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Sunday, 4 March 2018

जेण्डर डिस्फोरिया - Er S. D. Ojha

                                                                   जेण्डर डिस्फोरिया

                                 आईने में पुरुष को जब अपना दाढ़ी मूंछ युक्त चेहरा या स्त्री को अपना दाढ़ी मूंछ विहीन चेहरा पसंद न आए तो समझ लीजिए कि ऐसे पुरुष स्त्री जेण्डर डिस्फोरिया के शिकार हो गये हैं । ऐसा क्यों होता है ? क्योंकि जब पुरूष तन में स्त्री मन और स्त्री तन में पुरूष मन समा जाए तब जेण्डर डिस्फोरिया की आवक हो जाती है । इस तरह का विकार बच्चों मे ढाई तीन साल की उम्र से हीं आने लगता है । बच्चों को अपने से विपरीत जेण्डर की सोहबत अच्छी लगने लगती है । यदि बच्चा पुरुष जेण्डर का है तो उसे औरत जेण्डर के बच्चों का साथ अच्छा लगेगा । यही बात औरत जेण्डर के बच्चों के साथ होगी । उन्हें पुरुष जेण्डर के बच्चों की सोहबत अच्छी लगेगी ।
आम तौर पर  किन्नर इस मनोविकार से ग्रसित होते हैं । 84% किन्नरों की कद काठी शकल सब पुरुषों से मिलती जुलती है । उनकी दाढ़ी मूछें भी होती हैं । आवाज भी पुरुषों जैसी मोटी होती है । इसके बावजूद वो अपने को स्त्री मानते हैं । उनके हाव भाव में स्त्रैण प्रवृति झलकती है । हालांकि किन्नर थर्ड जेण्डर में आते हैं , पर वे भी जेण्डर डिस्फोरिया के शिकार होते हैं । कुछ सालों पहले तक डी आई जी रैंक के एक पुलिस ऑफिसर जेण्डर आइडेण्टिटी डिसआर्डर ( जेण्डर डिस्फोरिया ) से पीड़ित थे । वे वर्दी में रहते हुए भी नाखूनों पर नेल पाॅलिश , होठों पर लिपिस्टिक और आंखों में काजल लगाते थे । वे काफी दिनों तक मीडिया के आंखों के तारे बने हुए थे । अब जब वे रिटायर्ड होकर घर बैठ गये हैं तो कोई उनकी खोज खबर नहीं लेता । मीडिया भी उनसे मुंह मोड़ चुका है ।
कुछ मरीज जन्म से हीं जेण्डर डिस्फोरिया से पीड़ित होते हैं । उन्हें अपनी वर्तमान शारीरिक संरचना पसंद तो होती है , पर वे रहना विपरीत लिंगियों की तरह रहना चाहते हैं । यही केस डी आई जी साहब का था । वे जन्म से हीं जेण्डर आइडेण्टिटी डिसआर्डर से जूझ रहे थे । कुछ लोग ऐसे लोगों को समलैंगिक समझने की भूल कर बैठते हैं । जब कि वास्तव में ऐसा नहीं होता । जेण्डर डिस्फोरिया के मरीज भी विषमलिंगी हीं होते हैं । कुछ मरीज बाद में बनते हैं । कई घरों में बेटों की चाह होती है । बेटा न होने पर बेटी का हीं लालन पालन बेटे की तरह किया जाने लगता है । उसे बेटे के पोशाक में रखा जाता है । ऐसे में उनमें पुरुष की प्रवृति पनपने लगती है । कई घरों में कई बेटियों के बाद बेटा पैदा होता है । वह बेटा अपनी बहनों के संग रहकर अपने अंदर औरतों के गुण विकसित कर लेता है । उसकी चाल ढाल अदा सब औरतों वाली हो जाती है ।
कुछेक घरों में पिता की मृत्यु के बाद कोई एक लड़की घर की जिम्मेदारी सम्भाल लेती है । जिम्मेदारी सम्भालते सम्भालते उसमें पुरुषोचित गुण उभरने लगते हैं और वह लड़की जेण्डर डिस्फोरिया की मरीज बन जाती है । कुछ लड़कियों का परवरिश भी लड़कों की तरह होती है ।  ऐसी लड़कियों की चाल ढाल सब लड़कों की तरह हीं हो जाती है । कुछेक घरों में जब लड़के हीं लड़के होते हैं तो मां बाप किसी एक लड़के को लड़की की तरह पालने लगते हैं । उसे लड़कियों के कपड़े पहनाते हैं । ऐसे में उस लड़के में स्त्रियोचित गुण आने लगते हैं । कई बार जैण्डर डिस्फोरिया पागलपन की वजह से भी होता है । ऐसे में पागलपन का इलाज किया जाना चाहिए । पागलपन का इलाज होने के बाद जेण्डर डिस्फोरिया स्वतः हीं ठीक हो जाती है ।

जेण्डर डिस्फोरिया के मरीज का इलाज शुरूआती दौर में आसानी से हो जाता है । उसे विहेवियर थेरेपी के साथ साथ मनोवैज्ञानिक काउंसलिंग भी की जाती है । लेकिन जब काफी समय निकल जाता है तो मामला पेचीदा होने लगता है । देर हो जाने के बाद जेण्डर डिस्फोरिया के मरीज वापस अपने जेण्डर में नहीं आ पाते । कई अपना सेक्स चेंज करा बैठते हैं और ताजिंदगी हारमोन के इंजेक्सन लेते रहते हैं । वे सर्जरी की लम्बी प्रक्रिया से गुजरते हैं । ऐसे लोगों का कभी मजाक नहीं बनाना चाहिए । वे भी हमारी आपकी तरह से इंसान हैं । उन्हें भी हमारी तरह हीं जीने का हक है । वे आपके प्यार के मुंतजिर हैं । उन्हें प्यार दीजिए । जीने दीजिए ।

