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Wednesday, 14 September 2022

मार्क्स का जन्मदिन : कृष्ण मोहन

#मार्क्स_का_जन्मदिन

मार्क्स ने कहा था 
दुनिया की व्याख्या बहुत हो गई
अब उसे बदलना चाहिए
हालांकि उसने व्याख्या भी की
और बदला भी

हमने बदलने वाली बात पकड़ ली 
और व्याख्याओं से कतरा गए
दुनिया बदलती गई
हमारी उम्मीद से भी ज़्यादा
पर हमने उसकी व्याख्या करते रहना
ज़रूरी नहीं समझा

नतीजा वही हुआ
जो होना था
हम जिसे बदलने में लगे थे
उसे समझने से चूक गए

मार्क्स को याद करते हुए
मैं आज कहता हूँ
बदलने के लिए भी समझने की ज़रूरत है
हमें इस नई दुनिया की
व्याख्या करनी चाहिए।

ऐजाज़ अहमद का मार्क्सवाद: कृष्ण मोहन

ऐजाज़ अहमद का मार्क्सवाद 
1 .
(अग्रणी मार्क्सवादी विचारक ऐजाज़ अहमद पर यह लेख 'समयांतर' के जून अंक में प्रकाशित हुआ है। सोशल मीडिया के पाठकों और अपने विद्यार्थियों के लिए मैं यह लेख फ़ेसबुक पर  शृंखलाबद्ध रूप से प्रस्तुत कर रहा हूँ।)

ऐजाज़ अहमद की ख्याति तमाम फ़ैशनेबल भटकावों के बीच बुनियादी मार्क्सवादी स्थापनाओं के लिए संघर्ष करने वाले विचारक की रही है। 1992 में प्रकाशित उनकी सबसे प्रसिद्ध किताब 'इन थियरी' उनकी वैचारिक जद्दोजहद के सबूत पेश करती है। इस किताब में ऐजाज़ अहमद बीसवीं शताब्दी में हुए बदलावों, ख़ास तौर पर दूसरे विश्वयुद्ध के बाद हुए बड़े वैचारिक और राजनैतिक बदलावों पर विस्तार से बहस करते हैं। इस किताब का उपशीर्षक उन्होंने 'क्लासेस', 'नेशन्स', 'लिटेरचर्स' दिया है। इस तरह हम उनके चिंतन के तीन बुनियादी सरोकारों से परिचित होते हैं। 'क्लासेस' यानी 'वर्गों' की भूमिका और उनके दृष्टिकोणों का अध्ययन किसी भी मार्क्सवादी का सबसे प्रारंभिक और बुनियादी काम है, इसे कहने की आवश्यकता नहीं है। जहाँ तक 'राष्ट्रों' का प्रश्न है, उनके चिंतन के केंद्र में बीसवीं सदी में पूरी दुनिया में चलने वाले उपनिवेश-विरोधी राष्ट्रीय मुक्ति के आंदोलन हैं, दूसरे महायुद्ध के बाद जिनमे से अधिकांश को कामयाबी मिली। आज़ाद होने के बाद इनमें से कुछ ने पूंजीवाद की ओर क़दम बढ़ाया और कुछ ने समाजवाद की दिशा में बढ़ने का प्रयास किया। ऐजाज़ अहमद इन प्रयासों की बारीक़ी से पड़ताल करते हैं, ख़ास तौर पर समाजवाद के सामने आने वाली कठिनाइयों की छानबीन से वे यह निष्कर्ष निकालते हैं। कहना ग़ैरज़रूरी है कि यह सारा विचार-विमर्श तीसरे बिंदु 'साहित्यों' के माध्यम से ही होगा, जिसमें लिखित रूप में प्रस्तुत वैचारिक और रचनात्मक साहित्य तो है ही, पढ़ने, भाषण देने, विमर्श करने, यानी भाषाई व्यवहार के तमाम रूपों को भी शामिल माना गया है। किताब से दिए गए उद्धरणों का अंग्रेज़ी से अनुवाद मैंने ही किया है। हिंदी में उनके लेखन की अनुपलब्धता को देखते हुए इस लेख के पहले हिस्से में मैंने उनके विचारों का सार-संक्षेप प्रस्तुत किया है, और दूसरे भाग में उसकी समीक्षा की है।

                      (1)

इस किताब में ऐजाज़ अहमद का मुख्य ज़ोर परिवर्तन और आमजन की पक्षधरता का दावा करने वाले विचारों से बहस करने पर है। पूंजीवादी और साम्राज्यवादी प्रवृत्तियों और उनके कारनामों का उल्लेख वे उपयुक्त अवसर पर करते हैं, लेकिन उन पर कोई तर्क वितर्क नहीं करते। वे जनता और मनुष्यता की पक्षधरता का दम भरने वाले विचारों से निर्मम संघर्ष में उतरते हैं, और उन पर अपने कठोर प्रहारों के साथ-साथ तीख़ी व्यंग्योक्तियों का तालमेल बनाए रखते हैं। मुक्तिबोध ने कभी कहा था–

'बुरे अच्छे बीच के संघर्ष से भी उग्रतर
अच्छे व उससे अधिक अच्छे बीच का संगर'

इस बहसधर्मी किताब से गुज़रते हुए हम समानधर्मा लोगों, मुक्ति की राह के हमसफ़रों के बीच छिड़ने वाले विवादों की ज़रूरत को नए सिरे से महसूस करते हैं।

ऐजाज़ अहमद के आकलन के मुताबिक़ दूसरे महायुद्ध के बाद और ख़ास तौर पर साठ के दशक में बुनियादी महत्व की कुछ समानांतर प्रक्रियाएँ चलीं। दुनिया में जारी राष्ट्रीय मुक्ति संघर्षों की सफलता के बीच एक तरफ़ तो राजनैतिक स्तर पर पूंजीवाद और समाजवाद के दो मॉडलों के बीच संघर्ष चला और दूसरी तरफ़ साहित्य संस्कृति के क्षेत्र में ऐसे नए  आंदोलन सामने आए जिन्होंने राजनीति का विकल्प बनने का दावा किया और जिन्हें वे कुछ व्यंग्य के साथ 'रैडिकल' आंदोलन कहते हैं। इन आंदोलनों की मुख्य प्रेरणा '60 के दशक में एशिया और यूरोप के विभिन्न देशों के विश्वविद्यालयों में चले छात्र आंदोलन थे। उन्होंने साहित्यिक-सांस्कृतिक अध्ययन की पद्धतियों को अपने राष्ट्रवादी-राजनैतिक व्यवहार का प्रमुख हिस्सा बनाया। इसी कारण इन्हें सांस्कृतिक राष्ट्रवादी भी कहा जाता है। उल्लेखनीय है कि भारत में यह संज्ञा हिंदुत्ववादियों के लिए सुरक्षित हो गई है, लेकिन साहित्यिक सिद्धांतों को लेकर चलने वाले वैश्विक विमर्श में इसका अर्थ अलग है।

इस 'सांस्कृतिक राष्ट्रवाद' की विशेषताओं को चिह्नित करते हुए ऐजाज़ अहमद कहते हैं— 'सांस्कृतिक राष्ट्रवाद' की विचारधारा में एक व्यापक निहितार्थ है जैसा कि यह साहित्यिक 'सिद्धांत' में प्रकट होता है कि तीसरी दुनिया के पास एक 'संस्कृति' और 'परंपरा'  है, और अपनी संस्कृति और परंपरा के अंदर से बोलना अपने आप मे ही उपनिवेशवाद-विरोधी कृत्य है।' ('इन थियरी', पृ. 9)

इस उद्धरण में लेखक ने जिस चीज़ को साहित्यिक 'सिद्धांत' कहा है, वही दरअसल इस किताब का केंद्रीय सरोकार है। किताब की बिल्कुल शुरुआत में ही इसे स्पष्ट करते हुए लेखक कहता है—'साहित्यिक अध्ययनों का विकास पिछली तिहाई सदी से अंग्रेज़ी भाषी देशों में "सिद्धांत" के रूप में हुआ है।….जेराल्ड ग्राफ़ ने बिल्कुल सही बताया है कि सिद्धांत का यह विस्फोट "रैडिकल असहमतियों के वातावरण" की देन है जो विशिष्ट सूचनात्मक सांस्कृतिक व्यवहारों और उनकी व्याख्या के तरीक़ों के बारे में है। "असहमति की संस्कृति" ज्ञान के उन नए रूपों की देन है जो दूसरे महायुद्ध के बाद बौद्धिक जांच-पड़ताल के स्थापित  तौर-तरीक़ों को विस्थापित करने के लिए विकसित हुई थी। युद्ध के बाद महानगरों के विश्वविद्यालयों में आए जनसांख्यिकीय बदलावों के दौरान हुए राजनीतिकरण के चलते और 1960 क दशक के छात्र आंदोलनों के कारण ये परिवर्तन हुए हैं।' (वही, पृ. 1)

ग़ौरतलब है कि ऐजाज़ अहमद प्रायः विकसित देशों और उनके शहरों में स्थित विश्वविद्यालयों को 'मेट्रोपोलिटन' की संज्ञा देते हैं। यही 'मेट्रोपोलिटन' केंद्र इस 'सिद्धांत' के विकास के लिए ज़िम्मेदार हैं। रचनाओं, घटनाओं, परिघटनाओं आदि के अध्ययन और उनके अपने 'पाठ' (रीडिंग) यानी अपनी व्याख्या को प्रतिरोध का पर्याप्त तरीक़ा मानने वाली इस प्रवृत्ति की वर्गीय स्थिति का संकेत करते हुए वे कहते हैं— 'बड़े प्रभावशाली लोग ही मानते हैं कि वे पढ़ने, लिखने, बोलने आदि के द्वारा साम्राज्यवाद से छुटकारा पा सकते हैं। पूंजी के पिछड़े इलाक़ों के मानव समूहों का साम्राज्यवाद से हर रिश्ता उनके अपने राष्ट्र-राज्यों के माध्यम से बनता है। अलग तरीक़े की राष्ट्रीय परियोजनाओं और अपने राष्ट्र-राज्यों की क्रांतिकारी पुनर्रचना के बिना उन्हें साम्राज्यवाद से मुक्ति नहीं मिल सकती। यह राष्ट्र-राज्य से सीधे जा टकराने के मसला नहीं है।, बल्कि वर्ग, राष्ट्र, और राज्य की नई व्याख्याओं को विकसित करने का प्रश्न है।' (वही, पृ. 11)

लेखक अपने विश्लेषण के माध्यम से हमें बताता है कि '60 के दशक के छात्र आंदोलनों से उपजे इस 'सिद्धांत' का ज़ोर राजनैतिक कार्यक्रमों की संस्कृति की जगह 'पाठ' (टेक्स्ट) केंद्रित संस्कृति की स्थापना, स्थापित संस्कृतियों की समझौताहीन आलोचना को एक नए प्रकार की वामपंथी रहस्यमयता से विस्थापित करने के साथ साथ अतीत में मार्क्सवाद से जुड़े मुद्दों को उत्तरआधुनिक दिशा में मोड़ देने की कुशलता के साथ परिभाषित किया है। इसे ही 'नव वाम' की संज्ञा भी वह देता है। इस कथित 'सिद्धांत' में समाविष्ट अनेक चिन्तानधाराओं के प्रसंग में वह बेंजामिन, फ्रैंकफर्ट स्कूल, लुकाच, भाषा विज्ञान, संरचनावाद, उत्तर संरचनावाद, वोलोशिनोव-बख़्तिन सर्कल, ग्राम्शी, फ्रायड, लाकां आदि का उल्लेख करता है। 

ऐजाज़ अहमद के विश्लेषण में 'सिद्धांत' की उन शाखाओं को प्रमुखता प्राप्त है जो उपनिवेश और साम्राज्य का मुद्दा उठाती हैं, और राष्ट्र, राष्ट्रवाद और तीसरी दुनिया जैसी श्रेणियों के माध्यम से ख़ुद को परिभाषित करती हैं। राष्ट्रवाद को वे आम तौर पर राष्ट्रीय पूंजीपति वर्ग की अगुवाई में चलने वाली प्रक्रिया मानते हैं। यह वर्ग साम्राज्यवाद से संघर्ष के मामले में अंततः कमज़ोर साबित होता है और समझौते पर बाध्य होता है। इसलिए साम्राज्यवाद से संघर्ष की ज़िम्मेदारी भी उनके मुताबिक़ समाजवाद पर ही आती है। इस बात को स्पष्ट करते हुए वे कहते हैं—

'मैं यह नहीं मानता कि राष्ट्रवाद साम्राज्यवाद का दृढ़, द्वंद्वात्मक विपरीत है। यह हैसियत सिर्फ़ समाजवाद की है।…… न ही मैं मानता हूँ कि राष्ट्रवाद कोई एकात्मक (unitary) चीज़ है जो हमेशा प्रगतिशील या प्रतिगामी होता है। कोई राष्ट्रवाद क्या भूमिका निभाएगा यह हमेशा वर्ग शक्तियों और सामाजिक राजनैतिक व्यवहार के तरीक़ों पर निर्भर करता है जो उस शक्ति समूह (पावर ब्लॉक) को संगठित करते हैं, जिसके भीतर कोई राष्ट्रवादी पहल ऐतिहासिक रूप से प्रभावी होती है।' (वही, पृ. 11) 

ऐजाज़ अहमद के मुताबिक़ विउपनिवेशीकरण के साथ-साथ अमरीकी पूंजीवाद का अभूतपूर्व केंद्रीकरण और उसकी साम्राज्यवादी अभिव्यक्ति युद्धोत्तर विश्व की एक प्रमुख सचाई थी। व्यवहार में यह देखने में आया कि जो देश अपनी मुक्ति के बाद समाजवादी राह पर नहीं चले वे क्रमशः साम्राज्यवादी ढांचे में समाते चले गए। उत्तर औपनिवेशिकता इसी प्रवृत्ति की विचारधारा थी। इसने उपनिवेशवाद के विरुद्ध संघर्ष तो किया, उससे मुक्ति भी हासिल की और साम्राज्यवाद के बारे में हाय तौबा मचाने में भी कोई कसर नहीं छोड़ी, लेकिन यह सब ऊपरी रंग-रोगन साबित हुआ। 'नव वाम' और साहित्यिक 'सिद्धांत' के 'रैडिकल' अनुयायियों की ऐसी अनेक गतिविधियों का उल्लेख उन्होंने किया है जिनमें वे अपनी गर्मागर्म साम्राज्यवाद-विरोधी लफ़्फ़ाज़ी भी जारी रखते हैं और समझौते का चोर-रास्ता भी ढूंढ लेते हैं। वे बताते हैं कि मेट्रोपोलिटन वाम संरचनाओं और विकसित पूंजीवादी राज्यों ने उपनिवेशवाद से पीड़ित देशों के प्रति भेदभावपूर्ण नज़रिया प्रदर्शित किया है। इस्राइल फिलिस्तीन संघर्ष में उन्होंने पर्दे के पीछे इस्राइल से हाथ मिला लिया था और फिलिस्तीन से आंख फेरकर दक्षिण अफ्रीका के लिए घड़ियाली आँसू बहाते रहे थे। वे लिखते हैं—

'फ़िलहाल चर्चा का मुख्य बिंदु उपनिवेश-विरोधी राष्ट्रवाद है। इसके दो रूप हैं—पहला, राष्ट्रवादी विचारधाराओं से युक्त तथा राष्ट्रीय पूंजीपति वर्ग के उत्तर औपनिवेशिक राज्य; और दूसरा, क्रांतिकारी युद्धों और समाजवादी वाम के उत्तर क्रांतिकारी राज्य। 1970 के दशक तक यह वैश्विक संरचना का निर्धारक तत्व था। इस अवधि के भी आख़िरी दशक तक क्रांतिकारी आंदोलनों के वर्चस्व था जिन्होंने अपने उपनिवेशवाद-विरोध को बुनियादी बदलाव के राजनैतिक कार्यक्रमों का हिस्सा बनाया था। लेकिन '60 के दशक के बाद आए मेट्रोपोलिटन वाम ने इससे यह ग़लत नतीजा निकाल लिया कि प्रगतिशील सामाजिक परिवर्तन उपनिवेशवादविरोधी राष्ट्रवाद का अभिन्न अंग है। इसी पृष्ठभूमि में तीन दुनियाओं के चीनी सिद्धांत ने वैश्विक मान्यता प्राप्त की, और राष्ट्रवाद तथा सांस्कृतिक सिद्धांतकारों के लिए सांस्कृतिक राष्ट्रवाद की विचारधारा को साम्राज्यवादी (उत्तरआधुनिकतावादी?) संस्कृति के स्वाभाविक विरोधी की मान्यता मिल गई।' (वही, पृ. 33)

लेकिन इस भ्रामक मान्यता से ये तथ्य नहीं बदलते कि 1980 के दशक के अंत तक दुनिया की संरचना में ऐतिहासिक परिवर्तन घटित हो रहे थे, क्रांति के बाद समाजवाद की राह पकड़ने वाले देशों को प्रायः सबसे निम्न स्तर की उत्पादक शक्तियों से काम लेना पड़ा जिससे आर्थिक ठहराव की स्थिति बनी, लेकिन इन रैडिकल नववामपंथियों में शामिल कम्युनिस्टविरोधियों ने इसे इस रूप में प्रचारित किया कि समाजवाद आर्थिक रूप से कारगर नहीं है। इस तरह सोवियत संघ के बारे में राय बदलने लगी। ऐजाज़ अहमद के अनुसार अभी कुछ समय पहले तक जब क्रांतिकारी संघर्ष चल रहे थे तो बात कुछ और थी। तब इस तथ्य को नज़रअंदाज़ करना मुश्किल था कि हर प्रकार के क्रांतिकारी संघर्ष को सोवियत संघ का निर्णायक भौतिक और राजनयिक समर्थन मिलता रहा था। यहाँ तक कि ब्रेजनेव के शासनकाल के तथाकथित 'जड़ता' के दौर में भी बहुत सारी क्रांतियाँ सोवियत संघ के प्रत्यक्ष समर्थन से सफल हुईं। बहरहाल, आगे चलकर गोर्बाचेव के दौर ने इस ऐच्छिक स्मृतिभ्रंश को और तेज़ किया।

दूसरी तरफ़ जिन उत्तर औपनिवेशिक राज्यों से बहुत बड़ी-चढ़ी आशाएँ की गई थीं वे बहुत जल्द जड़ता, परनिर्भरता, तानाशाही क्रूरता, धार्मिक कट्टरता आदि का प्रदर्शन करने लगे। सांस्कृतिक राष्ट्रवादियों की आख़िरी उम्मीद ईरान की क्रांति थी, जहाँ खोमैनी ने असंख्य ईरानी कम्युनिस्टों और देशभक्तों का सफ़ाया किया और ईरान को एक धर्म-शासित राज्य में बदल दिया। इस तरह साम्राज्यवाद के विकल्प के रूप में मेट्रोपोलिटन वामपंथियों के लिए समाजवाद तो पहले ही चुक गया था, उत्तर औपनिवेशिक राज्य भी नहीं बच सके।
#ऐजाज़_अहमद_का_मार्क्सवाद  (2)

ऐजाज़ अहमद हमें बताते हैं कि सांस्कृतिक राष्ट्रवाद का संबंध तीन दुनियाओं के सिद्धांत के साथ अनिवार्यतः होता है। इसके बाद राष्ट्रवाद के विरोध का विचार एक पूरी तरह से अलग सैद्धांतिक ढांचे उत्तरसंरचनावाद से प्रेरित होकर आता है। उत्तरसंरचनावाद प्रत्यक्षतः तीन दुनियाओं के सिद्धांत का विरोधी हैं, इसके बावजूद वह इन्हें समेटने का प्रयास करता है। मार्क्सवाद को ठुकराने के क्रम में इस विचारधारा ने ऐतिहासिकता से अपना नाता पूरी तरह से ख़त्म कर लिया। नतीजा यह निकला कि नई ज़मीन तोड़ने निकला यह अवांगार्द (हिरावल) साहित्य-सिद्धांत आंतरिक रूप से संगत कोई संरचना तक तैयार न कर सका।

मार्क्सवाद-विरोध से भी बड़ी वजह इस असंगति की यह रही कि यह विचार दुनिया मे तेजी से हो रहे राजनैतिक और आर्थिक परिवर्तनों से संचालित था। '70 के दशक में साम्राज्यवाद के विरुद्ध राष्ट्रवाद गतिशील था तो तीन दुनियाओं के सिद्धांत के रूप में उसकी स्थापना हुई, लेकिन '80 के दशक में जब यही राष्ट्रवाद निरंकुश और दमनकारी हो गया तो उसे ठुकराने की ज़रूरत उत्तरसंरचनावाद में प्रकट हुई।  ऐसा करते हुए उत्तरसंरचनावाद किसी भी प्रगतिशील या पतनशील राष्ट्रवाद के बीच अंतर नहीं करता और सबको सिर्फ़ राष्ट्रवाद होने के कारण ख़ारिज़ कर देता है।

'60 के बाद पैदा हुए 'पश्चिमी मार्क्सवाद' (नव वामपंथियों को यह नाम पेरी एंडरसन ने दिया था) की बहुत सी प्रवृत्तियों ने आगे चलकर उत्तरसंरचनावाद की राह आसान की। मसलन, मार्क्यूस ने वर्ग की श्रेणी का परित्याग करके कामुकता और सौंदर्य के क्षेत्र में क्रांतिकारी गतिशीलता की खोज की। अडोर्नो की चरम निराशावादी कृति 'मिनिमा मोरलिया' ने सार्त्र के 'क्रिटिक ऑफ डाइलेक्टिकल रीज़न' के सहयोग से यह विचार विकसित किया कि 'अभाव' की श्रेणी के चलते यह अनिवार्य है कि कोई भी विद्रोही समूह सत्ता पाने के बाद नौकरशाही में पतित हो जाएगा। 'सिद्धांत' पर उल्लेखनीय प्रभाव रखने वाले अल्थ्यूसर का संरचनावाद से रिश्ता जगजाहिर है, लेकिन विचारधारा को 'अचेतन' 'प्रतिनिधित्व की प्रणाली के रूप में', 'इंसान और दुनिया के बीच जिए गए संबंध के रूप में', और 'ऐसी चीज़ के रूप में जो किसी राज्य के सभी अनुमानित उपकरणों को संतृप्त कर देती है', प्रस्तुत करके उसने इसे मिशेल फूको द्वारा प्रवर्तित उत्तरसंरचनावादी विमर्श के समतुल्य बना दिया। ब्रिटिश-अमरीकी अकादमिक जगत में पश्चिमी मार्क्सवाद का आगमन उल्लेखनीय रूप से '70 के दशक में उत्तरसंरचनावाद के साथ हुआ।

