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Tuesday, 1 September 2020

नंदकिशोर नवल:आधुनिक कविता के आलोचक :गोपेश्वर सिंह

आज हमारे अध्यापक साथी नंदकिशोर नवल का जन्मदिन है. यह पहला जन्मदिन   है , जब वे हमारे बीच नहीं है. जब मैं पटना में था तो आज के दिन नवल जी के घर  बढ़िया भोजन मिलता था और हम देर तक गपशप करते थे. ...उनके निधनोपरांत 'आजकल' ने अपना इस महीने का अंक नवल जी पर केंद्रित किया है. इस अंक में मेरा भी एक लेख है जिसके जरिए  मैंने आलोचक नंदकिशोर नवल को वस्तुपरक ढंग से समझने की यथासंभव  कोशिश की है. उस लेख के साथ नवल जी की स्मृति को प्रणाम .                  

नंदकिशोर नवल:आधुनिक कविता के आलोचक :गोपेश्वर सिंह


लिखने के लिए नंदकिशोर नवल ने कई विधाओं में लिखा है, लेकिन वे मूलतः कविता के आलोचक हैं. कविता में भी छायावाद और उसके बाद के काव्य परिदृश्य में उनकी विशेष रूचि थी. उन्होंने निराला की कविता पर शोध -कार्य किया था. निराला की कविता का प्रभाव उनके ऊपर ऐसा पड़ा कि वह उनके रूचि- निर्माण का वह मुख्य आधार बन गया. वैसे उनके अध्ययन का दायरा बहुत व्यापक था. वे संस्कृत भाषा के कालिदास से लेकर अपभ्रंश के कवियों पर बात कर सकते थे. वे सरहपाद, विद्यापति, तुलसीदास, बिहारी, निराला से लेकर आधुनिक काल तक के
कवियों के काव्य-वैशिष्ट्य पर समान रूप से लिखते- बोलते थे. वे यदि निराला के काव्य की अर्थ छवियों को खोलते थे तो संजय कुंदन, राकेश रंजन आदि युवा कवियों के काव्य-वैशिष्ट्य को भी . हिंदी कविता पर इतने विस्तार से लिखने वाले और बातचीत करनेवाले आलोचक के रूप में नामवर सिंह के बाद सहज ही नंदकिशोर नवल का नाम याद आता है. 
 नवल जी ने सूरदास, तुलसीदास, मैथिलीशरण गुप्त, दिनकर, अज्ञेय, नागार्जुन आदि पर स्वतंत्र पुस्तकें लिखी हैं और उनकी कविता का नया मूल्यांकन प्रस्तुत करने की कोशिश की है. उन्होंने रघुवीर सहाय, कुँवर नारायण, राजकमल चौधरी, केदारनाथ सिंह आदि पर भी लम्बे-लम्बे लेख लिखे हैं. उन्होंने ‘आधुनिक हिंदी कविता का इतिहास’ लिखा है और अपनी पसंद के कवियों का मूल्यांकन किया है. ‘हिंदी कविता अभी, बिलकुल अभी’ जैसी पुस्तक भी लिखी है और आठवें दशक के प्रमुख कवियों का मूल्यांकन किया है. इसके अतिरिक्त कविता और कवियों पर लिखे हुए निबंधों की उनकी अनेक किताबें हैं. उन्होंने ‘निराला रचनावली’ का तो संपादन किया ही है, कुछ और पुस्तकों का भी संपादन किया है. कुल मिलाकर यह कि नंदकिशोर नवल ने कविता पर प्रचुर मात्रा में  लेखन कार्य किया है, लेकिन आलोचक के रूप में उनकी कीर्ति का मूल आधार ‘मुक्तिबोध: ज्ञान और संवेदना’ तथा ‘निराला: कृति से साक्षात्कार’ नामक दो पुस्तकें हैं. अन्य कवियों पर उनके लिखे हुए की कोई भले अनदेखी कर जाए, लेकिन जिसकी भी रूचि निराला और मुक्तिबोध में है, उसे नवल जी की आलोचना से गुजरना ही होगा. जिस तैयारी के साथ नवल जी ने मुक्तिबोध के कवि- मन में प्रवेश किया है  और उनके काव्य- मर्म को उद्घाटित किया है, वह अपूर्व है. लिखने के लिए मुक्तिबोध पर उनके पूर्व रामविलास शर्मा, नामवर सिंह आदि ने भी लिखा है. लेकिन नवल जी ने जितने विस्तार और गहराई से मुक्तिबोध के मनस्विन रूप की खोज की है, वह मुक्तिबोध को नए रूप में हमारे सामने रखता  है. इसी तरह निराला पर रामविलास शर्मा का प्रबंधात्मक लेखन है. अन्य लोगों की लिखी हुई पुस्तकें भी हैं. लेकिन ‘निराला: कृति से साक्षात्कार’ के जरिए नवल जी ने निराला की कविताओं की जो पाठ आधारित आलोचना लिखी है, वह निराला संबंधी समझ को बदलनेवाली और विकसित करनेवाली है. 
 नवल जी का मानना है कि ‘कुछ कवि भावना के साथ ज्ञान को भी महत्त्व देते हैं, कुछ जितना भावना को महत्त्व देते हैं, उतना ज्ञान को नहीं.’ इन दोनों तरह के कवियों के उदाहरण हिंदी कविता के इतिहास में मिल जाएँगे. लेकिन नवल जी की नजर में मुक्तिबोध ऐसे कवि थे जिनकी कविता में ज्ञान और भावना दोनों समान रूप से मौजूद हैं.  नवल जी का कहना है- ‘मुक्तिबोध कविता में संवेदना के साथ ज्ञान को अनिवार्य मानते थे. इसी कारण उन्होंने कवि द्वारा अपने भीतर विश्व-दृष्टि विकसित करने पर बहुत बल दिया है.’ नवल जी का मानना है कि मुक्तिबोध यथार्थवादी कविता के पक्षधर थे, लेकिन उन्होंने आत्मपरकता का निशेष नहीं किया है. नवल जी के अनुसार मुक्तिबोध ‘व्यक्तिबद्ध पीड़ाओं से हटकर’ रची गई कविताओं को महत्त्व देनेवाले कवि थे. मुक्तिबोध जीवन के साथ कविता का अनिवार्य संबंध मानते थे. लेकिन कविता को जीवन का इतिवृत बनाने के पक्ष में वे नहीं थे. नवल जी के अनुसार मुक्तिबोध का लेखन प्रगतिशील चेतना का है, लेकिन उसमें परंपरागत प्रगतिशीलता का आधार नहीं खोजा जा सकता. नवल जी के अनुसार मुक्तिबोध बहुत ही गहरे अर्थों में राजनीतिक कवि थे. लेकिन उनकी राजनीति रोजमर्रा की राजनीति नहीं थी. उनकी राजनीति के मूल में विश्व के शोषित-पीड़ित मनुष्य की मुक्ति का प्रश्न अंतर्निहित है. उनकी दृष्टि व्यापक है और विश्व मानवता से प्रतिबद्ध है. इस कारण मुक्तिबोध की कविता में ‘महाकाव्यात्मक औदात्य और ओजस्विता’ संभव हो सकी है और वे हिंदी कविता का नए रूप में विस्तार करते हैं. 
 रामविलास शर्मा ने अपनी पुस्तक ‘नई कविता और अस्तित्ववाद’ में मुक्तिबोध की बहुत ही ‘आत्मपरक’ आलोचना की थी. रामविलास जी ने मुक्तिबोध को न सिर्फ अस्तित्ववाद से प्रभावित माना था, बल्कि उन्हें सिजोफ्रेनिक भी करार दिया था. नवल जी ने मुक्तिबोध का मूल्यांकन करते हुए रामविलास शर्मा का न सिर्फ खंडन किया, बल्कि यह भी साबित किया कि मुक्तिबोध अस्तित्ववाद के विरोधी थे. इसी के साथ उनकी कविता की विशेषता बताते हुए नवल जी ने लिखा है: “मुक्तिबोध की कविता जिस तरह अज्ञेय की कविता की तरह ‘जड़ाऊ’ नहीं, उसी तरह वह नागार्जुन, केदारनाथ अग्रवाल और त्रिलोचन की कविता की तरह सरल भी नहीं. इसका एक मुख्य कारण यह है कि वह प्रायः आकार में लम्बी ही नहीं, प्रकार में जटिल भी है. इस जटिलता का कारण वह गहन वैचारिकता है, जो ‘प्रसाद’ और ‘निराला’ के बाद सिर्फ मुक्तिबोध में ही दिखलाई पड़ती है, न अज्ञेय में, न किसी अन्य प्रतिष्ठित प्रगतिशील कवि में ही.” 
