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Wednesday, 14 September 2022

कीर्तिगान उपन्यास हमारे समाज में जारी साम्प्रदायिक उन्माद और फ़ासिस्ट राजनीति को साहित्य की ओर से दिया हुआ जवाब है :कृष्ण मोहन

'कीर्तिगान' चंदन पांडेय का दूसरा उपन्यास है। इससे पहले 'वैधानिक गल्प' में उन्होंने एक ऐसे युवा मुस्लिम अध्यापक रफ़ीक की कहानी बयान की थी, जो लोकचेतना को जगाने वाले नाटकों को अपने विद्यार्थियों के साथ तैयार करके उनका प्रदर्शन करता है। इस प्रक्रिया में वह स्थानीय शक्तिशाली सामाजिक समूहों और निहित स्वार्थों को खटकने लगता है, जो बदलते हुए समय के साथ कथित धर्मनिरपेक्ष राजनीति को तिलांजलि देकर साम्प्रदायिक राजनीति के उभार के दौर में बढ़ चढ़ कर उसकी अगुवाई करने में लगे हुए हैं। एक निर्णायक प्रदर्शन से पहले रफ़ीक और उसकी टीम की सदस्य एक छात्रा अचानक गायब हो जाते हैं। उस छात्रा से जोड़कर उसके ग़ायब होने की अनेक व्याख्याएँ समाज मे फैला दी जाती हैं, जिनपर विश्वास करने को हमारा समाज मानो तैयार बैठा रहता है। उसकी पत्नी का मित्र, एक लेखक जब उसकी खोज में उतरता है तो उसके सामने रफ़ीक के सहयोगी अध्यापकों से लेकर पुलिस, दंगाई समूहों, राजनेताओं और सोशल मीडिया तक के गठजोड़ का दृश्य धीरे धीरे उभरता है।

यह उपन्यास हिंदी जगत में एक परिघटना की तरह आया और अत्यंत चर्चित और प्रशंसित हुआ। इसके पीछे वजह यही थी कि हमारे समाज के मौजूदा दौर में ज़मीनी स्तर पर चलने वाली साम्प्रदायिक ध्रुवीकरण की प्रक्रिया और उसको संचालित करने वाले निहित स्वार्थों की कार्यप्रणाली को कथा-साहित्य में पहली बार विश्वसनीय और कलात्मक ढंग से चित्रित किया जा सका था। साहित्य के पाठकों ने अपने ज्ञान से अधिक अपनी संवेदना से इस चुनौतीपूर्ण कथा की रचना में आने वाले कलात्मक जोख़िम को महसूस किया था।

बहरहाल, लेखक का अगला उपन्यास 'कीर्तिगान' इस मामले में एक बहुत बड़ी लकीर खींचता हुआ दिखाई पड़ता है। 'वैधानिक गल्प' में मॉब लिंचिंग की भूमिका-सी बनती है और एकाध इसके प्रयास भी होते हैं, लेकिन उसकी कथा प्रायः समाज की ऊपरी सतह पर जारी सॉफिस्टिकेशन के पाखंड को अनावृत करती है। इस अगले उपन्यास में हमारे समाज का यह लोमहर्षक यथार्थ  अपने सर्वग्रासी अंदाज़ में प्रकट होता है। अपनी आँखों के सामने सतत जारी इस हत्यारे सिलसिले को कला-रचना में ढालने का फ़ैसला करना एक अकल्पनीय चुनौती को आमंत्रित करने जैसा था। हिंदी-उर्दू के कथा-साहित्य में एक मंटो को छोड़कर दूसरा कोई नाम याद नहीं आता जिसने समाज में जारी ऐसे पाखंड और पागलपन की विकराल विभीषिका को, उसकी मनोवैज्ञानिक, सामाजिक और ऐतिहासिक गहराई में जाकर, कलात्मक ढंग से प्रस्तुत करने की चुनौती स्वीकार की हो। लेखक ने न केवल इसे स्वीकार किया है बल्कि बहुत बड़ी हद तक इसे सफलतापूर्वक निभाया है। इसका अर्थ है कि इस भीषण यथार्थ के सतही आयामों तक सीमित होकर नहीं, बल्कि इसके गहन आंतरिक आयामों का स्पर्श करते हुए कथा को बुद्धि-संवेदना-गम्य बनाया है। मेरी नज़र में यह एक हैरतअंगेज़ कारनामा है जो हमारे कथा-साहित्य में संभव हुआ है। उपन्यास अभी आया ही है, इसलिए इसकी विषयवस्तु के बारे में और कुछ कहना अभी उचित नहीं है। मैं यही कह सकता हूँ कि यह उपन्यास हमारे समाज में जारी साम्प्रदायिक उन्माद और फ़ासिस्ट राजनीति को साहित्य की ओर से दिया हुआ जवाब है। यह हमारी इस समझ को बल देता है कि रात जितनी ही अँधेरी और काली होती है, उसके सुबह में बदलने की संभावना उतनी ही निकट होती है।

अपूर्वानन्द की किताब 'सुंदर का स्वप्न' : कृष्ण मोहन

#सुंदर_का_सत्य

अपूर्वानन्द की किताब 'सुंदर का स्वप्न'

सचाई जब कड़वी हो जाती है, तो शासकवर्गीय विचारक सौंदर्य के पैमानों पर बहस छेड़ते हैं, और सत्य को व्यक्त करने के आग्रह पर कुढ़ने लगते हैं। जब उस सचाई को कला में ढालकर पेश किया जाता है तो वे उससे नाक़ाबिले बर्दाश्त होने की मांग करते हैं, और ऐसा न होने को कला की असफलता कहते हैं। असल में ऐसे विचारक रंगे सियार की तरह होते हैं, जो सत्ता के विरोधी होने का स्वांग भरते हैं, लेकिन जब भी मुँह खोलते हैं तो अपनी असलियत उजागर कर देते हैं। समय-समय पर इनकी चर्चा करनी पड़ती है, ताकि लेखकों की इस प्रजाति को पहचानना हम भूल न जाएं।

आधुनिक युग में सौन्दर्यशास्त्र के अस्तित्व में आने की एक दिलचस्प वजह बताते हुए अपूर्वानन्द अपनी किताब 'सुन्दर का स्वप्न' (वाणी प्रकाशन) के आरम्भिक पृष्ठों पर कहते हैं– "हम देखते हैं कि प्रायः हर समय शासक वर्गों के प्रत्यक्ष या परोक्ष प्रोत्साहन पर सर्वसम्मति का एक स्तर खोजने की कोशिश चलती रहती है।... सौन्दर्यानुभूति के इस स्तर से गुजरकर ही किसी भी राजनीतिक या सामाजिक व्यवस्था का तर्क मान्यता प्राप्त करने में सफल होता है।... अर्थशास्त्र और नीतिशास्त्र की दुनिया अमूर्त तर्कों से अलग अनुभूति का एक सम्पूर्ण लोक है, जिसे समझना किसी सामाजिक व्यवस्था की आवश्यकता है। अठारहवीं सदी के यूरोपीय दार्शनिक अनुभूति के उस लोक का अपना तर्कशास्त्र गढ़ने की जरूरत महसूस करने लगे जो मानवीय चिन्तन द्वारा निर्मित नीतिशास्त्र, राजनीतिशास्त्र या तर्कशास्त्र से अलग अस्तित्व रखता हो। इसी प्रयास में सौन्दर्यशास्त्र का जन्म हुआ।" (पृ. 18-19)

लेकिन विकास के क्रम में सिक्के का दूसरा पहलू भी सामने आता है-- "सौन्दर्यशास्त्र ने अठारहवीं सदी में जहाँ एक नई सामाजिक-आर्थिक शक्ति के औचित्य के लिए आधार प्रस्तुत किया, वहीं आगे चलकर उसकी क्रूरता से विद्रोह किया, उसके असली चेहरे को बेनकाब किया और यह बताया कि एक ऐसा क्षेत्र बचा हुआ है जहाँ मनुष्य अपनी रचनात्मकता की शक्ति के साथ उस व्यवस्था का मुकाबला कर सकता है।" (पृ. 29)

बुनियादी तौर पर सौन्दर्य के शास्त्र के निर्माण या विवेचन का कोई भी प्रयास इन्हीं दोनों दिशाओं में से किसी एक के निकट होगा। इस किताब के उपशीर्षक में इसे मार्क्सवादी सौन्दर्य-दृष्टि से सम्बन्धित माना गया है, इसलिए इस परिप्रेक्ष्य में भी इसकी जाँच-परख अनिवार्य है। कुल मिलाकर सौन्दर्य को परिभाषित करने के इस आग्रह की राजनीति क्या है और यह स्वयं सौन्दर्य की कसौटी पर कितना खरा उतरा है, यही इस लेख का विषय है।

मार्क्सवादी सौन्दर्य-चेतना का पुनरुद्धार करने के क्रम में लेखक के हाथ एक अत्यन्त मौलिक सूत्र लगा है जिसे वह इन शब्दों में प्रस्तुत करता है- "मार्क्स और एंगेल्स की रचनाओं को आत्मीयता से पढ़नेवाला व्यकि यह देखे बिना नहीं रह सकता कि उनके आदर्श मानवीय जीवन का लक्ष्य जितना सत्य की प्राप्ति नहीं, सुख, आनन्द या लोगों की भलाई है।" (पृ. 37) मार्क्स को इस किताब में किसी सौन्दर्यशास्त्री जैसे उच्चतर आसन पर प्रतिष्ठित किया गया है क्योंकि उनका पूरा प्रयास मानवीय श्रम को पूंजीवादी उपयोगितावाद की अनिवार्यता से मुक्त कराकर उसे सुख और आनन्द की ऐच्छिकता के हवाले करता है और इस प्रकार पूंजीवादी उत्पादन पद्धति में अजनबियत का शिकार होकर गुम हो गए मानव-व्यक्तित्व को उसे वापस करता है। पूर्णता और सौन्दर्य का यह लक्ष्य निश्चय ही मार्क्स के बुनियादी लक्ष्यों में से एक है, लेकिन अपूर्वानन्द के विश्लेषण में मार्क्स को यह श्रेय महंगे दामों मिलता है। उसके लिए उन्हें सबसे पहले सत्य की भारी कीमत चुकानी पड़ती है। उपयुक्त उद्धरण में सुख या आनन्द, जिसे किताब में प्रायः सौन्दर्य के पर्याय के रूप में व्यवहृत किया गया है और लोगों की भलाई यानी लोककल्याण एक तरफ है और सत्य दूसरी तरफ। यह खेमेबन्दी रणनीतिक है जिसका रहस्य आगे चलकर खुलता है।

भारतीय परम्परा में सत्य और शिव को सुन्दर से अभिन्न माना गया है, लेकिन यहाँ अगर वे अलग-अलग दिखते हैं तो यह अकारण नहीं है। 'सच्चे' सौन्दर्य की स्थापना सत्य के मानमर्दन के बगैर नहीं हो सकती। साहित्य और कला के क्षेत्र में, जिसे सौन्दर्यशास्त्र का विशिष्ट क्षेत्र माना गया है, सत्य को अंतर्वस्तु तथा सौन्दर्य को रूप के द्वारा पहचाना जाता है। अन्तर्वस्तु की अवहेलना करके रूप के महत्व पर आत्यंतिक जोर देनेवाले विचार, रूपवाद का समर्थन करने के लिए बहुत खोजबीन कर मार्क्स की निम्नलिखित गवाही जुटाई गई है। रूपवाद को मार्क्सवाद का शत्रु घोषित करने और तमाम तथाकथित गैरयथार्थवादियों की आलोचना करनेवाले अगर मार्क्स के इस उद्धरण को देखें तो उन्हें अपनी गलती का अहसास शायद हो सके-- "सत्य में सबका साझा होता है- यह मेरी मिल्कियत नहीं है। इस पर हर किसी का हक है। मुझ पर वह नियन्त्रण रखता है। मैं उसे नियन्त्रित नहीं करता, मेरी सम्पत्ति बस रूप ही है-- यानी मेरी मानसिक और बौद्धिक विशिष्टता।" (वही, पृ. 47 )

