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Friday, 6 October 2017

पाश की कविता ' सबसे खतरनाक ' पर केन्द्रित मोहन कुमार झा की समीक्षा


(पढ़िये पाश और उनकी कविता '
सबसे खतरनाक ' पर केन्द्रित मेरा लेख )
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क्या आपने कभी यह बात सोची है कि एक कविता क्या-क्या कर सकती है ? क्या-क्या हो सकती है ? अगर नहीं तो आप अवतार सिंह संधू यानी कवि ' पाश ' की कविता ' सबसे ख़तरनाक ' जरुर पढ़ लें । इस कविता को ठीक से पढ़ने के बाद ये हो सकता है कि आप इस तरह की कविताओं को खोज-खोज के पढ़ने के मरीज़ हो जाए। ये भी हो सकता है कि आपके रगों में बहता खून बहुत तेजी से दौड़ने लगे। और ये भी हो सकता है कि आप वो न रह जाए जो आप पहले थें। यह कविता अन्यायी और मतलबी हुकूमतों के लिए किसी बुरे सपने से कम नहीं है।यह कविता एक ऐसी दवाई है जिसे पीकर मुर्दा जनता के भीतर क्रांति के लिए आगे बढ़ने का हौसला पैदा होता है।आप यकीन करें न करें यह एक ऐसी कविता है जिससे हुकूमतें डरती हैं। 
इस कविता को समझने के लिए दो बातों का जरुर ध्यान रखना चाहिए । पहला कि कवि के लिए क्या गलत है और क्या खतरनाक।सदियों से आदमी के द्वारा आदमी को लूटा जा रहा है। सदियों से हक की मांग करने वालों को बेरहमी से मारा जाता रहा है। सदियों से चालाक लोगों द्वारा किसी शातिर शिकारी की तरह व्यवस्था , नियम -कानून आदि का जाल फैला कर निरीह और बेबस लोगो का शिकार किया जाता रहा है। और उन्हें आगे बढ़ने से रोका जाता रहा है।पर कवि इनकों गलत तो कहता है पर खतरनाक नहीं कहता। तो फिर ख़तरनाक क्या है ? कवि के नजर में ख़तरनाक है आदमी के भीतर अन्याय से लड़ने की इच्छाशक्ति का अभाव। खतरनाक है दिल में तड़प का न होना । खतरनाक है सबकुछ चुपचाप सहना , खतरनाक है जरुरी समय पर किसी जरुरी प्रतिक्रिया का न होना। खतरनाक़ है चुनौती से लड़ने के मुकाबिल उसकी अनदेखी करना ।सबसे खतरनाक है बेहतर कल का कोई सपना न होना। 
कवि को भविष्यद्रष्टा कहा जाता है। पाश ऐसे ही भविष्यद्रष्टा कवि हैं।इस बात का प्रमाण इसी कविता के अंतिम आधे हिस्से में मिल जाता है।क्या आज हमारा समाज अति असंवेदनशील नहीं हो गया है ? क्या आज हमारे समाज में आपसी प्रेम और भाईचारे की ऐसी स्थिति है जिसपर हम-आप संतोष कर सकें ? आख़िर क्यों स्त्री को शक्ति और देवी मानने वाले भारतीय समाज में स्त्रियों की स्थिति आज भी सर्वोत्तम नहीं कही जा सकती ?
दरअसल् हमने लड़े बिना ही हार मान ली है। पश्चिम का प्रभाव सड़क से लेकर संसद तक जबरदस्त छाप छोड़ चुका है और इसकी वज़ह से समाज से लेकर सियासत तक की चलने के तौर -तरीके बदल गए है।परन्तु समाज व्यक्ति से बनता है और व्यक्ति से ही चलता है। इसलिए जिस दौर में समाज की आबादी का एक बड़ा भाग पथ भूल गया हो , एक कवि की चुनौती यहीं से शुरु होती है कि वह राह भूलें समाज को मार्ग पर लाने का प्रयास करे। और पाश इस कविता में यह कार्य करने का प्रयास करते हैं। पाश पंजाब के क्रांतिकारी कवि थे। उन्होंने अलग खालिस्तानी आन्दोलन को बहुत करीब से देखा और समझा था।लोग मारे जा रहे थे।
हुकूमत सत्ता के नशे में चूर आन्दोलन को कुचलने पर लगी थी। आम आदमी रोटी के इंतज़ाम में इस कदर पस्त था कि उसे इन सब बातों से कोई फर्क नहीं पड़ता था। ऐसे कठिन दौर में जलते हुए पूजाब की आत्मा को बचाने का संकल्प लिये यह कवि हमसे यह कहता है कि जब जुर्म और अन्याय देखकर आपकी आंखों में मिर्ची न लगे और आप एक मुर्दा खामोशी ओढ़े रहें तो यह समझ लेना चाहिए कि आपकी आत्मा मर गई है।पाश की यह कविता जिन्दगी में लागातार दोहराव की प्रक्रिया से अलग सजग आत्मा के साथ अग्रसर होने के लिए प्रेरित करती है। 
पाश को क्रांति का कवि कहा जाता है।बहुत से लोग पाश को एक ख़ास विचारधारा से जोड़कर देखते हैं जोकि मेरे विचार से ठीक नहीं है।वास्तविकता यह है कि पाश स्पष्टता और बेबाकीपन के कवि हैं। चाहे उनकी कविता हो या निजी जिन्दगी पाश ने जो भी किया , जो भी लिखा , पूरी स्पष्टता , खुलापन और बेबाकी से किया और लिखा। उस वक्त पाश के आसपास जिस तरह की घटनाएं घटित हो रहीं थी उसमें प्रेम गीत गाने की न तो कोई जरुरत थी और न ही उसका कोई महत्व ही था। समस्याग्रस्त पंजाब अपनी समस्या बताने, समाधान के लिए नये मार्ग तलाशने और उत्साह पैदा करने वाले शब्दों को पढ़ने-सुनने के लिए व्याकुल था। और पाश की कविताएं इस आवश्यकता की पूर्ति करती हैं।
यह एक संयोग है कि पाश की मृत्यु उसी तारीख को हुई जिस तारीख को भगत सिंह की।पाश कि कविताओं का मिजाज बहुत कुछ भगत सिंह के विचारों से मिलता है। और वो यह है कि मरने से पहले मरना मनुष्य होने की निशानी नहीं है। अंतिम सांस तक बेहतर कल के सपने को साकार करने के लिए जुर्म और अन्याय के ख़िलाफ़ संघर्ष करना ही हमारे ज़िन्दा होने की पहचान है।शायद इसी अर्थ में डा. नामवर सिंह जी ने पाश को " शापित कवि " कहा है। सच है कि पाश एक शापित कवि थे और वो छोटी उम्र मिलने के बावजूद जिन्दगी भर अन्याय के विरुद्ध संधर्ष के गीत 
गाने के लिए अभिशप्त थे।

