Thursday, 10 January 2019

दिनकर-देसे ‘ब्रह्मपुत्र को देखा है’! : डाॅ. राजीव रंजन प्रसाद

दिनकर-देसे ‘ब्रह्मपुत्र को देखा है’! : डाॅ. राजीव रंजन प्रसाद
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(विश्व हिंदी दिवस के दिन अपने प्रिय कवि दिनकर कुमार जिनसे हठात् मुलाकात हुई और मन में गहरे धंस गए के लिए; सादर! )

साहित्य चेतस मनुष्य को परदुःखकातर और द्रवणशील बनाता है। असम प्रांत के सशक्त हिंदी-असमिया कवि दिनकर कुमार के लिखे से इस बात की तसदीक हो जाती है, जब वे कहते हैं-‘मैं कई बार बना हूँ माँझी/गाया है शोकगीत’। वे माँझी जिस नदी का हैं उसका इतिहास पुराना और सन्दर्भ ऐतिहासिक है। वे शिद्दत और शाइस्तगी से उनका हवाला हमारे सामने रख देते हैं-‘रेत पर लिखे गए सारे अक्षर/उसी तरह उजड़ते हैं जैसे उजड़ती हैं सभ्यताएँ/आहोम राजाओं को मैंने देखा है/अंजुली में जल भरकर पिंडदान करते हुए/मैंने कामरूप को देखा है/चीन का यायावर ह्वेनसांग उमानंद पर्वत पर/मिला था/उसकी आँखें भीगी हुई थी/हाथों में ढेर सारे फूल और जेब में /पुरानी पांडुलिपियाँ/ह्वेनसांग रास्ता भूल गया था’।

लोक-हृदयी कवि दिनकर तथ्य, तकनीक, विज्ञान और प्रयोग आधारित इस युग का सच जानते हैं। इसलिए वे आधुनिक सन्दर्भ देना नहीं भूलते हैं जिससे पाठक का सामान्य ज्ञान नहीं अंतर्मन संवेदित-संतुष्ट हो सके। उनकी लम्बी कविता ‘उद्गम स्थल की खोज’ का वृत्तांत देखिए-‘एक सौ मील के दायरे में जलधारा का दस हजार फीट/नीचे उतरना एक रहस्य था जिसके आधार पर/कल्पना की गई कि जरूर कहीं/विश्व का सबसे बड़ा जलप्रपात होगा/उसका नाम रखा गया ‘ब्रह्मपुत्र फाल्स’/इस काल्पनिक जल-प्रपात की खोज शुरू हो गई/वार्ड और कोडोर ने आखिरकार इस रहस्य की/खोज की/वे पहुँचे उद्गम स्थल पर/उन्होंने पहचान लिया ब्रह्मपुत्र का सम्पूर्ण गति पथ/तिब्बत से बहकर आने वाली सांगपो/अरुणाचल में दिहांग के साथ मिल जाती है/वही दिहांग असम में दिबांग और लुइत के साथ/एकाकार हो जाती है/उसका नाम रखा जाता है-ब्रह्मपुत्र’।

कवि दिनकर कुमार बोधि प्रकाशन से प्रकाशित अपने काव्य संग्रह ‘ब्रह्मपुत्र को देखा है’ में ब्रह्मपुत्र की विशालता, विराटता और प्राचीनता को देखने का दावा करते हैं, तो मन में जिज्ञासा कलोल भरती है,-‘आखिर इस कवि के पास ऐसा कौन-सा टेलीस्कोप है जो उसकी दृष्टि को इतना दूरदर्शी बना देती हैं!’ मर्मस्पर्शी चित्रण जिससे गुजरते हुए कलेजा दो-टुक हो जाता है; की वेदना देखिए-‘किस तरह एक दरिद्र किसान मनौती मानता है/प्रार्थना करता है-मनबाहु ब्रह्मपुत्र-/अगर क्रुद्ध हो गए, तो किसान के सपने बह जाते हैं/ढोर और झोपड़ी-नवजात शिशु और/बांसुरी बजाने वाला चरवाहा लड़का/ले लेते हैं जल-समाधि’।

उत्तर आधुनिक मित्रता के अपनापे में गलबहियाँ करती नई पीढ़ी क्या इस दर्द, टीस, हूक, कसक को बूझ पाएगी; यदि नहीं तो यह खतरे की निशानी है। जो नदी के खतरे के निशान पर चढ़ने से भी अधिक भयावह और त्रासद है। इन दिनों जनगाथा से उलट लिखे-पढ़े के इतिहास को ऊँट बनाकर इस-उस करवट बिठाने की जो विध-विधि अपनाई जा रही है, वह सर्वथा ग़लत है। समय रहते अपनी ग़लती में सुधार किए बिना हममें से किसी का बच पाना मुश्किल है। खेत, चरवाहे, किसान, आदिवासी, कारीगर, मजदूर, शिल्पी, लेखक, कवि इत्यादि जिनको नज़रअंदाज करना मौजूदा समय-समाज का शगल है; कुछ भी नहीं बचेगा।

