Thursday, 10 January 2019

मेरा बच्चा हमीं से अनजान क्यूँ है...! -राजीव रंजन प्रसाद

मेरा बच्चा हमीं से अनजान क्यूँ है...! : राजीव रंजन प्रसाद

हमसब छुटपन में बड़ी सफाई से लकड़ी को काँट-छाँटकर, छिल-छालकर गुली-डंडे बनाने का काम कर लिया करते थे। बच्चों के लिए जो तिपहिया गाड़ी बनती थी; क्या भली सवारी थी। छोटे-छोटे किन्तु गोलमटोल अंटों की आपसी टकराहट से दिनभर गुँजार रहता था। कबड्डी, छुआ-छुअंत, बाघ-बकरी, आइस-पाइस, असेरी-पसेरी, पिट्ठों आदि उन दिनों हमारी मासूम जरूरियात या कहें शौक का असली साधन-संसाधन थं। चार लड़कियाँ मिली नहीं कि कित्तकित्ता खेलने लगती; रस्सी फांगने-कुदने लगती थीं। बाज़ार और उपभोक्ता समाज उस समय हाशिए पर क्या; हम-सबके जेहन में था ही नहीं।

इक्कीसवीं सदी में शास्त्र का ज्ञान बढ़े हैं। शास्त्रियों की संख्या बढ़ी है। आधुनिकता और उत्तर आधुनिकता को लेकर अकादमिक बहस की शुरुआत हुई है। स्त्री-विमर्श और दलित-विमर्श ने हालीय दशक में अपना एक मजबूत मुकाम हासिल किया है। लेकिन इस घेरे में हमारे घर और घरौंदे नहीं हैं; हमारे बच्चों के लिए सुचिंतित और सुविचारित विकल्प नहीं है। बच्चों को अब फुलझड़ी, गुब्बारे, गुड्डे-गुड्डियाँ कम लुभाते हैं। अब उनकी माँग में नकली ही सही परन्तु बंदूके, राइफल, मिशिनगन आदि प्रमुख हो चले हैं। प्रत्यक्षतः बाल-मनोविज्ञान, बाल-मन और बाल-कर्म के लिए भी एक संगठन-समवाय चाहिए जिसका भारत में इस घड़ी अकाल है। नतीजतन, बच्चे बड़ी जल्दी सयाने हो जा रहे हैं। उनका बचपना आँख झपकते बीत जा रहा है।

आजकल ‘स्मार्ट’ शब्द खूब चलन में है। इसकी लोकप्रियता का आलम यह है कि औद्योगिकीकरण, शहरीकरण, बाज़ारीकरण, ब्रांडीकरण आदि अब स्मार्टीकरण के नक़्शेकदम पर हैं। आधुनिक तकनीकी एवं प्रौद्योगिकी का आपसी गणित इतना बेजोड़ है कि हर कोई डिजीटल क्रांति का राग अलाप रहा है। यद्यपि इससे फायदे बेशुमार हुए हैं तथापि स्मार्टफोन, टैबलेट, ई-रीडर्स, लैपटाॅप जैसे गैजेट्स ने नई पीढ़ी की एकाग्रता व गहरे चिंतन की स्वाभाविक क्षमता को भयानक तरीके से क्षतिग्रस्त किया है। सयाने बच्चे इस विडम्बना और त्रास का सबसे अधिक शिकार है।

दरअसल, बच्चों को लेकर हमारा नज़रिया बेहद चलताऊ है, तो रवैया बहुरूपिया है। इस दूषित नज़रिए और रवैए ने बच्चों को कार्टूनजीवी बना दिया है। उन्हें पिकाचू पसंद है। पोकेमाॅन उनका पाॅकेट मान्स्टर है जिसे जेबी दानव भी कहा जाता है। आज हमारे बच्चे हमसे नहीं हम जैसों के प्रतिरूपों से अपनापा और दोस्ताना गाँठने लगे हैं; उन्हें अधिक सम्मान की दृष्टि से देख रहे हैं और उन्हें अपने द्वारा अपनी तरह से दुलारते भी खूब हैं। यही नहीं अब उनकी बालसुलभ हरकतों में कार्टूनी पात्र एवं चरित्र परोक्ष अथवा प्रत्यक्ष ढंग से स्पष्ट दिखाई देने लगे हैं।

ऐसी नाजुक घड़ी में बच्चों के लिए सुरुचिपूर्ण और सर्जनात्मक लेखन अत्यावश्यक है। क्योंकि बच्चों के लिए लिखना बाजार और सत्ता के खि़लाफ बोलने-लिखने से कमतर नहीं है! बच्चे हमारे भविष्य की मूल कड़ी हैं। अतः वर्तमान में उनकी ओर हमारा विशेष ध्यान देना जरूरी है। आजकल अधिसंख्य माता-पिता एवं अभिभावकों की आदत-सी बन गई है, हर विचार को आँकड़ेबाजी और फार्मूलेबाजी के गणित अथवा समीकरण में फांस लेना, घसीट लेना। वे बच्चों के मेरिट इंडेक्स का ग्राफ ऊँचा अवश्य चाहते हैं; लेकिन उनके द्वारा किए गए अभ्यास अथवा सीखे हुए अनुभव को सुनने-समझने का धैर्य नहीं रख पाते है।

