Thursday, 10 May 2018

धान रोपती हुई औरतों पर कविताएँ

धान रोपती हुई औरतों पर कविताएँ
                        1

धान रोपती स्त्री - विश्वनाथ प्रसाद तिवारी
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वह गाड़ी की ओर नहीं देखती
गाड़ी धड़धड़ाती हुई निकल जाती है उसके सामने से

गाड़ी के लोग उसकी ओर देख रहे हैं
पानी और कीचड़ में सनी
उसकी पिण्डलियाँ दीख रही हैं
उसके जाँघ गोरे हैं
गाड़ी में बैठी गोरी मेम की तरह

वह कछोटा मारे
ज़मीन में धँसी
अपना भविष्य रोप रही है

वर्तमान भागा जा रहा है उसके सामने से
वह मिट्टी में क्या ढूँढ़ रही है ?

गाड़ी रोज़ ऐसे ही भागती चली जाती है
उसके सामने से
गाड़ी में उसकी कोई दिलचस्पी नहीं

वह धान रोपती स्त्री
सिर्फ़ धान रोपती है ।

                            2

धान रोपती औरतों का प्यार -अरुण चंद्र राय
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खेतों के बीच
घुटने भर कीच में
धान रोपती औरतों से पूछो
क्या होता है प्यार
मुस्कुराकर वे देखेंगी
आसमान में छाये बदरा की ओर
जो अभी बरसने वाला ही है
और प्रार्थना में
उठा देंगी हाथ
धान रोपती औरतों का प्यार
होता है अलग
क्योंकि होते हैं अलग
उनके सरोकार
उन्हें पता है
बरसेंगे जो बदरा
मोती बन जायेंगे
धान के गर्भ में समाकर
और मिटायेंगे भूख
उन्हें कतई फ़िक्र नहीं है
अपनी टूटी मडैया में
भीग जाने वाले
चूल्हे, लकड़ी और उपलों की
हां , उन्हें
फ़िक्र जरुर है
जो ना बरसे बदरा
सूख जायेंगी आशाएं

जब प्रेमी की याद आती हैं उन्हें
जोर जोर से गाती हैं वे
बारहमासा
और हंसती हैं बैठ
खेतों की मेढ़ पर
गुंजित हो उठता है
आसमान
ताल तलैया
इमली
खजूर
और पीपल
दूर ऊँघता बरगद भी
जाता है जाग
उनकी बेफिक्र हंसी से
फ़िक्र भरी आँखों
और बेफिक्र हंसी के
द्वन्द में जीता है
धान रोपती औरतों का प्यार

.
पानी लगे पैर

बचपन से
अब तक
सुनता आ रहा हूँ
पैरों में
पानी लगने के बारे में
सोचता भी आया
लेकिन कहाँ समझ पाया
मैं भी

औरतें
जो करती हैं
घरों/ खेतों में काम
उनके पैरों में
लगा होता है पानी
फैक्ट्री और दफ्तरों में
काम करने वाली औरतें भी
अछूती नहीं रहतीं

घुटने भर पानी लगे खेतों में
जो हरवाहे बनाते हैं हाल
जो मजूर बोते हैं धान
उनके पैरों में भी लगा होता है पानी
एक्सपोर्ट हाउस/एम् एन सी के कामगार
अपने सपनों के साथ
पैरों में लगाये होते हैं
अलग तरह का पानी
जो पैर
लक्ष्मी होते हैं
पूजे जाते हैं
उन पैरों में भी
लगा होता है पानी
बुरी तरह से
आज भी .

आँगन से घर
घर से दालान
दालान से खेतों तक
चकरघिन्नी खाती माँ के पैरों में भी
लगा होता था पानी
और लगा रहा वह
उमर भर
नहीं समझा गया
उसे या
उसके पानी लगे पैरों को
अलग बात है कि
उसके नहीं रहने के बाद सूना हो गया था
घर आँगन
अनाथ हो गए थे
खेत खलिहान, बैल-गोरु

जबकि
फटे हुए
विवाई भरे पैर
दिख भी जाते हैं
नहीं दिखता
पैरों में लगा हुआ पानी
चुपचाप लिपटा रहता है पानी
पैरों से किसी जोंक की तरह

आँखों के पानी की तरह
सुख-दुःख में
छलक नहीं उठता
पैरों में लगा पानी.

     3

धान रोपती औरतें -क्षमा सिंह
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धान रोपती औरतें 
गाती हैं गीत 
और सिहर उठता है खेत 
पहले प्यार की तरह

धान रोपती औरतों के 
पद थाप पर 
झूमता है खेत ..
और सिमट जाता है 
बांहों में उनकी ..

