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Wednesday, 9 October 2019

क़िस्सा चयन समिति - सिद्धार्थ शंकर राय

क़िस्सा चयन समिति

किसी विश्वविद्यालय का इंटरव्यू हो रहा था। अमुक आवेदक से विशेषज्ञ ने सवाल पूछा तो आवेदक ने कोई जवाब नहीं दिया। साक्षात्कार समाप्त हुआ तो आवेदकों पर बात होने लगी। चयन समिति के अध्यक्ष ने कहा कि अमुक आवेदक का करिए। इस पर विशेषज्ञों ने कहा कि अमुक आवेदक ने किसी प्रश्न का उत्तर नहीं दिया; कुछ भी नहीं बोला । इस पर अध्यक्ष ने कहा कि अमुक आवेदक लिखता बहुत अच्छा है। अध्यक्ष महोदय के इस तर्क पर अमुक की नियुक्ति हो गयी।
कुछ दिनों के बाद अमुक जी के प्रोमोशन काा इंटरव्यू था। पिछली चयन समिति के एक विशेषज्ञ फिर से चयन समिति में विशेषज्ञ के रूप में आ गये। अमुक जी साक्षात्कार के लिए आये और पूछे गये सवालों पर मौनव्रत की पिछली व्यवस्था बनायी रखी। विशेषज्ञ ने अमुक जी के लेखन के बारे में सवाल किया तो उन्होंने काँख-कूँख, खाँस-खखारकर शांति व्यवस्था बहाल रखी। समिति के अध्यक्ष ने अमुक जी के प्रोमोशन हेतु प्रस्ताव रखा। इस पर दोबारा पधारे विशेषज्ञ ने कहा कि आपने पिछली बार कहा था कि ये बोलते नहीं अपितु लिखते अच्छा हैं; लेकिन इन्होंने ने तो कुछ लिखा भी नहीं है। इस पर अध्यक्षजी ने कहा कि जी! ये सोचते बहुत अच्छा हैं।
इस प्रकार अच्छा सोचने के कारण अमुकजी प्रोमोशन को प्राप्त कर गये।
आप भी अच्छा सोचिए ।

Sunday, 5 August 2018

मैंने हर बार जूतों को रफीक समझा है - Er S. D. Ojha

मैंने हर बार जूतों को रफीक समझा है ।

आपको वह दृश्य याद होगा कि किस तरह एक पत्रकार ने अमेरिका के राष्ट्रपति पर दो बार जूते फेंके थे । हालाँकि दोनों बार निशाना चूक गया था , पर वह पत्रकार रातों रात स्टार बन गया था । उसके जूते भी अमर हो गये । जूतों बनाने वाली कम्पनियों में इस बात का श्रेय लेने की होड़ मच गयी कि वह उन्हीं के ब्राण्ड का जूता था । लेकिन एक बात मेरी समझ में नहीं आई कि उस पत्रकार को जूते चलाने की नौबत हीं क्यों आई ? वह तो कलम चलाने वाला था । कलम चलाता । मेरे ख्याल में वह कलम चलाने में उतना माहिर नहीं था । इसलिए वह जूता चला बैठा । जूता चलाने में भी वह माहिर नहीं था । एक बार नहीं दो बार उसका निशाना चूका । लेकिन अपने कृत्य से वह इतिहास में अपना नाम दर्ज करा बैठा । उसी के चलते भारत में भी केजरीवाल और मनमोहन सिंह पर जूते चले । जूते चलाना एक ट्रेण्ड बन गया । वैसे सदन में जूते चलाने की परम्परा हमारे यहाँ पहले से कायम थी ।

जूते मंदिरों से चोरी हो जाते हैं । भगवान के दरबार से जूते चोरी हों और भगवान कुछ नहीं करें इससे बड़ा मजाक और क्या हो सकता है ? कहने वाले कहते हैं कि भगवान के पास ढेर सारे काम हैं । वह जूता चोरी जैसे तुच्छ मामले को निपटाने में लग जाएंगे तो असल समाज कल्याण का काम कौन करेगा ? 12 मई 2018 को उज्जैन के महाकाल मंदिर से ज्योतिरादित्य सिंधिया का जूता चोरी हो गया था । भगवान ने कुछ नहीं किया , पर भगवान ने उसके बाद उन्हें वह विलक्षण शक्ति प्रदान की कि वे जमकर भाजापा पर बरसे । मंदिर के पुजारी का कहना था कि पनौती उतर गयी है । अब ज्योतिरादित्य सिंधिया को आगे बढ़ने से कोई रोक नहीं सकता । दूल्हे के जूते भी चोरी होते हैं । हमारे समय में इस रश्म को नहीं निभाया जाता था , लेकिन फिल्म " हम आपके हैं कौन " में माधुरी दीक्षित ने इस रश्म को राष्ट्र व्यापी मान्यता दिला दी ।

जूतों को संस्कृत में चरणपादुका कहते हैं । इस चरणपादुका को लेकर भरत ने 14 साल तक अयोध्या पर शासन किया था । आधुनिक काल में उमा भारती ने जेल जाने से पहले मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री की कुर्सी अपने भाई बाबूलाल को इस उम्मीद से सौंप दी थी कि उनके जेल से आने के बाद वह कुर्सी उन्हें सही सलामत मिल जाएगी । बाबूलाल को लालच आ गया । उन्होंने कुर्सी अपनी बहन को नहीं सौंपा ।  उमा भारती को मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री की यह कुर्सी आज तक मुंह चिढ़ा रही है । यही हाल रहा जीतनराम माझी का । उन्होंने भी नीतीश कुमार को कुर्सी सौंपने से इंकार कर दिया था । चरण पादुका अपने असली हकदार का इंतजार करती रह गयी थी ।  लेकिन इस जमाने में अपवाद भी होते हैं । दक्षिण में जयललिता को पनीर सेल्बम ने सहर्ष कुर्सी सौंप दी थी । उनको पता था कि अंततः लेडीज सीट को छोड़ना हीं पड़ता है ।

