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Wednesday, 31 July 2019

ख़ुद के आधे-अधूरे नोट्स : व्योमेश शुक्ल

ख़ुद के आधे-अधूरे नोट्स : व्योमेश शुक्ल

है अमानिशा उगलता गगन घन अंधकार
खो रहा दिशा का ज्ञान स्तब्ध है पवन चार
(निराला, ‘राम की शक्तिपूजा’)

ऐसे क्षण अंधकार घन में जैसे विद्युत
जागी पृथ्वी तनया कुमारिका छवि अच्युत
(निराला, ‘राम की शक्तिपूजा’)

एक

स्मृति निराशा का कर्तव्य है. लेकिन इस बीच वर्तमान को इतना प्रबल, अपराजेय और शाश्वत मान लिया गया है कि कोई भी हार मानने को तैयार नहीं है और जब तक आप हार नहीं मानेंगे, स्मृति का काम शुरू नहीं होगा. यों, आजकल, स्मृति क्षीण है और चाहे-अनचाहे हमलोग उसका पटाक्षेप कर देने पर आमादा हैं.

दो

इस धारणा को साक्ष्यों से सिद्ध किया जा सकता है. मिसाल के लिए फ़ेसबुक प्रायः रोज़ हमें याद दिलाता रहता है कि आज – इसी तारीख़ से – ठीक एक-दो-तीन-चार या पाँच साल पहले हमने यहाँ क्या कहा-सुना था, कहाँ गए थे या कौन सी तस्वीर शाया की थी. उस परिघटना को वह स्मृति की तरह पेश करता है और हमें, एक बार फिर, उसे अपने लोगों के साथ साझा करने का अवसर देता है. हममें से ज्यदातर लोग कई बार उस बिलकुल क़रीब के अतीत को स्मृति की तरह स्वीकार करते हैं और ‘वे दिन’ वाले अंदाज़ में शेयर करते हैं. हमारे मित्रों की लाइक्स और आशंसा भरी प्रतिक्रियाओं से यह निर्धारित भी होता जाता है कि वह जो कुछ भी है, स्मृति ही है.

तीन

स्मृति की उम्र इतनी कम नहीं हुआ करती. वह बहुत मज़बूत धातु है. मनुष्य नामक शक्तिशाली चीज़ जब इस धातु से टकराती है तो उससे निकलने वाली आवाज़ शताब्दियों के आरपार लहराती हुई जाती है. मुक्तिबोध के शब्दों में : ‘इतिहास की पलक एकबार उठती और गिरती है कि सौ साल बीत जाते हैं.

चार

एक ओर इतिहास-बोध का नुक़सान और दूसरी तरफ़ वर्तमान के ही हीनतर और सद्यःव्यतीत संस्करण को स्मृति मान लेने का भोथरा परसेप्शन – क्या ये दो असंबद्ध बातें हैं ? जो लोग इतिहास और स्मृति को ध्रुवांतों पर रखकर सोचने के अभ्यस्त हैं, उन्हें इस सचाई को भी सोचना होगा. आख़िर यथार्थ का अनुभव क्या है ? वह या तो स्मृति है या कल्पना. यानी स्मृति का अवमूल्यन यथार्थ का निरादर है.

लमही पर कुछ नोट्स : व्योमेश शुक्ल

लमही पर कुछ नोट्स : व्योमेश शुक्ल

लमही वतन है

एक

लमही वतन है। दूसरी जगहें गाँव घर मुहल्ला गली शहर या जन्मस्थल होती हैं, लमही वतन हो जाती है और लेखक को अपने वतन लौटते रहना चाहिये। लेखक को दूसरे लेखकों के वतन भी लौटना चाहिए। जाँच-परख या टीका-टिप्पणी करने नहीं, रहने के लिए। जितनी देर तक वहाँ ठहरिये, रह जाइये। वतन जाकर रहने से कम कोई काम क्या करना ?

दो

लेकिन किसी लेखक के पैदा होने या रहने लगने से कोई जगह वतन नहीं हो जाती। चतुर्दिक फैले हुए कर्म और मानवीय सम्बन्ध उसे वतन बनाते हैं। माला में मोती पिरोने, अनवरत खाँसने और किसी कम ज़रूरी काम में लगे रहने से, आधी रात में जागकर ट्यूबवेल चलाने और ग्राम प्रधान के देर रात तक सुरा और संभोग में व्यस्त रहने जैसी अनन्त वजहों से कोई जगह वतन बन जाती है। ऐसी ही वजहों से कोई गाँव लेखक का गाँव बन जाता है, कोई जगह वतन बन आती है और प्राइमरी स्कूल का एक मुदर्रिस उपन्यास-सम्राट बन जाता है।