रोपनी के गीतों में बसता है जीवन
जितने सधे हाथों से रोपती हैं धान 
उतने ही सधे हाथों से बनाती हैं रोटियां

मिट्टी का मोल जानती हैं 
धान रोपती औरतें 
खेत से चूल्हे तक 
चूल्हे से देह तक..

         4

धान रोपती औरत- अनुषा मिश्रा
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कभी देखी है तुमने धान रोपती हुई औरत
अपने बालों को कपड़े में लपेटकर
साड़ी को घुटनों तक चढ़ाकर
वो घुस जाती है पानी में और
घंटों यूं ही उस पानी में खड़े रहकर
रोपती रहती है धान
खेत में भरे गंदे पानी से सड़ जाते हैं
उसके हाथ और पैर
कुछ जोंक भी चिपक जाती हैं उसके पैरों में
और भी कई पानी के कीड़े जो
चूसते रहते हैं उसका खून
फिर भी धान रोपती औरतें
अपने लक्ष्य से नहीं भटकतीं
और चेहरे पर मुस्कान लिए
गाती रहती हैं कजरी
इतना दर्द सहने के बाद भी
उनके चेहरे पर होती है एक खुशी
खुशी इस बात की कि उनकी रोपी हुई फसल
बड़ी होकर जब कटेगी तो इसी से
उनका  घर चलेगा और
खुशी इस बात की उनके धानों से
मिलने वाले चावल से
न जाने कितनों का पेट भरेगा।।

           5
धान रोपती औरतों का प्यार- अरुण रॉय
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खेतों के बीच
घुटने भर कीच में
धान रोपती औरतों से पूछो
क्या होता है प्यार
मुस्कुराकर वे देखेंगी
आसमान में छाये बदरा की ओर
जो अभी बरसने वाला ही है
और प्रार्थना में
उठा देंगी हाथ

धान रोपती औरतों का प्यार
होता है अलग
क्योंकि होते हैं अलग
उनके सरोकार
उन्हें पता है
बरसेंगे जो बदरा
मोती बन जायेंगे
धान के गर्भ में समाकर
और मिटायेंगे भूख

उन्हें कतई फ़िक्र नहीं है
अपनी टूटी मडैया में
भीग जाने वाले
चूल्हे, लकड़ी और उपलों की
हां , उन्हें
फ़िक्र जरुर है
जो ना बरसे बदरा
सूख जायेंगी आशाएं

जब प्रेमी की याद आती हैं उन्हें
जोर जोर से गाती हैं वे
बारहमासा
और हंसती हैं बैठ
खेतों की मेढ़ पर
गुंजित हो उठता है
आसमान
ताल तलैया
इमली
खजूर
और पीपल
दूर ऊँघता बरगद भी
जाता है जाग
उनकी बेफिक्र हंसी से

फ़िक्र भरी आँखों
और बेफिक्र हंसी के
द्वन्द में जीता है
धान रोपती औरतों का प्यार

चलो हम भी करते हैं
ऐसा ही प्यार
धान रोपती औरतों सा प्यार

              6

पराग पावन- ये धान रोपती औरतें
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ये धान रोपती औरतें
बान कलम से
गीली मिट्टी की स्याही से
खेत के कागज पर
आखिर क्या लिखतीं हैं?

साँझ ढले
धरती की ढोलक पर
पैरों की थाप देती हुई
ये घर को लौट जायेंगी
फिर खुद को झोंक देंगी चूल्हे के भुक्खड़ मुँह में
जिसकी ताप से चावल पककर भात बन जायेगा
दाल, दाल बन जायेगी
पति को खिलायेंगी
बच्चों को खिलायेंगी
कुछ बच गया तो खुद भी खायेंगी
फिर कल सुबह सबसे पहले उठने के लिये
रात को सबसे बाद में सो जायेंगी।

ये औरतें
गृहस्थ-रथ-आरूढ़ बेताज़ रानियाँ हैं

और उनके पुरुष जुतते रहे हैं उसी रथ में
ऐसा महसूसते, गीली मेंड़ पर खड़े होकर
मैं अब भी यही सोच रहा हूँ

ये धान रोपती औरतें
बान की कलम से
गीली मिट्टी की स्याही से
खेत के कागज पर
आखिर क्या लिखती हैं?

