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Wednesday, 12 June 2019

कृष्णानन्द की किसान कविताएं

कृष्णानन्द की कविता 

                                     
                           तुम क्या समझोगे ?

               तुम क्या समझोगे ?

  

           जेठ की दुपरिहा में

           पैरों में भू की तपन

           तुम क्या समझोगे ?

                        पैरों में पत्थर की चोट

                        कांटे की दर्द भरी चुभन

                        तुम क्या समझोगे ?

           आषाढ़ के महीनो में

           घर की टूटी छत से

           टपकते पानी को

           तुम क्या समझोगे ?

                           भीगी लकड़ियों से धुन्धुआते चूल्हे

                           धुँआई  रोटी का स्वाद

                           तुम क्या समझोगे ?

           माघ के महीने में

           फटे चादर से सनसनाती हवा

           नीचे से धरती की ठंडक

           तुम क्या समझोगे?

                        दो दिन की भूख में

                        एक रोटी का स्वाद

                        तुम क्या समझोगे ?

          सूखी मिट्टी में ठनकते फावड़े

          हाथ में लगती चोट

          और फूटे छाले को

          तुम क्या समझोगे ?

                       मिट्टी से भरे टोकरे का

                       खोपड़ी पर पड़ते भार 

                       सिर में चिलचिलाती धूप

 

                       डगमगाते पैरों में उठे दर्द

                       तुम क्या समझोगे ?

         स्कूल की घंटी बजने पर

         पढ़ने को लालायित होने पर

         कलम की जगह हथौड़ा पकड़ने पर

         ह्रदय और घायल हाथों के दर्द

         तुम क्या समझोगे ?