तीन

जबकि हमारे यहाँ वजहों को भूलकर या कुछ नकली किताबी वजहें खोजकर लोगों को और चीज़ों को समझने-समझाने की कोशिश की जाती है। ये कोशिशें दूर से गुज़र जाती हैं और असर पैदा नहीं कर पातीं। कई बार ये वस्तुस्थिति को बीमार बनाने का काम करती हैं। ये नई समस्याएँ पैदा कर देती हैं। लमही उदाहरण है। यहाँ मुंशी प्रेमचन्द के अमरत्व को उनके रोज़मर्रा मरण से अलग कर दिया गया है। कुछ सरकारी और अकादमिक क़िस्म के विभाग बन गये हैं जहाँ एक विभाग में प्रेमचंद सुबह पैदा होकर शाम को मर जाते हैं और पड़ोस के विभाग में वह 1936 से आज तक एक नुमाइशी ज़िन्दगी जी रहे हैं। लमही में प्रेमचन्द के जन्म, जीवनयापन और महानता को वहाँ के लोगों के जीवन-संघर्ष से अलग किसी संसार की तरह बसाने के प्रयत्न अब तक होते आये हैं और राजनीतिक पैंतरेबाज़ी ने रचनाकार को स्थानीय आत्मसम्मान का मुद्दा नहीं बनने दिया है। यह बात हमेशा कही जानी चाहिए कि किसी स्थान के साथ लेखक के संबंधों की पद्धतियाँ तय करना सत्ताओं के बस की बात नहीं है। ये संबंध वृहत्तर जनता की कोख़ से निकलते हैं और वहीं से नियमित होते हैं। इसलिए, आदर्श स्थिति तो यही है कि कोई कमबख्त, लेखक और जनता के बीच में न आए।

चार

अब तक की बातों से साफ़ हो गया होगा कि सत्ता के विभिन्न संस्करणों में लमही का ‘उद्धार’ कर डालने की कितनी होड़ रही है। बीते साठ सालों से लगातार चलती इस प्रतियोगिता में भाग लेने वाली चार प्रमुख टीमें इस प्रकार हैं – १. केन्द्र सरकार, २. राज्य सरकार, ३. नागरी प्रचारिणी सभा और ४. प्रगतिशील लेखक संघ। इन टीमों ने वहाँ प्रतियोगिता के सभी क़ायदों का जुलूस निकाल दिया है और श्रेय लेने की जगहें लगातार ढूँढती रही हैं। प्रेमचन्द के वंशजों ने पैतृक सम्पत्ति सरकार को दान देकर ख़ुद को दौड़ से बाहर कर लिया है। वे कभी-कभार अतिथि की तरह वहाँ पधारते हैं और उनमें से आलोक राय और सारा राय जैसी छवियाँ गाँव के धूलपसीनामग्न माहौल में ख़ासी सिनेमाई लगती हैं। नागरी प्रचारिणी सभा का संगठन जर्जर और मृतप्राय होकर किनारे लग गया है और सिर्फ़ 31 जुलाई को होने वाले वार्षिक कर्मकांड में हिस्सा लेने योग्य बचा है। उसने प्रेमचन्द के मक़ान के ठीक सामने अपने छोटे से किन्तु ऐतिहासिक महत्व के ‘कंपाउंड’ को ज़िले के प्रशासन को दान में दे दिया। यह छोटी सुंदर संपदा ‘सभा’ को अरसा पहले प्रेमचन्द के परिवार द्वारा ही दान में मिली थी। दान में मिली वस्तु को दान कर डालने की यह अद्भुत घटना, ऐसा लगता है, कि बनारस की ही किसी संस्था द्वारा अंजाम दी जा सकती थी जहाँ शायद दान के कोई पारलौकिक आशय नहीं बचे हैं। बहरहाल, इसी परिसर में पहले राष्ट्रपति डा. राजेन्द्र प्रसाद ने मुंशी प्रेमचंद स्मारक का शिलान्यास किया था और शिलान्यास का शिलापट्ट यहाँ से गायब है। स्थानीय मीडिया के लिए यह बात लमही के दुर्भाग्य की स्थायी ख़बर है। बनारस रहकर जवान होते हुए इस बात को प्रतिवर्ष कम से कम दो बार अखबारों में पढ़कर मनहूस हुआ जा सकता है। उसी परिसर में लगी प्रेमचन्द की पत्थर की मूर्ति की आँखें या तो टूट-फूट गई हैं या गाँव के शरारती बच्चों ने निकाल ली हैं। यह दृश्य न्यूज़ चैनल्स के काम का है। दृश्य की विकृति देखने-दिखाने वालों के लिए है। चार साल पहले 31 जुलाई के आसपास लमही में घूमते हुए इन पंक्तियों के लेखक ने देखा कि ‘स्टार न्यूज’ के उत्साही फोटोग्राफर दौड़-दौड़कर गाँव के भीतर से कपड़े धोते बच्चों को मूर्त्ति के करीब ला रहे हैं और उनसे वहीं बैठाकर कपड़ा धुलवा रहे हैं।.कमाल का दृश्य था। बग़ैर साफ़ पानी के, सिर्फ़ साबुन के झाग से कपड़ा धुल रहा था क्योंकि बच्चे पानी की बाल्टी लेकर नहीं आए थे। वाशिंग पाउडर निर्माता कंपनियों को तत्काल स्टार न्यूज से सम्पर्क करना चाहिए।