जातिवादी मानसिकता एवं भ्रष्ट आचरण वाले लोगों की कारस्तानियों-करतूतों को छोड़ दें, तो अधिसंख्य पुरनिया बचे रहे क्योंकि उन्होंने अतीत को जिया ही नहीं उसे समुचित आदर-सम्मान भी दिया। आज की लखटकिया माहवारी वाली मुझ जैसी पीढ़ी को लानत है जो कायदे से अपने घर और परिवार को नहीं जानते, वो क्या और कहाँ जान सकेंगे ब्रह्मपुत्र की तलछटी, कछार और उसके तीर पर बसे लोगों का दुःख-दर्द, टीस-हूक, आफ़त और बेचैनी। कवि दिनकर उनको महसूसते हैं क्योंकि वे उनके बीच रहते हैं। स्त्री का आत्मा-शरीर लिए किन्तु गणिकाओं के वेश में जो आकार-आकृति ब्रह्मपुत्र से साक्षात्कार करती है, उनके लिए कवि का शब्द कितना जीवंत है, ‘ब्रह्मपुत्र का जल एक-दूसरे पर उछालती हुई गणिकाएँ/धोने की कोशिश करती हैं विवशता को/थकान को अनिद्रा को कलेजे की पीड़ा को/भूलने की कोशिश करती हैं रात भर की यंत्रणा को/नारी बनकर पैदा होने के अभिशाप को’।

ब्रह्मपुत्र को कवि ‘बाबा’ शब्द से सम्बोधित करता है, तो वह आत्मीयता के साथ पुरातनता का भी द्योतक है। यह नजदीकीपन राग-वैराग दोनों का साक्षी; उल्लास-बिछोह दोनों का गवाह है। दिनकर कुमार के कहन का ढंग तो देखिए, ‘बाबा ब्रह्मपुत्र!/मैं चाहता हूँ कि जब मैं गाऊँ तो/तुम भी मेरे संग मग्न होकर गाओ/ मेरे सीने में लहराता हुआ वैशाख/तुम्हारे चेहरे पर भी गुलाल बनकर बिखर जाए/अमलतास के लाल लपटों से खुशी के अक्षर/आसमान पर उभर जाएँ!’। स्मृति से विरत और अनुभव से खाली हम जैसे लोग सांस लेने के बावजूद हवा की गंध महसूसना नहीं जानते, धूप सेंकने के बावजूद धूप को अपने चित्त पर परावर्तित होने देना नहीं चाहते हैं। हमारे लिए हमारी कृत्रिम सजावट और बनावटीपन ही यथार्थ है, अपना सर्वस्व है। आभासी दुनिया की चुहल और फंतासी ही हमारे मनुष्य होने की निशानी है; ऐसे में दिनकर कुमार की ‘ब्रह्मपुत्र में सूर्यास्त’ कविता एकबारगी हमें झकझोरने लगती है, ‘रंगों का गुलाल/मेरे वजूद पर भी बिखर गया है/नारी की आकृति वाली पहाड़ी के नीले रेंग के साथ/लाल रंग घुल गया है/दूर बढ़ती हुई नाव सुनहली बन गई है/इस अलौकिक पल की कैद से/मैं मुक्त होना नहीं चाहता/इस रहस्यमी दृश्यावली से दूर/होकर मैं कहीं नहीं रह सकता।’

ब्रह्मपुत्र का अतीत सदानीरा रहा है। यह नदी झूठा आश्वासन या फ़रेबी दिलासा देने की आदी नहीं है। कवि समय के प्रायोजित उपक्रम और शोषण-उत्पीड़न के आधुनिक कुचक्रों के बीच नदी को असहाय जान बिफर पड़ता है, ‘एक प्राचीन नदी इस कदर तटस्थ कैसे हो सकती है/कुछ बोले बगैर विरोध जतलाए बगैर/चुपचाप कैसे बहती रह सकती है/कैसे सुन सकती है किनारे के लोगों का हाहाकार’। यह किनारा सामाजिक हाशिया है और सीमान्त का क्षेत्र भी जो कई बार अपने भूगोल के नाते भी 'बहिष्कृत भारत' मानिंद जान पड़ता है। ऐसे में नदी ही उसका बिस्तर-बिछौना, माथ-ललाट है। बकौल कवि ‘नदी समझती है मांझी की अनुभूतियों को/मौन में घुली हुई शिकायत को/सीने में पलते हुए प्रेम को विद्रोह को/नदी समझती है सबकुछ’। दिनकर यहीं नहीं रूकते जन-मन के साथ नदी के साहचर्य-सम्बन्धन को एक बीजरूप प्रदान करते हुए कहते हैं-‘नदी की जीवन कथा असल में हमारी जीवन कथा होती है।’

