Sunday, 5 August 2018

असित कुमार मिश्र की कहानी ये कहानी फिर सही

ये कहानी फ़िर सही.../ असित कुमार मिश्र

इस साल जेठ की गर्म हवाओं के झोकों ने ज़िन्दगी के कुछ पन्ने ज़रा जल्दी पलट दिए।उन पन्नों में खुद के ही विवाह के कुछ अवतरण भी थे। उन अवतरणों में मित्र रिवेश प्रताप सिंह जी के साथ लैक्मे की लिपिस्टिक और शिल्पा की बिंदी ख़रीदने जैसा कठोर निर्णय भी शामिल था तो शेरवानी जैसे एकदिवसीय वस्त्रों के लिए हज़ारों रुपए अपव्यय का दु:ख भी।
'हम आपके हैं कौन' टाईप फ़िल्मों द्वारा प्रसारित जूता-चुराई नामक रस्म की अदायगी में सत्ताईस सौ रुपए चले जाने का असह्य ग़म तो ख़ैर किसी तरह ग़लत नहीं किया जा सकता।
कोहबर में प्रवेश के समय ग्राम-बालाओं का वह हठ कि - कोई कविता सुनाइए!
मैंने पूछा था कि कौन सी कविता ? छायावादी या प्रयोगवादी? या फिर जनवादी? दरअसल कविताओं के कई प्रकार होते हैं न!
पीछे से किसी मृगनयनी ने इठलाते हुए कहा था - प्रेम पर कोई कविता सुनाइए!
मैंने केदारनाथ सिंह की कालजयी पंक्तियाँ सुनाईं - उसका  हाथ अपने हाथ में लेते हुए मैंने सोचा कि
दुनिया को उसके हाथ की तरह गर्म और सुंदर होना चाहिए।
तभी किसी कोमलांगी ने बिम्बफल सदृश रक्तिम अधरों को तृज्याकार मोड़ कर कहा - यह तो 'टाइफाइड' पर कविता लग रही है...।
पिछले दिनों कवि मित्र वीरू सोनकर ने सच कहा था कि कविता ख़तरे में है।
खैर! 'बन्नो तेरी अँखियाँ सुरमेदानी' से होते हुए छत पर लगे लाउड स्पीकर ने जब रुंआसी आवाज़ में गाना शुरू किया-बाबुल की दुआएँ लेती जा... तो विवाह नामक यह यज्ञ सम्पूर्ण हुआ।
               मन क्रम और वचन से 'दुल्हन ही दहेज़ है' मानने के बाद भी दुल्हन के साथ कुछ भौतिक वस्तुएँ गांठ बाँध दी गईं।मेरे हिस्से में भी कुछ स्वर्णाभूषण आए, जिनमें अंगूठी और चेन टाईप कुछ संज्ञाएँ थीं।जिनका असह्य भार न सहन कर पाने की दशा में पुन:विजया जी को ही समर्पित कर देने के बाद और अँगना में मिले रुपए, गाड़ी-घोड़े (यहाँ घोड़ा केवल तुक के लिए आया है) और नाच-बाजे (यहाँ नाच केवल तुक के लिए आया है) के हिसाब-किताब की बलि वेदी चढ़ गए, तो जो स्थिति बनी उसे ही शास्त्रों में "पुन:मूषको भव" कहा गया है।
                  यूँ तो जीवन में निजी कहने के लिए कुछ नहीं है किताबों के अलावा। और वो भी निजी बस इसलिए कि उन्हें ख़रीदने और रखने की ज़िम्मेदारी मेरी। बाकी पढ़ने, ले जाने और फाड़ने की ज़िम्मेदारी दूसरों की।इधर कुछ वर्षों में लेखकों, संपादकों और प्रकाशकों से दोस्ती का फ़ायदा यह हुआ कि घर में कुरते कम और किताबें ज्यादा होती गईं।
गाँव - जवार में जो अब थोड़े बहुत रीमा भारती और सरस सलिल के प्रशंसक बच गए हैं उनकी भी तीक्ष्ण दृष्टि पड़ी और उन्होंने कहा - बड़ी सुन्दर-सुन्दर पत्रिकाएँ हैं! जरा दो तो देखें क्या लिखा है इनमें!
और आगे धूमिल कहते हैं कि - 'जब सौंदर्य में स्वाद का मेल नहीं मिलता तो कुत्ते महुए के फूल पर मूतते हैं'।
यूँ किताबों का आना, जब जाने का आधा रह गया तो मैंने बाहर से उठा कर सारी किताबें अंदर आलमारी में रख दीं।
और किताबों को उसी दिन निजी संपत्ति के क्षेत्र में घोषित कर दिया गया।
          विवाह निजी क्षेत्र के किस-किस कोने में प्रवेश कर सकता है यह अगले ही दिन पता चल गया जब विजया जी ने पूरी आलमारी में फ़ैली किताबों को लगभग आधी जगह में समेट दिया।
