कार्तिक पूर्णिमा की अगली सांझ
फ़ैल रही है मेरे गिर्द
ये तुम्हारा ही तो रंग है
मेरी सांवली सी प्रेमिका
हल्की सी धुंध की
पागल छुअन
मेरे नथुनों में
रातरानी की खुशबू
जैसे तुम हो यहीं कहीं
और तुम्हारे माथे पे चिपकी टिकुली सा चाँद
हमारे प्यार के हश्र सा
कटेगा और चौदह दिन
बुझ जाएगा
पहले मिलन के बल्ब सा
****--अरमान आनंद
Sunday, 6 November 2016
कविता
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