पाश को बहुत कम उम्र मिली थी। वे कुल 38 वर्ष ही जीवित रहे।हिन्दी के एक और आधुनिक कवि सुदामा पाण्डेय ' धूमिल ' को भी बहुत कम उम्र मिली थी।धूमिल का निधन भी 39 वर्ष की ही अवस्था में हो गया।मगर पाश और धूमिल की कविताओं की उम्र बहुत लम्बी है , इसमें कोई शक नहीं । इन दोनों कवियों की कविताएं सरल शब्दों में अपने समय की धड़कन को बयां करती हैं।पटकथा धूमिल की अक्षयकीर्ति का मूल है तो ' सबसे ख़तरनाक ' पाश की प्रसिद्धि का आधार।इनमे से किसी एक की कविताएं पढ़ने पर दूसरा खुद-ब-खुद हमारे जेहन में उपस्थित हो जाता है।
धूमिल के समान पाश के यहां भी कुछ शब्दों और उपमाओं पर आपत्ति दर्ज की जा सकती है।पर मुकम्मल नज़रिये से देखने पर पता चलेगा कि पाश के यहां ऐसे अवसर बहुत ही कम हैं। पाश को पढ़ने वालों और पसंद करने वालों में युवाओं की संख्या सर्वाधिक है।पाश की कविता ' सबसे खतरनाक ' की एक ख़ास विशेषता यह है कि यह कविता पाठक के भीतर एक धीमी और लम्बी परिवर्तन की प्रक्रिया आरंभ कर देती है , जो अन्ततः अन्याय के विरुद्ध सक्रिय संधर्ष के रुप में परिणत होती है।शायद यहीं वज़ह है कि ज्यादातर हुकूमतें इस एक कविता के सामने खुद को असहज महसूस करतीं हैं।