जूतों पर बहुत से मुहावरे बने हैं । मियाँ की जूती को कभी बीवी ने मियाँ के हीं सिर पर दे मारा होगा तो मुहावरा बन गया  " मियाँ की जूती मियां के सिर " । यदि बीवी ने अपनी जूती का इस्तेमाल किया होता तो मुहावरा कुछ इस तरह से बनता " बीवी की जूती मियाँ के सिर "। जूते चाटना भी एक मुहावरा है । यह मुहावरा चाटुकार लोगों के लिए बना है । चाटुकार लोगों की दुनियां में कोई कमी नहीं हैं । आप एक ढूढेंगें , हजार मिलेंगे । कुछ लोग घर में बीवी से डरते हैं , पर बाहर अति दम्भ में कह जाते हैं मैं अपनी बीवी को "जूतों की नोक" पर रखता हूँ ।  कुछ लोगों को अपनी रचनाओं को छपवाने के लिए सम्पादकों के दफ्तरों के चक्कर काटने पड़ते हैं । फिल्मों में काम करने के लिए प्रोड्यूसरों के दफ्तरों के भी चक्कर लगाने पड़ते हैं । नौकरी के लिए गली गली घूमना पड़ता है । ऐसे में जूते बखूबी घिसेंगे । इसलिए जूते घिसना भी एक मुहावरा बन गया ।

चमचमाते जूते आपकी शान में इजाफा करते हैं । माडर्न टाइप या करीने से पहने फार्मल जूते आपकी इज्जत को चार चांद लगा देते हैं । जूते इज्जत बढ़ाते हैं तो घटाने का भी काम करते हैं । किसी को जूतों की माला पहना दी जाय तो उसका तत्क्षण हीं अपमान हो जाता है ।  जूतों की मार हंटर से भी ज्यादा दर्द देता है । इससे शरीर के अलावा दिल व दिमाग भी घायल हो जाता है । चांदी के जूते से भी मारा जाता है  । चांदी के जूते मार लोग अपना काम निकालते हैं । इससे जूता मारने वाला और जूता खाने वाला दोनों खुश रहते हैं । नहीं समझे ?? चांदी के जूते मारने का मतलब घूस देना होता है । चांदी के जूते मारने से कभी टोपी चमकती है तो कभी उछलती है । वैसे पते की बात यह है कि अक्सर जूता टोपी से महंगा होता है ।

Saturday, 4 August 2018

मैंने हर बार जूतों को रफीक समझा है - Er S. D. Ojha

मैंने हर बार जूतों को रफीक समझा है ।

आपको वह दृश्य याद होगा कि किस तरह एक पत्रकार ने अमेरिका के राष्ट्रपति पर दो बार जूते फेंके थे । हालाँकि दोनों बार निशाना चूक गया था , पर वह पत्रकार रातों रात स्टार बन गया था । उसके जूते भी अमर हो गये । जूतों बनाने वाली कम्पनियों में इस बात का श्रेय लेने की होड़ मच गयी कि वह उन्हीं के ब्राण्ड का जूता था । लेकिन एक बात मेरी समझ में नहीं आई कि उस पत्रकार को जूते चलाने की नौबत हीं क्यों आई ? वह तो कलम चलाने वाला था । कलम चलाता । मेरे ख्याल में वह कलम चलाने में उतना माहिर नहीं था । इसलिए वह जूता चला बैठा । जूता चलाने में भी वह माहिर नहीं था । एक बार नहीं दो बार उसका निशाना चूका । लेकिन अपने कृत्य से वह इतिहास में अपना नाम दर्ज करा बैठा । उसी के चलते भारत में भी केजरीवाल और मनमोहन सिंह पर जूते चले । जूते चलाना एक ट्रेण्ड बन गया । वैसे सदन में जूते चलाने की परम्परा हमारे यहाँ पहले से कायम थी ।

जूते मंदिरों से चोरी हो जाते हैं । भगवान के दरबार से जूते चोरी हों और भगवान कुछ नहीं करें इससे बड़ा मजाक और क्या हो सकता है ? कहने वाले कहते हैं कि भगवान के पास ढेर सारे काम हैं । वह जूता चोरी जैसे तुच्छ मामले को निपटाने में लग जाएंगे तो असल समाज कल्याण का काम कौन करेगा ? 12 मई 2018 को उज्जैन के महाकाल मंदिर से ज्योतिरादित्य सिंधिया का जूता चोरी हो गया था । भगवान ने कुछ नहीं किया , पर भगवान ने उसके बाद उन्हें वह विलक्षण शक्ति प्रदान की कि वे जमकर भाजापा पर बरसे । मंदिर के पुजारी का कहना था कि पनौती उतर गयी है । अब ज्योतिरादित्य सिंधिया को आगे बढ़ने से कोई रोक नहीं सकता । दूल्हे के जूते भी चोरी होते हैं । हमारे समय में इस रश्म को नहीं निभाया जाता था , लेकिन फिल्म " हम आपके हैं कौन " में माधुरी दीक्षित ने इस रश्म को राष्ट्र व्यापी मान्यता दिला दी ।

जूतों को संस्कृत में चरणपादुका कहते हैं । इस चरणपादुका को लेकर भरत ने 14 साल तक अयोध्या पर शासन किया था । आधुनिक काल में उमा भारती ने जेल जाने से पहले मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री की कुर्सी अपने भाई बाबूलाल को इस उम्मीद से सौंप दी थी कि उनके जेल से आने के बाद वह कुर्सी उन्हें सही सलामत मिल जाएगी । बाबूलाल को लालच आ गया । उन्होंने कुर्सी अपनी बहन को नहीं सौंपा ।  उमा भारती को मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री की यह कुर्सी आज तक मुंह चिढ़ा रही है । यही हाल रहा जीतनराम माझी का । उन्होंने भी नीतीश कुमार को कुर्सी सौंपने से इंकार कर दिया था । चरण पादुका अपने असली हकदार का इंतजार करती रह गयी थी ।  लेकिन इस जमाने में अपवाद भी होते हैं । दक्षिण में जयललिता को पनीर सेल्बम ने सहर्ष कुर्सी सौंप दी थी । उनको पता था कि अंततः लेडीज सीट को छोड़ना हीं पड़ता है ।