अफसोस! कि अपने बच्चों को लेकर, किशोरों को लेकर हम-सबके भीतर छटपटाहट और चिंताएँ अधिक हैं; किन्तु समुचित कार्रवाई कम या कहें बिल्कुल नगण्य। दरअसल, बच्चों की अंतःप्रकृति एवं मनोजागतिक अभिरचना के निर्माण में सहायक सामाजिक सोच तथा अकादमिक गतिविधियाँ पर्याप्त हरग़िज नहीं है। यानी बच्चों और किशोरों के लिए माकुल भाषा, विचार, दृष्टिकोण, माध्यम, दिशा, लक्ष्य, गतिविधि, कार्यकलाप, प्रयोग, प्रेक्षण, अनुभव, अंतःक्रिया, कल्पना, स्वप्न आदि जितने भी संस्तर शैक्षणिक एवं अकादमिक प्रविधि के रूप में मौजूद हैं, उनमें मौलिक सर्जना, स्वतंत्र निर्णय, अधिकारसम्मत ज्ञान का पूर्णतया अभाव है।

अतएव, इस बदलते समय में हमारे बच्चों का मानस कैसा तैयार हो रहा है? उनकी निर्मिति में देश, काल, परिवेश, परम्परा, संस्कृति, समाज आदि का योगदान क्या और किस तरह का है? जरा ठहरकर इस बारे में चिंतन करना अत्यावश्यक हो गया है। दरअसल, हमारे बच्चे जिस भाषा और लहजे में आजकल अपनी मांग और फरमाइश रखने लगे हैं; जिद और कभी-कभी तो अनचाहा आक्रमण तक करने लगे है; वह बेहद चिंतनीय परंतु गौरतलब है। बच्चों के बोल-बर्ताव, व्यक्तित्व-व्यवहार, पसंद-नापसंद आदि का ढर्रा बड़ी तेजी से बदला है। इस अनपेक्षित बदलाव की मुख्य वजहें क्या हैं? यह जानना जरूरी है। प्रायः बच्चों में एक ऐब समान रूप से लग चुकी है कि वे कार्टूनजीवी हो चले हैं, तो किशोरवय छोटे उम्र से ही तेज संगीत सुनने और आधुनिकतम मौज-मस्ती के ठिकानों(रेव पार्टी, डिस्कोथिक, क्लब, बार, रेस्टोरेंट इत्यादि) में बेसुध नजर आ रहे हैं।

हर चीज वह चाहे सामाजिक रूप से मान्य हो या अमान्य, उचित हो या अनुचित, नैतिक हो या अनैतिक, हमारे बच्चे और किशोर उनमें अंतर करना भूलते जा रहे हैं; पारिवारिक-सामाजिक रिश्तों की कद्रदानी, मोह और ममता में हम-सबने अपना बचपन गुजारा है; परिवार के लिए व्यक्तिगत इच्छाओं-आकांक्षाओं को समेटते हुए हम नित अपनी सोच और स्वप्न में आगे बढ़े हैं, जबकि आज के नौनिहाल उसे ठेंगा दिखा रहे हैं, हमारे सदाचरणी पाठ, अनुशासन और सहज मानवीय संस्कार तक को वे अपनी आधुनिक(?) भाषा में ‘आउटडेटेड’ बता रहे हैं। हमसब जिन पारिवारिक-सामाजिक संस्कारों पर पेट के बल लोटते थे; वे अब हमारे बच्चों अथवा किशोरों को रास नहीं आ रहे हैं। यह माज़रा तकलीफदेह है। उससे भी तकलीफ़जनक पहलू यह है कि प्रायः बच्चों की दुनिया में हमसब अपनी आत्मा के साथ नहीं, अपने पद, रुतबे और हैसियत के साथ दाखिल होना चाहते हैं।

