Monday, 24 August 2015
भ्रान्ति कविता
Wednesday, 1 July 2015
कविता
तुम इतनी शिद्दत से मुझे चाहती हुई
खुदा घोषित करने ही वाली थी
कि मैं
मैंने तुम्हे धोखा दे दिया
साथ ही सच कर दिया उस दावे को
जिसे तुम झुठलाने के आख़री पायदान पर दी
सच्चा प्यार किस्से कहानियों की बातें हैं
और फिर मैं पुरुष हूँ
ये दम्भ मुझे कहाँ सिर्फ तुम्हारा होने देता है
कविता
हताशाएं होंगी
निराशाएं होंगी
सभ्यताओं ने छीनी हैं खुशियाँ
भूल गए हम लड़ने-जीने का हुनर
दुनिया का अंत तय है
लेकिन न तारीखों में
न विश्वयुद्ध में पानी के लिए
पानी की नदियों से ज्यादा आँखों में जरूरत है
एक दिन नींद की गोलियों में सो जायेगी दुनियां
आत्महत्याओं में ख़त्म हो जायेगी ये दुनियां
Friday, 19 June 2015
केदारनाथ सिंह (दिनकर जी के पुत्र )से इंटरव्यू
दंगा (1) अरमान आनन्द
कि मेरे चेहरे पर दाढ़ियाँ थीं
मूंछे नहीं थी
मेरा कुसूर था कि
मेरे माथे पर लाल रोड़ी का तिलक लगा था
हमने अपनी कुसुरवारी की सजा कुछ मासूम बच्चों को दी
हमने एक दूसरे की औरतों को नंगा किया
हम अपना वीर्य
अपने अपने शक्तिशाली ईश्वर को बचाने में खर्च करते रहे।
हमने कुछ पागल बनाए हैं
जिन्होंने तुम्हारी सरकार बनाई है।
Monday, 11 May 2015
आज जाने की जिद न करो
यूं ही पहलू में बैठे रहो
आज जाने की जिद न करो
कि तुम जो रुक जाओ
आज
आज की साँझ ढलेगी नहीं
यहीं किसी मेज के नीचे से निकल आएगी यमुना
और विस्की की ये बोतल
बदल जायेगी बांसुरी में
इस कैंडल की लाइट
भक्क से टूटेगी
और आसमान में आधे चाँद सा
उल्टा लटक जायेगी
आज जाने की जिद न करो
यूँ ही पहलू में बैठे रहो
आज जाने की....
रहने दो
कि मम्मी डैडी को समझा लेना कुछ बहानों से
कह देना
नेहा की बर्थडे पार्टी थी
और शबाना आंटी ने रोक लिया था
डैडी से कहना एग्जाम की तैयारी के लिए रुक रही हो आज की रात
किसी सहेली के घर पर
खुद से भी कह देना एक झूठ
कि तुम
नशे में थी
कि आज जाने क़ी ज़िद न करो
निकालो
अपनी जीन्स से रेशमी रुमाल
और फैला दो अपने आँचल की तरह
इससे पहले कि हमें कोई बोरियत के मायने समझाए
कुछ देर तलक हम बेतरह प्यार करें
इस से पहले कि हमारे झगडे मतभेदों में बदल जाए
हमें लगने लगे कि हम शायद एक दूसरे के लिए नहीं बने थे
और यह बार बार हो
हर एक बार हो
और जब हम पर
मैं
हाई हील वाली सैंडल पहन कर इतराने लगे
और तुम
मुझे सिर्फ इस लिए छोड़ दो
कि मैंने सलमान की जगह
मनोज वाजपेयी की फ़िल्म तुम्हे दिखा दी
इससे पहले कि तुम्हे पता चले
मैंने अपने पिता की 10 बीघे की जमीन
जिसके चार पटीदार हैं
तुम्हें 1000 एकड़ की बताई है
इस दफे गेहूँ को भी तुम्हारे मनपसंद रेन डांस के रेन ने तबाह कर दिया है।
बाबूजी का दिल इसी गम में झट्के ले रहा है
जैसे पुराने एम्बेसडर के करबोरेटर में कचड़ा फंस गया हो
तुम्हे पता है?
