Sunday, 6 November 2016

कविता

कार्तिक पूर्णिमा की अगली सांझ
फ़ैल रही है मेरे गिर्द
ये तुम्हारा ही तो रंग है
मेरी सांवली सी प्रेमिका
हल्की सी धुंध की
पागल छुअन
मेरे नथुनों में
रातरानी की खुशबू
जैसे तुम हो यहीं कहीं
और तुम्हारे माथे पे चिपकी टिकुली सा चाँद
हमारे प्यार के हश्र सा
कटेगा और चौदह दिन
बुझ जाएगा
पहले मिलन के बल्ब सा
****--अरमान आनंद

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