मैंने ऊँची आवाज़ में कहा - ये क्या हो रहा है?
उन्होंने कहा कि - आधी जगह में आपकी हिंदी की किताबें रहेंगी और आधे में मेरी संस्कृत की किताबें...।
शादी-विवाह से अनजान व्यक्ति इसे निजी जीवन में अतिक्रमण कह सकते हैं लेकिन विवाहित लोग जानते हैं कि यह एक तरह का समन्वय है। एक साहचर्य की भावना है...।
उधर उन्होंने अपने हाथ में पकड़ी एक किताब की पंक्ति पढ़ते हुए चौंक कर कहा - यह क्या है!!
मैंने कहा- क्या?
उन्होंने किताब लगभग मेरी आँख में घुसाते हुए कहा - ये!
और मेरी आँखों ने पढ़ा - "मास्टर की सुबह और रंडी की शाम नहीं ख़राब करनी चाहिए। यह उनके धंधे का समय होता है"।
मैं जब तक समुचित तर्क तलाश करता तब तक उन्होंने कहा - तो यही सब पढ़ते हैं आप! और यही लिखा जा रहा है हिंदी में!
मैंने बताया - देखिए! ऐसा कुछ नहीं है। यह काशीनाथ सिंह का लिखा 'कासी का अस्सी' है और इसकी भाषा जो है ...
तब तक उन्होंने कोई दूसरी किताब निकाल कर उलटना - पलटना शुरू कर दिया था।और किसी किताब के पन्नों को देखकर कहा - उफ़! अब यह क्या है!!
मैंने फिर से देखा -
चंदर ने सुधा को पलटा और पीठ सहलाने लगा।
"ब्रा स्ट्रैप खोल दो।"
चंदर के लिए ब्रा स्ट्रैप खोलना कोई नई बात नहीं थी लेकिन वो हर बार थोड़ा-सा अटक जाता था...।
सुधा ने अपने एक हाथ से स्ट्रैप खोल दिया और अपने हाथ स्ट्रैप वाली जगह पर रख के बताया कि यहाँ सहला दो।
"दिन भर पहने-पहने निशान पड़ जाता है।"
                  और कहते हैं न कि किस्मत जब कांग्रेस होती है तो परिस्थितियाँ भी नारायण दत्त तिवारी हो जाती हैं। सैकड़ों किताबों की भीड़ में से वही किताबें मिलनी थीं? और उन किताबों के वही पन्ने खुलने थे?
मैंने कहा - देखिए ये धर्मवीर भारती के सुधा-चन्दर नहीं हैं। ये 'मुसाफिर कैफ़े' वाले दिव्य प्रकाश दुबे के सुधा-चंदर हैं।
-तो फिर ज़रूरत क्या थी इन अश्लील बातों में सुधा-चंदर को घुसाने की?
मैंने समझाया -पात्रों का नाम इतना कुछ सोचकर नहीं रखा जाता और श्लीलता-अश्लीलता के शास्त्रीय पक्ष भी तो हैं आख़िर कपड़ों के भीतर हम सभी नग्न ही तो हैं...। फिर संस्कृत में तो एक से बढ़कर एक पद हैं जहाँ अश्लीलता भी...
-तो संस्कृत के कुछ पद अश्लील हैं इस तर्क पर हिंदी अवधी भोजपुरी में भी यही हो? सच है कि श्लीलता-अश्लीलता के साहित्यिक पक्ष हैं लेकिन यह तो शब्दों की बदमाशियाँ और निजी कुंठा है। इस अश्लीलता में साहित्य कहाँ है?
मैंने बताया - ये बेस्टसेलर बुक है और पाठक की डिमांड पर ही तो...
उन्होंने अपनी किताबें समेटते हुए कहा - कुछ भी हो मेरी किताबें इन किताबों के साथ नहीं रहेंगी।
               आधे घंटे बाद कमरे के पूरब की आलमारी में भवभूति, दण्डी , कालिदास, और आनन्दवर्धन गर्वोन्नत विराजमान थे और पश्चिम की आलमारी में सत्य व्यास, नीलोत्पल मृणाल, निखिल सचान और शशिकांत मिश्र डरे-सहमे।जैसे दोनों पक्षों के बीच भीषण शास्त्रार्थ होने ही वाला हो। हम दोनों का मुँह अपने-अपने योद्धाओं की तरफ़...
रात गहराती जा रही थी।शादी-ब्याह का दिन। ऊपर के कमरे में फ़िल्मी गानों से उकता कर शायद किसी लड़के ने ग़ज़ल बजानी शुरू कर दी थी - हमको किसके ग़म ने मारा। ये कहानी फ़िर सही... ये कहानी फ़िर सही...

