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Monday, 16 July 2018

चन्द्रकला त्रिपाठी की कविता

चिड़िया
शाख पर उतरती है नृत्य में घूमती हुई सी
समेटती पंख
और उड़ान
उड़ती है मगर चलना भी नहीं भूलती
मुडेर पर
जमीन पर कोना कोना थहाती परखती चंचल
सामने खुला अजगर का विकराल जबड़ा हो तो भी
वह जिंदा रहने को किसी पैतरे में नहीं आजमाती

उड़ती है पंख सलामत रहने तक
थिरकती है
और ज्यादा कोमल हो जाते हैं पेड़
और ज्यादा मधुर हो जाती हैं ध्वनियां
तब और जब
चहक कर लहरा उठती है किसी अंत में डूबते समय को न जानती हुई वह
एक नहीं अनेक होकर जीने के रंग में प्रेम भी
कलह भी
छेड़ भी
छीन झपट भी

ढेर सारी हैं ऐसी अमर नश्वरताएं
एक चिड़िया और अनेक चिड़िया की
मौत
कब की हार चुकी ऐसे
भरपूर जीने से

चंद्रकला त्रिपाठी

Monday, 16 April 2018

चंद्रकला त्रिपाठी की कविता आसिफा

बकरियां चराने जंगल में निकल जाती थी
नन्हें नन्हें पैरों से थिरकती चलती होगी वह आसिफा
पत्तों से खेलती इतराती जंगल से नहीं डरती थी वह
छलांगें लगा कर ऊची शाखों  से लटक झूलती थी वह
आठ साल की वह उम्र
जो मासूम निर्भय और विश्वासी होती है
वे दोनों बेरहम जब उसकी घोड़ी ढूंढने के छल से उसे घेर रहे थे
तब सचमुच डर गई थी वह बच्ची
स्तब्ध था जंगल जहां से उसे दरिंदगी के लिए उठा लिया गया था
मुंह में उड़ेल दी गई थी बेहोशी की दवा
हैवानों की जांघ के नीचे उसकी छटपटाहट को महसूस करो
महसूस करो इस तरह जैसे वहां तुम्हारी बच्ची थी
महसूस नहीं करोगे तो सब भूल जाओगे
भूल जाओगे कि दरिंदों को कोई डर नहीं था क्यो कि सुशासन
भगवान और वकील
सब उनके साथ थे
कुछ लेखक लेखिकाएं भी
उसे मृत्यु तक रौंदा गया
पत्थर पर पटका गया
कितना जबर था उसका जीना कि
बार बार कुचलने पर उसका खत्म होना
बर्बरों को महसूस नहीं हुआ
खूनसनी उसकी चिथी फटी देह
ओह मैंने आजतक इतना भयानक कभी नहीं लिखा
यह लिख रही हूं कि आसिफा
तुम्हारी यातनाएं
पुरानी खबर में ओझल न हों
हम सब सुरक्षित  ठीहों में बसे मां बाप
उस चीख को अपने कलेजे में धंसा लें
हमें चाहिए उन दरिंदों की उससे बहुत ज्यादा भयानक मौत
उससे कम कुछ नहीं
बहुत निहत्थे हुए हैं वे
जिन्हें विश्वास था कि भगवान सब देख रहा है

चंद्रकला त्रिपाठी

*प्रो चंद्रकला त्रिपाठी महिला महाविद्यालय बीएचयू में हिन्दी विषय की प्रोफेसर हैं, कवयित्री हैं साथ ही स्त्री विमर्श पर गहरी पकड़ रखती हैं। 
चंद्रकला त्रिपाठी

Wednesday, 11 April 2018

चंद्रकला त्रिपाठी की कविता औरतें

औरतें
पतियों पिताओं भाइयों के हिस्सों में बटी औरतें
प्रतिहिंसा का रास्ता नहीं चुनती
ढ़ेर सारी नफरत और हत्या का भी

अपने बल की नुमाइश नहीं करतीं कि
औरताना होने का बुरा भी नहीं मानती
अपने बोलने का इंतजार करती हैं
चुप कराए जाने का बुरा नहीं मानती

पहाड़ उठा लेती हैं
बोझ फटकती हैं
दाने पकाती हैं
कोख संभालती हैं
कितने बियाबान बसा चुकी हैं अहसान जताए बिना

अपनी जात को सिखाने में कोताही नहीं करती कि
ये पिता हैं वो बाबा नाना
वो पड़ोस के चाचाजी
वो मामा ऐसा कि सांप को भी मामा कह दो तो सारा विष उतार कर रख दे
वो सगा बेसगा भाई
भाई का दोस्त भी भाई
इतना सारा सगापन जुटाती संभालती हैं औरतें कि
रात बिरात ऊंचे खाले सगे ही मिलें
बेदाग पार लगा दें जीवन

सारे रिश्तों में खुद को देहभर समझी जाने वाली नृशंसता
वे समझ कर भी नहीं समझना चाहतीं

पाप अपनी देह का हश्र समझती आईं वे और
यही चेताती आईं बेटियों बहनों को
दो कौड़ी की नहीं रहोगी तुम और उनका कुछ नहीं बिगड़ेगा क्योंकि
जमाना उनका है
कोने कतरे में लुकाई
जीने में कोई आवाज़ नहीं करती ये औरतें
पृथ्वी पर छोड़ चुकी हैं बर्बरता के लिए पूरी जगह

ख़त्म हुई पृथ्वी पर स्त्री के लिए पारिवारिकता ?
अब तो ईश्वर का घर भी
हत्या और बलात्कार की जगह हुआ

क्या तय करना है स्त्री
बांझ हो जाना
दूध की जगह ज़हर की घुट्टी पिला देना

पता नहीं क्या करने से इस जघन्यता का जवाब बनेगा मगर जब भी बनेगा सिर्फ
तुम्हारे बल पर बनेगा
समझी
तुम जो रोज़
धरती भर चलती हो
आसमान भर आजादी भी जोड़ लो

चंद्रकला त्रिपाठी

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सर गणेश दत्त