                                   कृष्णानन्द

कवि बहादुर पटेल की किसान कविताएं

सवाल

---------

इन जुवार के दानों को देखो

किसान के पसीने की बूँदों से बने हैं ये

पसीना शरीर की भट्टी में तपकर धरता है यह रूप

दरअसल उसके पसीने की हर बूँद 

स्वाति नक्षत्र की होती है 

जो गिरती है बीज की सीपी में

देखो इनको वह अकेला नहीं खाता

जीव- जंतु और पंछियों को देता है उनका हिस्सा

कुछ अपने परिवार के लिए

कुछ रखता है बीज के लिए

बचा हुआ सब हमें लौटा देता है

अब वो क्या क्या जाने

जमाखोरी 

उसे नहीं पता सरकार के गोदाम में

कितना सड़ जाता है हर साल

और कितने लोग मर जाते हैं भूख से 

वो तो इतना जानता है 

कि कर्ज से दब जायेगा 

तो क्या बोयेगा इस धरती की कोख में

हम सबकी भूख वह देख नहीं सकता

और उसकी आखिरी नियति 

हम सब जानते ही हैं 

यह सब सनद रहे 

आने वाली पीढ़ी पूछेगी हमसे सवाल ।


टापरी 

--------- 

वो देखो वहाँ कभी हुआ करती 

ठीक कुएँ के बगल में टापरी 

तब दादा भी हुआ करते 

बनाई भी उन्होंने ही थी

अपनी मेहनत के मोतियों से

इकट्ठा किया था उन्होंने 

ईंट, गारा और चूना 

जिससे खड़ी की थीं चारों ओर दीवारें 

सुरक्षा का एक घेरा बनाया था 

बिछा दी थीं दीवारों पर 

कुछ सीमेंट की चादरें 

नीचे से बल्लियों के टेकों पर

बहिन कमली अक्सर लीप दिया करती 

पीली मिट्टी और गोबर से 

कैसा दिपदिपाता था अन्दर 

सोने-सा

धूप के कुछ पहिए

मंडराते थे वहाँ दिन में कुछ ढूंढ़ते से 

और रात में चांदनी 

अपने करतब दिखाती

अमावस की रात जब भारी पड़ती

तो गुलुप जलता

या फिर किरासिन की चिमनी 

ही होती आँखों का सहारा

यह तब की बात है 

जब कुएँ में हुआ करता था 

लबालब सागर-सा पानी 

दादा अक्सर क़िस्सा सुनाते 

कि कैसे जब चड़स में बैलों को जोतकर 

निकला जाता पानी

कैसे सोते फूट पड़ते 

कल-कल संगीत के साथ 

बैलों की कांसट करती उनकी संगत

यह कैसी कहानी थी 

जिसमे कविता का वास था 

संगीत का वास था 

फिर कैशा हलवाहा अपनी 

तान छेड़ता तो नहा जाती हवाएँ

बहा ले जातीं दूर तक मिठास

कैशा तब भी गाता था जब 

पहली बार बिजली से पानी निकाला गया 

फिर वाह गाने को 

क़िस्से में बदलने लगा 

ऐसे किस्से सुनाता कि कुएँ के 

सोते धार-धार रोते से लगते

इसे हम दूर से टापरी कहते 

और यदि होते पास तो खोली 

गाँव से दूर खेत पर थी यह 

ऐसी कई टापरियां थीं 

कई-कई खेतों पर 

सबका मिज़ाज होता अलग-अलग 

सबकी अलग-अलग थी गंध 

सबका अलग-अलग था संसार

इनका उपयोग ऐसा कि 

जैसे ख़ाली पेट को खाना 

प्यासे को पानी 

मदन, मंशाराम, दादा, दादी 

माँ, पिता और हम भाई-बहन कर रहे होते 

खेतों में काम 

तो बार-बार हर छोटे-मोटे काम के लिए 

गाँव के घर न जाने की सुविधा 

थी यह टापरी

काम करते तो सुस्ताते इसी में 

थकान को धोते इसी की छाया से 

मौसम की मार में हमेशा तैयार 

गर्मी में देती ठंडक 

बारिश में छिपा लेती हमें 

ठण्ड में रजाई सी होती गरम 

हर मर्ज़ की दवा

सो तालों की एक चाबी

गाँव के घर की उपशाखा 

जिसमे कुछ ख़ास चीज़ों को छोड़कर 

था सबकुछ 

जैसे एक लकड़ी का संदूक 

जिसमें फुटबॉल, पाइप पर लगाने के क्लिप,

स्टार्टर की पुरानी रीलें, बिरंजी, नट-बोल्ट,

कुछ पाने, पिंचिस, पेंचकस, टेस्टर,

बिजली के तार, फेस बाँधने का वायर,

सुतलियाँ, नरेटी, सूत के दोड़ले

और साइकिल के पुराने ट्यूब इत्यादि

ये सारे ब्यौरे किसी न किसी काम से नस्ती थे

यह एक ऐसा कबाड़खाना था कि

इससे बाहर कोई काम नहीं था 

या कि किसी काम के लिए इसके 

अलावा किसी विकल्प की ज़रूरत नहीं

कोने में पड़ी रहती खटिया 

जिस पर दिन में एक तरफ़ ओंटा

हुआ चिथड़ा बिस्तर 

जो रात में काम आता 

रखवाली के समय 

ठण्ड के दिनों में 

पाणत करते तो इसी में दुबक जाते

खटिया के नीचे था रहस्यमय संसार 

ख़ाली बोरे, खाद की थेलियों के बंडल,

कुछ पल्लियाँ 

जब अनाज पैदा होता तो 

इन्हीं में बरसता 

सब्जियां मंडी जातीं तो इन्हीं में

इनके सहयोगी होते 

कुछ टोकनियाँ, छबलिये

और बड़े डाले, गेंती, फावड़े, कुल्हाड़ी 

दरांते, सांग, खुरपियाँ 

कितना कुछ था इस टापरी के भीतर 

खेती किसानी का पूरा टूल-बॉक्स

यही नहीं इसके पिछवाड़े 

बल्लियाँ, बाँस, हल, बक्खर, डवरे,

जूड़ा पड़े रहते 

छाँव में पड़ी होती पुरानी साइकिल

हाँ यहीं तो था यह सबकुछ 

कैसे स्मृति में रपाटे मारती हैं सारी चीजें 

कहाँ गया यह सब

देखो भाई 

यह खोड़ली सड़क 

जब से यहाँ से निकली है 

सबकुछ खा गई यह डाकिन 

यह देखो अपने साथ 

कैसा विकास का पहिया लेकर आई 

कुचल दिया सबकुछ

यह पेट्रोल पंप 

वह चौपाल सागर 

ये बड़ी-बड़ी मशीनों से भरी फैक्ट्रियाँ

बड़ा भयावह दृश्य है यह 

बाज़ार और पूँजी के पंजों को देखो 

अदृश्य हैं ये 

इनके वार ने खोद दी है 

ऐसी कई टापरियों की जड़ें 

एक सागर में तब्दील होता जा रहा है 

सारा मंजर 

जिसमें डूबता जा रहा है सबकुछ।

  