 मुक्तिबोध की कविता ‘अँधेरे में’ की अनेक व्याख्याएँ हुई हैं. रामविलास शर्मा ने इसे कवि के विभाजित व्यक्तित्व का परिणाम माना है. वे ‘अँधेरे में’ को असफल कविता मानते हैं. नामवर सिंह ने ‘अँधेरे में’ को ‘व्यक्ति अस्मिता की खोज’ कहा है. लेकिन नवल जी ने इस कविता की बिल्कुल अलग व्याख्या की है. इस कविता की रचना के पीछे वे फासीवाद की मुख्य भूमिका मानते हैं. यह व्याख्या पिछली सभी व्याख्याओं से अलग है और मुक्तिबोध की इस महान कविता को सही परिप्रेक्ष्य में रखने का काम करती है. आगे चलकर नामवर सिंह ने भी नवल जी की व्याख्या को सही माना और इसकी पृष्ठभूमि में फासीवाद की आशंका से इन्कार नहीं किया. 
 मुक्तिबोध के प्रसंग में आत्म-संघर्ष की बहुत चर्चा होती है. उनके आत्म-संघर्ष की तरह-तरह से व्याख्याएँ हुई हैं. उनके आत्म-संघर्ष वाले पक्ष पर विचार करते हुए नवल जी ने लिखा है: “मुक्तिबोध को आत्म-संघर्ष का कवि माना जाता है. वे मध्यवर्गीय संस्कारों और सीमाओं से मुक्त होकर सर्वहारा वर्ग से तादात्म होना चाहते थे, लेकिन चूँकि यह काम आसान नहीं था, इसलिए वे आत्म-संघर्ष में गिरफ्तार थे. एक तरफ़ अपने व्यक्तित्त्व का मोह और दूसरी तरफ़ उसके विसर्जन की आकांक्षा- इसने उन्हें विकट अंतर्द्वंद्व में डाल रखा था.... हमारा निष्कर्ष यह है कि मुक्तिबोध का आत्म-संघर्ष उनका अपना संघर्ष होते हुए भी पूरे सचेत प्रगतिशील मध्यवर्गीय बुद्धिजीवी समुदाय का संघर्ष है और उसका संघर्ष होते हुए भी वह उनका अपना संघर्ष हैं. यह संघर्ष वस्तुतः वर्ग संघर्ष की छाया है, जिसकी द्वंद्वात्मकता उनके यथार्थबोध के साथ बढ़ती गई है.” मुक्तिबोध के भीतर मौजूद इस द्वंद्व की चर्चा नवल जी ने ठीक ही की है, लेकिन उनके यहाँ ‘अन्तःकरण’ की बात भी बार- बार आती है, उसकी अनदेखी अन्य लोगों की तरह नवल जी ने भी की है. 
 मुक्तिबोध की कविता में प्रगीतात्मक तत्त्व की नवल जी ने चर्चा की है. यह उनकी कविता की विशेषता है. नवल जी के अनुसार: “उनमें वस्तुपरकता और आत्मपरकता का जटिल संयोग देखने को मिलता है, यह तथ्य है. इस कारण उन्होंने न केवल लम्बी कविताओं की रचना की है, बल्कि छोटी कविताएँ भी अच्छी संख्या में लिखी हैं और उनकी लम्बी कविताओं में भी प्रगीतात्मक संवेदना के खंड पिरोए हुए हैं.” प्रगीतात्मकता के साथ विश्व-दृष्टि मुक्तिबोध की कविता का वह पक्ष है, जिस कारण उनकी कविता का विचार फलक बहुत व्यापक दिखाई देता है. मुक्तिबोध की विश्व-दृष्टि पर विचार करते हुए नवल जी ने लिखा है: “मुक्तिबोध की विश्व-दृष्टि असंदिग्ध रूप से मार्क्सवादी थी, लेकिन यह मार्क्सवाद उनके लिए जितना पराया था, उतना ही वह उनका अपना था. वह उनके लिए कोई जड़ सूत्र या रूढ़ विचार प्रणाली तो कतई नहीं था, जो व्यक्ति की अनुभूति, कल्पना और चिंतन शक्ति को मुक्त करने की जगह परतंत्र बना देती है.” इसी के साथ यह कहना जरुरी है कि मार्क्सवादी विश्व-दृष्टि के बावजूद मुक्तिबोध कम्युनिस्ट रेजिमेंटेशन के खिलाफ़ थे. वे पूँजीवाद का विरोध करते थे और मार्क्सवाद में उनकी आस्था थी. प्रश्न है कि किस कम्युनिस्ट रेजिमेंटेशन के ? सिर्फ हिंदी में जारी रेजिमेंटेशन के या सोवियत संघ समेत अन्य कम्युनिस्ट देशों में हुई कम्युनिस्ट परिणतियों के भी? नवल जी के मुक्तिबोध सम्बन्धी लेखन में इन प्रश्नों के उत्तर प्राय: नहीं मिलते हैं. 
प्रारंभ में नंदकिशोर नवल की आलोचना पर प्रगतिशील आलोचना खासतौर से रामविलास शर्मा की आलोचना का गहरा प्रभाव था. जाहिर है कि कंटेंट और फॉर्म के रूढ़ विभाजन के जरिए कविता को समझने की कोशिश उनकी आलोचना में मुख्य रूप से दिखाई देती है. यथार्थवादी दृष्टि से कविताओं का मूल्यांकन और उससे प्राप्त निष्कर्ष प्राय: कविता के साथ न्याय नहीं करते. कविता संबंधी नवल जी की आलोचना का पूर्व पक्ष यथार्थवादी दृष्टि की सीमाओं से घिरा हुआ लगता है. लेकिन धीरे-धीरे वे इस प्रभाव से मुक्त होते हैं और उनका झुकाव पाठ केन्द्रित आलोचना की ओर होता है. उनके लेखन में यह मोड़ सोवियत संघ के पतन के बाद आता है.  उनके इस आलोचनात्मक प्रयत्न का सर्वोत्तम उदाहरण ‘निराला: कृति से साक्षात्कार’ नामक क़िताब है. इसके अतिरिक्त अन्य पुस्तकें भी हैं, जो उनके आलोचनात्मक लेखन में आए तेज और झटकेदार मोड़ का प्रमाण देती हैं. आगे का उनका आलोचनात्मक लेखन इसी दिशा में है. हालाँकि पाठ आधारित आलोचना की अपनी सीमाएँ हैं. उसके जरिए कविता के पूरे आशय को नहीं समझा जा सकता. यह बात नवल जी जानते हैं और उन्होंने यह बात  स्वीकार भी की है: “पाठ आधारित आलोचना की अपनी सीमाएँ हैं. इसमें रचना की जो क्लोज स्टडी की जाती है, वह अध्येता को इसकी इजाजत नहीं देती कि रचना को उससे हटकर, दूर स्थित होकर, सम्पूर्ण रूप में देखा जा सके. अध्येयता प्रायः रचना के छोटे-छोटे और नजदीकी ब्यौरों में उलझकर रह जाता है. यह आलोचना रचना के अदृश्य पक्षों का उद्घाटन नहीं कर पाती, नहीं वह आलोचक की अंतर्दृष्टि से रचना की सर्वथा नवीन व्याख्या कर पाठकों को चमत्कृत कर पाती है.”  यह स्वीकार करने के साथ नवल जी ने निराला की कुछ प्रसिद्ध कविताओं की व्याख्या की है. नवल जी का मानना है कि निराला की कविता पर कालिदास, तुलसीदास, रवीन्द्रनाथ और शेली का गहरा प्रभाव है. निराला की शब्दावली और बिम्बों से लेकर उनके भावलोक तक पर इन कवियों का प्रभाव है. लेकिन इसी के साथ यह भी सही है कि निराला ने अपने कवि- व्यक्तित्त्व का स्वतंत्र विस्तार किया है. 
