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Saturday, 25 July 2026

चोर

चोर 
(लघुकथा)
डॉ. अरमान आनंद

'शांति विहार' अपने नाम की तरह ही एक बेहद शांत और संभ्रांत कॉलोनी थी। वहाँ कुल सात परिवार रहते थे, जो रोज़मर्रा की ज़िंदगी में व्यस्त थे। लेकिन इस शांति के पीछे एक ऐसा तूफान छिपा था, जिसकी कल्पना किसी ने नहीं की थी। कहानी तब शुरू हुई जब कॉलोनी के कोने वाले दोमंजिला मकान में माधव बाबू रहने आए।

माधव बाबू एक एकाकी, सफेद बालों वाले और बेहद गंभीर इंसान थे। वे किसी से ज्यादा बात नहीं करते थे, लेकिन उनकी एक अजीब आदत ने जल्द ही पूरे मोहल्ले की नींद उड़ा दी। वे रोज़ रात को ठीक 10:00 बजे अपनी बालकनी में आते, आसमान की तरफ देखते और पूरी ताकत से एक बार चिल्लाते "चोओओर!

शुरू के कुछ दिनों तक सातों परिवारों ने इसे पूरी तरह अनसुना किया। सब आपस में हंसते और कहते, "बुड्ढा सठिया गया है।" लेकिन यह सिलसिला थमा नहीं। हर रात, ठीक 10 बजे, वह एक चीख सन्नाटे को चीर देती थी।

धीरे-धीरे हवा बदलने लगी। वह एक शब्द—'चोर'—सातों परिवारों के कानों में पिघले हुए सीसे की तरह उतरने लगा। सबसे पहला झटका सरकारी बाबू मिश्रा जी को लगा। वे टेबल के नीचे से मोटी घूस लेने के लिए बदनाम थे। एक रात जब 10 बजे माधव बाबू चिल्लाए, तो मिश्र जी के हाथ से नोटों की गड्डी छूट गई। उन्हें लगा, 'क्या इस बुड्ढे ने मुझे देख लिया है? यह चोर मुझे कह रहा है!'

अगले कुछ हफ्तों में यह डर संक्रामक बीमारी की तरह सातों घरों में फैल गया:
 वर्मा जी ने अपने सगे भाई को धोखे से संपत्ति से बेदखल किया था। उन्हें लगा कि माधव बाबू उनकी वसीयत के जालसाजी को जानते हैं।
  किराना दुकान वाले गुप्ता जी को लगा कि अनाज में मिलावटखोरी और तौल में हेराफेरी की वजह से उन्हें निशाना बनाया जा रहा है।
 शर्मा जी के बेटे ने अपनी कंपनी में लाखों का गबन किया था, शर्मा जी को लगा कि बात लीक हो चुकी है।
शुरुआत में हर परिवार सोचता था कि चोर कोई दूसरा पड़ोसी है, लेकिन धीरे-धीरे सबका अपना-अपना पाप उनके सामने आकर खड़ा हो गया। अब रात के 9:55 बजते ही सातों घरों में अजीब सी खामोशी छा जाती। लोग बत्तियां बुझाकर खिड़कियों से झांकते और खौफ से कांपने लगते।

जब पानी सिर से ऊपर चला गया, तो मोहल्ले के लोगों ने व्यक्तिगत रूप से सच पता करने का फैसला किया।
एक सुबह मिश्र जी ने पार्क में माधव बाबू को अकेले टहलते देखा। वे हिम्मत करके आगे बढ़े और पूछा, "माधव बाबू, आप रोज़ रात को १० बजे बालकनी में आकर किसे चोर-चोर चिल्लाते हैं? साफ़-साफ़ बताइए, क्या परेशानी है?"
माधव बाबू रुके, उन्होंने मिश्र जी की आँखों में गहराई से झांका, एक रहस्यमयी मुस्कान दी और सिर्फ इतना कहा: "मैं सब जानता हूँ।"  और वे आगे बढ़ गए।

अगले दिन वर्मा जी ने उन्हें गली के मोड़ पर घेरा। "देखिए माधव जी, इस मोहल्ले में सब शरीफ़ लोग रहते हैं। आप यह 'चोर' किसे कहते हैं? नाम बताइए उसका!"
माधव बाबू के चेहरे पर कोई भाव नहीं उभरा। वे ठंडे स्वर में बोले:
"मैं सब जानता हूँ।"