मार्क्स के इस कथन से रूपवाद को तो शायद ही कोई राहत मिल सके, हाँ सत्य के प्रति उनकी प्रतिबद्धता का पता अवश्य चल जाता है। अपने इतने उत्साही समर्थकों के प्रयासों पर मार्क्स की ऐसी ठंडी प्रतिक्रिया देखकर उनके एक समकालीन मिर्ज़ा ग़ालिब होते तो कहते:

'शौक हर रंग रक़ीबे सरो सामां निकला 
क़ैस तस्वीर के पर्दे में भी उरियाँ निकला'

मज़े की बात यह है कि लेखक अपनी उपलब्धि का श्रेय ख़ुद लेने में संकोच करता है और अत्यंत उदारतापूर्वक उसे पूँजीवाद को प्रदान कर देता है– "पूँजीवादी समाज में सत्य और सुन्दर अलग-अलग हैं, वे अलग-अलग मूल्य हैं। पूँजीवादी व्यवस्था में जो सत्य है, वह सुन्दर नहीं क्योंकि मानवीयता से रहित हुए बिना सच का सामना
नहीं किया जा सकता।" (पृ. 55) जाहिर है कि यह विलक्षण पूंजीवाद 'मानवीयता' को 'सत्य' से अलगाकर 'सुन्दर' के साथ जोड़ देता है जिससे दोनों के बीच मूल्यगत अलगाव पैदा हो जाता है। पूँजीवाद यह कैसे करता है, इसका मर्मस्पर्शी वर्णन देखें-- "इसी लिहाज से यह मान लिया जाता है कि सत्य का अनुधावन तो विज्ञान का काम है, लेकिन सौन्दर्य कला का लक्ष्य होता है। सत्य और सुन्दर के बीच जो सख्त अलगाव माना जाता है, उसकी वजह यह है कि सौन्दर्य-भावना का मानवीय आकांक्षाओं की पूर्ति से सम्बन्ध है जबकि इस समाज में जो वस्तुनिष्ठ सत्य है, वह अनेक बार इस मानवीय अभिलाषा के विपरीत, उसे कुचलते हुए अपनी सत्ता स्थापित करता है। इसीलिए पूँजीवाद की खासियत है कि यथार्थलोक में जो अभिलाषाएँ पूरी नहीं हो सकतीं, उनकी पूर्ति के लिए वह एक कल्पना लोक का निर्माण करता है और जनसामान्य को उसमें सन्तुष्टि हासिल करने को प्रेरित करता है। इस प्रकार सौन्दर्य - भावना की प्रबलता की जाँच मनुष्य को अधिक से अधिक यथार्थ-विस्मृत करने या अचेत बनाने की उसकी क्षमता से की जाती है।" (वही)

इस उद्धरण से किसी को भी यह भ्रम हो सकता है कि लेखक पूँजीवाद की इन कारस्तानियों असन्तुष्ट है, लेकिन वह तो इनकी पुष्टि के लिए मार्क्सवादी तर्कों की तलाश में है। पहले जैसे उसने मार्क्स को उद्धृत किया था, उसी तरह अब क्रिस्टोफर कॉडवेल को उद्धृत करते हुए 'सुन्दर' को समाज से काटने की जुगत भिड़ाता है। कॉडवेल कहते हैं कि "सौन्दर्य में बदलाव का कारण समाज है, उसी की वजह से नए सौन्दर्य का भी जन्म होता है। सौन्दर्य जिस वस्तुनिष्ठ परिवेश में अवस्थित होता है वह प्राकृतिक से ज्यादा सामाजिक है। यानी सौन्दर्य का निर्धारण दूसरे असौन्दर्यात्मक गुणों के द्वारा होता है और वे ही इसके अस्तित्व में आने और फिर विलीन हो जाने, इसके अन्दर तब्दीली का और इसके विकास का कारण बता सकते हैं... ये समाज वैज्ञानिक शक्तियाँ हैं।... ये समाज वैज्ञानिक गुण सौन्दर्यात्मक नहीं हैं: सौन्दर्यशास्त्र का एक अलग ही क्षेत्र है।" (वही, पृ. 56)

कॉडवेल के इस वक्तव्य से पता चलता है कि सौन्दर्य का आधार समाज है, वही उसमें परिवर्तन और विकास का कारण है, लेकिन उसकी व्याख्या के नियम समाज की व्याख्या के नियमों से अलग होंगे। कला का गतिविज्ञान सामाजिक गतिविज्ञान से अलग है; इससे लेखक यह निष्कर्ष निकालता है कि, "सौन्दर्यशास्त्र को बलपूर्वक समाजशास्त्र से अलग करने के उनके आग्रह को कभी भी नजरअन्दाज नहीं किया जाना चाहिए।" इसी तरह 'कला के तर्कशास्त्र' की व्याख्या करते हुए कॉडवेल तर्कणापरक के बजाय सौन्दर्यात्मक विश्वदृष्टि की आवश्यकता बताते हुए तर्कणापरक को 'वैज्ञानिक' (इनवर्टेड कामा लगाकर किसी विशिष्ट अर्थ में) कहते हैं। अपूर्वानन्द इससे झट निष्कर्ष निकाल लेते हैं कि 'वैज्ञानिकता को सौन्दर्यात्मकता के बर-अक्स खड़ा करके कॉडवेल कला के अपने तर्कशास्त्र, यानी सौन्दर्यशास्त्र की विशिष्टिता को चिह्नित करते हैं।"

यहाँ कॉडवेल के विचारों की विवेचना का अवकाश नहीं है, लेकिन अपूर्वानन्द मार्क्स से लेकर कॉडवेल तक के वक्तव्यों से 'बलपूर्वक' वे सारे निष्कर्ष निकालते हैं जिसकी ज़िम्मेदारी उन्होंने पूँजीवाद पर डाली थी। इस प्रकार उन्होंने सौन्दर्य को अपने ही शब्दों में 'अधिक से अधिक यथार्थ-विस्मृत या अचेत बनाने की क्षमता' से सम्पन्न कर लिया। उनकी योजना बिल्कुल स्पष्ट है, हालाँकि उसे छिपाने के लिए उन्होंने ढेरों मार्क्सवादी पापड़ बेले हैं।

आन्तरिक संगति, सामंजस्य, लय और एकता सौन्दर्य के सम्भवत: सर्वाधिक पहचाने गए अवयवों में से कुछ एक हैं। लेकिन इस किताब में वर्णित सौन्दर्य हमेशा किसी न किसी का मुकाबला करते, उसे अपदस्थ करते हुए आता है। पहले उसने मनुष्यता को साथ लेकर सत्य को पछाड़ा, फिर भावना को साथ लेकर विचार को अपदस्थ करने की योजना बनाई। सन्दर्भ से कटे हुए उद्धरणों की कमज़ोर नींव पर खड़ा होने के कारण पहले की तरह ही इस उपलब्धि का श्रेय लेने का साहस भी लेखक नहीं कर सका और निहायत सादगी के साथ इसका जिम्मा एक बार फिर उसने पूँजीवाद के सिर मढ़ लिया। रिंद के रिंद रहे हाथ से जन्नत न गई। मुलाहजा फरमाएं– "भारतीय पूँजीवाद का विकास इस स्तर तक हो चुका था, जहाँ जाकर वह मानवीय व्यक्तित्व के पूर्ण विकास के उन वायदों के खिलाफ काम करता हुआ दिखाई देने लगा था, जो अपने आरम्भिक काल में उसने किए थे। भारतीय मनुष्य के भावलोक और विचारलोक में एक दरार-सी पड़ गई थी और यह अहसास तेज हो गया था कि यह विकास सहज मानवीय भावनाओं को कुचलकर आगे बढ़ रहा है।" (पृ. 92)

यहाँ ग़ौरतलब है कि भावलोक और विचारलोक में दरार डालनेवाला पूँजीवाद सिर्फ़ भावनाओं को कुचलकर आगे बढ़ रहा है। संकेत साफ है, विचारों पर पूँजीवाद के समर्थन का आग्रह। इस प्रकार पूँजीवाद को दोषी ठहराने वाली भंगिमा में दरअसल उसके द्वारा डाली गई फाँक को और गहरा किया जा रहा है और उसी के आधार पर अपनी रणनीति को व्यवस्थित किया जा रहा है। इस बार आचार्य शुक्ल 'आत्मीयता' से भरी व्याख्या के शिकार बनते हैं– 'अपनी भाषा पर विचार' शीर्षक अपने निबन्ध में वे लिखते हैं "भाषा का प्रयोग मन में आई हुई भावनाओं को प्रदर्शित करने के लिए होता है।" इसके बाद आचार्य शुक्ल भावनाओं को विचारों से अलगाते हुए उसे रेखांकित करते हैं। लेखक का निष्कर्ष है– "भाषा को विचारों की जगह भावनाओं की अभिव्यक्ति का माध्यम मानने पर शुक्लजी का बल एक नई दृष्टि का परिचायक है। जिस तरह पाश्चात्य दर्शन में सौन्दर्यशास्त्र का विकास ऐन्द्रिय संवेदन पर बल देने के कारण हुआ उसी प्रकार शुक्लजी का सम्पूर्ण साहित्य-चिन्तन 'भावनाओं' को केन्द्र में रखकर होता है।" (पृ. 92)

इस मासूम से दिखनेवाले निष्कर्ष में एक तीर से दो शिकार किए गए हैं। एक तरफ विचारों को शुक्लजी के चिन्तन में हाशिए पर धकेला गया है, तो दूसरी तरफ ऐन्द्रिय संवेदन को पश्चिम की राह दिखाई गई है। फिर भी एक सवाल उठता है कि अगर भावना विचारों से इतनी अलग है और भाषा में उसी की अभिव्यक्ति होती है तो स्वयं शुक्लजी भाषा में किस चीज को व्यक्त कर रहे थे और क्या यह उचित न होगा कि उन्हें विचारक की भ्रामक श्रेणी से हटाकर भावक (या भावुक!) की समुचित कोटि में स्थापित कर दिया जाए। इसका उत्तर पाने के लिए आइए एक बार शुक्लजी के उस स्पष्टीकरण को भी देखें जिससे लेखक ने उक्त निष्कर्ष निकाला है– "स्मरण रखिए यह बात मैंने भावनाओं (Impressions) के विषय में कही है, विचारों (General notion) के विषय में नहीं।" (वही)

ऐसा लगता है कि शुक्लजी को अपने विचारों के अन्यथाकरण की कुछ आशंका थी, इसीलिए उन्होंने अपने शब्दों के साथ अंग्रेजी पर्यायों को भी देना ज़रूरी समझा। अंग्रेजी के 'इम्प्रेशन' का सबसे प्रचलित अर्थ 'प्रभाव' है जो वैचारिक भी हो सकता है। यहाँ तक कि उसका एक अर्थ स्वयं 'विचार' या 'नोशन' भी है। शुक्लजी के दिमाग में ये सारे अर्थ थे, इसीलिए उन्होंने 'नोशन' के साथ 'जनरल' लगाया, यानी सामान्य, आमफ़हम विचार। इससे अलग 'इम्प्रेशन' या 'भावना' को वह अभिव्यक्तिकर्ता की विशिष्ट मनोभूमि से जोड़ना चाहते थे। भाषा में अभिव्यक्ति की विशिष्टता से सम्बन्धित उनके इस कथन को मार्क्स के उस पूर्वोक्त वक्तव्य से जोड़कर देखा जा सकता है जिसे लेखक ने रूपवाद का समर्थन करने के लिए उद्धृत किया था। आचार्य शुक्ल ने ही कहीं कहा है कि सत्य सबका एक होता है और झूठ सबके अलग-अलग होते हैं। प्रत्यक्षं किं प्रमाणम्।

आचार्य शुक्ल के विचार इस विषय में पर्याप्त स्पष्ट हैं। स्वयं लेखक ने उनके जो उद्धरण दिए हैं, उनसे भी यह बात साफ हो जाती है। 'भाव या मनोविकार' शीर्षक लेख का एक उद्धरण देखें– "नाना विषयों के बोध का विधान होने पर ही उनसे सम्बन्ध रखनेवाली इच्छा की अनेकरूपता के अनुसार अनुभूति के भिन्न-भिन्न योग संघटित होते हैं जो भाव या मनोविकार कहलाते हैं।" ज़ाहिर है कि बोध की बुनियाद पर ही इच्छा और अनुभूति के रास्ते भावों का गठन होता है। यह बोध गहरे पानी पैठकर किए जानेवाले मन्थन से आता है। विचार तो उन लहरों की तरह हैं जो इस मन्थन से पैदा होते हैं। कुछ लोगों को साहित्य में इन्हीं विचारों से तकलीफ़ होती है। दरअसल यह तकलीफ़ बोध और चेतना से है। वे साहित्य को विचारों से 'इन्सुलेट' करके 'शुद्ध' बनाना चाहते हैं ताकि वह 'मनुष्य को अधिक से अधिक यथार्थ-विस्मृत या अचेत' कर सके।