मैं बिहार से दिल्ली उसी तरह पढ़ने आया हूँ
जैसे
हावड़ा अमृतसर से पंजाब
और जनसाधारण में पटना से दिल्ली मजदूर आते हैं
इससे पहले कि तुम यह जान लो
आइसा मेरी मजबूरी है और तुम्हारा शौक
दोस्त के कमरे पे उधार में रहकर खाना बनाने के बदले
मिल जाती है उसकी बाइक
जिसपर मैं तुम्हे
मैं चाँद के पार ले जाने के सपने देखता हूँ।
कल तुम्हे डिस्को लेजाने के लिए
मैंने अपने स्पर्म और खून बेचे हैं।
ये जानने से पहले
कि मेरा इश्क मेरे पॉकेट में रोशनाई छोड़ चुकी कलम और
मेरी कमर के फाड़े में खोंसा हुआ कट्टा है
ये सब जानने से पहले आज
बस आज
तुम जाने की जिद न करो
आज जाने की जिद न करो
सहम जाता हूँ
जब किसी हंक और स्टड को तुम देखती हो
मेरी बाइक के पीछे बैठ बी एम् डब्ल्यू पर नजर फेंकती हो
देखो मैंने खरीदी है लिए
ये ड्रेस
इसमें तुम्हारे वक्ष आजादी की लड़ाईयां लड़ रहे हैं
मैंने इस अप्रैल कोई किताब नहीं खरीदी
मैंने बहुत कुछ किया है
जो तुम्हारी नजर में कुछ भी नहीं हो सकता है
इस लिए आज
आज जाने की जिद न करो
यूं ही पहलू में बैठे रहो
हम तो मर जायेंगे
हम किधर जायेंगे
ऐसी बातें किया न करो
आज जाने की जिद न करो...
अरमान आनंद
Sunday, 5 April 2015
बनारस वाया बजरडीहा
Thursday, 12 March 2015
आगरे का पागलखाना (गल्प) - अरमान आनंद
14को आगरा जा रहा हूँ। बेरोजगारी का फायदा ये कि आपको घूमने के खूब मौके मिलते हैं। बेरोजगारी और आवारगी का सम्बन्ध जीजा साली वाला है। रंगीन और संगीन।
आगरे में तीन चीज़े प्रसिद्ध हैं। पेठा, पागलखाना, और ताजमहल। ताजमहल और पेठा कैसे बना ये तो सब जानते हैं। पागलखाना कैसे बना ये बताता हूँ। एक बार एक अंग्रेज अधिकारी आगरा पहुंचा। पेठा खा के मस्त हो गया। फिर शाम को बग्ग्घी से ताजमहल देखने निकला। ताजमहल देखा तो दंग रह गया। उसने कारिंदों को कहा मेरा सामान गेस्ट हाउस से ले आओ। अब हम इसी महल में रहेंगे। गाइड ने कहा सरकार ये महल नहीं कब्र है। यहाँ नहीं रह सकते। गाइड ने आगे बताया राजा ने रानी को खूब प्यार किया , जिससे रानी बच्चा पैदा करते करते मर गई। फिर उसकी याद में राजा ने ताजमहल बनवाया। ताजमहल बनवाने के बाद राजा ने यहीं ताज बनाने वाले कारीगर के हाथ भी काटा था। जिससे कि वो कोई दूसरा ताज न बना सके।
अंग्रेज ने कहा इस शहर को पागलखाने की जरुरत है। जल्दी से पागलखाना बनवाया जाय।
फिर क्या था आगरा का पागलखाना तैयार हो गया और जब से पागलखाना बना दूसरा ताजमहल नहीं बना। मन हो तो भिजिट(विजिट) कर आइये।
Tuesday, 24 February 2015
सत्ता और साहित्य