असित कुमार मिश्र
बलिया

Saturday, 4 August 2018

मैंने हर बार जूतों को रफीक समझा है - Er S. D. Ojha

मैंने हर बार जूतों को रफीक समझा है ।

आपको वह दृश्य याद होगा कि किस तरह एक पत्रकार ने अमेरिका के राष्ट्रपति पर दो बार जूते फेंके थे । हालाँकि दोनों बार निशाना चूक गया था , पर वह पत्रकार रातों रात स्टार बन गया था । उसके जूते भी अमर हो गये । जूतों बनाने वाली कम्पनियों में इस बात का श्रेय लेने की होड़ मच गयी कि वह उन्हीं के ब्राण्ड का जूता था । लेकिन एक बात मेरी समझ में नहीं आई कि उस पत्रकार को जूते चलाने की नौबत हीं क्यों आई ? वह तो कलम चलाने वाला था । कलम चलाता । मेरे ख्याल में वह कलम चलाने में उतना माहिर नहीं था । इसलिए वह जूता चला बैठा । जूता चलाने में भी वह माहिर नहीं था । एक बार नहीं दो बार उसका निशाना चूका । लेकिन अपने कृत्य से वह इतिहास में अपना नाम दर्ज करा बैठा । उसी के चलते भारत में भी केजरीवाल और मनमोहन सिंह पर जूते चले । जूते चलाना एक ट्रेण्ड बन गया । वैसे सदन में जूते चलाने की परम्परा हमारे यहाँ पहले से कायम थी ।

जूते मंदिरों से चोरी हो जाते हैं । भगवान के दरबार से जूते चोरी हों और भगवान कुछ नहीं करें इससे बड़ा मजाक और क्या हो सकता है ? कहने वाले कहते हैं कि भगवान के पास ढेर सारे काम हैं । वह जूता चोरी जैसे तुच्छ मामले को निपटाने में लग जाएंगे तो असल समाज कल्याण का काम कौन करेगा ? 12 मई 2018 को उज्जैन के महाकाल मंदिर से ज्योतिरादित्य सिंधिया का जूता चोरी हो गया था । भगवान ने कुछ नहीं किया , पर भगवान ने उसके बाद उन्हें वह विलक्षण शक्ति प्रदान की कि वे जमकर भाजापा पर बरसे । मंदिर के पुजारी का कहना था कि पनौती उतर गयी है । अब ज्योतिरादित्य सिंधिया को आगे बढ़ने से कोई रोक नहीं सकता । दूल्हे के जूते भी चोरी होते हैं । हमारे समय में इस रश्म को नहीं निभाया जाता था , लेकिन फिल्म " हम आपके हैं कौन " में माधुरी दीक्षित ने इस रश्म को राष्ट्र व्यापी मान्यता दिला दी ।

जूतों को संस्कृत में चरणपादुका कहते हैं । इस चरणपादुका को लेकर भरत ने 14 साल तक अयोध्या पर शासन किया था । आधुनिक काल में उमा भारती ने जेल जाने से पहले मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री की कुर्सी अपने भाई बाबूलाल को इस उम्मीद से सौंप दी थी कि उनके जेल से आने के बाद वह कुर्सी उन्हें सही सलामत मिल जाएगी । बाबूलाल को लालच आ गया । उन्होंने कुर्सी अपनी बहन को नहीं सौंपा ।  उमा भारती को मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री की यह कुर्सी आज तक मुंह चिढ़ा रही है । यही हाल रहा जीतनराम माझी का । उन्होंने भी नीतीश कुमार को कुर्सी सौंपने से इंकार कर दिया था । चरण पादुका अपने असली हकदार का इंतजार करती रह गयी थी ।  लेकिन इस जमाने में अपवाद भी होते हैं । दक्षिण में जयललिता को पनीर सेल्बम ने सहर्ष कुर्सी सौंप दी थी । उनको पता था कि अंततः लेडीज सीट को छोड़ना हीं पड़ता है ।