जूतों पर बहुत से मुहावरे बने हैं । मियाँ की जूती को कभी बीवी ने मियाँ के हीं सिर पर दे मारा होगा तो मुहावरा बन गया  " मियाँ की जूती मियां के सिर " । यदि बीवी ने अपनी जूती का इस्तेमाल किया होता तो मुहावरा कुछ इस तरह से बनता " बीवी की जूती मियाँ के सिर "। जूते चाटना भी एक मुहावरा है । यह मुहावरा चाटुकार लोगों के लिए बना है । चाटुकार लोगों की दुनियां में कोई कमी नहीं हैं । आप एक ढूढेंगें , हजार मिलेंगे । कुछ लोग घर में बीवी से डरते हैं , पर बाहर अति दम्भ में कह जाते हैं मैं अपनी बीवी को "जूतों की नोक" पर रखता हूँ ।  कुछ लोगों को अपनी रचनाओं को छपवाने के लिए सम्पादकों के दफ्तरों के चक्कर काटने पड़ते हैं । फिल्मों में काम करने के लिए प्रोड्यूसरों के दफ्तरों के भी चक्कर लगाने पड़ते हैं । नौकरी के लिए गली गली घूमना पड़ता है । ऐसे में जूते बखूबी घिसेंगे । इसलिए जूते घिसना भी एक मुहावरा बन गया ।

चमचमाते जूते आपकी शान में इजाफा करते हैं । माडर्न टाइप या करीने से पहने फार्मल जूते आपकी इज्जत को चार चांद लगा देते हैं । जूते इज्जत बढ़ाते हैं तो घटाने का भी काम करते हैं । किसी को जूतों की माला पहना दी जाय तो उसका तत्क्षण हीं अपमान हो जाता है ।  जूतों की मार हंटर से भी ज्यादा दर्द देता है । इससे शरीर के अलावा दिल व दिमाग भी घायल हो जाता है । चांदी के जूते से भी मारा जाता है  । चांदी के जूते मार लोग अपना काम निकालते हैं । इससे जूता मारने वाला और जूता खाने वाला दोनों खुश रहते हैं । नहीं समझे ?? चांदी के जूते मारने का मतलब घूस देना होता है । चांदी के जूते मारने से कभी टोपी चमकती है तो कभी उछलती है । वैसे पते की बात यह है कि अक्सर जूता टोपी से महंगा होता है ।

Monday, 12 March 2018

व्हिस्की में विष्णु बसे - असित कुमार मिश्र

व्हिस्की में विष्णु बसे....
आज एक मित्र का मैसेज़ मिला है कि - असित भाई समाजवादी पार्टी के नरेश अग्रवाल जिन्होंने कभी भगवान् श्री राम के बारे में अपशब्द कहे थे वो अब भाजपा में आ गए हैं। समझ में नहीं आ रहा है कि क्या लिखूँ! आप ही कुछ लिखिए न!
मुझे याद आ रहा है वह दिन जब भाजपा के प्रदेश स्तर के एक नेता श्री दयाशंकर सिंह जी ने सुश्री मायावती जी के खिलाफ कुछ अपशब्द कहे थे। मायावती जी ने उस मौके का फायदा उठाने के लिए एक रैली आयोजित की जिसमें नारे लगाए गए - दयाशंकर सिंह की बेटी को पेश करो! पेश करो!! ज़ाहिर सी बात है सबका खून खौलेगा ही। दयाशंकर सिंह जी की पत्नी श्रीमती स्वाति सिंह जी ने कहा - हाँ बोलिए! कहाँ अपनी बेटी को लेकर आऊँ?
अब स्थिति बदल गई और एक स्वाति सिंह अचानक मंत्री बन गईं बाद में श्री दयाशंकर सिंह जी भी अपने मूल पद पर आ गए।
कहने का मतलब है कि श्री सूतजी की कृपा से सब कुछ ठीक हो गया।
लेकिन मेरा सवाल अब भी वहीं है कि स्वाति सिंह जी द्वारा खाली की गयी अध्यापक की कुर्सी पर कोई दूसरी अध्यापिका आई कि नहीं? अगर नहीं तो कब तक आएगी? कि हम पकौड़े ही... 
खैर! नरेश अग्रवाल और भाजपा के अंर्तसंबंधों पर क्या लिखूँ! दो साल पहले ही लिख चुका हूँ इस पर।
लीजिए - सोचिए! समझिए और तय कीजिए!