यह घुसपैठ बच्चों की आत्मा पर चोट है। नतीजतन, पर्याप्त दुलार और लाड़-प्यार के अभाव में बच्चे खुद अपने माता-पिता और अन्य पारिवारिक सदस्यों के साथ दूरी बनाने लगते हैं। यह कटाव बच्चों के प्रति माता-पिता के लगाव में कमी होने का नतीजा है। बच्चों का मानस अजीबोगरीब व्यवहार करने लगता है। उनके दिमाग में अपने पैरेंटस की नकारात्मक छवि अंकित हो जाती है। वे माता-पिता को देखते ही सहम जाते हैं। लिहाजा, बच्चों और अभिभावकों के बीच संवादहीनता की स्थिति उत्पन्न हो जाती है। यही आगे चलकर ‘जैनरेशन गैप’ बन जाता है। हम अक्सर उन पर गुमराह और अपसंस्कृतियों का शिकार हो जाने का आरोप मढ़ते हैं; लेकिन हम अपने खि़लाफ कोई कार्रवाई या कि चार्जशीट दायर नहीं करते हैं। ऐसा क्यों? इसका जवाब बच्चों से अधिक गार्जियन के लिए मायनेपूर्ण है; क्योंकि हमारे बच्चे हम-सबकी इन्हीं छोटी-छोटी आदतों या कि व्यवहार से सर्वाधिक आहत होते हैं।

इसलिए यह समझना आवश्यक है कि जिन बातों को हम प्रायः मामूली मानकर नजरअंदाज कर देते हैं; वे मासूम और अबोध बच्चों को सबसे ज्यादा चोटिल और उनके मन-मस्तिष्क को दुखी करने वाले होते हैं। सबसे बड़ी दिक्कतदारी यह है कि बाजार और सत्ता के खिलाफ अधिसंख्य लोग बोलने, मुहिम छेड़ने, आंदोलनरत रहने की बातें पूरजोर ताकत संग कहते-सुनते हैं; लेकिन जब हम अपने घर के बच्चों का रिपोर्ट कार्ड देखते हैं, तो लाल-पिले होते हैं कि इस बार शत-प्रतिशत अंक क्यों नहीं लाए? सचाई यह है कि अब हमसब अपने बच्चों की ‘सोशल टीआरपी’ तय करने लगे हैं; उनकी योग्यता और काबिलियत का ‘प्रोफेशनल वैल्यू’ बनाने लगे हैं। आज हमारा बच्चा ‘क’ से कबूतर नहीं, ‘क’ से कंप्यूटर कहना सीख गया है; वह सहज अभिवादन की जगह औपचारिक हैलो-हाय करने लगा है? क्या हमने इस ‘वर्ड टरमिनेशन’ की आधुनिक संस्कृति पर गौर फ़रमाया है? मुख्य बात यह है कि जब हमारे बच्चे हमारी अपनी ही भाषा में रींज-भींज नहीं रहे हैं, खिल-पक नहीं रहे हैं, तो सयाने होकर वे हम-सबको वृद्धाश्रम नहीं भेजेंगे, तो क्या आठों पहर आरती उतारेंगे?

दिनकर-देसे ‘ब्रह्मपुत्र को देखा है’! : डाॅ. राजीव रंजन प्रसाद

दिनकर-देसे ‘ब्रह्मपुत्र को देखा है’! : डाॅ. राजीव रंजन प्रसाद
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(विश्व हिंदी दिवस के दिन अपने प्रिय कवि दिनकर कुमार जिनसे हठात् मुलाकात हुई और मन में गहरे धंस गए के लिए; सादर! )

साहित्य चेतस मनुष्य को परदुःखकातर और द्रवणशील बनाता है। असम प्रांत के सशक्त हिंदी-असमिया कवि दिनकर कुमार के लिखे से इस बात की तसदीक हो जाती है, जब वे कहते हैं-‘मैं कई बार बना हूँ माँझी/गाया है शोकगीत’। वे माँझी जिस नदी का हैं उसका इतिहास पुराना और सन्दर्भ ऐतिहासिक है। वे शिद्दत और शाइस्तगी से उनका हवाला हमारे सामने रख देते हैं-‘रेत पर लिखे गए सारे अक्षर/उसी तरह उजड़ते हैं जैसे उजड़ती हैं सभ्यताएँ/आहोम राजाओं को मैंने देखा है/अंजुली में जल भरकर पिंडदान करते हुए/मैंने कामरूप को देखा है/चीन का यायावर ह्वेनसांग उमानंद पर्वत पर/मिला था/उसकी आँखें भीगी हुई थी/हाथों में ढेर सारे फूल और जेब में /पुरानी पांडुलिपियाँ/ह्वेनसांग रास्ता भूल गया था’।