पाँच

फ़िलहाल सरकार की सरपरस्ती में यह छोटा-सा परिसर पहले से अच्छी हालत में है। दीवारों से लगी व्यवस्थित हरियाली और प्रेमचन्द की कहानियों, जीवन-प्रसंगों और दूसरे रचनाकारों के प्रसिद्ध वाक्यों पर आधारित पोस्टर्स हमें भटका देते हैं। हमारा ध्यान बदनसीबी से हट जाता है। इस परिसर का रखरखाव निहायत स्वयंभू तरीके से प्रेमचंद-साहित्य के एक स्थानीय मुरीद  ‘दूबे जी’ कर रहे हैं। वे पड़ोस के गाँव से साइकिल चलाकर रोज़ सुबह-शाम लमही आते हैं, पेड़-पौधों की सेवा करते हैं, प्रतिमा और चबूतरे को पानी से धोते हैं। परिसर में स्थित दो कमरों और लम्बे बरामदे को उन्होंने प्रेमचन्द की किताबों, प्रेमचन्द के बारे में लिखी गई किताबों, डाक टिकटों और प्रेमचंद के कथासाहित्य की नुमाइंदगी करने वाली अमर वस्तुओं – चिमटा, चरखा, हुक्का, गिल्ली-डंडा आदि से सजा दिया है। उन्होंने बताया कि ये पुस्तकें आस-पास के गाँवों के बच्चों और अन्य लोगों को पढ़ने के लिए दी जाती हैं । इन्हीं में से एक कमरे में उन्होंने अपना एक दफ्तर जमा लिया है और वहाँ कुर्सी-मेज पर बैठकर वह कुछ और आत्मविश्वास के साथ प्रेमचंद के बारे में पिटी-पिटायी बातें करते हैं, हालांकि उनकी इस निःस्वार्थ और गैरकानूनी कोशिश में सेवा और कर्त्तव्य के असली तत्वों की झलक है। उनसे मिलकर ऐसा लगता है कि एक दिन नागरिक किसी न किसी तरीके से सरकार को पीछे करके सुधार के काम अपने हाथ में ले लेगा – अपनी सारी सीमाओं और सरकार की सारी शक्तियों के बावजूद। ऐसे व्यक्ति लमही, गढ़ाकोला और अगोना (बस्ती) जैसी जगहों में पहली-पहली बार दिखना शुरू हुए हैं। यह सुखद अभिनव विकास है। तंग आकर जनता कुछ ऐसे ही हिस्सेदारी करने लगती है।

छह

प्रेमचन्द के पुश्तैनी मकान को राज्य सरकार ने पर्याप्त पैसा खर्च करके नया बना दिया है; उसके मूल रूप को यथावत रखने की विफल और सतही कोशिश भी इस निर्णय में हुई है। लेकिन इतना तय है कि दुर्दशा पर सालाना आँसू बहाने वाले लोग अचानक बेरोजगार हो गये हैं, कि अब किस बात पर अफसोस किया जाय। बड़े मकान की सुरक्षा और रखरखाव का स्थाई इन्तजाम नहीं है और स्वयंसेवी ग्रामवासी सोत्साह ‘गाइड’ की भूमिका निभाने लगते हैं। खिड़कियों से धूल और उजाला लगातार भीतर आता रहता है। दरवाजे भी हमेशा हर किसी के लिए खुले हैं। मधुमक्खी के बड़े-बड़े छत्ते हैं और सफेद दीवारों पर आशिकों और दिलजलों ने अपने नाम और मोबाइल नम्बर खून के रंग में लिख डाले हैं। पूरे मकान में बिजली की वायरिंग की गई है लेकिन बल्ब और पंखों वगैरह का कहीं पता नहीं है।

सात

गाँव में – हालाँकि लमही को गाँव मानना मुश्किल है; वह बनारस का एक बिगड़ा हुआ मुहल्ला .ज्यादा लगता है – मुख्य रूप से तीन जातियाँ हैं – गोड़, कुनबी और कायस्थ। प्रायः सभी कायस्थ खुद को प्रेमचन्द का दूर या नजदीक का रिश्तेदार बताते हैं। समृद्धि और भोग के मामलों में पटेल (कुनबी) समुदाय के लोगों ने सबको पीछे छोड़ दिया है। वे दरअसल प्रदेश की सबसे ताकतवर जातियों में से एक हैं। प्रेमचन्द के मकान के ठीक बाहर एक शिव मंदिर है। उसके निर्माण की दास्तान तथाकथित रूप से 150 साल और वास्तव में 5 साल में फैली हुई है। लगभग 5 साल पहले 31 जुलाई के आसपास वहाँ एक शिवलिंग खुले में रखा हुआ था। एक साल बाद वहाँ पहुँचने पर इन पंक्तियों के लेखक ने देखा कि वहां दरो-दीवार का इंतजाम हो गया था। दीवार पर मोटे-मोटे हर्फों में लिखा हुआ था  – ‘ 150 साल पुराना मंदिर – प्रेमचंदेश्वर महादेव।’ एक शराबी ने झूमते हुए बताया कि यह महान मंदिर मुंशी प्रेमचन्द द्वारा स्थापित है। हमने शराबी से नाम पूछा तो उसने कहा कि ‘प्रेमचंद’। हालाँकि इस बीच वहाँ जाने पर देखा गया है कि ‘प्रेमचंदेश्वर महादेव’ के ऊपर पुताई करा दी गयी है और लिख दिया गया है – ‘बाबा भोलेनाथ मंदिर, लमही’,  और कम से कम दर्जन भर शिवलिंग और स्थापित कर दिये गये हैं।

आठ

प्रेमचंद और शिवरानी देवी के प्रकाशन-समूहों में काम कर चुके कुल दो बुजुर्ग अभी जीवित हैं। दोनों सज्जन मृत्युशय्या पर हैं। पत्रिका आदि के लोकार्पण के लिए ये दो लोग उपयुक्त सर्वहारा मुख्य अतिथि और अध्यक्ष रहे हैं। हालाँकि दोनों को काफी ऊँचा सुनाई देता है और याद रखने लायक सभी बाते ये बहुत पहले भूल चुके हैं। उनके चेहरों और जीर्ण जीवन को कोशिश करके बिकाऊ बनाया गया है. लेकिन खरीदने वाली ताक़तें आशंकाओं से ज़्यादा चंचल और कंजूस साबित हुई हैं.