नदी जब राग बनती है, तो गले में समा जाती है। भूपेन हजारिका के लिए ब्रह्मपुत्र ‘बूढ़ लुइत’ है। कवि के शब्दों में ‘जो हाहाकार को सुनते हुए भी/ख़ामोश रहता है’। भूपेन हजारिका की स्मृति में ब्रह्मपुत्र को याद करते हुए कवि कहता है-‘भूपेन हजारिका के गीतों में स्पंदित है/ब्रह्मपुत्र उसके विविध रंग/उसकी प्रसन्नता उसका शोक उसका क्रोध।’ दरअसल,आदमी को इंसानी रुह बख़्शने का काम नदी बड़े जतन से करती है। वह सचमुच में ‘कनेक्टिंग पीपुुल्स’ है। नदी का स्वभाव इतना ‘केयरिंग’ है कि कोई भी उसके किनारे पर सर रख कर उसका आशीष पा सकता है। ब्रह्मपुत्र के आश्रय में जो भी जाता है अपनी कुंठा, विषाद, दुःख, संताप, भूल, ग़लती सबकुछ से बरी यानी मुक्त हो जाता है। दिनकर इसीलिए यह कहने के आग्रही हैं अपनी कविता ‘नदी के पास जाऊँगा' में-‘प्रेम में डूबने के बाद/नदी के पास जाऊँगा/नदी मुझे बना देगी मोहक/मेरे अंदर की सारी कलुषता को/अपने संग बहाकर ले जाएगी’।

बतौर कवि दिनकर कुमार ब्रह्मपुत्र की नक्काशी जबर्दस्त करते हैं; उनके चित्रण और वर्णन इतने स्वाभाविक हैं कि हम सहज ही अंतरंग हो जाते हैं। देखिए, हाथ कंगन को आरसी क्या!-‘शाम होते ही इसी तरह धूसर हो जाता है चित्र/बगुलों का झुंड पंख फड़फड़ाता हुआ/इस पार से उस पार तक उड़ता जाता है/जलधारा में हिलते रहते हैं पंखों के प्रतिबिम्ब’। इन्हीं सब कारणों से ब्रह्मपुत्र जनजातीय स्मृतियों में गहरे बसा हुआ है जिसकी चेतन-अचेतन अभिव्यक्ति सायास-अनायास होते रहते हैं। कवि ने इस ओर संकेत करते हुए अपनी कविता ‘जनजातीय स्मृतियों से’ में लिखा है-‘सोनेवाल कछारी समुदाय आज भी अपने मृतक की/अंत्येष्टि करते समय गाड़ता है तांबे का एक सिक्का/चूँकि वह सारी भूमि पर तुम्हारा ही अधिकार समझता है/और इस तरह अंत्येष्टि के लिए खरीदता है/तुमसे थोड़ी सी ज़मीन/यह समुदाय अपने गाँवों के नाम किसी न किसी/उपनदी के नाम पर रखता है।/जनजातीय स्मृतियों से जुड़े हुए हो तुम ब्रह्मपुत्र।’ ब्रह्मपुत्र नदी लोकमन की धड़कन है, संगीत और आवाज है; जो हरदम अपनी ही धुन, लय, राग में बजती है; बजना जानती है। कवि दिनकर की पंक्तियाँ इसकी बानगी पेश करते हुए कहती हैं-‘शराईघाट पुल के उत्तरी छोर से/मैं देख रहा हूँ रोशनी की लकीरों को/रहस्यमयी शाम को ओढ़कर गुमसुम है शहर/स्याह जलधारा में/दूर-दूर तक फैली हुई लकीरें/इन तिलिस्मी लकीरों में ही मानो/धड़कता है मेरे शहर का हृदय’।

फिलहाल, मात्र सतरटकिया मूल्य वाले इस काव्य-संग्रह का पेपरबैक संस्करण आप खुद पढ़ें, तो मालूम चलेगा कि ब्रह्मपुत्र का रंग इतना गाढ़ा, धूसर और लालिमा लिए क्यों है! कभी-कभर नदी उदास क्यों हो जाती है? कवि दिनकर के लिए नहीं, तो ब्रह्मपुत्र के लिए तो हमारा इतना मानुष होना वाज़िब बनता है। तभी हम जान पाएँगे कि-‘किस बात की पीड़ा है जो/नदी को बेचैन रखती है/क्यों चाहती है वह/प्यार के दो मीठे बोल/थोड़ी सी हमदर्दी’।

हैलो, क्या आप हिंदी बोलते हैं; नमस्ते...! - डाॅ. राजीव रंजन प्रसाद

हैलो, क्या आप हिंदी बोलते हैं; नमस्ते...!