बहादुर पटेल


Thursday, 17 May 2018

गौरव पांडेय की किसान कविताएँ

खेत सब जानते हैं
-----------------------------

किसके घर है दो वक्त की रोटी
कौन एक जून पानी पीकर काटता है
किसके यहाँ पकते हैं व्यजंनों के प्रकार
और कौन पेट से घुटने सटाकर सोता है

खेत जानते हैं

किसान के घर कितनी औरतें हैं
कितने हैं बूढ़े और बच्चे कितने
जवान लड़कियाँ कितनी हैं
खेत जानते हैं
गांव के सारे शोहदों को
खेत भली-भाँति पहचानते हैं

खेत जानते रहते हैं
किस कंधे पर कितना कर्ज है
किसकी मेहरारू को कौन सा मर्ज है
किसकी बिटिया कब ब्याही जाने वाली है
हाड़-तोड़ मेहनत के बावजूद बखारी किसकी खाली है ?

बहुत मजबूरी में खेत विदा लेते हैं  किसान से
कुछ कर्ज के लिए तो कुछ मर्ज के लिए
तो कुछ फर्ज के लिए
मसलन बिटिया की विदाई के पहले
विदा ले लेते है किसान के सबसे अच्छे खेत

इस तरह किसान का बचपन यौवन ज़रा
उसने की है आत्महत्या
अथवा कैसे मरा
खेत जानते हैं !

जी हाँ ! ज्यादा सोचिए मत हमारी ही नहीं
आपकी पीढ़ियों का भी इतिहास
खेत भली-भांति जानते है

2

एक ऋणग्रस्त किसान का एकालाप
_______________________________

गेहूँ की बालियों और मकई के दानों में
गढ़ा रहा है दूध
घर की बेटियों  का गढ़ा रहा है खून
अब हम सरसों में फूल नहीं फलियाँ चाहते हैं।

बर्तन-टकराने और सूनी थालियां बजाने के
अलावा भी कोई संगीत है
हमें नहीं पता
बर्तनों के माँजन के साथ मंज गई है
हमारी देह भी
अब हमें दर्पण की कोई जरूरत नहीं है।

जरूरतें शाखों सी फैल पत्तों-सी फूट रही हैं
जरा सी हवा से तना काँप उठता है
पत्नी के बालों में गढ़ा गई है धूप
हाथ की रेखाएँ चेहरे पर उभर आई हैं
हमारी कमर भी पुराने पीपल की तरह
छाल छोड़ने लगी है।
.
परिवार का भविष्य नाज़ुक रस्सी से बंधा
छूँछ बाल्टी-सा कुँए में लटक रहा है
हम चाहते हैं हमारे बच्चे भी
कलम पकड़ें
हम हमेशा हारे जुआरी की तरह
कुछ और पैसों के जुगाड़ में लगे रहते हैं ।

हम जानते हैं
अब रौशनी कुछ लोगों की मुठ्ठियों में कैद है
बिजलियां खेलती हैं उनकी मुस्कान में
जिस ओर देखते हैं हँसकर होती है बारिस उधर ही
जिधर तने भृकुटि पड़ जाता है सूखा
हमारे हिस्से का सूरज अंधा है
धरती दिनों-दिन हो रही ऊसर
पुराने हुए हमारे बीज

जिसे ईश्वर कहते हैं उसका कोई पता नहीं...

ओ गणतंत्र देश के उत्सवी लोगो !
हमें समझाओ स्वतंत्रता-गणतंत्रता का अर्थ ?
हमारे लिए यह उस जुआ की तरह है
जो हमारे कंधों पर रखा है
और हम देश के मानचित्र पर बीचो-बीच जुते हुए हैं ।