लोक-हृदयी कवि दिनकर तथ्य, तकनीक, विज्ञान और प्रयोग आधारित इस युग का सच जानते हैं। इसलिए वे आधुनिक सन्दर्भ देना नहीं भूलते हैं जिससे पाठक का सामान्य ज्ञान नहीं अंतर्मन संवेदित-संतुष्ट हो सके। उनकी लम्बी कविता ‘उद्गम स्थल की खोज’ का वृत्तांत देखिए-‘एक सौ मील के दायरे में जलधारा का दस हजार फीट/नीचे उतरना एक रहस्य था जिसके आधार पर/कल्पना की गई कि जरूर कहीं/विश्व का सबसे बड़ा जलप्रपात होगा/उसका नाम रखा गया ‘ब्रह्मपुत्र फाल्स’/इस काल्पनिक जल-प्रपात की खोज शुरू हो गई/वार्ड और कोडोर ने आखिरकार इस रहस्य की/खोज की/वे पहुँचे उद्गम स्थल पर/उन्होंने पहचान लिया ब्रह्मपुत्र का सम्पूर्ण गति पथ/तिब्बत से बहकर आने वाली सांगपो/अरुणाचल में दिहांग के साथ मिल जाती है/वही दिहांग असम में दिबांग और लुइत के साथ/एकाकार हो जाती है/उसका नाम रखा जाता है-ब्रह्मपुत्र’।

कवि दिनकर कुमार बोधि प्रकाशन से प्रकाशित अपने काव्य संग्रह ‘ब्रह्मपुत्र को देखा है’ में ब्रह्मपुत्र की विशालता, विराटता और प्राचीनता को देखने का दावा करते हैं, तो मन में जिज्ञासा कलोल भरती है,-‘आखिर इस कवि के पास ऐसा कौन-सा टेलीस्कोप है जो उसकी दृष्टि को इतना दूरदर्शी बना देती हैं!’ मर्मस्पर्शी चित्रण जिससे गुजरते हुए कलेजा दो-टुक हो जाता है; की वेदना देखिए-‘किस तरह एक दरिद्र किसान मनौती मानता है/प्रार्थना करता है-मनबाहु ब्रह्मपुत्र-/अगर क्रुद्ध हो गए, तो किसान के सपने बह जाते हैं/ढोर और झोपड़ी-नवजात शिशु और/बांसुरी बजाने वाला चरवाहा लड़का/ले लेते हैं जल-समाधि’।

उत्तर आधुनिक मित्रता के अपनापे में गलबहियाँ करती नई पीढ़ी क्या इस दर्द, टीस, हूक, कसक को बूझ पाएगी; यदि नहीं तो यह खतरे की निशानी है। जो नदी के खतरे के निशान पर चढ़ने से भी अधिक भयावह और त्रासद है। इन दिनों जनगाथा से उलट लिखे-पढ़े के इतिहास को ऊँट बनाकर इस-उस करवट बिठाने की जो विध-विधि अपनाई जा रही है, वह सर्वथा ग़लत है। समय रहते अपनी ग़लती में सुधार किए बिना हममें से किसी का बच पाना मुश्किल है। खेत, चरवाहे, किसान, आदिवासी, कारीगर, मजदूर, शिल्पी, लेखक, कवि इत्यादि जिनको नज़रअंदाज करना मौजूदा समय-समाज का शगल है; कुछ भी नहीं बचेगा।

जातिवादी मानसिकता एवं भ्रष्ट आचरण वाले लोगों की कारस्तानियों-करतूतों को छोड़ दें, तो अधिसंख्य पुरनिया बचे रहे क्योंकि उन्होंने अतीत को जिया ही नहीं उसे समुचित आदर-सम्मान भी दिया। आज की लखटकिया माहवारी वाली मुझ जैसी पीढ़ी को लानत है जो कायदे से अपने घर और परिवार को नहीं जानते, वो क्या और कहाँ जान सकेंगे ब्रह्मपुत्र की तलछटी, कछार और उसके तीर पर बसे लोगों का दुःख-दर्द, टीस-हूक, आफ़त और बेचैनी। कवि दिनकर उनको महसूसते हैं क्योंकि वे उनके बीच रहते हैं। स्त्री का आत्मा-शरीर लिए किन्तु गणिकाओं के वेश में जो आकार-आकृति ब्रह्मपुत्र से साक्षात्कार करती है, उनके लिए कवि का शब्द कितना जीवंत है, ‘ब्रह्मपुत्र का जल एक-दूसरे पर उछालती हुई गणिकाएँ/धोने की कोशिश करती हैं विवशता को/थकान को अनिद्रा को कलेजे की पीड़ा को/भूलने की कोशिश करती हैं रात भर की यंत्रणा को/नारी बनकर पैदा होने के अभिशाप को’।