नौ

लेकिन अंदरूनी तब्दीलियाँ बेसंभाल ढंग से घटित हो रही हैं. समझदार लोग अंदाज़ा नहीं लगा पा रहे हैं या उलझना नहीं चाहते, इसलिए सूत्र कम से कम उपलब्ध हैं. दरअसल नेतृत्व बदल गया है. इसे ३१ जुलाई को शिद्दत से महसूस किया जा सकता है, लेकिन शायद उस दिन लोग उत्सव में गाफ़िल रहते होंगे. आयोजन की सूची बड़े ज़ोरदार ढंग से घोर साहित्येतर लोगों के हाथ में जा रही हैं, बल्कि चली गई हैं, ये लोग राजनीति या समाज के दूसरे मंचों के उजले लोग नहीं, दिलजले हैं – चिढ़े हुए, शोर्ट टेम्पर्ड और अत्यन्त निराशावादी. लेकिन यह तय है कि ये अपना, प्रेमचंद और लमही का सबसे बड़ा दुश्मन वहाँ आकर भाषण देने वालों को मानते हैं. बीती ३१ जुलाई को इन्होने पर्याप्त सांस्कृतिक उपद्रव किया. वहाँ इस बार प्रगतिशील परंपरा के घुटे हुए भाषणबाज़  वहाँ किनारे कर दिए गए थे और उत्तर भारत के बड़े बिरहा गायक मंच की शोभा बढ़ा रहे थे. दसियों हज़ार लोगों की भीड़ के सामने शहरी साहित्यकारों की हवा गुम होने को थी. बग़ल के एक विद्यालय में भंडारा चल रहा था, यहाँ अज्ञात लोग इंतज़ाम में लगे हुए थे और लेखकनुमा लोगों को आदर सहित बुलाकर बाटी-चोखा खिला रहे थे. मेरे ख़याल से यह निरादर की हद है और अकर्मण्यता का सच्चा पारिश्रमिक. अब लेखक मेहमान हैं या दामाद हैं व्यापक समाज के.

दस

बनारस की ख़ास अपनी दिक्क़तें अलग भूमिकाएं निभाती रहती हैं. विराट अतीत प्रायः विपत्ति है. अकेले प्रेमचंद ही शोभा नहीं हैं, प्रसाद हैं, भारतेंदु हैं, और पीछे जाइए तो कबीर, तुलसी, रैदास, रामानंद. नागरी प्रचारिणी, शुक्ल और द्विवेदी; हिंदी विभागों की अपनी ऐतिहासिकता को छोड़कर भागना आसान नहीं है. आधुनिक काल के अपने संकट हैं. सबके प्रति आभारी होना, या दिखना हिंदी वाले का कर्तव्य है. धूमिल , त्रिलोचन, गिन्सबर्ग, शिवप्रसाद सिंह – सबके अपने-अपने प्रकोष्ठ हैं. पार पाना आसान नहीं, गंगा एक आग का दरिया है और उसमें सिर्फ़ डूबके नहीं, मर के जाना है, तभी मुक्ति है. इसलिए अभिनवता के मोर्चे कभी खुल ही नहीं पाते और रचनाकार स्वप्न देखता रह जाता है.
मसलन कवि अपनी कविता में लिखता है:
छोटे से आँगन में माँ ने लगाए हैं तुलसी के बिरवे दो
पिता ने उगाया है बरगद छतनार
मैं अपना नन्हा गुलाब कहाँ रोप दूं? (केदारनाथ सिंह)

ग्यारह

कभी-कभी लगता है, हम काम के भीतर से राह निकालना भूल गए हैं. हम विचारमग्न या चिंतित होना चाहते लोग हो गए और हमें पता ही नहीं चला. यह हार थी. कुछ संकल्प होते ही ऐसे हैं कि उन्हें बैठकर दिमागी ताक़त से साधा नहीं जा सकता. लेकिन कौन याद दिलाये किसे? ऐसे मुद्दों पर हमारा शरीर सोचता है, वह आवाहन करता है दिमाग़ का, तब तानाशाही चलना बंद होती है, लेकिन ऐसा कभी-कभी होता है.

बारह

प्रेमचंद की कहानी सिर्फ़ गाँव की कहानी नहीं है, वह शहर में भी फ़ैली हुई है, उनसे जुडी हुई चीज़ों और जगहों को सँभालने और पहचानने का काम शर्म और आलस्य से भर गया है. उनकी ग़रीबी को मिथक के वज़न पर प्रचारित किया गया, जबकि यह अकाट्य है कि एकाध मौक़ों को छोड़कर प्रेमचंद ज़िन्दगी में कभी विपन्न नहीं रहे. पता नहीं इस झूठ से किसी को क्या फ़ायदा हुआ होगा, लेकिन यह चेतना के बालीवुड़ीकरण का प्राचीन प्रमाण है. ऐसे लोग अभी जीवित और सक्रिय हैं मसलन जिनके मक़ान में रहकर प्रेमचंद ने निर्मला की रचना की थी, उनका वह कमरा अभी भी वैसा ही है. उन्होंने अपने पिता के हवाले से लगभग शर्माते हुए बताया कि मुंशी जी समय से किराया नहीं देते थे और इस मुद्दे पर झक-झक होती रहती थी. बनारस में जिस जगह उनका निधन हुआ वहाँ एक शिलापट्ट तक नहीं है.