आचार्य शुक्ल न केवल बुद्धि और हृदय की भूमिकाओं की विशिष्टता को समझते और उसकी रक्षा करते हैं, बल्कि सभ्यता के विकास के साथ साहित्य - व्यापार में बुद्धि की भूमिका को बढ़ाने के आग्रही हैं। 'कविता क्या है' शीर्षक निबन्ध से उद्धृत यह वक्तव्य देखें--"ज्यों-ज्यों सभ्यता बढ़ती जाएगी.. मनुष्य के हृदय की वृत्तियों से सीधा सम्बन्ध रखनेवाले रूपों और व्यापारों को प्रत्यक्ष करने के लिए उसे बहुत से परदों को हटाना पड़ेगा। ज्यों-ज्यों हमारी वृत्तियों पर सभ्यता के नए-नए आवरण चढ़ते जाएँगे त्यों-त्यों एक ओर तो कविता की आवश्यकता बढ़ती जाएगी, दूसरी ओर कवि-कर्म कठिन होता जाएगा।... आरम्भ में मनुष्य जाति की चेतना सत्ता इंद्रियज ज्ञान की समष्टि के रूप में ही अधिकतर रही। अब मनुष्य का ज्ञान-क्षेत्र बुद्धि व्यवसायात्मक या विचारात्मक होकर विस्तृत हो गया है। अत: उसके विस्तार के साथ हमें अपने हृदय का विस्तार भी बढ़ाना होगा।" (वही, पृ. 100 )

कहना न होगा कि इन स्थितियों में विचारों के अवमूल्यन की कोई भी प्रवृत्ति 'भावना' के नाम पर मूलवृत्तियों और संवेगों की तरफ़ ही जाएगी और इस उलटी यात्रा से न तो साहित्य का कोई भला होगा, न सौन्दर्य का।

शुक्लजी के विचारों की मनचाही व्याख्या कर चुकने के बाद लेखक एक बार फिर मार्क्सवाद के समर्थन में ज़मीन-आसमान के कुलाबे मिलाता है और हिन्दी के मार्क्सवादी लेखकों का कुछ इस उत्साह से समर्थन करता है कि मन आशंकित हो उठता है। ख़ासतौर पर मुक्तिबोध को जब वह मार्क्सवादी सौन्दर्य-मूल्यों के लिए संघर्षरत योद्धा के रूप में चित्रित करता है और उनके सुपरिचित विचारों का परिचय अनपेक्षित विस्तार से देने लगता है तब यह आभास हो जाता है कि इसी विवरण के बीच कहीं कोई गाँठ ऐसी लगी होगी जिससे आगे चलकर मुक्तिबोध की 'मुक्ति' का ऐलान भी सम्भव हो सकेगा। उस गाँठ की तलाश भूसे के ढेर में सुई ढूँढ़ने जैसी थी। समूचे लेख से गुज़रने के बाद पता चला कि लेखक ने हाथ-पाँव तो बहुत मारा, मुक्तिबोध के विचारों में कोई ऐसा बिन्दु नहीं मिला जहाँ सूराख हो पाता। इसी खीज का नतीजा अन्त में जाकर इस आरोप में निकला-- "लेकिन यह भी सही है कि एकाधिक स्थल पर, अपनी व्यावहारिक समीक्षाओं और आलोचनाओं में मुक्तिबोध स्वयं एक विशेष प्रकार की सौन्दर्याभिरुचि के दायरे में घुसते नजर आते हैं। और प्रायः वे रचनाओं के विचार पक्ष या नैतिक अन्तर्वस्तु पर ही अधिक ध्यान केन्द्रित करते हैं" (वही, पृ. 158)।

इस आरोप की पुष्टि के लिए लेखक मुक्तिबोध के 'कामायनी : एक पुनर्विचार' के कुछ उद्धरणों का सहारा लेता है– " 'कामायनी' में व्यक्त विचारधारा को स्पष्ट तौर पर अस्वीकार करते हुए वे यह कहते हैं कि 'साहित्यिक सौन्दर्य के बारे में दो मत नहीं हो सकते।' लेकिन वे यह भी कहते हैं कि 'भावना या प्रभावोत्पादकता वह कसौटी नहीं है, जिससे हम जीवन के प्रति कवि-दृष्टि के औचित्य या अनौचित्य की जाँच कर सकें। कभी-कभी होता यह है कि भावना की रसात्मकता वस्तु-तत्त्व के अनौचित्य को ढाँक लेती है।' इन वाक्यों से यह निष्कर्ष निकालना बहुत गलत न होगा कि रचना में व्यक्त विचारधारा और उसकी कलात्मक प्रभावोत्पादकता, मुक्तिबोध के अनुसार, दो एकदम अलग-अलग चीजें हैं। किसी भी कलाकृति में व्यक्त विचारधारा वास्तव में एक सौन्दर्यात्मक समस्या है और उसके प्रभाव से उसका गहरा सम्बन्ध है। फिर यह कहना कहाँ तक उचित है कि कलात्मक सौन्दर्य का विश्लेषण एक अलग काम है और अन्तर्वस्तु का विश्लेषण जो कि विचारों से सम्बन्धित होता है, एक अलग काम है?" (वही)

यहाँ विचार और भावना यानी अन्तर्वस्तु और सौन्दर्य की एकता और अखंडता का नारा लगानेवाले अपूर्वानन्द का मार्क्स, कॉडवेल और आचार्य शुक्ल के सन्दर्भ में इन्हें अलग-अलग करना और एक की क़ीमत पर दूसरे को स्थापित करने के लिए एड़ी-चोटी का ज़ोर लगाना हम पहले ही देख चुके हैं। मुक्तिबोध ने जब इनके जैसे 'सच्चे सौन्दर्यशास्त्रियों' के मर्मस्थल पर चोट कर दी तो इन्हें एकता याद आने लगी। कहाँ तो विचार और भावना का अलगाव 'एक नई दृष्टि का परिचायक' नज़र आ रहा था और कहाँ अब दोनों का अलग-अलग विश्लेषण भी भारी गुज़र रहा है। उन्हें यह याद दिलाना तो गुस्ताख़ी ही होगी कि रूप और अन्तर्वस्तु में द्वन्द्वात्मक एकता होती है और कृति के समग्र मूल्यांकन के लिए उसके अवयवों का विश्लेषण करने के बाद ही संश्लेषण की क्रिया सम्पन्न होती है। रचना सुन्दर होकर भी नुकसानदेह हो सकती है। बकौल तुलसी–- 'विष रसभरा कनक घट जैसे'। स्वयं लेखक भी, मुक्तिबोध की ही तरह, सौन्दर्य की अचेतनकारी भूमिका की चर्चा कर चुका है, लेकिन संगति की अपेक्षा करना ही सम्भवतः उसके साथ ज़्यादती है।

कुल मिलाकर यह किताब तमाम देशी और विदेशी लेखकों के उद्धरणों और उनकी उबाऊ व्याख्याओं को बटोरकर हिन्दी में शास्त्र-निर्माण के नाम पर चलनेवाले कुंजी-लेखन का अच्छा नमूना है। इसका जो भी महत्व है वह इसमें सावधानीपूर्वक गूंथे गए मन्तव्यों के कारण है, जिनका थोड़ा परिचय यहाँ दे दिया गया है। इन विचारों का व्यावहारिक प्रयोग शमशेर की कविता पर जिस हल्के ढंग से किया गया है वह अपने आत्मविश्वास के कारण हास्यास्पद है। शमशेर की कविता के बारे में इससे शायद ही कोई अन्तर्दृष्टि मिलती है। हाँ, कवि के ही शब्दों और उनके शब्दकोषीय अर्थों के सहारे उनकी व्याख्या का छद्म ज़रूर रचा गया है, जिसकी परिणति प्रायः गूँगे के गुड़ जैसी अनुभूति में होती है। बहरहाल, सौन्दर्यशास्त्र में रुचि रखनेवाले प्रत्येक लेखक और पाठक को एक बार इस किताब को ज़रूर पढ़ना चाहिए ताकि पता लग सके कि सौन्दर्यशास्त्र पर बात किस तरह नहीं करनी चाहिए। नकारात्मक रूप में ही सही, लेकिन यह भी इस किताब का महत्वपूर्ण योगदान हो सकता है।

साभार

Monday, 25 November 2019

समय सत्ता और कवि : एक (मनोज कुमार झा की कविताएं)

जब मोहम्मद रफ़ी मरे तो बारिश हुई थी
संदर्भ : #मनोज_कुमार_झा_की_कविताएँ
■ शहंशाह आलम