तीसरे दिन गुप्ता जी ने अपनी दुकान के सामने उन्हें रोका और वही सवाल दोहराया। माधव बाबू ने फिर वही जादुई और खौफनाक वाक्य कहा:
"मैं सब जानता हूँ।"

अब सातों परिवारों का डर पूरी तरह यकीन में बदल चुका था। उन्हें लगा कि माधव बाबू कोई साधारण इंसान नहीं, बल्कि एक ब्लैकमेलर हैं, जिसके पास सबके काले कारनामों के पक्के सबूत हैं। वे किसी भी दिन उन्हें तबाह कर सकते थे।
 
डर जब चरम पर पहुँच जाता है, तो इंसान हिंसक हो जाता है। सातों परिवारों ने एक गुप्त मीटिंग बुलाई। किसी ने पुलिस के पास जाने की हिम्मत नहीं की, क्योंकि सबके दामन पर दाग थे। अंततः सबने मिलकर एक खौफनाक फैसला लिया—माधव बाबू की हत्या
उन्होंने एक बेहद शातिर और अचूक प्लानिंग तैयार की, ताकि किसी एक पर शक न जाए और यह पूरी तरह से एक 'हादसा' लगे:

  तय हुआ कि हत्या ठीक रात के 10:00 बजे ही की जाएगी, ताकि उनके चिल्लाने के नियम का इस्तेमाल किया जा सके। गुप्ता जी ने दोपहर में माधव बाबू के सोने के दौरान, उनके घर के पिछले रास्ते से जाकर उनकी बालकनी की लोहे की रेलिंग के मुख्य नट-बोल्ट ढीले कर दिए। सातों परिवारों ने मोहल्ले के मंदिर में रात 9:45 बजे एक 'सामूहिक कीर्तन' का आयोजन किया। मोहल्ले के बाहर के कुछ पुजारियों को भी बुलाया गया। सीसीटीवी कैमरों के सामने सातों परिवार वहां बैठकर ताली बजा रहे थे। ठीक 9:58 बजे, योजना के अनुसार बिजली विभाग के एक कर्मचारी को पैसे देकर पूरी गली की स्ट्रीट लाइट बंद करवा दी गई।
ठीक 9:59 बजे, कीर्तन की ढोलक और मंजीरों की आवाज़ चरम पर थी। उसी वक्त सातों परिवारों द्वारा किराए पर लिए गए दो नकाबपोश युवक अंधेरे का फायदा उठाकर पाइप के सहारे माधव बाबू की बालकनी में चढ़ गए।
जैसे ही घड़ी की सुइयां 10:00 पर पहुँचीं, माधव बाबू हमेशा की तरह चिल्लाने के लिए बालकनी की तरफ बढ़े। ठीक उसी पल, नकाबपोशों ने बालकनी के फर्श पर ग्रीस और गाढ़ा तेल फेंक दिया और उन्हें पीछे से एक ज़ोरदार धक्का दिया।
माधव बाबू का पैर फिसला। उन्होंने खुद को संभालने के लिए सामने लगी लोहे की रेलिंग को कसकर पकड़ा। लेकिन ढीली हो चुकी रेलिंग उखड़ गई और माधव बाबू सीधे सिर के बल नीचे पक्की सड़क पर जा गिरे। गिरते वक्त उनके मुंह से आखिरी अधूरी चीख निकली— "चो..."
और चारों तरफ सन्नाटा पसर गया। दोनों नकाबपोश अंधेरे में गायब हो गए।

अगली सुबह पुलिस आई। मौके का मुआयना किया गया। फॉरेंसिक टीम ने पाया कि रेलिंग पुरानी और जंग लगी थी। फर्श पर गिरा तेल उनके गिरने के कारण घर में रखे किसी डिब्बे के टूटने से फैला माना गया। सबसे बड़ी बात—कॉलोनी के सभी सात परिवार उस वक्त मंदिर में भगवान के भजन गा रहे थे, जिसका पुख्ता वीडियो सबूत था। केस को एक 'दुर्भाग्यपूर्ण दुर्घटना' मानकर बंद कर दिया गया।
सातों परिवारों ने राहत की सांस ली। ब्लैकमेलर का खात्मा हो चुका था। उनके राज़ अब हमेशा के लिए दफन थे।
मर्डर के अगले दिन, रात के ठीक 10:00 बजे सातों परिवार अपने-अपने घरों में थे। गली में एकदम सन्नाटा था। बाहर से कोई चीख नहीं सुनाई दी।
लेकिन, जैसे ही घड़ी की सुई 10 पर ठहरी, सातों घरों के कमरों में बैठे लोगों के कानों के पर्दे फटने लगे। उन्हें अपने ही दिमाग के भीतर माधव बाबू की वही खौफनाक आवाज़ गूंजती हुई महसूस हुई— "चोओओर!"
उन्हें अचानक समझ आ गया कि बाहर का बोलने वाला तो मर गया, लेकिन उनके अंदर छुपा चोर अब उन्हें ताउम्र सोने नहीं देगा।

