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Saturday, 25 July 2026

चोर

चोर 
(लघुकथा)
डॉ. अरमान आनंद

'शांति विहार' अपने नाम की तरह ही एक बेहद शांत और संभ्रांत कॉलोनी थी। वहाँ कुल सात परिवार रहते थे, जो रोज़मर्रा की ज़िंदगी में व्यस्त थे। लेकिन इस शांति के पीछे एक ऐसा तूफान छिपा था, जिसकी कल्पना किसी ने नहीं की थी। कहानी तब शुरू हुई जब कॉलोनी के कोने वाले दोमंजिला मकान में माधव बाबू रहने आए।

माधव बाबू एक एकाकी, सफेद बालों वाले और बेहद गंभीर इंसान थे। वे किसी से ज्यादा बात नहीं करते थे, लेकिन उनकी एक अजीब आदत ने जल्द ही पूरे मोहल्ले की नींद उड़ा दी। वे रोज़ रात को ठीक 10:00 बजे अपनी बालकनी में आते, आसमान की तरफ देखते और पूरी ताकत से एक बार चिल्लाते "चोओओर!

शुरू के कुछ दिनों तक सातों परिवारों ने इसे पूरी तरह अनसुना किया। सब आपस में हंसते और कहते, "बुड्ढा सठिया गया है।" लेकिन यह सिलसिला थमा नहीं। हर रात, ठीक 10 बजे, वह एक चीख सन्नाटे को चीर देती थी।

धीरे-धीरे हवा बदलने लगी। वह एक शब्द—'चोर'—सातों परिवारों के कानों में पिघले हुए सीसे की तरह उतरने लगा। सबसे पहला झटका सरकारी बाबू मिश्रा जी को लगा। वे टेबल के नीचे से मोटी घूस लेने के लिए बदनाम थे। एक रात जब 10 बजे माधव बाबू चिल्लाए, तो मिश्र जी के हाथ से नोटों की गड्डी छूट गई। उन्हें लगा, 'क्या इस बुड्ढे ने मुझे देख लिया है? यह चोर मुझे कह रहा है!'

अगले कुछ हफ्तों में यह डर संक्रामक बीमारी की तरह सातों घरों में फैल गया:
 वर्मा जी ने अपने सगे भाई को धोखे से संपत्ति से बेदखल किया था। उन्हें लगा कि माधव बाबू उनकी वसीयत के जालसाजी को जानते हैं।
  किराना दुकान वाले गुप्ता जी को लगा कि अनाज में मिलावटखोरी और तौल में हेराफेरी की वजह से उन्हें निशाना बनाया जा रहा है।
 शर्मा जी के बेटे ने अपनी कंपनी में लाखों का गबन किया था, शर्मा जी को लगा कि बात लीक हो चुकी है।
शुरुआत में हर परिवार सोचता था कि चोर कोई दूसरा पड़ोसी है, लेकिन धीरे-धीरे सबका अपना-अपना पाप उनके सामने आकर खड़ा हो गया। अब रात के 9:55 बजते ही सातों घरों में अजीब सी खामोशी छा जाती। लोग बत्तियां बुझाकर खिड़कियों से झांकते और खौफ से कांपने लगते।

जब पानी सिर से ऊपर चला गया, तो मोहल्ले के लोगों ने व्यक्तिगत रूप से सच पता करने का फैसला किया।
एक सुबह मिश्र जी ने पार्क में माधव बाबू को अकेले टहलते देखा। वे हिम्मत करके आगे बढ़े और पूछा, "माधव बाबू, आप रोज़ रात को १० बजे बालकनी में आकर किसे चोर-चोर चिल्लाते हैं? साफ़-साफ़ बताइए, क्या परेशानी है?"
माधव बाबू रुके, उन्होंने मिश्र जी की आँखों में गहराई से झांका, एक रहस्यमयी मुस्कान दी और सिर्फ इतना कहा: "मैं सब जानता हूँ।"  और वे आगे बढ़ गए।