मनोज कुमार झा की कविता हवा का वह झोंका है, जो भीषण गर्मी के दिन सहसा आता है और पसीने से चिपचिप बदन को थोड़े समय के लिए राहत देकर खेत, पगडंडी, दरख़्त, दरिया के रास्ते आगे बढ़ जाता है। नामवर सिंह ने भी इनकी कविता को लेकर कहा है कि इनकी कविताएँ हवा के नए झोंके की तरह हैं। नामवर जी ने सही लिखा। मनोज कुमार झा की कविता में हवा के जिस झोंके की बात यहाँ पर चल रही है, वह झोंका जब-जब आता है
मनोज कुमार झा
पुनर्नवा होकर आता है। मनोज कुमार झा की कविता में व्यक्त शब्द आदमी के लिए यही काम करते हैं। यानी इनकी कविता आदमी को राहत पहुँचती है। आज की तारीख़ में एक आदमी की हालत कैसी है, यह क़िस्सा किसी दहलाने वाले क़िस्से से कम नहीं है। तभी दुनिया भर के आदमियों के सड़कों पर निकलने की ख़बरें रोज़ आती रहती हैं। सड़कों पर आदमी के लिए कड़ी धूप है और किसी साये का इंतज़ाम तक नहीं है। ऐसे में, मनोज कुमार झा की कविता एक सायेदार पेड़ की तरह आदमी को राहत पहुँचाती है। कविता का असल काम यही तो है। बहुत सारे लोग ऐसे भी हैं, जो पल भर सो नहीं पाते, ग़ुरबत की वजहकर। इनकी कविता उनकी आँखों को नींद देती आई है।
     मनोज कुमार झा की कविता ‘देशज’ कविता है और यह कवि ‘देशज्ञ’ कवि है। यानी इनकी कविता बोलचाल की भाषा से स्वतः उत्पन्न कविता तो है ही, कवि आदमी की रीति, नीति और संस्कृति से भी परिचित है। यह देशजता और यह देशज्ञता इस कवि का अपना गुण है। अपना मूल पाठ है। संभवतः इन्हीं कारणों से यह कवि अतीत से अधिक वर्तमान में जीता है। कवि का अपना वर्तमान वही है, जो देश के आम नागरिक का वर्तमान है, ‘ठीक कह रहे अनवर भाई / जब मोहम्मद रफ़ी मरे तो बारिश हुई थी / अनवर भाई, ठीक कह रहे / जब आपके भाई रोशन क़व्वाल मरे तब भी बारिश हुई थी / मानता हूँ अनवर भाई / आपके अब्बू मोहम्मद रफ़ी की नक़ल नहीं करते थे / उनकी आवाज़ निकालते थे / मगर अबकि बारिश वैसी बारिश नहीं / घुला हुआ है अम्ल / घुला हुआ है रक्त / चलो अनवर चलो कोई चौड़े पाट वाली नदी ढूँढ़ो / जिसमें धुल सके इस बारिश की बूँदें।’
     अपने शब्द की मार्फ़त अंतिम आदमी के लिए जितना कुछ किया जा सकता है, हर कवि करता है। मनोज कुमार झा अपने शब्द की मार्फ़त यही करते हैं। कारण कि जो अंतिम आदमी है, उसकी बोलती बंद है। हर अंतिम आदमी ‘कदाचित् अपूर्ण’ है। अब जिन कदाचित् कारणों से सबकी आवाज़ अपूर्ण है, सबकी बोलती बंद है, सबकी हालत पतली है, ये सारी वजहें घृणा से भरी हुई हैं। घृणित इस कारण हैं कि सत्ताएँ हर अंतिम आदमी के साथ आखेट करती हैं। यह सच ही तो है, अब वह वक़्त गया, जब कोई राजा अपने राज्य के अंतिम आदमी के दुःख को समझने वेश बदलकर रात को निकला करता था। अब का राजा अपने असली रूप में अंतिम आदमी का शिकार करने निकलता है। यानी अब सत्ताधीश बस कुशल आखेटक भर बनकर है, शांत दिनों की हर संभावना को नष्ट करने वाला भर रह गया है, ‘उखड़ी-उखड़ी लगती है रात की साँस / बढ़ता जाता प्रकाश का भार / तेज़ उठता मथने वाला शोर / तो क्या फट जाएगा एक दिन रात का शहद / और नाराज़ सूरज कहेगा अब नहीं लौटूँगा / रात ही देती थी लाल रूमाल / जिसको हिलाते बीतते थे प्रात / अब भोगो अपना प्रकाश अपना अँधकार।’ मनोज कुमार झा अपनी कविता में जिस अंदेशे से अकसर घिरे दिखाई देते रहे हैं, वह अंदेशा एक जागरूक कवि का अंदेशा है। यह अंदेशा हर कवि में बार-बार आता रहता है। वह कवि जिस भी भाषा का कवि है, यह अंदेशा यानी यह पूर्वाभास उसको परेशान करता रहता है कि उसके घर के बाहर जो सत्ताधीश गली में छिपकर उसकी टोह में लगा हुआ है, वह उसको न मालूम किस जुर्म में फँसाकर उसका शिकार कर लेगा। ऐसे टोही और हरजाई सत्ताधीशों से भरे समय में भी मनोज कुमार झा अपने ‘अनवर भाई’ जैसे पड़ोसियों को आज के शिकारी सत्ताधीश से बचाना चाहते हैं। कवि के बचाव का यह तरीक़ा हर आदमी के लिए माक़ूल है और कविता के लिए मुनासिब भी, ‘क्या तुम्हें शर्म नहीं आती / क्या तुमने दूध के लिए रोते बच्चों को देखा है / अपनी माँ से पूछ लो / नहीं, तुमसे छूट गई होगी वो भाषा / जिसमें माँओं से बात की जाती है / क्या तुमने तेज़ाब की शीशी को / बच्चों की पहुँच से दूर किया है कभी / अपनी पत्नी से पूछ लो।’
     मनोज कुमार झा की कविता ऊपर-ऊपर से जितनी शांत दिखाई देती है, अंदर से आपको इतनी बेचैन कर देती है कि आप ज़िंदगी की त्रासदी को परत-दर-परत समझ पाते हैं। शर्त यही है कि इस कवि की कविता वाली नदी में आपको डुबकी लगानी होगी। शर्त यह भी है कि आपको नदी में गोता लगाना आता हो। इनकी कविता का स्वर आदमी को प्रेम से बाँधे रखना ज़रूर है, परंतु जो सत्ताधीश रेड कार्पेट पर चलते हैं, उनकी मुख़ालफ़त की शर्त पर मनोज कुमार झा आपसे प्रेम करते हैं। वजह साफ़ है, सत्ता के लोग आपके मुख़ालिफ़ ही तो खड़े दिखाई देते रहे हैं। मनोज कुमार झा की असल कारीगरी यही है कि लोगों के सत्तावादी प्यार को ख़त्म करना चाहते हैं, ‘तुम नहीं तो यहाँ अब मेरे हाथ नहीं / एक जोड़े दास्तानें हैं / पैर भी नहीं / एक जोड़ी जूते की / देह भी नहीं / मात्र बाँस का एक बिजूका / जिसमें रक्त और हवाएँ घूम रही हैं।’ कवि आपसे यह कहना चाहता है कि पक्षियों और जंतुओं को डराने के लिए खेत में उलटी हाँडी का सिर बनाकर खड़ा किया गया जो पुतला होता है न, वही अब लोगबाग होते जा रहे हैं। लेकिन वह पुतला तो महज़ धोखा और भुलावा होता है न। फिर आप ऐसे क्यों होते जा रहे हैं? कवि को मालूम है, आज के सत्ताधीश अपनी जनता को किसी बिजूका से ज़्यादा नहीं मानते। हालत यह हो गई है कि देश में जनता को नोटबंदी के बाद अब एक किलो प्याज़ के लिए पंक्ति में खड़ा कराया जा रहा है और तुर्रमख़ाँ सत्ताधीश विदेश की यात्राएँ कर-करके मौज मना रहा है, ‘तुमने परमाणु बम बनाया / चाँद को छुआ / वह दस दिन का बच्चा डूब रहा पानी में / वह काग़ज़ का टुकड़ा नहीं / जिसे तुम फेंक देते हो बिना दस्तख़त के / शिशु-शरीर वह / बसती है जिसमें सभ्यता की सुगंध / तुम इस दस दिन के बच्चे को नहीं बचा सकते / तुम्हें शर्म नहीं आती।’
     यह सही है कि सत्ताधीशों को अब शर्म नहीं आती। शर्म आती होती तो वे जो दिन-रात संविधान की धज्जियाँ यहाँ-वहाँ उड़ाते हुए दनदनाते फिर रहे हैं, देश में संविधान दिवस मनाए जाने की बातें नहीं करते। वास्तव में, देश की जनता ऐसे सत्ताधीशों को अपना मौन-समर्थन जब तक देती रहेगी, वे देश की जनता को प्याज़ क्या, नमक तक के लिए पंक्ति में खड़ा करवाते रहेंगे। चेतना सत्ताधीशों को नहीं, हमको है। ग़म यही है कि हम चेतने से अच्छा किसी मंदिर में जाकर घंटी बजा आना मान रहे हैं, ‘यह युद्ध इतना विषम / नोचे इतने पंख / लूटते रहे मेरे दिन की परछाइयाँ / कुतरते रहे मेरे रात की पंखुड़ियाँ / चितकबरा लहू थूकता यह अँधकार / फिर भी छूटा वो अर्जित कोना निपट अकेला / जहाँ बसे हैं विकट दुर्गुण मेरे ख़ास।’ मनोज कुमार झा धब्बेदार, लाल-काले दाग़ोंवाली और बेसुरी इस सदी के बारे में जो भी कहते हैं, यथार्थ कहते हैं। तभी इनकी कविता यथार्थ की कविता है। यह कवि ऐसा है कि अपने दुःख में सबको शामिल करने से बचता दिखाई देता है। इस कवि को मालूम है, दुखी तो सभी जन हैं, फिर अपना दुःख सुनाकर दुखी जनों को और अधिक दुखी काहे किया जाए, ‘मैं काँपता अपने निश्चय के भीतर कि मैं तो रोऊँगा।’ आज का माहौल भी ऐसा है कि किसी रोते हुए आदमी के काँधे पर भला प्यार से कौन हाथ धरता है। हमदर्द आदमियों की कमी जो होती जा रही है। साथ ही, आदमी के अंदर से हमदर्दी ख़त्म भी होती जा रही है, ‘मगर मेरे पास सिर्फ़ देह / क्या इसे निर्वस्त्र करके गलियों में घुमाऊँ / तो दिखेगा उदासी का चेहरा।’ एक कवि आपको चेता भर ही न सकता है कि आप अपनी दर्दमंदी, अपना ख़ुलूस, अपनी सहानुभूति खो रहे हैं, तभी अब आप दूसरे के दुःख से दुखी होने का भाव अपने अंदर नहीं महसूस कर पाते, ‘उधर से खाँसी उठती थी / जान जाता था कि पिता जगे हैं / इधर मैं कविताओं का काग़ज़ फाड़ता था / जान जाते थे कि लड़का जगा है / इस तरह एक रिश्ता बनता था / लड़ाइयों की हार की तरफ़ लुढ़कते हुए।’
     मनोज कुमार झा की कविता का जो स्वर है, यही है कि इनकी कविता आदमी के अतीत और वर्तमान, दोनों को साथ लेकर चलती है। आदमी का अतीत अगर-मगर करता हुआ पूर्णता के साथ बीता है तो उसका वर्तमान कदाचित् अपूर्ण रह गया है। लेकिन कवि की श्रद्धा आदमी के भविष्य को लेकर विश्वास से भरी है। यही वजह है कि इनकी कविता आदमी को अधूरा आदमी नहीं मानती - पूर्ण, सुंदर और भव्य मानती है। इनकी कविता आदमी से बातचीत की कविता है। कहीं कोई कमी है भी तो कवि का ग़ुस्सा सातवें आसमान तक नहीं जाता है। कारण कि ‘तथापि जीवन’ एक कवि का ही जीवन तो है। मनोज कुमार झा ‘हम तक जो विचार’ पहुँचाना चाहते है, यही पहुँचाना चाहते हैं, ‘दुःख तो पुराना गुइयाँ है / जैसे राख की साथी आग / मगर चुंबक का एक सिल बनाया हम लोगों ने / और उस पर खीरा रखा / जिसे काटने को लोहे के चाक़ू से हुनर क़बूल किया।’
     मनोज कुमार झा उम्मीदों के कवि हैं। इनको नाउम्मीदी हर तरफ़ से घेरती भी है तो नाउम्मीदी का घेरा इनको तोड़ना बख़ूबी आता है। नाउम्मीदी के घेरे को तोड़ने का यह काम भी यह कवि विनम्रतापूर्वक करता है। संभव है, इनकी इस विनम्रता और इनके इस विनयन के लिए कोई ‘बहुत डरा हुआ कवि’ कहकर ताने मारे, लेकिन यह ग़लत होगा। मानवता के बचाव की लड़ाई मुहब्बत से भी लड़ी जाती रही है। मनोज कुमार झा ऐसे ही कवियों में हैं। इनकी कविता को एक नए फ़्रेम में देखेंगे तो लगेगा कि पूरी तरह सहज रहकर कोई कवि किस प्रकार आदमी के पक्ष का संघर्ष जीतता है, ‘नहीं दिख रहा हरसिंगार का पेड़ / नहीं दिख रहा गेंदा जिसे सुबह में छुआ था / इन अँधियारों में मुझे क्यों लग रहा कोई नाव चला रहा है।’ दरअसल मनोज कुमार झा का कवि उस नाविक की भूमिका में है, जो नाविक चाहे समुद्र में जितनी आँधियाँ आएँ, जितनी परेशानियाँ आएँ, जितनी हैरानियाँ आएँ, अपनी कश्ती को किनारे लाकर ही दम लेता है। यह इनके एक सतर्क कवि होने का भी परिचायक है।
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Tuesday, 9 July 2019

समीक्षा - रति-राग और यौन नैतिक विवेक की कविताएँ 'चौंसठ सूत्र सोलह: अभिमान'