Saturday, 28 April 2018

निलय उपाध्याय की किसान कविता बेदखल

बेदखल
मैं एक किसान हूँ
अपनी रोजी नहीं कमा सकता इस गाँव में
मुझे देख बिसूरने लगते हैं मेरे खेत
मेरा हँसुआ
मेरी खुरपी
मेरी कुदाल और मेरी,
जरूरत नहीं रही
अंगरेज़ी जाने बगैर सम्भव नहीं होगा अब
खेत में उतरना
संसद भवन और विधान सभा में बैठकर
हँसते हैं
मुझ पर व्यंग्य कसते हैं
मेरे ही चुने हुए प्रतिनिधि
मैं जानता हूँ
बेदख़ल किए जाने के बाद
चौड़े डील और ऊँची सींग वाले हमारे बैल
सबसे पहले कसाइयों द्वारा ख़रीदे गये
कोई कसाई…
कर रहा है मेरी बेदख़ली का इंतजार
घर के छप्पर पर
मैंने तो चढ़ाई थी लौकी की लतर –
यह क्या फल रहा है?
मैने तो डाला था अदहन में चावल
यह क्या पक रहा है?
मैंने तो उड़ाये थे आसमान में कबूतर
ये कौन छा रहा है?
मुझे कहाँ जाना है-
किस दिशा में?
बरगद की छाँव के मेरे दिन कहाँ गये
नदी की धार के मेरे दिन कहाँ गये
माँ के आँचल-सी छाँव और दुलार के मेरे दिन कहाँ गये
सरसों के फूलों और तारों से भरा आसमान
मेरा नहीं रहा
धूप से
मेरी मुलाकात होगी धमन-भट्ठियों में
हवा से कोलतार की सड़कों पर
और मेरा गाँव?
मेरा गाँव बसेगा
दिल्ली मुम्बई जैसे महानगरों की कीचड़-पट्टी में
मैं गाँव से जा रहा हूँ
कुछ चीज़ें लेकर जा रहा हूँ
कुछ चीज़ें छोड़कर जा रहा हूँ
मैं गाँव से जा रहा हूँ
किसी सूतक का वस्त्र पहने
पाँच पोर की लग्गी काँख में दबाए
मैं गाँव से जा रहा हूँ
अपना युद्ध हार चुका हूँ मैं
विजेता से पनाह माँगने जा रहा हूँ
मैं गाँव से जा रहा हूँ
खेत चुप हैं
हवा ख़ामोश, धरती से आसमान तक
तना है मौन, मौन के भीतर हाँक लगा रहे हैं
मेरे पुरखे… मेरे पित्तर, उन्हें मिल गई है
मेरी पराजय, मेरे जाने की ख़बर
मुझे याद रखना
मैं गाँव से जा रहा हूँ।
                        -निलय उपाध्याय
निलय उपाध्याय

Sunday, 3 April 2016

मुल्क लीलाधर मंडलोई



ख़बरें जो सुनी नहीं गई ध्यान से जैसे

किसान आत्महत्या कर रहे हैं

मजदूर आत्मदाह

कामकाजी औरतें

बलात्कार से खुद को बचा नहीं पा रहीं

भ्रष्टाचार की आग

गोल इमारत में भी

चैनल गुप्त रूप से

नए नए ऑपरेशन में सक्रिय

और लेन- देन का

विलम्ब प्रसारण

मुल्क यक़ीनन बदल रहा है

..................



पृष्ठ ९८ लिक्खे में दुःख

देहगाथा अरुण कमल


------                
कोई चीज़ थी जो पहले
जैसे रोओं से झरती थी
जैसे भुट्टे की तरह गसी रहती थी
जैसे तारों की तरह थाल में भरी रहती थी
जैसे मछलियों की तरह खलबली करती थी
और बिना हवा के नदी को जोड़ती रहती थी
अब इतना कम कि बहुत फूंकने पर गुब्बारा जरा सा फूले
फिर बैठ जाय
एक बीघा खेत में सेर भर धान

  पृष्ठ ९५ पुतली में संसार अरुण कमल

शहर लीलाधर मंडलोई



शहर में जब नहीं मिले

सोगहक नरम मूली

बथुआ का साग

पापड़

और चूल्हे से उतरते गरम-गरम फुल्के

गाँव से आये पिता

लौट गये बाज़ार ऐसा ना था कि रोक सके



पृष्ठ ७१ लिक्खे में दुःख

बिजूका - लीलाधर मंडलोई



मैं खेत के बीच खड़ा बिजूका हूँ

सब जानते हैं

झूठ बड़े काम का है

यह सिर्फ किसान जानता है



पृष्ठ २२ बीजूका / लिक्खे में दुःख

किसान कवितायेँ -शंकरानंद



१.



पेड़


-------

ओ किसान!

