साहित्यिक -सांस्कृतिक ई पत्रिका
एक छत जिसे दुनिया पिता कहती है। एक दीवार जो माँ कहलाती है। इस घर की खिड़की कितनी हसीन दिखती है ये दुनिया....
जब से घर से निकला हूँ....दुनिया का चेहरा स्याह पड़ता जा रहा है। दूर से मेरा घर आज हसीन नज़र आ रहा है।...
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