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Saturday, 14 April 2018

बलात्कार के विरुद्ध अमेरिकी कवयित्री मार्ज पियर्सी की कविता

मार्ज पियर्सी अमरीकी उपन्यासकार, कवि और राजनीतिक कार्यकर्ता हैं. यह कविता “बलात्कार के खिलाफ नारीवादी संश्रय” नामक संगठन के समाचार पत्र – “रेड वार स्टिक्स” (अंक अप्रील/मई 1975) में प्रकाशित हुई थी. इस कविता में बलात्कार की नृशंसता और उसके विविध आयामों को तीखेपन से अभिव्यंजित किया गया है.

बलात्कार

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बलात्कार किये जाने और
सीमेंट के खड़े जीने से धकेल दिये जाने में
कोई फर्क नहीं, सिवाय इसके कि
उस हालत में भीतर-भीतर रिसते हैं ज़ख्म.
बलात्कार किये जाने और
ट्रक से कुचल दिये जाने में
कोई फर्क नहीं, सिवाय इसके कि
उसके बाद मर्द पूछता है –मज़ा आया ?

बलात्कार किये जाने और
किसी ज़हरीले नाग के काटने में
कोई फर्क नहीं, सिवाय इसके कि
लोग पूछते हैं क्या तुमने छोटा स्कर्ट पहना था
और भला क्यों निकली थी घर से अकेली.

बलात्कार किये जाने और
शीशा तोड़कर सर के बल निकलने में
और कोई फर्क नहीं, सिवाय इसके कि
तुम डरने लगती हो
मोटर गाड़ी से नहीं, बल्कि मर्द ज़ात से.

बलात्कारी तुम्हारे प्रेमी का भाई है.
वह सिनेमाघर में बैठता है तुमसे सटकर पॉपकॉर्न खाता हुआ.
बलात्कार पनपता है सामान्य पुरुष के कल्पनालोक में
जैसे कूड़े की ढेर पर गोबरैला.

बलात्कार का भय एक शीतलहर की तरह बहता है
हर समय चुभता किसी औरत के कूबड़ पर.

सनोबर के जंगल से गुजरती रेतीली सड़क पर
कभी अकेले नहीं टहलना,
नहीं चढ़ना किसी निर्ज़न पहाड़ी पगडण्डी पर
बिना मुँह में चाक़ू दबाए
जब देख रही हो किसी मर्द को अपनी ओर आते.

कभी मत खोलना दरवाज़ा किसी दस्तक पर
बिना हाथ में उस्तरा लिये.
हाते के अँधेरे हिस्से का भय,
कार की पिछली सीट का,
भय खाली मकान का
छनछनाती चाभियों का गुच्छा जैसे साँप की चेतावनी
उसकी जेब में पड़ा चाकू इस इंतज़ार में है
कि धीरे से उतार दिया जाय मेरी पसलियों के बीच.
उसकी मुट्ठी में बंद है नफरत.

बलात्कारी की भूमिका में उतरने के लिये काफी है
कि क्या वह देख पाता है तुम्हारी देह को,
छेदने वाली मशीन की नज़र से,
दाहक गैस लैम्प निगाह से,
अश्लील साहित्य और गन्दी फिल्मों की तर्ज़ पर.
जरुरी है बस तुम्हारे शरीर से, तुम्हारी अस्मिता,
तुम्हारे स्व, तुम्हारी कोमल मांसलता से
नफरत करने भर की.

यही काफी है कि तुम्हें नफरत है जिस चीज से,
डरती हो तुम उस शिथिल पराये मांस के साथ जो-जो करने से
उसी के लिये मजबूर किया जाना.
संवेदनशून्य पहियों से सुसज्जित
किसी अपराजेय टैंक की तरह रौंदना,
अधिकार जमाना और सजा देना साथ-साथ,
चीरना-फाड़ना मज़ा लेना, जो विरोध करे उसे क़त्ल करना
भोगना मांसल देह काम-क्रीडा के लिये अनावृत.

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सर गणेश दत्त