जूतों पर बहुत से मुहावरे बने हैं । मियाँ की जूती को कभी बीवी ने मियाँ के हीं सिर पर दे मारा होगा तो मुहावरा बन गया  " मियाँ की जूती मियां के सिर " । यदि बीवी ने अपनी जूती का इस्तेमाल किया होता तो मुहावरा कुछ इस तरह से बनता " बीवी की जूती मियाँ के सिर "। जूते चाटना भी एक मुहावरा है । यह मुहावरा चाटुकार लोगों के लिए बना है । चाटुकार लोगों की दुनियां में कोई कमी नहीं हैं । आप एक ढूढेंगें , हजार मिलेंगे । कुछ लोग घर में बीवी से डरते हैं , पर बाहर अति दम्भ में कह जाते हैं मैं अपनी बीवी को "जूतों की नोक" पर रखता हूँ ।  कुछ लोगों को अपनी रचनाओं को छपवाने के लिए सम्पादकों के दफ्तरों के चक्कर काटने पड़ते हैं । फिल्मों में काम करने के लिए प्रोड्यूसरों के दफ्तरों के भी चक्कर लगाने पड़ते हैं । नौकरी के लिए गली गली घूमना पड़ता है । ऐसे में जूते बखूबी घिसेंगे । इसलिए जूते घिसना भी एक मुहावरा बन गया ।

चमचमाते जूते आपकी शान में इजाफा करते हैं । माडर्न टाइप या करीने से पहने फार्मल जूते आपकी इज्जत को चार चांद लगा देते हैं । जूते इज्जत बढ़ाते हैं तो घटाने का भी काम करते हैं । किसी को जूतों की माला पहना दी जाय तो उसका तत्क्षण हीं अपमान हो जाता है ।  जूतों की मार हंटर से भी ज्यादा दर्द देता है । इससे शरीर के अलावा दिल व दिमाग भी घायल हो जाता है । चांदी के जूते से भी मारा जाता है  । चांदी के जूते मार लोग अपना काम निकालते हैं । इससे जूता मारने वाला और जूता खाने वाला दोनों खुश रहते हैं । नहीं समझे ?? चांदी के जूते मारने का मतलब घूस देना होता है । चांदी के जूते मारने से कभी टोपी चमकती है तो कभी उछलती है । वैसे पते की बात यह है कि अक्सर जूता टोपी से महंगा होता है ।

Friday, 3 August 2018

पुण्य प्रसून वाजपेयी के लिए

आओ
पत्रकारों हम
इस तम में तुम्हारे मारे जाने का मातम मनाते हैं
तुम्हारे बाद का हाल भी तुमको बताते हैं

सुना है वो
सच की लाश को
जलाएंगे नहीं
बल्कि दफनायेंगे

नंगा राजा रोशनी के खिलाफ है
और
तुम्हारा जुर्म की तुमने दियासलाई की कीमत पूछी

पंकज विश्वजीत की कविताएँ

पंकज विश्वजीत की कविताएँ

1

एक ज़माने में
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एक ज़माने में
चुल्हियाँ नहीं खिसकती थीं अपने दर से
तब बारिश का हिसाब लगाकर
साँझ होने से बहुत पहले ही 
उठ पड़ता था मोहल्ले की तमाम चुल्हियों से धुँआ, और
छान्हियों से छनते हुए छा जाता था बादलों के ठीक नीचे
लगाए जाते थे और दिनों से अधिक और मोटे चईले
और दिनों से ज़्यादा तेज़ रखी जाती थी आँच
तेज़ चलाये जाते थे हाथ ......

2

अधूरी हँसी
___________________

बहुत हँसने के बाद
याद आती है,
किसी की आधी अधूरी हँसी
वो जो कहा करता था,
कितना फ़रेब है, कितना दुःख है यहाँ

आख़िर कितना फ़रेब
कितना दुःख

ये मैंने जाना एक अधूरी हँसी के बाद
उतना ही ज़्यादा जितनी अधूरी हँसी .