अगले दिन वर्मा जी ने उन्हें गली के मोड़ पर घेरा। "देखिए माधव जी, इस मोहल्ले में सब शरीफ़ लोग रहते हैं। आप यह 'चोर' किसे कहते हैं? नाम बताइए उसका!"
माधव बाबू के चेहरे पर कोई भाव नहीं उभरा। वे ठंडे स्वर में बोले:
"मैं सब जानता हूँ।"

तीसरे दिन गुप्ता जी ने अपनी दुकान के सामने उन्हें रोका और वही सवाल दोहराया। माधव बाबू ने फिर वही जादुई और खौफनाक वाक्य कहा:
"मैं सब जानता हूँ।"

अब सातों परिवारों का डर पूरी तरह यकीन में बदल चुका था। उन्हें लगा कि माधव बाबू कोई साधारण इंसान नहीं, बल्कि एक ब्लैकमेलर हैं, जिसके पास सबके काले कारनामों के पक्के सबूत हैं। वे किसी भी दिन उन्हें तबाह कर सकते थे।
 
डर जब चरम पर पहुँच जाता है, तो इंसान हिंसक हो जाता है। सातों परिवारों ने एक गुप्त मीटिंग बुलाई। किसी ने पुलिस के पास जाने की हिम्मत नहीं की, क्योंकि सबके दामन पर दाग थे। अंततः सबने मिलकर एक खौफनाक फैसला लिया—माधव बाबू की हत्या
उन्होंने एक बेहद शातिर और अचूक प्लानिंग तैयार की, ताकि किसी एक पर शक न जाए और यह पूरी तरह से एक 'हादसा' लगे:

  तय हुआ कि हत्या ठीक रात के 10:00 बजे ही की जाएगी, ताकि उनके चिल्लाने के नियम का इस्तेमाल किया जा सके। गुप्ता जी ने दोपहर में माधव बाबू के सोने के दौरान, उनके घर के पिछले रास्ते से जाकर उनकी बालकनी की लोहे की रेलिंग के मुख्य नट-बोल्ट ढीले कर दिए। सातों परिवारों ने मोहल्ले के मंदिर में रात 9:45 बजे एक 'सामूहिक कीर्तन' का आयोजन किया। मोहल्ले के बाहर के कुछ पुजारियों को भी बुलाया गया। सीसीटीवी कैमरों के सामने सातों परिवार वहां बैठकर ताली बजा रहे थे। ठीक 9:58 बजे, योजना के अनुसार बिजली विभाग के एक कर्मचारी को पैसे देकर पूरी गली की स्ट्रीट लाइट बंद करवा दी गई।
ठीक 9:59 बजे, कीर्तन की ढोलक और मंजीरों की आवाज़ चरम पर थी। उसी वक्त सातों परिवारों द्वारा किराए पर लिए गए दो नकाबपोश युवक अंधेरे का फायदा उठाकर पाइप के सहारे माधव बाबू की बालकनी में चढ़ गए।
जैसे ही घड़ी की सुइयां 10:00 पर पहुँचीं, माधव बाबू हमेशा की तरह चिल्लाने के लिए बालकनी की तरफ बढ़े। ठीक उसी पल, नकाबपोशों ने बालकनी के फर्श पर ग्रीस और गाढ़ा तेल फेंक दिया और उन्हें पीछे से एक ज़ोरदार धक्का दिया।
माधव बाबू का पैर फिसला। उन्होंने खुद को संभालने के लिए सामने लगी लोहे की रेलिंग को कसकर पकड़ा। लेकिन ढीली हो चुकी रेलिंग उखड़ गई और माधव बाबू सीधे सिर के बल नीचे पक्की सड़क पर जा गिरे। गिरते वक्त उनके मुंह से आखिरी अधूरी चीख निकली— "चो..."
और चारों तरफ सन्नाटा पसर गया। दोनों नकाबपोश अंधेरे में गायब हो गए।