असित कुमार मिश्र

जानने और मानने के बीच.... 
मेरे बचपन के दिनों में कक्षा छह से आठ तक की पढ़ाई का मजा ही कुछ और है। 
बड़े साधारण से थे वे दिन, और बहुत साधारण सी है मेरे बचपन की कहानी।
जब  यूरिया खाद के बोरे का सिला हुआ बस्ता होता था। जिस पर सामने का लिखा चमकता था - नाइट्रोजन 46%... 
वही हवाई चप्पलों के मटमैले से फीते। जो दो चार लोहे की कीलों के अवैध संबंधों के दम पर टिके रहते थे। शर्ट के बटन जब अचानक से तलाक दे जाते तो माँ के कलाई की चूड़ियों के बीच रहने वाली सेफ़्टी पिन से शर्ट का 'आकस्मिक विवाह' सम्पन्न हो जाता।डव, ब्रीज और लक्स जैसे 'एकांगी' साबुन हम जैसे 'टैलेंटेड' देखते भी नहीं थे।हम लाईफबाय वाले 'बहुउद्देशीय' साबुन लगाते थे ताकि मौका पड़ने पर उससे बनियान भी साफ कर ली जाए। लेकिन गुरुर तो  दोस्त,तब भी मॉनीटरी वाला ही रहता था ।औक़ात तो तब भी इतनी थी कि, जब चाहे जिस लड़के का ज़ुर्म साबित करा कर माट्साहब के हाथों पिटवा दें।लेकिन किस्मत में तब सरकारी स्कूल का छह रुपये मासिक फ़ीस ज़मा करने के लिए बारह बार डाँट सुनना भी लिखा था। गणित के माट्साहब के लिए रोज़ मरने की मासूम सी दुआएँ भी माँगनी लिखी थी। 
लेकिन जैसे ही साइकिल से वो आते दिखते, कसम से देवी-देवताओं पर से भरोसा उठ जाता। दो चोटी बाँध कर आने वाली सभी लड़कियाँ बहुत अच्छी लगती थीं। साइकिल से आने वाली अमीर लड़कियाँ मेरे लेबल की थी ही नहीं, तो उनके बारे में क्या सोचना।उनके सामने तो हम खुद को ईमानदारी से रिजेक्ट मान लेते थे।
'राजा हिन्दुस्तानी' मार्का शर्ट पहनने की वो अधूरी रह गई ख़्वाहिश और हिन्दी की किताब में मिली प्रियंका की वो चिट्ठी। जिसे मेरे दोस्तों ने नाम दिया 'लभ लेटर'। जिससे हम सातवीं कक्षा में ही ग़ालिबन बदनामी के दौर से गुज़रे।
और फिर 'लभ लेटर रखने के जुर्म में' जितनी भी छड़ियाँ इस वज्र देह ने सहीं, उसके गवाह प्रियंका के आँसू भी बने।
लेकिन हमने भी छोड़ा नहीं, और अकेले में प्रियंका से कह ही दिया -" का रेऽ कुत्ती हमके पिटवा के खुश हो गईले नऽ ".....।
सच! बहुत खूबसूरत थे ये दिन।
       इन्हीं दिनों गाँव के और लड़कों की तरह हमारे भी फेवरेट हीरो थे मिथुन चक्रवर्ती।हम भी चर्चा करते थे कि कौन 'बरियार' हीरो है? नाम आते सनी देओलवा, जैकी सराफवा और अम्ता बच्चन।यूं हमारे फेवरेट मिथुन दा का रेस में नाम ही न आता। लेकिन हम भी जब तक सबसे मनवा न लेते अपनी इमली किसी को देते नहीं थे। कुछ इमलियों के बदले मेरा हीरो बाक्स आफिस में धूम मचा दे,यह सौदा घाटे का नहीं था।
इसी दौरान कोई फिल्म देखी थी मैंने जिसमें अमरीश पुरी ने मिथुन की माँ को मारा था, बहन के साथ 'गन्दा काम' किया और मिथुन का घर भी जला दिया था।पहली बार मेरी मुट्ठियाँ तनीं थीं। आँखों से आँसू गिरे थे। और अमरीश पुरी मेरा भी 'जानी दुश्मन' बन गया था। तबसे जब भी मैं 'अमरीश पुरिया' को देखता बस एक ही बात दिमाग में आती- बदला।
लेकिन इस बाल मन को झटका तब लगा जब मिथुन की उसी माँ को दूसरे फ़िल्म में 'अमरीश पुरिया' की पत्नी के रूप में देखा। और वो लड़की जिसके साथ 'गन्दा काम' हुआ था, वो अमरीश पुरिया को 'डैडी-डैडी' कह रही थी। दिल पर बहुत चोट लगी कि इसकी नफ़रत को मैं अपने दिल में रखे घूमता हूँ, और ये सब एक ही हैं।लेकिन मैंने अमरीश पुरिया का पीछा नहीं छोड़ा। जहाँ उसके बारे में कुछ छपता मैं ज़रूर पढ़ता था। फिर पता चला कि ये बहुत अच्छा आदमी है बस फ़िल्मों में ही ऐसा काम करता है।और सभी हीरो - हिरोईन 'कैरेक्टर' कहे जाते हैं। सब आपस में बहुत प्यार से रहते हैं। सब साथ मिलकर घूमते हैं। खाते हैं। फोन पर बात करते हैं। शादी-ब्याह में एक दूसरे के घर भी जाते हैं। तब पता चला कि जानने और मानने के बीच कितना बड़ा फ़र्क होता है। मेरी भावनाओं के साथ जो हुआ उसका दोषी सिर्फ मैं था। वो तो अपना काम कर रहे थे... 
            रुकिए! कहानी अब शुरू हो रही है। मैं अक्सर देखता हूँ कि मेरे कुछ दोस्त विभिन्न राजनैतिक दलों के लिए दिन भर लड़ते रहते हैं। इंदिरा गाँधी ने लालू यादव को 'मीसा कानून' बना कर ज़ेल भेज दिया तो इस अपमान का बदला लेने के लिए उन्होंने अपनी बेटी का नाम रख दिया 'मीसा'। सारे कार्यकर्ताओं में जोश की लहर दौड़ गई। लालू जी सत्ता में आ गए।मायावती ने कहा था कि - "हम सत्ता में आए तो मुलायम होंगे जेल में "। मोदी अलग कुछ कहते हैं नीतीश कुमार अलग कहते हैं।मायावती अलग कहती हैं। आदित्य नाथ अलग कहते हैं। ओवैसी अलग कहते हैं। और सच्चाई क्या है कि यही मीसा सोनिया गाँधी के साथ फोटो बनवाती हैं। यही मुलायम और मायावती ने सम्मिलित सरकार चलाई थी उत्तर प्रदेश में । हम कब समझेंगे कि इन्हें 'पालिटिशियन्स' कहा जाता है। ये भी आपस में बहुत प्यार से रहते हैं। सब साथ मिलकर घूमते हैं, खाते हैं। फोन पर बात करते हैं। शादी ब्याह में एक दूसरे के घर भी जाते हैं... और यहाँ लड़ते हैं हम... मरते हैं हम।मेरी ही तरह न जाने कितने लोग अपने मन में 'अमरीश पुरिया' के प्रति नफ़रत पालते हैं।जैसे 'कैरेक्टर्स' के लिए 'कैरेक्टर' मुख्य होता है वैसे ही 'पालिटिशियन्स' के लिए 'पालिटिक्स'। 
बहुत सोचने की बात है कि आज़ादी के बाद जो आम चुनाव हुए उसमें जो मुद्दा था - गरीबी भ्रष्टाचार और विकास।पैंसठ सालों बाद पार्टियाँ बदलती गई नेता बदलते गए लेकिन मुद्दा आज भी वही है। जबकि भारत के किसी भी एक पंचवर्षीय योजना को ठीक से कार्यान्वित कर दिया जाए तो लगभग सब ठीक हो जाएगा। लेकिन फ़िल्म के लिए  जैसे 'अमरीश पुरिया' ज़रूरी है वैसे ही पार्टियों के लिए गरीबी भ्रष्टाचार और पिछड़ापन।अमरीश पुरिया ही नहीं रहेगा तो कैसी फिल्म? और ये मुद्दे ही नहीं रहे तो कहाँ जाएगा 'पालिटिशियन्स'....आज भी हमारे भावनाओं के साथ खेल होता है।लेकिन हम दोष 'अमरीश पुरिया' को देते हैं। यह भूल कर कि जानने और मानने के बीच बहुत फर्क होता है। 