'तीसरी दुनिया का साहित्य' बक़ौल ऐजाज़ अहमद इंग्लैंड और अमरीका के महानगरों में स्थित विश्वविद्यालयों की निर्मिति है। इस पर संदेह करने की प्रमुख वजह इन विश्वविद्यालयों का विकासशील देशों के बौद्धिक जगत पर क़ायम वर्चस्व है। दोनों के बीच का रिश्ता, ख़ासकर अंग्रेज़ी भाषा के माध्यम से, शासक-शासित संबन्ध जैसा हो जाता है। लैटिन अमरीका में छपे किसी उपन्यास को चुनकर उसका अंग्रेज़ी में अनुवाद कराने से लेकर किसी अन्य देश, मसलन, भारत के विश्वविद्यालयों में इसे 'तीसरी दुनिया' के प्रतिनिधि उपन्यास की हैसियत से स्थापित करने की प्रक्रिया इसी वर्चस्व के तहत संचालित होती है। आम तौर पर इस कथित तीसरी दुनिया की भाषाओं से 'पहली दुनिया' के इन महानगरीय बुद्धिजीवियों और लेखकों का परिचय तक नहीं होता। इसलिए ख़ास दृष्टि से चुनी हुई बहुत थोड़ी सी कृतियाँ अनूदित होकर इस प्रतिष्ठान द्वारा स्वीकृत-पुरस्कृत होने की दहलीज पर पहुंच पाती हैं। इसके अलावा अपनी मातृभाषाओं से मुंह मोड़कर सीधे अंग्रेज़ी में लिखने वाले लेखक भाग्यशाली होते हैं कि उन्हें इस प्रक्रिया से नहीं गुज़रना पड़ता। पहली दुनिया के लेखकों को भी इसी में आसानी होती है। इस वजह से उन्हें तुरंत अपने देश का प्रतिनिधित्व करने का गौरव मिल जाता है।

जहाँ तक साहित्यिक 'सिद्धांत' का सवाल है, ऐजाज़ अहमद उसका खाका खींचते हुए हमें बताते हैं कि दो महायुद्धों के बीच के समय में अंग्रेज़ी साहित्य में चार प्रमुख प्रवृत्तियों का ज़ोर था। ये थीं— आई. ए. रिचर्ड्स की व्यावहारिक आलोचना, टी. एस. इलियट की रूढ़िवादी-कैथोलिक-राजतन्त्रवादी आलोचना, आधुनिकतावाद की कुछ अवांगार्द प्रवृत्तियाँ, और अमरीका में नई-नई उभर रही रैंसम और टेट आदि की 'नई समीक्षा'। इन प्रवृत्तियों का प्रतिवाद करने की रुचि इंग्लैंड में अधिक थी, क्योंकि वहाँ सामाजिक चेतना से संपन्न साहित्यिक अध्ययनों की परंपरा पुरानी थी। एफ. आर. लेविस की अगुवाई में 'स्क्रूटिनी' ग्रुप ने व्यावहारिक समीक्षा के शिक्षाशास्त्रीय महत्व को समझते हुए इसे साहित्यिक विश्लेषण के वस्तुगत मानदंड में बदल दिया, और इस प्रकार उन्होंने साहित्यिक 'आस्वाद' की अभिजात प्रवृत्तियों को विस्थापित कर दिया। 

लेविस और उनके ग्रुप की मध्यवर्गीय जड़ों, और साहित्यिक अध्ययन को इंग्लैंड की सांस्कृतिक मुक्ति के सुनिश्चित मार्ग की तरह देखने के लगभग धार्मिक रवैये के बावजूद इसमें रैडिकलवाद का कुछ लोकप्रियतावादी क़िस्म का अंश भी था। इसी लोकप्रियतावादी तत्व को रेमंड विलियम्स ने अपनी श्रमिकवर्गीय पृष्ठभूमि और उस ख़ास क़िस्म के रैडिकलवाद से जोड़ा जो उसे कम्युनिस्ट पार्टी में ले गया था। अगले बीस साल तक 'कल्चर ऐंड सोसाइटी' से लेकर 'द कंट्री ऐंड द सिटी' तक उसने अनेक अध्ययन प्रस्तावित किए। बाद वाली किताब को ऐजाज़ अहमद अंग्रेज़ी समीक्षा की सबसे प्रभावशाली कृति मानते हैं। हालाँकि, ब्रिटिश अकादमिक जगत में रेमंड विलियम्स को वह महत्व कभी नहीं मिल सका जो टी. एस. इलियट को मिला। लेकिन यह आसानी से कहा जा सकता है कि लेविस की मध्यवर्गीयता और विलियम्स के मार्क्सवादी संदर्भों के बीच ब्रिटिश बौद्धिकता का अगुवा तबक़ा शीतयुद्ध के दौर में भी साहित्य की सामाजिक भूमिका की स्थापना की ओर बढ़ता रहा। दूसरे शब्दों में, जब अमरीका में 'नई समीक्षा' के विरुद्ध उपजी प्रतिक्रिया 'विखंडनवाद' की ओर अग्रसर हुई, इंग्लैंड में रिचर्ड्स और लेविस के आलोचकों ने वामपंथी दिशा अपनाई।

अमरीकी समाज को ऐजाज़ अहमद ऐतिहासिक कारणों से अधिक रूढ़िवादी, कुलीनतावादी, और यहाँ तक कि नस्लवादी मानते हैं। दास प्रथा जैसी बुराई को अपनी आज़ादी के बाद बहुत लंबे समय तक बनाए रखने की जो वजहें अमरीकी समाज में थीं, उन्होंने ऐसी ही मनोभूमि का निर्माण किया था। फ्रांस की 'जैकोबिन' और इंग्लैंड की 'क्रामवेलियन' मनोवृत्ति के मुक़ाबले यह अमरीका का पिछड़ापन ही कहा जाएगा। इसी पृष्ठभूमि में वहाँ 'नई समीक्षा' का उदय होता है। इसने प्रत्येक कृति को निरपेक्ष रूप से स्वायत्त और 'साहित्य' को 'एक ख़ास तरह का ज्ञान रखने वाली अलग भाषा' मानते हुए 'पाठ' (रीडिंग) की जो संस्कृति विकसित की, वह अमरीकी साहित्यिक अध्ययन के क्षेत्र में चौथाई सदी तक छाई रही।

ग़ौरतलब है कि 1940 के दशक के अंत तक 'नई समीक्षा' अपने उत्कर्ष पर पहुंच गई थी। यही समय है जब अमरीका ने शीतयुद्ध छेड़ा और सख़्त कम्युनिस्टविरोधी 'मैकार्थीवाद' की शुरूआत की। '50 के दशक के अंत मे जब उसका वर्चस्व गिरावट के दौर में पहुँचा तो मैकार्थीवाद का भी उतार हो रहा था, और आइजनहावर के कठोर सिद्धांतों ने केनेडी युग के लिए जगह ख़ाली कर दी थी। अमरीकी उदारतावाद का यह वही सुनहला ज़माना था जिसने वियतनाम युद्ध छेड़ा था।

नई समीक्षा के विरुद्ध उसी दौर में पहली असहमति नार्थोप फ्राई जैसे आलोचकों के माध्यम से सामने आई। उन्होंने साहित्य को 'विशेष ज्ञान रखने वाली विशेष भाषा' के विचार को बरक़रार रखा लेकिन उसकी निरपेक्ष स्वायत्तता से इनकार कर दिया। उनका कहना था कि किसी व्यापकतर आख्यान के बग़ैर कोई रचना अपना अर्थ नहीं प्रकट कर सकती। साफ़ तौर पर यह 'टेक्स्ट' को 'कॉन्टेक्स्ट' में समझने का आग्रह था। सभ्यताओं की गहन संरचनाओं के रूप आकार के अंदर ही रचनाकार अपनी बातों को भाषा के माध्यम से प्रेषित करता है। इस परंपरा ने आगे चलकर 'संरचनावाद' की राह आसान कर दी। साथ ही साथ इसने 'विमर्श' के उत्तरसंरचनावादी सिद्धांत के लिए भी जगह बनाई, जिसमें यह माना जाता था कि भाषा ही मनुष्यों के माध्यम से बोलती है और मानव तत्व (ह्यूमन एजेंसी) का निर्माण भाषा ही के द्वारा हुआ है।

'60 के दशक में और उसके बाद अमरीकी साहित्यिक परिदृश्य को आच्छादित करने वाले हेरल्ड ब्लूम और पॉल दी मान जैसे व्यक्तित्वों का उभार हुआ। इसी दौरान अमरीकी शासन डलेस (जॉन फ़ास्टर डलेस, '50 के दशक में अपने कम्युनिस्टविरोध के लिए कुख्यात अमरीकी राज्य-सचिव) टाइप के कट्टरवाद से केनेडी टाइप के 'उदार' साम्राज्यवाद में, दूसरे शब्दों में कोरिया से वियतनाम में रूपांतरित हुआ। आगे चलकर 'विखंडनवाद' के उभार से ब्लूम को काफी पीड़ा हुई लेकिन वे इसका समुचित विरोध न कर सके, क्योंकि, लेखक के मुताबिक़, सैद्धांतिक प्रश्नों का सामना करने की उनकी तैयारी पर्याप्त नहीं थी।

वियतनाम युद्ध के विरोध में अमरीका में जो जनज्वार उठा वह इसे कोई साम्राज्यवादविरोधी स्वरूप देने में असफल रहा। उसकी चेतना बस इतनी ही थी कि अमरीका सेना को वियतनाम से बुला लेने के बाद वह शांत पड़ गई। लेकिन इससे हरकत में आई सामाजिक शक्तियों ने नारीवाद और ब्लैक आंदोलन (हिंदी में इसके लिए 'अश्वेत' चलता है जो कि पूरी तरह भ्रामक शब्द है। किसी बेहतर विकल्प के अभाव में मैं मूल शब्द 'ब्लैक' का इस्तेमाल करना उचित समझता हूँ।) के क्षेत्र में नए मुक़ाम तय किए। अमरीकी रैडिकलवाद का गठन इन तत्वों के साथ हुआ है।

इस दौरान अमरीकी अकादमिक जगत ने पहली बार नस्ल और लिंगभेद के सवालों का सामना किया। पहली बार इस बात की तरफ़ उनका ध्यान गया कि उनका अब तक का अध्ययन दुनिया के कितने छोटे से हिस्से, यूरोप और उत्तरी अमरीका तक सीमित था। इस अहसास से उन्होंने एशिया, अफ्रीका और लैटिन अमरीका पर जब दृष्टि डाली तो तीसरी दुनिया का साहित्य नामक एक नई श्रेणी को जन्म दिया। '60 के दशक में एशिया और यूरोप के विकसित शिक्षा केंद्रों को हिला देने वाले छात्र-आंदोलनों के साथ-साथ चीन की सांस्कृतिक क्रांति (1966-76) ने भी तीसरी दुनिया नामक नई श्रेणी को स्थापित करने में भूमिका निभाई। इस प्रकार रैडिकलवाद के तीन चेहरे उभरे— ब्लैक, नारी और तीसरी दुनिया। वे कहते हैं:

'किसी भी रैडिकलवाद के सामने चाहे वह ब्लैक हो, नारीवादी हो, या तीसरी दुनियावादी हो, सबसे बुनियादी और निरंतर बना रहने वाला ख़तरा उसका बुर्जुआकरण है। इस तरह के रैडिकल आंदोलन जिन तीन शीर्षक-संकेतों के अंतर्गत पूरी तरह से समेट लिए गए, वे हैं— तीसरी दुनियावादी राष्ट्रवाद, सारतत्ववाद (एसेंशियलिज्म), और बिखराव और टूट-फूट के मौजूदा फैशनेबल सिद्धांत, जैसे— "विषय की मृत्यु" (डेथ आफ सब्जेक्ट)। यानी एक तरफ तो सुविचारित विशिष्टता और स्थानीयतावाद की राजनीति और दूसरी तरफ, जैसा कि कुछ उत्तरसंरचनावादी मानते हैं, सामाजिक की मृत्यु, विषय की स्थिर स्थितियों की असंभाव्यता, यानी राजनीति मात्र की ही मृत्यु। हाल के वर्षों में तीसरी दुनियावादी विचार के उत्तरसंरचनावाद के साथ मेलजोल के कई प्रयास सामने आए हैं।' (वही, पृ.64-5)

यहां 'सब्जेक्ट' के पर्याय के रूप में मैंने 'विषय' का चुनाव किया है, लेकिन इसका वास्तविक अर्थ इसके साथ 'मरने वाली' 'सामाजिक' और 'राजनैतिक' जैसी श्रेणियों के साथ इसे रखने से प्रकट होता है। दूसरे शब्दों में, 'डेथ आफ सब्जेक्ट' का अर्थ है जनता और उसके लिए सोचने और काम करने वाले बौद्धिक कार्यकर्ता की मौत। उत्तरसंरचनावाद की अपनी राजनीति का तकाजा भी यही है।
                   #ऐजाज़_अहमद_का_मार्क्सवाद  (3)

ऐजाज़ अहमद के अनुसार '70 के दशक के अंत तक आते-आते उपनिवेशवादविरोधी क्रांतियों की आँधी थम गई और इसकी समाजवादी धारा को घेरने और काबू करने में साम्राज्यवाद सफल हुआ। '80 के दशक में इसीलिए राष्ट्रीय बुर्जुआ की अगुवाई में उत्तऔपनिवेशिक राष्ट्रवाद मजबूत हुआ, जिसने तीसरी दुनियावाद की नींव डाली। '80 के दशक के परवर्ती वर्षों में ऐसे अवांगार्द सिद्धांतकार सामने आए जिन्होंने घोषणा की कि राष्ट्रवाद की आलोचना करने के लिए उत्तरसंरचनावाद और विखंडनवाद मज़बूत वैचारिक स्थितियां हैं। एडवर्ड सईद ने रंजीत गुहा और सबाल्टर्न इतिहास की पूरी परियोजना को उत्तरसंरचनावादी माना है।

यहां फूको की कुछ मान्यताओं पर गौर करना चाहिए जो उत्तरसंरचनावाद के एक प्रमुख प्रेरक विचारक हैं—एक, जो भी खुद को 'तथ्य' बताता है वह विमर्श द्वारा प्रस्तावित 'सत्य-प्रभाव' (ट्रुथ-इफ़ेक्ट) है। दो, जो भी 'शक्ति' का प्रतिरोध करने का दावा करता है वह खुद 'शक्ति' बन जाता है। बक़ौल ऐजाज़ अहमद, इसके बाद 'सिद्धांत' के लिए 'प्रभावों' को गिनने, और उसे निगलने और उगलने के अलावा कोई काम नहीं बचता। यह खुद विचारों का बाजार बन जाता है जहां 'सिद्धांत' का किसी उपयोगशुदा माल की तरह थोक में उत्पादन और आपूर्ति होती है।

                           (2)

फ्रेडरिक जेम्सन के एक निबंध 'थर्ड वर्ल्ड लिटेरचर इन द एरा ऑफ मल्टीनेशनल कैपिटलिज्म' के फुटनोट में तीसरी दुनिया के संज्ञानात्मक सौंदर्यशास्त्र की शब्दावली के प्रयोग पर सवाल खड़े करते हुए ऐजाज़ अहमद कहते हैं कि यूरोप या अमरीका का शायद ही कोई ऐसा लेखक होगा जो कथित तीसरी दुनिया की कोई भाषा जानता हो। इन देशों की भाषाओं से अंग्रेजी अनुवाद भी अपवादस्वरूप ही हो पाता है। ऐसे में इन देशों के अंग्रेजी में लिखने वाले लेखक अनायास इनके प्रतिनिधि का दर्जा पा लेते हैं जैसा कि सलमान रश्दी और एडवर्ड सईद के मामले में हुआ है। इसके अलावा फ्रेडरिक जेम्सन की अपनी वैचारिकी में तीसरी दुनिया और पहली दुनिया एक दूसरे के बायनरी विपरीत हैं। तीसरी दुनिया को वे उपनिवेशवाद और साम्राज्यवाद के 'अनुभव' के आधार पर परिभाषित करते हैं, राष्ट्रवाद जिसकी अनिवार्य परिणति है। इसके बाद उनका प्रसिद्ध सूत्र आता है— तीसरी दुनिया की सभी रचनाओं को आवश्यक रूप से राष्ट्रीय रूपक की तरह पढ़ा जाना चाहिए। इस प्रकार इन तीनों का समीकरण अविभाज्य है। 

उल्लेखनीय है कि जेम्सन के अनुसार पहली दुनिया पूंजीवादी राज्यों का समूह है, और दूसरी दुनिया समाजवादी राज्यों का। तीसरी दुनिया शेष बची हुई है जिसकी विशेषता उपनिवेशवाद और साम्राज्यवाद का उसका 'अनुभव' है। ऐजाज़ अहमद की आपत्ति यह है कि इस वर्गीकरण की पहली दो श्रेणियां मानवीय प्रयासों का परिणाम हैं, जबकि तीसरी श्रेणी केवल निष्क्रिय भोक्ता होने की स्थिति को व्यक्त करती है। भारत का उदाहरण देकर वे बताते हैं कि उसमें पहली और दूसरी दुनिया के कई देशों से अधिक मात्रा में पूंजीवादी विकास भी हुआ है, और समाजवादी विकास भी। इससे मिलती-जुलती स्थिति ब्राजील, मेक्सिको, दक्षिण अफ्रीका आदि देशों की भी है। इसलिए इन्हें पहली दुनिया का बायनरी विपरीत बताना वास्तविकता से मेल नहीं खाता। उनका कहना है कि तीसरी दुनिया के सामने दो ही विकल्प हैं, राष्ट्रवाद या अमरीकी उत्तरआधुनिक संस्कृति। ऐजाज़ अहमद का प्रश्न है कि उनके सामने दूसरी दुनिया में शामिल होने का विकल्प क्यों नहीं हो सकता। वे जेम्सन को याद दिलाते हैं कि तीसरी दुनिया के वही राष्ट्र अमरीकी साम्राज्यवाद का प्रतिरोध कर सके जिन्होंने समाजवाद की राह चुनी। बाकी राष्ट्रवादियों को अमरीकी संस्कृति से जुड़ने में वक्त नहीं लगा। अगर मानव समाजों की व्याख्या उत्पादन संबंधों के बजाय अंतरराष्ट्रीय प्रभुत्व के 'अनुभवों' के आधार पर की जाएगी और उन्हें पूंजीवाद और समाजवाद के बीच संघर्ष के बाहर हमेशा के लिए त्रिशंकु की तरह लटकने के लिए छोड़ दिया जाएगा, उनके बीच एकता और संघर्ष के अन्य बिंदुओं की जगह राष्ट्रीय उत्पीड़न का अनुभव ही उन्हें एकताबद्ध करेगा, तो वे इतिहास के निष्क्रिय शिकार के रूप में देखे जाने को अभिशप्त होंगे।

इस बहस को आगे बढ़ाते हुए ऐजाज़ अहमद एक वैकल्पिक तर्क देते हैं— मान कर देखें कि हम तीन दुनियाओं में नहीं बल्कि एक ही दुनिया में रहते हैं, जिसमें पूंजीवाद और समाजवाद के बीच युद्ध छिड़ा हुआ है। कहीं पूंजीवाद जीता है जिसे जेम्सन पहली दुनिया कहते हैं, कहीं समाजवाद जीता है जिसे वे दूसरी दुनिया कहते हैं, और जहां अभी पलड़ा किसी के पक्ष में निर्णायक तौर पर नहीं झुका है उसे तीसरी दुनिया कहते हैं। यह विचार दुनिया की अधिक यथार्थवादी समझ देता है। इस दृष्टि से सोचने पर राष्ट्रवाद पर अतिरिक्त जोर देने की जरूरत नहीं रह जाती और न ही राष्ट्रीय रूपक की कोई खास अहमियत होती है। 

दूसरी तरफ जेम्सन का विचार है कि औद्योगिक समाजों में 'व्यक्तिगत' और 'सामाजिक' का पूर्ण विलगाव हो जाता है और पूर्व औद्योगिक समाजों में व्यक्तिगत और सामूहिक के तत्व परस्पर घुले-मिले होते हैं। इसीलिए तीसरी दुनिया के देशों की कथाओं में व्यक्तिगत के साथ  सामूहिकता के कुछ आशय भी सम्मिलित हो जाते हैं। इसे ही उन्होंने राष्ट्रीय रूपक होने का कारण माना है। ऐजाज़ अहमद इस बात के लिए उनको आड़े हाथों लेते हैं कि वे अपनी धारणाएं बहुत जल्दी-जल्दी बदलते हैं। 'सामूहिक' और 'राष्ट्रीय' में बहुत बड़ा फर्क है। 19वीं और 20वीं सदी के भारत की अनेक कथा-रचनाओं का हवाला देकर उन्होंने बताया कि वे कतई राष्ट्रीय रूपक नहीं है। इनमें मिर्जा हादी रुसवा, मोहम्मद हुसैन आजाद, इंशा अल्ला खाँ इत्यादि 19वीं सदी के बड़े लेखकों से लेकर 20 वीं सदी के उपन्यासकार अब्दुल्लाह हुसैन भी शामिल हैं। 

इस संबंध में कहने की बात यह है कि बहस में अगर कोई पक्ष अपनी बात का स्पष्टीकरण दे तो उसे फेसवैल्यू पर लेना चाहिए, और यथासंभव स्वीकार करना चाहिए, बशर्ते उसे येन केन प्रकारेण हराने ही कि मंशा न हो। क्योंकि इसके बगैर इस बात की संभावना बनी रहती है कि आप अपने प्रतिपक्ष के विचारों के किसी हीनतर पक्ष से बहस करते रहे जाएँ, और अपने हिसाब से उसमें सुर्खरू भी हो जाएँ, लेकिन वास्तविकता में उस बहस से कुछ भी नहीं बदलता। इस बहस में भी फ्रेडरिक जेम्सन की बात को ऐजाज़ अहमद तोड़ते-मरोड़ते हुए प्रतीत होते हैं। जैसे, उन्होंने जेम्सन पर परोक्ष रूप से ईसाइयत की परंपरा को रूपक के माध्यम से पुनर्जीवित करने का आरोप लगा दिया है, क्योंकि मध्यकाल में एलिगरी या रूपक का इस्तेमाल धार्मिक बोधकथाओं को प्रस्तुत करने के लिए बहुतायत से किया जाता था, जिसके विरुद्ध 19वीं सदी के अंग्रेज़ी साहित्य में विद्रोह हुआ और सेक्युलर परंपरा की स्थापना हुई थी। अब यह कुछ ऐसी ही बात है जैसे आज हिंदी में कोई रूपक की बात करे तो उस पर 'पंचतंत्र' या 'पुराणों' की परंपरा को पुनर्जीवित करने का आरोप लगा दिया जाए। बीसवीं सदी में भी अंग्रेज़ी-फ्रांसीसी साहित्य में रूपक-आधारित बेहतरीन कृतियों की रचना हुई है। अल्बैर कामू का 'प्लेग' और जार्ज ऑरवेल का 'एनिमल फार्म' इनमें खास तौर पर उल्लेखनीय हैं। फ़िलहाल हमारा विषय 19वीं और 20वीं सदी का हिंदी-उर्दू साहित्य है तो इसमें से बहुत चुने हुए दो-तीन रचनाकारों के माध्यम से रूपक की अहमियत पर बात की जाएगी।