ब्रह्मपुत्र को कवि ‘बाबा’ शब्द से सम्बोधित करता है, तो वह आत्मीयता के साथ पुरातनता का भी द्योतक है। यह नजदीकीपन राग-वैराग दोनों का साक्षी; उल्लास-बिछोह दोनों का गवाह है। दिनकर कुमार के कहन का ढंग तो देखिए, ‘बाबा ब्रह्मपुत्र!/मैं चाहता हूँ कि जब मैं गाऊँ तो/तुम भी मेरे संग मग्न होकर गाओ/ मेरे सीने में लहराता हुआ वैशाख/तुम्हारे चेहरे पर भी गुलाल बनकर बिखर जाए/अमलतास के लाल लपटों से खुशी के अक्षर/आसमान पर उभर जाएँ!’। स्मृति से विरत और अनुभव से खाली हम जैसे लोग सांस लेने के बावजूद हवा की गंध महसूसना नहीं जानते, धूप सेंकने के बावजूद धूप को अपने चित्त पर परावर्तित होने देना नहीं चाहते हैं। हमारे लिए हमारी कृत्रिम सजावट और बनावटीपन ही यथार्थ है, अपना सर्वस्व है। आभासी दुनिया की चुहल और फंतासी ही हमारे मनुष्य होने की निशानी है; ऐसे में दिनकर कुमार की ‘ब्रह्मपुत्र में सूर्यास्त’ कविता एकबारगी हमें झकझोरने लगती है, ‘रंगों का गुलाल/मेरे वजूद पर भी बिखर गया है/नारी की आकृति वाली पहाड़ी के नीले रेंग के साथ/लाल रंग घुल गया है/दूर बढ़ती हुई नाव सुनहली बन गई है/इस अलौकिक पल की कैद से/मैं मुक्त होना नहीं चाहता/इस रहस्यमी दृश्यावली से दूर/होकर मैं कहीं नहीं रह सकता।’

ब्रह्मपुत्र का अतीत सदानीरा रहा है। यह नदी झूठा आश्वासन या फ़रेबी दिलासा देने की आदी नहीं है। कवि समय के प्रायोजित उपक्रम और शोषण-उत्पीड़न के आधुनिक कुचक्रों के बीच नदी को असहाय जान बिफर पड़ता है, ‘एक प्राचीन नदी इस कदर तटस्थ कैसे हो सकती है/कुछ बोले बगैर विरोध जतलाए बगैर/चुपचाप कैसे बहती रह सकती है/कैसे सुन सकती है किनारे के लोगों का हाहाकार’। यह किनारा सामाजिक हाशिया है और सीमान्त का क्षेत्र भी जो कई बार अपने भूगोल के नाते भी 'बहिष्कृत भारत' मानिंद जान पड़ता है। ऐसे में नदी ही उसका बिस्तर-बिछौना, माथ-ललाट है। बकौल कवि ‘नदी समझती है मांझी की अनुभूतियों को/मौन में घुली हुई शिकायत को/सीने में पलते हुए प्रेम को विद्रोह को/नदी समझती है सबकुछ’। दिनकर यहीं नहीं रूकते जन-मन के साथ नदी के साहचर्य-सम्बन्धन को एक बीजरूप प्रदान करते हुए कहते हैं-‘नदी की जीवन कथा असल में हमारी जीवन कथा होती है।’

नदी जब राग बनती है, तो गले में समा जाती है। भूपेन हजारिका के लिए ब्रह्मपुत्र ‘बूढ़ लुइत’ है। कवि के शब्दों में ‘जो हाहाकार को सुनते हुए भी/ख़ामोश रहता है’। भूपेन हजारिका की स्मृति में ब्रह्मपुत्र को याद करते हुए कवि कहता है-‘भूपेन हजारिका के गीतों में स्पंदित है/ब्रह्मपुत्र उसके विविध रंग/उसकी प्रसन्नता उसका शोक उसका क्रोध।’ दरअसल,आदमी को इंसानी रुह बख़्शने का काम नदी बड़े जतन से करती है। वह सचमुच में ‘कनेक्टिंग पीपुुल्स’ है। नदी का स्वभाव इतना ‘केयरिंग’ है कि कोई भी उसके किनारे पर सर रख कर उसका आशीष पा सकता है। ब्रह्मपुत्र के आश्रय में जो भी जाता है अपनी कुंठा, विषाद, दुःख, संताप, भूल, ग़लती सबकुछ से बरी यानी मुक्त हो जाता है। दिनकर इसीलिए यह कहने के आग्रही हैं अपनी कविता ‘नदी के पास जाऊँगा' में-‘प्रेम में डूबने के बाद/नदी के पास जाऊँगा/नदी मुझे बना देगी मोहक/मेरे अंदर की सारी कलुषता को/अपने संग बहाकर ले जाएगी’।