तुम नहीं रोंपो बीज धरती के गर्भ में
नहीं जोतो खेत
अब मत बहाओ पसीना
ये तुम्हारे दुश्मन हैं
कुछ और सोचो जो तुम्हें जिन्दा रहने का मौका देगा
तुम कुछ और करो जो दो वक्त की रोटी दे तुम्हें
ये लोकतंत्र है
जिसके सामने रोओगे
वही उठ कर चल देगा
जिससे माँगोगे मदद
वही सादे कागज पर अँगूठा लगवा लेगा
तुम जिस पौधे को रोपोगे विदर्भ में
वह दिल्ली में पेड़ बन कर खड़ा मिलेगा
वह सबको छाँह देगा और तुम्हें धूप में जलना पड़ेगा
तुम्हें ध्यान खींचने के लिए
उसी पेड़ की टहनी में फाँसी लगा कर मरना पड़ेगा
भरी सभा में हजारों लोगों के बीच
और सब इसे तमाशे की तरह देखेंगे
इसलिए कहता हूँ कि मत रोंपो बीज.


......................परिकथा मार्च अप्रैल २०१६


२.


भाव

-----
सबसे सस्ता खेत
सबसे सस्ता अन्न
सबसे सस्ता बीज
सबसे सस्ती फसल और
उससे बढ़ कर सस्ता किसान
जिसके मरने से किसी को जेल नहीं होता
जिसके आत्महत्या करने से किसी को फाँसी नहीं होती.

..............................................................................

कविता संग्रह 'पदचाप के साथ'बोधि प्रकाशन जयपुर से 2015 में भी शामिल है.पृष्ठ-31

३.
अब

-------
घर के सारे लोग उदास हैं
टूट गए हैं धीरे धीरे
लेकिन मैं देख रहा हूँ कि वह लड़का खेत में है और
कंधे पर संभाले है कुदाल
एकदम अकेला है वह
लेकिन डरा हुआ नहीं
वह नहीं है जरा भी उदास
जबकि खेत में दरार पड़ गई है
फटी हुई है दूर दूर तक धरती
कहीं नहीं है कोई बीज
वह रूका हुआ नहीं है
बल्कि चल रहा है दरार पर
वह देख रहा है खेत का हरेक कोना
जैसे खोज रहा हो वह जगह
जहाँ से शुरूआत करना अब जरूरी है.
४.
किसान

--------
पूरी पृथ्वी का अधिकांश उसके बीज के लिए बना
हुआ यह कि सब गायब होने लगा धीरे धीरे हिस्सा
जैसे बच्चे का खिलौना कोई गायब कर देता है
वह सरकार हुई
जिसके लिए किसान बीते मौसम का उजड़ा हुआ दिन था
कोई बंजर जिसका होना न होना कोई मायने नहीं रखता
कोई खंडहर कोई खर पतवार
यह एक किसान का जीवन तय हुआ
जिसके मरने पर भी कोई आँसू नहीं बहाता था.

..............जनसत्ता २६ जुलाई २०१५

-शंकरानंद











































रोटीयाँ जानती है किसान का दर्द- नवनीत सिंह



रोटीयाँ जानती है किसान का दर्द:-


उनके बनियान और धोतियो की किस्मत मे,
नही लिखा है टीवी वाला सर्फ एक्सल,
परन्तु सुनायी देती है,
विज्ञापन के नेपथ्य से सतुंष्टी की आवाजे,
अच्छाई मे लगे दाग अच्छे ही होते है,

वे देखते है सपने लहलहाते हुये फसलो मे,
पालते है उम्मीदे खुदगर्ज मौसमो से,
धान,गेहूँ की बालियाँ बनाती बिगाङती है जिनकी तकदीर,
वे किसान है और आज भी किसान है,
फर्क बस इतना कि,
कुछ जमीने छीन ली है महँगाई ने,
उनके सपनो को छोङकर,
जो आशा की पहली किरण के साथ निकलती है सुबह,
शायद इस महीने चुका देगे बैंक का कर्ज,
भर देगे ब्याज, जो बढ रहा है लगातार,
जवान होती बेटीयो की तरह ,
छीनते हुये नीद, सिवान के सुकून,