सबसे पहले ऐजाज़ अहमद के प्रिय शायर मिर्ज़ा ग़ालिब को लेते हैं। उनकी शायरी के बेशतर हिस्से को बतौर राष्ट्रीय रूपक ही समझ जा सकता है। मसलन उनकी ये मशहूर ग़ज़ल देखें:

'न गुल-ए-नग़मा हूँ न पर्दा-ए-साज़
मैं हूँ अपनी शिकस्त की आवाज़'

यह महज़ किसी आशिक़ की आवाज़ नहीं है, एक पराजित और विनष्ट होती हुई सभ्यता की भी आवाज़ है। इस शेर को अगर केवल रवायती मुहावरे में समझने की कोशिश करेंगे तो कोई घिसा-पिटा अर्थ भले ही हाथ लग जाए, इसका वास्तविक वैभव हमसे दूर ही रह जाएगा। अगला शेर देखें:

'हूँ गिरफ़्तार-ए-उल्फ़त-ए-सय्याद
वरना बाक़ी है ताक़त-ए-परवाज़'

यहाँ बात और खुल जाती है। ये जो शिकारी है, जिसने हमें क़ैद कर रखा है, हम दरअसल उसके सम्मोहन में उलझ गए हैं। वरना उड़ने की ताक़त अभी ख़त्म नहीं हुई है। हम भारतीय लोग 19वीं सदी में ब्रिटिश मान मूल्यों से ऐसे ही सम्मोहित हो गए थे। आज भी औपनिवेशिक विरासत हमारे ऊपर सवार है, क्योंकि राजनैतिक रूप से हम भले ही आज़ाद हो गए, लेकिन सांस्कृतिक स्तर पर आज भी ब्रिटिश-अमरीकी संस्कृति के दीवाने हैं। इसीलिए ज्ञान के किसी भी क्षेत्र में हम कोई मौलिक काम कर पाने में असमर्थ हो चुके हैं। 

ग़ालिब की एक अपेक्षाकृत कम उद्धृत की गई ग़ज़ल के चंद शेर हैं-

'गुलशन में बंदोबस्त बरंगे-दिगर है आज
कुमरी का तौक़ हल्का-ए-बेरूने-दर है आज

'आता है एक पारा-ए-दिल हर फ़ुगाँ के साथ
तारे-नफ़स कमंदे-शिकारे-असर है आज

'अय आफ़ियत किनारा कर अय इंतिज़ाम चल
सैलाबे-गिरिया दर पै-ए-दीवारो-दर है आज'

पहले शेर का आशय है कि बग़ीचे का इंतज़ाम आज दूसरे ढंग का हो गया है। पहले जो फंदा चिड़िया के गले
के इर्द-गिर्द था, अब वह दरवाजे का दायरा बन गया है। ऊपरी तौर पर तो चिड़िया अपना गीत गाने के लिए आजाद है, लेकिन यह आज़ादी एक बड़े क़ैदख़ाने के अंदर की आज़ादी है। आबो-हवा में उन्मुक्तता की जगह घुटन भर गई है, और पूरा माहौल प्रदूषित हो गया है। यह फ़र्क़ शासकवर्गीय कठोरता और उदारता का है। 19वीं सदी में अंग्रेज़ों ने इन हथकंडों का बख़ूबी इस्तेमाल किया था। हमारे मौजूदा शासक भी अक्सर इसका स्वांग भरते दीख जाते हैं। यहां दूसरे (दिगर) ढंग के इंतज़ाम' की बात में व्यंग्य और विडंबना है। अव्वल तो वह पहले से अलग है नहीं, और फिर उसे आज़ाद करने वाला समझा जा रहा है जबकि वह ग़ुलामी ही को और गहराई देता है।

दूसरे शेर में इसी परिस्थिति से उपजी मन:स्थिति का बयान है। इस स्थिति में हर कराह के साथ दिल का एक टुकड़ा बाहर आ जाता है। इससे प्रभावित व्यक्ति की सांस का हर तार मानो कमान बन गया है, जिससे छूटने वाला तीर उसके दिल में पैबस्त हो जाता है। 

तीसरे शेर में भी इसी तकलीफ़देह सचाई पर प्रतिक्रिया व्यक्त किया है---ऐ दिल की शांति तू अपनी राह ले और ऐ व्यवस्था तू चलती रह। आंसुओं की बाढ़ आज घर-बार को ढा देने पर उतारू है। व्यवस्था यानी वही 'नया बंदोबस्त'। उसे चलते रहना है क्योंकि कोई और विकल्प नहीं है, लेकिन उसके साथ शांति का बने राह पाना नामुमकिन है। अशांति होकर रहेगी। दुख के इस पहाड़ का मुकाबला आँसुओं की नदी में आई बाढ़ ही कर सकती है। यही बाढ़ अन्याय पर आधारित इस घर की दीवारों को ढाने में कामयाब हो सकती है।

                              #ऐजाज़_अहमद_का_मार्क्सवाद  (4)

हिंदी-उर्दू साहित्य में राष्ट्रीय रूपक की मौजूदगी के विषय पर बहुत विस्तार से बात की जा सकती है लेकिन मैं यहाँ नमूने के बतौर ही कुछ कहने तक ख़ुद को सीमित रखूँगा। ग़ालिब के बाद बीसवीं सदी के हिंदी कवि मुक्तिबोध का एक अंश और अब्दुल्लाह हुसैन के उपन्यास 'उदास नस्लें' के बारे में कुछ वाक्य। मुक्तिबोध की कविता 'ब्रह्मराक्षस' की ये अंतिम पंक्तियां हैं:

'पिस गया वह भीतरी
औ' बाहरी दो कठिन पाटों बीच, 
ऐसी ट्रैजेडी है नीच ! !

बावड़ी में वह स्वयं 
पागल प्रतीकों में निरन्तर कह रहा 
वह कोठरी में किस तरह 
अपना गणित करता रहा
औ' मर गया..
वह सघन झाड़ी के कँटीले
तम-विवर में
            मरे पक्षी-सा
            बिदा ही हो गया
वह ज्योति अनजानी सदा को सो गयी 
यह क्यों हुआ !
क्यों यह हुआ ! !
मैं ब्रह्मराक्षस का सजल-उर शिष्य
होना चाहता
जिससे कि उसका वह अधूरा कार्य, 
उसकी वेदना का स्रोत
              संगत, पूर्ण निष्कर्षों तलक
                       पहुँचा सकूँ।'

यहाँ 'ब्रह्मराक्षस' नाम का यह पात्र ज्ञान के लिए उन्मुख भारतीय परंपरा का ही रूपक है जो आंतरिक स्तर पर सामंती और बाहरी स्तर पर औपनिवेशिक, दो कठिन पाटों के बीच पिस कर ख़त्म हो जाता है।

ऐजाज़ अहमद ने जिन रचनाकारों का नाम अपने मत के समर्थन में लिया है, उनमें अब्दुल्लाह हुसैन भी हैं। क्लासिक का दर्जा रखने वाले उनके उपन्यास' 'उदास नस्लें' को वर्षों तक मैं विश्वविद्यालय की कक्षाओं में पढ़ाता रहा हूँ और ये दावे के साथ कह सकता हूँ कि राष्ट्रीय रूपक के बतौर पढ़े बग़ैर इस उपन्यास में आने वाले घटनाक्रमों— 1857 के विद्रोह में एक सरकारी कर्मचारी रोशन अली ख़ाँ के हाथों कर्नल जानसन की जान बचने, फिर इस सेवा के बदले ब्रिटिश सरकार से मिली ज़मीन पर 'रोशनपुर' के बसने, उस नए बसे गाँव में रोशन अली ख़ाँ का अपने मुग़ल दोस्त मिर्ज़ा मुहम्मद बेग को रहने के लिए आमंत्रित करने, मुहम्मद बेग का अच्छी खासी जमींदारी के बावजूद लोहे की शिल्पकारी शौक़िया करने, उनकी मौत के बाद उनके बेटे नियाज़ बेग को इसी शिल्पकारी के कारण राजद्रोह के आरोप में जेल जाने, और उसके बेटे नईम का अंग्रेज़ों के ख़िलाफ़ आज़ादी की जंग में शामिल होने जैसे प्रसंगों की कोई सार्थक व्याख्या नहीं हो सकती। यह आम तौर पर समूची 19वीं सदी में और ख़ास तौर पर '57 के विद्रोह के दमन के बाद अंग्रेज़ों के हाथों अपने वफ़ादार लोगों के माध्यम से पुनर्गठित हिंदुस्तान की कथा है। 

रोशनपुर इसी नए हिंदुस्तान का रूपक है। इसकी अपनी प्रभुत्वशाली परंपरा अंग्रेज़ों के एहसानमन्द और उनकी दी हुई जागीरों और वजीफ़ों पर पलने वालों की है तो दूसरी वास्तविक भारतीयता की परंपरा भी है जो इससे बेनियाज़ होकर अपनी मेहनत से सच्चे हिंदुस्तानी की तरह जीने वाले लोगों के जीवन में दिखती है। इसकी नुमाइंदगी मुग़ल परिवार करता है। शिल्पकारी का शौक़ एक ऐसा सूत्र है जो उन्हें भारतीयता से जोड़ता है। हमारे देश में शास्त्रज्ञान का उतना ही महत्व रहा है, जितना कि कला कौशल का। अपने काम मे दक्ष कोई किसान, कोई शिल्पकार, कोई जुलाहा, कोई राजमिस्त्री, या कोई कातिब किसी विद्वान से कम नहीं समझा जाता था। किसानों, श्रमिकों, और शिल्पकारों ने मध्यकाल में भारतीय अर्थव्यवस्था की रीढ़ की हड्डी की भूमिका निभाई थी। कबीर आदि निर्गुण संत कवियों की वाणी में उन्हीं की भावना व्यक्त होती है। जातीय श्रेष्ठता की सामाजिक प्रणाली से इसका सहज विरोध का संबंध था, भले ही इसने निर्णायक संघर्ष का रूप न पकड़ा हो। शिल्प और कला का असाधारण विकास शिल्पकारों के सम्मान के बग़ैर नहीं हो सकता। औपचारिक शिक्षा को एकमात्र शिक्षा पद्धति का दर्जा देने में अंग्रेजों ने परंपरागत प्रणाली को नष्ट करने के बाद ही कामयाबी पाई।  

किस्सा कोताह यह कि अंग्रेज़ों की बनाई हुई व्यवस्था में केवल औपचारिक शिक्षा को मान्यता मिली, और बाकी सबको अशिक्षित और अज्ञानी मान लिया गया। रोशनपुर का यह मुगल परिवार शिल्पकारी में दक्ष है। आगे चलकर मुहम्मद बेग का बेटा नियाज़ बेग लोहे की खूबसूरत बंदूकें बनाने लगता है, जिसे पुलिस की चेतावनी के बावजूद नहीं छोड़ता और राजद्रोह के आरोप में तेरह साल की सज़ा काटता है। ध्यान रहे कि हिंदुस्तान के लोगों के हथियार रखने के हक़ को ब्रिटिश सरकार ने ही छीना था। आज जिस लाइसेंस प्रणाली को हम स्वाभाविक समझते हैं, वह ग़ुलाम देशों की ही ख़ासियत है जो अब तक चली आई है। बहरहाल, आगे चलकर ये दोनों परंपराएँ परस्पर घुलती-मिलती हैं, आज़ादी के लिए लड़ती हैं, और अपनी राष्ट्रीय नियति में साझेदारी करती हैं।

कहने का आशय यह कि रूपक एक शैली है जिसमें आधुनिक युग के अनुरूप भी रचनाकर्म होता है। उस पर मध्ययुग का ठप्पा लगा देना उचित नहीं है। जेम्सन ने जिस संदर्भ में कहा है कि पूर्वऔद्योगिक समाजों में व्यक्तिगत कथा में सामूहिक कथा शामिल होती है, वह समझ में आने वाली बात है। पूर्वआधुनिक परंपराओं में व्यक्तिगत की चेतना भी नहीं होती और समूह के अंश के रूप में ही व्यक्ति के अस्तित्व की चरितार्थता संभव होती है। यही समाज उपनिवेशवाद से लड़ाई के दौरान अपने अंदर एक नई, राष्ट्रीय पहचान विकसित करता है। विकसित औद्योगिक समाज बनने तक उसकी चेतना में नई व पुरानी दोनों प्रकार की सामूहिकताएँ सक्रिय रहती हैं। लेकिन उपनिवेशवाद-विरोधी और साम्राज्यवाद-विरोधी चेतना उसे लगातार आधुनिक दिशा में उन्मुख करती है। इसी पृष्ठभूमि में जेम्सन तीसरी दुनिया की रचनाओं को राष्ट्रीय रूपक के बतौर 'पढ़ने' की वक़ालत करते हैं। ध्यान दें, कि वे ऐसा 'लिखने' का आग्रह नहीं कर रहे हैं। सिर्फ़ पढ़ने के आग्रह में यह निहित है कि पुरानी सामूहिकताओं के नज़रिए से लिखी हुई रचनाओं में भी नई सामूहिकता यानी राष्ट्र के आग्रह स्वाभाविक रूप से शामिल होंगे। अब क्योंकि यह नई चीज है और सबसे मूल्यवान भी, इसलिए हमें चाहिए कि पढ़ते समय इसके प्रति विशेष रूप से सचेत हों, अन्यथा हम इसकी पहचान करने से चूक सकते हैं।

इस बहस का केंद्रीय मुद्दा यह है कि जो देश उपनिवेशवाद से मुक्त हुए हैं उन्हें समाजवाद में संक्रमण का संभावित उम्मीदवार माना जाए या साम्राज्यवाद से जूझते राष्ट्रवाद के रूप में देखा जाए। ऐजाज़ अहमद के विश्लेषण से ऐसा लगता है कि एक बार औपनिवेशिक गुलामी से मुक्त होने के बाद उन्हें कथित तौर पर पूंजीवादी पहली या समाजवादी दूसरी दुनिया के अंग के रूप में अपनी भूमिका तय कर लेनी चाहिए, वरना वे तीसरी दुनिया की त्रिशंकु नियति को ही प्राप्त होंगे। इस मान्यता के पीछे जो सबसे बड़ी वजह दिखती है वह यह कि राष्ट्रवाद को वे व्यवहारतः राष्ट्रीय पूंजीपति वर्ग के नेतृत्व में चलने वाला विचार ही मानते हैं, सैद्धांतिक गुंजाइशें चाहे जो हो। यानी, तीसरी दुनिया में राष्ट्रवाद के होने का एकमात्र अर्थ है कि वहां सर्वहारा वर्ग पूंजीपति का अनुगामी है, और समाजवाद के लिए संघर्ष नहीं हो पा रहा है। 

ग़ौरतलब है कि यह सारा विश्लेषण उन्होंने तब किया जब चीन में कम्युनिस्ट पार्टी के नेतृत्व में जनता के लोकतांत्रिक गणतंत्र की स्थापना हो चुकी थी, 'पूंजीवादी पथिकों' (कैपिटलिस्ट रोडर्स) के विरुद्ध दस साल तक 'सांस्कृतिक क्रांति' चलाने के बाद उसे वापस ले लिया गया था, और माओ ने कहा था कि यह पूंजीवाद और समाजवाद के बीच संघर्ष की संक्रमणकालीन स्थिति है। यह संघर्ष लंबा चलेगा और अंत में कौन जीतेगा यह अभी से नहीं कहा जा सकता। रूस समेत जिन देशों में समाजवाद आया उनमें से कोई विकसित पूंजीवादी देश (जैसी कि मार्क्स ने कल्पना की थी) नहीं था। पिछड़ी हुई उत्पादन पद्धतियों वाले समाज में क्रांतियाँ संपन्न हुईं। रूस में 1917 की अक्टूबर क्रांति के सिर्फ़ एक साल के अंदर लेनिन 'नई आर्थिक नीति' लेकर आए जिसमें पूंजीवादी उत्पादन संबंधों को एक स्तर पर पुनर्स्थापित किया गया ताकि उत्पादक शक्तियों के विकास में मदद मिल सके। उस दौर के समाजवाद को इसीलिए 'राजकीय पूंजीवाद' और 'पूंजीपति के बगैर पूंजीवाद' कहां गया। मार्क्स के दिए नारे--- 'सबसे उसकी योग्यता के अनुसार और सबको उसकी आवश्यकता के अनुसार'--- से अलग लेनिन के समाजवाद की पहचान बन चुका नारा--- 'सबसे उसकी योग्यता के अनुसार और सबको उसके काम के अनुसार'--- पूंजीवादी लूट और शोषण के विरुद्ध अवश्य है, लेकिन बेशी मूल्य के आधार पर पूंजी के संचय के विरुद्ध नहीं है। ख़ुद ऐजाज़ अहमद के विश्लेषण में एक जगह यह सचाई झलक जाती है, जब वे लेनिन की छोटे बुर्जुआ वर्ग के लिए जगह बनाने वाली 'नई आर्थिक नीति' को पलटने और 'नियंत्रित अर्थव्यवस्था' की नीति अपनाने के स्तालिन के रवैये को 'विकृति' कहते हैं:

'बदले में इसका नतीजा यह हुआ कि स्तालिनीय नौकरशाहीवाद की सबसे बुरी संभावनाएँ सामने आईं, जिन्होंने राष्ट्रीय सुरक्षा के नाम पर न केवल विरोध को दबा दिया बल्कि अर्थव्यवस्था में व्यापक विकृतियों को जन्म दिया, जिसमें भ्रष्टाचार और भाई-भतीजावाद में पतन भी शामिल था। असहनीय बाहरी दबाव और नियंत्रित अर्थव्यवस्था--- जिसे स्तालिन शासन ने नई आर्थिक नीति को हटाकर लागू किया और बाद में पूर्वमध्य यूरोप के कोमेकान (परस्पर आर्थिक सहयोगी, पूर्वसमाजवादी) देशों तक पर थोप दिया था और जो समाजवादी निर्माण का मॉडल बन गया था--- के बीच कोई विभाजक रेखा नहीं थी। कहना मुश्किल है कि बाहरी दबाव ने आंतरिक विकृतियों को किस हद तक निर्धारित किया।' (वही, पृ. 22-3)

दूसरी बात यह कि जेम्सन के सूत्रीकरण में यह निहित है कि तीसरी दुनिया का सीधा संघर्ष साम्राज्यवाद से है। लेकिन इस समीकरण को बायनरी विपरीत का मामला बताकर ऐजाज़ अहमद खारिज कर देते हैं क्योंकि तीसरी दुनिया को साम्राज्यवाद या राष्ट्रवाद में से एक विकल्प चुनना पड़ता है। वे मानते हैं कि समाजवाद का सीधा संघर्ष साम्राज्यवाद से है और तीसरी दुनिया भी उस संघर्ष में शामिल है, यानी मूल लड़ाई समाजवाद बनाम पूंजीवाद है। उन्हें एतराज है कि इस सिद्धांत में समाजवाद को साम्राज्यवाद के विकल्प के रूप में क्यों नहीं रखा गया है। ध्यान दें कि साम्राज्यवाद से सीधे टकराव में अगर कामयाबी नहीं मिलेगी तो तीसरी दुनिया के देशों को उसका अंग बनना ही पड़ेगा। इसे अलग से कहने की भी जरूरत नहीं है। लेकिन अगर संघर्ष में कामयाबी मिलेगी तो जाहिर है कि देश के अंदर की समाजवादी प्रवृत्तियां मजबूत होंगी। ऐसी स्थिति में त्रिशंकु बनने की आशंका उचित नहीं है।

ऐसा लगता है कि ऐजाज़ अहमद यह कल्पना ही नहीं करते कि मजदूर वर्ग कभी राष्ट्रवाद का चैंपियन बन सकता है। यह भूमिका वे राष्ट्रीय पूंजीपति के लिए सुरक्षित रखते हैं, जबकि साम्राज्यवाद के युग में यह संभव ही नहीं है कि वह राष्ट्रीय हितों के लिए समझौताहीन संघर्ष कर सके। हर जगह उसे जनता के अधिकारों में कटौती करनी पड़ेगी, राष्ट्रवाद की जगह अंधराष्ट्रवाद लागू करना पड़ेगा, और साम्राज्यवाद को अधिक से अधिक छूट देते हुए अपनी जनता की मुश्कें कसने का काम करना होगा। इसी परिस्थिति से जूझते हुए किसी देश के अंदर की समाजवादी शक्तियां मजबूत होती हैं और राष्ट्रवाद तथा जनतंत्र के लिए संघर्ष की अगुवाई करती हैं। पिछड़े हुए विकासशील देशों के समाजवादी दिशा अपनाने का यही वास्तविक तरीका है, ऐजाज़ अहमद जिसकी अनदेखी करते हैं। 

एक और बात जिसके लिए उन्होंने जेम्सन को आड़े हाथों लिया है कि वे राष्ट्रों को उत्पादन प्रणाली के आधार पर नहीं, अंतरराष्ट्रीय प्रभुत्व के संबंधों के 'अनुभव' के आधार पर वर्गीकृत कर रहे हैं। यह ध्यान रखना चाहिए कि किसी भी नवस्वतंत्र देश के इतिहास में उपनिवेशवाद और साम्राज्यवाद के 'अनुभव' का अर्थ कोई संवेदनात्मक अनुभूति नहीं है। इसका सीधा संबंध उत्पादन प्रणाली, उत्पादन संबंध, स्वामित्व और वितरण के तरीकों से होता है। उपनिवेशवाद का अनुभव भारत जैसे देश में पुरानी उत्पादन प्रणाली के विनाश, संरक्षणवादी नीतियों के माध्यम से देश को कच्चे माल की मंडी में बदलना, भूमि संबंधों में बदलाव, देश के नियम कानून में बदलाव, शिक्षा, प्रशासन और राजनैतिक व्यवस्था में आमूलचूल परिवर्तन आदि के रूप में दिखाई पड़ता है। यानी, किसी पिछड़े हुए उत्पादन संबंध वाले नवस्वतंत्र देश के लिए उपनिवेशवाद का 'अनुभव' 'अंतरराष्ट्रीय प्रभुत्व संबंध' का अध्ययन नहीं है। यह उत्पादन संबंधों का ही अध्ययन है।
कृष्ण मोहन

