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Thursday, 26 April 2018

बलात्कार के विरुद्ध शिव शक्ति कुमार की कविता के बाद बलात्कार

के बाद बलात्कार

एक लड़की का बलात्कार हो जाने के बाद
और तीन बार उसके साथ बालात्कार होता है
फर्क सिर्फ इतना होता है
कि उसकी चीखे गुम हो जाती है
पहली बार मेजो की थपथपाहट में
दूसरी बार हथौड़े की ठकठकाहट
और तीसरी बार
सडक की फुसफुसाहट में
           

Tuesday, 24 April 2018

धर्मवीर यादव गगन की कविता वीरांगना फूलन

जब मैं बुड्ढा हो जाऊँगा

तब मेरा बेटा मेरी गोद में बैठकर

मेरी जवानी के किस्से पूछेगा

मैं आंसू बहाते हुए

बस यही कह पाऊंगा

मेरे बच्चे

मेरी जवानी में कोई वीरांगना फूलन नहीं थी

इसलिए वो दरिंदे

किसी की भी गर्दन काटकर

रस्सी में बाँध

पेड़ से लटका देते

किसी जवान लड़की का

रेप कर उसे जिन्दा जला देते

या उसकी हत्या कर

उसे पेड़ से लटका देते

हम सब उस समय उस टँगी हुई

लाश के चारो ओर बैठकर विलखते रहते

जब बच्चा पूछेगा

कि बाबा आप लोग

‘बुआ फूलन’ क्यों नहीं बन गए ?

हम कुछ नहीं बोल पाएंगे

तब भी बैठे – बैठे हम आंसू बहाएंगे.

मेरा बच्चा मेरी गोंद से उठकर

मेरी आँखों में आँखें डालकर

घूरते हुए फूलन बन, वहां जाएगा

जहाँ कोई निहत्था लड़ रहा होगा

तलवार बाज हाथों से;

उस निहत्थे हाथ को मजबूत करेगा —

मनुष्यता के लिए

समानता के लिए

बंधुता के लिए l

- धर्मवीर यादव गगन

अम्बर रंजन पांडेय की कविता रक्तपात

रक्तपात

कदली के कुञ्ज में, कोने में जहाँ दीपक की आड़ जैसी अंध-ज्योत थी
वहीँ कौमार्य नष्ट किया उसका
किसे समाचार होता
यदि कौओं का झुण्ड 'षडज षडज'
करता नहीं ऊपर;  देखकर उसका
शुद्ध, गाढ़ा रक्त
उसी की कोपवती आँखों के रंगवाला

Saturday, 21 April 2018

अशोक कुमार पांडेय की कविता बुरे समय की कविताएं

बुरे समय की कविताएं
_______________

(एक)

छिपता है राम की ओट मे बलात्कारी
हत्यारा कंधे पर हाथ रखे करता है अट्टहास
घायल कबूतर का लहू सूखता जाता है माथे पर
लुटेरा तूणीर से निकालता है तीर और सर खुजाता है

मूर्तियों के समय में कितने निरीह हो तुम राम
और कितने मुफ़ीद

-
(दो)

तिरंगा उसके हाथों मे कसमसाता है
रथ पर निःशंक फहराता है भगवा
एक पवित्र नारा बदलता है अश्लील गाली में
और ढेर सारा ताज़ा ख़ून नालियों का रंग बदल देता है

भावनाएं सुरक्षित
आत्माएं क्षत-विक्षत

-
(तीन)

लड़की की उम्र आठ साल
देह पर अनगिनत चोटों के निशान
झरने की तरह बहता ख़ून
कपड़े फटे
आँखें फटीं

प्रतिवाद करता है हत्यारा
लेकिन उसका नाम तो आसिफा है न!

-
(चार)

भूखी है जनता आधी
आधी की देह पर धूल के कपड़े
आधी जनता पिटती है रोज़
आधी बिना अपराध जेल में
आधी की इज़्ज़त न कोई घर
आधी जनता उदास है

बाक़ी आधी जनता की ख़ुशी के लिए 
बस इतना काफी है।

---
अशोक कुमार पाण्डेय

रमेश प्रजापति की कविता प्यारी बेटियों

प्यारी बेटियो!
अब तुमको आसान नही रह गया बचना
भेड़ियों, कुत्तों और भालुओं
गिद्धों और कव्वों से
इन आंखों के सामने ही
नोंच डालते हैं नाज़ुक अंग

लपलपाती जीभ और आंखों की क्रूरता के बीच
कितना बेमानी लगता है
इस बेरहम समय के माथे पर चिपका *बेटी बचाओ* स्लोगन

मां ,बाप,भाई
जब भी चाहते हैं बचाना
इंशानियत को तार-तार करते दरिंदों से
हाथ धोना पड़ता है उन्हें
तब अपने ही जीवन से
कहीं कुछ भी सुरक्षित नहीं सिवाय आदमखोर आदमियों के