रति-राग और यौन नैतिक विवेक की कविताएँ
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चर्चित युवा कवि अविनाश मिश्र का दूसरा कविता-संग्रह 'चौंसठ सूत्र:सोलह अभिमान' शीर्षक से राजकमल प्रकाशन से आया है।बक़ौल कवि ये कविताएँ उसके जीवन में प्रेम व 'कामसूत्र' दोनों के आगमन की साक्षी हैं।कवि की खूबी यहाँ दैहिक आत्म की अपनी खोज में रति-सुख के सार्वजनिक स्पेस का दृष्टा बनने में है।इन कविताओं को पढ़ते हुए मुझे वर्षों पहले लिखीं अपनी ही पंक्तियाँ याद आईं:'अगली बार युवा कवियों के संकोच कम हों/वे लिखें प्रेम के बारे में कविताएँ/अलगनी पर सूखने डाल दिए जाएँ/कुछ नए रूमाल/कुछ पुराने चुम्बन'।हिंदी में लंबे समय
तक सामाजिक संघर्षों की विकट वरीयता के चलते प्रेम को एक कमतर शै माना गया- अशोक वाजपेयी की कविताओं से किया गया सलूक इस तथ्य की पुष्टि करता है।
दरअसल मध्यकालीन दुराग्रहों ने भारत के लोगों को यौन संकोची और यौनजीवन-व्यवहार में छद्म बनाया।अन्यथा वेद के ऋषि को तो अनन्य साधक भी प्रेमिका की ओर जाते जार-सा दिखाई देता था, उपनिषदकार को ऊब-डूब आध्यात्मिक स्थिति के लिए प्रिया का आलिंगन याद आता था।इसीलिए वैदिक मनीषा ने इंद्रियों के छबीलेपन और वासना के उन्माद को लेकर अद्भुत सृजन किया है ताकि जीवन को कुछ और सजीला कुछ और  रसीला बनाया जा सके।
भारतीय इतिहास में लगभग ढाई हजार वर्ष पूर्व महर्षि वात्स्यायन रचित 'कामशास्त्र' विश्व की पहली 'यौन-संहिता' है।इसके 7 अधिकरणों,36 अध्यायों एवं 64 प्रकरणों में प्रेम के मनोशारीरिक सिंद्धान्तों एवं प्रयोगों की विस्तृत पड़ताल करते हुए वात्सायन ने व्यक्ति के दाम्पत्य जीवन को सुखी बनाने, यौन जीवन में उसे संतुष्ट रहने के कारगर नुस्खे सुझाये हैं।कवि अविनाश इस संग्रह में उस विषय सरणी के पारम्परिक सूत्रों का निर्वाह करते हुए भी यहाँ जिस तरह प्रेम की निजता का सन्धान करते हैं वह काबिले-तारीफ़ है।
पहली ही कविता 'मंगलाचरण'में वे कहते है-'मेरे प्रार्थनाक्षर/तुम्हारे नाम के वर्ण-विन्यास को चूमते हैं आलिंगन,चुम्बन,नखक्षत,दंतक्षत,सीत्कृत जैसी रति-क्रियाओं में गहरे पैंठते हुए वे प्रणययुद्ध में रात्रि से उत्तेजना और सूर्योदय से बल की याचना करते हैं।यौन सुख में यहाँ जिह्वां युद्ध में 'अधरों के आघात' हैं,'वक्षरेखा' में डूबती दृष्टि है,रजतरश्मियों
से 'अभिसार' हैं,उरोजों व उरुओं के 'स्मारणीयक' हैं,'नहीं भरती प्यास' और तनुता में 'नाभि में भरता जल' है,नाखूनों से स्तनों पर बनते 'अर्धचंद्र' हैं...
और भी कितना कुछ!
पर कवि कहीं भी भदेस नहीं होता।प्रेम में 'मात्र अनुराग ही चयन के योग्य' है की धारणा में यकीन रखने वाले कवि अविनाश साफ़ कहते हैं कि 'उच्च कुल भी रच सकता है नर्क'।पर 'प्रेम अगर सफल हो/तब पीछे से उम्र घटती है/ अगर असफल हो/तब आगे से।उनका यह भी कहना है कि तुम्हारे बगैर/मेरी सारी यात्राएँ अधूरी हैं इसीलिए यह विश्वास कि-जो प्यार में हैं/प्यार बरसता है उन पर।कवि को:'मैं बहुत गलत था जीवन में/तुम से मिलकर सही हुआ' का अहसास है।अपनी 'समरत' कविता में वह परस्पर प्रिया के पैर दबाने और फलतः दर्द में कभी अकेले न होने में विश्वास प्रकट करता है।वह आश्वस्त हैं कि जो आत्मबल से युक्त हैं-ऐसे नायकों को अनायास ही अलभ्य नायिकाएं मिलती हैं।लेकिन आत्मवंचित/मैत्रीमुक्त/नागरकतारहित/अंतर्मुखी नायकों को(?)के लिए है:हस्तमैथुन।
जीवन की इसी ज़रूरी नैतिक पक्षधरता के चलते यौन सम्बन्धों को लेकर कवि का मानना है कि-समय से पूर्व पहुँचना मूर्खता है/समय पर पहुँचना अनुशासन/समय के पश्चात अहंकार। 'व्यवहित राग' कविता में कवि का कहना है कि तुम इच्छाओं से भरी हुई हो/जैसे यह सृष्टि/मैं सुन सकता हूँ तुम्हे उम्र भर/व्रती है यह दृष्टि।इस तरह कवि जीवन की शुभता के लिए स्त्री-पुरुष समवाय पर बल देता है।इतना ही नहीं 'सवर्णा' शीर्षक अपनी एक दुर्लभ कविता में वह उन तमाम यौन अनैतिकताओं का ब्यौरा पेश करता है जो विवाह कर लाई गई एक लड़की को बगैर छुए प्रताड़ित करने का घरों में सबब बनते हैं-विवाहपूर्व यौन सम्बन्ध,विवाहेत्तर
यौन सम्बन्ध,विवाह बाद भी हस्तमैथुन की कुटिल लत,अप्राकृतिक यौन सम्बध।
कवि का तो यहाँ तक मानना है कि अनैतिकताएँ/कुछ भी पहन लें/वासनाएँ ही जगाती हैं: प्रेम में कौमार्य की चाह में न बहना ही सच्ची प्रगतिशीलता है और सच्चा स्त्री-पुरुष विमर्श भी।इसीलिए कवि कह पाता है:'एकल रहना स्त्रीवाद है/मुझे चाँद चाहिए कहना स्त्री विरोधी।इस यौन अराजक समय और छद्मब्रह्मचर्य प्रदर्शन भरे युग में कवि अविनाश जैसे एक नैतिक यौन मानक के लिए मार्ग प्रशस्त करते हैं।वे यह भी मानते हैं कि प्रेम का अभिनय नहीं हो सकता।उसमें 'तुम्हारे सब अंग अब मेरे हैं' का भरोसा ज़रूरी है।इस तरह ये कविताएँ अपने विन्यास में समकालीन अधकचरी मॉड अवधारणा (राजेंद्र यादव मार्का)के बरक्स भारतीय दाम्पत्य के स्त्री-पुरुष ऐक्य की नज़ीर बनती हैं।
भारतीय मनीषा दस दिशाएं मानती आई है।आठ दिशाएं 8×8 के अनुपात में 64 के विस्तार में व्याप रही हैं।ऊर्ध्व और अधो दो दिशाएं आकाश और पाताल की मानी गई हैं।अविनाश संग्रह के प्रथम खंड में अपने विभिन्न आयामों में चौंसठ के विस्तार में रति-राग और जीवन के अनिवार्य यौन नैतिक विवेक को वर्णित करते हैं।दूसरे और समापन खंड में 16 कविताएँ 'संग्रहित हैं।गौरतलब है कि प्रेम में कुछ भी'अधो' स्थिति नहीं होती-सभी कुछ 'ऊर्ध्व' है-इसलिए कवि दोनों को 'सौलह अभिमान' कहता उपयुक्त समझता है।
अपनी व्यंजना और विन्यास में दूसरे खंड की कविताएँ दुर्लभ बन पड़ी हैं।बल्कि 'उल्लेखनीय' में कवि अविनाश अपनी इन कविताओं की जिस अनायासिता का ज़िक्र करते हुए 'उन्हें 'आई और हुई' कविताएँ बताते हैं उसका जीवंत अहसास इस खंड की कविताओं को पढ़कर अधिक होता है। सिंदूर, बेंदा, बिंदिया, काजल, नथ,कर्णफूल,
गजरा मंगलसूत्र,बाजूबंद,मेंहदी,चूड़ियाँ,अँगूठी,
मेखला,पायल,बिछवे,इत्र जैसे प्राचीन पारम्परिक आभूषणों के प्रतीक के जरिए कवि ने विवाह की मांगलिक मान्यताओं के निहित गहन आशय को जिस अनूठे ढंग से निबद्ध किया है वह पढ़ते ही बनता है।
यहाँ सिंदूर किसी लड़की के विवाहित होने की ही नहीं,पराये हो जाने की भी गवाही देता है।रंगबूँद-सी भाल पर प्रतिष्ठित बिंदिया एक लड़की के स्वप्न-अभिलाषा और उसके आत्मगौरव तथा नैतिक रूप से किसी के होने का भी इज़हार है।नथ वह घड़ी है जिसमें चन्द्रमा व समुद्र दोनों को कसा जा सकता है।चंद्रमा जो हमारे यहाँ भावपूर्ण मन और समुद्र जो मर्यादित गहराई का प्रतीक रहा है। मंगलसूत्र वह सूत्र है जिस पर पति का मंगल निर्भर है।कवि इसे पुरुष की मर्यादा और स्त्री की कामना से जोड़कर उसके मांगलिक आशय का विस्तार करता है।बाजूबंद प्रथम पुरुष के लिए अर्गला है,मध्यम के लिए आश्चर्य और अन्य के लिए आशंका-कहकर कवि जैसे दाम्पत्य के सामाजिक-नैतिक सूत्र का खुलासा करता है।'मेखला 'मैं और तुम के बीच मध्यमार्गी-सी है। 'इत्र' कविता में कवि कहता है कि-'मैं ऐसे प्रवेश चाहता हूँ/तुम में/कि मेरा कोई रूप न हो/मैं तुम्हें ज़रा-सा भी न घेरूँ/और तुम्हें पूरा ढँक लूँ।प्रेम की ऐसी निर्भार सूझ ही उसे गहरा और अंतरंग बनाती है।इस तरह इन कविताओं के के ज़रिए कवि अविनाश जैसे तिरोहित भारतीय दाम्पत्य परंपराओं को एक बार फिर से खोजने-पाने में सफल होते हैं।
किताब
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Friday, 6 October 2017