असित कुमार मिश्र
बलिया

Saturday, 3 March 2018

आ बैल मुझे मार (व्यंग्य) -Er S. D. Ojha

                                                          आ बैल मुझे मार
आ बैल मुझे मार का मतलब खुद हीं समस्याओं को निमंत्रण देना होता है । जब समस्याओं को बुलाने वाले हम हैं तो फिर रोना धोना कैसा ? बेहतर है कि समस्याओं का सामना करें । उसका स्वागत करें । एक बेहद पुरानी हमारे किशोर वय की कविता की दो लाइनें याद आ रही हैं -
दुःख को आप बुलाकर घर में स्वागत गान करेगा कौन ?
सुख का स्वाद लिया है तूने , अब विषपान करेगा कौन  ?

लेकिन सवाल यह है कि इस मुहावरे का ईजाद क्योंकर हुआ ? क्या वास्तव में केवल बुलाने मात्र से हीं बैल आकर मारने लगता है ? क्या उसके पास अपनी कोई बुद्धि विवेक नहीं है ? इसे जानने के लिए एक सज्जन वहां पहुंच गए जहां बैल अकसर घूमता रहता था । पहले तो बैल को उन्होंने प्यार से कहा - आ बैल मुझे मार । बैल ने उन पर एक सरसरी निगाह डाली , पर टस से मस नहीं हुआ । उन्होंने जोर देकर कहा - आ बैल मुझे मार । बैल ने कोई प्रतिक्रिया नहींभ दिखाई । अब वे बैल के थुथुन के करीब पहुंच गए । बैल पलट के चल पड़ा । मानों कह रहा हो - अरे , जा बे ! मैं तुझ जैसों के मुंह नहीं लगता । उन सज्जन का पारा सातवें आसमान पर पहुंच गया । बैल को कम से कम प्रत्युत्तर में कुछ तो प्रतिक्रिया देनी थी । यह तो वही बात हुई कि आप किसी खूबसुरत नाजनीन को सलाम करें और वह सलाम कुबुल न करें ।
गुरूर ए हुस्न की इस कदर बेनियाजी तोबा , 
कोई अदा से सलाम करे और सलाम कुबुल न हो ।

उन सज्जन को गुस्सा आ गया । उन्होंने आव देखा न ताव । झट से बैल पर डंडा लेकर पिल पड़े । साथ में चिल्लाते भी जा रहे थे - आ बैल मुझे मार । आ बैल मुझे मार । बैल पूंछ उठाकर भाग खड़ा हुआ । वे बिचारे पीछे से चिल्लाते रह गये - आ बैल मुझे मार । पहले जोर जोर से गुस्से से बाद में करुण क्रंदन में - आ बैल मुझे मार । बैल को मारना नहीं था । इसलिए उसने नहीं मारा । वह हमारे हुक्म का गुलाम नहीं है । जब उसे मारना होगा तब मारेगा । किसी के आदेश का इंतजार नहीं करेगा । बैल को हमने खामख्वाह बदनाम कर दिया है । यह पूरी बैल बिरादरी का अपमान है ।
इस बैल का हमने भी अपमान किया है । ट्राफिक चेकिंग हो रही थी । गाड़ी के कागजात दिखाए । लगे हाथों इंश्योरेंस के भी कागज दिखा दिए । सब इंसपेक्टर ने बड़ी अनिच्छा से उसे लिया । देखा । इस साल का प्रीमियम नहीं भरा था । चालान कट गया । मैंने सोचा - क्या जरूरत थी इंश्योरेंस का कागज दिखाने की । उसने तो मांगा हीं नहीं था । इसी को कहते हैं - आ बैल मुझे मार । हुआ न बैल का अपमान । बैल ने थोड़े हीं कहा था कि इंश्योरेंस का कागज दिखाओ ।
पति पत्नी सड़क पर लड़ रहे थे । बगल में स्कूटर खड़ा था । पति पत्नी को स्कूटर पर बिठा रहा था । पत्नी उसके साथ जाने को तैयार नहीं थी । झगड़ा बढ़ता देख मैंने पति को डांटा । पति के बोलने से पहले हीं पत्नी बोल उठी - "आपको कोई हक नहीं है हमारे अंदरुनी मामले में पड़ने का । आप अपने रास्ते चलो । "  मैं अपना सा मुंह लेकर रह गया । आगे जाकर मैंने पीछे मुड़ कर देखा । पति पत्नी पुनः उलझ पड़े थे । मैं सोचने लगा । कितने प्यार से वे लड़ रहे थे । मुझे क्या जरुरत थी बीच में पड़ने की ? इसी को कहते हैं कि आ बैल मुझे मार । फिर बैल का अपमान हुआ । मैं ऐसा भी तो सोच सकता था - क्या जरूरत थी मुझे दाल भात में मूसलचंद बनने की ?
इसी तरह बैल का अपमान करने में जज भी पीछे नहीं है । आपको 2012 की घटना याद होगी । जब कर्नाटक हाई कोर्ट के जज भक्त वत्सल ने एक तालाक मांगने गई महिला पर टिप्पणी कर दी थी । उनका कहना था कि तुम्हारा पति पीटता है तो तुम्हारा ख्याल भी तो रखता है । बच्चों का लालन पालन भी तो करता है । सारी स्वयं संस्थाएं भड़क गयीं । सारे नारीवादियों ने म्यान से तलवार निकाल लिए । कर्नाटक हाई कोर्ट के चीफ जज की अदालत में याचिका आॅन लाइन दाखिल कर दी गयी । भक्त वत्सल को हटाने के लिए धरना प्रदर्शन होने लगे । फेस बुक पर तरह तरह के कमेण्ट आने शुरू हो गये । कोई कोई कहने लगा कि जज ने "पति पीटता है " नहीं कहा था । जज ने कहा था - "पति पिटता है " तो कोई हर्ज नहीं है । पीटता है और पिटता है में जमीन आसमान का अंतर है । सबने कहा - यहां "आ बैल मुझे मार " वाली कहावत चरितार्थ हो रही है । वैसे यहां यह कहावत बहुत फिट बैठती - जज ने उड़ता हुआ तीर पकड़ अपने सीने से लगाया है ।
बैल बिरादरी की कदम कदम पर अपमान हो रहा है । वन्य जीव संरक्षण संस्था भी चुप बैठी है । क्या हमारे प्रधान मंत्री मोदी जी को इस पर कोई आधिकारिक बयान नहीं देना चाहिए था ? क्या बैल हीं मारता है ? भैंसा नहीं मारता है । वह भी तो मारता है । फिर ऐसा क्यों नहीं कहा जाता - आ भैंसा मुझे मार । बैल की सरे आम इज्जत तार तार हो रही है । हम खड़े खड़े उसकी इज्जत सरे आम नीलाम होते हुए देख रहे हैं । इस के लिए दोषी कौन है ? हम हैं । आप हैं । सब हैं । बैल को अब गुस्सा आ रहा है । उसके नथुने फड़क रहे हैं ।  उसे अब " आ बैल मुझे मार " कहने की जरुरत नहीं है । वह अब किसी को भी मार सकता है । सबने जो उसको लूटा है ।
कहां तक नाम गिनवाएं सभी ने मुझको लूटा है ।