‘जूही की कलि’, ‘बादल राग’, ‘जागो फिर एक बार’, ‘तुलसीदास’, ‘मित्र के प्रति’, ‘सरोज स्मृति’, ‘प्रेयसी’, ‘राम की शक्तिपूजा’, ‘सम्राट एडवर्ड अष्टम के प्रति’ और ‘वन-बेला’ इन दस कविताओं की पाठ आधारित आलोचना करते हुए नंदकिशोर नवल ने बहुत गहराई से इन कविताओं का अर्थ- संधान किया है. इन कविताओं की जो व्याख्याएँ उन्होंने की हैं, वे पूर्ववर्ती आलोचकों की व्याख्याओं से अलग और अधिक विश्वसनीय है. जैसे ‘राम की शक्तिपूजा’ की श्रेष्ठता का कारण नवल जी उसमें पाई जाने वाली ‘नाटकीयता’ को मानते हैं. उनका कहना है: “यह नाटकीयता इसकी घटनाओं में भी है, इसके चरित्रों में भी, इसके भाव में भी और इसमें प्रयुक्त संवादों की भाषा में भी. पूरी कविता एक नाटक की तरह है, जिसमें क्रम-क्रम से सारे दृश्य रंगमंच पर प्रत्यक्ष होते हैं.” इसी के साथ नवल जी इस कविता में पाई जाने वाली उदात्तता की भी चर्चा करते हैं. नवल जी का कहना है: “शक्तिपूजा पत्नी प्रेम की कविता है, जिसका एक अत्यंत व्यापक संदर्भ है- आधुनिक युग में उत्पन्न जनतांत्रिक चेतना. इसी ने इस कविता को वह सुविस्तृत भावभूमि प्रदान की है, जिससे यह अत्यंत उदात्त हो गई है.” अपनी व्याख्या का अंत करते हुए नवल जी ने लिखा है: “राम की शक्तिपूजा आज खड़ी बोली की सर्वोत्कृष्ट काव्य कृति ही नहीं, सर्वाधिक उदात्त काव्य कृति के रूप में भी मान्य है. उदात्त कृति की एक पहचान यह भी है कि भिन्न रूचि और संस्कार के व्यक्तियों के भीतर भी वह प्रखर सौन्दर्यानुभूति उतपन्न करने में समर्थ होती है.” 
हिंदी साहित्य की विभिन्न विधाओं का इतना विकास हो चुका है कि अब किसी एक व्यक्ति के लिए  अकेले इसका इतिहास लिखना संभव नहीं है. हिंदी कविता का भी परिसर इतना विस्तृत हो चुका है कि एक पुस्तक के जरिए उसके इतिहास को किसी एक व्यक्ति द्वारा प्रस्तुत नहीं किया जा सकता. इसलिए अब समय आ गया है कि अलग-अलग कालखंडों का और अलग-अलग विधाओं का इतिहास अलग-अलग विद्वानों द्वारा लिखा जाए. शायद इसी को ध्यान में रखते हुए नंदकिशोर नवल ने ‘आधुनिक हिंदी कविता का इतिहास’ नामक पुस्तक लिखी है, जिसमें भारतेंदु से लेकर साठोत्तरी पीढ़ी के धूमिल तक को शामिल किया गया है. इसमें शुक्ल जी के इतिहास की तरह प्रवृत्तियों के आधार पर काल विभाजन न करके हिंदी कविता के विकास क्रम के आधार पर कवियों का विवेचन किया गया है. कोई चाहे तो इसे ‘आधुनिक हिंदी कविता का इतिहास’ न कहकर ‘आधुनिक हिंदी कविता का विकास’ कह सकता है. सही अर्थों में यह पुस्तक इतिहास न होकर आधुनिक हिंदी कविता के विकास के पड़ावों को समझने का एक प्रयास है. साहित्य के इतिहास में इतिहासकार की रूचि के महत्त्व से इंकार नहीं किया जा सकता. लेकिन वह रूचि कुछ कवियों को शामिल करने और कुछ कवियों को छोड़ देने की दिशा में सक्रिय दिखे तो वह इतिहास की बड़ी सीमा बन जाती है. आधुनिक हिंदी कविता के इस इतिहास को पढ़ते हुए यह बात ध्यान में आती है. 
‘हिंदी कविता: अभी, बिलकुल अभी’ नवल जी की महत्त्वपूर्ण आलोचना पुस्तक है. इसमें आठवें दशक के महत्त्वपूर्ण नौ कवियों- विनोद कुमार शुक्ल, विष्णु खरे, राजेश जोशी, मंगलेश डबराल, आलोक धन्वा, श्याम कश्यप, ज्ञानेंद्रपति, उदय प्रकाश और अरुण कमल- की काव्य- यात्रा का अध्ययन प्रस्तुत किया गया है. हर दौर अपना आलोचक लेकर आता है. एक ही आलोचक हर पीढ़ी के साथ न्याय नहीं कर सकता. कहा जा सकता है कि नंदकिशोर नवल आठवें दशक की कविता के विशिष्ट आलोचक हैं. यह आलोचना- पुस्तक इन कवियों का अलग-अलग काव्य संसार लेकर हमारे सामने तो आती ही है, वह हिंदी कविता में आए नए बदलावों को भी रेखांकित करती है. जिन कवियों को नवल जी ने शामिल किया है और जिन कवियों को छोड़ दिया है, उनमें से कुछ नामों को लेकर बहस हो सकती है और कहा जा सकता है कि यह आलोचक की निजी पसंद है. कोई पूछ सकता है कि श्याम कश्यप क्यों शामिल किए गए हैं और वीरेन डंगवाल, गिरधर राठी आदि क्यों छोड़ दिए गए हैं? बावजूद इसके कहा जा सकता है कि धूमिल के बाद के कवियों को और काव्य विकास को समझने में नंदकिशोर नवल की लिखी हुई इस आलोचना का विशेष महत्त्व है. 
 ‘हिंदी कविता: अभी, बिलकुल अभी’ में पहला निबंध विनोद कुमार शुक्ल पर है. धूमिल के बाद आए कवियों में विनोद कुमार शुक्ल का अलग महत्त्व है. उनकी काव्य शैली सबसे अलग और ध्यान आकृष्ट करनेवाली है. आमतौर से माना जाता है कि वे रूपवादी कवि हैं. लेकिन नवल जी ने यह संकेत किया है कि वे प्रगतिशील कवि हैं. उनकी प्रगतिशीलता का ढाँचा केदार, नागार्जुन और त्रिलोचन वाला नहीं है. वे शमशेर और मुक्तिबोध की तरह जटिल वितान वाले कवि हैं. नामवर सिंह का एक कथन है- ‘यथार्थवाद कोई शैली नहीं, बल्कि जीवन-दृष्टि है’. नवल जी कहते हैं कि इसको ध्यान में रखते हुए विचार करें तो हम पाएँगे कि विनोद कुमार शुक्ल पारिभाषिक रूप से भले ही प्रगतिशील या जनवादी कवि न हों, लेकिन वे सामाजिकता के व्यापक दायरे के करीब है. नवल जी ने लिखा है: “सामाजिकता या सामाजिक चेतना कोई संकीर्ण वस्तु नहीं है. वह मुट्ठी बाँधकर और गला फाड़कर क्रांतिकारी नारा लगाने में भी नहीं हैं. वह अत्यंत व्यापक है, आकाश की तरह, जो हमारे भीतर भी है और बाहर भी है. वस्तुतः समाज से बाहर कुछ भी नहीं है.” इस तरह व्यापक अर्थों में विनोद कुमार शुक्ल को प्रगतिशील कवि मानते हुए नवल जी का कहना है कि उनकी प्रगतिशीलता किसी साँचे में ढली हुई नहीं है. 
विष्णु खरे को नवल जी ने ‘हिंदी की प्रचलित काव्य-भाषा के फॉर्म को तोड़ने वाला कवि’ कहा है. नवल जी के अनुसार भाषा के फॉर्म को तोड़ने का मतलब उसकी व्याकरणिक व्यवस्था को तहस-नहस करना नहीं है, बल्कि भाषा का नया इस्तेमाल करते हुए इस तरह कविता लिखना है, जिस तरह अब तक नहीं लिखी गई थी. इसी के साथ नवल जी का यह भी मानना है कि खरे की कविता में यथार्थ चित्रण इतना गहरा होता है कि उन्हें फैंटेसी लिखने की ज़रूरत नहीं होती. राजेश जोशी पर लिखते हुए नवल जी ने कहा है कि धूमिल के बाद की कविता को नया अर्थ देने वाले कवियों में राजेश जोशी प्रमुख हैं. धूमिल में ‘आत्मीयता का अभाव’ था. राजेश की पीढ़ी ‘आत्मीयता और सहजता’ लेकर आई. राजेश की कविता में एक ऐसा जादू है जिसके सौंदर्य का विश्लेषण आलोचक के लिए चुनौती है. इसी के साथ नवल जी ने राजेश की कविता में रुमानीपन को रेखांकित किया है और कहा है- ‘रुमानीपन राजेश की कविता की बहुत बड़ी ताकत है. वह उनकी दृष्टि को धुंधलाता नहीं, बल्कि उसी के कारण उनके यथार्थ के बिम्बों में एक ताजगी और अनुभूति में एक नवीनता संभव हुई है’. 