सबसे ख़तरनाक -पाश
मेहनत की लूट सबसे ख़तरनाक नहीं होती
पुलिस की मार सबसे ख़तरनाक नहीं होती
ग़द्दारी और लोभ की मुट्ठी सबसे ख़तरनाक नहीं होती
बैठे-बिठाए पकड़े जाना बुरा तो है
सहमी-सी चुप में जकड़े जाना बुरा तो है
सबसे ख़तरनाक नहीं होता
कपट के शोर में सही होते हुए भी दब जाना बुरा तो है
जुगनुओं की लौ में पढ़ना
मुट्ठियां भींचकर बस वक्‍़त निकाल लेना बुरा तो है
सबसे ख़तरनाक नहीं होता

सबसे ख़तरनाक होता है मुर्दा शांति से भर जाना
तड़प का न होना
सब कुछ सहन कर जाना
घर से निकलना काम पर
और काम से लौटकर घर आना
सबसे ख़तरनाक होता है
हमारे सपनों का मर जाना
सबसे ख़तरनाक वो घड़ी होती है
आपकी कलाई पर चलती हुई भी जो
आपकी नज़र में रुकी होती है

सबसे ख़तरनाक वो आंख होती है
जिसकी नज़र दुनिया को मोहब्‍बत से चूमना भूल जाती है
और जो एक घटिया दोहराव के क्रम में खो जाती है
सबसे ख़तरनाक वो गीत होता है
जो मरसिए की तरह पढ़ा जाता है
आतंकित लोगों के दरवाज़ों पर
गुंडों की तरह अकड़ता है
सबसे ख़तरनाक वो चांद होता है
जो हर हत्‍याकांड के बाद
वीरान हुए आंगन में चढ़ता है
लेकिन आपकी आंखों में
मिर्चों की तरह नहीं पड़ता

सबसे ख़तरनाक वो दिशा होती है
जिसमें आत्‍मा का सूरज डूब जाए
और जिसकी मुर्दा धूप का कोई टुकड़ा
आपके जिस्‍म के पूरब में चुभ जाए

मेहनत की लूट सबसे ख़तरनाक नहीं होती
पुलिस की मार सबसे ख़तरनाक नहीं होती
ग़द्दारी और लोभ की मुट्ठी सबसे ख़तरनाक नहीं होती ।

Tuesday, 3 October 2017

सूक्ष्म अवलोकन और गहन चिंतन के कवि हैं अरमान आनन्द  !