3

छतों पर टंकियाँ
__________________________________

दृश्य बदल चुका है,
अब छत से मैं
दूर की छतों तक निगाह दौड़ाता हूँ
महज़ पानी की टंकियों से टकराती है नज़र
और अपने छत तक आ जाती है

गलियों के वे लड़के
बहुत पहले ही छोड़ चुके हैं उम्मीद
कोई जो माउथ ऑर्गन पर बजाया करता था
आवारा और श्री 420 की अमर धुनें
जो नाले के ऊपर बनी सीढ़ियों पर खेला करते थे ताश
जो फ़ुटपाथ के खुले चायख़ाने पे पिया करते थे चाय

अब वो रुकते हैं महज़ चाय के ख़तम होने तक
क्योंकि उन्हें पता है
छतों से किसी भी शाम प्यार नहीं आएगा

छतों पर आतें हैं बाप
जो एक अरसे तक ऐसी ही किसी गली में
छतों से प्यार के इंतज़ार में लफंगे बने काटते रहे चक्कर
और तब भी छतों पर आते थे बाप

दृश्य बदल चुका है
अब छतों पर नहीं आती लड़कियाँ
ना ही छतों से गली या बगल की छत पर प्यार
अब हर शाम छतों पर दिखती हैं ओवरफ्लो हुई टंकियाँ .

4
जब तक
गड़ही  नखनखाए  नहीं
खड़ंजा  बजबजाए नहीं
मेढक    टरटाराए   नहीं
फतिंगा   उधियाए   नहीं
जनता   बिछिलाये  नहीं

तो बरखा किस काम की!

5

जो जानते होंगे धूप,
तौंकती होगी जिनकी छत
जिन्हें पता होगा
चिड़ियों और घोसलों का ठिकाना
वो बचाएंगे पेड़ों को
और दम भर सुस्ताएँगे .

6

एक दिन,
निकलेंगे हम घर से
निकलेंगे शहर से
और पूछेंगे एक दूसरे से
किसी शजर का पता .

7

बारिश आने के बाद
_____________________

बारिश आने के बाद
हर कोई नहीं भागता घर की ओर
हर कोई नहीं तलाशता छान्ही छप्पर

कुछ ऐसे भी होते हैं जो
बारिश आने के बाद
तमाम छतों से बचते हुए
भागते हैं उसी दिशा की ओर

ये घंटों ग़ायब रहते हैं घरों से
ये खोजते हैं ताज़े जोते हुए खेत
ये दौड़ते हैं दूर तक हर गड्ढे को ठोकर मारते हुए
ये झोरते चलते हैं पेड़ों की कंछियों को
ये खोजते हैं बईरहवा आम का पेड़

ये बने रहते हैं बारिश के साथ उसके जान तक
और घर से बहुत दूर की पोखरियों में
ये फेंकते हैं चिक्का और दम भर खेलते हैं छिछिली .

8

चोरी के बाद -
_______________

वो बचपन की ही आदत थी,
बड़ा नटखट
बड़ा भोला
बड़ा मासूम है मुन्ना
यही माँ-बाप कहते थे,

दुपहरी में निकलता वो
धांगते हुए खेतों को ककड़ी तोड़ लेता वो
टिकोरा मार लेता वो
बल्लफ फोड़ देता वो

कि वो पकड़ा भी जाता था
'धर धर धर' ध्वनि के गूंजते ही
भाग पड़ता वो,

पीछे उसके मलिकार, कुजड़ा भागते रहते
वो ऐसे दौड़ता रहता
कि बस ....
अब गिरेगा
तब गिरेगा
गिर पड़ेगा
पर न गिरता
बच निकलता
घर पहुँचता

बड़ा नटखट
बड़ा भोला
बड़ा मासूम है मुन्ना
यही माँ-बाप कहते थे

बड़ा चोरकट
बड़ा फरकट
बड़ा लतखोर है मुन्ना
ये पूरा गांव कहता था .