जिन्हें रक्षक होना था
वहीं तेरे जीवन और अस्मिता के भक्षक
और लुटेरे बने हैं
आगे नाथ न पीछे पगाह की तरह
बेपरवाह घूम रहे हैं
जो चाहते हैं बक देते हैं

इस बदलती मर्दवादी मानसिक और सामाजिक परिदृश्य के बीच
तुम्हारा पैदा होना ही सबसे बड़ी त्रासदी है बेटियो!
जिन्हें बोलना चाहिए वे सब गूंगे-बहरे बने बैठे हैं

हम कितना चाहे ढोल पीटे कि तुम
पुरुष वर्चस्व को तोड़कर
उड़ो मुक्त गगन में
पर शातिर बाजों के ख़ूनी पंजे
तुम्हारे पंखों को नोचने पर हरदम उतारू रहते हैं

इस आब-ओ-हवा में तुम्हारे सांस लेने से
आत्मग्लानि से भरा इतना डर गया हूँ कि
कायरता की सब हदें पार कर चुका हूं बेटी!

एक कवि कर भी क्या सकता है सिर्फ,
भाषा बदलने के
विचार बदलने के
शब्द बदलने के
प्रतिरोध करने के
परन्तु कविता से दुनिया कतई नहीं बदल सकता है

तुम्हारे पैदा होने के डर से ही
यह धरती बेबस और लाचार बनी कांप रही है
तुम्हारे कोमल कदमों की थाप से हवा हांफ रही है
पेड़ों का कलेजा थरथरा रहा है
आसमान का चेहरा फीका पड़ रहा है

मां की कोख में हीं नहीं
दरिंदों से भरी
इस धरती के किसी भी कोने में
तुम सुरक्षित नहीं हो बेटी!

प्रदीपिका सारस्वत की कविता ध्वंश के इस काल में

प्रदीपिका सारस्वत

ध्वंस के इस काल में 

हथियार उठा लो, लड़कियों
पैने कर लो 
दांत और नाखून
इज़्ज़त और आबरू नाम का महीन रेशम
तुम्हें कमज़ोर कर देने की साज़िश भर है
मत देखो उनके चेहरे
जो तुम्हें सिखाते हैं
कि शर्म तुम्हारा गहना है

तुम्हें सीखना होगा
कि तुम्हारी कोख, तुम्हारी ताकत है
मत पालने दो उसे, किसी की कमज़ोरी
नाज़ुक देह पर जब तक इतराती रहोगी
तुम बनी रहोगी सजावटी सामान, खुली तिजोरी

उठो, निकलो, देखो, चुनो और खत्म कर दो सब कुछ
जो दूर करता है तुम्हें, तुम्हारे होने से
काट दो सब खूबसूरत जाल

ध्वंस के इस काल में 
तुम बनी रहीं कोमलांगी
तो उसके दिए निशानों को 
उसके गहनों तले छुपाए
गाती रहना शोकगीत
उसकी संस्कृति के उत्सवों में 
और देखना, तुम्हारी अपनी संस्कृति की कहानी
तुम्हारे आंसू, तुम पर हंसते हुए लिखेंगे

मृदुला शुक्ल की कविता एक दिन

मृदुला शुक्ला

एक दिन 

एक दिन जी उठेंगी
बलात्कार के बाद खुद को फूंक लेने वाली औरते
और वो भी जो भोगे जाने के बाद
लटका दी गयी थीं पेड़ों पर

उनमे भी जान पड़ जायेगी
जिन्हें भोगने के लिए तुम्हारा बल कम था
तुम्हे यकीन नहीं था खुद के अकेले पौरुष पर
तुम समूह बना कर टूटे थे
उस एक अकेली स्त्री पर

उन्हें भी जीना होगा जो मर गयी थी गिराते हुए
तुम्हारा अवैध गर्भ
शहर के किसी सरकारी अस्पताल में
कम उम्र और खून के कमी से

वे आदिवासी लडकियां
भी जी उठना चाहेंगी
जिन्हें सिर्फ इसलिए मार दिया गया
की वे चरा रही थी बकरियां
उनके हाथ में बन्दूक नहीं थी
मगर वे नक्सली करार दी गयी थी
बलात्कार के बाद

अपने वस्त्र और कौमार्य
संभालती ये स्त्रियाँ
खुद को मार लेती हैं ,अथवा मार दी जाती है
नग्न होते ही
भग्न होते ही कुंवारापन

ये औरतें जी उठेंगी समूह में
चौराहों पर चलेंगी
गर्दन झुकाए नहीं
सिर उठाये
उनकी आँखों में पानी नही
खून उत्रा हुआ होगा
आँचल वे ओढ़े ही नहीं होंगी
वे सब होंगी निर्वस्त्र

कुछ स्त्रियों के हाथ में होगा बैनर
जिस पर किसी अपराधी का चित्र नहीं
बने होंगे मानव लिंग

और सुनो
वे अपने हाथों में
मोमबत्तियां नहीं थामे होंगी
बल्कि वे संभाल कर लिए होंगी
अपने कटे हुए स्तन,क्षत विक्षत योनि
क्या तुम्हे ऐसी किसी कल्पना से सचमुच डर नहीं लगता
विकसित सभ्यता के आदिम लोगों !