नवाधुनिक विधानों एवं नवाचारी अनुशासनों में हिंदी भाषा सहज ही स्वीकार्य है। हिंदी की ‘रेंज’ बहुत अधिक है। वैश्विक बनती हिंदी चुनावी भाषणों, ख़रीद-बिक्री सम्बन्धी सामान्य बातचीतों, नितांत निजी अथवा घरेलू राय-विचारों, सामान्य-विशेष बहस-मुबाहिसों आदि की पटरी पर सरपट दौड़ रही है। इसके अतिरिक्त नवमाध्यमों यानी ‘न्यू मीडिया’ एवं ‘वर्चुअल मीडिया’ में भी उसकी भूमिका देखने योग्य है। संचार-क्रांति और सूचना-राजमार्ग वाली इस उत्तर शती में भारतीय भाषा का वैश्विक वितान ‘हिन्दी-समय’ ही है। यह राष्ट्रीय ही नहीं अन्तरराष्ट्रीय दबाव है कि हिंदी बौद्धिकता अंग्रेजी ‘आईपीआर’ (इंटेलेक्चुअल प्रोपर्टी राइट) को सीधे टक्कर दे रही है।

रोजगारपरक और कौशल-निर्माणकारी भाषा की खोज में उभरे हिंदी के प्रयोजनमूलक स्वरूप को देखें, तो इक्कीसवीं सदी का भारत आज जिस ज़बान में जवान होता दिखाई दे रहा है, वह प्रयोजनमूलक हिंदी ही है। चुनाव से बड़ा उदाहरण और क्या हो सकता है। अंग्रेजी के जानकर, प्रबंधक, बौद्धिक चाहे जो कुछ भी कर ले; चुनाव की भाषा यानी ‘मीडियम आॅफ स्पीच’ हिंदी की जगह अंग्रेजी नहीं हो सकती है। इसी प्रकार फ़िल्म, विज्ञापन, समाचार एवं मनोरंजन माध्यम आदि में हिंदी की पैठ एवं ठाठ जबर्दस्त है। ‘न्यू मीडिया’ की खूबियों को पूरी तरह आत्मसात कर चुकी हिंदी भाषा को जानने, देखने, समझने की जो नयी परिपाटी शुरू हुई है, उसका एक बड़ा उपभोक्ता-वर्ग हिंदी जनसमाज है। यूनीकोडी सोशल मीडिया ने तो झमाझमी मचा दी है। यथा: वेब, ब्लाॅग, ट्वीटर, फेसबुक, वाट्सअप, हैंगआउट, हैशटैग इत्यादि।

यह समय अपनी हिंदी भाषा को लेकर रुदाली-गान करने का नहीं है। अंग्रेजी की आलोचना करने की जगह आज आवश्यकता अन्तरभाषायी तथा अन्तरानुशासनिक हिंदी अनुवाद की दिशा में उत्तरोत्तर आगे बढ़ने की है। साहित्य, कला, विज्ञान, प्रौद्योगिकी इत्यादि से सम्बन्धित ज्ञानानुशासनों को हिंदी में लेकर आना हिंदी भाषा के वैश्विक महत्त्व एवं पहचान को केन्द्रीयता प्रदान करना है। जनपक्षधरता की दृष्टि से अंग्रेजी ही नहीं, संविधान की आठवीं अनुसूची में वर्णित सभी राष्ट्रीय भाषाओं का अनुवाद सम्बन्धी कार्य महत्त्वपूर्ण है। विशेषतया विभिन्न देशज भाषाओं में उपलब्ध ज्ञान-सामग्रियों का हिंदी में संग्रहण-संकलन अत्यावश्यक है। यह कार्य स्वाधीनतापूर्व बड़े जतन से किया गया।