Wednesday, 7 February 2018

पन्नीरसेल्वम और लेडीज़ सीट

नहीं हटूंगा ,डटा रहूंगा , इसी बर्थ पर मर मिटूंगा .
कलकत्ता में हमने बसों में महिला सीटें आरक्षित होते देखीं हैं. सीट न मिलने पर लोग उन पर बैठ जाते थे,पर जैसे हीं महिलाएं आतीं ,लोग आरक्षित सीट छोड़ देते . कंडक्टर भी तत्पर होता ,महिला सीट खाली करवाने के लिए . इसलिए लोग महिला सीट पर बैठने से गुरेज करते .सीट न मिलने की स्थिति में लोग बड़े बेमन से आरक्षित सीट पर बैठते . पराया धन उनके किस काम का  ? कई बार ऐसा होता कि आप जैसे हीं बैठे कि कोई न कोई महिला अपना अधिकार मांगनेे आपके सामने आकर खड़ी हो जाती .
काका हाथरसी ने इस व्यवस्था का पुरजोर विरोध किया . उनका कहना था कि बर्थ कंट्रोल (जन्म नियंत्रण ) के लिए जब नेता हमें प्रेरित कर रहे हैं तो हमने बर्थ (सीट )कंट्रोल कर लिया तो क्या बुरा किया ? इसी के विरोध स्वरुप वे ट्रेन में महिला आरक्षित सीट पर बैठ गये . टीटी के कहने पर भी वे नहीं हटे ,डटे रहे . टीटी को कविता सुना दी . यह कविता उन दिनों साप्ताहिक धर्मयुग में छपी थी .पूरी कविता ठीक तरह से  मुझे याद नहीं . आधी अधूरी जो याद है ,वह लिख रहा हूं .
नेता लोग चिल्ला रहे हैं ,पीट पीट कर ढोल.
करो बर्थ कंट्रोल , भइया ! करो बर्थ कंट्रोल .
..............................................................

कह काका कविराय ,सुनो हे टीटी !
नहीं हटूंगा ,डटा रहूंगा ,
इसी बर्थ पर मर मिटूंगा .

इस क्षेत्र में समानता का अधिकार काम नहीं करता . लोगों के मन पर महिलाओं का शारीरिक रुप से कमजोर होना हॉवी रहता है . व्यंग्य ही सही ,पर काका हाथरसी ने यह मुद्दा उठाकर महिला सीट के आरक्षण पर अपना विरोध तो दर्ज करा हीं दिया है . ऐसे हीं एक बार महिला सीट पर मेरे एक fb मित्र बैठ गये थे . वे दक्षिण के किसी शहर में विजनेस टूर पर थे .भाषा न समझ पाने के कारण वे महिला आरक्षित सीट पर बैठ गये .काफी देर बाद एक महिला उनके सीट के सामने आ खड़ी हुई . वह अपनी भाषा में अपनी सीट छोड़ने की मांग करने लगी . भाषा न समझ पाने के कारण वे उस सीट पर डटे रहे .स्थानीय लोग अपनी भाषा में उनका मजाक बनाने लगे . वह महिला भी खरी खोटी सुनाती रही .भाषा की समझ आड़े आ रही थी . वे सुनते रहे . तभी किसी ने अंग्रेजी में कहा कि यह महिला सीट है . उनका तब तक स्टॉपेज आ गया था . कंडक्टर के बताने पर वे उतर पड़े .
महिलाओं के लिए अब प्लेन में भी छ: सीटें आरक्षित होने लगी हैं .राजनीति भी उनके लिए अछूती नहीं रह गई है . महिलाओं के लिए 33% आरक्षण हाल के दिनों में तो फिलहाल खटाई में पड़ा हुआ है ; पर देर सबेर यह लागू हो जायेगा . ग्राम पंचायतों में यह पहले से हीं लागू है . ऑल इंडिया द्रविड़ मुनेत्र कड़गम पार्टी में मुख्यमंत्री का यह पद महिला आरक्षण को भेंट चढ़ चुका है . जय ललिता के बाद इस पद की दावेदारी उनकी परम मित्र शशिकला को मिल चुकी है . वे वर्तमान पार्टी प्रमुख बन गईं हैं .
शशिकला का पार्टी प्रमुख बनने से राजनीतिक विश्लेषकों कोई आश्चर्य नहीं हुआ है .ओ पनीर सेल्वम तीन बार स्टैंड बाई मुख्यमंत्री बने हैं . अम्मा चिन्नमा (जय ललिता -शशिकला ) की जोड़ी उन्हें मुख्य मंत्री बनने नहीं देगी . यह पद अघोषित रुप से हीं सही ऑल इंडिया द्रविण मुनेत्र कड़गम पार्टी में महिलाओं के लिए आरक्षित हो रखा है . गल्ती ओ पनीर सेल्वम की है ,जो बार बार स्टेपनी मुख्यमंत्री बनते रहते हैं . आखिर वे महिला आरक्षित सीट पर बैठते हीं क्यों हैं ?
लेखक - Er S.D. Ojha