पाश की कविता ' सबसे खतरनाक ' पर केन्द्रित मोहन कुमार झा की समीक्षा


(पढ़िये पाश और उनकी कविता '
सबसे खतरनाक ' पर केन्द्रित मेरा लेख )
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क्या आपने कभी यह बात सोची है कि एक कविता क्या-क्या कर सकती है ? क्या-क्या हो सकती है ? अगर नहीं तो आप अवतार सिंह संधू यानी कवि ' पाश ' की कविता ' सबसे ख़तरनाक ' जरुर पढ़ लें । इस कविता को ठीक से पढ़ने के बाद ये हो सकता है कि आप इस तरह की कविताओं को खोज-खोज के पढ़ने के मरीज़ हो जाए। ये भी हो सकता है कि आपके रगों में बहता खून बहुत तेजी से दौड़ने लगे। और ये भी हो सकता है कि आप वो न रह जाए जो आप पहले थें। यह कविता अन्यायी और मतलबी हुकूमतों के लिए किसी बुरे सपने से कम नहीं है।यह कविता एक ऐसी दवाई है जिसे पीकर मुर्दा जनता के भीतर क्रांति के लिए आगे बढ़ने का हौसला पैदा होता है।आप यकीन करें न करें यह एक ऐसी कविता है जिससे हुकूमतें डरती हैं। 
इस कविता को समझने के लिए दो बातों का जरुर ध्यान रखना चाहिए । पहला कि कवि के लिए क्या गलत है और क्या खतरनाक।सदियों से आदमी के द्वारा आदमी को लूटा जा रहा है। सदियों से हक की मांग करने वालों को बेरहमी से मारा जाता रहा है। सदियों से चालाक लोगों द्वारा किसी शातिर शिकारी की तरह व्यवस्था , नियम -कानून आदि का जाल फैला कर निरीह और बेबस लोगो का शिकार किया जाता रहा है। और उन्हें आगे बढ़ने से रोका जाता रहा है।पर कवि इनकों गलत तो कहता है पर खतरनाक नहीं कहता। तो फिर ख़तरनाक क्या है ? कवि के नजर में ख़तरनाक है आदमी के भीतर अन्याय से लड़ने की इच्छाशक्ति का अभाव। खतरनाक है दिल में तड़प का न होना । खतरनाक है सबकुछ चुपचाप सहना , खतरनाक है जरुरी समय पर किसी जरुरी प्रतिक्रिया का न होना। खतरनाक़ है चुनौती से लड़ने के मुकाबिल उसकी अनदेखी करना ।सबसे खतरनाक है बेहतर कल का कोई सपना न होना। 
कवि को भविष्यद्रष्टा कहा जाता है। पाश ऐसे ही भविष्यद्रष्टा कवि हैं।इस बात का प्रमाण इसी कविता के अंतिम आधे हिस्से में मिल जाता है।क्या आज हमारा समाज अति असंवेदनशील नहीं हो गया है ? क्या आज हमारे समाज में आपसी प्रेम और भाईचारे की ऐसी स्थिति है जिसपर हम-आप संतोष कर सकें ? आख़िर क्यों स्त्री को शक्ति और देवी मानने वाले भारतीय समाज में स्त्रियों की स्थिति आज भी सर्वोत्तम नहीं कही जा सकती ?
दरअसल् हमने लड़े बिना ही हार मान ली है। पश्चिम का प्रभाव सड़क से लेकर संसद तक जबरदस्त छाप छोड़ चुका है और इसकी वज़ह से समाज से लेकर सियासत तक की चलने के तौर -तरीके बदल गए है।परन्तु समाज व्यक्ति से बनता है और व्यक्ति से ही चलता है। इसलिए जिस दौर में समाज की आबादी का एक बड़ा भाग पथ भूल गया हो , एक कवि की चुनौती यहीं से शुरु होती है कि वह राह भूलें समाज को मार्ग पर लाने का प्रयास करे। और पाश इस कविता में यह कार्य करने का प्रयास करते हैं। पाश पंजाब के क्रांतिकारी कवि थे। उन्होंने अलग खालिस्तानी आन्दोलन को बहुत करीब से देखा और समझा था।लोग मारे जा रहे थे।
हुकूमत सत्ता के नशे में चूर आन्दोलन को कुचलने पर लगी थी। आम आदमी रोटी के इंतज़ाम में इस कदर पस्त था कि उसे इन सब बातों से कोई फर्क नहीं पड़ता था। ऐसे कठिन दौर में जलते हुए पूजाब की आत्मा को बचाने का संकल्प लिये यह कवि हमसे यह कहता है कि जब जुर्म और अन्याय देखकर आपकी आंखों में मिर्ची न लगे और आप एक मुर्दा खामोशी ओढ़े रहें तो यह समझ लेना चाहिए कि आपकी आत्मा मर गई है।पाश की यह कविता जिन्दगी में लागातार दोहराव की प्रक्रिया से अलग सजग आत्मा के साथ अग्रसर होने के लिए प्रेरित करती है। 
पाश को क्रांति का कवि कहा जाता है।बहुत से लोग पाश को एक ख़ास विचारधारा से जोड़कर देखते हैं जोकि मेरे विचार से ठीक नहीं है।वास्तविकता यह है कि पाश स्पष्टता और बेबाकीपन के कवि हैं। चाहे उनकी कविता हो या निजी जिन्दगी पाश ने जो भी किया , जो भी लिखा , पूरी स्पष्टता , खुलापन और बेबाकी से किया और लिखा। उस वक्त पाश के आसपास जिस तरह की घटनाएं घटित हो रहीं थी उसमें प्रेम गीत गाने की न तो कोई जरुरत थी और न ही उसका कोई महत्व ही था। समस्याग्रस्त पंजाब अपनी समस्या बताने, समाधान के लिए नये मार्ग तलाशने और उत्साह पैदा करने वाले शब्दों को पढ़ने-सुनने के लिए व्याकुल था। और पाश की कविताएं इस आवश्यकता की पूर्ति करती हैं।
यह एक संयोग है कि पाश की मृत्यु उसी तारीख को हुई जिस तारीख को भगत सिंह की।पाश कि कविताओं का मिजाज बहुत कुछ भगत सिंह के विचारों से मिलता है। और वो यह है कि मरने से पहले मरना मनुष्य होने की निशानी नहीं है। अंतिम सांस तक बेहतर कल के सपने को साकार करने के लिए जुर्म और अन्याय के ख़िलाफ़ संघर्ष करना ही हमारे ज़िन्दा होने की पहचान है।शायद इसी अर्थ में डा. नामवर सिंह जी ने पाश को " शापित कवि " कहा है। सच है कि पाश एक शापित कवि थे और वो छोटी उम्र मिलने के बावजूद जिन्दगी भर अन्याय के विरुद्ध संधर्ष के गीत 
गाने के लिए अभिशप्त थे।

पाश को बहुत कम उम्र मिली थी। वे कुल 38 वर्ष ही जीवित रहे।हिन्दी के एक और आधुनिक कवि सुदामा पाण्डेय ' धूमिल ' को भी बहुत कम उम्र मिली थी।धूमिल का निधन भी 39 वर्ष की ही अवस्था में हो गया।मगर पाश और धूमिल की कविताओं की उम्र बहुत लम्बी है , इसमें कोई शक नहीं । इन दोनों कवियों की कविताएं सरल शब्दों में अपने समय की धड़कन को बयां करती हैं।पटकथा धूमिल की अक्षयकीर्ति का मूल है तो ' सबसे ख़तरनाक ' पाश की प्रसिद्धि का आधार।इनमे से किसी एक की कविताएं पढ़ने पर दूसरा खुद-ब-खुद हमारे जेहन में उपस्थित हो जाता है।
धूमिल के समान पाश के यहां भी कुछ शब्दों और उपमाओं पर आपत्ति दर्ज की जा सकती है।पर मुकम्मल नज़रिये से देखने पर पता चलेगा कि पाश के यहां ऐसे अवसर बहुत ही कम हैं। पाश को पढ़ने वालों और पसंद करने वालों में युवाओं की संख्या सर्वाधिक है।पाश की कविता ' सबसे खतरनाक ' की एक ख़ास विशेषता यह है कि यह कविता पाठक के भीतर एक धीमी और लम्बी परिवर्तन की प्रक्रिया आरंभ कर देती है , जो अन्ततः अन्याय के विरुद्ध सक्रिय संधर्ष के रुप में परिणत होती है।शायद यहीं वज़ह है कि ज्यादातर हुकूमतें इस एक कविता के सामने खुद को असहज महसूस करतीं हैं।

सबसे ख़तरनाक -पाश
मेहनत की लूट सबसे ख़तरनाक नहीं होती
पुलिस की मार सबसे ख़तरनाक नहीं होती
ग़द्दारी और लोभ की मुट्ठी सबसे ख़तरनाक नहीं होती
बैठे-बिठाए पकड़े जाना बुरा तो है
सहमी-सी चुप में जकड़े जाना बुरा तो है
सबसे ख़तरनाक नहीं होता
कपट के शोर में सही होते हुए भी दब जाना बुरा तो है
जुगनुओं की लौ में पढ़ना
मुट्ठियां भींचकर बस वक्‍़त निकाल लेना बुरा तो है
सबसे ख़तरनाक नहीं होता

सबसे ख़तरनाक होता है मुर्दा शांति से भर जाना
तड़प का न होना
सब कुछ सहन कर जाना
घर से निकलना काम पर
और काम से लौटकर घर आना
सबसे ख़तरनाक होता है
हमारे सपनों का मर जाना
सबसे ख़तरनाक वो घड़ी होती है
आपकी कलाई पर चलती हुई भी जो
आपकी नज़र में रुकी होती है

सबसे ख़तरनाक वो आंख होती है
जिसकी नज़र दुनिया को मोहब्‍बत से चूमना भूल जाती है
और जो एक घटिया दोहराव के क्रम में खो जाती है
सबसे ख़तरनाक वो गीत होता है
जो मरसिए की तरह पढ़ा जाता है
आतंकित लोगों के दरवाज़ों पर
गुंडों की तरह अकड़ता है
सबसे ख़तरनाक वो चांद होता है
जो हर हत्‍याकांड के बाद
वीरान हुए आंगन में चढ़ता है
लेकिन आपकी आंखों में
मिर्चों की तरह नहीं पड़ता

सबसे ख़तरनाक वो दिशा होती है
जिसमें आत्‍मा का सूरज डूब जाए
और जिसकी मुर्दा धूप का कोई टुकड़ा
आपके जिस्‍म के पूरब में चुभ जाए

मेहनत की लूट सबसे ख़तरनाक नहीं होती
पुलिस की मार सबसे ख़तरनाक नहीं होती
ग़द्दारी और लोभ की मुट्ठी सबसे ख़तरनाक नहीं होती ।

Saturday, 30 August 2014

बेबाक कविताओं की दुनिया: जी हाँ लिख रहा हूँ.. armaan anand



बेबाक कविताओं की दुनिया: जी हाँ लिख रहा हूँ..


सर्जक की प्रसव पीड़ा को उसकी रचना ही सार्थक करती है और सर्जना जड़ता के विध्वंश और प्रजनन के दर्द से उत्पन्न आनंद का नाम है| अपने परिवेश से कवि का सतर्क सम्बन्ध सशक्त एवं कालजयी कविताओं को जन्म देता है|निशान्त अपने संग्रह के शीर्षक "जी हाँ लिख रहा हूँ ..", आवरण चित्र और प्रस्तावना में नागार्जुन की कविता के द्वारा संकेत दे देते हैं कि वे अपनी सर्जना के प्रति कितने सतर्क ,संकल्पित और गौरवान्वित हैं| जी हाँ लिख रहा हूँ.../बहुत कुछ! बहोत -बहोत!! /ढेर -ढेर सा लिख रहा हूँ/मगर, आप उसे पढ़ नहीं पाओगे /देख नहीं सकोगे उसे आप!...जी हाँ लिख रहा हूँ...| बाबा नागार्जुन की इन पांच पंक्तियों को अपनी पांच लम्बी कविताओं का प्रतिनिधि स्वर बनाकर कवि ने अपना रूख बिलकुल साफगोई से सामने रख दिया है| जी हाँ लिख रहा हूँ.. शीर्षक इस ध्वन्यात्मकता के साथ अपनी उपस्थिति दर्ज कराता है ,जैसे वह कालचक्र का इतिहास लिखने जा रहा हो ... ,जैसे उसने भांप ली हो चाल समय के पहिये की |संग्रह की कवितायें एक प्रकार से यात्रा कवितायेँ है, जो कवि के जीवनानुभव को साथ लेकर चलती हैं |व्यक्ति का सम्पूर्ण जीवन एक यात्रा ही तो है|जन्म से मृत्यु की यात्रा ,अज्ञान से ज्ञान की यात्रा ,अबोध से बोध, बोध से शास्त्र, शास्त्र से अनुभव, अनुभव से बौद्धिकता की यात्रा ,कहा भी गया है कि यात्रा ही जीवन है और ठहराव मृत्यु | संग्रह में उतरते ही निशान्त कोलकाता को कविता के कैनवास पर बिखेर देते हैं| चित्र दर्शन के बहाने से पाठक को कालयात्री बना देते हैं |कोलकाता के सीने पर बिछी हुई हैं पटरियां , कहते ही वे कोलकाता की प्राच्य -आधुनिकता ,टून...टून..टून की आवाज के साथ सांस्कृतिक बोध और बैलगाड़ी और उसके चलने की आवाज कहते ही समय के पारिवार्तनिक नैरंतैर्य की यात्रा पर पाठक को अनायास ही रवाना कर देते हैं |कोलकाता कभी हाथ में रिक्शा बन दौड़ पड़ता है, तो कभी पिताजी की सीख में सामंत बनकर खड़ा दिखता है|फिर यह यात्रा पाताललोक में सरक आती है, जहाँ पाताल लोक कोलकाता के साथ-साथ कवि के बचपन में भी बसा है और साथ ही बसा है दादी की कहानियों में |यह पाताल लेखक की अगली पीढ़ी की कहानियों में भी प्रत्यक्ष -अप्रत्यक्ष दोनों बसता है|'कोलकाता एक जादुई नगरी' कहते हुए लेखक उन तमाम कहानियों को जिन्दा कर देता है, जो दूर अनजान देशों में कोलकाता कि प्रतिनिधि थीं | सत्ता के उस तिलिस्म को बेनकाब करता है, जो वामपंथ के नाम पर गद्दी से गलियों तक फैला हुआ है| यही जादू कवि -फिल्मकार बुद्धदेव दास गुप्ता की फिल्मों और कविताओं में प्रकृति बन कर मुस्कुरा रहा है|कोलकाता बस में एक रूपये के लिए लडती औरत से लेकर विक्टोरिया मेमोरियल के गुम्बद तक फैला हुआ है|भोर के सपने-सा उतरता हुआ किराये के कमरों में घर बनकर अधलेटा हुआ कोलकाता कविता की आखिरी पंक्ति तक पाठक के अन्दर टहल रहा है|कुल मिलाकर "कोलकाता :कविता के कैनवास" पर कुछ बिखरे चित्रों में निशांत दर्शन की कला और दर्शन का सौन्दर्य प्रस्तुत करते हैं|बातें सारी होतीं तो इसी दुनिया और हमारे आस-पास की हैं ,मगर घड़ियों की रफ़्तार में अंधी आँखें न देख पाती हैं , न टिक टिक के शोर में सुना जा सकता है| आधुनिक अफ़्रीकी साहित्य के पिता माने जाने वाले चिनुआ अचेबे कहते थे -लेखक को इतिहासकार होना पड़ता है|मेरी उनसे सौ प्रतिशत सहमति इसलिए है क्योंकि मैं सोचता हूँ, पत्रकारिता या इतिहास लेखन में समाज के रहन -सहन ,विचार आदि का डाटा मात्र भरा होता है ,वहीँ साहित्यकार समाज का भावपूर्ण इतिहास लिखता है, जो कई मायनों में बेहतर और उपयोगी है|