बतौर कवि दिनकर कुमार ब्रह्मपुत्र की नक्काशी जबर्दस्त करते हैं; उनके चित्रण और वर्णन इतने स्वाभाविक हैं कि हम सहज ही अंतरंग हो जाते हैं। देखिए, हाथ कंगन को आरसी क्या!-‘शाम होते ही इसी तरह धूसर हो जाता है चित्र/बगुलों का झुंड पंख फड़फड़ाता हुआ/इस पार से उस पार तक उड़ता जाता है/जलधारा में हिलते रहते हैं पंखों के प्रतिबिम्ब’। इन्हीं सब कारणों से ब्रह्मपुत्र जनजातीय स्मृतियों में गहरे बसा हुआ है जिसकी चेतन-अचेतन अभिव्यक्ति सायास-अनायास होते रहते हैं। कवि ने इस ओर संकेत करते हुए अपनी कविता ‘जनजातीय स्मृतियों से’ में लिखा है-‘सोनेवाल कछारी समुदाय आज भी अपने मृतक की/अंत्येष्टि करते समय गाड़ता है तांबे का एक सिक्का/चूँकि वह सारी भूमि पर तुम्हारा ही अधिकार समझता है/और इस तरह अंत्येष्टि के लिए खरीदता है/तुमसे थोड़ी सी ज़मीन/यह समुदाय अपने गाँवों के नाम किसी न किसी/उपनदी के नाम पर रखता है।/जनजातीय स्मृतियों से जुड़े हुए हो तुम ब्रह्मपुत्र।’ ब्रह्मपुत्र नदी लोकमन की धड़कन है, संगीत और आवाज है; जो हरदम अपनी ही धुन, लय, राग में बजती है; बजना जानती है। कवि दिनकर की पंक्तियाँ इसकी बानगी पेश करते हुए कहती हैं-‘शराईघाट पुल के उत्तरी छोर से/मैं देख रहा हूँ रोशनी की लकीरों को/रहस्यमयी शाम को ओढ़कर गुमसुम है शहर/स्याह जलधारा में/दूर-दूर तक फैली हुई लकीरें/इन तिलिस्मी लकीरों में ही मानो/धड़कता है मेरे शहर का हृदय’।

फिलहाल, मात्र सतरटकिया मूल्य वाले इस काव्य-संग्रह का पेपरबैक संस्करण आप खुद पढ़ें, तो मालूम चलेगा कि ब्रह्मपुत्र का रंग इतना गाढ़ा, धूसर और लालिमा लिए क्यों है! कभी-कभर नदी उदास क्यों हो जाती है? कवि दिनकर के लिए नहीं, तो ब्रह्मपुत्र के लिए तो हमारा इतना मानुष होना वाज़िब बनता है। तभी हम जान पाएँगे कि-‘किस बात की पीड़ा है जो/नदी को बेचैन रखती है/क्यों चाहती है वह/प्यार के दो मीठे बोल/थोड़ी सी हमदर्दी’।

हैलो, क्या आप हिंदी बोलते हैं; नमस्ते...! - डाॅ. राजीव रंजन प्रसाद

हैलो, क्या आप हिंदी बोलते हैं; नमस्ते...!

नवाधुनिक विधानों एवं नवाचारी अनुशासनों में हिंदी भाषा सहज ही स्वीकार्य है। हिंदी की ‘रेंज’ बहुत अधिक है। वैश्विक बनती हिंदी चुनावी भाषणों, ख़रीद-बिक्री सम्बन्धी सामान्य बातचीतों, नितांत निजी अथवा घरेलू राय-विचारों, सामान्य-विशेष बहस-मुबाहिसों आदि की पटरी पर सरपट दौड़ रही है। इसके अतिरिक्त नवमाध्यमों यानी ‘न्यू मीडिया’ एवं ‘वर्चुअल मीडिया’ में भी उसकी भूमिका देखने योग्य है। संचार-क्रांति और सूचना-राजमार्ग वाली इस उत्तर शती में भारतीय भाषा का वैश्विक वितान ‘हिन्दी-समय’ ही है। यह राष्ट्रीय ही नहीं अन्तरराष्ट्रीय दबाव है कि हिंदी बौद्धिकता अंग्रेजी ‘आईपीआर’ (इंटेलेक्चुअल प्रोपर्टी राइट) को सीधे टक्कर दे रही है।

रोजगारपरक और कौशल-निर्माणकारी भाषा की खोज में उभरे हिंदी के प्रयोजनमूलक स्वरूप को देखें, तो इक्कीसवीं सदी का भारत आज जिस ज़बान में जवान होता दिखाई दे रहा है, वह प्रयोजनमूलक हिंदी ही है। चुनाव से बड़ा उदाहरण और क्या हो सकता है। अंग्रेजी के जानकर, प्रबंधक, बौद्धिक चाहे जो कुछ भी कर ले; चुनाव की भाषा यानी ‘मीडियम आॅफ स्पीच’ हिंदी की जगह अंग्रेजी नहीं हो सकती है। इसी प्रकार फ़िल्म, विज्ञापन, समाचार एवं मनोरंजन माध्यम आदि में हिंदी की पैठ एवं ठाठ जबर्दस्त है। ‘न्यू मीडिया’ की खूबियों को पूरी तरह आत्मसात कर चुकी हिंदी भाषा को जानने, देखने, समझने की जो नयी परिपाटी शुरू हुई है, उसका एक बड़ा उपभोक्ता-वर्ग हिंदी जनसमाज है। यूनीकोडी सोशल मीडिया ने तो झमाझमी मचा दी है। यथा: वेब, ब्लाॅग, ट्वीटर, फेसबुक, वाट्सअप, हैंगआउट, हैशटैग इत्यादि।