साभार      

कीर्तिगान उपन्यास हमारे समाज में जारी साम्प्रदायिक उन्माद और फ़ासिस्ट राजनीति को साहित्य की ओर से दिया हुआ जवाब है :कृष्ण मोहन

'कीर्तिगान' चंदन पांडेय का दूसरा उपन्यास है। इससे पहले 'वैधानिक गल्प' में उन्होंने एक ऐसे युवा मुस्लिम अध्यापक रफ़ीक की कहानी बयान की थी, जो लोकचेतना को जगाने वाले नाटकों को अपने विद्यार्थियों के साथ तैयार करके उनका प्रदर्शन करता है। इस प्रक्रिया में वह स्थानीय शक्तिशाली सामाजिक समूहों और निहित स्वार्थों को खटकने लगता है, जो बदलते हुए समय के साथ कथित धर्मनिरपेक्ष राजनीति को तिलांजलि देकर साम्प्रदायिक राजनीति के उभार के दौर में बढ़ चढ़ कर उसकी अगुवाई करने में लगे हुए हैं। एक निर्णायक प्रदर्शन से पहले रफ़ीक और उसकी टीम की सदस्य एक छात्रा अचानक गायब हो जाते हैं। उस छात्रा से जोड़कर उसके ग़ायब होने की अनेक व्याख्याएँ समाज मे फैला दी जाती हैं, जिनपर विश्वास करने को हमारा समाज मानो तैयार बैठा रहता है। उसकी पत्नी का मित्र, एक लेखक जब उसकी खोज में उतरता है तो उसके सामने रफ़ीक के सहयोगी अध्यापकों से लेकर पुलिस, दंगाई समूहों, राजनेताओं और सोशल मीडिया तक के गठजोड़ का दृश्य धीरे धीरे उभरता है।

यह उपन्यास हिंदी जगत में एक परिघटना की तरह आया और अत्यंत चर्चित और प्रशंसित हुआ। इसके पीछे वजह यही थी कि हमारे समाज के मौजूदा दौर में ज़मीनी स्तर पर चलने वाली साम्प्रदायिक ध्रुवीकरण की प्रक्रिया और उसको संचालित करने वाले निहित स्वार्थों की कार्यप्रणाली को कथा-साहित्य में पहली बार विश्वसनीय और कलात्मक ढंग से चित्रित किया जा सका था। साहित्य के पाठकों ने अपने ज्ञान से अधिक अपनी संवेदना से इस चुनौतीपूर्ण कथा की रचना में आने वाले कलात्मक जोख़िम को महसूस किया था।

बहरहाल, लेखक का अगला उपन्यास 'कीर्तिगान' इस मामले में एक बहुत बड़ी लकीर खींचता हुआ दिखाई पड़ता है। 'वैधानिक गल्प' में मॉब लिंचिंग की भूमिका-सी बनती है और एकाध इसके प्रयास भी होते हैं, लेकिन उसकी कथा प्रायः समाज की ऊपरी सतह पर जारी सॉफिस्टिकेशन के पाखंड को अनावृत करती है। इस अगले उपन्यास में हमारे समाज का यह लोमहर्षक यथार्थ  अपने सर्वग्रासी अंदाज़ में प्रकट होता है। अपनी आँखों के सामने सतत जारी इस हत्यारे सिलसिले को कला-रचना में ढालने का फ़ैसला करना एक अकल्पनीय चुनौती को आमंत्रित करने जैसा था। हिंदी-उर्दू के कथा-साहित्य में एक मंटो को छोड़कर दूसरा कोई नाम याद नहीं आता जिसने समाज में जारी ऐसे पाखंड और पागलपन की विकराल विभीषिका को, उसकी मनोवैज्ञानिक, सामाजिक और ऐतिहासिक गहराई में जाकर, कलात्मक ढंग से प्रस्तुत करने की चुनौती स्वीकार की हो। लेखक ने न केवल इसे स्वीकार किया है बल्कि बहुत बड़ी हद तक इसे सफलतापूर्वक निभाया है। इसका अर्थ है कि इस भीषण यथार्थ के सतही आयामों तक सीमित होकर नहीं, बल्कि इसके गहन आंतरिक आयामों का स्पर्श करते हुए कथा को बुद्धि-संवेदना-गम्य बनाया है। मेरी नज़र में यह एक हैरतअंगेज़ कारनामा है जो हमारे कथा-साहित्य में संभव हुआ है। उपन्यास अभी आया ही है, इसलिए इसकी विषयवस्तु के बारे में और कुछ कहना अभी उचित नहीं है। मैं यही कह सकता हूँ कि यह उपन्यास हमारे समाज में जारी साम्प्रदायिक उन्माद और फ़ासिस्ट राजनीति को साहित्य की ओर से दिया हुआ जवाब है। यह हमारी इस समझ को बल देता है कि रात जितनी ही अँधेरी और काली होती है, उसके सुबह में बदलने की संभावना उतनी ही निकट होती है।

अपूर्वानन्द की किताब 'सुंदर का स्वप्न' : कृष्ण मोहन

#सुंदर_का_सत्य

अपूर्वानन्द की किताब 'सुंदर का स्वप्न'

सचाई जब कड़वी हो जाती है, तो शासकवर्गीय विचारक सौंदर्य के पैमानों पर बहस छेड़ते हैं, और सत्य को व्यक्त करने के आग्रह पर कुढ़ने लगते हैं। जब उस सचाई को कला में ढालकर पेश किया जाता है तो वे उससे नाक़ाबिले बर्दाश्त होने की मांग करते हैं, और ऐसा न होने को कला की असफलता कहते हैं। असल में ऐसे विचारक रंगे सियार की तरह होते हैं, जो सत्ता के विरोधी होने का स्वांग भरते हैं, लेकिन जब भी मुँह खोलते हैं तो अपनी असलियत उजागर कर देते हैं। समय-समय पर इनकी चर्चा करनी पड़ती है, ताकि लेखकों की इस प्रजाति को पहचानना हम भूल न जाएं।

आधुनिक युग में सौन्दर्यशास्त्र के अस्तित्व में आने की एक दिलचस्प वजह बताते हुए अपूर्वानन्द अपनी किताब 'सुन्दर का स्वप्न' (वाणी प्रकाशन) के आरम्भिक पृष्ठों पर कहते हैं– "हम देखते हैं कि प्रायः हर समय शासक वर्गों के प्रत्यक्ष या परोक्ष प्रोत्साहन पर सर्वसम्मति का एक स्तर खोजने की कोशिश चलती रहती है।... सौन्दर्यानुभूति के इस स्तर से गुजरकर ही किसी भी राजनीतिक या सामाजिक व्यवस्था का तर्क मान्यता प्राप्त करने में सफल होता है।... अर्थशास्त्र और नीतिशास्त्र की दुनिया अमूर्त तर्कों से अलग अनुभूति का एक सम्पूर्ण लोक है, जिसे समझना किसी सामाजिक व्यवस्था की आवश्यकता है। अठारहवीं सदी के यूरोपीय दार्शनिक अनुभूति के उस लोक का अपना तर्कशास्त्र गढ़ने की जरूरत महसूस करने लगे जो मानवीय चिन्तन द्वारा निर्मित नीतिशास्त्र, राजनीतिशास्त्र या तर्कशास्त्र से अलग अस्तित्व रखता हो। इसी प्रयास में सौन्दर्यशास्त्र का जन्म हुआ।" (पृ. 18-19)

लेकिन विकास के क्रम में सिक्के का दूसरा पहलू भी सामने आता है-- "सौन्दर्यशास्त्र ने अठारहवीं सदी में जहाँ एक नई सामाजिक-आर्थिक शक्ति के औचित्य के लिए आधार प्रस्तुत किया, वहीं आगे चलकर उसकी क्रूरता से विद्रोह किया, उसके असली चेहरे को बेनकाब किया और यह बताया कि एक ऐसा क्षेत्र बचा हुआ है जहाँ मनुष्य अपनी रचनात्मकता की शक्ति के साथ उस व्यवस्था का मुकाबला कर सकता है।" (पृ. 29)

बुनियादी तौर पर सौन्दर्य के शास्त्र के निर्माण या विवेचन का कोई भी प्रयास इन्हीं दोनों दिशाओं में से किसी एक के निकट होगा। इस किताब के उपशीर्षक में इसे मार्क्सवादी सौन्दर्य-दृष्टि से सम्बन्धित माना गया है, इसलिए इस परिप्रेक्ष्य में भी इसकी जाँच-परख अनिवार्य है। कुल मिलाकर सौन्दर्य को परिभाषित करने के इस आग्रह की राजनीति क्या है और यह स्वयं सौन्दर्य की कसौटी पर कितना खरा उतरा है, यही इस लेख का विषय है।

मार्क्सवादी सौन्दर्य-चेतना का पुनरुद्धार करने के क्रम में लेखक के हाथ एक अत्यन्त मौलिक सूत्र लगा है जिसे वह इन शब्दों में प्रस्तुत करता है- "मार्क्स और एंगेल्स की रचनाओं को आत्मीयता से पढ़नेवाला व्यकि यह देखे बिना नहीं रह सकता कि उनके आदर्श मानवीय जीवन का लक्ष्य जितना सत्य की प्राप्ति नहीं, सुख, आनन्द या लोगों की भलाई है।" (पृ. 37) मार्क्स को इस किताब में किसी सौन्दर्यशास्त्री जैसे उच्चतर आसन पर प्रतिष्ठित किया गया है क्योंकि उनका पूरा प्रयास मानवीय श्रम को पूंजीवादी उपयोगितावाद की अनिवार्यता से मुक्त कराकर उसे सुख और आनन्द की ऐच्छिकता के हवाले करता है और इस प्रकार पूंजीवादी उत्पादन पद्धति में अजनबियत का शिकार होकर गुम हो गए मानव-व्यक्तित्व को उसे वापस करता है। पूर्णता और सौन्दर्य का यह लक्ष्य निश्चय ही मार्क्स के बुनियादी लक्ष्यों में से एक है, लेकिन अपूर्वानन्द के विश्लेषण में मार्क्स को यह श्रेय महंगे दामों मिलता है। उसके लिए उन्हें सबसे पहले सत्य की भारी कीमत चुकानी पड़ती है। उपयुक्त उद्धरण में सुख या आनन्द, जिसे किताब में प्रायः सौन्दर्य के पर्याय के रूप में व्यवहृत किया गया है और लोगों की भलाई यानी लोककल्याण एक तरफ है और सत्य दूसरी तरफ। यह खेमेबन्दी रणनीतिक है जिसका रहस्य आगे चलकर खुलता है।

भारतीय परम्परा में सत्य और शिव को सुन्दर से अभिन्न माना गया है, लेकिन यहाँ अगर वे अलग-अलग दिखते हैं तो यह अकारण नहीं है। 'सच्चे' सौन्दर्य की स्थापना सत्य के मानमर्दन के बगैर नहीं हो सकती। साहित्य और कला के क्षेत्र में, जिसे सौन्दर्यशास्त्र का विशिष्ट क्षेत्र माना गया है, सत्य को अंतर्वस्तु तथा सौन्दर्य को रूप के द्वारा पहचाना जाता है। अन्तर्वस्तु की अवहेलना करके रूप के महत्व पर आत्यंतिक जोर देनेवाले विचार, रूपवाद का समर्थन करने के लिए बहुत खोजबीन कर मार्क्स की निम्नलिखित गवाही जुटाई गई है। रूपवाद को मार्क्सवाद का शत्रु घोषित करने और तमाम तथाकथित गैरयथार्थवादियों की आलोचना करनेवाले अगर मार्क्स के इस उद्धरण को देखें तो उन्हें अपनी गलती का अहसास शायद हो सके-- "सत्य में सबका साझा होता है- यह मेरी मिल्कियत नहीं है। इस पर हर किसी का हक है। मुझ पर वह नियन्त्रण रखता है। मैं उसे नियन्त्रित नहीं करता, मेरी सम्पत्ति बस रूप ही है-- यानी मेरी मानसिक और बौद्धिक विशिष्टता।" (वही, पृ. 47 )

मार्क्स के इस कथन से रूपवाद को तो शायद ही कोई राहत मिल सके, हाँ सत्य के प्रति उनकी प्रतिबद्धता का पता अवश्य चल जाता है। अपने इतने उत्साही समर्थकों के प्रयासों पर मार्क्स की ऐसी ठंडी प्रतिक्रिया देखकर उनके एक समकालीन मिर्ज़ा ग़ालिब होते तो कहते:

'शौक हर रंग रक़ीबे सरो सामां निकला 
क़ैस तस्वीर के पर्दे में भी उरियाँ निकला'

मज़े की बात यह है कि लेखक अपनी उपलब्धि का श्रेय ख़ुद लेने में संकोच करता है और अत्यंत उदारतापूर्वक उसे पूँजीवाद को प्रदान कर देता है– "पूँजीवादी समाज में सत्य और सुन्दर अलग-अलग हैं, वे अलग-अलग मूल्य हैं। पूँजीवादी व्यवस्था में जो सत्य है, वह सुन्दर नहीं क्योंकि मानवीयता से रहित हुए बिना सच का सामना
नहीं किया जा सकता।" (पृ. 55) जाहिर है कि यह विलक्षण पूंजीवाद 'मानवीयता' को 'सत्य' से अलगाकर 'सुन्दर' के साथ जोड़ देता है जिससे दोनों के बीच मूल्यगत अलगाव पैदा हो जाता है। पूँजीवाद यह कैसे करता है, इसका मर्मस्पर्शी वर्णन देखें-- "इसी लिहाज से यह मान लिया जाता है कि सत्य का अनुधावन तो विज्ञान का काम है, लेकिन सौन्दर्य कला का लक्ष्य होता है। सत्य और सुन्दर के बीच जो सख्त अलगाव माना जाता है, उसकी वजह यह है कि सौन्दर्य-भावना का मानवीय आकांक्षाओं की पूर्ति से सम्बन्ध है जबकि इस समाज में जो वस्तुनिष्ठ सत्य है, वह अनेक बार इस मानवीय अभिलाषा के विपरीत, उसे कुचलते हुए अपनी सत्ता स्थापित करता है। इसीलिए पूँजीवाद की खासियत है कि यथार्थलोक में जो अभिलाषाएँ पूरी नहीं हो सकतीं, उनकी पूर्ति के लिए वह एक कल्पना लोक का निर्माण करता है और जनसामान्य को उसमें सन्तुष्टि हासिल करने को प्रेरित करता है। इस प्रकार सौन्दर्य - भावना की प्रबलता की जाँच मनुष्य को अधिक से अधिक यथार्थ-विस्मृत करने या अचेत बनाने की उसकी क्षमता से की जाती है।" (वही)

इस उद्धरण से किसी को भी यह भ्रम हो सकता है कि लेखक पूँजीवाद की इन कारस्तानियों असन्तुष्ट है, लेकिन वह तो इनकी पुष्टि के लिए मार्क्सवादी तर्कों की तलाश में है। पहले जैसे उसने मार्क्स को उद्धृत किया था, उसी तरह अब क्रिस्टोफर कॉडवेल को उद्धृत करते हुए 'सुन्दर' को समाज से काटने की जुगत भिड़ाता है। कॉडवेल कहते हैं कि "सौन्दर्य में बदलाव का कारण समाज है, उसी की वजह से नए सौन्दर्य का भी जन्म होता है। सौन्दर्य जिस वस्तुनिष्ठ परिवेश में अवस्थित होता है वह प्राकृतिक से ज्यादा सामाजिक है। यानी सौन्दर्य का निर्धारण दूसरे असौन्दर्यात्मक गुणों के द्वारा होता है और वे ही इसके अस्तित्व में आने और फिर विलीन हो जाने, इसके अन्दर तब्दीली का और इसके विकास का कारण बता सकते हैं... ये समाज वैज्ञानिक शक्तियाँ हैं।... ये समाज वैज्ञानिक गुण सौन्दर्यात्मक नहीं हैं: सौन्दर्यशास्त्र का एक अलग ही क्षेत्र है।" (वही, पृ. 56)

कॉडवेल के इस वक्तव्य से पता चलता है कि सौन्दर्य का आधार समाज है, वही उसमें परिवर्तन और विकास का कारण है, लेकिन उसकी व्याख्या के नियम समाज की व्याख्या के नियमों से अलग होंगे। कला का गतिविज्ञान सामाजिक गतिविज्ञान से अलग है; इससे लेखक यह निष्कर्ष निकालता है कि, "सौन्दर्यशास्त्र को बलपूर्वक समाजशास्त्र से अलग करने के उनके आग्रह को कभी भी नजरअन्दाज नहीं किया जाना चाहिए।" इसी तरह 'कला के तर्कशास्त्र' की व्याख्या करते हुए कॉडवेल तर्कणापरक के बजाय सौन्दर्यात्मक विश्वदृष्टि की आवश्यकता बताते हुए तर्कणापरक को 'वैज्ञानिक' (इनवर्टेड कामा लगाकर किसी विशिष्ट अर्थ में) कहते हैं। अपूर्वानन्द इससे झट निष्कर्ष निकाल लेते हैं कि 'वैज्ञानिकता को सौन्दर्यात्मकता के बर-अक्स खड़ा करके कॉडवेल कला के अपने तर्कशास्त्र, यानी सौन्दर्यशास्त्र की विशिष्टिता को चिह्नित करते हैं।"

यहाँ कॉडवेल के विचारों की विवेचना का अवकाश नहीं है, लेकिन अपूर्वानन्द मार्क्स से लेकर कॉडवेल तक के वक्तव्यों से 'बलपूर्वक' वे सारे निष्कर्ष निकालते हैं जिसकी ज़िम्मेदारी उन्होंने पूँजीवाद पर डाली थी। इस प्रकार उन्होंने सौन्दर्य को अपने ही शब्दों में 'अधिक से अधिक यथार्थ-विस्मृत या अचेत बनाने की क्षमता' से सम्पन्न कर लिया। उनकी योजना बिल्कुल स्पष्ट है, हालाँकि उसे छिपाने के लिए उन्होंने ढेरों मार्क्सवादी पापड़ बेले हैं।

आन्तरिक संगति, सामंजस्य, लय और एकता सौन्दर्य के सम्भवत: सर्वाधिक पहचाने गए अवयवों में से कुछ एक हैं। लेकिन इस किताब में वर्णित सौन्दर्य हमेशा किसी न किसी का मुकाबला करते, उसे अपदस्थ करते हुए आता है। पहले उसने मनुष्यता को साथ लेकर सत्य को पछाड़ा, फिर भावना को साथ लेकर विचार को अपदस्थ करने की योजना बनाई। सन्दर्भ से कटे हुए उद्धरणों की कमज़ोर नींव पर खड़ा होने के कारण पहले की तरह ही इस उपलब्धि का श्रेय लेने का साहस भी लेखक नहीं कर सका और निहायत सादगी के साथ इसका जिम्मा एक बार फिर उसने पूँजीवाद के सिर मढ़ लिया। रिंद के रिंद रहे हाथ से जन्नत न गई। मुलाहजा फरमाएं– "भारतीय पूँजीवाद का विकास इस स्तर तक हो चुका था, जहाँ जाकर वह मानवीय व्यक्तित्व के पूर्ण विकास के उन वायदों के खिलाफ काम करता हुआ दिखाई देने लगा था, जो अपने आरम्भिक काल में उसने किए थे। भारतीय मनुष्य के भावलोक और विचारलोक में एक दरार-सी पड़ गई थी और यह अहसास तेज हो गया था कि यह विकास सहज मानवीय भावनाओं को कुचलकर आगे बढ़ रहा है।" (पृ. 92)

यहाँ ग़ौरतलब है कि भावलोक और विचारलोक में दरार डालनेवाला पूँजीवाद सिर्फ़ भावनाओं को कुचलकर आगे बढ़ रहा है। संकेत साफ है, विचारों पर पूँजीवाद के समर्थन का आग्रह। इस प्रकार पूँजीवाद को दोषी ठहराने वाली भंगिमा में दरअसल उसके द्वारा डाली गई फाँक को और गहरा किया जा रहा है और उसी के आधार पर अपनी रणनीति को व्यवस्थित किया जा रहा है। इस बार आचार्य शुक्ल 'आत्मीयता' से भरी व्याख्या के शिकार बनते हैं– 'अपनी भाषा पर विचार' शीर्षक अपने निबन्ध में वे लिखते हैं "भाषा का प्रयोग मन में आई हुई भावनाओं को प्रदर्शित करने के लिए होता है।" इसके बाद आचार्य शुक्ल भावनाओं को विचारों से अलगाते हुए उसे रेखांकित करते हैं। लेखक का निष्कर्ष है– "भाषा को विचारों की जगह भावनाओं की अभिव्यक्ति का माध्यम मानने पर शुक्लजी का बल एक नई दृष्टि का परिचायक है। जिस तरह पाश्चात्य दर्शन में सौन्दर्यशास्त्र का विकास ऐन्द्रिय संवेदन पर बल देने के कारण हुआ उसी प्रकार शुक्लजी का सम्पूर्ण साहित्य-चिन्तन 'भावनाओं' को केन्द्र में रखकर होता है।" (पृ. 92)

इस मासूम से दिखनेवाले निष्कर्ष में एक तीर से दो शिकार किए गए हैं। एक तरफ विचारों को शुक्लजी के चिन्तन में हाशिए पर धकेला गया है, तो दूसरी तरफ ऐन्द्रिय संवेदन को पश्चिम की राह दिखाई गई है। फिर भी एक सवाल उठता है कि अगर भावना विचारों से इतनी अलग है और भाषा में उसी की अभिव्यक्ति होती है तो स्वयं शुक्लजी भाषा में किस चीज को व्यक्त कर रहे थे और क्या यह उचित न होगा कि उन्हें विचारक की भ्रामक श्रेणी से हटाकर भावक (या भावुक!) की समुचित कोटि में स्थापित कर दिया जाए। इसका उत्तर पाने के लिए आइए एक बार शुक्लजी के उस स्पष्टीकरण को भी देखें जिससे लेखक ने उक्त निष्कर्ष निकाला है– "स्मरण रखिए यह बात मैंने भावनाओं (Impressions) के विषय में कही है, विचारों (General notion) के विषय में नहीं।" (वही)