सुमन केशरी की कविता बेटी

सुमन केशरी

बेटी

इतना डर है बिखरा हुआ कि
मन में आता है
तुम्हें बीज के अंतर्मन में
छिपे अंकुर-सा
अपने भीतर ही पालूँ
तब तक 
जब तक कि तुम पूर्ण पेड़ न हो जाओ 
पर फिर लगता है कि क्या तब तुम 
झेल सकोगी
धूप के ताए
हवा के थपेड़े
बिजली के गर्जन-तर्जन को
क्या जमा सकोगी अपने पाँव 
पृथ्वी पर मजबूती से..

डर डर कर भी
बिटिया
इतना तो जान चुकी हूँ
अपने दम पर कि
तुझे बीज की तरह
उगना पड़ेगा
अपने बूते ही
अपने हिस्से की धूप, हवा और नमी पर हक जमाते...

महाराज संतोषी की कविता आसिफ़ा

आसिफा

ईश्वरीय उपस्थित के बीच
कोई मासूम
इस तरह
तडपा तडपा कर
मार दी जाए
और मेरे शहर  में
चर्चा  कुछ और हो
रोहिंग्या रोहिंग्या  का शोर हो

मै इस शोर के बीच
तुम्हारा  नाम पुकारूंगा
आसिफा आसिफा
तुम्हें  जिन्होंने  मारा
उन के पास
जैसे  बंधक  बना बैठा है
मेरा ईश्वर
चुपचाप  देखता  रहता है
आस्था  का तमाशा

Maharaj Santoshi, प्रसिद्ध कश्मीरी कवि

गौहर रज़ा की कविता ज़ख्म

ज़ख़्म

जिस्म पर ज़ख़्म हैं,
आँखों में लहू उतरा है,
आज तो रूह भी लरज़ां  है मेरी,
ज़हन पत्थर की तरह,
सख़्त-ओ-बेजान सा, मफ़लूज  सा,
बेहिस, बेकार
इस में चीख़ों के सिवा
कुछ भी नहीं, कुछ भी नहीं, कुछ भी नहीं

मुझ से मत पूछो मेरा नाम तो बेहतर होगा
मैं वही हूँ के जिसे
सारी बदमस्त बहारों को परखना था अभी
मैं वही हूँ के जिसे
फूल सा खिलना , महकना था अभी
झूमते गाते हुए झरनों की धुनों को सुन कर
मेरे पैरों को थिरकना था अभी
दरसगाहों  की खुली बाहों में जाना था मुझे
और एक शोले की मानिंद , धधकना  था मुझे

मैं वही हूँ जिसे
मंदिर की हदों के अंदर
तुम ने जूतों के तले रौंद दिया
मैं वही हूँ के जिसे
सारे भगवान खड़े,
चुप की तस्वीर बने
तकते रहे, तकते रहे, तकते रहे
और मेरे जिस्म का हर क़तरा-ए-ख़ून
थपकियाँ दे के सुलाने का जतन करता रहा
मुझ को समझाता रहा
मौत के पार हर एक ज़ुल्म सिमट जाएगा
तब कोई हाथ तुझे छू भी नहीं पाएगा

मैं वही हूँ जो दरिंदों के घने जंगल में
बैन करती रही इंसाफ़ के दरवाज़े पर
मुझ को मालूम नहीं था के तुम्हें
बाप का साया भी सर पर मेरे मंज़ूर नहीं

जिस्म पर ज़ख़्म हैं, गहरे हैं
बहुत गहरे हैं
मुझ से मत पूछो मेरा नाम तो बेहतर होगा

मादर-ए-हिंद हूँ मैं

वो जो ख़ामोश हैं शामिल हैं ज़िना में मेरी

-गौहर रज़ा

निर्भया को समर्पित कैफ़ी आज़मी की नज्म उठ मेरी जान! मेरे साथ ही चलना है तुझे….

उठ मेरी जान! मेरे साथ ही चलना है तुझे….