यह समय अपनी हिंदी भाषा को लेकर रुदाली-गान करने का नहीं है। अंग्रेजी की आलोचना करने की जगह आज आवश्यकता अन्तरभाषायी तथा अन्तरानुशासनिक हिंदी अनुवाद की दिशा में उत्तरोत्तर आगे बढ़ने की है। साहित्य, कला, विज्ञान, प्रौद्योगिकी इत्यादि से सम्बन्धित ज्ञानानुशासनों को हिंदी में लेकर आना हिंदी भाषा के वैश्विक महत्त्व एवं पहचान को केन्द्रीयता प्रदान करना है। जनपक्षधरता की दृष्टि से अंग्रेजी ही नहीं, संविधान की आठवीं अनुसूची में वर्णित सभी राष्ट्रीय भाषाओं का अनुवाद सम्बन्धी कार्य महत्त्वपूर्ण है। विशेषतया विभिन्न देशज भाषाओं में उपलब्ध ज्ञान-सामग्रियों का हिंदी में संग्रहण-संकलन अत्यावश्यक है। यह कार्य स्वाधीनतापूर्व बड़े जतन से किया गया।

यह और बात है, आजादी से पहले जिस हिन्दुस्तानी ज़बान ने देश की गरिमा और उसका गौरवगान कायम रखा था, स्वाधीन भारत में उसे वह सर्वोचित स्थान नहीं मिला। बहुभाषिक तथा बहुसांस्कृतिक भारतीय जनसमाज में हिंदी के महत्त्व को इरादतन कम कर दर्शाना अंग्रेजीपठित भारतीय नेताओं की सोची-समझी चाल थी। बाद के दिनों में हिंदी भाषा को लेकर जो विवाद-विरोध शुरू हुए उसे भाषिक राजनीति कहा जाना उचित है। भाषा को लेकर वितंडावाद खड़े करने वाले अधिसंख्य नेताओं को अपनी-अपनी मातृभाषाओं से लगाववृत्ति न होकर उनमें राजनीतिक हित-लाभ साधने की छटपटाहट और महत्त्वाकांक्षा अधिक थी। हाल के दिनों तक संयुक्त राष्ट्रसंघ में हिंदी भाषा को शामिल किए जाने को लेकर चर्चे खूब हुए; लेकिन हिंदी की दशा और दिशा में आमूल-चूल परिवर्तन नहीं हुआ।

ध्यातव्य है कि हम आज को लेकर अतीत के कालक्रमों पर अपना मनगढ़त आरोप मढ़ते हैं। जबकि अंग्रेजी का दबदबा अंग्रेजी राज में भी वैसी सम्मानित स्थिति में कभी नहीं रहा जिस प्रभुमान स्थिति में आज है। दरअसल, ‘‘जब अंग्रेजी शिक्षा और सभ्यता भारत के चिंतनशील लोगों के बीच में आई, उन्होंने बजाए इसके कि इसके साथ बह जाएँ, अपने अतीत की ओर देखना आरंभ किया। इससे एक नए जागरण का युग प्रारंभ हुआ।’’ स्वाधीनता आन्दोलन के दिनों में उपलब्ध उन सभी माध्यमों को आज़माया गया जिसमें भारतीयता की जान बसती हो, राष्ट्रीयता की चेतना अनुस्यूत हो। समाचारपत्र-पत्रिकाओं से कहीं अधिक बेजोड़ करतब दिखाने का काम ‘आकाशवाणी’ और स्वाधीनता के पश्चात ‘दूरदर्शन’ ने किया।

विशेषतया ‘‘इसके लिए आकाशवाणी का माध्यम सबसे सबल और प्रबल माध्यम है। क्योंकि अनेक बोलियों में, अनेक भाषाओं में प्रसारण इस संस्थान के द्वारा होता है लेकिन अभिव्यक्ति इतनी भाषाओं में, इतनी बोलियों में, मुद्रण के माध्यम से भी नहीं होती जितनी कि इसके माध्यम से होती है और इसमें अपनी अभिव्यक्ति की विविध शैलियाँ हैं जैसे कि जो आकाशवाणी के हमारे किसानों के लिए कार्यक्रम होते हैं, हमारे श्रमिकों के लिए कार्यक्रम होते हैं या अन्य विशेष वर्गों के लिए जो कार्यक्रम होते हैं उनमें ऐसी अभिव्यक्ति-शैली अपनाई जाती है जो उन तक बात पहुँचा सके।’’