Sunday, 28 September 2014
हिन्दी साहित्यिक ब्लॉग (परिचयात्मक आलेख)
Friday, 19 September 2014
एक कहानी चाय के साथ
Saturday, 30 August 2014
बेबाक कविताओं की दुनिया: जी हाँ लिख रहा हूँ.. armaan anand
Thursday, 10 July 2014
धर्म {कहानी}
अधेड़ उम्र के सुलतान मियां की आँखों में बीस साल पहले का दृश्य घूम गया। कैसे लोग एक दुसरे की जान के प्यासे हो रहे थे। साथ साथ गली में क्रिकेट खेलने वाले बच्चों ने बल्लों की जगह तलवारें थाम लीं थीं। जमीन खून से लाल हो चुकी थी।
या अली या अल्लाह के नारे गूँज रहे थे। मुस्लिम बाहुल्य क्षेत्र होने के कारण दूसरा कोई नारा गूंजना तो खैर संभव ही नहीं था। बीस साल गुजर गए। यहीं पास में दो गली छोड़ के आम वाले मकान में सुलेमान का दोस्त भी तो रहता था। बड़ा प्यारा दोस्त था वह सुलेमान का । गाढ़ी छनती थी दोनों की। वो मनहूस शाम भी याद है उडती खबर आई थी की किसी ने दरगाह में जानवर का कोई अंग काट कर फेंक दिया है। बात की तह तक जाने की जरूरत किसी ने नहीं समझी। मार काट शुरू हो गयी। कर्फ्यू भी लग गया। देखते ही गोली मारने का आदेश था।दो दिनों गुज़र गए।
उस शाम करीबन आठ बज रहे होंगे। अँधेरा आहिस्ते-आहिस्ते शहर को अपनी आगोश में ले रहा था। अचानक किसी ने दरवाजे को पीटना शुरू किया। दरवाजा खुलते सुल्तान के पैरो में कोई गिर गया। ये गोविन्द था। बुरी तरह घायल.. उसके हाथ में 6 महीने की बच्ची भी थी।
...बचा ले यार इसे। इसे बचा ले। मैं तेरे पाँव पड़ता हूँ। उन्होंने सब खत्म कर दिया। मेरी बीबी बेटे सबको मार दिया। इतना कहकर गोविन्द रोने लगा।
सुलेमान उसे उठाकर घर के अन्दर ले आया। उसे भरोसा नही हो रहा था। उसकी आवाज जैसे गायब हो गयी थी। दिमाग सुन्न पड़ गया था। गोविन्द बोलता ही जा रहा था। नही सुलेमान मुझे जाने दो इसे बचा लो बस ।वो सब पागल हो चुके हैं।
सुलेमान ने दरवाजा बंद किया और बोला आओ भाई तुम्हे जल्दी से कहीं छुपा दूं। तभी किसी ने दरवाजे को पीटा। आवाज आई दरवाजा खोलो सुलेमान भाई... भाई दरवाजा खोलो ..
गोविन्द का चेहरा स्याह पड़ गया। सुलेमान ने कहा तुम घबराओ मत मैं इनसे निबटता हूँ। दरवाजा खोलते ही सामने जहीर बशीर के साथ कई लोग दिखे। उनके हाथों में नंगी तलवारें थीं। जहीर ने चीखते हुए पूछा साला गोविन्दवा आया है क्या इधर। सुलेमान ने अपने को संयत करते हुए कहा.. नही तो.. क्या हुआ?
झूठ मत बोलो सुलेमान भाई छोड़ेंगे नही उसे। उसके बेटे और बीबी को काट डाला हमने .. उसेभी नहीं छोड़ेंगे?? कहाँ है वह काफ़िर?