ऐसा लगता है कि शुक्लजी को अपने विचारों के अन्यथाकरण की कुछ आशंका थी, इसीलिए उन्होंने अपने शब्दों के साथ अंग्रेजी पर्यायों को भी देना ज़रूरी समझा। अंग्रेजी के 'इम्प्रेशन' का सबसे प्रचलित अर्थ 'प्रभाव' है जो वैचारिक भी हो सकता है। यहाँ तक कि उसका एक अर्थ स्वयं 'विचार' या 'नोशन' भी है। शुक्लजी के दिमाग में ये सारे अर्थ थे, इसीलिए उन्होंने 'नोशन' के साथ 'जनरल' लगाया, यानी सामान्य, आमफ़हम विचार। इससे अलग 'इम्प्रेशन' या 'भावना' को वह अभिव्यक्तिकर्ता की विशिष्ट मनोभूमि से जोड़ना चाहते थे। भाषा में अभिव्यक्ति की विशिष्टता से सम्बन्धित उनके इस कथन को मार्क्स के उस पूर्वोक्त वक्तव्य से जोड़कर देखा जा सकता है जिसे लेखक ने रूपवाद का समर्थन करने के लिए उद्धृत किया था। आचार्य शुक्ल ने ही कहीं कहा है कि सत्य सबका एक होता है और झूठ सबके अलग-अलग होते हैं। प्रत्यक्षं किं प्रमाणम्।

आचार्य शुक्ल के विचार इस विषय में पर्याप्त स्पष्ट हैं। स्वयं लेखक ने उनके जो उद्धरण दिए हैं, उनसे भी यह बात साफ हो जाती है। 'भाव या मनोविकार' शीर्षक लेख का एक उद्धरण देखें– "नाना विषयों के बोध का विधान होने पर ही उनसे सम्बन्ध रखनेवाली इच्छा की अनेकरूपता के अनुसार अनुभूति के भिन्न-भिन्न योग संघटित होते हैं जो भाव या मनोविकार कहलाते हैं।" ज़ाहिर है कि बोध की बुनियाद पर ही इच्छा और अनुभूति के रास्ते भावों का गठन होता है। यह बोध गहरे पानी पैठकर किए जानेवाले मन्थन से आता है। विचार तो उन लहरों की तरह हैं जो इस मन्थन से पैदा होते हैं। कुछ लोगों को साहित्य में इन्हीं विचारों से तकलीफ़ होती है। दरअसल यह तकलीफ़ बोध और चेतना से है। वे साहित्य को विचारों से 'इन्सुलेट' करके 'शुद्ध' बनाना चाहते हैं ताकि वह 'मनुष्य को अधिक से अधिक यथार्थ-विस्मृत या अचेत' कर सके।

आचार्य शुक्ल न केवल बुद्धि और हृदय की भूमिकाओं की विशिष्टता को समझते और उसकी रक्षा करते हैं, बल्कि सभ्यता के विकास के साथ साहित्य - व्यापार में बुद्धि की भूमिका को बढ़ाने के आग्रही हैं। 'कविता क्या है' शीर्षक निबन्ध से उद्धृत यह वक्तव्य देखें--"ज्यों-ज्यों सभ्यता बढ़ती जाएगी.. मनुष्य के हृदय की वृत्तियों से सीधा सम्बन्ध रखनेवाले रूपों और व्यापारों को प्रत्यक्ष करने के लिए उसे बहुत से परदों को हटाना पड़ेगा। ज्यों-ज्यों हमारी वृत्तियों पर सभ्यता के नए-नए आवरण चढ़ते जाएँगे त्यों-त्यों एक ओर तो कविता की आवश्यकता बढ़ती जाएगी, दूसरी ओर कवि-कर्म कठिन होता जाएगा।... आरम्भ में मनुष्य जाति की चेतना सत्ता इंद्रियज ज्ञान की समष्टि के रूप में ही अधिकतर रही। अब मनुष्य का ज्ञान-क्षेत्र बुद्धि व्यवसायात्मक या विचारात्मक होकर विस्तृत हो गया है। अत: उसके विस्तार के साथ हमें अपने हृदय का विस्तार भी बढ़ाना होगा।" (वही, पृ. 100 )

कहना न होगा कि इन स्थितियों में विचारों के अवमूल्यन की कोई भी प्रवृत्ति 'भावना' के नाम पर मूलवृत्तियों और संवेगों की तरफ़ ही जाएगी और इस उलटी यात्रा से न तो साहित्य का कोई भला होगा, न सौन्दर्य का।

शुक्लजी के विचारों की मनचाही व्याख्या कर चुकने के बाद लेखक एक बार फिर मार्क्सवाद के समर्थन में ज़मीन-आसमान के कुलाबे मिलाता है और हिन्दी के मार्क्सवादी लेखकों का कुछ इस उत्साह से समर्थन करता है कि मन आशंकित हो उठता है। ख़ासतौर पर मुक्तिबोध को जब वह मार्क्सवादी सौन्दर्य-मूल्यों के लिए संघर्षरत योद्धा के रूप में चित्रित करता है और उनके सुपरिचित विचारों का परिचय अनपेक्षित विस्तार से देने लगता है तब यह आभास हो जाता है कि इसी विवरण के बीच कहीं कोई गाँठ ऐसी लगी होगी जिससे आगे चलकर मुक्तिबोध की 'मुक्ति' का ऐलान भी सम्भव हो सकेगा। उस गाँठ की तलाश भूसे के ढेर में सुई ढूँढ़ने जैसी थी। समूचे लेख से गुज़रने के बाद पता चला कि लेखक ने हाथ-पाँव तो बहुत मारा, मुक्तिबोध के विचारों में कोई ऐसा बिन्दु नहीं मिला जहाँ सूराख हो पाता। इसी खीज का नतीजा अन्त में जाकर इस आरोप में निकला-- "लेकिन यह भी सही है कि एकाधिक स्थल पर, अपनी व्यावहारिक समीक्षाओं और आलोचनाओं में मुक्तिबोध स्वयं एक विशेष प्रकार की सौन्दर्याभिरुचि के दायरे में घुसते नजर आते हैं। और प्रायः वे रचनाओं के विचार पक्ष या नैतिक अन्तर्वस्तु पर ही अधिक ध्यान केन्द्रित करते हैं" (वही, पृ. 158)।

इस आरोप की पुष्टि के लिए लेखक मुक्तिबोध के 'कामायनी : एक पुनर्विचार' के कुछ उद्धरणों का सहारा लेता है– " 'कामायनी' में व्यक्त विचारधारा को स्पष्ट तौर पर अस्वीकार करते हुए वे यह कहते हैं कि 'साहित्यिक सौन्दर्य के बारे में दो मत नहीं हो सकते।' लेकिन वे यह भी कहते हैं कि 'भावना या प्रभावोत्पादकता वह कसौटी नहीं है, जिससे हम जीवन के प्रति कवि-दृष्टि के औचित्य या अनौचित्य की जाँच कर सकें। कभी-कभी होता यह है कि भावना की रसात्मकता वस्तु-तत्त्व के अनौचित्य को ढाँक लेती है।' इन वाक्यों से यह निष्कर्ष निकालना बहुत गलत न होगा कि रचना में व्यक्त विचारधारा और उसकी कलात्मक प्रभावोत्पादकता, मुक्तिबोध के अनुसार, दो एकदम अलग-अलग चीजें हैं। किसी भी कलाकृति में व्यक्त विचारधारा वास्तव में एक सौन्दर्यात्मक समस्या है और उसके प्रभाव से उसका गहरा सम्बन्ध है। फिर यह कहना कहाँ तक उचित है कि कलात्मक सौन्दर्य का विश्लेषण एक अलग काम है और अन्तर्वस्तु का विश्लेषण जो कि विचारों से सम्बन्धित होता है, एक अलग काम है?" (वही)

यहाँ विचार और भावना यानी अन्तर्वस्तु और सौन्दर्य की एकता और अखंडता का नारा लगानेवाले अपूर्वानन्द का मार्क्स, कॉडवेल और आचार्य शुक्ल के सन्दर्भ में इन्हें अलग-अलग करना और एक की क़ीमत पर दूसरे को स्थापित करने के लिए एड़ी-चोटी का ज़ोर लगाना हम पहले ही देख चुके हैं। मुक्तिबोध ने जब इनके जैसे 'सच्चे सौन्दर्यशास्त्रियों' के मर्मस्थल पर चोट कर दी तो इन्हें एकता याद आने लगी। कहाँ तो विचार और भावना का अलगाव 'एक नई दृष्टि का परिचायक' नज़र आ रहा था और कहाँ अब दोनों का अलग-अलग विश्लेषण भी भारी गुज़र रहा है। उन्हें यह याद दिलाना तो गुस्ताख़ी ही होगी कि रूप और अन्तर्वस्तु में द्वन्द्वात्मक एकता होती है और कृति के समग्र मूल्यांकन के लिए उसके अवयवों का विश्लेषण करने के बाद ही संश्लेषण की क्रिया सम्पन्न होती है। रचना सुन्दर होकर भी नुकसानदेह हो सकती है। बकौल तुलसी–- 'विष रसभरा कनक घट जैसे'। स्वयं लेखक भी, मुक्तिबोध की ही तरह, सौन्दर्य की अचेतनकारी भूमिका की चर्चा कर चुका है, लेकिन संगति की अपेक्षा करना ही सम्भवतः उसके साथ ज़्यादती है।

कुल मिलाकर यह किताब तमाम देशी और विदेशी लेखकों के उद्धरणों और उनकी उबाऊ व्याख्याओं को बटोरकर हिन्दी में शास्त्र-निर्माण के नाम पर चलनेवाले कुंजी-लेखन का अच्छा नमूना है। इसका जो भी महत्व है वह इसमें सावधानीपूर्वक गूंथे गए मन्तव्यों के कारण है, जिनका थोड़ा परिचय यहाँ दे दिया गया है। इन विचारों का व्यावहारिक प्रयोग शमशेर की कविता पर जिस हल्के ढंग से किया गया है वह अपने आत्मविश्वास के कारण हास्यास्पद है। शमशेर की कविता के बारे में इससे शायद ही कोई अन्तर्दृष्टि मिलती है। हाँ, कवि के ही शब्दों और उनके शब्दकोषीय अर्थों के सहारे उनकी व्याख्या का छद्म ज़रूर रचा गया है, जिसकी परिणति प्रायः गूँगे के गुड़ जैसी अनुभूति में होती है। बहरहाल, सौन्दर्यशास्त्र में रुचि रखनेवाले प्रत्येक लेखक और पाठक को एक बार इस किताब को ज़रूर पढ़ना चाहिए ताकि पता लग सके कि सौन्दर्यशास्त्र पर बात किस तरह नहीं करनी चाहिए। नकारात्मक रूप में ही सही, लेकिन यह भी इस किताब का महत्वपूर्ण योगदान हो सकता है।

साभार

यह भी था और वह भी था पर था क्या : कृष्ण मोहन

यह भी था और वह भी था पर था क्या 
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आधुनिक युग में विकास के वैज्ञानिक नियम के बतौर द्वन्द्वात्मकता को पर्याप्त स्वीकृति प्राप्त हो गई है। हिन्दी में भी अब इस पर कोई विवाद नहीं रह गया है। लेकिन इस सर्वस्वीकार के आवरण में हमारे विद्वानों और विचारकों ने इसके मूलभूत चरित्र की ही अनदेखी कर दी है। नाम-रूप में स्वीकार और अन्तर्वस्तु में निषेध ही द्वंद्वात्मकता के साथ हमारे व्यवहार की विशिष्टता बन गई है। आश्चर्य की बात यह है कि बाक़ायदा घोषित द्वन्द्ववादियों ने भी इसमें कोई कोताही नहीं की है। यह मसला चूँकि अत्यन्त बुनियादी क़िस्म का है इसलिए इसे ठीक से समझना जरूरी है।

किसी भी विकासोन्मुख और जीवन्त वस्तु (व्यक्ति, विचार, स्थिति या परिघटना) का गठन उसमें सक्रिय परस्पर द्वन्द्वरत तत्वों से होता है। उनमें से कुछ तत्व परस्पर अंतर्विरोधी होते हैं जिनके आपसी रिश्तों के कारण वस्तु के अन्दर बहुस्तरीय अंतर्विरोध सक्रिय होते हैं। इन अंतर्विरोधों के बारे में जानने योग्य सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि एक समय में इनमें से कोई एक ही प्रमुख अंतर्विरोध होता है जो वस्तु के मूल चरित्र को निर्धारित करता है। मुख्य अंतर्विरोध के सशक्त पक्ष के अनुरूप इसका निर्धारण होता है, लेकिन जद्दोजहद के दौरान दूसरा पक्ष भी भारी पड़ सकता है। तब वस्तु अपने विपरीत में बदल जाती है। इसके अलावा समय के साथ मुख्य अंतर्विरोध अपनी प्रमुखता खो सकता है और कोई गौण अंतर्विरोध मुख्य हो सकता है। ऐसी स्थिति में भी वस्तु का मूल चरित्र बदल जाता है, भले ही यह बदलाव विपरीत दिशा में हो। यही नहीं, क्रमिक विकास भी किसी एक बिन्दु पर जाकर गुणात्मक छलांग में बदल जाता है जिससे वस्तु अपने विकास की अगली अवस्था में चली जाती है और उसके आंतरिक अंतर्विरोधों का क्रम बदल जाता है।

कहने का आशय यह है कि परिवर्तनशीलता ही द्वन्द्ववाद का सारतत्व है और यह तभी संभव है जब किसी समय विशेष में वस्तु का कोई मूलभूत चरित्र हो। अगर कोई मूल चरित्र होगा ही नहीं तो बदलेगा क्या? इसी बिन्दु पर संशयवाद का टकराव द्वन्द्ववाद से होता है। यह वस्तु के किसी मूलभूत स्वरूप को मानने से  इनकार कर देता है और इसके तमाम संघटक तत्वों की छानबीन में ही लगा रहता है। इसका प्रतिनिधित्व हमारे समय में उत्तर-आधुनिकता करती है। यही वजह है कि अन्य तत्वों के दमन की आशंका की आड़ में उत्तर-आधुनिकता वस्तु के किसी संघटक तत्व की प्रधानता की संभावना से इनकार कर देती है। परिणामस्वरूप दमन की पुरानी व्यवस्था बनी रहती है और उसमें परिवर्तन की हर संभावना का निषेध हो जाता है। दूसरे शब्दों में, जब वे अपने उत्तर-आधुनिक युग में किसी महाख्यान (मेटानैरेटिव) की संभावना से इनकार करते हैं तो इसका अर्थ होता है कि साम्राज्यवाद इस युग का अकेला महाख्यान बना रहेगा और उसके विरोधियों में से किसी को उसके मुकाबले के लिए शक्तिशाली बनकर प्रमुखता पाने का प्रयास नहीं करना चाहिए अन्यथा साम्राज्यवाद के अन्य विरोधियों का 'दमन' हो जाएगा। इसीलिए यह विचारधारा अमरीका समेत तमाम विकसित पूंजीवादी देशों की अकादमिक दुनिया में महत्व पाती रही है। ख़ास बात यह है कि हिंदी की आधिकारिक मार्क्सवादी आलोचना भी इससे बुरी तरह से ग्रस्त रही है, क्योंकि इसका अवसरवाद इसे कोई एक मज़बूत स्टैंड लेने से रोकता रहा है। मजबूरी में इसे नरो - कुंजरो शैली से ही काम चलाना पड़ता है।

हिन्दी-उर्दू क्षेत्र में 19वीं सदी में हुए नवजागरण (जिसे कुछ लोग 'हिन्दी नवजागरण' कहते हैं), के आकलन के संबंध में उपरोक्त संशयवाद का चमत्कार दिखाई पड़ता है। ब्रिटिश राजभक्ति और देशभक्ति के बीच इस नवजागरण की त्रिशंकु स्थिति के कारण हमारे इतिहासकार किसी निष्कर्ष पर पहुंचने में नाकाम रहे और इन दोनों आग्रहों की मौजूदगी और उनके बीच संघर्ष की स्वीकृति को ही द्वन्द्ववाद का पर्याय समझते रहे। नवजागरणयुगीन चेतना के चुक जाने और सांप्रदायिक फासीवाद के आगे हथियार डाल देने के कारण इसका आकर्षण घटने और नई परिस्थिति में नए और मूलगामी चिंतन से प्रेरित पहलकदमियों ने नवजागरणवादियों को काफी कुछ रक्षात्मक स्थिति में डाल दिया है और बार-बार उन्हें अपने औचित्य और प्रासंगिकता की घोषणा करनी पड़ रही है। ऐसी ही घोषणा मार्क्सवादी आलोचक मैनेजर पाण्डेय ने 'समकालीन जनमत' के मार्च 2004 के अंक में प्रकाशित इण्टरव्यू में की है। प्रेमशंकर के सवालों के जवाब में उन्होंने नवजागरण के समर्थन में बोलते हुए भी उसकी अनेक कमज़ोरियों को उजागर कर दिया है। इसी के साथ छपे नामवर सिंह के इण्टरव्यू में हालांकि नवजागरण को लेकर कुछ विचारणीय स्थापनाएँ दी गई हैं, लेकिन प्रस्तुत लेख के आरम्भ में द्वन्द्वात्मकता के प्रति हमारे जिस रुख़ का ज़िक्र किया गया है उसका पर्याप्त प्रमाण उनकी बातों से भी मिलता है।

साम्प्रदायिक फ़ासीवाद के बरक्स नवजागरण और उसके पुरोधाओं के चरित्र पर पुनर्विचार के प्रश्न पर अपना पक्ष रखते हुए मैनेजर पाण्डेय नवजागरण के प्रतीक पुरुष भारतेन्दु का 'हिन्दू मानसिकता' के सवाल पर बचाव करते हैं। वे यह बताते हैं कि भारतेन्दु ने 'कुरान शरीफ़' का अनुवाद किया, 'पवित्रात्मा' नामक किताब लिखी जिसमें इस्लाम के पाँच बड़े लोगों की जीवनी और तारीफ थी। यही नहीं वे 'रसा' नाम से उर्दू में शायरी करते थे। इस तर्क-प्रक्रिया का विकास करते हुए वे भारतन्दु के नाटक 'भारत दुर्दशा' के एक दृश्य के शीर्षक 'किताबखाना' का ज़िक्र भी कर डालते हैं। आशय वही है, उर्दू के प्रति लगाव का। सांप्रदायिकता के संदर्भ में कोई विचारक अगर उर्दू शब्दों के प्रयोग को इतना महत्व दे रहा है, तो यह समझा जा सकता है कि उसे अपने पक्ष पर कितना भरोसा है। मैनेजर पाण्डेय कहते हैं “नवजागरण के संबंध में रामविलास जी की निंदा करने वाले घुमा-फिराकर वहीं काम करते हैं, जो उन्होंने किया। रामविलास जी ने नवजागरण के किसी अंतर्विरोध पर ध्यान देने की ज़रूरत नहीं महसूस की। उनको यह महसूस नहीं होता कि भारतेन्दु के यहाँ दोनों तरह की चीजें पड़ी हैं।... रामविलास जी हिन्दी नवजागरण के सिर्फ पाजिटिव देखा करते थे और विरोधी केवल निगेटिव देखते हैं।"

'दोनों तरह की चीज़ें', यानी सांप्रदायिक भी और धर्मनिरपेक्ष भी। आगे चलकर वे नवजागरण में सांप्रदायिकता की बीज रूप में मौजूदगी को स्वीकार करते हैं और इसके खिलाफ संघर्ष को महत्व देते दीख पड़ते हैं। वे इस बात की क़तई चिन्ता नहीं करते कि नवजागरण अपने मूल चरित्र में क्या था? हाँ, वह क्या नहीं था, इसके लिए तमाम कच्चे-पक्के सबूत ज़रूर जुटाते हैं। जाहिर है कि अंतर्विरोधों की मौजूदगी की साहसिक घोषणा के बावजूद वे द्वन्द्ववाद के नियम की अवहेलना करते हैं। इतिहास को केवल पाजिटिव अथवा केवल निगेटिव रूप में देखना उतना ही गलत है जितना उसे पाजिटिव और निगेटिव के पुलिन्दे के रूप में देखना!

