कुचलते हो
कुचलकर कितना मचलते हो
सोचो
किसी दिन वह पकड़ ले तुम्हारी लात
चबा जाये उँगलियाँ
उखाड़ दे नाखून
बना दे तुम्हारी हड्डियों का चूरमा
उलट दे पटक दे तुमको
डर लगता है न सोच कर
बताओ न
डरते हो इसीलिए डराते हो न
Subscribe to:
Post Comments (Atom)
Featured post
अरमान के शेर
मैने सर झुकाया, तुझे इल्म नहीं जा तू पत्थर हो जा, परवाह नहीं। अरमान
-
कुँवर नारायण की आत्मजयी को प्रकाशित हुए पचास साल से ज्यादा हो चुके हैं। इन पचास सालों में कुँवर जी ने कई महत्त्वपूर्ण कृतियों से भारतीय भा...
-
खेत में संस्कृति -------------------------------------------------------------- साहब!खेती करते देखा है बुनकरों को खेतों में नहीं साड़ी म...
-
धान रोपती हुई औरतों पर कविताएँ 1 धान रोपती स्त्री - विश्वनाथ प्रसाद तिवारी --------------------------------------...
No comments:
Post a Comment