कल्ब-ए-माहौल में लरज़ाँ शरर-ए-ज़ंग हैं आज
हौसले वक़्त के और ज़ीस्त के यक रंग हैं आज
आबगीनों में तपां वलवला-ए-संग हैं आज
हुस्न और इश्क हम आवाज़ व हमआहंग हैं आज
जिसमें जलता हूँ उसी आग में जलना है तुझे
उठ मेरी जान! मेरे साथ ही चलना है तुझे

ज़िन्दगी जहद में है सब्र के काबू में नहीं
नब्ज़-ए-हस्ती का लहू कांपते आँसू में नहीं
उड़ने खुलने में है नक़्हत ख़म-ए-गेसू में नहीं
ज़न्नत इक और है जो मर्द के पहलू में नहीं
उसकी आज़ाद रविश पर भी मचलना है तुझे
उठ मेरी जान! मेरे साथ ही चलना है तुझे

गोशे-गोशे में सुलगती है चिता तेरे लिये
फ़र्ज़ का भेस बदलती है क़ज़ा तेरे लिये
क़हर है तेरी हर इक नर्म अदा तेरे लिये
ज़हर ही ज़हर है दुनिया की हवा तेरे लिये
रुत बदल डाल अगर फूलना फलना है तुझे
उठ मेरी जान! मेरे साथ ही चलना है तुझे

क़द्र अब तक तिरी तारीख़ ने जानी ही नहीं
तुझ में शोले भी हैं बस अश्कफ़िशानी ही नहीं
तू हक़ीक़त भी है दिलचस्प कहानी ही नहीं
तेरी हस्ती भी है इक चीज़ जवानी ही नहीं
अपनी तारीख़ का उनवान बदलना है तुझे
उठ मेरी जान! मेरे साथ ही चलना है तुझे

तोड़ कर रस्म के बुत बन्द-ए-क़दामत से निकल
ज़ोफ़-ए-इशरत से निकल वहम-ए-नज़ाकत से निकल
नफ़स के खींचे हुये हल्क़ा-ए-अज़मत से निकल
क़ैद बन जाये मुहब्बत तो मुहब्बत से निकल
राह का ख़ार ही क्या गुल भी कुचलना है तुझे
उठ मेरी जान! मेरे साथ ही चलना है तुझे

तोड़ ये अज़्म शिकन दग़दग़ा-ए-पन्द भी तोड़
तेरी ख़ातिर है जो ज़ंजीर वह सौगंध भी तोड़
तौक़ यह भी है ज़मर्रूद का गुल बन्द भी तोड़
तोड़ पैमाना-ए-मरदान-ए-ख़िरदमन्द भी तोड़
बन के तूफ़ान छलकना है उबलना है तुझे
उठ मेरी जान! मेरे साथ ही चलना है तुझे

तू फ़लातून व अरस्तू है तू ज़ोहरा परवीन
तेरे क़ब्ज़े में ग़रदूँ तेरी ठोकर में ज़मीं
हाँ उठा जल्द उठा पा-ए-मुक़द्दर से ज़बीं
मैं भी रुकने का नहीं वक़्त भी रुकने का नहीं
लड़खड़ाएगी कहाँ तक कि संभलना है तुझे
उठ मेरी जान! मेरे साथ ही चलना है तुझे

निर्भया को समर्पित बाबुषा कोहली  की कविता दंड 

[ सोलह दिसंबर 2012 की काली रात के बाद लिखी ये कविता निर्भया को समर्पित]

ओ मेरे देश !

यदि इस घोर विपत्ति काल में मेरे मुँह पर छाले पड़ जाएँ
और मैं कुछ कह न सकूँ तो तू मुझे दंड देना

मेरे गूँगेपन को इतिहास के चौराहों पर धिक्कारना

ओ मेरी मिट्टी
मेरे फेफड़ों में भरी हवाओं
और मुझे सींचने वाले जल

इस कठिन समय में मेरे कंठ की तटस्थता पर थूकना

ओ मेरे मुक्त आकाश
ओ विनम्र पेड़ और धधकती अग्नि शिखाओं
जीभ में भर आए फोड़ों के लिए मुझे दंड देना

फाँसी से कम तो हरगिज नहीं

इस चालाक चुप्पी के लिए मेरे शव को भी दंड देना
अपनी स्मृतियों में दिन रात कोड़े मारना आजीवन

कुमार विश्वास की कविता विदा लाडो

विदा लाडो!
तुम्हे कभी देखा नहीं गुड़िया,
तुमसे कभी मिला नहीं लाडो!
मेरी अपनी दुनिया की अनोखी उलझनों में
और तुम्हारी ख़ुद की थपकियों से गढ़ रही
तुम्हारी अपनी दुनिया की
छोटी-छोटी सी घटत-बढ़त में,
कभी वक़्त लाया ही नहीं हमें आमने-सामने।
फिर ये क्या है कि नामर्द हथेलियों में पिसीं
तुम्हारी घुटी-घटी चीख़ें, मेरी थकी नींदों में
हाहाकार मचाकर मुझे सोने नहीं देतीं?
फिर ये क्या है कि तुम्हारा ‘मैं जीना चाहतीं हूँ माँ‘ का
अनसुना विहाग मेरे अन्दर के पिता को धिक्कारता रहता है?
तुमसे माफी नहीं माँगता चिरैया!
बस, हो सके तो अगले जनम
मेरी बिटिया बन कर मेरे आँगन में हुलसना बच्चे!
विधाता से छीन कर अपना सारा पुरुषार्थ लगा दूंगा
तुम्हें भरोसा दिलाने में कि
‘मर्द‘ होने से पहले ‘इंसान‘ होता है असली ‘पुरुष‘!