सूक्ष्म अवलोकन और गहन चिंतन के कवि हैं अरमान आनन्द  !
( पढ़िये अरमान आनन्द जी की कविताओं पर मेरा यह लेख)
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आधुनिक कविता की एक ख़ास , जरुरी और महत्वपूर्ण विशेषता यह है कि इन कविताओं का वर्ण्य विषय समाज में घटित होने वाली विभिन्न प्रकार की घटनाओं से जुड़ा होता है।
कवि अरमान आनन्द की कविताएं भी अपने समय और समाज के बीच से अपने निर्माण के तत्त्व ग्रहण करती हैं। उनकी कविताएं पढ़ते हुए जो सर्वाधिक महत्वपूर्ण तथ्य मेरे हाथ लगा वो ये कि अरमान आनन्द  की कविताएं सूक्ष्म अवलोकन और गहन चिंतन की प्रकिया से गुजर कर आकार ग्रहण करती हैं। शायद यहीं कारण है कि उनके यहां  ' जो जंग हम हार गए हैं ' , ' तानाशाह ' , ' बजरडीहा ' ,  ' आडवाणी : चौराहे पर खड़े गांधी हैं ' ,  ' जुर्माना ' , ' दंगे का फूल '  जैसी कविता हमें पढ़ने को मिलती हैं।
          अपने पराजय के कारणों की पड़ताल करती है इनकी कविता ' जो जंग हम हार गए हैं ' । यह कविता हमारा ध्यान इस तरफ ले जाती है कि कौन सी जंग हम हार गए हैं और क्यों हार गए हैं ? ऐसा क्यों हो रहा है कि युद्धगान लिखने वाला भूखा मर रहा है और प्रशस्तिगान लिखने का कोई मतलब नहीं रहा। राजा राजा की तरह लड़ नहीं पा रहा है और आशिक माशूकों के द्वारा दुत्कारे जा रहे हैं ? कवि का संकेत कहीं न कहीं उस वर्ग की तरह है जिसे ' बीच का आदमी ' कहा जाता है। वर्तमान समय में ये बीच के लोग किस तरह आम आदमी का इस्तेमाल कर अपना स्वार्थ सिद्ध कर रहे हैं , कविता इस तरफ संकेत करती है। कवि जिस जंग के हारने की बात करते हैं वो आम आदमी का जंग है जिसे हम रोज हारते हुए लड़ रहे हैं।
          ' आडवाणी :चौराहे पर खड़े गांधी हैं '  कविता में देश के सर्वेसर्वा बनते बनते रह गए नेता के मजबूरी की तुलना चौराहे पर खड़े गांधी की  प्रतिमा से की गई है। दरअसल कविता में आया आडवाणी और गांधी शब्द व्यक्तिवाचक के बदले जातिवाचक अर्थ दे रहे हैं। यहां आडवाणी और गांधी शब्द देश के उन तमाम नेताओ से बाबस्ता है जिनकी हालत निर्जिव मूर्तियों के समान हो गयी है। जिनके नाम पर सरकारें बनती और चलती हैं पर उनमें उनकी सक्रिय भागीदारी नहीं होती। भारत के जो मूल्यों थे , क्या आज उससे विचलन का दौर नहीं है ? गांधी का देश क्यों नक्सलवाद की आग में जल रहा है ? अवसरवाद और परिवारवाद की राजनीति की वजह से देश की दुर्गति हो रही है। ईमानदारों के लिए कहीं जगह नहीं बची है वे पत्थर की मूर्तियों के समान चौराहे पर खड़े हैं जिनपर कौवे-कबूतर बीट कर रहे हैं।कविता के आख़िर में कवि गांधी के बच्चे के लाठी बनने की बात कहता है अर्थात् जनता से सक्रिय प्रतिक्रिया की मांग करता है।आज देश की राजनीति युवा केन्दित है पर युवाओ की हालत सबसे अधिक खराब है।यह कविता हूकूमत के कथनी और करणी में मौजूद फासलें की और हमारा ध्यान खीचती है ।
                  असत्य पर सत्य की , अन्याय पर न्याय की , बुराई पर अच्छाई की , नफरत पर मोहब्बत की होने वाली जीत का यकीन दिलाती उनकी एक बेहद महत्वपूर्ण कविता है ' तानाशाह ' । सतही तौर पर देखने पर आप इसे एक राजनीतिक कविता समझ सकते हैं परन्तु यह केवल एक राजनीतिक कविता न होकर अपने में शाश्वत मूल्यों और सिद्धांतों को समेटे है।व्यक्ति ईश्वर की सर्वश्रेष्ठ रचना है परन्तु सदा से ही दुनिया में ऐसे लोग होते आये हैं जिन्होंने अपने कृत्यों से मानवता को शर्मशार किया है। ये अपने महात्वाकांक्षा और जिद के आगे मनुष्य और मनुष्यता की अहमियत को कुछ नहीं समझते। तानाशाह किसी की आवाज नहीं बनते बल्कि लोगों की आवाज को दबाते हैं।परन्तु एक कवि लोगों की आवाज बनता है। उनकी समस्याओं और भावनाओं को स्वर देता है। इसलिए निसंदेह कवि उस अंतिम आदमी को भी इंकलाब के लिए तैयार कर सकता है जिससे तानाशाह को सबसे अधिक खतरा  है। लोकतांत्रिक समाज में तानाशाह का होना काफी ख़तरनाक होता है क्योंकि उसे लोकतंत्र पर भरोसा नहीं होता। उसके दिमाग में एक प्रकार का पागलपन सवार रहता है जिसकी वजह से वह सही और गलत की शिनाख़्त नहीं पाता। वह अपने मार्ग में आने वाली हर चीज को रौंदता चला जाता है। लेकिन समाज के बुद्धिजीवी वर्ग के पास सही और गलत के चयन की समझ होती है।ये अपने विचारों से समाज में लोकतात्रिक और मानवीय मूल्यों की स्थापना कर तानाशाह के मनसूबों को चूरचूर कर सकते हैं।ऐसे में यह कविता तानाशाही सोच के खिलाफ प्रगतिशील विचारों को मोर्चे पर आने का निमंत्रण देती है।
              इस क्रम में अरमान आनन्द  की एक और कविता ' बजरडीहा ' का जिक्र मैं जरुर करना चाहूंगा। यह बहुत ही ख़ास कविता है। ख़ास इस अर्थ में कि यह कविता बनारस शहर के बजरडीहा इलाके और वहां के बुनकरों की बदहाल जिन्दगी का सच बयां करती कविता है। बजरडीहा  विश्व प्रसिद्ध बनारसी साड़ियों का केन्द्र है परन्तु वहा रहने वाले लोगों की समस्याएं देखने की फुर्सत किसी को नहीं है। तमाम मुश्किलों को झेलते हुए भी यहां के