Saturday, 4 May 2024

कथाचोर का इकबालिया बयान: अखिलेश सिंह

कथाचोर का इकबालिया बयान
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कहानियों की चोरी पकड़ी जाने पर लेखिका ने सार्वजनिक अपील की : 
जब मैं कहानियां चुराती थी तो मैं अवसाद में थी। मैं काफ़ी अकेलापन महसूस करती थी। मेरे भीतर एक void बन गया था। जिसे मैं कुछ का कुछ करते हुए भरती रहती थी। मैं डिप्रेशन सर्वाइवर हूँ। ...और देखिए तो सुधिजनों! तबसे मेरा बहुत विकास हुआ है। अब मैं इस तरह सत्य आरोपों से भी अपनी अनूठी मौलिक शैली में लड़ सकती हूँ

लोगों ने लेखिका से भिन्न स्वरों में सहानुभूति ज़ाहिर की : 
यू आर अ रियल फ़ाइटर
तुम मेरी (पसंदीदा) हो और रहोगी
चोरी तो वाल्मीकि भी करते थे फिर इतने बड़े राइटर बने कि उन्हें गीता प्रेस ने छापा
आसमान पर थूकने से थूक चिड़िया पर ही गिरेगा
तुम लिखती रहो, मुझे इंतज़ार रहता है
हमारी एकता जिंदाबाद 
शारदीय नवरात्र की शुभकामनाएँ!

घटना के उपसंहार में चोरी जैसे अमर्यादित शब्द को असाहित्यिक घोषित करते हुए, लेखिका ने सबको धन्यवाद कहा।

Wednesday, 25 September 2019

अरमान आनंद की लघुकथा एन एच 31

एन एच 31 (लघुकथा)