                 7

धान रोपती स्त्री - अक्षय उपध्याय
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क्यों नहीं गाती तुम गीत हमारे
क्यों नहीं तुम गाती

बजता है संगीत तुम्हारे पूरे शरीर से
आँखें नाचती हैं
पृथ्वी का सबसे ख़ूबसूरत 
नृत्य

फिर झील-सी आँखो में
सेवार क्यों नहीं उभरते

एक नहीं कई-कई हाथ सहेजते हैं तुम्हारी आत्मा को
एक नहीं
कई-कई हृदय केवल तुम्हारे लिए धड़कते हैं
क्यों नहीं फिर तुम्हारा सीना
फूल कर पहाड़ होता

प्रेम के माथे पर डूबी हुई
तुम
धूप में अपने बाल कब सुखाओगी
कब गाओगी हमारे गीत

धान रोपती
एक स्त्री
केवल स्त्री नहीं होती

तुम वसंत हो
पूरी पृथ्वी का
तुम स्वप्न हो
पूरी पृथ्वी का
तुम्हारी बाँहों में छटपटाते हैं हम और
सूखते हैं हमारे गीत
वसंत पीते हुए इस मौसम में
क्यों नहीं गाती तुम
क्यों नहीं तुम गाती गीत हमारे ?

                 8

पहाड़ी स्त्री-  निर्मला पुतुल
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वह जो सर पे सुखी लकड़ियों का गठर बांधे
पहाड़ से उतर रही है
पहाड़ी स्त्री
अभी अभी जाएगी बाजार
और बेच कर साडी लकड़िया
बुझाएगी घर भर के पेट की आग
चादर में बच्चे को
पीठ पर लटकाये
धान रोपती पहाड़ी स्त्री
रोप रही अपना पहाड़ सा दुःख
सुख की एक लहलहाती फसल के लिए
पहाड़ तोड़ती , तोड रही है
पहाड़ी बंदिश और वर्जनाएं
चटाइयां बुनते पहाड़ पर
काट रही है पहाड़ सा दिन
झाड़ू बनाती , बना रही है
गन्दगी से लड़ने के हथियार
खोपा में खोसती फूल
खोस रही है किसी का दिल
गाय बकरियों के पीछे भागते
उसके पाँव
रच रहे है धरती पर
सैकड़ो कुंवारे गीत ।

        9

रामशंकर यादव विद्रोही
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मैं किसान हूं
आसमान में धान बो रहा हूँ
कुछ लोग कह रहे हैं
कि पगले! आसमान में धान नहीं जमा करता
मैं कहता हूं, पगले!
अगर जमीन पर भगवान जम सकता है
तो आसमान में धान भी जम सकता है
और अब तो दोनों में से कोई एक होकर रहेगा
या तो जमीन से भगवान उखड़ेगा
या आसमान में धान जमेगा."

                 10

धान रोपती औरतें-मुरारी शर्मा
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धान रोपती औरतें

करती हैं इंतजार

रोपे की रूहणी और

बरसात के मौसम का

उनके लिए किसी उत्सव

से कम नहीं है धान के रोपे में 

रूहणी के लिए आना।

वे समझती हैं

अषाढ़ की उमस भरी दोपहर में

आसमान पर उमड़ते-घुमड़ते

काले मेघों के चले आने का सबब

वे जानती हैं सावन की

फुहारों के बीच जंगल में नाचते

मोर का प्रणय प्रलाप।

मगर वे फिर भी चली आती हैं

कीचड़ भरे खेत में

हरियाली रोंपने

क्योंकि वे जानती हैं

उनके कीचड़ में डूबने से ही

महक उठेगा धान की बालियों से भरा खेत।

11

चाँद, पानी और सीता -अरुण देव 

स्त्रियाँ अर्घ्य दे रही हैं चंद्रमा को

पृथ्वी ने चंद्रमा को स्त्रियों के हाथों जल भेजा है
कि नर्म मुलायम रहे उसकी मिट्टी
कि उसके अमावस में भी पूर्णिमा का अंकुरण होता रहे

लोटे से धीरे-धीरे गिरते जल से होकर आ रही हैं चंद्रमा की किरणें
जल छू रहा है उजाले को
उजाला जल से बाहर आकर कुछ और ही हो गया है
बीज भी तो धरती से खिलकर कुछ और हो जाता है

घुटनों तक जल में डूबी स्त्रियों को
धान रोपते हुए, भविष्य उगाते हुए सूर्य देखता है
देखता है चंद्रमा

स्त्रियाँ सूरज को भी देती हैं जल, जल में बैठ कर
कि हर रात के बात वह लौटे अपने प्रकाश के साथ

धरती पर पौधे को पहला जल किसी स्त्री ने ही दिया होगा
तभी तो अभी भी हरी भरी है पृथ्वी
स्त्रियाँ पृथ्वी हैं

रत्न की तरह नहीं निकली वें
न ही थी किसी मटके में जनक के लिए

अगर और लज्जित करोगे
लौट जाएँगी अपने घर

हे राम !
क्या करोगे तब...

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