ज्ञानमीमांसा के साथ यहाँ इतिहासबोध का प्रश्न भी खड़ा होता है। क्या ऐतिहासिक परिघटनाओं को समझने में सकारात्मक-नकारात्मक, शुभ-अशुभ और उचित-अनुचित जैसी नैतिक श्रेणियाँ हमारी कुछ मदद कर सकती हैं? इससे भी बढ़कर यह कि इतिहास को समझने के लिए हमारा रवैया वस्तुगत होना चाहिए या आत्मगत। वाल्टर बेंजामिन को उद्धृत करते हुए वे कहते हैं कि 'अतीत का ऐतिहासिक रूप वह नहीं है जैसा वह था बल्कि वह है जैसा वह ख़तरे के वक्त याद आता है।'

कहना न होगा कि यह विशुद्ध रूप से आत्मनिष्ठ और प्रत्ययवादी दृष्टिकोण है। बेंजामिन ने किस संदर्भ में यह बात कही थी इसे देखना होगा, लेकिन मौजूदा प्रसंग में यह बिलकुल अस्वीकार्य है। यह इतिहास को 'पाठ' और 'आख्यान' बना देने के उत्तर-आधुनिक नज़रिए के समतुल्य है। फिर, ख़तरे के वक़्त व्यक्ति की स्मृति तो ख़तरे के प्रति उसके रिस्पांस से निर्धारित होगी। फासिज़्म की चुनौती के सामने नवजागरण की स्मृति हममें एक भारी भूल और भटकाव के रूप में कौंधती है तो हम क्या करें? भूकंप के पहले ही झटके में जो घर गिरने-गिरने को हो आया, उसकी मज़बूती की बात करना जले पर नमक छिड़कना है। 

इसके साथ ही मैनेजर पाण्डेय ने 'भंडारकर ओरिएंटल रिसर्च इंस्टीट्यूट' को नष्ट करने और तसलीमा नसरीन की किताब पर प्रतिबंध लगाने का हमारे समय में कट्टरतावाद की दो प्रमुख अभिव्यक्तियों के रूप में उल्लेख किया है। एक हिन्दू कट्टरवाद और एक मुस्लिम कट्टरवाद। हिसाब बराबर! सतह की चीजें ऐसी ही दिखती हैं। महाराष्ट्र में इंस्टीट्यूट को नष्ट करने का दण्ड उन अपराधियों को नहीं मिला। वह मिला उस लेखक को जिसकी किताब के ख़िलाफ़ यह कारनामा किया गया था। महाराष्ट्र की कांग्रेस सरकार ने उस किताब पर प्रतिबंध लगा दिया। आम विश्वास के विपरीत, वे अपराधी शिवसैनिक नहीं थे, बल्कि नवजागरण की मुख्यधारा की प्रतिनिधि कांग्रेस सरकार के ही उकसावे पर काम करने वाले उपद्रवी थे जो उग्र हिंदुत्ववादी तेवर से शिवसेना -भाजपा को हक्का-बक्का कर देना चाहते थे। रहा सवाल तसलीमा नसरीन का तो उनकी किताब पर प्रतिबंध भी नवजागरण की धारा के प्रतिनिधि वामपंथियों की सरकार ने लगाया है और उसकी शह पाकर ही कट्टरपंथियों का हौसला बढ़ा है। अगर ये बातें महज़ तात्कालिक लग रही हों तो हिन्दू-मुस्लिम प्रश्न पर नवजागरण, स्वाधीनता आंदोलन और आज़ाद भारत की सरकारों की भूमिका की एक बार फिर छानबीन कीजिए। नवजागरण का मूल चरित्र सामने आ जाएगा।

इण्टरव्यू के अंत तक आते-आते मैनेजर पाण्डेय नवजागरण के मूल्यांकन के प्रतिमान के रूप में हमारी स्मृति के साथ-साथ 19वीं सदी के लेखकों की चेतना के अवगाहन का प्रस्ताव करते हैं- "इन सबकी मुख्य चिंता साम्राज्यवाद के विरुद्ध संघर्ष और मुक्ति की कामना ही थी।" हमें इस पर यही कहना है कि अगर ऐसी कोई कामना या चिंता थी भी तो यह देखना होगा कि वस्तुगत स्तर उसका नतीजा क्या निकला। जिस आज़ादी को हम इस नवजागरण की सबसे बड़ी भेंट मानते हैं क्या वह सांप्रदायिक बँटवारे की शर्त पर नहीं आई। और क्या यह सच नहीं है कि आज़ाद भारत के नागरिक समाज में लोकतान्त्रिक अवकाश लगातार छीजता गया और विभाजन की दीवार और ऊँची होती गई। आत्मगत स्तर पर हमारी और उनकी कामना और चेतना चाहे जो हो, इस वस्तुगत सचाई का मतलब क्या है? लाख टके का सवाल यह है कि नवजागरण के चरित्र के निर्धारण में आत्मनिष्ठ कारकों की भूमिका प्राथमिक होगी या वस्तुनिष्ठ कारकों की।

इसी तरह नामवर सिंह ने 13वीं-14वीं शताब्दी को ही नवजागरण युग मानने पर ज़ोर दिया है तथा नवजागरण की 'डायलेक्टिक्स' को समझने का भी आग्रह किया है। मूलतः यह अवधारणा रामविलास शर्मा की है। उन्होंने ही इस दौर को 'लोकजागरण' का काल कहा था। इस अवधारणा में ख़ास तौर पर मध्यकाल की बेहतर समझ हासिल करने की गुंजाइश है। इस बात से इनकार नहीं किया जा सकता कि सांस्कृतिक और सामाजिक स्तर पर तत्कालीन समाज में आधुनिकता की दिशा में प्रयाण के अनेक ठोस संकेत मिलते हैं। मगर नामवर सिंह अपनी इस स्थापना को तार्किक परिणति तक ले जाने में हिचक जाते हैं और 1857 की जंग के मूल चरित्र को लेकर असमंजस में फँस जाते है, क्योंकि उसमें सामंतों की भागीदारी थी। यहाँ एक बार फिर आत्मगत चेतना और इच्छा का वस्तुगत सचाई से टकराव होता है। उस विद्रोह में निजी तौर पर कोई किसी लक्ष्य को लेकर लड़ रहा हो, समग्रता में वह उपनिवेशवाद के ख़िलाफ़ जंग थी, इससे कोई इनकार नहीं कर सकता। यही नहीं उसमें एक भारतीय ढंग की संवैधानिक राजतंत्रात्मक व्यवस्था का स्वरूप उभर रहा था। उसकी अधिकांश घोषणाओं और माँगों की लोकतांत्रिक दिशा भी निर्विवाद है। ऐसी स्थिति में इन आशंकाओं का क्या मतलब है? क्या किसी गुलाम का आज़ादी के लिए लड़ना अपने आप में प्रगतिशील क़दम नहीं है? क्या कोई उपनिवेशवादी ताक़त अपने उपनिवेशों को आधुनिक और प्रगतिशील युग में ले जाती है, अथवा ले जा सकती है? आजकल कुछ ऐसा ही तर्क इराक़ में अमरीका के ढँके-छिपे समर्थक भी दे रहे हैं। 'इण्डिया टुडे' जैसी पत्रिकाएँ खुलेआम इराक़ी लड़ाकों को 'प्रतिक्रियावादी' घोषित कर रही हैं। कल्पना कीजिए कि अगर ये विद्रोही सफल नहीं रहे, तो इराक़ की आने वाली पीढ़ियाँ भी क्या यही मानने को तैयार नहीं हो जाएँगी।

विडंबना तो यह है कि इसी इंटरव्यू में चीन के जिस 'अफीम युद्ध' को डॉ. नामवर सिंह ने आदर्श माना है वह पूरी तरह सामंतों के सहारे लड़ा गया ऐसा युद्ध था जिसका अंत समझौते में हुआ था। इसके बावजूद चीन के इतिहास में उसका गौरवपूर्ण स्थान है। रूस में 1825 का कुलीन सैन्याधिकारियों का 'दिसंबरवादी' विद्रोह भी इसी श्रेणी में आता है। फिर भी अगर हम 1857 की अपनी परंपरा को स्वीकार करने को तैयार नहीं हैं तो इसके लिए निश्चय ही पिछले 150 साल की औपनिवेशिक परंपरा ज़िम्मेदार है।
कृष्ण मोहन

(एक विद्यार्थी के संस्मरण में उल्लिखित मैनेजर पाण्डेय और नामवर सिंह से संबंधित मेरी एक टिप्पणी को लेकर अनेक विद्वानों और विदूषियों में यह भ्रम पैदा हो गया कि शायद मैंने ऐसी कोई टिप्पणी पहली बार क्लास में शिक्षक के रूप में अपने विशेषाधिकार का फ़ायदा उठाकर कर दी है। इसका निराकरण करने के लिए मैं अत्यंत विनम्रतापूर्वक यह बताना चाहता हूँ कि मैंने इन महानुभावों के बारे लिखते हुए सैकड़ों पेज काले किये हैं। इनमें से एक निहायत छोटी सी टिप्पणी वर्ष २००४ की यहाँ दे रहा हूँ, जो इलाहाबाद से उस समय निकलने वाली 'बतकही' नाम की पत्रिका में छपी थी। बाद में यह मेरी किताब 'आईनाख़ाना' में भी संकलित हुई- कृष्ण मोहन
साभार फेसबुक

मुक्तिबोध और नामवर सिंह के नए प्रतिमान : कृष्ण मोहन

मुक्तिबोध और नामवर सिंह के नए प्रतिमान: कृष्ण मोहन
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मुक्तिबोध को पहचानने और साहित्य में उन्हें स्थापित करने का श्रेय नामवर सिंह को उसी तरह मिलता है जैसे निराला के संबंध में रामविलास शर्मा को। नामवर सिंह के आलोचना कर्म की उपलबद्धि मानी जाने वाली किताब "कविता के नए प्रतिमान" के प्रथम संस्करण की भूमिका में स्वयं लेखक का कथन है, "यह तथ्य अनदेखा नहीं किया जा सकता कि 'कविता के नए प्रतिमान’ के केंद्र में मुक्तिबोध हैं। इस पुस्तक का आधार यह धारणा है कि नई कविता में मुक्तिबोध की स्थिति वही है जो छायावाद में निराला की थी।"

 हिंदी के नए पाठकों के लिए यह सुखद आश्चर्य का विषय होना चाहिए कि निराला के महत्व का उद्घाटन करने के लिए रामविलास शर्मा को "निराला की साहित्य-साधना" में हज़ार-बारह सौ पेज खर्च करने पड़े जबकि एक उतने ही महत्वपूर्ण कवि का उद्घाटन नामवर सिंह ने सिर्फ एक कविता "अँधेरे में" की व्याख्या द्वारा अपनी किताब के परिशिष्ट में महज़ दस पेज में कर डाला। बाद में आई  आपत्तियों का जवाब देते हुए बीस पेज का पुनश्च और जोड़ दिया। मितव्ययिता और संकोच का ऐसा उदाहरण तुलसी के राम ही में मिल सकता है:

"जो संपत्ति सिव रावनहिं दीन्हीं दिएँ दस माथ।
सोई संपदा विभीषनहि सकुचि दीन्ही रघुनाथ।।"

"कविता के नए प्रतिमान" के ये अंतिम तीस पेज लगभग आधी सदी से मुक्तिबोध के अध्ययन का पर्याय बने हुए हैं। आइए इनकी थोड़ी छानबीन करके देखें कि ये प्रतिमान कितने नए हैं और इन्होंने मुक्तिबोध की कविता को समझने में कितनी मदद की है। "कविता के नए प्रतिमान" के परिशिष्ट के रूप में संकलित निबंध "अंधेरे में:परम अभिव्यक्ति की खोज" के आरंभ में नामवर सिंह कहते हैं,"निस्संदेह इस कविता का मूल कथ्य है अस्मिता की खोज; किंतु कुछ अन्य व्यक्तिवादी कवियों की तरह इस खोज में किसी प्रकार की आध्यात्मिकता या रहस्यवाद नहीं, बल्कि गली- सड़क की गतिविधि, राजनीतिक परिस्थिति और अनेक मानव चरित्रों की आत्मा के इतिहास का वास्तविक परिवेश है।" लेख में आगे एक जगह वे कहते हैं, "कवि मुक्तिबोध के लिए अस्मिता की खोज व्यक्ति की खोज नहीं बल्कि अभिव्यक्ति की खोज है। एक कवि के नाते उनके लिए परम अभिव्यक्ति ही अस्मिता है।"

इस लेख पर उठी आपत्तियों के जवाब में किताब के अगले संस्करण में परिवर्धित लेख "अंधेरे में:पुनश्च" में नामवर सिंह ने अस्मिता के लोप को 'एलियनेशन' या 'अलगाव' की मार्क्सवादी अवधारणा से जोड़ते हुए कहा, "इस 'अलगाव' की प्रक्रिया से मुक्त होने का उपाय, मार्क्स की दृष्टि में 'वर्ग चेतना' है; क्योंकि वर्ग चेतना के लोप से ही मजदूर वर्ग 'अलगाव' का अनुभव करता है, जिसका दूसरा नाम 'मिथ्या चेतना' है।... इसी प्रकार मध्यवर्गीय व्यक्ति की... सच्ची वर्ग चेतना इस बात में है कि वह मजदूर वर्ग के हितों की रक्षा में ही अंततः अपने हितों की रक्षा महसूस करे और इसके लिए पूंजीवाद के विनाश में मजदूर वर्ग का साथ दे। इस चेतना का अभाव मध्यवर्गीय व्यक्ति के लिए मिथ्या चेतना है। 'अस्मिता का लोप' इस मिथ्या चेतना का ही दूसरा नाम है और इसके विपरीत वर्ग-चेतना को अस्मिता की खोज कहा जा सकता है।"(पृ 246)

यह सच है कि वर्ग-विभाजित समाजों में 'अलगाव' एक निरंतर चलने वाली प्रक्रिया है और वर्ग-चेतना से लैस हो जाने पर शोषित वर्ग के सदस्य 'अलगाव' को अतीत की वस्तु बना देते हैं और व्यवस्था को उखाड़ फेंकने के लिए संगठित होते हैं। यानी वर्ग-चेतना की प्राप्ति के साथ ही पुराने समाज की 'अलगाव' जैसी बुराइयों का असर जाता रहता है और नए समाज की संघर्ष, शांति, मैत्री और सहयोग जैसी विशेषताएं मानव मन में उनकी जगह लेती हैं। मार्क्स का नाम जपते हुए नामवर सिंह घपला तब करते हैं जब वे 'वर्ग-चेतना के लोप' से 'अलगाव के अनुभव' की उत्पत्ति मानते हैं। यह वैसे ही है जैसे डार्विन का कोई अनुयायी इंसान के लुप्त होने को बन्दर की उत्पत्ति का कारण बता दे।

बहरहाल, नामवर सिंह 'अलगाव के अनुभव' का दूसरा नाम 'मिथ्या चेतना' तथा 'मिथ्या चेतना' का दूसरा नाम 'अस्मिता का लोप',बताते हैं। इस जानकारी से समीकरण यूँ बनता है---चूँकि 'अलगाव के अनुभव का दूसरा नाम मिथ्या चेतना है, और मिथ्या चेतना का दूसरा नाम अस्मिता का लोप है, इसलिए  'अलगाव के अनुभव' का दूसरा नाम 'अस्मिता का लोप'होगा।

अब इस 'दूसरे नाम' की असलियत पर ग़ौर करें। 'मिथ्या चेतना' अगर किसी चीज़ का 'दूसरा नाम' है, तो वह है ग़लत दृष्टिकोण। 'अलगाव का अनुभव' यूं तो ऐतिहासिक भौतिक सचाई की उपज है लेकिन 'मिथ्या चेतना' का अर्थ अगर हम खींचतान कर 'सही चेतना का अभाव' कर लें तो किसी तरह 'अलगाव के अनुभव' को 'सही चेतना के अभाव' का दूसरा नाम कहा जा सकता है। इसका अर्थ होगा कि 'अलगाव के हर अनुभव' का अर्थ है 'सही चेतना का अभाव'।  लेकिन 'मिथ्या चेतना' या 'सही चेतना के अभाव' का दूसरा नाम 'अस्मिता का लोप' है; इसका अर्थ होगा कि 'सही चेतना के हर अभाव' का अर्थ है 'अस्मिता का लोप'। हर तरह के ग़लत दृष्टिकोण को अस्मिता का लोप मान लेने के बाद अस्मिता के साथ आइस-पाइस खेलने के अलावा बाक़ी कुछ नहीं बचेगा।

मार्क्स का हवाला नामवर सिंह ने अस्मिता-केंद्रित व्याख्या को ग़ैरमार्क्सवादी बुर्जुआ अवधारणा मानने वालों पर लाल-पीला होते हुए कुछ यों दिया है, " 'अस्मिता के लोप' और 'आत्मनिर्वासन' की चर्चा '1948 की आर्थिक और दार्शनिक पांडुलिपि' के युवा मार्क्स ने ही नहीं बल्कि 'पूंजी' के लेखक प्रौढ़ मार्क्स ने भी की है। इस प्रसंग में मार्क्स ने जिन दो जर्मन शब्दों का प्रयोग किया है उनके अंग्रेजी प्रतिशब्द क्रमशः 'एलिएनेशन'और 'री-इफिकेशन' है। इन शब्दों के साथ मार्क्स ने 'सेल्फ एलिएनेशन'और 'लॉस ऑफ सेल्फ' की भी चर्चा की है।...मार्क्स ने जिसे 'लॉस ऑफ सेल्फ' कहा है, वह अन्य विचारकों द्वारा प्रयुक्त 'लॉस ऑफ आइडेंटिटी' ही है जिसे हिंदी में 'अस्मिता का लोप' कहा जा सकता है।" (पृ 245)

अब ज़रा इस तर्क-शैली का जायजा लें। पहले 'अस्मिता के लोप' को मार्क्स के मुंह में डाल दिया फिर इधर-उधर की कुछ गूढ़ लगने वाली बातों के साथ मान लिया कि मार्क्स ने जो कहा था वह 'लॉस ऑफ सेल्फ' था। बस इसके बाद दीदादिलेरी के साथ कह दिया कि यह 'लॉस ऑफ सेल्फ' अन्य विचारकों द्वारा प्रयुक्त 'लॉस ऑफ आइडेंटिटी'  'ही'  है। इस 'ही'  के लिए किसी प्रमाण की आवश्यकता नहीं। यह ब्रह्म की तरफ स्वयंभू है। कहना न होगा कि यहाँ नामवर सिंह मार्क्स के प्राधिकार का इस्तेमाल अपने पाठकों पर धौंस जमाने के लिए कर रहे हैं, जो ज्ञान के क्षेत्र में एक नितान्त अनुचित व्यवहार है।

 बहरहाल, इस श्रृंखला की अगली कड़ी में हम  अपना ध्यान 'अस्मिता' पर केंद्रित करेंगे ताकि पता चल सके कि नामवर सिंह आख़िर किस चीज़ के लिए इतना आग्रह कर रहे हैं, और वे 'अन्य विचारक' कौन-से हैं, जिनमें इनका इतना अधिक विश्वास है:

"वैसे मूल कथ्य है संभावित आत्मरूप या अस्मिता की खोज जिसे मनोविज्ञान की भाषा में 'सर्च फॉर आइडेंटिटी' कहते हैं।" (नामवर सिंह,कविता के नए प्रतिमान,पृ.150)

"आज की कविता में ईमानदारी का ही एक रूप है 'अस्मिता' (आइडेंटिटी) की खोज जिसे आज की भाषा में 'अस्मिता का संकट' कहा जा रहा है।" (वही,पृ.199)

इन उद्धरणों में 'अस्मिता' को 'अलगाव' से जोड़ने की हड़बड़ी नहीं है, इसलिए वह यहाँ अधिक स्वाभाविक रूप में मौजूद है। सबसे पहले यह देखें कि उधार लिए हुए विचारों का खोखलापन भाषा में कैसे व्यक्त होता है। पहले उद्धरण में 'मनोविज्ञान की भाषा' का प्रयोग निरर्थक है क्योंकि 'अस्मिता की खोज' को मनोविज्ञान की भाषा में लिखें या शरीरविज्ञान की भाषा में 'सर्च फॉर आइडेंटिटी' ही लिखेंगे, बशर्ते इसे अंग्रेज़ी में लिखें। इसलिए यहां 'मनोविज्ञान की भाषा' की जगह 'अंग्रेज़ी भाषा' का प्रयोग करना चाहिए।

अगले उद्धरण में 'अस्मिता की खोज' को 'आज की भाषा' में 'अस्मिता का संकट' कहा गया है। यहां वाक्य का 'प्रजेंट कंटीनिवस टेंस' में होना महत्वपूर्ण है। इसका मतलब है कि यह वर्तमान काल का नवीनतम प्रयोग है जो अभी जारी है। यह लेटेस्ट माल कहां से आया है 'लॉस ऑफ आइडेंटिटी' कहने वाले 'अन्य विचारक' कौन है, इसे वे नहीं बताते। साठ के दशक में यूरोप और अमरीका में अस्मिताकेंद्रित आंदोलन चल रहे थे लेकिन भारत मे इसकी सुगबुगाहट अस्सी के दशक में ही शुरू हुई थी। पूरी किताब में पश्चिमी विचारकों पर जैसी निर्भरता दिखाई पड़ती है, और अंग्रेज़ी को जिस तरह मनोविज्ञान के पर्याय के रूप बरता गया है, यह मान लेने के पर्याप्त कारण हैं कि अस्मिता का आईडिया भी वहीं से उठाया गया है।

'अस्मिता की खोज' जब मुक्तिबोध के काव्य का केंद्रीय सत्य बनती है तो कौन-कौन से गुल खिलते हैं, देखें-----"मुक्तिबोध की इस कविता की विशेषता है कि आज के अन्य कवि जहां अस्मिता की खोज आत्मपरक ढंग से करते हैं, मुक्तिबोध ने उसे अंदर और बाहर दोनों जगह खोजा है, बल्कि यह कहना अधिक संगत होगा कि मुक्तिबोध की काव्यानुभूति की बनावट ही ऐसी है कि इसमें अंदर और बाहर के बीच कोई अंतर नहीं रह जाता।" (पृ.150)

कविता के संबंध में 'अंदर' और 'बाहर' यानी  अंतर्जगत और बहिर्जगत से कवि के रिश्ते का प्रश्न निर्णायक प्रश्नों में से एक है जिस पर मुक्तिबोध ने कविता और गद्य दोनों में पर्याप्त प्रकाश डाला है। लेकिन नामवर सिंह के लिए वहां 'अंदर और बाहर के बीच कोई अंतर नहीं' है। वजह यह है कि दोनों के बीच अंतर होगा तो दोनों का अलग-अलग स्वरूप होगा और फिर यह सवाल उठेगा कि मुक्तिबोध की कविता में कौन प्राथमिक है। इस सवाल का जवाब देने का मतलब होगा इस बुनियादी महत्व के मुद्दे पर कुछ कमिट करना। वह अवसरवादी ही क्या जो आसानी से कुछ कमिट कर ले। यहां हम पहले इस सवाल पर मुक्तिबोध की राय से वाकिफ़ होंगे, फिर नामवर सिंह की कलाबाज़ियों का आनंद लेंगे:

"हमारे जन्म-काल से ही शुरू होने वाला हमारा जो जीवन है, वह बाह्य जीवन-जगत के आभ्यंतरीकरण  द्वारा ही संपन्न और विकसित होता है। यदि वह आभ्यंतरीकरण न हो तो हम अंध-कृमि पानी का जीव हाइड्रा बन जाएँ। हमारी भाव-संपदा, ज्ञान-संपदा, अनुभव -समृद्धि तो उस अंतर्तत्व व्यवस्था ही का अभिन्न अंग है कि जो अंतर्तत्व-व्यवस्था हमने बाह्य जीवन-जगत के आभ्यंतरीकरण से प्राप्त की है।...किंतु बातचीत, बहस, लेखन, भाषण, साहित्य और काव्य द्वारा हम निरंतर स्वयं का बाह्यीकरण करते जाते हैं। बाह्य का आभ्यंतरीकरण और आभ्यंतरीकृत का बाह्यीकरण एक निरंतर चक्र है।" (वस्तु और रूप एक, मुक्तिबोध रचनावली, भाग पाँच, पृ.105)

यह है आंतरिक और बाह्य यानी चेतना और परिवेश के द्वंद्वात्मक रिश्ते की सही पहचान जिसमें परिवेश न केवल  प्राथमिक, बल्कि चेतना का निर्माता होता है।