रमेसर आज जल्दी उठ गया। रोज से लगभग दो घण्टे पहले । आसमान पर नजर डाली। घनघोर बादलों  के कारण समय का ठीक-ठीक अंदाजा नही लगा सका फिर भी उसने सोचा तीन साढ़े तीन तो बज ही रहे होंगे। सोने की कोशिश की लेकिन दुबारा नींद नही आई.. बगल में देखा उसका बीस साल का पोता पवन गहरी नींद में सो रहा था।  रमेसर बेगूसराय में एन एच 31 के ठीक किनारे चाय की दुकान चलाता था। दिन में दुकान पर उसके साथ उसका बेटा भी आ जाता लेकिन रात में वह घर चला जाता। रामेश्वर की बीबी मर चुकी थी। अब वह घर जाकर करता भी क्या? एक कमरे वाले घर मे उसका बेटा बहु और बच्चे रहते हैं । बच्चे क्या एक पोती और एक पोता। पोता बड़ा हुआ तो साथ ही आकर सोने लगा।
    लाख कोशिशों के बाद भी जब रमेसर को दुबारा नींद नही आई तो वह घरेलू चिंताओं में खो गया। पोती पूजा की शादी करनी है सोलह की हो गयी है। कहाँ से आएगा पैसा?बहु सबीतरी और पोती पूजा घर घर बर्तन माँजती हैं और यह चाय की दुकान है तो जीवन जैसे तैसे चल जाता है।बेटा तो बौधा ही है। किसी काम का नही इसलिए चाय की दुकान पर साथ बैठा लिया ।एक ये पोता पवन है उसका दाख़िला तो उसने सरकारी स्कूल में कराया था लेकिन पढ़ाई उसने छोड़ दी । काम काज कुछ करता नही दिन रात कट्टा लेकर घूमता रहता है। सुना है बेगूसराय में बड़े पुलिस अधिकारी आए हैं बेगूसराय को अपराधमुक्त बनाने का सरकारी ऑर्डर जारी हुआ है। कहीं बिसनमा के जैसे इसका भी इनकाउंटर न हो जाये । लाख समझाया मानता ही नही।
       बिसनमा रामेश्वर के पोते पवन का ही दोस्त था ।छह महीने पहले बिसनमा ने लछमी पेट्रोल पंप पर डकैती डाली । पेट्रोल पंप के मालिक की सरकार में पहुंच थी । दबाव डलवा कर बिसनमा का सीधा इनकाउंटर करवा दिया। दीरा जा कर पुलिस उठाई थी उसको। ठीक ही हुआ पुलिस ने मार दिया। पूजा को जब तब ले के अलका सिनेमा में घुसा रहता था। रमेसर ने लम्बी सांस ली।
      रमेसर के बेटे का नाम ढिबरी था। वह बचपन मे वह ढिबरी को ढूंढता रहता और जब मिल जाये तो उसका ढक्कन खोल बाती से किरोसिन तेल चाटता रहता। रमेसर ने भाई ने उसका नाम ढिबरी रख दिया। रमेसर सोचने लगा कि बैल बुद्धि ढिबरी से तो पूजा की शादी नही सम्भल पाएगी । पूजा की शादी उसे अपने जीते जी करनी होगी कहाँ से आएगा पैसा ? पिछला कर्जा बाकी है । कम से कम पचास बाराती तो आएंगे ही फिर दूल्हा उसका बाप माई सबका कपड़ा-लत्ता । सोना न सही चांदी का ही बिछिया अंगूठी भी बनेगा। बहुत खर्चा है । सोचते सोचते रमेसर ने करवट बदली।अचानक  खटर पटर की आवाज आई । रमेसर ने गर्दन उठा कर देखा एक मोटा चूहा छप्पर से बर्तन पर कूदा और अंधेरे में खो गया।
    आज तो रामजीवन सिंह भी आएगा बोला है कम से कम पांच हजार रुपया देना ही होगा। कर्जा तो जान का जपाल ही हो जाता है । पवन को डेंगू न होता तो यह कर्जा नही होता। कमबख्त एक मच्छर सारी जमापूंजी खा गया। चलो यह पैसा देकर आज लगभग बरी हो जाना है । थोड़ा बहुत बचेगा। जल्दी ही चुकता कर देंगे।  दुपहरी में सौ रुपया मोफतिया को भी देना है चाय दुकान लगाने का रंगदारी । पवनमा क्या रंगदार बनता है। मोफतिया है असली रंगदार ।आ जाता है तो सिपाही उठ के खड़ा हो जाता है । यामाहा मोटरसाइकिल उसकी हरदम स्टार्ट ही रहती है । कब जाने दुष्मनमा उस पर हमला बोल दे। तभी रमेसर के कान के पास एक मच्छर भनभनाने लगा। रमेसर ने चपत लगाई। पता नही मच्छर मरा या नही आवाज बन्द हो गयी।
        मच्छर से रमेसर का ध्यान टूटा तो उसने देखा दिन साफ हो रहा है पांच बजने वाले होंगे । रमेसर उठ बैठा।  एन एच इकत्तीस पर लगातार ट्रक गुजर रहे थे। सुबह के शांत शहर के बीच जाती इस सड़क पर ट्रकों का गुजरना सांय सांय की ध्वनि उत्त्पन्न कर रहा था। रमेसर ने सोचा घर जा कर नहा धो कर आ जाऊं। उसने पवन को उठा कर कहा घर जा रहा हूँ लौटकर आता हूँ तब तक झाड़ू दे कर और चूल्हा जला कर रखना। दुकान के पीछे से उसने सायकिल निकाली  और एन एक 31 पर बढ़ चला ।
   रमेसर सायकिल पर धीरे धीरे  पैडल मारता हुआ घर की ओर बढ़ चला । कपड़ों के नाम पर एक मैली धोती और फटा हुआ बनियान पहने  हुए था । उसका शरीर दुबला पतला और थोड़ा झुका हुआ। लग रहा था जैसे संसार की इस आपाधापी में वह जीवन को अभिशाप की तरह जीताऔर गरीबी से लड़ता हुआ जा रहा हो । बारिश के मौसम से सड़कें भी भीगी हुई थीं। अपने मुहल्ले की गली के पास वह ज्यों मुड़ा एक तेज रफ्तार ट्रक आया और रमेसर को कुचलता हुआ निकल गया।

अरमान आनंद

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Saturday, 3 March 2018

जीवन संध्या पर खुशी (लघुकथा) - Er S. D. Ojha

उसका नाम रधिया था । रधिया पासवान । उसका घर गांव से बाहर उत्तर दिशा में था । उसकी बिरादरी एक टोले के रूप में बसी थी । मैं दीपक पाण्डेय एक कुलीन घराने का सरयू पारीण ब्राह्मण था । रधिया मेरे साथ हीं पढ़ती थी ।  वह अक्सर मजाक में कहती - "रावण का श्राद्ध खाने वाले कुलीन ब्राह्मण कैसे हुए ?  थोड़े से जमीन पर कोई कहीं अपना ईमान बेचता है भला ?"

