Saturday, 25 July 2026

चोर

चोर 
(लघुकथा)
डॉ. अरमान आनंद

'शांति विहार' अपने नाम की तरह ही एक बेहद शांत और संभ्रांत कॉलोनी थी। वहाँ कुल सात परिवार रहते थे, जो रोज़मर्रा की ज़िंदगी में व्यस्त थे। लेकिन इस शांति के पीछे एक ऐसा तूफान छिपा था, जिसकी कल्पना किसी ने नहीं की थी। कहानी तब शुरू हुई जब कॉलोनी के कोने वाले दोमंजिला मकान में माधव बाबू रहने आए।

माधव बाबू एक एकाकी, सफेद बालों वाले और बेहद गंभीर इंसान थे। वे किसी से ज्यादा बात नहीं करते थे, लेकिन उनकी एक अजीब आदत ने जल्द ही पूरे मोहल्ले की नींद उड़ा दी। वे रोज़ रात को ठीक 10:00 बजे अपनी बालकनी में आते, आसमान की तरफ देखते और पूरी ताकत से एक बार चिल्लाते "चोओओर!

शुरू के कुछ दिनों तक सातों परिवारों ने इसे पूरी तरह अनसुना किया। सब आपस में हंसते और कहते, "बुड्ढा सठिया गया है।" लेकिन यह सिलसिला थमा नहीं। हर रात, ठीक 10 बजे, वह एक चीख सन्नाटे को चीर देती थी।

धीरे-धीरे हवा बदलने लगी। वह एक शब्द—'चोर'—सातों परिवारों के कानों में पिघले हुए सीसे की तरह उतरने लगा। सबसे पहला झटका सरकारी बाबू मिश्रा जी को लगा। वे टेबल के नीचे से मोटी घूस लेने के लिए बदनाम थे। एक रात जब 10 बजे माधव बाबू चिल्लाए, तो मिश्र जी के हाथ से नोटों की गड्डी छूट गई। उन्हें लगा, 'क्या इस बुड्ढे ने मुझे देख लिया है? यह चोर मुझे कह रहा है!'

अगले कुछ हफ्तों में यह डर संक्रामक बीमारी की तरह सातों घरों में फैल गया:
 वर्मा जी ने अपने सगे भाई को धोखे से संपत्ति से बेदखल किया था। उन्हें लगा कि माधव बाबू उनकी वसीयत के जालसाजी को जानते हैं।
  किराना दुकान वाले गुप्ता जी को लगा कि अनाज में मिलावटखोरी और तौल में हेराफेरी की वजह से उन्हें निशाना बनाया जा रहा है।
 शर्मा जी के बेटे ने अपनी कंपनी में लाखों का गबन किया था, शर्मा जी को लगा कि बात लीक हो चुकी है।
शुरुआत में हर परिवार सोचता था कि चोर कोई दूसरा पड़ोसी है, लेकिन धीरे-धीरे सबका अपना-अपना पाप उनके सामने आकर खड़ा हो गया। अब रात के 9:55 बजते ही सातों घरों में अजीब सी खामोशी छा जाती। लोग बत्तियां बुझाकर खिड़कियों से झांकते और खौफ से कांपने लगते।

जब पानी सिर से ऊपर चला गया, तो मोहल्ले के लोगों ने व्यक्तिगत रूप से सच पता करने का फैसला किया।
एक सुबह मिश्र जी ने पार्क में माधव बाबू को अकेले टहलते देखा। वे हिम्मत करके आगे बढ़े और पूछा, "माधव बाबू, आप रोज़ रात को १० बजे बालकनी में आकर किसे चोर-चोर चिल्लाते हैं? साफ़-साफ़ बताइए, क्या परेशानी है?"
माधव बाबू रुके, उन्होंने मिश्र जी की आँखों में गहराई से झांका, एक रहस्यमयी मुस्कान दी और सिर्फ इतना कहा: "मैं सब जानता हूँ।"  और वे आगे बढ़ गए।

अगले दिन वर्मा जी ने उन्हें गली के मोड़ पर घेरा। "देखिए माधव जी, इस मोहल्ले में सब शरीफ़ लोग रहते हैं। आप यह 'चोर' किसे कहते हैं? नाम बताइए उसका!"
माधव बाबू के चेहरे पर कोई भाव नहीं उभरा। वे ठंडे स्वर में बोले:
"मैं सब जानता हूँ।"

तीसरे दिन गुप्ता जी ने अपनी दुकान के सामने उन्हें रोका और वही सवाल दोहराया। माधव बाबू ने फिर वही जादुई और खौफनाक वाक्य कहा:
"मैं सब जानता हूँ।"