अगली सुबह पुलिस आई। मौके का मुआयना किया गया। फॉरेंसिक टीम ने पाया कि रेलिंग पुरानी और जंग लगी थी। फर्श पर गिरा तेल उनके गिरने के कारण घर में रखे किसी डिब्बे के टूटने से फैला माना गया। सबसे बड़ी बात—कॉलोनी के सभी सात परिवार उस वक्त मंदिर में भगवान के भजन गा रहे थे, जिसका पुख्ता वीडियो सबूत था। केस को एक 'दुर्भाग्यपूर्ण दुर्घटना' मानकर बंद कर दिया गया।
सातों परिवारों ने राहत की सांस ली। ब्लैकमेलर का खात्मा हो चुका था। उनके राज़ अब हमेशा के लिए दफन थे।
मर्डर के अगले दिन, रात के ठीक 10:00 बजे सातों परिवार अपने-अपने घरों में थे। गली में एकदम सन्नाटा था। बाहर से कोई चीख नहीं सुनाई दी।
लेकिन, जैसे ही घड़ी की सुई 10 पर ठहरी, सातों घरों के कमरों में बैठे लोगों के कानों के पर्दे फटने लगे। उन्हें अपने ही दिमाग के भीतर माधव बाबू की वही खौफनाक आवाज़ गूंजती हुई महसूस हुई— "चोओओर!"
उन्हें अचानक समझ आ गया कि बाहर का बोलने वाला तो मर गया, लेकिन उनके अंदर छुपा चोर अब उन्हें ताउम्र सोने नहीं देगा।

Wednesday, 25 March 2026

अरमान के शेर

मैने सर झुकाया, तुझे इल्म नहीं
जा तू पत्थर हो जा, परवाह नहीं।

अरमान

Tuesday, 11 February 2025

कविता वो खुश नहीं है - अरमान आनंद

वो खुश नहीं है
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उसने कहा है वो खुश नहीं है

ब्याह के बाद प्रेमी से हुई पहली मुलाकात में
उदास चेहरे के साथ
मिली
किसी बाज़ार में
उसने छूटते ही कहा
कि वो खुश नहीं है

प्रेमी प्रेमिका के ब्याह के बाद कई रातों से जगा हुआ
बुखार में तपता
उजाड़ चेहरे के साथ मिला

अब प्रेमी पहले से ठीक है
चेहरे पर रौनक लौट आई है
मन शांत है
ये जानकर
कि वो खुश नहीं है

वो लौट गई
वापस ससुराल
सास ससुर को आदर
देवर को दुलार
पति को खूब करके प्यार
प्रेमी को देकर सांत्वना
सोएगी
नींद भर

प्रेमी
उचाट मन से रात भर देखता रहा छत
सोचता रहा
होता हुआ
कभी खुश कभी उदास
वो खुश नहीं है