संग्रह की दूसरी लम्बी कविता कबूलनामा लेखक के आत्म चिन्तन और आत्म-चिन्तन के बहाने समग्र चिंतन की भी कविता है|मध्यवर्गीय चेतना अपने अस्तित्वमूलक सत्ता की पहचान और स्थापना को लेकर चिंतित है|कभी-कभी मैं पहचान नहीं पाता हूँ ,अपने आपको /शीशे में मेरा चेहरा स्थिर रहता है /हिलता है /डुलता है और कई चेहरे बनता है /दरअसल वह कई मुखौटे रखता है अपने पास /मैं अपने 'मैं' को लेकर सशंकित रहता हूँ.. जीवन संकट के पीछे मध्यवर्गीय चिंता और मध्यवर्ग का ढुलमुल आचरण है ,जो स्वयं को बचाए और बनाये रखने के लिए वह इस्तेमाल करता है| यहाँ जीवन संकट से ज्यादा तवज्जो निशांत पहचान के संकट को देते हैं |अस्तित्व मूलक सत्ता की स्थापना को देते हैं |जीवन को बचा लेने और गुपचुप तरीके से जी लेने की मध्यवर्गीय सोच जिसके लिए मध्यवर्ग ने मुखौटों और कई चेहरों का आज तक सहारा लिया है|उसे वह एक सिरे से नकार देते हैं| सत्ता सबसे पहले स्वायत्तता चाहती है |लेखक अपनी अस्मिता की स्थापना के लिए स्वतंत्रता चाहता है|आँखें वह नहीं देख पातीं जिसे मैं देखना चाहता था / जुबान वह नहीं बोलती जिसे मैं चाहता था बोलना |मध्यवर्गीय चेतना दो चरित्रों को साथ लेकर चलती है |वह दास भी है और दमनकारी भी|वह स्वतंत्रता चाहता भी है और स्वतंत्र होने देना भी नहीं चाहता |सपने में हमेशा एक सुन्दर स्त्री आती है और अपने हाथों में बारूद लिए /उसके हाथ बहुत ही कलात्मक होते /किसी कलाकार द्वारा फुरसत में बनाए हाथों की तरह ..अब बारूद लिए स्त्री निश्चय ही कवि द्वारा अपनी अस्मितामूलक सत्ता बचाने और बनाने में उद्धत स्त्री का बिम्बात्मक चित्रण है ,परन्तु उसके हाथों की तारीफ में डूबी अगली पंक्तियाँ उन तमाम मध्यवर्गीय मानसिकता को उजागर करती है , जो उसकी यौनेच्छाओं को शांत करने में लगी रहती हैं|फ्रायड इसी को लिविडो कहते हैं|माँ में हमेशा एक पुरुष दीखता था मुझे ..उस स्त्री का चित्रण है जो शरीर से स्त्री और चेतना से पुरुष है |यह पंक्ति लान्का के सुप्रसिद्ध विचार वीमेन डज नाट एक्जिस्ट का काव्यात्मक रूपांतरण है|विचार कविता में ढलकर किस तरह आम जन तक पहुँचती है इसका सुंदर उदाहरण भी|शक ,संशय और डर मध्यवर्ग का चिर परिचित मिजाज है |अपने ही विश्वासघाती व्यक्तिव से मनुष्य इतना आतंकित है कि उसे किसी पर भरोसा नहीं है|माँ , बहन, बच्चे, प्रेमिका सब पर शक करता है ,अपने डर को तुष्ट करने के लिए डराता है ,मनोनुकूल आचार और प्यार करने पर मजबूर करता है|यह भी जानता है कि यह एक मनोरोग है परन्तु वह लाचार है| उसका सबसे बड़ा संकट है पवित्रता, जो उसे विरासत में मिली है|इसे बचाने के लिए वह कई जघन्य अपराध भी करता है| कविता का दूसरा हिस्सा गाँव और शहर के बीच फंसे मध्यवर्ग का बयान है |कुछ खेत, कुछ जानवर, कुछ बच्चे, कुछ औरतें और /ढेर सारे झूठ पीछे छूटे जा रहे थे /यात्रा करना जरूरत नहीं मेरी मजबूरी थी/लाभ बहुत ज्यादा नहीं था/ फिर भी पेट के लिए फिरते रहना मेरी मजबूरी है ......शहर पहुँचते ही पवित्रता के सारे आडम्बर धराशायी हो जाते हैं | पहली बार भीख मांगते हुए मैंने जाना /दुनिया में कुछ भी पवित्र नहीं है /अभी -अभी जाना... शहर के नजदीक आते गाँव का दूर हो जाना सांस्कृतिक बिछुडन का शिकार बनाता है |वहीँ शहर पवित्रता के ढोंग का चेहरा साफ़ और स्पष्ट करने में भी माहिर है|असलम दा के बहाने एक बौद्धिक और एक सामान्य व्यक्ति के बीच के फर्क को कवि दिखाना चाह रहा है|अपनी जिन्दगी बिना अनावश्यक पचड़े के न जी पाने की सारी भडास निकाली है|कविता के चौथेपन में कवि डर जैसे शाश्वत सत्य का उद्घाटन कर रहा है|डर जीवन का उपहार भी है और कमजोरी भी |डर का अपना मनोविज्ञान है| राजनीतिक सत्ता खुद की स्थापना के लिए जनता में डर बनाये रखना चाहती है तो उसी अनुरूप क़ानून भी बनाती है| घार्मिक सत्ता नैतिकता और पवित्रता के नाम पर डर का निर्माण करती है ,तो समाज मर्यादा के नाम पर डर पैदा करता है|व्यक्ति अपने जीवन और अस्मिता की रक्षा के लिए भयभीत रहता है, परन्तु तब तक जब तक भय संभव है|भय के अंतिम क्षणों में साहस की उत्पत्ति होती है| युद्ध नीति कहती है -दुश्मन को हमेशा तीन तरफ से ही घेरना चाहिए, एक तरफ से भागने का मौका देना चाहिए |वर्ना वह अंतिम सांस तक लडेगा | यह डरना नितांत आवश्यक है /डर-डर के ही की जा सकती है सफल यात्रा..कहते ही कवि इंगित करता है कि मध्यवर्गीय मनोविज्ञान में डर अपनी अस्मिता, पवित्रता, नैतिकता, संस्कार आदि को बचाए रखने के लिए ही आता है| यही डर सफलता की कुंजी है, परन्तु यह डर घातक हो जाता है ,जब डर अभिव्यक्ति और सोच की स्वतंत्रता पर हावी हो जाता है| डरो ताकि डरने से नहीं लगता चुनरी में दाग /भागो ताकि भागने से सोयी रहती है आत्मा...../ डर-डर कोई स्वप्न देखता है भविष्य के लिए /डर -डर कर कुछ लोग करते हैं आत्महत्या ..... / डर कर कुछ मुंह खुल नहीं पाते ..कविता के पांचवें हिस्से में कई छोटी-छोटी चीज़ें अहम हो जाती हैं| फुलपैंट ,कुरता , बंडी, रुमाल, छोटी घटनाएँ, रिश्ते ,रिश्तों की छोटी-छोटी मगर अहम यादें ,सबकुछ मध्यवर्गीय जीवन में विशालता के साथ उपस्थित होता हैं |जीवन में इनका अपना हिस्सा है|अपना सरोकार है|निशांत लिखते हैं -छोटे -छोटे शब्दों के भी होते हैं /बहुत बड़े-बड़े अर्थ /बहुत बड़े -बड़े साम्राज्य /एक उम्र में समझ में आती है यह बात /..साइकिल, प्रेम, चाय , झगड़ा ,रूठना - मनाना,एस एम् एस सबकुछ एक आम जीवन में उतना ही महत्वपूर्ण होता है ,जितना कि राज्य के लिए प्रधानमन्त्री, राजनयिक, विदेश नीति, मुद्रास्फीति, परमाणु और मिसाइलें |छोटी चीजों का अस्तित्व कितना महत्वपूर्ण होता है और हो सकता हैं या होना चाहिए ,इसे बतलाते हुए निशांत लिखते हैं -इतने बड़े राष्ट्रपति भवन में /एक कबूतर तक नहीं बैठ सकता /बड़े शर्म की बात है /दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र में /कबूतरों तक को बैठने के लिए जगह नहीं है .. अर्थात लोकतंत्र तभी तक सार्थक है, जब तक लोक जिन्दा है|जब तक केंद्र हाशिये से परिचालित है|अन्त्योदय सबसे बड़ा लक्ष्य है|छोटी और मामूली चीजें लोक जैसी महत्वपूर्ण शक्ति का निर्माण करती हैं|इन्हीं छोटी चीजों में मध्यवर्ग का मैं भी महत्वपूर्ण है और इतना महत्वपूर्ण कि आपका जीवन ,आपके अस्तित्व की सत्ता भी इसी मैं पर टिकी है|


'मैं में हम -हम में मैं' कविता कई मैं के मिलने से बने हम और हम की परिधि में उलझे कई मैं की गाथा है| निशांत ने कई मैं की कहानियों को बारीकी से रखा है, जो समवेत रूप में हम की कहानी है|हम ही नहीं हैं 'सबकुछ'/सबकुछ में एक बूँद में एक बूँद हैं हम /हम में ही कुछ है /कुछ में ही मैं हूँ -हम है .. कवितायेँ छात्र जीवन की चुहलबाजियों और यादों से पटी पड़ी हैं|इनमे एक जीवन्तता है|कभी न खत्म होने वाला एक सिलसिला है|कितनी छोटी -छोटी बातों से खुश हो लेते हैं 'हम '/तो कुछ दुखी भी /मसलन हजार रूपये की ब्रांडेड जींस चार सौ में मिल गयी /पडोसी वर्मा की बेटी मुस्कुराकर के बगल से सट कर गयी... |कविता के दौरान निशांत उन तमाम परेशानियों और उधेड़बुनों से भी दो चार होते हैं, जिनसे छात्र जीवन जूझता है| ....और बार-बार आत्महत्या के बारे में सोचते हुए /कमरे से बाहर निकलता /जीने की मजबूरी को कंधे पर लादे /कमरे में उसी ब्लेड से नाखून काटता ....../ माँ पंखा झलती /और कहती -"आज बहुत उमस है |/रात को बारिस होगी|"/ 'पिता' कहते -"बस ,वह बन जाये 'कुछ'|"...