Tuesday, 21 November 2017

वादापूर्ति शशि कुमार सिंह

वादापूर्ति 

देश की संसद में बड़े ही अहम मुद्दे 'धर्मोत्थान और सरकार का दायित्व' विषय पर बहस हो रही थी.सत्ताधारी सनातन दल का कहना था कि,''सरकार ने इतने कम समय में अपने सारे वादे पूरे कर दिए.जनता बड़ी खुशहाल है.अब उसे करने के लिए कोई नया प्रोजेक्ट चाहिए.''
अध्यात्म मंत्री ने कहा,''किसी भी समाज का वास्तविक विकास उसके आध्यात्मिक उत्थान में निहित है.यदि सरकार चाहे तो मैं बहुमूल्य सुझाव दूं.भगवान् राम की 100 मीटर ऊँची प्रतिमा स्थापित की जाए.''
रोजगार मंत्री ने कहा,''मैं अध्यात्म मंत्री की बात का समर्थन करता हूँ.देश की जनता को उनके गौरव का बोध कराना अति आवश्यक है.''
संसद ने सर्वसम्मति से यह निर्णय लिया कि भगवान् राम की प्रतिमा स्थापित होगी और उसकी लम्बाई 100 मीटर होगी.सिर्फ सर्वहारा दल ने इसका विरोध किया.सभी माननीय सदस्यों ने सर्वहारा दल के सदस्य की तरफ मुँह करके 'शेम शेम' का जयघोष किया.
अनुदार दल के नेता ने कहा,''सरकार का यह  कदम स्वागत योग्य है.मगर मैं इससे प्रसन्न नहीं हूँ.''
सभी सदस्यों ने दलीय भावना से ऊपर उठकर पूछा, ''क्यों, माननीय सदस्य को इसमें क्या आपत्ति है?स्पष्ट करें.''
अनुदार दल के नेता ने अपनी आपत्ति को स्पष्ट करते हुए कहा, ''देखो हमारी संस्कृति संयुक्त परिवार की पक्षधर है.हमारे आराध्य भगवान् राम का भी संयुक्त परिवार में विश्वास है.वे संयुक्त परिवार में ही जन्में, पले और बढ़े भी.इसलिए सिर्फ भगवान् राम की ही नहीं, बल्कि उनके पूरे परिवार की प्रतिमा स्थापित हो.''
रोजगार मंत्री ने हनुमान, सुग्रीव, अंगद, विभीषण, नल और नील की भी प्रतिमा स्थापित करने का सुझाव दिया.
स्वास्थ्य मंत्री ने इसके लिए अस्पतालों की भूमि दान में देने की भी घोषणा की.
शिक्षा मंत्री का भी कहना था कि विश्वविद्यालयों से सिर्फ देशद्रोही पैदा हो रहे हैं.इसलिए विश्विद्यालयों की भूमि का भी इस्तेमाल इस धार्मिक अनुष्ठान में किया जा सकता है.
थोड़ी आनाकानी के पश्चात् ये सारे प्रस्ताव पारित हो गए.
'मुस्लिम अवाम मजलिस' के अध्यक्ष ने भी फ़रमाया, ''वैसे तो हम बुतपरस्ती के सख्त खिलाफ हैं मगर हमें भी अपनी कौम को मुँह दिखाना है.हम चाहते हैं कि हमारी कौम के लिए बहुमंजिला मस्जिद बने.हमें त्योहारों में नमाज़ पढ़ने में परेशानी होती है.सड़कों पर पढ़ना पड़ता है.सदन यह भी ख्याल रखे कि शिया और सुन्नी की मस्जिदों की संख्या बराबर न हो और इन मस्जिदों के दरम्यान पर्याप्त दूरी हो.''
धर्मनिरपेक्षता नहीं बल्कि पंथनिरपेक्षता का हवाला देते हुए सदन ने यह प्रस्ताव भी पारित कर दिया.
आदिम जनजाति अधिकार मोर्चा के सदस्य ने कहा,''देखिये हम आप सबकी आस्था का ख्याल रखते हैं.हमारी भी आस्था का ख्याल रखा जाए, हम भी अपनी कौम के बीच जायेंगे, तो क्या मुँह दिखाएँगे?अतः मैं सदन से निवेदन करता हूँ कि हमारे आराध्य इष्टासुरजी की प्रतिमा भी स्थापित की जाए.''
सिखों, ईसाइयों और बौद्धों को भी अपनी-अपनी कौम को मुँह दिखाना था, इसलिए उनकी मांगें भी मान ली गयीं.

सर्वहारा दल के नेता ने कहा, ''हमें भूख और गरीबी की प्रतिमा स्थापित करनी चाहिए.हम इक्कीसवीं शताब्दी में धार्मिक मसलों में उलझे हुए हैं.जबकि किसी भी ईश्वर या अल्लाह का कोई अस्तित्व नहीं है.सब हमारी कल्पना की उपज हैं.हमें स्कूल, कॉलेज, विश्वविद्यालय,अस्पताल आदि स्थापित करने के लिए जनता ने चुना है.और हम यहाँ मंदिर, मस्जिद, गिरजाघर में उलझे हुए हैं.आप सभी माननीय सदस्यों से निवेदन है कि कृपया हमें इस बात से अवगत कराएं कि क्या आपने जनता से यही वादा किया था?''

अध्यक्ष समेत सदन के सभी माननीय सदस्य चौंके.मार्शल तो अपनी हँसी नहीं रोक पा रहे थे.