                            कहते हैं कि राम पर रावण के हत्या का पाप लगा था । रावण ब्राह्मण था । ब्रह्म हत्या के पाप का निवारण ब्राह्मण हीं कर सकते थे । बहुत से ब्राह्मण तैयार नहीं थे । ले देकर कुछ ब्राह्मण तैयार हुए । रावण का विधिवत श्राद्ध हुआ । ब्राह्मणों ने भोजन किया । खुश होकर राम ने उन्हें सरयू पार की जमीन दान में दे दी । तब से ये ब्राह्मण सरयू पारीण ब्राह्मण कहलाए । रधिया को किसी ने यह बात बताई थी । उसके हाथ में ब्रह्मास्त्र था । उसका वह हर समय उपयोग करती थी । मैं भी गुस्से में आकर उसकी चोटी खींच देता । उसकी पीठ पर एक धौल जड़ देता । रधिया एक कदम और आगे बढ़ जाती । वह मुझे "दीपकवा महपातरवा" कह कर चिढ़ाती । मेरा घर चौरास्ता पर था । वह अक्सर शाम को मेरे घर के आगे से गुजरती । वह तरह तरह से मुंह बनाती मुझे चिढ़ाती। मैं अपने बाबा का ख्याल कर मन मसोस कर रह जाता ।

समय अपने गति से बढ़ता रहा । हम दोनों एक साथ पढ़ते हुए इण्टर की परीक्षा भी पास कर गये । इण्टर के बाद वह पास के डिग्री काॅलेज में पढ़ने लगी । मेरा एडमिशन इंजीनियरिंग काॅलेज गोरखपुर हो गया । मैं पहली बार घर से बाहर जा रहा था । मां रो रही थी । पिता सामान्य होने की कोशिश कर रहे थे । बाबा गुजर गये थे । मैं सोच सकता हूं कि उनकी हालत भी कोई खास अच्छी नहीं होती । घर का लाड़ला जा रहा था । रधिया चिढ़ा रही थी । अच्छा है गांव एक निकृष्ट ब्राह्मण के बोझ से कुछ दिन चैन की सांस लेगा । मैं गोरखपुर चला गया । कुछ महीनों बाद तीन चार दिनों की छुट्टियां पड़ीं । मैंने इस सुयोग को हाथ से जाने नहीं दिया । गांव आ गया । सबसे मिला । बचपन के दोस्त जिन्होंने पढ़ाई छोड़ दी थी , वे तनिक दूरी रख रहे थे । शाम को रधिया भी मेरे घर के सामने से गुजरी । मैं उसकी तरफ से किसी कटाक्ष की उम्मीद कर रहा था । पर उसकी आंखों में एक अव्यक्त सी उदासी तैर रही थी । वह कुछ कमजोर भी नजर आ रही थी । मैं इस हालत में उससे कुछ भी बोल नहीं पा रहा था । थोड़ी देर बाद वही बोली - " तुम चले गये थे । कुछ भी अच्छा नहीं लग रहा था । तुम्हारा ये घर सूना सूना सा लग रहा था । " मेरे भी हृदय में प्रेम रस का प्रवाह पहली बार हुआ । दूर ग्रामोफोन पर एक गीत बज रहा था - वो पास रहें या दूर रहें , नजरों में समाए रहते हैं......।