मंगलेश डबराल की कविता पर विचार करते हुए नवल जी का कहना है कि ‘उनमें राजेश जोशी वाली आत्मीयता और सहज सम्प्रेषणीयता नहीं है’. इसी के साथ नवल जी यह भी कहते हैं कि ‘मंगलेश में चीख और रुदन जिस मात्रा में हैं, उस मात्रा में भूख और दुःख नहीं हैं’. मंगलेश की कविताओं में ‘रक्तक्रांति’ के दर्शन करनेवाले नवल जी तीन कारणों से मंगलेश को महत्त्वपूर्ण कवि मानते हैं- ‘एक कारण तो यह कि उन्होंने बड़ी सावधानी से अपनी कविताओं को विचारधारा के आरोपण से बचाया है; दूसरा कारण यह कि उन्होंने अनेक बार संकेतों से भी काम लिया है और तीसरा कारण यह कि उन्होंने कभी-कभी सबसे मुक्त होकर जीवन की कविता लिखी है, जो अपने-आप में बेजोड़ है’. आलोक धन्वा को नवल जी ‘गतिशील काव्य संवेदना का कवि’ मानते हैं. ‘संप्रेषणीयता’ नवल जी की नजर में आलोक का सबसे बड़ा गुण है. पहले नवल जी मानते थे कि आलोक धन्वा की कविता में रेटॉरिक का गुण है. बाद के वर्षों में नवल जी को आलोक में  रेटॉरिक की जगह संप्रेषणीयता का गुण दिखने लगा. 
ज्ञानेंद्रपति की कविता में ‘एक ताजगी’ दिखाई देती है. इसी के साथ ‘नई भाषा, नए बिम्ब और नई कल्पना-शक्ति के भी दर्शन होते हैं.’ नवल जी के अनुसार ज्ञानेंद्रपति की काव्य- भाषा मूलतः बिम्बात्मक है. अरुण कमल की कविता के बारे में नवल जी का कहना है: ‘सर्जनात्मक कल्पना के योग से उन्होंने जो बिम्ब बनाए हैं, वे मोहक तो है ही, इस बात का भी प्रमाण देते हैं कि उनका इन्द्रीयबोध आज के कवियों में सर्वाधिक तीक्ष्ण है.’ अरुण कमल को नवल जी ‘स्वतंत्र स्फुट कविताओं का कवि’ कहते हैं. नवल जी यह भी कहते हैं कि ‘अरुण जी बिम्ब-कुशल ही नहीं, शब्द-कुशल भी हैं’. अरुण कमल की कविता में नवल जी ‘आत्मपरकता’ का गुण पाते हैं. लेकिन यह आत्मपरकता ‘आत्मग्रस्तता’ नहीं है, जिसके कारण अरुण कमल की कविता नया प्रभाव पैदा करती है. 
यूँ तो हिंदी ‘कविता: अभी, बिलकुल अभी’ में श्याम कश्यप और उदय प्रकाश पर भी लेख हैं. लेकिन आज हिंदी कविता जिस मुकाम पर है वहाँ से देखने पर पता चलता है कि यह आलोचक की निजी पसंद है जो आलोचक की आत्मग्रस्तता की देन है. एक समय में उदय प्रकाश की कविताओं की चर्चा थी. लेकिन बाद में कहानी उनकी मुख्य विधा हो गई. कई अन्य कवियों की अनदेखी करके नवल जी ने श्याम कश्यप को रखा है. इसका कारण किसी की भी समझ में शायद ही आए! नवल जी ने राजेश जोशी, उदय प्रकाश और अरुण कमल की ‘कवि- त्रयी’ भी बनाई है, जिससे आज शायद ही कोई सहमत हो. समकालीन कविता के आलोचक के रूप में यह उनकी परख की सीमा है.   
नवल जी अपनी स्थापनाओं के जरिए हिंदी कविता का नैरेटिव बदलने की जगह उसके पाठ के परिप्रेक्ष्य को सही करनेवाले आलोचक हैं. उनकी आलोचना पढ़ी तो खूब गई, लेकिन हिंदी कविता के प्रति पूर्व की  धारणा को बदलने में कितनी सहायक हुई, यह कहना अभी मुश्किल है. उन्होंने हिंदी की महत्त्वपूर्ण लम्बी कविताओं की जो त्रयी बनाई वह हमारा ध्यान खींचती है. उस त्रयी में ‘राम की शक्तिपूजा’, ‘अँधेरे में’ और ‘मुक्ति प्रसंग’ (राजकमल चौधरी) की इतनी गहन और आत्मीय व्याख्या नवल जी ने की है जिसे पढ़कर हिंदी कविता के विकास का एक नया रूप पाठक के सामने उपस्थित होने लगता है.
‘हिंदी कविता: अभी, बिलकुल अभी’ के प्रारंभ में अपने प्रिय कवि मुक्तिबोध की कुछ काव्य- पंक्तियाँ नंदकिशोर नवल ने उद्धृत की है-
राहगीर को जैसे राहगीर मिल जाए,
बंजारे को गाहक,
पंडित को लघुसिद्धांतकौमुदी
वैसे ही तुम मिले मुझे यह काफी;
भूल-चूक की माफ़ी!

क्या यह एक आलोचक की पसंद की घोषणा है? अपनी पसंद को लेकर क्या उसके भीतर संशय है? अपनी  आलोचना पर की गई क्या यह उनकी अपनी ही टिप्पणी है? अपनी पसंद की आत्मपरकता का भान क्या आलोचक को खुद है? ऐसी आत्मपरकता क्या वस्तुपरक आलोचना के मार्ग में बाधक नहीं है? नंदकिशोर नवल की आधुनिक कविता पर किए गए लेखन के संदर्भ में ये प्रश्न उठेंगे.   
                                                           
                                                          गोपेश्वर सिंह 
                                                                 38/4, छात्र मार्ग 
दिल्ली विश्वविद्यालय, दिल्ली-110007
                                                                  मो. 8826723389
E-mail. Gopeshwar1955@gmail.com

साभार गोपेश्वर सिंह फेसबुक आईडी

Friday, 31 July 2020

प्रेमचंद की नज़र में राष्ट्र - प्रो गोपेश्वर सिंह

प्रेमचंद की नज़र में राष्ट्र  : गोपेश्वर सिंह

रामविलास शर्मा ने 1936 ई. को इस अर्थ में विशिष्ट माना है कि इस वर्ष तीन ऐसी रचनाएँ प्रकाशित हुईं जिनमें भविष्य के भारत का सपना था। इनमें पहली रचना आधुनिक भारत के निर्माता जवाहर लाल नेहरू की ‘आत्मकथा’ है। दूसरी रचना लोकनायक जयप्रकाश नारायण की ‘समाजवाद ही क्यों?’ (‘why socialism?’) है जबकि तीसरी रचना प्रेमचंद का निबंध ‘महाजनी सभ्यता’ है। पहली दोनों रचनाएँ पुस्तक रूप में थीं और अंग्रेजी में लिखी गई थीं। ‘आत्मकथा’ सिर्फ नेहरू की निजी कथा न होकर स्वतंत्रता आन्दोलन और स्वतंत्र भारत के आधुनिक जनतांत्रिक सपने की भी कथा है। ‘समाजवाद ही क्यों?’ भारत में समाजवादी व्यवस्था की आवश्यकता पर जोर देने वाली पहली व्यवस्थित पुस्तक है। नेहरू और जे.पी. प्रसिद्ध स्वतंत्रता सेनानी, अपने-अपने समय के युवा ह्रदय सम्राट तथा गाँधी के बाद देश के सर्वाधिक लोकप्रिय नेता थे। ऐसे महानों की अति प्रसिद्ध पुस्तकों के साथ रामविलास जी ने हिंदी के लेखक प्रेमचंद के एक निबंध को याद किया है तो इसका विशेष अर्थ है| वे ऐसे लेखक थे जिनकी नजर वर्तमान के साथ बेहतर भविष्य पर भी थी। इसलिए यह अकारण नहीं है कि नेहरू और जे.पी. की पुस्तकों के साथ रामविलास शर्मा प्रेमचंद के निबंध का नाम लेते हैं जो उनकी लेखकीय दृष्टि को समझने के खयाल से बहुत ही महत्त्वपूर्ण है। महाजनी सभ्यता यानी पूँजीवादी सभ्यता। पूँजीवाद के पहले सामंतवादी सभ्यता थी। ये दोनों सभ्यताएँ जनता के शोषण और सामजिक भेदभाव पर आधारित थीं। जो सभ्यता शोषण और भेदभाव पर आधारित हो वह प्रेमचंद को किसी भी रूप में स्वीकार्य नहीं थी। उन्होंने उस सभ्यता का स्वागत किया जिसका सूर्य पश्चिम में उग रहा था। निस्संदेह पश्चिम के उस सूर्य से तात्पर्य रूस में स्थापित समाजवादी व्यवस्था से है। प्रेमचंद ने पूँजीवादी सभ्यता की कठोरतम आलोचना करने के बाद लिखा: “परन्तु अब नई सभ्यता का सूर्य सुदूर पश्चिम से उदय हो रहा है जिसने इस नारकीय महाजनवाद या पूँजीवाद की जड़ खोदकर फेंक दी है जिसका मूल सिद्धांत यह है कि प्रत्येक व्यक्ति, जो अपने शरीर या दिमाग से मेहनत करके कुछ पैदा कर सकता है, राज्य और समाज का परम सम्मानित सदस्य हो सकता है और जो दूसरों की मेहनत या बाप-दादों के जोड़े हुए धन पर रईस बना फिरता है वह पतीततम प्राणी है।”1 