यह और बात है, आजादी से पहले जिस हिन्दुस्तानी ज़बान ने देश की गरिमा और उसका गौरवगान कायम रखा था, स्वाधीन भारत में उसे वह सर्वोचित स्थान नहीं मिला। बहुभाषिक तथा बहुसांस्कृतिक भारतीय जनसमाज में हिंदी के महत्त्व को इरादतन कम कर दर्शाना अंग्रेजीपठित भारतीय नेताओं की सोची-समझी चाल थी। बाद के दिनों में हिंदी भाषा को लेकर जो विवाद-विरोध शुरू हुए उसे भाषिक राजनीति कहा जाना उचित है। भाषा को लेकर वितंडावाद खड़े करने वाले अधिसंख्य नेताओं को अपनी-अपनी मातृभाषाओं से लगाववृत्ति न होकर उनमें राजनीतिक हित-लाभ साधने की छटपटाहट और महत्त्वाकांक्षा अधिक थी। हाल के दिनों तक संयुक्त राष्ट्रसंघ में हिंदी भाषा को शामिल किए जाने को लेकर चर्चे खूब हुए; लेकिन हिंदी की दशा और दिशा में आमूल-चूल परिवर्तन नहीं हुआ।

ध्यातव्य है कि हम आज को लेकर अतीत के कालक्रमों पर अपना मनगढ़त आरोप मढ़ते हैं। जबकि अंग्रेजी का दबदबा अंग्रेजी राज में भी वैसी सम्मानित स्थिति में कभी नहीं रहा जिस प्रभुमान स्थिति में आज है। दरअसल, ‘‘जब अंग्रेजी शिक्षा और सभ्यता भारत के चिंतनशील लोगों के बीच में आई, उन्होंने बजाए इसके कि इसके साथ बह जाएँ, अपने अतीत की ओर देखना आरंभ किया। इससे एक नए जागरण का युग प्रारंभ हुआ।’’ स्वाधीनता आन्दोलन के दिनों में उपलब्ध उन सभी माध्यमों को आज़माया गया जिसमें भारतीयता की जान बसती हो, राष्ट्रीयता की चेतना अनुस्यूत हो। समाचारपत्र-पत्रिकाओं से कहीं अधिक बेजोड़ करतब दिखाने का काम ‘आकाशवाणी’ और स्वाधीनता के पश्चात ‘दूरदर्शन’ ने किया।

विशेषतया ‘‘इसके लिए आकाशवाणी का माध्यम सबसे सबल और प्रबल माध्यम है। क्योंकि अनेक बोलियों में, अनेक भाषाओं में प्रसारण इस संस्थान के द्वारा होता है लेकिन अभिव्यक्ति इतनी भाषाओं में, इतनी बोलियों में, मुद्रण के माध्यम से भी नहीं होती जितनी कि इसके माध्यम से होती है और इसमें अपनी अभिव्यक्ति की विविध शैलियाँ हैं जैसे कि जो आकाशवाणी के हमारे किसानों के लिए कार्यक्रम होते हैं, हमारे श्रमिकों के लिए कार्यक्रम होते हैं या अन्य विशेष वर्गों के लिए जो कार्यक्रम होते हैं उनमें ऐसी अभिव्यक्ति-शैली अपनाई जाती है जो उन तक बात पहुँचा सके।’’

स्मृतिभ्रंशता के इस मुश्किल दौर में विभिन्न समाज एवं संस्कृतियों के बीच एक सेतु बनाए जाने की आवश्यकता महसूस की जा रही है। हिंदी अपनी जनपक्षधर प्रकृति के कारण यह सेतु बन भी रही है। ध्यातव्य है कि भारतीय परिक्षेत्र से बाहर और भारत के सभी क्षेत्रों में हिन्दी समझी जाती है। समझे जाने का मतलब वह भाषा जिसे बहुत सारे लोग बोलते हैं; अपने भाव, विचार एवं दृष्टि में बड़ी आसानी से बरतते हैं। यह सहजता हिन्दी भाषा की खूबसूरती है यानी प्राणतत्त्व। हिन्दी भाषा की लिपि देवनागरी है। हिन्दी लिखावट और उच्चार दोनों में सादृश्यता रखती है। इस भाषिक वैशैष्टिय के कारण यह बेहद सुघड़ और सजीव भाषा है।