Saturday, 3 March 2018

ओसीडी रोमाण्टिक प्रेम जैसा होता है (आलेख) - Er S. D. Ojha

ओसीडी रोमाण्टिक प्रेम जैसा होता है ।
ओसीडी का मतलब Obsessive compulsion disorder होता है , जो कि मानव मन की एक विकृति है । इस बीमारी में आदमी एक हीं चीज को बार बार करता है । जैसे दिन में कई बार हाथ धोना । यदि आपने हाथ धोया है । किसी साफ चीज को भी छुआ है तो आपको ऐसा लगेगा कि एक बार और हाथ धोना चाहिए । यही बीमारी ओसीडी कहलाती है । ओसीडी पीड़ित व्यक्ति कई तरह की चिंताओं से ग्रसित रहता है । ताला लगाने के बाद भी उसे लगता है कि ताला नहीं लगाया है । वह बार बार ताला चेक करने लगता है । ताला को हिलाने से लेकर वह ताले पर लटकने लगता है । फिर भी जांचने के लिए उसका दिमाग बार बार उसे प्रेरित करता रहता है। रात को सोते समय यह ख्याल आता है कि कहीं गैस खुला न छुट गया हो । पीड़ित व्यक्ति हर चीज को करीने से रखता है । उसका रखने का एक क्रम व रिदम होता है । यदि वह क्रम व रिदम किसी ने भंग कर दिया तो पीड़ित व्यक्ति का वह कोपभाजन बनता है ।
मैं अक्सर रात को ऊपरी मंजिल से उतर कर गेट का ताला चेक करता हूं । हर बार ताला अपनी जगह पर होता है । एकाध बार हीं ऐसा हुआ कि ताला न लगा हो , गाड़ी अंदर न की गयी हो । लेकिन परिवार का बड़ा होने के कारण यह मेरा परम कर्तव्य है । इसे ओसीडी नहीं कहा जा सकता । ओसीडी पीड़ित लोगों को कबाड़ इकट्ठा करने का भी शौक होता है । उन्हें लगता है कि कबाड़ कहीं आगे चलकर काम आ सकता है । वे उसे कबाड़ी को नहीं बेचते । इस तरह से कबाड़ से हीं एक कमरा भरा रहता है । उसमें और इजाफा होता रहता है । औरतों को पुरानी चीजों से बहुत लगाव होता है । नारी वादी मुझे क्षमा करेंगे । जब मैं रिटायर्ड होकर आ रहा था तो बहुत से लोगों ने मेरे स्टार , स्कार्फ , बेल्ट और टोपी की मांग की थी । ऐसी मान्यता है कि रिटायर्ड आदमी के वर्दी से सम्बंधित चीजें लेने से आगे के प्रोन्नति का मार्ग प्रशस्त होता है । लेकिन मेरी श्रीमती जी ने वे सब चीजें यादगार के तौर पर रख लीं । इसे ओसीडी नहीं कहेंगे , पर यह एक खास जेंडर के जातिगत स्वभाव की तरफ जरूर इशारा  करता है ।
कुछ ओसीडी पीड़ित लोग पूजा पाठ में काफी समय व्यतीत करते हैं । ऐसा पूजा पाठ किस काम का जो आपके रुटीन वर्क को प्रभावित करने लगे । धर्म और नैतिक विचार जब पागलपन की हद तक आप पर हावी होने लगे तो समझ जाना चाहिए कि वह व्यक्ति ओसीडी से पीड़ित है । आश्चर्य की बात यह कि ओसीडी पीड़ित व्यक्ति यह मानने के लिए तैयार नहीं कि वह ओसीडी पीड़ित है । जब तक ओसीडी पीड़ित को इस बीमारी का भान नहीं होता तब तक इलाज सफल नहीं होता । वैसे भी यह बीमारी इलाज की जद में है ( Treatable ) ,पर इसका स्थायी इलाज (Curable treatment )अभी तक सम्भव नहीं हुआ है । यदि इस बीमारी का 6 माह के अंदर अंदर पता चल जाता है तो इलाज जल्द सम्भव होगा , लेकिन बाद में पता चलता है तो काफी वक्त लग सकता है । पुराने ओसीडी से ईटिंग डिसआर्डर , अवसाद और शीजोफ्रेनिया जैसी कई बीमारियां लग जाती हैं । कुछ लोगों को नशे की लत भी लग सकती है ।
अभी मेडिकल साईंस के इजाद से पता चला है कि यह बीमारी दिमाग के एक खास हिस्से के अनियंत्रित होने से होती है । यह वही हिस्सा है , जिस हिस्से के सक्रिय होने से आदमी रोमाण्टिक होता है । अर्थात् ओसीडी रोमाण्टिक प्रेम जैसा होता है । वैसा हीं जुनून और पागलपन आदमी पर सवार रहता है । आप कह सकते हैं कि रोमांस करने वाले लोग और ओसीडी पीड़ित लोग नफासत पसंद होते हैं । वे चीजों को करीने से सजाकर रखते हैं । गंदगी पसंद नहीं करते । पुरानी चीजों से लगाव रखते हैं (Old is Gold ). रोमाण्टिक लोग भी जिसे चाहते हैं उसे शिद्दत से चाहते हैं । यह नफासत जब हद से बढ़ जाए तो सजा हो जाती है । साहिर के एक गीत में से जब नजाकत हटाकर नफासत रख दिया जाय तो वह गीत इस प्रकार होगी -
हद के अंदर हो नफासत तो अदा होती है ,
हद से बढ़ जाए तो आप अपनी सजा होती है।

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सर गणेश दत्त