स्मृतिभ्रंशता के इस मुश्किल दौर में विभिन्न समाज एवं संस्कृतियों के बीच एक सेतु बनाए जाने की आवश्यकता महसूस की जा रही है। हिंदी अपनी जनपक्षधर प्रकृति के कारण यह सेतु बन भी रही है। ध्यातव्य है कि भारतीय परिक्षेत्र से बाहर और भारत के सभी क्षेत्रों में हिन्दी समझी जाती है। समझे जाने का मतलब वह भाषा जिसे बहुत सारे लोग बोलते हैं; अपने भाव, विचार एवं दृष्टि में बड़ी आसानी से बरतते हैं। यह सहजता हिन्दी भाषा की खूबसूरती है यानी प्राणतत्त्व। हिन्दी भाषा की लिपि देवनागरी है। हिन्दी लिखावट और उच्चार दोनों में सादृश्यता रखती है। इस भाषिक वैशैष्टिय के कारण यह बेहद सुघड़ और सजीव भाषा है।

‘कर ले ग़लती से मिस्टेक’ वाली ‘मस्टेकियन’ पीढ़ी को यह समझना ही होगा कि हिंदी भाषा जिसे नवजागरणकाल में बखूबी गढ़ा गया; में प्रतिरोध की चेतना और आत्मबल की शक्ति प्रचुर मात्रा में सन्निहित थी। यह शक्ति ओजमान और तेजमान थी इसलिए भारतीय स्वाधीनता आन्दोलन में हिंदी पत्रकारिता के अवदान एवं योगदान को लेकर बहुत कुछ कहने-सुनने को शेष है। इक्कीसवीं सदी में पैदा और विकसित हुई पीढ़ी को ध्यान में रखकर कहें, तो हमें अपनी भाषा-संस्कृति और उसमें घुली-मिली राजनीतिक चेतना को लेकर संवेदनशील होने-बनने की जरूरत सबसे अधिक है। युवाओं पर अतिरिक्त बल इस कारणवश कि, ‘‘जिस दुनिया में हम जी रहे हैं, वह बुद्धिजीवी-पैगम्बरों की दुनिया है, स्वार्थ में डूबे हुए व्यक्तियों की दुनिया है। वह ऐसी दुनिया है, जिसमें औद्योगिक और पूँजीवाद से निकली एक भयानक पद्धति राज कर रही है। जिसमें तकनीकी सफलताओं और बाहरी जीतों की धूम है, जिसमें शारीरिक सुविधाओं और अवास्तविक विलासिता सामग्री की बाढ़ है, जहाँ सार्वजनिक जीवन में भी अनियंत्रित लिप्सा का अनंत साम्राज्य है। जहाँ पाशविकता और रक्तपात का सहारा लेकर तानाशाही फैल रही है, जहाँ वास्तविकता का आदर एवं धर्म तथा आत्मा की उपेक्षा सबसे बड़ा आधार है।’’

अतएव, अधिसंख्य भारतीय भाषाओं के समक्ष अपने को बचाए रखने की जद्दोजहद जबर्दस्त है। हमने निज भाषा से सृजित माध्यम-संस्कृति जिसमें एक-दूसरे से जुड़ने या जुड़े रहने की अभ्यर्थना होती है; का परित्याग कर दिया है। अंग्रेजी की आरोपित माध्यम-संस्कृति ने भारतीय भाषा के सत्यानाश का महानुष्ठान जारी रखा है। लेकिन यह सच है, कोई भी अनुष्ठान दीर्घजीवी नहीं होता है। प्रत्येक भाषा न तो मन की कैदी है, न विचार की बंदी। यह तो अनुभूति, प्रत्यक्ष ज्ञान, आचरण और उन्मुक्त आदान-प्रदान पर आधारित ‘वार्ता-कौशल’ है। यह कौशल अथवा प्रवीणता अर्जित है न कि प्रकृत। इस कारणवश इसका स्वरूप किंचित मात्र भी पूर्व-निर्धारित या नियंत्रित नहीं है। आज हिंदी भाषा ऐसे वितण्डावादियों को धूल चटा चुकी है। वह पूरे विश्व में ज्ञान की भाषा बनने के लिए दृढ़संकल्पित है। हिंदी में भाषिक दक्षता, कुशलता, प्रयोग, अनुप्रयोग, प्रकृति, प्रयुक्ति आदि का समाजशास्त्र बदल चुका है। अर्थशास्त्र इसकी चेरी है। विज्ञापन हो या फिल्म, हाट-बाज़ार हो या उत्तर-दक्षिण हिंदी सबको जोड़ने में सफल है। हिंदी अन्य प्रदेशों की मातृभाषाओं के संग-साथ राष्ट्र-निर्माण में जुटी है।

-डाॅ. राजीव रंजन प्रसाद

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सर गणेश दत्त