‘कर ले ग़लती से मिस्टेक’ वाली ‘मस्टेकियन’ पीढ़ी को यह समझना ही होगा कि हिंदी भाषा जिसे नवजागरणकाल में बखूबी गढ़ा गया; में प्रतिरोध की चेतना और आत्मबल की शक्ति प्रचुर मात्रा में सन्निहित थी। यह शक्ति ओजमान और तेजमान थी इसलिए भारतीय स्वाधीनता आन्दोलन में हिंदी पत्रकारिता के अवदान एवं योगदान को लेकर बहुत कुछ कहने-सुनने को शेष है। इक्कीसवीं सदी में पैदा और विकसित हुई पीढ़ी को ध्यान में रखकर कहें, तो हमें अपनी भाषा-संस्कृति और उसमें घुली-मिली राजनीतिक चेतना को लेकर संवेदनशील होने-बनने की जरूरत सबसे अधिक है। युवाओं पर अतिरिक्त बल इस कारणवश कि, ‘‘जिस दुनिया में हम जी रहे हैं, वह बुद्धिजीवी-पैगम्बरों की दुनिया है, स्वार्थ में डूबे हुए व्यक्तियों की दुनिया है। वह ऐसी दुनिया है, जिसमें औद्योगिक और पूँजीवाद से निकली एक भयानक पद्धति राज कर रही है। जिसमें तकनीकी सफलताओं और बाहरी जीतों की धूम है, जिसमें शारीरिक सुविधाओं और अवास्तविक विलासिता सामग्री की बाढ़ है, जहाँ सार्वजनिक जीवन में भी अनियंत्रित लिप्सा का अनंत साम्राज्य है। जहाँ पाशविकता और रक्तपात का सहारा लेकर तानाशाही फैल रही है, जहाँ वास्तविकता का आदर एवं धर्म तथा आत्मा की उपेक्षा सबसे बड़ा आधार है।’’

अतएव, अधिसंख्य भारतीय भाषाओं के समक्ष अपने को बचाए रखने की जद्दोजहद जबर्दस्त है। हमने निज भाषा से सृजित माध्यम-संस्कृति जिसमें एक-दूसरे से जुड़ने या जुड़े रहने की अभ्यर्थना होती है; का परित्याग कर दिया है। अंग्रेजी की आरोपित माध्यम-संस्कृति ने भारतीय भाषा के सत्यानाश का महानुष्ठान जारी रखा है। लेकिन यह सच है, कोई भी अनुष्ठान दीर्घजीवी नहीं होता है। प्रत्येक भाषा न तो मन की कैदी है, न विचार की बंदी। यह तो अनुभूति, प्रत्यक्ष ज्ञान, आचरण और उन्मुक्त आदान-प्रदान पर आधारित ‘वार्ता-कौशल’ है। यह कौशल अथवा प्रवीणता अर्जित है न कि प्रकृत। इस कारणवश इसका स्वरूप किंचित मात्र भी पूर्व-निर्धारित या नियंत्रित नहीं है। आज हिंदी भाषा ऐसे वितण्डावादियों को धूल चटा चुकी है। वह पूरे विश्व में ज्ञान की भाषा बनने के लिए दृढ़संकल्पित है। हिंदी में भाषिक दक्षता, कुशलता, प्रयोग, अनुप्रयोग, प्रकृति, प्रयुक्ति आदि का समाजशास्त्र बदल चुका है। अर्थशास्त्र इसकी चेरी है। विज्ञापन हो या फिल्म, हाट-बाज़ार हो या उत्तर-दक्षिण हिंदी सबको जोड़ने में सफल है। हिंदी अन्य प्रदेशों की मातृभाषाओं के संग-साथ राष्ट्र-निर्माण में जुटी है।

-डाॅ. राजीव रंजन प्रसाद

Wednesday, 19 September 2018

सिद्धार्थ की कविता इक छोटी सी हँसी

इक छोटी सी हँसी

अगर तुम खरीद सकते हो कुछ
तो खरीदना इक छोटी सी हसी

उस नन्ही लड़की के लिये
जो किसी बड़े महानगर की चौड़ी सड़क पर
लाल गुलाब लिये दौड़ रही है
इस उम्मीद के साथ
कि सिगनल के  लाल होते ही
तुम्हारी जिंदगी ठहर सी जायेगी
चंद सेकंड्स के लिये ही सही
और तुम देख सकोगे
बचपन कैसे भागता है
जल्दी-जल्दी

तुम खरीद लेना उसके हाथों से बस एक गुलाब
मोल-भाव मत करना
दस-बीस -पचास से कही महगी है
उसकी उम्मीद
जो बस आज और आज में जीती है
गुलाब से गेहूँ खरीदती है
और भरती है परती पेट
कल उसके शब्दकोष में नहीं है

तुम खरीद लेना बस एक गुलाब
झिझकना मत उसके गंदे-फटे फ्राक को देखकर
मत सोचना अपनी बस्साती गंध में डुबो दिया होगा उसने
तुम्हारे गुलाब को

सोचना तुम खरीद रहे हो
कोई एक गुलाब नहीं
इक छोटी सी हसी
सोचना तुम खरीद रहे हो
इक छोटी सी हसी
जो खिलेगी तुम्हारी प्रेमिका के सुर्ख-लाल होंठों पर
जो फैलेगी तुम्हारे मन तक
जो फिर दौड़ेगी सड़को पर
उस लाल गुलाब वाली लड़की के साथ
जो जोहेगी हर रोज तुम्हे उसी चौराहे पर
ठीक उसी समय
उसी मन से
कि तुम हर दिन खरीदोगे एक छोटी सी हसी
उसके लिये भी