लोग दुनियां को अपने बेहतरीन हुनर और नायाब कारीगरी से कायल करते हैं। लेकिन कवि को इस बात का दुःख है कि देश-दुनिया में बनारस की पहचान बनाने वाला बनारस का यह बजरडीहा इलाका बनारस में ही बदहाल और गुमनाम है। और इसकी तरक्की की राह अभी तक कोसों दूर है।
      कवि के लिए यह जरुरी है की उनके भीतर रचनाशीलता के प्रति ललक , समर्पण और उत्साह का भाव गहराई तक भरा हो। अरमान आनन्द  को कविता पढ़ते हुए देख-सुनकर आप इसका अनुमान कर सकते है । आप जितनी शिद्दत से कविता लिखते हैं उतनी ही शिद्दत से काव्यपाठ भी करते हैं।
आप  अभी  रचनाकर्म में सक्रिय हैं । आपके भीतर जितनी कविताई है अभी उसका आधा भी हमारे सामने नहीं आया है।  
परन्तु फिर भी इसमें कोई संदेह नहीं है कि अरमान आनन्द  हिन्दी कविता के स्थापित  युवा कवि हैं।
                   मेरा यह लेख उनकी चार चयनित कविताओं पर है जो मैंने उनके फेसबुक वाल पर पढ़ी। उनकी कविताओं पर लिखकर मैंने न चाहते हुए भी एक दु:साहस किया है। परन्तु अपने लेख में यदि मुझसे उनकी कविता की गहराई के एक भी सोपान तय हुए हों तो मैं अपना प्रयास सार्थक समझूंगा ।
       
- मोहन 
परास्नातक छात्र
हिन्दी विभाग बीएचयू

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