अरमान आनंद

Saturday, 9 November 2024

व्याकरण कविता अरमान आंनद

व्याकरण

भाषा का हो या समाज का 
व्याकरण
सिर्फ हिंसा सिखाता है

व्याकरण पर चलने वाले लोग
सैनिक का दिमाग रखते हैं

प्रश्न करना 
जिनके अधिकार क्षेत्र से बाहर की चीज़ है
और
हिंसा
एक आदेश

व्याकरण की रक्षा करना
भविष्य और संभावनाओं हत्या करना है

अरमान आनंद

Friday, 1 November 2024

मैं वहीं मिलूंगा : अरमान आनंद

मुझे न ढूंढ
खो जा

मैं वहीं मिलूंगा
जहां
न तू पहुंच सके
न मैं आ सकूं
मिलूंगा
जहाँ
सब कुछ
 नहीं है

मुझे न ढूंढ
खो जा

गहरे सन्नाटे में
पदचाप की तरह
चला जा

मेरा हाथ न थाम
मेरी आत्मा में घुल
मेरी साँसों में मिल
मेरी आँखों में खिल

मुझे मृत्यु दे
मुझे जी
मुझे पहन
ओढ़
बिछा

जा
चला जा
मेरे साथ बिखर जा
संवर जा
बह जा

मुझे न ढूंढ

खो जा

अरमान आनंद

नया रंग : अरमान आनंद



दीवारों की तरह
इंसानों के भी रंग उतरते हैं

नया रंग भरते रहिए

Thursday, 6 August 2020

अरमान आनंद की कविता बेगुसरैया की आंख से बनारस

बनारस (1)

तुम्हारे महात्मय से
सर जैसे ही झुका
गोड़ गोबर*में  घुसते घुसते बचा
अहो भाग्य
वहां गड्ढा नहीं था।

*गोड़- पैर

बनारस (2)

मुंह इधर कर न बांदर
उधर क्या देखता है
कंघी कर पानी मार के
ऐसे कैसे जीता है
हम तुझे क्योटू बनावेंगे
तू कशिया चरस पीता है

बनारस(3)

अच्छी अच्छी सुनना हो
किसी और से कहो
न गालिबन तुम वो रहे
न हम ग़ालिब

बनारस(4)

किधर किधर न ढूँढा तुझको रे
तू इधर
शाही नाले में गोंता मार बैठा है
अब तू
जब इतना ऐंठा है
कल के कल जापान से कैमरा वाला ड्रोन मंगवाएंगे
कल के कल तुझे बाहर निकलवायेंगे

बनारस(5)

बउआ बनारसी
आज कल टीना का एक तलवार रखता है 
लचर पोंय टाइप
घुस गया एक दिन बूचर खाने में
बोला 
गाय हमारी माता है
टुन टूना टुन
बजा तभी उका फोन
आवाज आई
मैया बीमार हैं तुमरी
घर आ जाओ
पेट से दस किलो पिलास्टिक निकला है
हाय राम दईया रे दईया
मियान कने है

बनारस(6)

अरे बनारसी
सुना कि रानी बिक्टोरिया के पाँव तल्ले बजरी बिछा के
एगो बनारसी राजा कंगला होय गवा
और 
अब तो धरम करम बेच के सब अमीर हो रहे
तू रह गया कैसे फ़टे का फ़टे 



Monday, 29 June 2020

अरमान आनंद की कविता कॉमरेड दीमक

अरे यार कॉमरेड दीमक
तुम तो अव्वल दर्जे के क्रान्तिकामी हो
पता चला है जिस कुर्सी पर जमते हो उसे ही खा जाते
और सबसे पहले पैर फिर हत्था
और तो और
कुर्सी जिस मेज की ओट में इतराती है
उसका भी भोज उड़ाते हो
यार खा जाते हो
खाते जाते हो
पहले अपनी कुर्सी
फिर दूसरे की फिर तीसरे की...
हद है मतलब
यार कॉमरेड
कॉमरेड दीमक

जानते हो
हर कॉमरेड को दीमक होना था
मगर पता है
सब
मकड़ी हो गए

कुर्सी के पौव्वों के बीच
पहले अपना घर बनाते हैं
फिर धीरे धीरे
शिकार फँसाते हैं



Wednesday, 17 June 2020

अरमान आनंद की कविता मेरे शहर का आसमान

मेरे शहर का आसमान तेरे शहर के आसमान से बिलकुल अलग है
फिर भी मेरी शामों में बसती है
शाम तेरी
डूबते सूरज की लाली ठहरी है
अब भी एक कोने भर आसमान में
जैसे मुस्कुराते मुस्कुराते थक गया हो कोई
एक बात तो साफ़ है
अब काम का बोझ सिर्फ बाजुओं की मांसपेशियों तक नहीं रह गया है
तुम लौटती होगी फुटपाथ से
कई नजरों से होकर 
मैं किसी बीयर की दूकान की पिछली गली में तब्दील हो रहा हूँ
शहर की सारी टैक्सियां हमारे ठिकानों को जानती हैं
और सारे ठिकाने 
सिर्फ महीने की एक तारीख का इंतज़ार करते हैं
इन दो शहरों के दरम्यान
हमारा प्यार
अब तुम्हारे किचन में लगा हुआ एम् सी डी का नल है
जिसमें पानी की जगह हवा निकलती है ....