सिद्धार्थ

विष्णु खरे की एक कविता 'चुनौती'

चुनौती / विष्णु खरे 

इस क़स्बानुमा शहर की इस सड़क पर
सुबह घूमने जाने वाले मध्यवर्गीय सवर्ण पुरुषों में
हरिओम पुकारने की प्रथा है

यदि यह लगभग स्वगत
और भगवान का नाम लेने की एकान्त विनम्रता से ही कहा जाता
तब भी एक बात थी
क्योंकि तब ऐसे घूमने वाले
जो सुबह हरिओम नहीं कहना चाहते
शान्ति से अपने रास्ते पर जा रहे होते

लेकिन ये हरिओम पुकारने वाले
उसे ऐसी आवाज़ में कहते हैं
जैसे कहीं कोई हादसा वारदात या हमला हो गया हो
उसमें एक भय एक हौल पैदा करने वाली चुनौती रहती है
दूसरों को देख वे उसे अतिरिक्त ज़ोर से उच्चारते हैं
उन्हें इस तरह जांचते हैं कि उसका उसी तरह उत्तर नहीं दोगे
तो विरोधी अश्रद्धालु नास्तिक और राष्ट्रद्रोही तक समझे जाओगे
इस तरह बाध्य किये जाने पर
अक्सर लोग अस्फुट स्वर में या उन्हीं की तरह ज़ोर से
हरिओम कह देते हैं
शायद मज़ाक़ में भी ऐसा कह देते हों

हरिओम कहलवाने वाले उसे एक ऐसे स्वर में कहते हैं
जो पहचाना-सा लगता है

एक सुबह उठकर
कोठी जाने वाले इस ज़िला मुख्यालय मार्ग पर
मैं प्रयोग करना चाहता हूं
कि हरिओम के प्रत्युत्तर में सुपरिचित जैहिन्द कहूं
या महात्मा गांधी की जय या नेहरू ज़िन्दाबाद
या जय भीम अथवा लेनिन अमर रहें
- कोई इनमें से जानता भी होगा भीम या लेनिन को? -
या अपने इस उकसावे को उसके चरम पर ले जाकर
अस्सलाम अलैकुम या अल्लाहु अकबर बोल दूं
तो क्या सहास मतभेद से लेकर
दंगे तक की कोई स्थिति पैदा हो जाएगी इतनी सुबह
कि इतने में किसी सुदूर मस्जिद का लाउडस्पीकर कुछ खरखराता है
और शुरू होती है फ़ज्र की अज़ान
और मैं कुछ चौंक कर पहचानता हूं
कि यह जो मध्यवर्गीय सवर्ण हरिओम बोला जाता है
वह नमाज़ के वज़न पर है बरक्स

शायद यह सिद्ध करने का अभ्यास हो रहा है
कि मुसलमानों से कहीं पहले उठता है हिन्दू ब्राह्म मुहूर्त के आसपास
फिर वह जो हरिओम पुकारता है उसी के स्वर अज़ान में छिपे हुए हैं
जैसे मस्जिद के नीचे मन्दिर
जैसे काबे के नीचे शिवलिंग

गूंजती है अज़ान
दो-तीन और मस्जिदों के अदृश्य लाउडस्पीकर
उसे एक लहराती हुई प्रतिध्वनि बना देते हैं
मुल्क में कहां-कहां पढ़ी जा रही होगी नमाज़ इस वक़्त
कितने लाख कितने करोड़ जानू झुके होंगे सिजदे में
कितने हाथ मांग रहे होंगे दुआ कितने मूक दिलों में उठ रही होगी सदा
अल्लाह के अकबर होने की लेकिन
क्या हर गांव-क़स्बे-शहर में उसके मुका़बिले इतने कम उत्साहियों द्वारा
हरिओम जैसा कुछ गुंजाया जाता होगा

सन्नाटा छा जाता है कुछ देर के लिए कोठी रोड पर अज़ान के बाद
होशियार जानवर हैं कुत्ते वे उस पर नहीं भौंकते
फिर जो हरिओम के नारे लगते हैं छिटपुट
उनमें और ज़्यादा कोशिश रहती है मुअज़्ज़िनों जैसी
लेकिन उसमें एक होड़ एक खीझ एक हताशा-सी लगती है
जो एक ज़बरदस्ती की ज़िद्दी अस्वाभाविक पावनतावादी चेष्टा को
एक समान सामूहिक जीवन्त आस्था से बांटती है
वैसे भी अब सूरज चढ़ आया है और उनके लौटने का वक़्त है

लेकिन अभी से ही उनमें जो रंज़ीदगी और थकान सुनता हूं
उस से डर पैदा होता है
कि कहीं वे हरिओम कहने को अनिवार्य न बनवा डालें इस सड़क पर
और फिर इस शहर में
और अन्त में इस मुल्क में.