प्रेमचंद भारतीय राष्ट्रीय आन्दोलन के गर्भ से पैदा हुए ऐसे लेखक थे जिसके लिए स्वतंत्रता का अर्थ राजनीतिक मुक्ति के साथ सामजिक और आर्थिक मुक्ति भी है। वे पूँजीवादी व्यवस्था के जितने खिलाफ थे, उतने ही सामंती व्यवस्था के भी। जाति, संप्रदाय और गरीबी के सवाल उनके शब्द-कर्म के जरूरी एजेंडे थे। पुराना क्या है जो अप्रासंगिक हो चुका है और नया क्या है जो प्रासंगिक है, उसकी जितनी साफ़ समझ उनके पास थी, वैसी हिंदी के उनके समकालीन किसी दूसरे लेखक के पास शायद ही हो! वे यदि 1936 में ‘महाजनी सभ्यता’ का क्रीटिक तैयार करते हैं तो इसका कारण यह है कि वे पुराने समय और नए समय में फर्क करना ठीक से जानते हैं। 1919 में प्रकाशित उनके ‘पुराना जमाना: नया जमाना’ शीर्षक निबंध को देखने से पता चलता है कि 1936 में वे जहाँ पहुंचे थे उसकी तैयारी वे बहुत पहले से कर रहे थे। अपने उस निबंध में वे लिखते हैं: ”आने वाला जमाना अब जनता का है, और वह लोग पछताएंगे जो ज़माने के कदम-से-कदम मिलाकर न चलेंगे।”2 
ज़माने के कदम-से-कदम मिलाकर चलने की जो सबसे बड़ी कसौटी प्रेमचंद की थी वह थी किसानों की हालत। उनके सारे रचनात्मक और वैचारिक लेख के मूल में किसान जीवन की वास्तविकता और उनकी चिंता सर्वोपरि है। जैसे महात्मा गाँधी के ‘स्वराज’ के केंद्र में गाँव था और गाँव के किसान थे, वैसे ही प्रेमचंद के लेखकीय चिंतन के केंद्र में किसान हैं। ‘पूस की रात’ का हलकू हो या ‘गोदान’ का होरी या उनका वैचारिक लेखन, किसान जीवन की दशा-दुर्दशा और उसका भविष्य उनकी सजग-सचेत नजर से कभी ओझल नहीं होता। ‘पुराना जमाना, नया जमाना’ का एक अंश इस दृष्टि से देखा जा सकता है:  ”क्या यह शर्म की बात नहीं कि जिस देश में नब्बे फीसदी आबादी किसानों की हो उस देश में कोई किसान सभा, कोई किसानों की भलाई का आन्दोलन, कोई खेती का विद्यालय, किसानों की भलाई का कोई व्यवस्थित प्रयत्न न हो... मगर नए ज़माने ने नया पन्ना पलटा है। आने वाला जमाना अब किसानों और मजदूरों का है। दुनिया की रफ़्तार इसका साफ़ सबूत दे रही है। हिंदुस्तान इस हवा से बेअसर नहीं रह सकता। हिमालय की चोटियाँ उसे इस हमले से नहीं बचा सकतीं। जल्द या देर से, शायद जल्द ही, हम जनता को केवल मुखर ही नहीं, अपने अधिकारों की माँग करने वाले के रूप में देखेंगे और तब वह आपकी किस्मतों की मालिक होगी।”3 
प्रेमचंद जिस आधुनिक भारत का सपना देख रहे थे वह ऐसा राष्ट्र-राज्य है जिसमें किसान-मजदूर खुद अपनी किस्मत के मालिक होंगे। वे यह तो मानते हैं कि ‘वर्तमान सभ्यता का सबसे अच्छा पहलू राष्ट्रीयता की भावना का जन्म लेना है।’4 लेकिन सच्ची राष्ट्रीयता उनकी नजर में तब तक नहीं आ सकती जब तक कि सामजिक, आर्थिक और शैक्षणिक गैर बराबरी जनता में है। वे कहते हैं: ”आपका आधुनिक शिक्षा से वंचित भाई आपको इस ठाट में देखता है और यह समझता है कि यह आदमी हममें नहीं है, हम उनके नहीं हैं। फिर चाहे आप कितनी बुलंद आवाज से राष्ट्रीयता की हाँक लगाएँ।”5 वे ‘राष्ट्रीयता’ को आधुनिक सभ्यता का सबसे अच्छा पहलू कहते हैं लेकिन वे यह भी बताते चलते हैं कि ‘जनतांत्रिक’ का समावेश ‘आधुनिक सभ्यता का सबसे प्रधान गुण है।”6 इससे पता चलता है कि प्रेमचंद के लिए जो भविष्य का भारत है उसका ताना-बाना ‘जनतांत्रिकता’ और ‘आधुनिकता’ के रेशे से निर्मित है जिसमें ‘किसान-मजदूर अपनी किस्मत के मालिक’ हैं। लगभग सौ वर्ष पूर्व देखा गया भारतीय राष्ट्र-राज्य का प्रेमचंद का सपना मुहावरे के अर्थ में अब भी सपना है! किसान मजदूर अब भी अपनी किस्मत के मालिक नहीं हैं! हमारी जनतांत्रिक आकांक्षाओं पर अब भी पहरेदारी है! आर्थिक और शैक्षणिक गैर बराबरी की तो बात ही मत पूछिए! “किसानों की हालत और खराब है. गरीबों और अमीरों के बीच खाई और चौड़ी हो चुकी है. समाजवादी दुनिया बिखर चुकी है. ऐसे पूँजीवाद की उनके द्वारा की गई आलोचना का महत्त्व और बढ़ गया है. रामविलास शर्मा ने ठीक ही गणेश शंकर विद्यार्थी के बाद प्रेमचंद को पूँजीवाद का सबसे महत्त्वपूर्ण आलोचक कहा है|7
भारत के राष्ट्रीय आन्दोलन में प्रेमचंद सदेह शामिल नहीं थे। कुछ लोगों को आश्चर्य हो सकता है कि जनता की मुक्ति की बात करने वाला लेखक जनता के मुक्ति-संघर्ष में सदेह शामिल क्यों नहीं होता? उस ज़माने में हिंदी व विभिन्न भारतीय भाषाओं के अनेक लेखक स्वतंत्रता संग्राम में सदेह शामिल थे और उस कारण उन्हें तरह-तरह की यातनाएँ भी झेलनी पड़ीं। ऐसे सभी लेखकों से भारत के मुक्ति-संग्राम को बल मिला। उनके कर्म से भी और उनके शब्द से भी। लेकिन ऐसे भी बहुतेरे लेखक थे जो स्वतंत्रता संग्राम में सदेह शामिल न होकर मनसा-वाचा शामिल थे। उनके लिखे से भारतीय राष्ट्र-राज्य का नया रूप बन रहा था। उनका एक-एक शब्द हजारों-लाखों को प्रेरित-प्रभावित कर रहा था। रवीन्द्रनाथ ठाकुर ऐसे ही लेखक थे जिनसे भारतीय स्वातंत्र्य संग्राम को नयी ऊर्जा मिलती थी। प्रेमचंद भी ऐसे ही लेखक थे जो भारतीय समाज और राष्ट्र की मुक्ति के मार्ग में बाधक सभी तत्त्वों से लड़ते रहे। अमृत राय ने ‘कलम का सिपाही’ नाम से उनकी जीवनी लिखी है। सही अर्थों में वे कलम के सिपाही थे। वे कलम से स्वतंत्रता की लड़ाई लड़ने वाले हिंदी के सबसे बड़े लेखक थे।