                            अब मैं जब भी गांव आता मेरी नजरें रधिया को ढूंढती । रधिया भी किसी न किसी बहाने से शाम को मेरे घर की तरफ आ जाती । हम खड़े खड़े आंखों आंखों में शाम की दहलीज पर बातें करते । मुंह से कुछ नहीं कहते । हम सहपाठी थे । इसलिए हमारे मिलने पर किसी को एतराज नहीं था । वह मेरे घर भी आ जाती । हमें इश्क का वह रोग लग गया था , जो "लगाए न लगे, बुझाए न बुझे " वाला था । । मेरी इंजीनियरिंग की पढ़ाई पूरी हो गयी थी । नौकरी भी लग गई थी । अब शादी के लिए तिलकहरू दुआर कोड़ने लगे थे । एक शाम रधिया मिली । उस दिन मैं अपनी नौकरी पर जा रहा था । उसकी आंखें दर्द से छलक रहीं थीं । उसने छूटते हीं पूछा - मेरा कसूर बताओ । मैं उसका कसूर नहीं बता सका । मैंने उसका हाथ पकड़ा । उसे अपने साथ ले लिया । उसने भी कोई प्रतिरोध नहीं किया । शाम  का झिटपुटा हो रहा था । सब घरों से रसोई के धुएं उठ रहे थे । दो प्रेमी दो पक्षी एक आशियां बनाने निकल पड़े थे । हां ,हमने अपना आशियां बनाया ।  मैंने बाद में पिता को सारी जानकारी पत्र के मार्फत दे दी । पिता चुप रहे , लेकिन मां का रो रो कर बुरा हाल हो गया । मां बाबूजी ने किसी को नहीं बताया कि मैं रधिया को भगाकर ले गया हूं । प्रचार यही किया गया कि मैंने अपने कार्य क्षेत्र के किसी कलिग की लड़की से शादी कर ली है । तिलकहरू का अब हमारे दरवाजे पर तांता लगना बंद हो गया था । रधिया के मां बाप ने यही सोचा कि वह किसी के साथ भाग गई है । उन्होंने बेटी को अपनी तरफ से मरा हुआ समझ लिया था ।

                                          कानपुर पहुंचकर हमने कोर्ट मैरिज कर ली । रधिया की जिद थी कि कोर्ट मैरिज के साथ साथ अग्नि को साक्षी मानकर वह मेरे साथ फेरे भी ले । उसे शादी का जोड़ा पहनने का शौक था । मुझे यह फिजूल खर्ची लगी । मैंने इंकार कर दिया । रधिया के साथ मेरा जीवन पंख बन उड़ने लगा था । तीन बच्चे हुए । एक लड़की दो लड़के । मां बाबूजी दो तीन महीने में आकर मिल जाते । मैं रधिया व बच्चों को गांव नहीं ले जा सका । इससे रधिया की अस्मिता पर आंच आती । बच्चे बड़े हुए । पढ़े लिखे । नौकरी किए । उनकी भी शादियां की । इस बीच मां बाबूजी का भी देहावसान हो गया । मेरे नाती पोते हुए । रधिया मेरा ख्याल पहले की अपेक्षा और ज्यादा करने लगी थी । बहुओं के होते हुए वह स्वंय मेरे लिए बेड टी बनाती । एक दिन मैं और रधिया बैठे हुए थे । क्या खोया पाया कि चर्चा चल रही थी । रधिया ने कहा कि उसने जीवन में पाया हीं पाया है । खोया कुछ भी नहीं । हां ,एक चीज वह आज भी मिस करती है । उसने शादी का लाल जोड़ा नहीं पहना । बात मुझे भी सही लगी । मेरी गलती थी । मैंने हीं पारम्परिक विवाह के लिए मना किया था । मैं अपने को दोषी मान रहा था । अचानक मैंने फैसला किया । हम फिर से शादी करेंगे । रधिया लाल जोड़ा पहनेगी । बेटे पोते हंस रहे थे । मैंने ठान लिया तो ठान लिया । दृढ़ प्रतिज्ञ होने से दुविधा की बेड़ियां कट जाती हैं । मेरी कोई दुविधा नहीं रही । रधिया ने लाल जोड़ा पहना । धूम धाम से शादी हुई । नाती पोते शादी में खूब नाचे ।

                                         रात को हम नये नवेले जोड़े की तरह सोए । सुबह बिना बेड टी के मेरी नींद नहीं खुलती थी । उस दिन नींद भी मेरी जल्दी हीं खुल गई । मैंने एक आंख खोली । तिपाई पर चाय की प्याली नहीं थी । दोनों आंख खोली । तिपाई पर वास्तव में चाय नहीं थी । मैंने एहतियातन तिपाई पर हाथ मारा । चाय का वहां सचमुच हीं कोई अता पता नहीं था । मैंने बगल में देखा । वहां रधिया सोई पड़ी है । मैंने उसे झिझोड़ा । वह उठ बैठी । मैंने चाय नहीं मिलने की शिकायत की । रधिया मुस्कुराई । बोली - मैं " दीपकवा महपातरवा " की नौकरानी नहीं हूं । मैं अब दीपक पाण्डेय की पत्नी हूं । जिसको चाय पीना हो वो खुद बनाए और पिए ।" ऐसा कहते हुए उसके चेहरे पर एक इन्द्रधनुषी आभा बिखर रही थी । वह शादी के लाल जोड़े में बला की खूबसूरत लग रही थी ।

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सर गणेश दत्त