जब नामवर सिंह अपनी किताब 'कविता के नए प्रतिमान' में संकलित लेख 'इतिहास की आवृत्ति' में अज्ञेय से बहस करते हैं, तब उनकी प्रतिभा की मौलिकता, उनके संघर्ष की प्रखरता, और उनके प्रतिमानों की नवीनता सही मायने में स्थापित होती है। ध्यान रहे कि यह किताब जिस 'नई कविता' को केंद्र करके लिखी गई है, अज्ञेय और मुक्तिबोध उसके परस्पर विपरीत दो छोर थे। अज्ञेय उच्चवर्गीय संवेदना समेत हर उस चीज़ के प्रतिनिधि थे, जिसके ख़िलाफ़ मुक्तिबोध आजीवन संघर्षरत रहे।

'तार सप्तक' और 'दूसरा सप्तक' का तुलनात्मक अध्ययन करते हुए नामवर सिंह लिखते हैं,---" 'अन्वेषण' का आग्रह दूसरा सप्तक में भी दोहराया गया है किंतु 'तार सप्तक' में जहां 'राहों के अन्वेषण' की बात की गई थी, 'दूसरा सप्तक' में बल 'आत्म-अन्वेषण' पर आ गया। 'वस्तु-सत्य' और 'व्यक्ति-सत्य' के बीच द्वंद्व की स्वीकृति और इन दोनों को एकाकार करने की समस्या अज्ञेय ने यहां भी रखी है, किंतु कथन में बल का अपसरण स्पष्ट है।...अज्ञेय के इस काव्य-सिद्धांत की नवीनता यह है कि इसमें बड़े कौशल से 'तार सप्तक' की परंपरा को आत्मनिष्ठ मोड़ दे दिया गया। 'वस्तु-सत्य' निःशेष हो गया सत्य में और फिर तथ्य भी रागात्मकता के अधीन होकर अपनी रही सही वस्तुनिष्ठता खो बैठा। इस प्रकार 'वस्तु -सत्य' सिमटकर 'अात्म-सत्य' हो गया। अन्वेषण की जो राह बाहर की ओर जा रही थी, वह सहसा अंदर की ओर मुड़ गई। जोर वास्तविकता से हटकर ईमानदारी पर आ गया। उल्लेखनीय है कि 1951 में 'प्रतीक' के संपादकीय ने 'ईमानदारी' का नारा दिया; जिससे आगे चलकर 'अनुभूति की प्रामाणिकता' की अवधारणा विकसित हुई। बौद्धिकता का स्थान 'रागात्मकता' ने ले लिया और छायावाद का प्रिय शब्द 'अनुभूति’ पुनः प्रचलन में आ निकला। ये सभी मान्यताएं अंत में 'व्यक्तित्व की खोज' का दार्शनिक रूप लेकर सामने आईं। 'प्रयोग ' शब्द को वाद-दूषित पाकर 'नई कविता' नामक संज्ञा का प्रचलन हुआ। 1951 में 'दूसरा सप्तक' के प्रकाशन के साथ 'नई कविता' के जिन सिद्धांतों का सूत्रपात किया गया, उनका विस्तार 'तीसरा सप्तक' के प्रकाशन-काल 1959 तक अबाध गति से होता रहा।"(पृ.89-90)

ग़ौरतलब है कि उपर्युक्त वक्तव्य में 'तार सप्तक' से 'दूसरा सप्तक' में हुए संक्रमण की प्रक्रिया में होने वाले परिवर्तनों का ब्यौरा देते हुए लेखक की मुद्रा यह आभास देने की है कि वह इन परिवर्तनों का विरोधी है, लेकिन जैसा कि हम आगे देखेंगे, यह मुद्रा 'मन-मन भावे, मूँड़ हिलावे' से अधिक कुछ भी नहीं है। आइए, इन परिवर्तनों के बारे में नामवर सिंह के क़ीमती विचार-स्फुलिंगों को एकत्र करें, जो किताब में हर तरफ़ बिखरे हुए हैं, और अनायास ही मिल जाते हैं।

सबसे पहले 'तार सप्तक' की वस्तुनिष्ठ परम्परा को आत्मनिष्ठ मोड़ देने के लिए ज़िम्मेदार 'अात्म-अन्वेषण' को लेते हैं। आत्म को अंग्रेज़ी में 'सेल्फ' कहते हैं और अन्वेषण को 'सर्च'। अंग्रेज़ी में इसे कहेंगे 'सर्च फॉर सेल्फ'। नामवर सिंह की इस घोषणा से हम पहले ही वाकिफ़ हैं कि 'लॉस ऑफ आइडेंटिटी' 'ही' 'लॉस ऑफ सेल्फ' है, यानी 'सेल्फ' और 'आइडेंटिटी' एक ही वस्तु हैं। निष्कर्ष यह निकला कि 'आत्म-अन्वेषण' यानी 'सर्च फ़ॉर सेल्फ' को 'सर्च फॉर आइडेंटिटी' यानी 'अस्मिता की खोज' भी कह सकते हैं। बात बोलेगी, हम नहीं।

जहां तक 'वस्तु-सत्य' और 'व्यक्ति-सत्य' में 'वस्तु-सत्य' पर ज़ोर कम करने का सवाल है, तो मुक्तिबोध के संबंध में 'अंदर और बाहर' के अंतर को मटियामेट करके नामवर सिंह ठीक यही काम ख़ुद कर चुके हैं। अज्ञेय ने अगर 'वस्तु- सत्य' को 'तथ्य' में निःशेष किया तो नामवर सिंह ने 'तथ्य' को 'सत्य' का दर्जा देते हुए उसे 'ईमानदारी' की टोपी भी पहना दी:---

" पिछले दौर के कवियों ने 'तथ्य' और 'सत्य' के अंतर को लेकर काफी मगजपच्ची की थी। वे 'सत्य' के लिए चिंतित थे। उन्होंने 'तथ्य' को रागात्मकता से रंजित करके सत्य का रूप दिया था। आकस्मिक नहीं कि इस क्रम में ईमानदारी भी राग-रंजित हुई और पिछले दौर की रागात्मकता से रंजित होकर ईमानदारी 'प्रामाणिक अनुभूति' हो गई। सातवें दशक के कवियों की दृष्टि नग्न तथ्य पर है। वे रागात्मक आवरण को हटाने में विश्वास करते हैं। कदाचित इसी क्रम में उन्होंने 'प्रामाणिक अनुभूति' का रंगीन आवरण हटाकर ईमानदारी को फिर से सामने ला दिया।" (पृ.191)

ध्यान रहे कि यहाँ नामवर सिंह 'सातवें दशक के कवियों' के प्रवक्ता के रूप में, 'पिछले दौर के कवियों' के मुक़ाबले, उनका पक्ष रख रहे हैं। ग़ालिब याद आते हैं:

शौक़ हर रंग  रक़ीबे-सरो-सामाँ  निकला
क़ैस तस्वीर के पर्दे में भी उरियाँ निकला

अब आते हैं 'ईमानदारी' और 'प्रामाणिक अनुभूति' पर। निम्नलिखित उद्धरण से स्पष्ट है कि 'ईमानदारी' स्वयं नामवर सिंह के लिए भी काम्य है, बशर्ते वह 'प्रतीक' और 'दूसरा सप्तक' वाली 'ईमानदारी' न हो। 'ईमानदारी' की अपनी अवधारणा को स्पष्ट करते हुए वे कहते हैं, "इस बार ईमानदारी विद्रोह का पर्याय बन कर प्रकट हुई, जिसमें ईमानदारी का मतलब था साहस।" 'ईमानदारी और प्रामाणिक अनुभूति' नामक इस अध्याय में 'तीसरा सप्तक' (1959) के बाद के, सातवें दशक के कवियों पर 'प्रकाश' डाला गया है। सातवें दशक के कवियों ने जिस ईमानदारी को अपनाया उसमें "अप्रिय से अप्रिय वास्तविकता के साक्षात्कार" का साहस और विद्रोह था। आइए देखें कि यह छठे दशक की इमानदारी से किस हद तक भिन्न है:

"कविता के पिछले पचास वर्षों के इतिहास से स्पष्ट है कि हर नए उन्मेष के मूल में ईमानदारी की आवाज है, किंतु हर दौर की ईमानदारी की अपनी भाषा है। छायावाद की ईमानदारी 'आत्मानुभूति' है, तो उत्तर छायावादी ईमानदारी 'नीयत'; प्रगतिवाद की ईमानदारी का आधार 'वर्ग-चेतना' है, तो प्रयोगशील नई कविता की ईमानदारी 'प्रामाणिक अनुभूति'; और अब सातवें दशक में 'विसंगति बोध' ही ईमानदारी का पर्याय है। साहस और विद्रोह किसी न किसी रूप में हर दौर की ईमानदारी के साथ हैं, चाहे उस साहस का रूप जो भी हो।" (पृ.191)

'प्रतीक' के संपादकीय में दिए 'ईमानदारी' के नारे का विरोध करते-करते ऐसा लगता है कि लेखक पर ईमानदारी का दौरा पड़ गया है। उसे हर जगह और हर बात में ईमानदारी ही दिखने लगती है। जब अपने पास कोई विचार नहीं होता है, और दूसरे का माल हड़प कर ख़ुद को उसका विरोधी भी जताना होता है, तो ऐसी ही दयनीय लफ़्फ़ाज़ी से काम लेना पड़ता है। विचार का खोखलापन अंतिम वाक्य तक आते-आते प्रकट हो गया है, जब 'रूप' की निरर्थक पुनरावृत्ति, सातवें दशक की 'अस्मिता- खोजी' कविता में साहस के बदले हुए 'रूप' पर ज़ोर देने के बजाय उसे और संदिग्ध कर जाती है। इस उद्धरण से भी यही ज़ाहिर होता है कि छठे दशक की कविता में अपने युग के अनुरूप ईमानदारी 'प्रामाणिक अनुभूति' थी, जो सातवें दशक में आकर
'विसंगति-बोध' बनी। इस प्रकार सातवें दशक से पहले की 'प्रयोगशील नई कविता' के, 'प्रामाणिक अनुभूति' और 'ईमानदारी' जैसे, मूल्यों की नामवर सिंह ने औचित्य-स्थापना ही की है। निम्नलिखित उद्धरण से यह भी स्पष्ट है कि सातवें दशक की 'ईमानदारी',  'विसंगति-बोध' का जन्म पूर्ववर्ती 'नई कविता की विसंगति के बोध' से हुआ।

"इस प्रकार नई कविता की अंतर्निहित विसंगति के बोध ने सातवें दशक की कविता में व्यापक स्तर पर एक विसंगति-बोध को जन्म दिया जो साहस के समानांतर ही ईमानदारी का पर्याय बन कर सामने आया।" (वही)

एक ही पेज से लिए गए इन उद्धरणों से पता चलता है कि नामवर सिंह ने सचमुच गागर में सागर भर दिया है। इस सागर का पूरा विवेचन तो यहाँ संभव नहीं, लेकिन यह ज़रूर कहा जा सकता है कि इस लेखक को अपनी भाषा से प्यार नहीं है। इसकी भाषा में ईमानदारी, साहस, विसंगति-बोध, और विद्रोह एक दूसरे का पर्याय बन जाते हैं, अस्मिता की खोज जिनका एक रूप है। इसमें तथ्य और ईमानदारी तथा रागात्मकता और रंगीन आवरण के बीच फ़र्क़ करना मुश्किल है। अंतिम वाक्य से स्पष्ट नहीं होता कि नई कविता की वह कैसी अंतर्निहित विसंगति थी जिसके बोध से सातवें दशक की कविता में व्यापक स्तर पर उसका (पुनः?) जन्म हुआ। जब भाषा का प्रयोग किसी सचाई को उजागर करने की जगह उस पर पर्दा डालने के लिए किया जाता है, वह ऐसी ही पिलपिली हो जाती है।

रहा सवाल 'रागात्मकता' का तो उस पर आरोप ही यह था कि उसने 'तथ्य' और 'ईमानदारी' को 'रंजित' करके 'प्रामाणिक अनुभूति' में बदल डाला है। अब जबकि दूध का दूध और पानी का पानी हो चुका है, और यह बात खुलकर साफ़ हो गई है कि 'प्रामाणिक अनुभूति' युग की मांग थी और उसमें पर्याप्त 'साहस', 'विद्रोह', 'ईमानदारी' वगैरह के साथ-साथ आने वाले युग का विसंगति बोध भी मौजूद था, तो सुधीजन विचार करें कि इस 'अपराध' के लिए उसे सज़ा मिलनी चाहिए या पुरस्कार!

 इस श्रृंखला में अब तक हमने नामवर सिंह को अपनी किताब "कविता के नए प्रतिमान" में अज्ञेय के 'आत्म-अन्वेषण',
'ईमानदारी', और 'आत्म-सत्य' आदि काव्य-मूल्यों से मुक़ाबला करते, और पलक झपकाए बिना इन्हीं अवधारणाओं को थोड़ा किन्तु-परंतु लगाकर अपने मौलिक योगदान के बतौर पेश करते देखा है। यही नहीं उन्होंने सातवें दशक के काव्य-मूल्य के बतौर अपनी एकमात्र खोज 'विसंगति-बोध' को न जाने किस 'ईमानदारी' या 'साहस' की वजह से छठें दशक की तरफ़ ठेलकर उल्टी गंगा तो बहा दी, लेकिन वे यह भूल गए कि इससे उनके प्रतिमानों की नवीनता और मौलिकता की पोल खुल जाएगी। सच कहें तो यह सब अपने घोषित वैचारिक विरोधी के सामने दयनीय और हास्यास्पद आत्मसमर्पण था। इस किताब(१९६८) को प्रकाशित हुए पचास बरस हो चुके हैं, लेकिन अब भी 'अपने युग को व्याख्यायित करने वाली आलोचना-कृति' के रूप में इसकी मान्यता बरक़रार है। हिंदी की बौद्धिक और लोकतांत्रिक विचार-विमर्श की संस्कृति पर यह मान्यता ख़ुद ही एक सवालिया निशान है। बहरहाल,  श्रृंखला के अंत में अब हम अपने निष्कर्षों की ओर बढ़ेंगे।

अज्ञेय की इस प्रकरण में अंतिम काबिले-एतराज़ बात थी 'व्यक्तित्व की खोज' जो 'दार्शनिक रूप' लेकर सामने आई थी। व्यक्तित्व एक समग्रता मूलक वस्तु है जिसमें व्यक्ति के रंग रूप से लेकर उसके विचार व्यवहार का हर पहलू समाविष्ट होता है, जबकि अस्मिता एक धारणा है जो व्यक्ति की अपने परिवेश, परिस्थिति और समाज में अवस्थिति पर निर्भर होती है। इसीलिए व्यक्तित्व की खोज नहीं होती उसका निर्माण होता है। अगर कोई अपने व्यक्तित्व की खोज करने निकलेगा तो व्यवहार में वह अपनी अस्मिता ही की खोज करेगा। यह खोज भी अपने या समाज के मनोजगत से बाहर नहीं हो सकती। इसलिए व्यक्तित्व एक ठोस, वस्तुगत सत्य है जबकि अस्मिता एक अमूर्त, मनोगत सत्य। इस प्रकार अज्ञेय ने व्यक्तित्व की जिस खोज में 'आत्म-अन्वेषण' करने की ठानी थी, वह आगे चलकर नामवर सिंह के हाथों 'अस्मिता की खोज' के रूप में संपन्न हुई। अज्ञेय उसे दार्शनिक रूप देने में भले ही सफल हुए हो नामवर सिंह, आधुनिकतावाद से लेकर मार्क्सवाद तक में घुसपैठ करने की लाख कोशिशों के बावजूद, ऐसा नहीं कर सके। इसीलिए कहते हैं, नकल हमेशा होती है पर बराबरी कभी नहीं।

अज्ञेय के काव्य सिद्धांतों के अनुसार 1951 से 1959 तक अबाध गति से चलने वाली 'नई कविता' का औचित्य उस दौर के परिवेश से भी स्थापित करते हुए नामवर सिंह कहते हैं---- "यदि 1938 की बौद्धिक कशमकश नेहरू से संबद्ध थी तो 1951 का 'आत्मान्वेषण' भी नेहरु की नई स्थिति से असंबद्ध न था।...जेल के अंदर 'भारत की खोज' करने वाले नेहरू के सामने अब दुनिया में 'भारत की खोज' का प्रश्न था । इसके समानांतर यदि कवि 'आत्म-सत्य' और अपने 'व्यक्तित्व की खोज' की ओर प्रवृत्त हुए तो स्वाभाविक ही कहा जाएगा। परिवेश के साथ काव्य की यह संगति सर्जनात्मक विकास के लिए वरदान सिद्ध हुई।" (पृष्ठ 91)

जाने क्या बात है कि किसी भी प्रकार की 'खोज' का ज़िक्र आते ही नामवर सिंह भावुक हो जाते हैं, और ऐसी ग़लतियाँ कर बैठते हैं, जिसकी आशा किसी ठीक-ठिकाने के आदमी से तो नहीं की जाती। यहाँ 'भारत की खोज' के साथ 'व्यक्तित्व की खोज' के मेल से उत्साहित होकर वे न केवल उसे 'सर्जनात्मक विकास के लिए वरदान' घोषित कर देते हैं, बल्कि आश्चर्यजनक रूप से 'लिखने' और 'करने' का अंतर भी भूल जाते हैं। ध्यान रहे कि सत्ताकामी मन सत्ता को ही परिवेश मानना और मनवाना चाहता है। छठें दशक की कविता का मूल्यवान हिस्सा नेहरू के सपनों और उनकी फलश्रुतियों पर उठने वाली शंकाओं और सवालों से प्रेरित था, न कि उनकी 'संगति' में था।

बहरहाल, अज्ञेय के काव्य सिद्धांतों पर छठें दशक की कविता चली तो सत्ता के गलियारे में भी उनका दबदबा रहा। स्थापित करने और मानदंड बनाने के लिए किसी और कवि को ढूंढना भी नहीं था। ख़ुद ही अच्छी-ख़ासी कविता कर लेते थे। नामवर सिंह के सामने समस्या यह थी कि सातवें दशक के अनुरूप नया कवि भी लाना था और नए सिद्धांत भी गढ़ने थे। उन्होंने सफलता का सुनिश्चित नुस्खा आज़माया; सत्ता की सेवा में अपनी उपयोगिता साबित कर चुके औजारों को ही कलई चढ़ाकर चमकाया और सत्ता के लिए ख़तरा बनने की संभावना रखने वाले कवि के प्रशंसक बन कर उसके शब्दों की धार को कुंद करने निकल पड़े। कुछ उनकी प्रतिभा और कुछ परिस्थितियों का योग, सो एक ही तीर से दो शिकार करने के इस प्रयास में उन्हें भरपूर सफलता मिली।

ख़ैर, आख़िर में ग़ालिब का एक शेर इस परिस्थिति के मद्देनज़र प्रस्तुत है:

लाज़िम नहीं कि ख़िज़्र की हम पैरवी करें
माना कि इक बुज़ुर्ग  हमें  हमसफ़र  मिले

भाषा की भूमिका - कृष्ण मोहन



भाषा की भूमिका

गणेशशंकर विद्यार्थी ने कभी कहा था कि अगर मेरा देश ग़ुलाम हो रहा हो और मेरी भाषा भी दूषित हो रही हो तो, मैं पहले अपनी भाषा को बचाऊंगा क्योंकि भाषा बची रहेगी तो देश को आज़ाद कराया जा सकता है, लेकिन भाषा दूषित हो गई तो देश को ग़ुलाम होने से कोई रोक नहीं सकता। इस कथन से भाषा के महत्व पर कुछ प्रकाश पड़ता है। हममें से ज़्यादातर लोग भाषा को अभिव्यक्ति के माध्यम से अधिक कुछ नहीं समझते। जैसे ट्रेन या बस यात्रा के माध्यम हैं, वैसे ही भाषा अभिव्यक्ति का माध्यम है। हमने जो अनुभव किया उसे भाषा में व्यक्त कर दिया। अगर वह ठीक ठाक से श्रोता अथवा पाठक तक पहुँच गया तो इससे कोई फ़र्क़ नहीं पड़ता कि भाषा का प्रयोग कैसे हुआ।कहने सुनने में यह बात चाहे जितनी अजीब लगती हो लेकिन व्यवहार में हम भाषा के साथ इसी तरह पेश आते हैं।

दरअसल, भाषा को इतना महत्व इसलिए दिया जाता है कि यह अभिव्यक्ति के साथ साथ अनुभूति का भी माध्यम है। भाषा का हर शब्द अपने अंदर किसी विशिष्ट अनुभव की स्मृति को धारण करता है। उस शब्द से परिचित होने का अर्थ है उसमें छुपी विशिष्ट अनुभूति से, उससे जुड़े तमाम विचारों से परिचित होना। इनसे परिचित होकर ही हम इनसे जुड़ी हुई या इनके बाद आने वाली धारणाओं की तरफ़ क़दम बढ़ाते हैं। उदाहरण के लिए दुःख, शोक, अवसाद, विषाद, पीड़ा, कष्ट, वेदना, यातना, यंत्रणा आदि एक ही वर्ग की भावनाओं को व्यक्त करने वाले शब्द हैं, लेकिन इनकी छायाएं अलग अलग हैं। जो व्यक्ति इन शब्दों को समझता है, वह अपने जीवन में इन शब्दों से जुड़ी भावनाओं को पहचान लेगा। अगर ऐसा नहीं है तो उसे इन भावनाओं में से किसी का सामना होने पर दुखद तो महसूस होगा लेकिन वह ठीक ठीक अपनी भावना को पहचान न सकेगा।