Friday, 4 May 2018

किशन महाराज पर व्योमेश शुक्ल का संस्मरण कठिन का अखाड़ेबाज़

आज किशन महाराज को गये दस साल हो गये. नीचे के निबंध में उनके बारे में, उनके और बनारस के रिश्ते के बारे में कुछ बातें हैं. जिन मित्रों को यह लंबा  लगे, वे कहीं से भी पढ़ लें. अगर पूरा पढ़ें तो मेरा सौभाग्य. - व्योमेश शुक्ल
                   कठिन का अखाड़ेबाज़
एक
अगर हर चीज़ का अन्त है तो मृत्यु का भी अन्त है। इस तर्क की ताक़त से मृत्यु के शोक के पार जाया जा सकता है। इसी तर्क की ताक़त से अन्त का भी अन्त मुमकिन है।
किशन महाराज
अन्त के इसी अन्त के साथ विरल तबलानवाज़ और इंसान किशन महाराज की ख़त्म हो चुकी ज़िंदगी को शुरू किया जा सकता है और एक बार फिर उसमें शामिल हुआ जा सकता है, उससे हासिल किया जा सकता है।
दो
कुछ लोग मृत्यु के बाद अनिवार्य हो जाते हैं। दरअसल उनका मृत्यु पूर्व जीवन घटनाओं, व्यस्तताओं, जगहों, लोगों और अवान्तर प्रसंगों से इतना भरा हुआ होता है कि अक्सर उनका ख़ुद इस भीड़भाड़ में गुम रहा आता है या इन्हीं भीड़ भरी शक्लों में ढल जाता है। वहाँ जीवन के दमदमाते हुए कार्यकलापों के सामने बातचीत या विश्लेषण या मूल्यांकन की नौबत नहीं आ पाती। किशन महाराज की ज़िंदगी और कला को इस धारणा के उदाहरण की तरह इस्तेमाल किया जा सकता है। बहुत दिनों तक उनके व्यक्त्वि की भव्यताओं - मसलन् धवल लहराते लम्बे सफेद बालों, माथे पर के गोल लाल टीके, डिज़ाइनर किस्म की अधुनातन और पारंपरीण पोशाकों, दबंग और डपटते हुए जीवन-व्यवहार; उनकी ही ऊँचाई और वज़न के दूसरे कलाकारों की उपस्थिति, और बिलावजह हीनतर और लाभहानिपरक कामों में गाफ़िल रहने की हमारी चालाकियों और लापरवाहियों ने उनके कलात्मक अवदान के स्वीकार का रास्ता रोके रक्खा। इसीलिए उन पर क़ायदे से बात नहीं हो पाई। जिस हद तक उनका व्यक्तित्व उनका तबला बिक्री और उपभोग के उपलब्ध तंत्र के भीतर समा सकता है उस हद तक वह हमारे बीच बाकी तो हैं ही, जैसे अपने ही किसी यादगार प्रदर्शन की आॅडियो कैसेट की कवर फ़ोटो में - तबला बजाते हुए, सजेधजे, लगभग खिलखिलाते हुए। लेकिन सभ्यता का काम एकाध सुन्दर किस्म की तस्वीरों से नहीं चलता। उसे सम्पूर्ण और व्यापक चित्रमाला चाहिये। उसे सब लोग और ठोस स्मृतियाँ मिलकर बनाते हैं। इसी तरह गँवा दिये गये खजाने और स्वाहा हो चुके इंसानों को हम फिर से अर्जित कर लेते हैं। इसी तरह किशन महाराज जैसे लोग कभी मरते नहीं, हालाँकि उन्हें दुबारा पा लेने के सिलसिले में एक समाज को अपनी ज़िंदगी के दौरान हज़ार बार मरना पड़ता है।
तीन
म्यूज़िकोलाॅजिस्ट्स और बड़े संगीतकार उनके तबले का गुणगान करेंगे, या वे ऐसा नहीं भी कर सकते हैं। बहुत सी बारीक़ और तकनीकी बातें पोथियों में बंद कर दी जाएंगी। हम लेकिन प्रभाव में नहीं बह जाना चाहते बल्कि अपने भविष्य के लिये किशन महाराज के जीवन और उनकी कला को प्रासंगिक कर लेना चाहते हैं। यही उनके काम का असल अभिनंदन होगा। और तब प्रलाप या भक्ति के लिये विवश भी नहीं होना पड़ेगा।
चार
उनका तबला लगातार जनपदीयता के अविराम हो-हल्ले के बीच बजता रहा। उनके घर उनकी बैठक उनके छोटे से बगीचे में रियाज़ के दौरान बजते पुत्रों-पौत्रों-रिश्तेदारों-शिष्यों के तबलों के अलावा कोई एक तबला शहर-शहर करता हुआ भी बजता आया है। जब आप शहर में डूब जाते हैं, ख़़ुद उसी में गुम हो जाते हैं तो शहर भी अपनी राग-रागनियाँ, लयें, अपने समस्त स्पंदन किसी अदृश्य और गोपन पद्धति से आपको सौंप देता है। कलाकार के लिए इससे बड़ा वरदान कुछ नहीं है। किशन महाराज अपने पुरखों के पिछले तीन सौ सालों में अपनी ज़िंदगी जोड़ते हुए इस बुजुर्ग शहर में