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Saturday, 24 June 2017

क्षणिकाएँ 2017

1 पांव दबा कर चलने में
चाय
छलक ही जाती है

2

मेरी बाइक के पीछे बैठ
तुम अपनी ठोड़ी
मेरे काँधे से टिका देती हो
जैसे धरती टिकती है आसमान पर

3

वह पुरुष कैसा
जिसके सीने पर भाला
और पीठ पर
नाखून का निशान न हो

4
इस देश में
लाल देख कर
सिर्फ
साँढ़ ही धैर्य नहीं खोता

5

स्त्री विमर्श

पुरुष ने अपने अपराधों का टोकरा
अपनी पत्नी के माथे मढ़ दिया
पत्नी थी
कि
कलंक लिये
सारा शहर घूमती रही

Tuesday, 27 December 2016

लघु कविता

तेरा मेरा प्यार
जैसे
एक कप चाय में
दो चम्मच चीनी एक्स्ट्रा

Saturday, 17 October 2015

क्षणिकाएँ

रेत पर मेरी कुछ क्षणिकाएँ

1.

उस दिन रेत

इंतज़ार में थी

ढेर बनी गुमसुम

उदास

उसे सीमेंट गिट्टी ईंट का इंतज़ार रहा होगा

ताकि रेत

एक मुकम्मल घर बन सके

2.

रेत

इंतज़ार में थी

कुछ बच्चों के

ताकि

रेत बन सके एक घरौंदा

3

रेत

एक साजिश है

जो गिरे हुए पुल में उतनी ही मिली है

जितना

ठीकेदार ने बजट से निकाल कर अफसर को दिया है


4


रेत

चाहे किउल नदी की हो

दुर्गावती की

सोन की हो

उड़ेलती रहती है

अपनी ही नदी में रक्त

रेत

गवाह है

लालची और हत्यारी पूरी एक कौम की


5


रेत

चांदनी रात में

अलसायी नदी का प्रेमी है


6.


रेत

को देखो

चांदनी रात में

चांदनी रात में रेत

बिखरा हुआ ताजमहल है


7.


रेत

शिव है

नश्वरता का शाश्वत इष्ट है

बनता है

बिखर जाता है

माथे के फूल उसे ढूंढते इधर उधर भटकते हैं इसी रेत पर


8.


रेत

आखिरी पड़ाव है

इस दुनिया को अलविदा कहने के पहले का

क्षणिका

दिमाग के आनंद कानन में
जैसे किसी शानदार केले के वन में
आता है एक हाथी
आता है
आता है
आता है
सब तहस नहस कर के चला जाता है

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सर गणेश दत्त