Sunday, 17 November 2019

कविता : कम्बखत ये गरीब

ये गरीबों के बच्चे
कम्बखत

बिना टैक्स दिए
पढ़ लेते हैं 
देश के बड़े संस्थानों में

फीस बढ़ाओ और 
संस्थानों को इनकी पहुंच से बाहर कर दो

बिना टैक्स दिए लेते हैं
देश की हवा में सांस
और
टैक्स पेयर के हिस्से की भी हवा खींच लेते हैं

सायकिल से मर्सिडीज की सड़क जाम कर देते हैं

देश की रफ्तार बढ़ाने के लिए
इन गरीब पिल्लों को 
मारो
धक्के दो
और विकास रथ से नीचे उतार दो

Saturday, 16 November 2019

कविता: प्रेम जो कभी बासी नहीं होता

बहुत बार दुहराने पर जो बासी नही होता
वह प्रेम ही है
बाक़ी
सब कुछ बासी हो जाता है
स्वर्ग
स्वाद
देह
दान
ज्ञान
जीवन
दुनिया- जहान

Monday, 11 November 2019

सवाल :कविता

सवाल

सवाल
महफ़िल में किसी बच्चे की तरह
बार बार
उठ खड़ा होता है
लोग नाच के नशे में चिल्लाते हैं

बैठ जाओ
बैठ जाओ

अरमान

Wednesday, 25 September 2019

अरमान आनंद की लघुकथा एन एच 31

एन एच 31 (लघुकथा)