रहे और शहर ने अपनी विभूतियाँ उनके कानों में फुसफुसा दीं। अपने पड़ोस अपने मुहल्ले के भूगोल में वह पेड़ धूप बारिश और लोगों की तरह शामिल थे। किसी ने उन्हें अपने से भिन्न या ऊँचा नहीं पाया। जला हुआ ट्रांसफार्मर बदलवाने वाले, नलों में पानी न आने पर जलसंस्थान के आला अधिकारी को फ़ोन पर धमकाने वाले, मुहल्ले के आवारों को पुलिस से छुड़वाने वाले, भाई-भाई, सास-बहू, बाप-बेटों के झगड़े सलटाने वाले किशन महराज, हैरत है कि वहीं हैं जिनके बारे में विश्वविख्यात सितार वादक रविशंकर ने अपनी आत्मकथा में लिखा है कि वह ‘संसार के श्रेष्ठतम संगतकार’ हैं। उस्ताद बिस्मिल्ला ख़ाँ की सादगी के दूसरे सिरे पर किशन महाराज की रईसी और शौकीन तबीयत को रखना होगा। लेकिन उनका अभिजात्य भी जनसाधारण से विलग, धन-संपदा की लाठी पर टिकने वाला आभिजात्य नहीं था, बल्कि अर्थशास्त्र के शब्दों में कहा जाय तो एक निम्न मध्यवर्गीय, या, अधिक से अधिक, एक मध्यवर्गीय औदात्य था। या उनके अकूत आत्मिक वैभव का रंग - जो उनके आस-पास की वस्तुओं, जगहों और व्यक्तियों पर अहर्निश बिखरता रहता था। उनकी सक्रियताओं में हमारे सामूहिक चेतन और अवचेतन पर दस्तक दे रहे विकराल बेसुरेपन के प्रतिकार की आवाज़ हमेशा सुनी जा सकती है। शहर के एक नामी-गिरामी अंग्रेज़ी माध्यम प्राइवेट स्कूल के सांस्कृतिक कार्यक्रम के मौके पर तबले, वायलिन आदि दूसरे वाद्यों को कायदे से मिलाया नहीं गया था तो मुख्य अतिथि किशन महाराज को विपत्ति की तरह टूट पड़ना पड़ा। वे बोले थे कि आपका सारा तामझाम बेकार है, अगर आपके साज़ बेसुरे बज रहे हैं।
पाँच
जब समग्र अस्तित्व के साथ, पूरी भाव और बुद्धि ऊर्जा के साथ जीवन में शामिल हुआ जाय तो स्मृति कोई बाहरी वस्तु नहीं रह जाती। पचास साल पुरानी और पुरखों से सुनी हुई सौ-दो सौ साल पुरानी किसी बात को वह कल हुई घटना की तरह बताते थे। उन्हें इस राष्ट्र के अतीत के कई स्वर्णिम अध्याय अपनी सादा, निरलंकार और लगभग ग़लत भाषा में अनायास याद थे। उन्हें विस्मृत गायक और गुमशुदा नर्तकियाँ याद थीं। उन्हें बनारस के कोठे और कोठों की संस्कृति याद थी। उन्हें बनारस के नववयस्कों द्वारा इन कोठों पर सीखी जा रही तहज़ीब के किस्से याद थे। उन्हें ‘समाज सुधार’ के जोश में इन कोठों में आज़ाद भारत की सरकारों का किया गया विध्वंस याद था जो एक अर्थ में उपशास्त्रीय संगीत के ‘संस्थान’ का ध्वंस था। यह मानने के पर्याप्त कारण हैं कि ये तथ्य सिर्फ उन्हीं की याद में बाक़ी थे। इस तरह, उनकी मृत्यु के साथ ही इन विरल सांस्कृतिक सूचनाओं की भी अंतिम तौर पर मौत हो गई है। तबले और ज़िन्दगी को लेकर किये गये एक इंटरव्यू के दौरान यह पूछने पर कि तबला बजाने के दौरान उन्हें क्या-क्या याद आता है, उन्होंने कहा था कि अपने पुरखे भैरव सहाय की दाढ़ी उनकी निगाहों में लहराने लगती है। इस अभिराम विजु़अल को पढ़ लेने के बाद कईयों की चेतना में वह झब्बा लहराने लगा होगा।
छह
किशन महाराज एक लोक शिक्षक थे। उन्होंने कुमारबोस, संदीपदास, सुखविन्दर सिंह नामधारी और शुभशंकर सरीखे सामर्थ्यवान तबलावादकों की कई पीढ़ियाँ तैयार कीं। यूरोप और दक्षिण एशिया के अनेक छात्र वर्षों उनके सान्निध्य में रहकर दूसरे वाद्य भी सीखते आए हैं। इसके अलावा मुहल्ले के लड़कों को डपटकर अभ्यास करवाने का काम उन्होंने दशकों तक किया। विख्यात शास्त्रीय गायक राजन-साजन मिश्र बताते हैं कि गली में महाराज जी को आता देखकर वह लोग पलटकर भाग जाते थे और कहीं छिप जाते थे। संदीप दास और सुखविन्दर नामधारी सरीखे पटु शिष्यों के पास गुरूजी की सख़्ती के अनगिन संस्मरण हैं। इस कड़क अध्यापक का असर वृहत्तर तबला-संसार पर