डॉ. ए. दीप की कविता - अगले गैंगरेप पर अगली कविता लिखने तक

कविता

अगले गैंगरेप पर अगली कविता लिखने तक

किसी ने तुम्हें वेदना कहा
किसी को तुम दामिनी दिखी
किसी ने निर्भया कहकर पुकारा
और तकनीकी शब्दावली में
गैंगरेप-पीड़िता थीं तुम…
जो भी नाम हो तुम्हारा
नमन करता हूँ तुम्हें
कि तुम जागी रहीं तब तक
जब तक बारी-बारी से
सो नहीं गए
तमाम अंग तुम्हारे।

आत्मा का आवरण ही नहीं
आत्मा भी लहूलुहान थी तुम्हारी
फिर भी
पूरे तेरह दिनों तक
तुम जीवित बैठी रहीं चिता पर
सोई नहीं
हमारे जागने से पहले।

मलाला का मलाल
अभी साल ही रहा था
कि जाना
छह-छह पशुओं ने मिलकर
बनाया तुम्हें शिकार
अपनी हवस का…
आज मैं लज्जित हूँ
अपने पुरुष होने पर
कि वे सारे पशु
पुरुष जाति के थे।

तुम निढ़ाल
नंगी पड़ी रहीं
सड़क के किनारे
पर कृष्ण के इस देश ने
देर कर दी
दो गज कपड़ा तक जुटाने में…
बस में उन पशुओं ने
जो तुम्हारे शरीर के साथ किया
वही दुष्कर्म करते रहे
तुम्हारे अस्तित्व के साथ
वहाँ से गुजरने वाले
न जाने कितने पिता, पुत्र, पति और भाई…
लज्जित हूँ
कि उन पशुओं के साथ-साथ
ये भी पुरुष जाति के थे।

यकीन मानो
उस दिन से आज तक
नजरें चुरा रहा हूँ
अपनी दो साल की बेटी से
और हो जाता हूँ कुंठित
जाकर पास पत्नी के
कि मैं
पुरुष जाति का हूँ।

तुम्हीं बताओ
अब कैसे करूँ पाठ
दुर्गा सप्तशती का
कैसे चढ़ाऊँ जल
पवित्र तुलसी को
कैसे दूँ बहन को
रक्षा का वचन
और कैसे दबाऊँ पैर
अपनी माँ के
कि मैं पुरुष जाति का हूँ।

लज्जित हूँ
कि पकड़े गए केवल वही छह
और बाहर हैं उनकी जाति के
बाकी हम सारे पशु।

लज्जित हूँ
कि हमारी सभ्यता के
हजारों साल होने को आए
पर हम अदद पशुता को भी
जीत नहीं पाए।

लज्जित हूँ
कि अब भी वीर्य बहता है
हमारे भीतर
और आदम की भूमिका
अब भी निभाएगा
आदमी ही।

लज्जित हूँ
कि तुम्हारे जगाने के बाद
जागकर ये कविता तो लिख दी…
अब शायद बैठ जाऊँगा
अगले गैंगरेप पर
अगली कविता लिखने तक।

सुलोचना वर्मा की कविता स्त्री रु- ब- रु

लड़की, नारी, स्त्री
इन नामों से जानी जाती है
कई उपाधियाँ भी हैं
बेटी, पत्नी, माँ
अनेक रूपों मे नज़र आती है
पहले घर की रौशनी कहा
तो आँखो के नीचे काला स्याह क्यों ?

निर्भया, दामिनी, वीरा भी कहा
पर तब जब कुछ लोगो ने अपनी
पाशविकता का प्रमाण भी दिया
कुछ ने तो परी कहा
परियो से पंख भी दे डाले
जब उनके उड़ने की बारी आई
वही पंख किसी ने काट डाले
ऐसे समाज से आज भी
करती वो निर्वाह क्यों?

लड़की का पिता अपना
सबसे मूल्यवान धन दान कर
कर जोड़े खड़ा है
उधर लड़के की माँ को
लड़के की माँ होने का
झूठा नाज़ बड़ा है

झूठा इसलिए कि
उसकी संतान के लिंग निर्धारण में
उसका कोई योगदान नहीं है
तो क्या लड़की के पिता का
कोई स्वाभिमान नहीं है?

पिता का आँगन छोड़कर
नया संसार बसाया है
माँ के आँचल की छाँव कहाँ
"माँ जैसी" ने भी रुलाया है
रुलाने का कारण?