- Pankaj Vishwajit

- पंकज विश्वजीत

Thursday, 2 August 2018

अम्बर पाण्डेय की प्रेम कविता प्रेमी स्थान खोजते है /

प्रेमी स्थान खोजते है /अम्बर पाण्डेय

जा, निर्विघ्न सम्पन्न हो तेरी रति
कोई नहीं आता वर्षा में इस ओर
रात को
भृंगवल्लभ के इन वृक्षों में
पुष्प अधिक है पत्रों से

भौरें- लालची, लम्पट, रातों को भी
भनभन करते जगते है

सुगंध से मस्तक की ऐसी दशा होती है
जैसे गुड़पुष्पों का सार पिया हो लोटाभर
छिन्नसंशय गुँथी पड़ी रह उससे
जैसे मन में विपरीत भावों का
द्वन्द रहता है

कलंक तक ने यहाँ का रस्ता नहीं देखा
पुतलियों पर छप जाए
उसकी पुतलियाँ, ऐसी देख एकटक

उतार दे वस्त्र योगियों से सीख
कैसे निर्विकल्प समाधि में वे
पंचभूतों की पोटली छोड़ दिया करते है

छींटें पड़ने लगे तो चली जाना
भीतर तक नि:संकोच
रति के पूर्ण हो जाने पर जो गन्ध
जोड़ों के कलेबरों से उठा करती है
वैसी ही सुगन्धवाले पुष्प वहाँ बहुत है

जिह्वा यों
जैसे मछली मूँगे की बेल का फल खाकर
जड़ हो जाती है, पुष्प का नाम ले नहीं पाता
मैं भी तो अपनी पूर्वप्रेमिका का

वहीं गाढ़ चुम्बन लेकर आया हूँ

#सम्वत२०७४आषाढ़ ९

Monday, 16 July 2018

चन्द्रकला त्रिपाठी की कविता

चिड़िया
शाख पर उतरती है नृत्य में घूमती हुई सी
समेटती पंख
और उड़ान
उड़ती है मगर चलना भी नहीं भूलती
मुडेर पर
जमीन पर कोना कोना थहाती परखती चंचल
सामने खुला अजगर का विकराल जबड़ा हो तो भी
वह जिंदा रहने को किसी पैतरे में नहीं आजमाती

उड़ती है पंख सलामत रहने तक
थिरकती है
और ज्यादा कोमल हो जाते हैं पेड़
और ज्यादा मधुर हो जाती हैं ध्वनियां
तब और जब
चहक कर लहरा उठती है किसी अंत में डूबते समय को न जानती हुई वह
एक नहीं अनेक होकर जीने के रंग में प्रेम भी
कलह भी
छेड़ भी
छीन झपट भी

ढेर सारी हैं ऐसी अमर नश्वरताएं
एक चिड़िया और अनेक चिड़िया की
मौत
कब की हार चुकी ऐसे
भरपूर जीने से

चंद्रकला त्रिपाठी

Saturday, 14 July 2018

व्योमेश शुक्ल की कविता- पोंSSSSSSSSSSSS

व्योमेश शुक्ल की कविता- पोंSSSSSSSSSSSS
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यार, ख़ूब मन लगाकर शादी कीजिए
फिर ख़ूब मन लगाकर बनारस आ जाइए
सुनिए उस कारख़ाने के सायरन की आवाज़ जो सन 2000 में ही बंद हो गया
रोज़ाना 8 बजे, 1 बजे, 2 बजे, 5 बजे
धिन धिन धा धमक धमक मेघ बजे

आइए तो मिलकर पता लगाया जाय कि वह आवाज़ आती कहाँ से है यह भी संभव है कि वह आवाज़ सिर्फ मुझे ही सुनाई देती हो एकाध बार मैंने रमेश से पूछा भी कि कुछ सुनाई दे रहा है आपको तो वह ऐसे मुस्कराए जैसे मेरा मन रखने के लिए कह रहे हों की हाँ

दिक्क़त है कि लोग सायरन की आवाज़ सुनना नहीं चाहते नए लोग तो शायद सायरन की आवाज़ पहचानते भी न हों सायरन बजता है और वे उसकी आवाज़ को हॉर्न, शोर, ध्वनि प्रदूषण और न जाने क्या-क्या समझते रहते हैं. नाक, कान, गले के डॉक्टर ने मुझसे कहा कि तुम्हारे कान का पर्दा पीछे चिपक गया है और ढंग से लहरा नहीं पा रहा है – इसकी वजह से तुम्हें बहुत सी आवाज़ें सुनाई नहीं देंगी तो मैंने उनसे कहा कि मुझे तो सायरन की आवाज़ बिलकुल साफ़ सुनाई देती है – रोज़ाना 8 बजे 1 बजे 2 बजे 5 बजे, तो वह ऐसे मुस्कराए जैसे मेरा मन रखने के लिए कह रहे हों की हाँ