उनके माथे से टपकता पसीना,
जब गिरता है खेतो मे,
तब घुलती है रोटीयो मे मिठास,
दरअसल रोटीयाँ कृतघ्न नही है,
वो जानती है अपने सघर्ष का इतिहास,
किसी खेत की मेङ पर खङा किसान,
कर रहा है जद्दोजहद,
खाद पानी के लिये सङक पर खा रहा है
पुलिस की अनगिनत लाठीयाँ,
रोटीयाँ यह भी जानती है,
अभावो के खून-पसीने को सोखकर वो बनी है ऊर्जावान,
इसलिये भर देती है भूखे का पेट बिना किसी स्वार्थ मे,

---नवनीत सिंह



यह कविता कुछ वर्ष पहले संवदिया पत्रिका मे छपी थी

अपमान-लीलाधर मंडलोई

अपमान

....
एक किसान और मर गया

इसे आत्महत्या कहना अपमान होगा

मरने के समय वह बैंक का दरवाजा खटखटा रहा था


पृष्ठ ५२ लिक्खे में दुःख

खरपतवार



खरपतवार


...................


मेरा कोई खेत नहीं

मैं दोस्तों के खेत में

करता था काम

जैसे माँ

फसल आने पर

मैं खेत से बाहर था

जैसे खरपतवार

.............................



लिक्खे में दुःख  लीलाधर मंडलोई पृष्ठ २१

आश्विन - अरुण कमल



ऐसा क्या है इस हवा में


जो मेरी मिटटी को भुरभुरी बना रही है


धूप इतनी नाम कि हवा उसे


सोखती जाती है पोर-पोर से

सिंघाड़ों में उतरता है धरती का दूध

और मखानों के फूटते लावे हैं हवा में

धान का एक-एक दाना भरता है

और हर तरफ धूम है

एक प्यारा शोरगुल रोओं भरा

इसी दिन का तो इंतज़ार था मुझको

इसी नवरात्र के प्रहर का

आकाश इतना नीला गूँज भरा

शरीर इतना साफ़ निथरा ,

ये हवा जो रोओं को उठा रही है

ये हवा जो मुझे खोल रही है

जैसे मैं फूल हूँ अगस्त्य का

इतनी इच्छाएँ ऐसा लालसा

मैं भर जाता हूँ जौ के अंकुरों से


आश्विन/पुतली में संसार / पृष्ठ ९३

रोता रहा किसान

बेटा पढ लिख कर गया, बन गया वो इंसान
देख उजडती फसल को, रोता रहा किसान

सारी उम्र चलाया हल, हर दिन जोते खेत.
बूढा हल चालक हुआ, सूने हो गए खेत.

दो बेटे थे खेलते इस आंगन की छांव.
अब नहीं आते यहां नन्हें नन्हें पांव.

बुढिया चूल्हा फूंकती सेक रही थी घाव.
अबके छुट्टी आएंगे बच्चे उसके गांव.

बडा बनाने के लिये क्यों भेजा स्कूल.
बूढा बैठा खेत पर कोसे अपनी भूल.

खेत बेच कर शहर में ले गया बेटा धन.
बूढे बूढी का इस घर में लगता नहीं है मन.

जब शहर वाले फ्लैट में गये थे बापू राव.
हर दिन उनको वहां मिले ताजे ताजे घाव.

आज पार्क में राव जी की आंखें गयी छलक.
देख नीम के पेड को झपकी नही पलक.



http://www.sahityashilpi.com/2008/11/blog-post_04.html

बिके हुए खेत की मेड़ पर बैठे एक किसान का शोक गीत प्रदीप जिलवाने

कि सब बातें तय हो गई
कि सौदा-चिट्ठी हो गई
कि खेत नहीं, यह मौके की जमीन थी

कि मैंने तो लगाया था कपास खरीफ में,
कि मैंने रबी में बोया था गेहूँ
कि लहलहाती फसलें नहीं, कौन दबा धन दिखा ?

कि आखिरशः मैं टूट गया किसी तरह
कि धन से लकदक रहूँगा कुछ महीने साल
कि न लौटकर आऊँगा कभी इस तरफ भी
कि न हल, न बक्खर, न छकड़ा होगा

कि भाई जैसे बैल भी अब बिक जाएँगे
कि मेरे घर भी अनाज अब आएगा बाजार से
कि खेत अब तब्दील हो जाएगा कंकरीट में

कि क्या कभी भूल पाऊँगा इस मिट्टी की गंध
कि मेरे पूर्वजों का पसीना है इसमें घुला-मिला






http://www.hindisamay.com/contentDetail.aspx?id=3234&pageno=1

किसान की खुदकुशी पर पाणिनी आनंद की कविता...