सुलेमान के चेहरे पर दर्द भरी मुस्कराहट तैर गयी। मार दिया? ... अच्छा किया अरे चचा कहता था तुम्हे और शांति भाभी कितनी प्यालियाँ चाय की गटकी हैं उनके घर पे खुदा इसका हिसाब करेगा। दोजख में जलोगे... दोजख में भाग जाओ यहाँ से कोई नही है यहाँ। बशीर और जहीर के चेहरे उतर गये। सुलेमान ने दरवाजा बंद कर लिया। सुलेमान लौट कर कमरे में आया। फूल सी बच्ची सोफे पर लेटी हुई थी। गोविन्द नही था। सुलेमान ने सारा घर छान मारा। पिछला दरवाजा खुला था। गोविन्द शायद वहीँ से निकल गया । सुलेमान बच्ची को सीने से लगाए काफी देर तक रोता रहा।
Sunday, 6 July 2014
विश्वसुन्दरी पुल वाया बनारस{कविता }
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विश्व सुंदरी पुल {कविता}
बनारस की गलियों में गुजरते हुए
घाटों की सीढियों पर घूमते हुए,
मैंने देखा
कि दुनिया भर से लोग यहाँ मरने आते हैं|
बनारस एक पुल है
जो मर्त्य को अमर्त्य तक पहुंचाता है
मृत्युंजय का ये शहर
मृत्यु के इंतज़ार का शहर भी है
एक जमाने में
जब डाक्टरी
समाज को भुलावा दे पाने में इतनी सक्षम नहीं थी
तब विधवाएं
यहाँ कबीर गढ़ती थीं
यहाँ आने वाला हर आदमी एक झुका हुआ सर है
और मदद में उठने वाला हर हाथ उस्तरा
ये वो शहर है
जहाँ तिरस्कृत तुलसीदास होता है
और बहिष्कृत रैदास
मौत कुछ दे न दे निश्चिन्तता तो जरूर देती हो
धतूरे सी सुबहें
भांग के नशे सी शाम
जैसे किसी अंतहीन यात्रा पर निकली हों
इसी बनारस में एक पुल रहता है
विश्व सुंदरी पुल
पुल को देखने के बाद मुझे कभी ऐसा नहीं लगा
कि यह विश्व का यह सबसे सुन्दर पुल है
विश्व के तमाम धर्मों की तरह यह पुल भी एक धोखा है
सुना है
कल फिर एक औरत ने यहाँ से गंगा में छलांग लगा दी
अखबार ने लिखा
वो कूदने से पहले पुल पर थोड़ी देर टहली भी थी
मन पूछता है टहलने के वक्त क्या सोचा होगा उसने
क्या उसने लड़ने के बारे में सोचा
या जीवन संग्राम से भाग जाना अधिक आसान लगा उसे
किसी ने उसे लड़ना क्यों नही सिखाया
लड़ना क्या सचमुच असभ्य हो जाना है
क्या होता अगर
मरने से पहले वो उसे मार कर मरती
क्या सचमुच पति ही दोषी होगा
हो सकता है
सरकार की किसी योजना का शिकार हुयी हो
ये भी हो सकता हो कि किसी प्रेमी ने
उसे अच्छे दिनों का झांसा देकर पांच साल तक किया हो यौन-शोषण
जरूर किसी ने सच बता दिया होगा उसे
जरूर उस कमबख्त का नाम भूख होगा
भूख खाने में बहुत माहिर है
सब कह रहे हैं बच्ची बच गयी उसकी
कोई बात नहीं
पुल का रास्ता दोनों तरफ से खुलता है
फिर माँ सिखा के तो गयी ही है
सहने और सहते हुए टूट जाने की कला
जानते हो लोग मरने बनारस आते हैं
और एक ये पुल है
यहाँ मरने
बनारस आता है
अरमान आनंद ०५/०७/२०१४
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“पुरुष कवि : स्त्री विषयक कविता” ----------------- मित्रो, पिछले चार साल से आप स्त्री दर्पण की गतिविधियों को देखते आ रहे हैं। आपने देखा हो...
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1 सुना है तुम्हारे घर के भीतर, तुम्हारे ही भक्त, तुम्हारी ही बेटी को तुम्हारे ही सामने, खा गए! सुना है तुमने आँखें बंद कर ली थीं...
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बिहार_राजनीति_और_बाहुबल -1 आजाद भारत में जब 1951-52 में पहली बार चुनाव हुए उसी समय से बिहार में वर्चस्व के बलबूते चुनाव जीतने का सिलसिल...