यार, ख़ूब मन लगाकर शादी कीजिए फिर ख़ूब मन लगाकर बनारस आ जाइए आपमें हीमोग्लोबिन कम है और मुझे सायरन की आवाज़ सुनाई देती रहती है आइए तो मिलकर पता लगाया जाय कि वह आवाज़ आती कहाँ से है

कारख़ाना बंद है तो सायरन बजता क्यों है जहाँ कारख़ाना था वहाँ अब एक होटलनुमा पब्लिक स्कूल है स्कूल में प्रतिदिन समय-समय पर घंटे बजते हैं लेकिन सायरन की आवाज़ के साथ नहीं बजते. सायरन की आवाज़ के बारे में पूछने के लिए मैंने स्कूल की डांस टीचर को फ़ोन किया तो वह कहने लगी कि पहले मेरा उधार चुकाओ फिर माफ़ी आदि माँगने पर उसने कहा कि उसकी कक्षा में नृत्य चाहे जिस ताल में हो रहा हो, ऐन सायरन बजने के मौक़े पर सम आता ही है. परन, तिहाई, चक्करदार – सब – सायरन के बजने की शुरूआत के बिंदु पर ही धड़ाम से पूरे हो जाते हैं.
मसलन तिग दा दिग दिग थेई, तिग दा दिग दिग थेई, तिग दा दिग दिग पोंSSSSSSSSS
     (यहाँ - तिग दा दिग दिग - कथक के बोल
      पोंSSSSSSSSS – सायरन की आवाज़)

सायरन की आवाज़ न हुई, ब्लैकहोल हो गया. बहुत सी चीज़ों का अंत हो जाता है उस आवाज़ की शुरूआत में – पिता, पंचवर्षीय योजना, पब्लिक सेक्टर, समूह, प्रोविडेंट फंड, ट्रेड यूनियन और हड़ताल – सब – सायरन के बजने की शुरूआत के बिंदु पर ही धड़ाम से पूरे हो जाते हैं

कभी-कभी धुएँ और राख़ और पानी और बालू में से उठती है आवाज़. वह आदमी सुनाई दे जाता है जो इस दुनिया में है ही नहीं कभी-कभी मृत पूर्वज बोलते हैं हमारे मुँह से. बहुत सी आवाज़ें आती रहती हैं जिनका ठिकाना हमें नहीं पता. वैसे ही, सायरन बजता है रोज़ाना आठ बजे एक बजे दो बजे पाँच बजे

जैसे मेरा, वैसे ही सायरन की आवाज़ का, आदि, मध्य और अंत बड़ा अभागा है. बीच में हमदोनों अच्छे हैं और आपसब की कुशलता की प्रार्थना करते हैं. बीच में, लेकिन यही दिक्कत है कि पता नहीं लगता कि हम कहाँ हैं और ज़माना कहाँ है? नींद में कि जाग में, पानी में कि आग में, खड़े-खड़े कि भाग में.

आइए यार तो ढूँढा जाय कि सायरन की आवाज़ कहाँ से आती है और हमलोग कहाँ हैं?  
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Saturday, 7 July 2018

एक चाकू की मौत - Er S D Ojha

एक चाकू की मौत ।

रामपुरिया कहते हीं जेहन में चाकू उभरता है । पता नहीं कैसे ताऊ ने रामपुरिया अपना तखल्लुस रखा है ? गुण्डे बादमाश अक्सर कहते हुए सुने जाते थे - रामपुरिया घुसेड़ दूंगा । 60-80 के दशक में फिल्मी दुनियां में रामपुरिया छायी रही थी । राजकुमार का एक प्रसिद्ध डाॅयलाॅग उन्हीं दिनों काफी लोक प्रिय हुआ था । राजकुमार अपने हाथ में रामपुरिया चाकू लेकर कहते हैं-  "यह बच्चों के खेलने की चीज नहीं है । हाथ कट जाए तो खून निकल आता है ।" अमिताभ बच्चन ने भी बहुत रामपुरिया हवा में लहराए हैं । जया भादुड़ी ने भी "चक्कू छूरिया तेज करा लो " गाते हुए रामपुरिया को मशीन पर तेज किया है । आज के डाॅन दाऊद भी अपनी प्रेमिका की सगाई हो जाने पर रामपुरिया लेकर उसके घर पहुंच गये थे । 