कलम से जिस तरह जनता और राष्ट्र की मुक्ति की लड़ाई प्रेमचंद लड़ रहे थे, उसका सही पता-ठिकाना तभी चलता है जब हम उनके रचनात्मक साहित्य के साथ उनके वैचारिक लेखन को भी देखते हैं। अपने लेखन काल के प्रारंभ से लेकर मृत्यु पर्यंत लगभग तीन दशक का उनका जो वैचारिक लेखन है वह भारत की स्वतंत्रता, स्वावलंबन, आर्थिक-सामजिक गैरबराबरी और विश्व बंधुत्व जैसी अनेक चिंताओं से मुठभेड़ का प्रतिफल है। हम अक्सर उन्हें आर्य समाजी, गाँधीवादी और मार्क्सवादी प्रभावों के सन्दर्भ में देखते-दिखाते हैं। उनके साहित्य पर इनके प्रभाव से किसी को इंकार भी नहीं है। लेकिन उनकी चेतना सबसे अधिक स्वतंत्रता आन्दोलन के मूल्यों से संचालित है। विदेशी दासता से मुक्ति के लिए स्वशासन जरूरी था। लेकिन कैसा स्वशासन? वे सही अर्थों में जनता के शासन के पक्ष में थे और जनता का शासन तब आएगा जब बेजबानों की ताकत जाहिर होने लगेगी। उन्हीं के शब्द देखें...”अब एक फाकाकश मजदूर भी अपनी अहमियत समझने लगा है और धन-दौलत की ड्योढ़ी पर सर झुकाना पसंद नहीं करता। उसे अपने कर्त्तव्य चाहे न मालूम हों लेकिन अपने अधिकारों का पूरा ज्ञान है। वह जानता है कि इस सारे राष्ट्रीय वैभव और प्रभुत्व का कारण मैं हूँ। यह सारा राष्ट्रीय विकास और उन्नति मेरे ही हाथों का करिश्मा है। अब वह मूक संतोष और सर झुकाकर सबकुछ स्वीकार कर लेने में विश्वास नहीं रखता।”8 तो प्रेमचंद इसी मजदूर की हिस्सेदारी ‘स्वशासन’ में सुनिश्चित करना चाहते थे। 
‘स्वदेशी आन्दोलन’ स्वतंत्रता संग्राम का एक बड़ा एजेंडा था। स्वदेशी के बिना भारत राष्ट्र के रूप में खड़ा नहीं हो सकता था। स्वतंत्रता आन्दोलन में महात्मा गाँधी के प्रवेश के बहुत पहले स्वदेशी की माँग जोर-शोर से उठने लगी थी। महात्मा गाँधी के आने के बाद इस आन्दोलन ने और जोर पकड़ा जब वे 1915 में भारत आए। प्रेमचंद 1905 में ‘देशी चीजों का प्रचार कैसे बढ़ सकता है’9  शीर्षक निबंध लिखकर घरेलू उद्योग-धंधों के विकास और उनकी मार्केटिंग के मार्ग में आने वाली बाधाओं की चिंता करते हैं। वे उसी वर्ष ‘स्वदेशी आन्दोलन’ की वकालत करते हैं और उसे ‘देशभक्तिपूर्ण आन्दोलन’10 की संज्ञा देते हैं। ‘स्वराज से किसका अहित होगा?’ (1930) शीर्षक अपने निबंध में वे निर्भय होकर इस संग्राम में सम्मिलित होने की मांग करते हैं। 1931 में ‘देश की वर्त्तमान परिस्थिति’ की चर्चा करते हुए वे किसानों से अपील करते हैं कि ‘महात्मा जी के मार्ग’ से यदि वे हटे तो उन्हें पछताना पड़ेगा। ‘स्वदेशी आन्दोलन’ का जबर्दस्त समर्थन करने के साथ प्रेमचंद भारत और पूरी दुनिया में गोरी जातियों की सभ्यता के अन्यायपूर्ण आचरण और दमन-शोषण की आलोचना करते हैं और उनके पाखंड पर चोट करते हैं। ‘गोरी जातियों का प्रभाव क्यों कम है’ (1931) शीर्षक निबंध में वे लिखते हैं कि “...गोरों ने आदि से ही प्रेम के बल पर नहीं, आतंक के बल पर संसार पर प्रभुत्व जमाया है। वह कालों की नज़रों से अपने ऐबों को छिपाकर अपनी नीतिमता की साख बिठाये थे|”11 अंग्रेजों की अन्यायपूर्ण नीति और गरीब जनता को टैक्स के जरिए लूटने की उनकी आदत के कारण प्रेमचंद को ‘स्वराज की कामना’ का भारतीय जन में ‘जन्म लेना’ स्वाभाविक जान पड़ता है। 
 प्रेमचंद के लिए राष्ट्र का अर्थ सिर्फ कोई निश्चित भू-भाग ही नहीं, उसके आगे भी बहुत कुछ है। उनके लिए राष्ट्र का अर्थ सबसे पहले उस भू-भाग की शोषित, पीड़ित जनता है। ‘नवयुग’ (1932) शीर्षक अपने एक निबंध में राष्ट्र और राष्ट्रीयता की ओर संकेत करते हुए वे लिखते हैं: “राष्ट्र केवल एक मानसिक प्रवृत्ति है। जब यह प्रवृत्ति प्रबल हो जाती है तो किसी प्रांत या देश के निवासियों में भ्रातृभाव जागरित हो जाता है। तब उनमें रुढियों से पैदा होने वाले भेद, पुराने संस्कारों से उत्पन्न होनेवाली विभिन्नताएँ और ऐतिहासिक तथा धार्मिक विषमताएँ, एक प्रकार से मिट जाती हैं।”12 जब तक ‘विविधताएँ’ और ‘विषमताएँ’ किसी राष्ट्र में मौजूद हैं तब तक वह सही अर्थों में राष्ट्र नहीं है। जनता का जिस तरह शोषण है, गरीबी का जैसा साम्राज्य है, गाँवों की जो हालत है, उस पर वे ‘दमन की सीमा’ (1932) शीर्षक निबंध में गंभीर और तल्ख़ टिप्पणी करते हैं। ब्रिटिश सरकार, प्रशासन और जमींदारों को कठघरे में खड़ा करते हुए कहते हैं: “देहात से, सुधार और सहयोग और शिक्षा और स्वास्थ्य और सभी आयोजनाएँ, जिनसे राष्ट्र बनता है, जिनसे उसका विकास होता है, लापता हैं।”13 इसीलिए औरों के लिए राष्ट्र और राष्ट्रीयता का जो भी अर्थ हो, प्रेमचंद के लिए उसका ठेठ भारतीय अर्थ है। उनकी दो टूक राय है,  “राष्ट्रीयता की पहली शर्त वर्ण-व्यवस्था, ऊँच-नीच के भेदभाव और धार्मिक पाखण्ड की जड़ खोदना है।”14 
 जाति भेद की समस्या को भारतीय राष्ट्रीयता की केन्द्रीय समस्या मानते हुए ऐसे लोगों पर प्रेमचंद जोरदार हमला करते हैं जो जाति की श्रेष्ठता और धार्मिक विद्वेष की भावना से भरे हुए हैं। राष्ट्र, राष्ट्रीयता और राष्ट्रवाद के नकली प्रवक्ताओं को ‘क्या हम वास्तव में राष्ट्रवादी हैं?’ (1934) शीर्षक निबंध लिखकर वे कठघरे में खड़ा करते हैं। वे लिखते हैं: “हम अभी तक केवल मुँह से राष्ट्र-राष्ट्र का गुल मचाते हैं, हमारे दिलों में अभी वही जाति भेद अन्धकार छुपा हुआ है। और यह कौन नहीं जानता कि जाति भेद और राष्ट्रीयता दोनों में अमृत और विष का अंतर है।”15 इसलिए जो पुजारी, पुरोहित और पंडे जातिभेद करते हैं उन्हें वे ‘टके पंथी’ और ‘हिन्दू जाति का कलंक’ कहकर संबोधित करते हैं।