सर्वहारा दल के नेता की बात सुन सनातन धर्म के नेता आपे से बाहर हो गए.उन्होंने सबसे पहले उन्हें 'देशद्रोही' की उपाधि से नवाजकर उनके इस कृत्य की भर्त्सना की.पाकिस्तान जाने की सलाह देते हुए और साथ ही अपना मेनिफेस्टो हवा में लहराते हुए सदन को अपनी ओजस्वी वाणी से कम्पायमान करते हुए कहा, ''धर्म के खिलाफ तुम्हारी एक बात भी बर्दाश्त नहीं की जायेगी.तुमने असंसदीय भाषा का प्रयोग किया है.तुम्हें माफी मांगनी होगी.और देखो हमने लिखित में जनता से वादा किया है कि हम मंदिर बनायेंगे.मूर्ति-निर्माण उसी का हिस्सा है....यहाँ तक कि हमने श्मशान और कब्रिस्तान का भी वादा लिखित रूप में किया है.हमारे यहाँ सब कुछ लिखित रूप में रहता है.हमारा मेनिफेस्टो पारदर्शी है.और ये मेनिफेस्टो नहीं अपितु हमारे लिए  'संकल्प पत्र'है.बल्कि मैं तो यह कहूँगा कि हम बहुमत में हैं इसलिए हमें सिर्फ मूर्ति ही नहीं अनेक  मंदिर निर्माण की भी अनुमति मिले.''
अनुदार दल के नेता ने ललकारते हुए सनातन दल के नेता की कायरता पर क्षोभ प्रकट किया,''आपसे कुछ नहीं होगा.आप सदन और सदन के बाहर बहुमत में हैं.आपको किससे अनुमति लेनी है?जाकर चूड़ियाँ पहन लो.''
सभी माननीय सदस्यों ने कहा कि हम बहुत अहम मसले पर बहस करने के लिए एकत्र हुए हैं.यह आपस में लड़ने का समय नहीं है.हमें इस सर्वहारा दल के नेता के बारे में कुछ सोचना होगा.
'मुस्लिम अवाम मजलिस' के अध्यक्ष भी मज़हबविरोधी बातें सुनने को तैयार न थे.'लाहौल विला कूवत' का उच्चारण करते-करते वे अपनी जगह खड़े हो गए और उचककर सामने की मेज पर चढ़ने की कोशिश करने लगे.

सभी माननीय सदस्यों ने सर्वहारा दल के उस सदस्य के प्रति रोष प्रकट किया.सदस्यों के निवेदन पर अध्यक्ष ने मार्शलों को आदेश दिया कि वे सर्वहारा दल के उस अमाननीय सदस्य को उठाकर सदन से बाहर फेंक दें.मार्शलों ने अविलम्ब आज्ञा-पालन किया.

मूर्ति, मंदिर, मस्जिद आदि के लिए जगह की किल्लत को देखते हुए सदन ने सर्वसम्मति से यह निर्णय लिया कि सभी स्कूल, कॉलेज, विश्वविद्यालय, पुस्तकालय, अस्पताल आदि तोड़ दिए जाएँ.अस्पतालों के न रहने से.श्मशान और कब्रिस्तान भी गुलज़ार हो जायेंगे.सरकार का एक और लिखित वादा भी पूरा हो जाएगा.जनता भी इस आध्यात्मिक माहौल में प्रसन्न रहेगी.

समस्त माननीयों ने अपनी-अपनी कौमों को जाकर खुशी-खुशी मुँह दिखाया.कौमों ने प्रतिनिधियों के वादापूर्ति पर प्रसन्न होकर इतने जोर का जयकारा लगाया कि सभी मूर्तियों, मस्जिदों, गुरुद्वारों, गिरजाघरों आदि पर बैठे हुए पंछी उड़ गए.

Sunday, 8 October 2017

चिड़िया की आँख- शशि कुमार सिंह

चिड़िया की आँख

''अर्जुन तुम्हें चिड़िया की आँख दिख रही है?''
''हाँ गुरुजी दिख रही है.''
''और कुछ दिख रहा है?''
''ना गुरुजी.आपने कहा कि चिड़िया की आँख देखनी है तो बस मुझे चिड़िया की आँख ही दिख रही है.''
''बहुत खूब.मेरा आशीर्वाद है.बहुत आगे जाओगे.''
''धन्यवाद गुरुजी.''
''दुर्योधन तुम आओ.तुम्हें क्या दिख रहा है?''
''गुरुजी मुझे पेड़, डाली, पत्ते, फल, चिड़िया,घोंसले और आप लोग.सब कुछ दिख रहा है.''
''आँख नहीं दिख रही है?''
''आँख बहुत छोटी है न गुरुजी.इसलिए नहीं दिख रही है.''
''अर्जुन इसको समझाओ.इसकी आँख में ही कुछ खराबी है.प्रश्न भी ठीक से नहीं समझ रहा है.''
''देख भाई दुर्योधन गुरुकुल की भी पार्टी लाइन होती है.गुरुजी जो सुनना चाहते हैं, वही बोलना चाहिए.उनकी हाँ में हाँ मिलाना चाहिए.आगे जाने का यही मूल मन्त्र है.''
''मगर भाई सचमुच मुझे पेड़, डाली,पत्ते, फल, चिड़िया,घोंसले और आप लोग, सब कुछ दिख रहा था.चिड़िया भी दिख रही थी.मगर उसकी आँख तो बहुत छोटी थी.''
''तुम्हें कैसे समझाऊँ, जैसे मान लो, राजा धृतराष्ट्र कहें कि हस्तिनापुर में विकास दिख रहा है कि नहीं, तो मैं कहूँगा 'नहीं'.तुम क्या कहोगे?''
''मैं कहूँगा पिताजी अगर आपको दिख रहा है तो मुझे भी दिख रहा है.मैं साफ़-साफ़ देख रहा हूँ, दूर तक विकास हुआ है.पूरा हस्तिनापुर खुशहाल है.कहीं कोई समस्या नहीं है.''
''मगर क्या यह सच है?''
''ना.''
''सब समझते हो फिर भी.''
''क्या?''
''लोकतंत्र का गूढ़ रहस्य समझते हो.''
''हाँ, अब तो मैं  गुरुकुल में आगे जाऊंगा ना?''
''अब कोई नहीं रोक सकता.''

शशि कुमार सिंह

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सर गणेश दत्त