किसान की खुदकुशी पर पाणिनी आनंद की कविता...

· April 22, 2015
...............................................................................

Panini Anand : यह नीरो की राजधानी है. एक नहीं, कई नीरो. सबके सब साक्षी हैं, देख रहे हैं, सबके घरों में पुलाव पक रहा है. सत्ता की महक में मौत कहाँ दिखती है. पर मरता हर कोई है. नीरो भी मरा था, ये भूलना नहीं चाहिए.


खून रोती आंखों वाली माँ,
बेवा, बच्चे और खेत,
सबके सब तड़पकर जान दे देंगे
फिर भी नहीं बदलेगी नीयत
इन भूखी आदमखोर नीतियों के दौर में
कैसे बचेगा कोई,
किसान
जब नियति का फैसला
बाज़ार के सेठ को गिरवी दे दिया गया हो
और चाय बेचनेवाले की सरकार
ज़हर और फंदे बेचने लगे

मौत किसे नहीं आती
कौन बचा है
पर कोई सोचता है,
कि मौत के सिवाय अब कोई रास्ता नहीं
और कोई सोचता है
वो मरेगा नहीं.
लोगों को लगातार मार रहे लोग
अपने को अमर क्यों समझते हैं
अपने मरने से पहले
दूसरों को मारना
बार-बार मारना
लगातार मारना
मरने पर मजबूर करना
किसी की उम्र नहीं बढ़ाता
न ही खेतों में सहवास से,
अच्छी होती है फसल
न गंगा नहाने से,
धुलते हैं पाप
न जीतने से,
सही साबित होता है युद्ध

हत्यारा सिर्फ हत्यारा होता है
भेष बदलने से
वो नीला सियार लग सकता है
साहूकार लग सकता है
कलाकार लग सकता है
बार-बार ऐसा सब लग सकता है
लेकिन हत्यारा, हत्यारा होता है
चाहे किसान का हो,
किसी मरीज़ का,
किसी ग़रीब का,
किसी हुनर का, पहचान का
कृति का, प्रकृति का
हत्या किसी को नहीं देती यौवन
न शांति, न अभ्युदय
मौत फिर भी आती है
मरना फिर भी होता है

खौलकर उठती मरोड़,
सूखती जीभ, बंधे गले,
और रह-रहकर चौंकते हाथों में
जो विचार
अंतिम अरदास हैं
वो चाहते हैं
कि
भाप हो जाएं
ऐसे नायक, सेवक
प्रतिनिधि
जिनके रहते आत्महत्या करे अन्नदाता
शीशे की तरह टूटकर बिखर जाएं
ऐसी आंखें
जो देखती रहीं मौत को लाइव
सूख जाएं दरख्त
कागज़ों की तरह फट जाएं राजधानी की वे सड़कें
जहाँ मरने के लिए मजबूर होकर आए एक किसान
किसान मरा करे,
देश तमाशा देखता रहे,
ऐसे लाक्षागृह की सत्ता
लहू के प्यासी नीतियां
और लड़खड़ाते गणतंत्र में
आग लगे.
मुर्दा हो चुकी कौमें
हत्यारी सरकारें
और देवालयों के ईष्ट
सबका क्षय हो.
प्रलय हो.

हा रे
हा



पाणिनि आनंद
22 अप्रैल, 2015. नई दिल्ली (एक किसान की राजधानी में आत्महत्या की साक्षी तारीख)

गाँव का दक्खिन हो गया है "आखिरी आदमी" जितेंद्र श्रीवास्तव

मौसम बदल रहा है
गाँव में सुगबुगाहट है चुनाव की
अब प्रधानी में बहुत पैसा है

खड़ंजा हो बाँध हो बिजली हो बाढ़ हो अकाल हो
प्रधान की पौ-बारह रहती है

अब भी दफ्तरों में टँगती हैं
महात्मा गांधी और डॉक्टर अंबेडकर की तसवीरे
पर कोई ताकना भी नहीं चाहता
महात्मा गांधी के "आखिरी आदमी" की तरफ
डॉक्टर अंबेडकर के सपनों की तरफ