 भारत का विशाल भू-भाग, शस्य श्यामला धरती और यहां की पुरानी अच्छी बातें उन्हें भाती हैं। इस अर्थ में वे सच्चे देश-प्रेमी हैं। इसलिए वे औपनिवेशिक गुलामी से मुक्ति की बात जोरदार ढंग से उठाते हैं। काँग्रेस और महात्मा गाँधी के नेतृत्व में चलने वाले राष्ट्रीय आन्दोलन की जोरदार वकालत करते हैं। इस विषय पर लिखते हुए उनका राष्ट्रवादी रुझान और उनकी राष्ट्रीयता पूरी बुलंदी पर है। इसलिए ‘दुनिया का सबसे अनमोल रतन’ जैसी भावना प्रधान देशभक्तिपूर्ण कहानी हो या ‘कर्मभूमि’ जैसा स्वाधीनता संग्राम के झंझावतों से भरा उपन्यास, ‘देशी चीजों का प्रसार कैसे बढ़ सकता है’ (1905) और ‘स्वदेशी आन्दोलन’ (1905) जैसे प्रारम्भिक वैचारिक लेख हों या आर्य समाज, गाँधीवाद और मार्क्सवाद जैसी विचारधाराओं के प्रभाव से गुजरने के बाद अंतिम दिनों के लेख, प्रेमचंद साम्राज्यवाद से भारत की मुक्ति के हमेशा पक्षधर हैं। लेकिन मुक्ति से प्रेरित उनकी राष्ट्रीयता सिर्फ कुछ प्रतीकों तक सीमित नहीं है। वे सिर्फ अपनी सरकार बन जाने से संतुष्ट होने वाले राष्ट्रप्रेमी नहीं हैं। राष्ट्र, जो मेहनतकश जनता से बनता है, वे उस राष्ट्र की मुक्ति के पक्षधर हैं। इसलिए ऐसे राष्ट्रवादियों को जिनके एजेंडे में भेदभाव मिटाना नहीं है, फटकार लगाते हुए वे कहते हैं “राष्ट्रीयता की पहली शर्त है, साम्य का दृढ होना। इसके बिना राष्ट्रीयता की कल्पना ही नहीं की जा सकती।”16  
 सच्ची राष्ट्रीयता का विकास कब होगा? जब समतामूलक समाज बनेगा, जब जाति भेद न होगा। प्रेमचंद हिंदी के इस अर्थ में अकेले लेखक हैं जो जीवन भर जातिप्रथा का विरोध करते रहे। उनका सारा साहित्य जातिप्रथा के विरुद्ध सतत संघर्ष का साहित्य है। सामजिक समता के लिए संघर्ष करते हुए वे कभी आर्थिक गैर बराबरी को नहीं भूलते। इसीलिए वे ‘स्वराज्य’ के साथ-साथ ‘आर्थिक स्वराज्य’ का प्रश्न उठाते हैं। अपनी एक टिप्पणी ‘आर्थिक स्वराज्य’ (1933) में वे आर्थिक और राजनैतिक स्वराज्य दोनों को एक-दूसरे का पूरक मानते हुए दिखाई देते हैं। उसी वर्ष की अपनी एक दूसरी टिप्पणी ‘अविश्वास’ में वे यही बात और साफ़ तरीके से कहते हुए दिखाई देते हैं। वे लिखते हैं “अधिकांश भारतीय स्वराज्य इसलिए नहीं चाहते कि अपने देश के शासन में उनकी आवाज ही पहले सुनी जावे, पर स्वराज्य का अर्थ उनके लिए आर्थिक स्वराज्य होता है। अपने प्राकृतिक साधनों पर अपना अधिकार, अपनी प्राकृतिक उपजों पर अपना नियंत्रण, अपनी वस्तुओं का स्वच्छंद उपभोग और अपनी पैदावार पर अपनी इच्छानुसार मूल्य लेने का स्वत्व- यही उनकी सबसे बड़ी, सबसे पहली, सबसे उत्कृष्ट माँग है। यह माँग स्वराज्य का अंग नहीं, स्वराज इसी माँग का अंग है।”17 इस तरह प्रेमचंद का स्वराज्य, उनके भारत का सपना, आर्थिक आत्मनिर्भरता से अलग नहीं था। भारत में आज भी किसानों-मजदूरों और आदिवासियों की आर्थिक पर निर्भरता, उनके अपने ही साधनों पर अपने अधिकार न होने पर हिंदी के कितने लेखक चिंतित दिखाई देते हैं? प्रेमचंद स्वराज्य के साधन के रूप में सबसे पहला स्थान इसीलिए ‘स्वावलंबन’ को देते हैं।18 
यह सही है कि प्रेमचंद भारत के लिए जिस स्वराज्य का स्वप्न देखते थे, वह ‘आर्थिक स्वराज्य’ से भिन्न न था। लेकिन वे उसके आगे सोशलिज्म का समर्थन करते हुए भी देखे जाते हैं। अपनी एक टिप्पणी ‘रूस में समाचार पत्रों की उन्नति’ (1933)  में जहाँ वे सोवियत संघ की प्रशंसा करते हैं, वहीँ वे भारत के नेताओं में जवाहरलाल नेहरू की उनके समाजवादी विचारों के लिए खुलकर तारीफ़ करते हैं। नेहरू के एक व्याख्यान की चर्चा करते हुए लिखते हैं, जैसे नेहरू उनके ही मन की बात कह रहे हों। प्रेमचंद के शब्द हैं, “श्री जवाहर लाल नेहरू ने अपने व्याख्यानों में वैज्ञानिक साम्यवाद (साइंटिफिक सोशलिज्म) शब्द का प्रयोग किया। आपका अभिप्राय यह था कि वर्तमान समाज में मनुष्य-मनुष्य में जो भीषण असमानता है, वह दूर हो। यह ठीक नहीं है कि एक मनुष्य के पास अथाह धन भरा पड़ा हो और दूसरा मनुष्य भूखा मरता हो। समाज का इस प्रकार संगठन होना चाहिए जिससे कोई मनुष्य भूखा न रहने पावे, सबको पर्याप्त अन्न और वस्त्र मिले और सबको उन्नति करने का समान अवसर हो।”19 1930 के दशक में जवाहर लाल नेहरू की जो छवि जनता में थी वह प्रेमचंद के उक्त कथन में दिखती है। 
 प्रेमचंद की राष्ट्रीय भावना कभी अंध-राष्ट्रवाद का रूप ग्रहण नहीं करती। वे अपने राष्ट्र से प्रेम तो करते हैं, पर विश्वबंधुत्व की भावना को तिलांजलि देकर नहीं। वे राष्ट्रीय आन्दोलन के समर्थक हैं, लेकिन उस अंध-राष्ट्रवाद के समर्थक नहीं हैं जो विश्वबंधुत्व का शत्रु है। इसीलिए वे अंध-राष्ट्रवाद की आलोचना करते हैं और अंतरराष्ट्रीयता को भारत के पुरातन सन्देश ‘वसुधैव कुटुम्बकम्’ से जोड़कर देखते हैं। राष्ट्र की सेवा, उसकी स्वतंत्रता आदि सवालों को वे राष्ट्रीय भावना के अंतर्गत रखते हैं, लेकिन जब हमारा राष्ट्रीय हित पड़ोसी मुल्क के हित के खिलाफ हो जाए, दूसरे देशों के अस्तित्व के लिए खतरा हो जाए तो वह अंध-राष्ट्रवाद में बदल जाता है। प्रेमचंद ऐसी अन्ध-राष्ट्रीयता के विरोध में हैं। अपनी एक टिप्पणी ‘राष्ट्रीयता और अंतरराष्ट्रीयता’ (1933) में वे अंध-राष्ट्रीयता की तुलना मध्ययुगीन साम्प्रदायिकता से करते हैं। वे लिखते हैं: “राष्ट्रीयता वर्त्तमान युग का कोढ़ है, उसी तरह मध्यकालीन युग का कोढ़ साम्प्रदायिकता थी। नतीजा दोनों का एक है। साम्प्रदायिकता अपने घेरे के अन्दर पूर्ण शांति और सुख का राज्य स्थापित कर देना चाहती थी, मगर उस घेरे के बाहर जो संसार था उसको नोचने-खसोटने में उसे जरा भी मानसिक क्लेश न होता था। राष्ट्रीयता भी अपने अपरिमित क्षेत्र के अन्दर रामराज्य का आयोजन करती है। उस क्षेत्र के बाहर का संसार उसका शत्रु है। सारा संसार ऐसे ही राष्ट्रों या गिरोहों में बंटा हुआ है और सभी एक-दूसरे को हिंसात्मक संदेह की दृष्टि से देखते हैं और जब तक इसका अंत न होगा संसार में शांति का होना असंभव है। जागरुक आत्माएँ संसार में अंतरराष्ट्रीयता का प्रचार करना चाहती है और कर रही हैं। लेकिन राष्ट्रीयता के बंधन में जकड़ा हुआ संसार उन्हें ड्रीमर या शेखचिल्ली समझकर उनकी उपेक्षा करता है।”20 उसके आगे वे लिखते हैं: “इसमें तो कोई संदेह नहीं कि अंतरराष्ट्रीयता मानव संस्कृति और जीवन का बहुत ऊँचा आदर्श है और आदि से संसार के विचारकों ने इसी आदर्श का प्रतिपादन किया है। ‘वसुधैव कुटुम्बकम्’ इसी आदर्श का परिचायक है।”