हमारे दौर के बिगड़ैल छात्र रामपुरिया की मदद से नकल करते थे । नकल की सामग्री खुले आम मेज पर रखी होती थी । रामपुरिया बगल में रुमाल से ढकी पड़ी होती थी । जितना बड़ा चाकू , उतना बड़ा रुमाल । रुमाल का आकार चाकू के आकार के समानुपाती होता था । यदि कक्ष निरीक्षक सख्त जान हुए तो उन्हें रुमाल हटाकर रामपुरिया का दर्शन करा दिया जाता था । उसके बाद कक्ष निरीक्षक महोदय धृतराष्ट्र हो जाते थे । वे अंधे हीं नहीं गूंगे बहरे भी हो जाते थे । छात्र रामपुरिया के बल पर अपनी धाक जमा लेते थे । वे खुलकर नकल करते थे । कहते हैं कि नकल करने के लिए भी अकल की जरुरत होती है । वह अकल उनके पास नहीं थी । इसलिए वे लिख आते थे - जैसा का पृष्ठ संख्या 57 के चित्र में दर्शाया गया है या जैसा कि आप पिछले अध्याय में पढ़ चुके हैं । 

अठारहवीं सदी तक पूरे भारत में आग उगलने हथियार रायफल , मशीन गन और बंदूकों का आविष्कार हो गया था , लेकिन ये हथियार क्लोज बैटल  ( नजदीकी लड़ाई ) में कामयाब नहीं थे । इसलिए रामपुर के नवाब ने चाकू को नजदीकी लड़ाई में शामिल करने की सोची । कारीगरों ने मोर्चा सम्भाल लिया । रामपुर शहर में चाकूओं की धड़ाधड़ दुकानें खुल गईं । इन दूकानों से रामपुर शहर में एक बाजार हीं बन गया , जिसे चाकू बाजार कहा जाने लगा ।  रामपुरिया चाकू को नवाबी सेना में शामिल कर लिया गया । देश आजाद होने पर भी ये चाकू बनते रहे । इनकी मांग कलकत्ता,  मुम्बई,  पटना , नैनीताल और शिमला तक होती थी ।

1990 के बाद से सरकार ने 4" से ज्यादा बड़े चाकुओं पर  बैन लगा दिया था । इसलिए रामपुरिया चाकू बहुत कम बनने लगे । इस चाकू को वही बना सकता था , जिसके पास लाइसेंस हो । वही खरीद भी सकता था , जिसके पास लाइसेंस हो । ऐसा बढ़ते अपराधों पर रोक लगाने के नियत से किया गया था । रामपुरिया का कारोबार चौपट हो गया । चाकू बाजार बंद हो गया । चाकू बाजार का नाम अब टीपु सुल्तान बाजार रख दिया गया । जब चाकू हीं नहीं बनते तो चाकू बाजार का औचित्य हीं क्या रह जाता है ? आए दिन हुई पुलिस की छापेमारी ने भी कारीगरों को चाकू उद्योग से विमुख कर दिया । अब कारीगरों ने रिक्शा  चलाना या मजदूरी करना शुरु कर दिया है ।

यामीन अंसारी एक अकेले कारीगर रह गये हैं,  जिनके पास रामपुरिया चाकू बनाने का लाइसेंस है । यामीन अंसारी के पास जब कोई लाइसेंस धारक आता है तो वे रामपुरिया बना देते हैं,  अन्यथा सब्जी काटने वाला चाकू बनाकर अपनी जीविका चलाते हैं  । वैसे छुपे तौर पर यह उद्योग अब भी फल फूल रहा है । अभी फरवरी 2018 में जी आर पी ने 750 अवैध रामपुरिया अमृतसर में पकड़ा था । लगता है कि अलीगढ़ के ताले , मुरादाबाद के पीतल , फिरोजाबाद की चूड़ियां और मेरठ की कैंची की तर्ज पर रामपुर भी रामपुरिया चाकुओं के लिए हमेशा हमेशा के लिए प्रसिद्ध रहेगा ।

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सर गणेश दत्त