जीवन के सीमित कार्यव्यापार में संलग्न रहने वाले किसी व्यक्ति के मन में भी अनेक प्रकार की भावतरंगें उठती हैं, लेकिन कोई भाषा संपन्न व्यक्ति जैसे उन्हें अलग अलग पहचान सकता है, वैसा वह नहीं कर पाता, क्योंकि उसका काम सीमित शब्दावली से चल जाता है। उसकी शब्दसंपदा उसकी अनुभूतिक्षमता को निर्धारित करती है। किसी वस्तु को पहचानने का मतलब है उसके बारे में एक अवधारणा ग्रहण करना और उसके सहारे उस वस्तु का वर्गीकरण करना। गुड़, चीनी, बूरा, खाँड़, मिश्री जैसे शब्दों के साथ इनके अलग अलग स्वाद की अवधारणा भी हमारे दिमाग़ में सुरक्षित रहती है। अगर कोई व्यक्ति इन अवधारणाओं से परिचित नहीं है तो इन चीज़ों को आकस्मिक रूप से खाने के बावजूद वह अलग अलग इनके स्वाद की विशेषता को पहचान नहीं सकेगा। आकस्मिकता की शर्त इसलिए कि अगर वह व्यक्ति अक्सर इन चीज़ों को खाता है तो वह इनके नाम से परिचित न होने के बावजूद अपने दिमाग़ में इनके स्वाद के अनुसार इनका वर्गीकरण करना और किसी न किसी रूप में इन्हें संबोधित करना सीख जायेगा। इस प्रकार वह आवश्यक भाषा अर्जित कर लेगा। इसके बाद वह इनकी बारीकियों पर और ध्यान देकर अपनी अनुभूति क्षमता का विकास करने में सफल हो सकेगा। इसी अर्थ में भाषा अनुभूति का माध्यम होती है। वह हमारे अनुभवों की स्मृति को संरक्षित और वर्गीकृत करती है। उसके सहारे ही हम अनुभूतियों की यात्रा पर निकल पाते हैं।

भाषा से वंचित होने का अर्थ है अनुभूति के सूक्ष्म विभेदों से अपरिचित रह जाना और इस प्रकार मनुष्योचित गरिमा और संवेदना से युक्त जीवन की संभावना का न्यूनतम रह जाना। ख़ास तौर पर हमारे देश में जहाँ विशाल आबादी निरक्षर है, और जो पढ़े लिखे हैं वे भी भाषा की शक्ति के प्रति सचेत नहीं हैं, यह मुद्दा निर्णायक हो जाता है। भूमंडलीकरण के युग में देश दुनिया के बड़े बड़े कारपोरेट निगम और कंपनियां हमारे जल, जंगल,और ज़मीन पर गिद्धदृष्टि लगाये बैठी हैं। किसानों, दलितों और आदिवासियों को उनकी ज़मीनों से बेदख़ल करके दर दर भटकने पर मजबूर किया जा रहा है। लोगों को जानवरों की तरह हाँका लगाकर खदेड़ने की तैयारी है। समृद्धि और सम्पन्नता के द्वीपों के इर्द गिर्द उगे बाड़ों में उन्हें संगीनों के बल पर क़ैद करके देश की धरती, पहाड़, जंगल,और नदियों का सौदा किया जाने वाला है। ऐसे में भाषा वह अकेला हथियार है जिसके बल पर लोग न्याय की अपनी मानवीय चाहत को बचा पाएंगे और उसके लिए लड़कर सत्ता के इस शिकंजे को तोड़ पाएंगे। इस पृष्ठभूमि में हम अच्छी तरह समझ सकते हैं कि भाषा का मुद्दा कितना अहम है और गणेशशंकर विद्यार्थी ने क्यों इसे देश को बचाने की पूर्वशर्त माना था।

यहाँ आकर हमारे सामने एक बात आईने की तरह साफ़ होनी चाहिए कि अगर हम देश, समाज, गरीब, दलित, आदिवासी, किसान, मज़दूर अथवा मध्यवर्ग के जीवन में कोई सकारात्मक बदलाव लाने के लिए काम करना चाहते हैं तो भाषा का सवाल हमारे एजेंडे में सबसे ऊपर होना चाहिए। अगर ऐसा नहीं है तो हमारी सारी क़वायद निष्फल हो जायेगी और हम अंग्रेज़ीदां बुद्धिजीवियों के पिछलग्गू बनकर रह जायेंगे।

अब लाख टके का सवाल यह है कि भाषा में आये प्रदूषण को कैसे पहचानें और उसके ख़ात्मे के लिए शुरुआत कहाँ से करें। इसका जवाब पाने के लिए हमें भाषा की बुनियादी इकाई वाक्य की छानबीन करनी होगी। वाक्य के विभिन्न अंगों संज्ञा, सर्वनाम, क्रिया, विशेषण आदि पर नज़र डालते हैं तो एक दिलचस्प खींचतान दिखाई पड़ती है। कवि त्रिलोचन ने कहा था---
               
               भाषा की लहरों में  जीवन की  हलचल  है,
               ध्वनि में क्रिया भरी है और क्रिया में बल है

ध्वनि से शब्द और भाषा का संकेत मिलता है। ध्वनिव्यवस्था के लिपिबद्ध संकेत को ही भाषा कहते हैं। ध्वनि कंपन से उत्पन्न होती है, यानी एक क्रिया जो ध्वनि-तरंगों को जन्म देती है। क्रिया में बल होने का और चाहे जो आशय हो, एक बात तो तय है कि बिना बल के क्रिया नहीं हो सकती और जहाँ सक्रियता है वहां निर्बलता नहीं रह सकती। यानि जहाँ क्रिया है वहां बल है। भाषा में क्रिया का वही स्थान है जो जीवन में क्रियाशीलता का है। भाषा की लहरों में जीवन की हलचल के होने का यही अभिप्राय है।

त्रिलोचन की ही एक दूसरी काव्यपंक्ति है--

"हिंदी की कविता उनकी कविता है 
जिनकी सांसों को आराम नहीं था"। 

मीर तक़ी मीर ने कहा था---

               क्या जानूँ लोग कहते हैं किसको सुरूरे-क़ल्ब
               आया नहीं ये लफ़्ज़ तो हिंदी  ज़ुबाँ  के  बीच

सांसों को आराम न होने का अभिप्राय भी इसी अहर्निश क्रियाशीलता से संबद्ध है। हाँ, उसमें बेचैनी और जुड़ जाती है।इसी बात को मीर ख़ूबसूरती के साथ कहते हैं कि दिल का सुकून (सुरूरे-क़ल्ब) नामका शब्द तो हिंदी भाषा में आया ही नहीं। यह कथन वैसे ही है जैसे हम किसी के आत्मविश्वास की सुचना देते हुए कहते हैं कि असंभव शब्द उसके शब्दकोष में ही नहीं है। तात्पर्य यह कि हिंदी बोलने वालों ने दिल के सुकून का अनुभव ही नहीं किया। उनकी सांसों को आराम नहीं था। ज़ाहिर है, हिंदी समाज को परिभाषित करने वाली उनकी बुनियादी विशेषता क्रियाशीलता है।वही उसे अर्थ देती है।

यहाँ आते आते एक बात साफ़ हो जाती है कि जिस प्रकार जीवन की प्राथमिक और बुनियादी इकाई मनुष्य का सौंदर्य और उसकी सार्थकता क्रिया पर टिकी हुई है, उसी प्रकार भाषा की बुनियादी इकाई वाक्य का सौंदर्य क्रिया पर टिका हुआ है। लेकिन हमारे समाज में कर्म के अवमूल्यन की प्रवृत्ति और विचारधारा भी न केवल वजूद में है, बल्कि ख़ासी मज़बूत है। वर्तमान समय में यह कोई अपनी राह तो नहीं बना पाती, लेकिन कर्मण्यता के महत्व को लेकर भ्रम फैलाती रहती है। ऐसे ही एक विचारक रामस्वरूप चतुर्वेदी हैं। ये अपनी किताब "हिंदी गद्य:विन्यास और विकास"(लोकभारती,2002) में लिखते हैं, "वाक्य-विन्यास में सहज प्रवाह का एक साक्ष्य तब माना जा सकता है जबकि वाक्य में सबसे महत्वपूर्ण तत्व क्रिया का विलोप हो जाय, और वाक्य शेष अवयवों के संतुलन पर तना रहे"(पृष्ठ 18)। यहाँ क्रिया को सबसे महत्वपूर्ण तत्व बताने की "सावधानी" तो बरती गई है, लेकिन किसी अनूठे कारण से उसके विलोप को ही अच्छे वाक्य की शर्त बता दिया गया है। आगे चलकर विभूतिभूषण वंदोपाध्याय और प्रसाद की रचनाओं के हवाले से वे वाक्य में क्रियाहीनता को बाक़ायदा एक मूल्य की तरह प्रस्तावित करते हैं। इस वैचारिकी की प्रतिध्वनि हमारे समय के एक प्रमुख कथाकार-चिंतक दूधनाथ सिंह की पुस्तक "महादेवी"(राजकमल,2009) में देखने को मिलती है। वे लिखते है, "कभी-कभी मुझे लगता है कि सर्वनामों के बिना उत्कृष्ट कविता संभव ही नहीं है। संज्ञाएँ और अलंकृतियां, अव्यय और क्रियापद- ये सब तो काव्य-रण के पिछले मोर्चे के योद्धा हैं। असली युद्ध तो सर्वनाम ही लड़ते हैं।"(पृष्ठ 59) सर्वनामों के अमूर्तन के सहारे कविता कई बार सामान्यीकरण के अपने लक्ष्य की साधना करती है, व्यक्तिगत से सार्वजनीन की यात्रा करती है। लेकिन संज्ञा की बनिस्बत इसकी नामरूपहीनता व्यक्तित्वों के विलोप की संभावना भी अपने अंदर  छिपाये रहती है। कहना अनावश्यक है कि व्यक्तित्वों का विखंडन, पतन और अंततः उनका विघटन हमारे समय और समाज की प्रमुख विडंबनाओं में से एक है। इसलिए सर्वनाम की उपयोगिता को स्वीकार करते हुए भी उसे वाक्य का सबसे प्रमुख अंग नहीं माना जा सकता। आगे चलकर लेखक की रणनीति तब और स्पष्ट होती है जब वह प्रसाद के विषय में लगभग तोहमत के रूप में कहता है कि "लेकिन प्रसाद में छायावाद के प्रारम्भिक चरण के सारे लक्षण हैं। वे अक्सर क्रियापदों का दामन नहीं छोड़ते(पृष्ठ 65)।" इससे पता चलता है कि सर्वनाम को प्रमुखता देने की रणनीति क्रिया को देशनिकाला देने से जुड़ी हुई थी। इस  रणनीति से न कविता का भला होगा न समाज का। हाँ, इससे हमारे समय में फैली धुंध और गहरी हो जायेगी। 

बहरहाल, ताज्जुब इस बात का नहीं है कि इन विचारकों ने ये बातें लिखीं। सबके अपने विचार हैं और अगर वे खुलकर व्यक्त होते हैं तो हम उनका स्वागत करते हैं। ताज्जुब इस बात का है कि इन विचारों से हिंदी के किसी कवि-आलोचक के कान पर जूं नहीं रेंगी। ये विचार अपने तरीक़े से हमारी चेतना में सक्रिय रहे लेकिन कहीं कोई सवाल नहीं उठा। अकर्मण्यता और व्यक्तित्वहीनता को मूल्य बनाकर वैधता और प्रामाणिकता देने की कोशिशें जारी रहीं लेकिन हिंदी समाज का सामूहिक विवेक शायद घोड़े बेचकर सोता रहा। यह क़िस्सा कोई नया नहीं है। हमने अपनी भाषा के साथ जो लापरवाही बरती है और उसके जो दुष्परिणाम सामने आये हैं, उनके कुछ नमूने देखने योग्य हैं।

वाक्य में क्रिया की केंद्रीय भूमिका की नासमझी और उसके प्रति हमारी लापरवाही को एक छोटे से उदाहरण से समझा जा सकता है। "पीना" हमारी भाषा की सबसे सहज क्रियाओं में से एक है। हम चाय या शरबत "पीते" हैं, लेकिन अंग्रेज़ी के सामने अपनी हीन भावना के चलते हमने अब उन्हें "लेना" शुरू कर दिया है। "टु टेक ए कप ऑफ़ टी" की तर्ज पर हम अब चाय या कॉफी "लेते" हैं, "पीते" नहीं। "आप चाय लेंगे या कॉफी" जैसे वाक्यांश अब आम तौर पर सुनने में आ जाते हैं। इसी क्रम में अब "ठंडा"या "गरम" लेने की बारी भी आ चुकी है। "पीना" की जगह "लेना" का प्रयोग कितना भ्रामक है, इसे इस बात से समझा जा सकता है कि अगर हम चाहते हैं कि हमारे परिवार का कोई सदस्य बाज़ार से चाय पीकर  चला आये तो हम उससे यह नहीं कह सकते कि "बाज़ार से चाय लेकर आओ"। ऐसा कहने पर वह बाज़ार से चाय खऱीदकर तो ला सकता है, लेकिन पीकर नहीं आ सकता। यानी "पीना" क्रिया को अपदस्थ करने में अंग्रेज़ी अभी पूरी तरह से कामयाब नहीं हुई है। अभी इस प्रदूषण को पहचान कर इसे दूर किया जा सकता है।

यहाँ किसी "उदारतावादी" विद्वान को शुद्धतावाद का ख़तरा दिखाई पड़ सकता है और वह "भाखा बहता नीर" जैसी किसी उक्ति की आड़ में छुपने की कोशिश कर सकता है। इस संबंध में फ़िलहाल इतना ही कहना पर्याप्त है कि जैसे बहते हुए पानी में दूसरे स्रोतों का पानी भी आकर मिलता है तो उसका प्रवाह बढ़ता है, उसी प्रकार दूसरी भाषा के शब्दों को लेकर कोई भी भाषा समृद्ध होती है, लेकिन जब किसी भाषा पर उसके स्वभाव के विपरीत दूसरी भाषा की वाक्यरचना और क्रिया थोपी जाती है तो उस भाषा का वही हाल होता है जो हमने गंगा-यमुना के बहते हुए नीर का कर रखा है। इस मामले में भाषा की तुलना नदी के साथ उचित ही की गई है।

दूसरी बात अंग्रेज़ी के सामने हीन भावना की है। अंग्रेज़ी की इस भूमिका को समझ लेना इसलिए ज़रूरी है कि यह हमारी भाषा के प्रदूषण का लगभग एकमात्र स्रोत है। इसे एक उदाहरण से समझने की कोशिश करते हैं। अंग्रेज़ी में पीने के लिए क्रिया "ड्रिंक" है, लेकिन सिगरेट का सुट्टा लगाने को वे "स्मोक करना" कहते हैं, जबकि हिंदी में इसे भी "पीना" ही कहते हैं। अब अगर अंग्रेज़ी के वाक्य में हिंदी की क्रिया का प्रयोग कर दें तो वाक्य बनेगा "आई ड्रिंक सिगरेट"। जब कभी मैं सामान्य पढ़े-लिखे हिन्दीभाषी लोगों के बीच इस वाक्य का ज़िक्र करता हूँ, उन्हें हंसी आ जाती है, जबकि अपनी भाषा में "पीने-लेने" के प्रसंग में इसी तरह की गलती करते हुए वे पूरी तरह सहज रहते हैं। इससे यह पता नहीं चलता कि हमारे लोग हिंदी से ज़्यादा अच्छी तरह अंग्रेज़ी को जानते- बरतते हैं। इससे सिर्फ़ यह पता चलता है कि अंग्रेज़ी की श्रेष्ठता और हिंदी की हीनता का भाव हमारे अवचेतन में घर कर चुका है। इसीलिए अंग्रेज़ी के वाक्य में हिंदी की क्रिया को घुसपैठ करते देखकर हम उसके दुःसाहस पर हंस पड़ते हैं। जबकि विदेशी भाषा होने के कारण अंग्रेज़ी के साथ यह बर्ताव व्याकरणिक रूप से ग़लत होने पर भी अधिक मानवीय और स्वाभाविक है। किसी ने कहा है कि अपनी भाषा में सामने आई मुहावरे की ग़लती कौर में आये बाल की तरह होती है जिसका एहसास हुए बिना नहीं रहता और जिसे नज़रंदाज़ करना बिलकुल नामुमकिन होता है। यह हमारी रग-रग में बसी ग़ुलामी का ही असर होगा कि हम अंग्रेज़ी के मामले में तो इस क़िस्म की संवेदनशीलता दिखाते हैं, लेकिन हिंदी के मामले में उदासीन बने रहते हैं।

इस उदासीनता को देखने के लिए कहीं दूर जाने की ज़रूरत नहीं।हम अपने आसपास ग़ौर करें तो पाते हैं कि हिंदी के किसी प्रयोग को लेकर कहीं कोई बहस दिखाई नहीं पड़ती।  "अनस्थिरता" शब्द को लेकर महावीरप्रसाद द्विवेदी और बालमुकुंद गुप्त के बीच हुए लगभग सौ साल पुराने विवाद की चर्चा हम ऐसे करते हैं जैसे वे किसी और ग्रह से आये लोग थे जो ऐसी "मामूली" बातों पर अपनी प्रतिष्ठा दांव पर लगा देते थे। आज़ादी के पहले तो फिर भी कुछ जवाब-सवाल होते थे, लेकिन उसके बाद ये तौर-तरीक़े शायद संदिग्ध मान लिए गए। इधर पिछले तीन दशक के बारे में तो मैं ख़ुद एक प्रत्यक्षदर्शी के रूप में कह सकता हूँ कि हिंदी के किसी प्रयोग को लेकर न कोई किसी को रोकता-टोकता है, न कोई किसी की बात काटता है। यह सब ग़ैरज़िम्मेदाराना अशिष्टाचार माना जाता है। एक-डेढ़ दशक पहले तक अभिनव ओझा नामके एक जागरूक पाठक की चिट्ठियाँ पत्र-पत्रिकाओं में दिखती थीं, जिनमें प्रकाशित रचनाओं में हुई भूलों की चर्चा होती थी। ऐसी कोशिशें भी हमारी उदासीनता की भेंट चढ़ गईं। ऐसा तब हुआ जबकि हिंदी में कम से कम एक अदद रसिक कलावंत और लगभग एक दर्जन जनपक्षधर आलोचक सक्रिय हैं। इनके होने के बावजूद हिंदी में वैचारिक बहसों का स्तर ननद-भौजाई की हंसी-ठिठोली जैसा रह गया है। सामाजिक हलचलों और उथल-पुथल ने हमारे साहित्य को लोकतांत्रिक दिशा ज़रूर दी, लेकिन हमारी साहित्यिक संस्कृति ने उसका मार्ग प्रशस्त नहीं किया, उसकी राह में रोड़े ही अटकाए।

ग़ौरतलब है कि हम अपने वाक्यों में केवल क्रिया को नहीं बदलते बल्कि उसका काल और उसकी संभाव्यता को भी बदलकर अपने  वाक्यों को पूरी तरह भोथरा कर लेते हैं। एक सर्वव्यापी उदाहरण लें। किसी भी उच्चस्तरीय साहित्यिक सभा-संगोष्ठी में बड़ी आसानी से संचालक को कहते हुए सुना जा सकता है---"अब मैं बुलाना  चाहूँगा अलाँ साहब को जिन्होंने फलाँ क्षेत्र में चिलाँ तीर चलाये हैं"। न बुलाता हूँ, न बुलाना चाहता हूँ, बल्कि "आई उड लाइक टु काल यू" की तर्ज पर भविष्य में कभी ऐसा करने की इच्छा की घोषणा। सचमुच बुला लूँगा ऐसा कोई वादा भी नहीं। लेकिन "खग जानै खगही की भाषा" को चरितार्थ करते हुए वक्ता महोदय माइक पर नमूदार होते हैं और फ़रमाते हैं---"मैं फलाँ साहब का शुक्रिया अदा करना चाहूंगा जिन्होंने मेरी इतनी ताऱीफ की"। इस तरह हिंदी का कारोबार भविष्य की अनिश्चित संभावना के रूप में चल रहा है, अथवा स्थगित है। हिंदी जैसी बाँकी, क्षिप्र और असरदार भाषा का दम ऐसे बोझिल और जड़ प्रयोगों से घुटता है।

एक उदाहरण और देखते चलें। हिंदी में भोजपुरी के प्रभाव से परसर्ग "ने" के विलोप पर तो कभी -कभी असहमति का अनौपचारिक इज़हार हो जाता है। यानी, मैंने कहा, मैंने खाया, मैंने गाया जैसे वाक्यों की जगह हम कहे, हम खाये, हम गाये जैसे वाक्यों को ख़ासतौर पर विद्यार्थियों के लिए उपयुक्त नहीं माना जाता क्योंकि इससे नौकरी के इंटरव्यू आदि में उनकी ग्रामीण जड़ों की पोल खुल सकती है। लेकिन निष्क्रियता की खुली  वकालत करने वाले अंग्रेज़ी के "पैसिव वॉइस" के दबाव में हिंदी के वाक्यों के सौन्दर्य के मटियामेट होने पर मैंने किसी विद्वान को ध्यान देते नहीं देखा। हिंदी में कहते हैं कि"आपने जो किया वह मैंने देखा"। लेकिन आजकल की हिंदी में इसे कुछ यूँ कहते हैं, "आपके द्वारा किये गए कार्य को मैंने देखा"। आई सा द वर्क डन बाय यू।

कहने का आशय यह कि इंग्लैंड जैसे छोटे से द्वीप की अपनी  भौगोलिक-ऐतिहासिक परिस्थितियों में विकसित भाषा के प्रयोग अगर भारतीय उपमहाद्वीप के विस्तृत भूभाग में जन्मी और पली-बढ़ी भाषा पर वर्चस्व स्थापित कर लेंगे तो यह किस क़दर विनाशकारी होगा इसकी कल्पना भी आसानी से नहीं की जा सकती। इसे समझने के लिए हमें अपनी नदियों और उनमें गिरने वाले नालों को देखना होगा।

अंत में, हिंदी के स्वभाव की गतिशीलता और अंग्रेज़ी से इसके फ़र्क़ को समझने के लिए एक उदाहरण और देख लेते हैं। हिंदी में जब हम अतीत की किसी घटना का ब्यौरा देते हैं तो इसकी सूचना के साथ ही हम ख़ुद उस काल में पहुँच जाते हैं और वह घटना हमारे लिए वर्तमान काल की हो जाती है। मिसाल के तौर पर अगर हम किसी दोस्त के घर उससे मिलने गए और उसे सोता हुआ पाकर वापस आ गए तो, अगले दिन इसका ब्यौरा कुछ यूँ देंगे---"कल मैं उसके घर गया और मैंने देखा कि वह सो रहा है"। अंग्रेज़ी में इस वाक्य का प्रासंगिक अंश कुछ यूँ बनेगा---",,,,,,,,,,आई सॉ दैट ही वाज़ स्लीपिंग"। आजकल हिंदी में लगभग निरपवाद रूप से अंग्रेज़ी वाला ही प्रयोग चल रहा है, यानी "मैंने देखा कि वह सो रहा था"। इस तरह हम हिंदी की जीवंतता और सक्रियता पर अंग्रेज़ी की निष्क्रियता और अनिश्चितता को थोपकर उसके स्वाभाविक प्रवाह को रोक देते हैं।

Krishna Mohan  

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सर गणेश दत्त