इन दिनों लोकतंत्र में
गाँव का दक्खिन हो गया है "आखिरी आदमी "

पिछली बार पाँच लोग मारे गए थे मेरे गाँव में
प्रधानी के चुनाव में
निकलने नहीं दिया था जबरों ने
दलितों को उनकी बस्ती से
उनके वोट खा गए थे वे
सरकारी योजनाओं की तरह

किसान बदहाल हैं
मर रहे हैं भरी जवानी में
जो बचे हैं उनकी जेबें इस कदर खाली हैं
कि वे भर नहीं सकते बच्चों की फीस
उनके घर में नहीं हैं
किसी के बदन पर साबूत कपड़े

लड़कियाँ भी महफूज नहीं हैं
गाँवों में

अब फिर चुनाव सिर पर है
धीरे-धीरे गर्म हो रही है हवा
लोग अकन रहे हैं एक दूसरे की कानाफूसी
मैदान में उम्मीदवार भी कई हैं
पर "आखिरी आदमी" को
"कोई उम्मीद बर नहीं आती
कोई सूरत नजर नहीं आती
आगे आती थी हाल-ए-दिल पे हँसी
अब किसी बात पर नहीं आती।

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http://www.hindisamay.com/contentDetail.aspx?id=6238&pageno=1

जब हँसता है कोई किसान जितेंद्र श्रीवास्तव

जब हँसता है कोई किसान 
जितेंद्र श्रीवास्तव

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वह हँसी होती है
महज चेहरे की शोभा
जिसका रहस्य नहीं जानता हँसने वाला
सचमुच की हँसी
उठती है रोम-रोम से
जब हँसता है कोई किसान तबीयत से
खिल उठती है कायनात
नूर आ जाता है फूलों में
घास पहले से मुलायम हो जाती है
उस क्षण टपकता नहीं पुरवाई में दुख
पूछना नहीं पड़ता
बाईं को दाईं आँख से खिलखिलाने का सबब

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http://www.hindisamay.com/contentDetail.aspx?id=6180&pageno=1

बेटा किसान का (कविता)


बेटा किसान का (कविता)


हमारे देश की है जो आन
मेहनत है जिसकी शान
ऊँचा है जिसका मान
और नहिँ वो है हमारा किसान
कडी धूप मेँ तपके जिसने
बनाई बँजर हरि-भरी
गर्मी सर्दी सहि जिसने खरी-खरी
दुनिया का भरता है जो पेट
मुश्किले और संघर्ष साथ है जिसके घडी-घडी
बनना चाहते है इनके बच्चे भी
डाक्टर इंजिनियर और विग्यानिक
पर इन्हे मील नहिँ पाता समय पर पैसा
किसान को मील ना पाए
खाद बीज और भाव फसल का
लेना पडता है इन्हेँ
बनिये से भारी ब्याज दर पर पैसा
बाजार जाए तो...2
भाव सुनकर उड जाते हैँ हौँस
अब कैसे चले ये जीवन के दो कौस
अब कैसे चले ये जीवन के दो कौस
भगवान का कैसा है ये रौष
भुगतते है ये सजा बिना किसी दोष
जानु मैँ ये सब गहराई से
क्योँकि मैँ भी हूँ बेटा किसान का!
Writer: Ashish Ghorela

http://kundanpura.yn.lt/villages/mugalpura/index/__xtblog_entry/10054009-?

मेहनत किसान की कविता - रवि श्रीवास्तव



आखिर हम कैसे भूल गये, मेहनत किसान की,

दिन हो या रात उसने, परिश्रम तमाम की।

जाड़े की मौसम वो, ठंड से लड़े,

तब जाके भरते, देश में फसल के घड़े।

गर्मी की तेज धूप से, पैर उसका जले,


मेहनत से उनकी देश में, भुखमरी टले।

बरसात के मौसम में, न है भीगने का डर,


कंधों पर रखकर फावड़ा, चल दिये खेत पर।

जिनकी कृपा से आज भी,चलता है सारा देश,


सरकार उनके बीच में, पैदा होता मतभेद।

मेहनत किसान की, कैसे भूल वो रहे,


कर्ज़, ग़रीबी, भुखमरी से, तंग हो किसान मरे।

दूसरों का पेट भर, अपनी जान तो दी,


आखिर हम कैसे भूल गये , मेहनत किसान की।

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सर गणेश दत्त