रमेसर आज जल्दी उठ गया। रोज से लगभग दो घण्टे पहले । आसमान पर नजर डाली। घनघोर बादलों  के कारण समय का ठीक-ठीक अंदाजा नही लगा सका फिर भी उसने सोचा तीन साढ़े तीन तो बज ही रहे होंगे। सोने की कोशिश की लेकिन दुबारा नींद नही आई.. बगल में देखा उसका बीस साल का पोता पवन गहरी नींद में सो रहा था।  रमेसर बेगूसराय में एन एच 31 के ठीक किनारे चाय की दुकान चलाता था। दिन में दुकान पर उसके साथ उसका बेटा भी आ जाता लेकिन रात में वह घर चला जाता। रामेश्वर की बीबी मर चुकी थी। अब वह घर जाकर करता भी क्या? एक कमरे वाले घर मे उसका बेटा बहु और बच्चे रहते हैं । बच्चे क्या एक पोती और एक पोता। पोता बड़ा हुआ तो साथ ही आकर सोने लगा।
    लाख कोशिशों के बाद भी जब रमेसर को दुबारा नींद नही आई तो वह घरेलू चिंताओं में खो गया। पोती पूजा की शादी करनी है सोलह की हो गयी है। कहाँ से आएगा पैसा?बहु सबीतरी और पोती पूजा घर घर बर्तन माँजती हैं और यह चाय की दुकान है तो जीवन जैसे तैसे चल जाता है।बेटा तो बौधा ही है। किसी काम का नही इसलिए चाय की दुकान पर साथ बैठा लिया ।एक ये पोता पवन है उसका दाख़िला तो उसने सरकारी स्कूल में कराया था लेकिन पढ़ाई उसने छोड़ दी । काम काज कुछ करता नही दिन रात कट्टा लेकर घूमता रहता है। सुना है बेगूसराय में बड़े पुलिस अधिकारी आए हैं बेगूसराय को अपराधमुक्त बनाने का सरकारी ऑर्डर जारी हुआ है। कहीं बिसनमा के जैसे इसका भी इनकाउंटर न हो जाये । लाख समझाया मानता ही नही।
       बिसनमा रामेश्वर के पोते पवन का ही दोस्त था ।छह महीने पहले बिसनमा ने लछमी पेट्रोल पंप पर डकैती डाली । पेट्रोल पंप के मालिक की सरकार में पहुंच थी । दबाव डलवा कर बिसनमा का सीधा इनकाउंटर करवा दिया। दीरा जा कर पुलिस उठाई थी उसको। ठीक ही हुआ पुलिस ने मार दिया। पूजा को जब तब ले के अलका सिनेमा में घुसा रहता था। रमेसर ने लम्बी सांस ली।
      रमेसर के बेटे का नाम ढिबरी था। वह बचपन मे वह ढिबरी को ढूंढता रहता और जब मिल जाये तो उसका ढक्कन खोल बाती से किरोसिन तेल चाटता रहता। रमेसर ने भाई ने उसका नाम ढिबरी रख दिया। रमेसर सोचने लगा कि बैल बुद्धि ढिबरी से तो पूजा की शादी नही सम्भल पाएगी । पूजा की शादी उसे अपने जीते जी करनी होगी कहाँ से आएगा पैसा ? पिछला कर्जा बाकी है । कम से कम पचास बाराती तो आएंगे ही फिर दूल्हा उसका बाप माई सबका कपड़ा-लत्ता । सोना न सही चांदी का ही बिछिया अंगूठी भी बनेगा। बहुत खर्चा है । सोचते सोचते रमेसर ने करवट बदली।अचानक  खटर पटर की आवाज आई । रमेसर ने गर्दन उठा कर देखा एक मोटा चूहा छप्पर से बर्तन पर कूदा और अंधेरे में खो गया।
    आज तो रामजीवन सिंह भी आएगा बोला है कम से कम पांच हजार रुपया देना ही होगा। कर्जा तो जान का जपाल ही हो जाता है । पवन को डेंगू न होता तो यह कर्जा नही होता। कमबख्त एक मच्छर सारी जमापूंजी खा गया। चलो यह पैसा देकर आज लगभग बरी हो जाना है । थोड़ा बहुत बचेगा। जल्दी ही चुकता कर देंगे।  दुपहरी में सौ रुपया मोफतिया को भी देना है चाय दुकान लगाने का रंगदारी । पवनमा क्या रंगदार बनता है। मोफतिया है असली रंगदार ।आ जाता है तो सिपाही उठ के खड़ा हो जाता है । यामाहा मोटरसाइकिल उसकी हरदम स्टार्ट ही रहती है । कब जाने दुष्मनमा उस पर हमला बोल दे। तभी रमेसर के कान के पास एक मच्छर भनभनाने लगा। रमेसर ने चपत लगाई। पता नही मच्छर मरा या नही आवाज बन्द हो गयी।
        मच्छर से रमेसर का ध्यान टूटा तो उसने देखा दिन साफ हो रहा है पांच बजने वाले होंगे । रमेसर उठ बैठा।  एन एच इकत्तीस पर लगातार ट्रक गुजर रहे थे। सुबह के शांत शहर के बीच जाती इस सड़क पर ट्रकों का गुजरना सांय सांय की ध्वनि उत्त्पन्न कर रहा था। रमेसर ने सोचा घर जा कर नहा धो कर आ जाऊं। उसने पवन को उठा कर कहा घर जा रहा हूँ लौटकर आता हूँ तब तक झाड़ू दे कर और चूल्हा जला कर रखना। दुकान के पीछे से उसने सायकिल निकाली  और एन एक 31 पर बढ़ चला ।
   रमेसर सायकिल पर धीरे धीरे  पैडल मारता हुआ घर की ओर बढ़ चला । कपड़ों के नाम पर एक मैली धोती और फटा हुआ बनियान पहने  हुए था । उसका शरीर दुबला पतला और थोड़ा झुका हुआ। लग रहा था जैसे संसार की इस आपाधापी में वह जीवन को अभिशाप की तरह जीताऔर गरीबी से लड़ता हुआ जा रहा हो । बारिश के मौसम से सड़कें भी भीगी हुई थीं। अपने मुहल्ले की गली के पास वह ज्यों मुड़ा एक तेज रफ्तार ट्रक आया और रमेसर को कुचलता हुआ निकल गया।