इतना ज़्यादा है कि देश दुनिया में फैले लगभग सभी तबलावादक दायें तबले पर चार उंगलियों की फटकार से ‘ता’ बजाने लगे हैं जो उनके पहले तक सिर्फ तर्जनी के ज़ोर से बजता आया था। यानी प्रत्येक तबलावादन में किशन महाराज की ईज़ाद और उनका अंदाज़ भी बज रहा है। मशहूर नर्तकी सितारा देवी का मानना है कि जाकिर हुसैन की शैली में भी किशन महाराज के प्रभाव पहचाने जा सकते हैं। अर्थात् इस रोदन की कोई गुंजाइश नहीं है कि उनके बाद उनकी परंपरा का क्या होगा। उनकी परंपरा अन्यान्य वर्तमानों और भविष्यों में पहले ही ढल गई है।
सात
आधुनिकता के पैमाने किशन महाराज नाम के आदमी और कलाकार को समझने में असहाय साबित होंगे। उनके चारों ओर मिथकों का जो आभामंडल है उसे पार करते हुए ही उनकी कला के मर्म तक पहुँचा जा सकता है। अन्यथा भटकन और अंधेरा ही मिलेगा। एक पिटा हुआ तरीका यह भी हो सकता है कि मूल्यांकन ठप कर दिया जाय, और पुष्प, धूप, नैवेद्य आदि के साथ उनकी आरती पर उतारू हो जाया जाय। यह सब बनारस से शुरू हो भी चुका है जो क्रमशः ज़ोर पकड़ेगा। लोग फ़लाँ चैराहे पर उनकी प्रतिमा लगाने के लिए हाहाकार करेंगे, फिर प्रतिमा की उपेक्षा पर हाहाकार करेंगे। कृतित्व को संगमरमर में कैद कर दिया जायेगा। भक्त उस विराट को नहीं संभाल सकते जिसे ज्ञान कहा जाता है। इसलिए बिल्कुल अभी से श्रद्धा से उलटी दिशा में यात्रा शुरू हो जानी चाहिए। बड़ा कलाकार बहुत से सवाल छोड़ जाता है और जैसा शुरू में कहा गया, उन सवालों के जवाब ढूढ़ने के लिए ज़िद्दी अनुसंधित्सुओं की ज़रूरत है। सवाल ज़ाहिर है कि कई हैं। क्यों उन्हें जींस-टी शर्ट जैसी आधुनातन पोशाकें तक पहनने का शौक था ? क्यों वह नगर के अधिकतर आयोजनों के स्थायी अध्यक्ष या मुख्य अतिथि थे ? उन्होंने जादू और पहलवानी जैसे आॅफ बीट चीज़ें क्यों सीखी थीं। सितारा देवी, गिरिजा देवी, राजन-साजन मिश्र की राह पर चलकर उन्होंने किसी बड़े शहर में आसन क्यों नहीं जमाया ? वह इतने स्वयं संपूर्ण थे तो हल्की-फुल्की तुकबंदियाँ करने और उन्हीं के दम पर स्वयं को कवि कहने-कहलवाने का शौक उन्हें कैसे पड़ा ?
आठ
ऐसे सवालों के जवाब उनके तबले में निहित हैं। उनके तबले को कभी न कभी उत्कृष्टतम लगाव के साथ रेशा-रेशा करना ही होगा। यह बात हमेशा याद रखने की है कि अगर किशन महाराज और उन जैसे कुछ और स्वतंत्रचेता दिमाग़ न होते तबला कमर में बंधा हुआ, इस देश की सड़कों और गलियों में घूम-भटककर बज रहा होता और शास्त्रीय संगीत के मंच पर होने पर भी वह एक हीनतर वाद्य, संगत का एक बाजा होता। वह मुख्य कलाकार के चरणों में लिपटा हुआ बजता रहता। बहुत हद तक किशन महाराज ने उसे एक स्वायत्त व्यक्तित्व, एक तिर्यक भंगिमा सौंपी है। इसके बाद सोलो वादन और संगत के तबले में जो भी परिवर्तन घटित हुए हैं, उनमें किशन जी की भी आभा है। यह जानना बेहद दिलचस्प है कि जिस दौर में अनोखेलाल और सामता प्रसाद जैसे उनके दिग्गज समकालीन उपलब्ध, हिट और समसंख्या वाले आसान तालों को, उनके कायदों-पल्टों-पेशकारों और तिहाइयों को विलक्षण परिष्कार के साथ साधते जा रहे थे, किशन महाराज विषम मात्रा वाले, विस्मृत, दुर्वह और अटपटे तालों, ऊबड़खाबड परनों, कटुता की सीमा तक पहुँची दबंग चक्करदार तिहाइयों और उद्धत लेकिन विश्वसनीय लयकारी की ओर गए। इन चीज़ों में एक कलाकार का दर्प बजता था। यह ‘कठिन’ की अखाड़ेबाजी थी। यह अकेला और अलोकप्रिय होना था। यह मधुरता के विमर्श का तिरस्कार था। यह अद्वितीय रचनाकार जयशंकर प्रसाद की कहानी ‘गुण्डा’ के नायक नन्हकू सिंह की गुण्डई का एक और संस्करण था। यह मुख्य धारा प्रवाह में अड़ जाने वाला हस्तक्षेप था। कुछ दिनों पहले हुए