आज उसके बेटे ने
किसी दूसरी औरत को
प्यार से बुलाया है
आज वो इक माँ है
उस पीड़ा की गवाह है
जो उसकी माँ ने कभी
झूठी मुस्कान से दबाया था

बेटी के पैदा होने पर
कब किसने गीत गया था
पति के चले जाने के बाद
माथे की लाली मिटा दी लोगों ने
वो लाली जो उसके मुख का गौरव था
उसे कुलटा, मनहूस कहा
क्या सिर्फ़ पति ही
उसके जीवन का एकमात्र सौरभ था

शीघ्र ही वो दिवस भी आएगा
जब हरियाणा और राजस्थान की तरह
सारे विश्व से विलुप्त हो जाएगी ये "प्रजाति"
फिर राजा यज्ञ करवाएँगे
पुत्री रत्न पाने हेतु
राजकुमारियाँ सोने के पलनों मे पलेंगी
स्वयंवर रचाएँगी,
अपने सपनों के राजकुमार से
फिर द्रौपदी के पाँच पति होने पर
कोई सवाल ना कर सकेगा
उसके चरित्र पर कोई
टिप्पणी नही होगी
नारी को तब कोई भी
"वस्तु" नही कहेगा
संवेदनशील इस चाह को
"तथास्तु" ही कहेगा।

अरुण शीतांश की कविता आबरू नागरिक की

आबरू नागरिक की
-------------------------------
 

ओ नागरिको!
अब जाओ, सो जाओ
कल आना
सड़क पर

आने की जरुरत क्यों -
धान के खेत में बच्ची गई है
किसान का खाना लेकर
फैक्टरी में कामग़ार का भोजन
कैटवाक करती कोई बच्ची ही तो है
घास काटती
सुई में धागा लगाती
स्कूल पढ़ने जाती
सड़क पार करती
छत पर खिलखिलाती

नागरिक पर बच्ची को यक़ीन नहीं
यक़ीन  का विश्वविद्यालय कहाँ है बहन?

जहाँ से यात्रा शुरु ही हुई थी
वहीं नागरिक ख़त्म करने को तत्पर है

हम नागरिक का विरोध करते हैं
उस बच्ची के कपड़े कौन सिलेगा
जो रोज़ फाड़ रहा है
चर्र.....  चर्र.....  चर्र..... ?

अपने अन्दर की आवाज सुनो
कोई  नहीं है
पृथ्वी पर
कोई नहीं है देश

मिट्टी कितनी मुलायम और कितनी कठोर है
उन्हें पता नहीं  कि मिट्टी में भी आग होती है
और धरती के नीचे तो ज़ख़ीरा ही है।

एक बेटी का बाप नहीं हूँ
हजारों बेटियां हैं 
हजारों माँएं  हैं
हज़ारों बहनें हैं
और हजारों समाचार वाचिकाएँ  हैं
सब हमारे साथ हैं

लो मशाल और उठा लो इसे
हजारों आँखें देख रहीं हैं
तुम्हें बारंबार।

नागरिक नंगा है
और पक रहा ईंट का भट्ठा  है
यहाँ-वहाँ पत्थर ही पत्थर  है
छू लो
और  चला दो वहाँ
जहाँ तुम्हें इच्छा हो...

Friday, 20 April 2018

राकेश रंजन की कविता सनहा

सनहा
--------

मेरा रूमाल कहीं छूट गया है
गुलाबी रूमाल
मेरे नाम के पहले अच्छर
कढ़े थे उस पर
छोटा था
पर छोटी चीज नहीं था हजूर
मेरा सनहा लिख लो

मेरा छाता कहीं छूट गया है
कुछ पुराना था पर ठीक था
सिर्फ एक कमानी खराब थी उसकी
जरा ऐसे खोलो
तो खुल जाता था
पिता की निशानी था हजूर

मेरी भाषा कहीं छूट गई है
आसमान में चिरैया जैसी भाषा
छौनों की खातिर
हँकरती गैया जैसी

मैं खो चुका मेहनत का पसीना
रात में परियों के किस्से
चौड़े पाटवाली नदी
मिट्टी का सीधा रास्ता
इससे पहले
कि यह भी छूट जाए
कि क्या छोड़ आया हूँ
लिख लो हजूर

सच कह रहा
बूटों ने कुचल दिया मेरा साहस
बाजार ने छीन लिया संघर्ष
प्रेत के पैरों में गिरा आया
अपनी संतान

मेरी मुट्ठी में राख है
आँखों में धुंध
साँसों में धुआँ
और पैरों में मांस के लोथड़े
मेरी स्मृति में मलबे की गाद
से सनी
वह लहूलुहान बच्ची है
जिसके हाथ में
उसकी माँ का हाथ है
एक कटा हुआ हाथ
जो हमले के बाद
उसके पास बचा रह गया है