अब सातों परिवारों का डर पूरी तरह यकीन में बदल चुका था। उन्हें लगा कि माधव बाबू कोई साधारण इंसान नहीं, बल्कि एक ब्लैकमेलर हैं, जिसके पास सबके काले कारनामों के पक्के सबूत हैं। वे किसी भी दिन उन्हें तबाह कर सकते थे।
 
डर जब चरम पर पहुँच जाता है, तो इंसान हिंसक हो जाता है। सातों परिवारों ने एक गुप्त मीटिंग बुलाई। किसी ने पुलिस के पास जाने की हिम्मत नहीं की, क्योंकि सबके दामन पर दाग थे। अंततः सबने मिलकर एक खौफनाक फैसला लिया—माधव बाबू की हत्या
उन्होंने एक बेहद शातिर और अचूक प्लानिंग तैयार की, ताकि किसी एक पर शक न जाए और यह पूरी तरह से एक 'हादसा' लगे:

  तय हुआ कि हत्या ठीक रात के 10:00 बजे ही की जाएगी, ताकि उनके चिल्लाने के नियम का इस्तेमाल किया जा सके। गुप्ता जी ने दोपहर में माधव बाबू के सोने के दौरान, उनके घर के पिछले रास्ते से जाकर उनकी बालकनी की लोहे की रेलिंग के मुख्य नट-बोल्ट ढीले कर दिए। सातों परिवारों ने मोहल्ले के मंदिर में रात 9:45 बजे एक 'सामूहिक कीर्तन' का आयोजन किया। मोहल्ले के बाहर के कुछ पुजारियों को भी बुलाया गया। सीसीटीवी कैमरों के सामने सातों परिवार वहां बैठकर ताली बजा रहे थे। ठीक 9:58 बजे, योजना के अनुसार बिजली विभाग के एक कर्मचारी को पैसे देकर पूरी गली की स्ट्रीट लाइट बंद करवा दी गई।
ठीक 9:59 बजे, कीर्तन की ढोलक और मंजीरों की आवाज़ चरम पर थी। उसी वक्त सातों परिवारों द्वारा किराए पर लिए गए दो नकाबपोश युवक अंधेरे का फायदा उठाकर पाइप के सहारे माधव बाबू की बालकनी में चढ़ गए।
जैसे ही घड़ी की सुइयां 10:00 पर पहुँचीं, माधव बाबू हमेशा की तरह चिल्लाने के लिए बालकनी की तरफ बढ़े। ठीक उसी पल, नकाबपोशों ने बालकनी के फर्श पर ग्रीस और गाढ़ा तेल फेंक दिया और उन्हें पीछे से एक ज़ोरदार धक्का दिया।
माधव बाबू का पैर फिसला। उन्होंने खुद को संभालने के लिए सामने लगी लोहे की रेलिंग को कसकर पकड़ा। लेकिन ढीली हो चुकी रेलिंग उखड़ गई और माधव बाबू सीधे सिर के बल नीचे पक्की सड़क पर जा गिरे। गिरते वक्त उनके मुंह से आखिरी अधूरी चीख निकली— "चो..."
और चारों तरफ सन्नाटा पसर गया। दोनों नकाबपोश अंधेरे में गायब हो गए।

अगली सुबह पुलिस आई। मौके का मुआयना किया गया। फॉरेंसिक टीम ने पाया कि रेलिंग पुरानी और जंग लगी थी। फर्श पर गिरा तेल उनके गिरने के कारण घर में रखे किसी डिब्बे के टूटने से फैला माना गया। सबसे बड़ी बात—कॉलोनी के सभी सात परिवार उस वक्त मंदिर में भगवान के भजन गा रहे थे, जिसका पुख्ता वीडियो सबूत था। केस को एक 'दुर्भाग्यपूर्ण दुर्घटना' मानकर बंद कर दिया गया।
सातों परिवारों ने राहत की सांस ली। ब्लैकमेलर का खात्मा हो चुका था। उनके राज़ अब हमेशा के लिए दफन थे।
मर्डर के अगले दिन, रात के ठीक 10:00 बजे सातों परिवार अपने-अपने घरों में थे। गली में एकदम सन्नाटा था। बाहर से कोई चीख नहीं सुनाई दी।
लेकिन, जैसे ही घड़ी की सुई 10 पर ठहरी, सातों घरों के कमरों में बैठे लोगों के कानों के पर्दे फटने लगे। उन्हें अपने ही दिमाग के भीतर माधव बाबू की वही खौफनाक आवाज़ गूंजती हुई महसूस हुई— "चोओओर!"
उन्हें अचानक समझ आ गया कि बाहर का बोलने वाला तो मर गया, लेकिन उनके अंदर छुपा चोर अब उन्हें ताउम्र सोने नहीं देगा।

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