गंगा महोत्सव में शीर्ष संतूर वादक शिवकुमार शर्मा के साथ जुगलबंदी के दौरान उन्होंने संगत के सारे तरीक़ों को दरकिनार करते हुए एक लगभग आपत्तिजनक लेकिन बेहद दिलचस्प हरकत की। सोलह मात्रा, यानी तीन ताल में निबद्ध एक बंदिश शिवकुमार जी बजा रहे थे। अपनी बारी आने पर किशन जी हर बार भिन्न मात्रा की कोई ताल कभी चैदह मात्राओं का धमार, कभी दस मात्राओं का झपताल, कभी छः मात्राओं का दादरा, कभी आठ मात्राओं का कहरवा बजा देते। इससे सुनने में भयानक अड़चन हो रही थी हालांकि लयविज्ञ प्रसन्न भी हो रहे होंगे। इतना तय था कि सुनने का प्रचलित आनन्द समाप्त हो गया था और एक अदृश्य तनातनी शुरू हो गई थी। अपनी सीमित निगाह से मैंने संतूर-सिरमौर को किंचित् अवसन्न भी पाया था। ऐसी घटना को भूलना अक्षम्य है जिसमें हाशिया गरज-गरज कर कलानुभूति के परिप्रेक्ष्य को संशोधित प्रासंगिक और राजनीतिक बना रहा है।
नौ
शहर सभ्यताओं के आईने हैं। शहर में रहने वाले लोग भी शहर होते हैं। शहर की ख़ासियतें उसकी तकलीफें उसका पिछड़ापन उसके नागरिक में छन जाती है। किशन महाराज प्रमाण हैं। वे दूसरे लोगों से, दूसरे कलाकारों से भिन्न नज़र आते हैं। दबंग और गपबाज़ और परवाह न करने वाले। लेकिन क्या इसलिए उन्हें खारिज कर देना चाहिए। उन्हें स्कूली शिक्षा नहीं मिली थी और भाषाओं की बुनियादी तालीम घर पर ही दिला दी गई थी। उनके व्यक्तित्व में आधुनिकताजन्य आकर्षण कम से कम थे। इसलिए भी उनसे प्रभावित लोगों की संख्या दूसरे लोगों की अपेक्षा कहीं कम है। पत्रकारों और दूसरे प्रश्नकर्ताओं के लिए वह कत्तई कोमल नहीं थे। एक इंटरव्यू के पहले मुझे डपटते हुए उन्होंने कहा था कि पहले के साक्षात्कारों में पूछा गया कोई सवाल मत पूछना, नहीं तो यह बातचीत वहीं ख़त्म हो जायेगी। ऐसे व्यक्ति को बहुत दूर तक अनुकूलित नहीं किया जा सकता। जिस ‘विनम्रता’ या ‘सौजन्य’ की उम्मीद प्रतिष्ठानों को कलाकारों से रहती है, वह उनमें नदारद थी। इसी वजह से उनपर प्रहार किए गए। तब के मानव संसाधन मंत्री मुरली मनोहर जोशी की अध्यक्षता में हुई एक स्थानीय गोष्ठी में उन्होंने केवल इतना कहा था कि सरकारों को राजकीय सम्मानों के लिए कलाकारों का चयन करते समय अनुभव और वरिष्ठता का आदर करना चाहिए। सनसनीखेज पत्रकारिता की मर्मशून्य ख़बरों में इस तथ्य को इस तरह पेश किया गया मानो किशन महाराज अपने लिए भारतरत्न की माँग कर रहे हों, और जैसा कि ऐसे प्रसंगों में होता है, कुछ सच्चरित्र लोग उनकी इस ‘माँग’ की भर्त्सना करने लगे। कुछ ही दिनों में प्रचार माध्यमों का यह झूठ विकराल हो गया और पढ़ेलिखे लोग चपेट में आ गए। निर्दोष कलाकार को बेवजह अवमूल्यित होना पड़ा।
दस
दरअसल किशन महाराज जैसे लोगों को पहचानने के लिए सभ्यता को समझने की एक महत्वाकांक्षी बौद्धिक परियोजना की दरकार है। इतनी लीला करने वाले व्यक्ति को ऊपर से और आसानी से नहीं जाना जा सकता। उन्होंने बहुत से भ्रम खड़े कर दिये थे। उनके कपड़े-लत्ते अगर फैशन के मुताबिक थे तो उन कपड़ों के भीतर का शरीर एक पहलवान का था और दिमाग़ एक ख़ालिस स्थानीय का। वह दूर तक सोचने वाले आदमी नहीं थे और भीतर के किसी तत्काल की ताक़त पर चलते थे। वह स्वयं को कभी गम्भीरता से नहीं लेते थे और ऐसा करने वालों को नकली मानते थे।
व्योमेश शुक्ल
वह एक थकी हुई तहज़ीब के प्रतिनिधि चरित्र थे। किशन महाराज की मृत्यु यह मान लेने का सही अवसर है कि जातीयता के वास्तविक स्त्रोतों की ईमानदार पहचान और उस पहचान की सैद्धान्तिकी के निर्माण के बग़ैर उनके जैसा आदमी और कलाकार अन्ततः अपरिचित रह जाएगा।

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सर गणेश दत्त