सीरिया और गाजा और मोसुल
अब यही मेरी स्मृति
सामूहिक हत्याओं के दृश्य
और युद्ध
युद्धों के अंतहीन सिलसिले
अब यही मेरी नियति

अब यही मेरा शहर
आज जिसकी गलियों में हिंसक जुलूस
आज जिसके हाथों में नंगी तलवारें
आज जिसके सीने में नफरत की आग
बुद्ध की पीठ में छुरा घोंपनेवाला
मेरा शहर
पहले ऐसा नहीं था हजूर

अस्सी के दशक में
ईदगाह
और नवमी के मेले में नंगे पाँव घूमता
एक घूँट शरबत के लिए तरसता मेरा शहर
खून का प्यासा नहीं था आज की तरह
भागलपुर
और मेरठ की तरह
जहर नहीं था उसकी रगों में

अस्सी के दशक में
गंडक के हिलकोरों में सिहरता मेरा शहर
किसी बच्चे की तरह
नंगे पाँव
स्कूल जाता हुआ
और स्कूल से ठीक पहले
जलेबी के पेड़ की छाँव में
मिठास के सवाल को हल करता हुआ
वह शहर कहीं खो गया हजूर
मेरा सनहा लिख लो

मेरे चारों ओर
चीख ही चीख
विलाप ही विलाप

दंगाइयों ने
जब उस औरत के पेट को छलनी किया
आँतों के साथ
उसका बच्चा बाहर आ गया
खून से लथपथ
वह आँतों को समेटती और बच्चे को सँभालती
कहाँ तक भागती
कब तक बचती
वह गिरी
और खत्म हो गई
उसका कुछ भी नहीं बचा
सिर्फ उसके गिरने
और खत्म होने की परछाईं बची
साबरमती के जल में

साबरमती से गोमती तक
गंगा-यमुना से दजला-फरात तक
आदमी के गिरने
और खत्म होने की परछाइयाँ

बूचड़खाने में बदलता मेरा देश
जहाँ ठीहे ही ठीहे
खून ही खून
लोथड़े ही लोथड़े

सोलह दिसंबर दो हजार बारह की रात
संसद के दक्खिन में
जिस बच्ची को हवस के भेड़िए चींथते रहे
और आखिर में
उसके अंग में सरिया डालकर फेंक गए
अब वही बच्ची मेरी भारत माता
अब वही सरिया
मेरा राष्ट्र ध्वज

लिख लो हजूर
लिख लो!

बलात्कार के विरुद्ध शिवांगी चौबे की कविताएं

1

सुना है तुम्हारे घर के भीतर,
तुम्हारे ही भक्त,
तुम्हारी ही बेटी को
तुम्हारे ही सामने,
खा गए!
सुना है तुमने आँखें बंद कर ली थीं,
मुँह छुपा लिया था,
हथियार डाल दिये थे,
शेर पर बैठी रही थी,
बिलखती रही थी!
सुना है तुम भी औरत हो,
अबला, कमज़ोर, मुँहचोर!
सुना है तुम्हें देवी कहते हैं,
तुम भी जानती हो,
तुम देवताओं का बनाया हुआ सामान भर हो!
तुम एक योनि से बढ़ कर कुछ भी नहीं,
हम सब माँस के लोथड़े हैं,
कल हम न होंगे तो ये खाने वाले तुम्हें भी खा जाएंगे,
भाग जाओ मंदिरों से,
कल ये तुम्हारा बलात्कार करने आएंगे।

2

गर कल मैं ना रही,
तो उसे कहना कि मैं हूँ,
कि मैं हूँ हर बुलंद आवाज़ में,
मैं साड़ियों के तार में हूँ,
मैं अदालत की पेशी में हूँ,
मैं हिन्दू-मुस्लिम दंगों में हूँ,
मैं न्यूज़ चैनल के थ्रेड में हूँ,
मैं बॉर्डर पार उस देश में हूँ,
मैं मोमबत्तियों की लौ में हूँ,
मैं तिरंगे के रंग में हूँ,
मैं अपनी माँ के गर्भ में हूँ,
मैं फेसबुक के कमैंट्स में हूँ,
मैं रातों की नींद में हूँ,
मैं नुक्कड़ों के कोरस में हूँ,
मैं जंतर मंतर मार्च में हूँ,
मैं संघियों के कटाक्ष में हूँ,
मैं कपड़ों की लंबाई में हूँ,
मैं लड़कों की पढ़ाई में हूँ,
मैं पिताजी की मौत में हूँ,
मैं गीता और क़ुरान में हूँ,
मैं क्या कहूँ मैं कहाँ नहीं हूँ,
उसे कहना कि मैं गयी नहीं हूँ,
उसे कहना कि मैं यहीं कहीं हूँ।

