Thursday, 13 August 2020

युवा कवि रवि प्रकाश के जन्मदिवस पर उनकी एक कविता

रवि प्रकाश के जन्मदिवस पर उनकी एक कविता




सूर्य के हाथ से छूट रही है पृथ्वी

तुम पास बैठकर
कविता की कोई ऐसी पंक्ति गाओ
जहाँ मेरे कवि की आत्मा
निर्वस्त्र होकर
मेरे आँख का पानी मांग रही है
यह कैसा समय है
कि, ये पूरी सुबह
किसी बंजारे के गीत की तरह
धीरे-धीरे मेरी आत्मा को चीर रही है
जिसके रक्त से लाल हो जाता है आसमान
जिसके स्वाद से जवान होता है
हमारे समय का सूरज
और चमकता है माथे पर
जहाँ से टपकी पसीने की एक बूंद
जाती है मेरे नाभी तक
और विषाक्त कर देती है
मेरी समस्त कुंडलनियों को
मैं धीरे-धीरे छूटने लगता हूँ
ऐसे, कि जैसे
सूर्य के हाथ से छूट रही है पृथ्वी
सागर के एक कोने में

शाम होने को है
मैं रूठकर कितना भटकूंगा
शब्दों में।

◆Ravi Prakash

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