"फिलहाल सांप कविता" संग्रह की चौथी कविता है|कवि ने इसे बाबा नागार्जुन को समर्पित किया है|बाबा लोक और लोक राजनीति के लोकमान्य धुरंधर थे|कविता का पहला पैरा ही बाबा के प्रति समर्पण को स्पष्ट कर देता है|साथ ही उन तमाम अवसरवादियों और विचारधारा के दलालों के प्रति अपने विरोध को भी मुखर रूप देता है जो पुरस्कार और साहित्य के नाम पर तीसरे दर्जे की राजनीति करते हैं|उम्र बढ़ने के साथ-साथ वह होता जा रहा है सन्त /बढती जा रही है लोलुपता ..कह कर निशांत तमाम घोंघा बसंतों को बेनकाब कर दते हैं|संपादकों को जनतांत्रिक तानाशाहों से जोड़ कर साहित्य और सियासत के सियारी चेहरे में बेनकाब कर देते हैं|खींसों के खेल से तथा अदृश्य पूँछों की सलामी के सहारे साहित्य की सीढियाँ चढ़ने वाले तमाम लोगों की खबर इस कविता में ली गयी है|एक कवि ने चिल्ला कर कहा /उदारवादी बाजारवादी और विज्ञापन के शिखर कालखंड में /दारू पीने-पिलाने से इनकार करने वाला व्यक्ति /सबकुछ हो सकता है कवि नहीं हो सकता ... |कविता का दूसरा खंड उस व्यक्ति का प्रतिनिधित्व करता है, जो पिछली कविताओं में अपने अस्तित्व और उसकी सत्ता की स्थापना के लिए चिंतित था|वह खूंसटों की खबर ले रहा है| अपनी स्थापना की घोषणा कर रहा है|वह बता रहा है कि ये कविता जो वह लिखता है, एक्सपायर्ड दिमाग से बाहर की चीज़ है|माओत्से कहते थे -साहित्य और कला का कार्य हमेशा से ही पर्दाफाश करना रहा है| सम्पादकीय चरित्र की बखिया उधेड़ते हुए निशांत साफ़ -साफ़ लिखते हैं एक सम्पादक सरकारी कमरे में तीन तरफ /चाणक्य प्लेटो और ईश्वर के शांति दूत प्रधानमंत्री की तस्वीर लगाये /चौथी तरफ अपनी तस्वीर लगाने की इच्छा लिये / थर-थर काँपता है रात को बिस्तर में /उसके सपने में आता है एक 'रक्त-स्नात-पुरुष' बीड़ी जलाता और अँधेरे में पूछता - पार्टनर तुम्हारी पोलिटिक्स क्या है ? जिन झोलाछाप डाक्टरों के कारण साहित्य क्षय रोग का शिकार हुआ है तथा खांसता हुआ दम तोड़ रहा है निशांत ने उन्हें एक- एक कर अपने निशाने पर लिया है|साहित्य अपने आप में एक महान काम है |लोग इसे शौक या प्रसिद्धि के लिए इस्तेमाल करते हैं |निशांत इनके प्रति भी खासा रोष प्रकट करते हुए कहते हैं .. दफ्तर के वक्त पूरी दफ्तरी/कविता के वक्त कविता के अलावा और कुछ नहीं होना चाहिए .. चीन के प्रसिद्ध साहित्यकार लू-शुन भी क्रन्तिकारी काल का साहित्य निबंध में अपने विचार व्यक्त करते हैं कि.. क्रांतिकारी साहित्य क्रांति के वक्त लिखा साहित्य नहीं बल्कि क्रांति के सम्बन्ध में क्रांतिकारियों द्वारा लिखा हुआ साहित्य होता है,परन्तु क्रांति के वक्त साहित्य नहीं लिखा जाना चाहिए| क्रांति के वक्त केवल क्रांति और साहित्य के वक्त केवल साहित्य|इसके लिए क्रांतिकारी साहित्य थोड़ी देर से भी शुरू हो तो कोई हर्ज नहीं है|काम के प्रति निष्ठा ही काम में परफेक्शन देता है|निशांत कविता में घुसी हुई हर फर्जी प्रवृति को उधेड़ते और निषेध करते हैं|चौथी लम्बी कविता के चौथे हिस्से में युवा समकालीन कवियों को लताड़ लगाते हैं कि उनका लक्ष्य पूँजी और पद प्राप्ति हो गया है,संपादकों के इर्द-गिर्द मंडराना उनकी फितरत हो गयी है|वे लिखते हैं -पूँजी हमारा परम मित्र है /जाति हमारी पहचान /सूचना जाल हमारे मददगार हैं /आप हमारे पालनहार ..| समकालीन कविता सचमुच फार्मूलाबद्ध हो गयी है|बिलकुल हिंदी सिनेमा की तरह ..थोडा आदर्श, थोडा नाच-गाना, थोडा इमोशनल ड्रामा,थोडा डायरेक्टर,एक्टर का नाम थोड़ी पब्लिसिटी हो गयी फिल्म सौ करोड़ के पार|इसी तरह संपादकों से मोबाइल मैनेजमेंट और चलताऊ विमर्शों से कविता में पुरस्कृत गोबर भरे जा रहे है|भाषा को साहित्य की कसौटी पर इसलिए कसा जाता है क्योंकि साहित्य ज्ञान मीमांसा का सर्वोत्कृष्ट साधन है|बिना नये ज्ञान का उत्पादन किये जो कुछ लिखा जायेगा |सब कूड़ा ही तो होगा |अनावश्यक ,बेमतलब ,सिर्फ भाषा चमत्कार कुछ भी हो साहित्य तो बिलकुल नहीं हो सकता | इस समय के पास नहीं है विचारों की वह सान /जो आन्दोलन की जमीन बना सके ...आगे लिखा है.. ठीक रीति काल में "कन्हाई सुमिरन के बहानो है"की तर्ज पे /वे समझ गये हैं इस समय की कविता पढने के लिए नहीं /सजे-धजे पृष्ठों पर छपने के लिए लिखी जा रही है|निशांत ने बेरोजगारी से मुक्ति और पूँजी के लोभ कविता के जन्म के दो तत्कालीन आधार बताये हैं |सम्पादक विज्ञापनों के लिए कवितायेँ बटोरता है तो कवि चंद लघु पत्रिकाओं की सीढियाँ बनाकर रोटी,फिर ऐशो -आराम तक पहुंच बनाता है|जनता को भी कवि कठघरे में खड़ा करता है-अब, खून नहीं खौलता किसी को सरेआम हत्या पर /बस अखबार में रिपोर्ट लिखी-पढ़ी जाती है / काली पट्टी बांधकर प्रदर्शन किया जाता है /मोमबत्ती जलाकर जुलूस निकाली जाती है /अंत में सारी घटनाएँ एक फिल्म में तब्दील हो जाती हैं | पांचवें खंड में कविता के अंतर्वस्तु के सम्बन्ध में बात करती है|कविता का डायरी और छोटी चीजों का इतिहास होते जाना आज की कविता की विशिष्टता है| कविता की शैली कुछ कुछ समाचार शैली है|घटनाओं को विस्तार से समझाती सुंदर लड़की के नीचे तुरत-फुरत की घटनाएँ शब्द बनकर दौड़ती हैं|मगर घटनाओं के विस्तारीकरण से निशांत आपको आपको बोर नहीं करते|कवितायेँ सीधी-सपाट भाषा में सत्ता की तमाम साजिशों का पर्दाफाश करती चली जाती है, जिसमे केंद्र चूतड़ अटकाए जमा है और हाशिया चूतड लिए धक्का मुक्की करता केंद्र की ओर दौड़ रहा है|किसी को सम्पूर्ण परिवर्तन नहीं चाहिए ; हिस्सा चाहिए लूट में हिस्सा| हर परिवर्तन बस अपनी स्थिति तक के परिवर्तन की आकांक्षा तक सीमित है |


'कैनवास पर कविता' रंगों की वैचारिकी को शब्दबद्ध करने का सुंदर प्रयास है| इसे रंगों का भावानुवाद भी कह सकते हैं , जिसमे कुछ -कुछ दार्शनिक टच भी मिलता है|संग्रह के इस अंतिम खंड में निशांत साबित करते हैं कि कला वैचारिकी का माध्यम भर है|कला का असल उद्देश्य नई वैचारिकी का जन्म है|चाहे बात रंगों में हो या शब्दों में नई बात अगर सलीके से कही जाएगी,तभी महत्वपूर्ण होगी|अंतिम पंक्ति इसे और भी पुष्ट करती है|जब कुमार अनुपम की पेंटिंग्स को देखते हुए कहते हैं -वह लिखता है कविता रंगों की भाषा में |


संग्रह को पढ़ते हुए पाठक यह महसूस करता है कि निशांत अपनी कविताई और समय के प्रति प्रतिबद्ध हैं|वह समस्याओं पर पैनी और निडर नजर रखते हैं| सबसे ज्यादा उनकी बेबाकी मुझे प्रभावित करती है|पांच लम्बी कविताओं से वे विश्वास दिलाते हैं कि कविता की पटकथा और शिल्प में आज भी नये और सार्थक प्रयोग हो रहे है|कविता में मुक्तिबोध के चिरपरिचित वाक्यों का प्रयोग उनके परम्पराबोध को भी दर्शाता है| मेरे विचार से जवान होते हुए लड़के का कबूलनामा के बाद उनका यह दूसरा संग्रह जी हाँ लिख रहा हूँ भी एक योग्य प्रयास है,जिसके लिए निशांत साधुवाद के पात्र हैं| आशा है कि आगे भी उनकी रचनाधर्मिता से साहित्य लाभान्वित होता रहेगा| 





अरमान आनंद,शोध-छात्र ,हिंदी विभाग बी.एच.यू. 07499261303

Wednesday, 17 April 2013

युवा कवि रामाज्ञा शशिधर की कविता मुठभेड़ की व्याख्या।

युवा कवि रामाज्ञा शशिधर की  कविता मुठभेड़ सत्ता की विषाक्त जड़ता के प्रति एक प्रतिक्रिया है। यह कोमल सपनो का आन्दोलन है। जीवन्तता की जद्दोजहद के लिए छेड़ा हुआ जिहाद है। जिसे सत्ता और उसे बघनखे मौत की आक्रांत शांति देने की फ़िराक में हैं।
कविता की शुरुआत गिलहरी से होती है। जो प्रतिनिधि है उस तमाम मासूम जनता की जिसे चुपके से सत्ता अपनी हवस और शौक का शिकार बना रही है। फुदकती हुई मासूम गिलहरी का पेड़ की छाल में बदल जाना दरअसल सत्ता द्वारा आम जनता की आजादी को निचोड़ उसे संसाधन में परिणत करने के बाद बाजार में परिवर्तित करने की प्रक्रिया है ।उस बाजारीकरण के प्रति उसकी कर्तव्यनिष्ठा है सत्ता जिसकी दलाली करती है।
कवि सत्ता के स्वभाव की नयी व्याख्या में व्यक्त करता है कि सत्ता ने पगडंडियों को ध्वस्त कर दिया है बुटों और एडियों से उसके नामोनिशान मिटा दिए हैं। पगडंडियों के साथ मिटाए हैं उसने दिशाओं के स्वरुप और संस्कार। दिशाओं के साथ उसने आजादी की तमाम संभावनाओं कभी गला रेत दिया है।
अक्षरों के अक्षारता पर उसने स्याही उड़ेल कर प्रश्नचिन्ह लगा दिया है। सत्ता को सबसे बड़ा डर इन अक्षरों से है। इसलिए उसने अपने अखबार और छापेखाने बनवाए हैं। सयाहियों की फैक्टरियां बनवाई। जो उन नन्हे विद्रोही शब्दों पर तेज़ाब की तरह उड़ेली जाती हैं जिनसे सत्ता की मंसूबों के अधूरे रह जाने का खतरा होता है।
मगर कोमल सपनों का आना जारी है।मई जून की दोपहरी में जली दूब का सावन में पनपना जारी है। ये वो सपने है जिनके नसीब में सत्ता की सलीबें आती हैं। सत्ता से टकराने को ठोस विचारों का तय होना जारी है और साथ ही जारी है एक मुठभेड़ जो शिकार और शिकारी का,बहेलिये के हाथ से छूटने को छटपटाते नन्हीं चोंच का,सत्ता के बघनखों में फंसे आजादी के गानों का।
........अरमान आनंद

कविता
मुठभेड़

तुमने पत्थर उठाया

दे मारा नवजात गिलहरी को

पेड़ की छाल में बदल गया वह

तुमने एड़ियों से रगड़ दी पगडंडी

चुपचाप गायब हो गयी दिशाएं

उड़ेल दी स्याही पृष्ठों पर

मर गए सारे के सारे अक्षर

मैंने देखे हैं पृथ्वी के वास्ते कोमल सपने

चिन्हित किये हैं ठोस विचार

उन्हें टांग दिए हैं सलीब पर तुमने

जो आज तक मुठभेड़ कर रहे हैं जीवित

तुम्हारे खिलाफ।

........रामाज्ञा शशिधर

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सर गणेश दत्त