3

बुरा हुआ!
बुरा हुआ जो आसिफ़ा मर गई,
इसलिए नहीं क्योंकि वो आठ साल की थी,
इसलिए भी नहीं क्योंकि वो मुसलमान थी,
पर इसलिए कि अब जब भी
हम 'जय श्री राम' का नारा सुनेंगे,
दुपट्टा और भींच के समेटेंगे,
दरवाज़े में दो सिटकनियाँ लगाएंगे,
खिड़कियों में छेद कर के झाँकेंगे,
और देखेंगे अपनी मौत का तमाशा।
देखेंगे अपने भाई और बाप को,
जो अब हमें नहीं पहचानते,
वो अब सिर्फ़ 'मर्द' होंगे,
देह में आग लिए, ख़ून के प्यासे कुछ 'मर्द',
अब मंदिरों की घंटियों में चीख सुनाई देगी,
हम जैसों की बेबसी की कराहें गूँजेंगी,
अब देवस्थान में भी पाबंदी होगी,
हम अपनी बेटियों को फिर से कोख में मार देंगे,
अब हम में प्रेम न उमड़ेगा,
न धर्म के प्रति, न देश के प्रति,
हम लाशें हैं, जला दो हमें,
भारत के सपूतों, जला दो हमें।

4

"आप पांडेय जी की बीवी हैं न?"
"अरे ये तो किशोर की माँ है!"
"नारी तो साक्षात देवी का रूप है।"
मुझे देवी कह कर जंगल में छोड़ने वालों,
आज मैं अपना हिस्सा माँगने आयी हूँ।
मुझे मेरी बारिश, मेरी रातें, मेरा चाँद वापस करो।
मुझे मेरे संदूक की चाभियाँ लौटाओ,
जिसमें रखे हैं मैंने अपने ख़्वाब, अपने सपने।
आज मैं तुम्हारे कागज़ी फ़रमान के टुकड़े उड़ाना चाहती हूँ।
चले जाओ, कि तमाशा नहीं हैं मेरी टाँगें अब,
हाथों में हथौड़ा लिए ज़ंजीर से मिल कर आई हूँ।
किवाड़ खटखटाया मैंने, तुमने सुना नहीं,
आग लगा दी, लकड़ी राख हो गयी है।
अब भी थोड़ी आग मैंने बचा कर रखी है।
वो सारी सड़कें जो मेरे पाँव तले पड़ी नहीं,
वो सारे तारे जो मेरी खिड़कियों तक पहुँचने न पाए,
वो टेढ़ी रोटियाँ जो पकती गयीं गोल होने तक,
उन सब के ज़िम्मेदार तुम हो।
आज हम सब हिसाब माँगते हैं, जवाब दो।
जवाब में चूड़ी, पायल, कँगन हो तो खुद पहन लेना,
मैं मेरा जवाब मेरे साथ ले कर आई हूँ।
और सुनो,
मैं तुम्हारी गालियों में प्रयोग की हुई माँ नहीं हूँ।
ना ही मैं तुम्हारे बाद खाना खाने वाली बहन हूँ।
नहीं हूँ बेटी, नहीं हूँ बीवी।
मैं इंसान हूँ,
मुझसे इंसानियत का रिश्ता रखो।

5

क्या मुझे मौसम की आज़ादी भी नहीं?
रात के शायद तीन बजे हैं,
बाहर झमाझम बारिश हो रही है,
मैं बूंदों के गिरने की खनक सुन पा रही हूँ,
मिट्टी की सोंधी खुशबू बेचैन कर रही है,
चलो सूँघने की आज़ादी अब तक न छिनी।
लंका पे चाय मिलती होगी क्या अभी?
लोग ठंडे पानी और गरम चाय में डूब रहे होंगे क्या?
मेरे कमरे का दरवाजा छोड़, मेरे लिए कोई और द्वार नहीं खुला,
कितने खोलूँ? सब बन्द हैं।
पँखे की आवाज़ के साथ झिमझिम कि आवाज़ मिल गयी है,
आज नींद कैसे आएगी?
उसने कहा वो दोस्तों के साथ बाहर जा रहा है।
मैं क्या कहूँ मेरे दोस्तों को?
हम सब मौसमहीन एक ही कमरे में बैठे हैं,
चाय पीने की इच्छा जताने पर हँस रहे हैं,
जैसे चाँद उतार लाने को कह दिया हो।
पर कोई बात नहीं,
हम सो जाएंगे,
इस आवाज़, इस खुशबू को लिए,
हम सो जाएंगे।


शिवांगी चौबे की यह तस्वीर
स्त्रियों पर हो रहे पुरुषों के अत्याचारों के विरुद्ध एक प्रतीक के रूप में है

*शिवांगी चौबे बीएचयू में स्नातक की छात्रा हैं । छात्र आंदोलनों और नुक्कड़ नाटकों का अहम हिस्सा रही हैं। शिवंगी एक समर्पित सामाजिक कार्यकर्ता हैं।




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सर गणेश दत्त