अरमान आनंद

#लघुकथा #shortstory #story #hindistory

Friday, 20 September 2019

पान पर शेर

पान पर शेर

प्रेम में आह वो पान का कुचला जाना
लाली होठ पर आई तो मगर कुर्बान होकर

अरमान

Saturday, 22 June 2019

अरमान आनंद की कविता गन्ध

वह
प्रेम जल की मछरी थी
धारा के विपरीत ही तैरती
नदी की गोद मे अटखेलियां करती
नाचती आँखें
सुनहली देह
और
लचक चाल
उसे औरों से अलग बनाती
एक साँझ
सारा पानी बह गया
वह दो पहर तक रेत पर तड़पती रही
सुबह तक रोई
मगर इतना पानी इकट्ठा न कर सकी कि जी पाती
सूरज आया
देखी उसने मछरी अधमरी
छुआ उसे
बेचारी मछरी मर गयी
मर्दों में खबर फैली
औरतों में गंध
दिन भर उसके देह गंध की चर्चा होती रही
कहते हैं
उस रात कोई उसे दूर छुपा आया
दुनियां में गंध न फैले लोग इसका खास ख्याल रखते हैं
हर बात को मिट्टी में दबा कर
भूल जाते हैं

अरमान आनंद

Saturday, 15 June 2019

Monday, 6 May 2019

अरमान आनंद की कविता सत्य

सत्य
जब भी समक्ष होगा सत्य
तुम अचेत हो जाओगे
और नही हुए
तो कम से कम लड़खड़ा तो जरूर जाओगे
सत्य तुम्हारी कल्पनाओं के उलट होगा
एक बात और
देखो सत्य का चेहरा
वह कभी भी
खूबसूरत नहीं होगा
सत्य ही अगर देवता है
तो सोचो उन देवताओं के बारे में
जिनके तुमने मनोहारी रूपों के वर्णन सुने

Friday, 17 August 2018

अरमान आनंद की कविता सुनो

आसमान से झड़ते हैं शब्द
धरती से टकरा कर
सन्तूर से बजते हैं

सुनना
किसी खाली रात में  जब तुम्हारा सीना
आसमान की तरह सजल बादलों से भरा हो

सुनना उसे
जैसे
पड़ोस की छत पर बजते रेडियो को सुनते हो

महसूस करना
जैसे न
होकर भी तुम्हारे पास कोई होता है

Friday, 3 August 2018

पुण्य प्रसून वाजपेयी के लिए

आओ
पत्रकारों हम
इस तम में तुम्हारे मारे जाने का मातम मनाते हैं
तुम्हारे बाद का हाल भी तुमको बताते हैं

सुना है वो
सच की लाश को
जलाएंगे नहीं
बल्कि दफनायेंगे

नंगा राजा रोशनी के खिलाफ है
और
तुम्हारा जुर्म की तुमने दियासलाई की कीमत पूछी

Saturday, 16 June 2018

गंगा

माँ गंगा
हमें क्षमा करना
हम
मनुष्य
बिच्छुओं के वंशज हैं
हम अपनी जननी को ही खा जाते हैं
और हम
सुरक्षा देने वाले साधू को भी
डस लेते हैं

अरमान आनंद

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सर गणेश दत्त