 अंतरराष्ट्रीयता के सम्बन्ध में प्रेमचंद की यह धारणा अचानक नहीं बनती है। देश में जो स्वाधीनता संघर्ष चल रहा था उसका लक्ष्य निश्चित रूप से स्वतंत्रता की प्राप्ति था। लक्ष्य की प्राप्ति के लिए भारतवासियों में राष्ट्रीय भावना का जागरण आवश्यक था। किन्तु हमारे राष्ट्र नायकों ने दूसरे राष्ट्रों की कीमत पर अपने राष्ट्र की मुक्ति और उन्नति की कामना नहीं की। उसका प्रभाव भारतीय साहित्य और हिंदी साहित्य पर भी पड़ा। हिंदी साहित्य की चेतना स्वस्थ राष्ट्रीयता के साथ उदार अंतरराष्ट्रीयता से निर्मित हुई। प्रेमचंद की राष्ट्रीयता और अंतरराष्ट्रीयता उसी चेतना की उपज है। इस सम्बन्ध में प्रेमचंद के पूर्ववर्ती महावीर प्रसाद द्विवेदी के भी विचारों को देखना उचित होगा। राष्ट्र-प्रेम जब संकुचित होकर दूसरे देश के विरोध में चला जाए, इसको द्विवेदी जी ‘धूर्तों के भयंकर ढोंग’ के अंतर्गत रखते हुए अंतरराष्ट्रीयता को प्रमुखता से रेखांकित करते हैं और ‘वसुधैव कुटुम्बकम्’ के प्राचीन भारतीय आदर्श को आधुनिक सन्दर्भ में प्रासंगिक बताते हैं।21 द्विवेदी जी ने ठीक ही इस सम्बन्ध में रवीन्द्रनाथ ठाकुर को भी याद किया है जिनका चिंतन राष्ट्रीयता के साथ अंतरराष्ट्रीयता के विचारों को पुष्ट करता है। द्विवेदी जी अंधराष्ट्रीयता को यूरोप की देन मानते हैं और इसे भारत की स्वाभाविक वृत्ति नहीं मानते। कहने की जरुरत नहीं कि प्रेमचंद उसी धारा से निकले हिंदी चेतना के मुखर स्वर हैं। 
 एक तरफ काँग्रेस के नेतृत्व में राष्ट्रीय मुक्ति आन्दोलन चल रहा था तो दूसरी तरफ मुस्लिम लीग और हिन्दू महासभा की सांप्रदायिक राजनीति थी। प्रेमचंद लीग और सभा दोनों की सांप्रदायिक राजनीति का विरोध करते हैं और कांग्रेस के नेतृत्व में चलने वाले मुक्ति संघर्ष के पक्ष में खड़े रहते हैं। साम्प्रदायिकता को वे राष्ट्रीयता का शत्रु मानते हैं और सभी सम्प्रदायों के बीच मेल मुहब्बत का माहौल बनाने में अपनी सारी लेखकीय ऊर्जा झोंक देते हैं। वे धर्म के आधार पर आधुनिक राष्ट्र-राज्य की कल्पना के विरुद्ध हैं। अपनी एक टिप्पणी ‘पाकिस्तान की नयी उपज’ (1933) में वे न सिर्फ मुहम्मद इकबाल के धर्म के आधार पर पाकिस्तान के निर्माण संबंधी प्रस्ताव का विरोध करते हैं, बल्कि यह भी कहना नहीं भूलते कि धर्म राष्ट्र निर्माण का आधार नहीं हो सकता।”22 वे धर्म के ऊँचे भावों का सम्मान करते  हैं, उसे जीवन में उतारने की बात करते भी हैं, लेकिन उसके संकीर्ण अर्थ का हमेशा विरोध करते हैं। 
 सांप्रदायिक ढंगों पर, हिन्दू-मुस्लिम समस्याओं पर उन्होंने जितनी अधिक मात्रा में जोरदार टिप्पणियाँ लिखी है, उतनी और वैसी हिन्दी के किसी दूसरे लेखक ने शायद ही लिखी हों। सांप्रदायिकता को ‘विष’ समझनेवाले प्रेमचंद सांप्रदायिक राजनीति के पीछे की उस चतुराई को भी बेनकाब करते हैं जो संस्कृति का रूप धारण कर तरह-तरह से राष्ट्रीय जीवन में जहर घोलने का काम करती है। ‘सांप्रदायिकता और संस्कृति’(1934) नामक अपने प्रसिद्ध निबंध में उन्होंने साफ शब्दों में कहा है: “सांप्रदायिकता सदैव संस्कृति की दुहाई दिया करती है। उसे अपने असली रूप में निकलते शायद लज्जा आती है, इसलिए वह गधे की भांति जो सिंह की खाल ओढ़कर जंगल के जानवरों पर रौब जमाता फिरता था, संस्कृति का खोल ओढ़कर आती है। अब संसार में केवल एक संस्कृति है और वह है आर्थिक संस्कृति मगर हम आज भी हिन्दू और मुस्लिम संस्कृति का रोना रोए चले जाते हैं।“23 सांप्रदायिकता, अंधविश्वास आदि की आलोचना करते हुए वे आगे लिखते हैं: “ये जमाना सांप्रदायिक अभ्युदय का नहीं है। ये आर्थिक युग है और आज वही नीति सफल होगी जिससे जनता अपनी आर्थिक समस्याओं को हल कर सके, जिससे ये अंधविश्वास और ये धर्म के नाम पर किया गया पाखंड या नीति के नाम पर गरीबों को दुहने की कथा मिटाई जा सके।”24
  प्रेमचंद का एक प्रसिद्ध वाक्य कहावत की तरह हिंदी समाज में लोगों की जुबान पर है, जो उनकी कहानी ‘आहुति’ का है: “ऐसे स्वराज का आना व्यर्थ है जिसमें जॉन की जगह गोविंद गद्दी पर बैठ जाए।” इसीलिए ठीक ही रामविलास शर्मा ने उन्हें ‘स्वाधीनता-संग्राम के सैनिक साहित्यकार’25 के रूप में याद किया है|उनके मन में ‘स्वराज’ और ‘राष्ट्र’ का जो चित्र था वह बहुत साफ था। वे सिर्फ पात्र परिवर्तन के नहीं, व्यवस्था परिवर्तन के हिमायती थे। वे जाति-भेद के सवाल पर अम्बेडकर की तरह, संप्रदाय-भेद पर गाँधी की तरह और अमीरी-गरीबी के सवाल पर एक समाजवादी की तरह सोचते थे। जीवन, समाज और राष्ट्र के इतने व्यापक धरातल को छूने वाले वे हिंदी के सबसे बड़े लेखक थे। गाँधी के नेतृत्व में काँग्रेस ने प्रस्ताव पारित कर स्वराज के जिस रूप का संकल्प लिया था, उस पर प्रेमचंद ने अपनी एक टिप्पणी ‘काँग्रेस’ (1931) में लिखा: “अब काँग्रेस का ध्येय राष्ट्र के सामने है। वह गरीबों की संस्था है, गरीबों के हितों की रक्षा उसका प्रधान कर्तव्य है। उसके विधान में मजदूरों, किसानों और गरीबों के लिए वही स्थान है जो अन्य लोगों के लिए। वर्ग, जाति, वर्ण आदि के भेदों को उसने एकदम मिटा दिया है।”26 प्रेमचंद की नजर में ‘स्वराज्य’ के लिए लड़ने वाली काँग्रेस का यही रूप था! अफसोस यह है कि यह देखने के लिए वे जीवित न रहे ! ‘स्वराज्य’ तो आया किन्तु भारत वैसा राष्ट्र-राज्य नहीं बन सका जिसका वे सपना देखते थे| 
संदर्भ सूची:
1. Anavaratblogspot.in
2. विविध प्रसंग; भाग-1, पृष्ठ- 269 
3. वही, पृष्ठ- 268
4. वही, पृष्ठ- 259
5. वही
6. वही
7. भारत में अंग्रेजी राज और मार्क्सवाद, पृष्ठ- 275
8. वही, पृष्ठ- 264 
9. वही, पृष्ठ- 15
10. वही, पृष्ठ- 20 
11. विविध प्रसंग; भाग-2, पृष्ठ- 77-78 
12. वही, पृष्ठ- 98
13. वही, पृष्ठ- 92
14. वही, पृष्ठ- 476
15. वही, पृष्ठ- 470
16. वही, पृष्ठ- 471
17. वही, पृष्ठ- 152
18. वही, पृष्ठ- 272
19. वही, पृष्ठ- 222 
20. वही, पृष्ठ- 334 
21. महावीर प्रसाद द्विवेदी रचना संचयन; संपादक: भरत यायावर, ‘समस्या’ शीर्षक निबंध। 
22. विविध प्रसंग; भाग-2, पृष्ठ- 409-10 
23. Krantiswarblogspot.in
24. वही
25. प्रेमचंद और उनका युग ,पृष्ठ -122
26. वि.प्र.,भाग-2, पृष्ठ-75  
Add: 38/4, छात्र मार्ग,
दिल्ली विश्वविद्यालय                                                                                                                                              दिल्ली- 110007
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