(परिकल्पना प्रकाशन द्वारा प्रकाशित 'लालटेन जलाना' से साभार)

Sunday, 16 September 2018

वे डरते हैं/गोरख पाण्डेय

वे डरते हैं/गोरख पाण्डेय

किस चीज़ से डरते हैं वे

तमाम धन-दौलत

गोला-बारूद पुलिस-फ़ौज के बावजूद ?

वे डरते हैं

कि एक दिन

निहत्थे और ग़रीब लोग

उनसे डरना

बंद कर देंगे ।

(रचनाकाल:1979)

-गोरख पाण्डेय

Monday, 10 September 2018

महाराज अजेय हैं / पंकज चतुर्वेदी

महाराज अजेय हैं
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नेतृत्व निरर्थक
साबित हुआ :
जब यह स्वीकार करने का
समय आया
राजा ने
दूसरे संकट की ओर
ध्यान दिलाया :
हमारा विपक्ष
प्रतिभाहीन है

सभासदों ने दोहराया :
महाराज का
कोई विकल्प नहीं है

उन्होंने जय-जयकार की :
महाराज अजेय हैं
अजर हैं
अभी आधी सदी तक
राज करेंगे

विधान के मुताबिक़
प्रत्येक पाँच साल पर
जनमत-संग्रह की भी
ज़रूरत नहीं
क्योंकि राज्य में
योग्यता का अभाव है

कारण कुछ ऐसा था
कि अकाल की
ख़बर की तरह
सुन पड़ती थी
यह मुनादी

कविता कादंबरी की कविताएँ

            1

इस शोर से भरी दुनिया में
मैं ओठों से तुम्हारी देह पर चुप्पियाँ बो रही हूँ
और तुम्हें शब्दों की कमी टीसती है!

शssss
चुप रहो न
करवट बदलो
और सुनो चुप्पी की आवाज़

तुम अनुभव करोगे
कि शब्द अर्थ भ्रष्ट हो चुके हैं
सुंदर कोमल शब्दों को
भीतर से चाट गए हैं दीमक
जिनमें अगर कुछ है, तो बस
खोखलेपन का उथला शोर है

तुम अनुभव करोगे चुप्पी का शुद्ध व्याकरण और भाव गाम्भीर्य का विस्तार

तुम अनुभव करोगे
कि चुप्पियों ने बचा रखी है भाव और भाषा की गहराई और माधुर्य

तुम अनुभव करोगे
कि बेमानी है बोलना

और एक दिन तुम अनुभव करोगे मिट्टी होना,धरती होना और होना आकाश भी
कि तुम्हारी देह पर बोई गई चुप्पियों में उतनी ही चुप्पी से उग आएंगे सतरंगी फूल
जिनकी बेलें धरती से आकाश तक फैल रही होंगी
और अनहद हो रही होगी जिनकी सुगंध की अलिखित भाषा

Sunday, 9 September 2018

कविता कादंबरी की कविताएँ

            1

इस शोर से भरी दुनिया में
मैं ओठों से तुम्हारी देह पर चुप्पियाँ बो रही हूँ
और तुम्हें शब्दों की कमी टीसती है!

शssss
चुप रहो न
करवट बदलो
और सुनो चुप्पी की आवाज़

तुम अनुभव करोगे
कि शब्द अर्थ भ्रष्ट हो चुके हैं
सुंदर कोमल शब्दों को
भीतर से चाट गए हैं दीमक
जिनमें अगर कुछ है, तो बस
खोखलेपन का उथला शोर है

तुम अनुभव करोगे चुप्पी का शुद्ध व्याकरण और भाव गाम्भीर्य का विस्तार

तुम अनुभव करोगे
कि चुप्पियों ने बचा रखी है भाव और भाषा की गहराई और माधुर्य

तुम अनुभव करोगे
कि बेमानी है बोलना

और एक दिन तुम अनुभव करोगे मिट्टी होना,धरती होना और होना आकाश भी
कि तुम्हारी देह पर बोई गई चुप्पियों में उतनी ही चुप्पी से उग आएंगे सतरंगी फूल
जिनकी बेलें धरती से आकाश तक फैल रही होंगी
और अनहद हो रही होगी जिनकी सुगंध की अलिखित भाषा

Thursday, 6 September 2018

अरुण शीतांश की कविताएँ

देखना तो ऐसे देखना

मेरी बच्ची सुबह सुबह उठना
लेकिन कसाई का मुँह मत देखना

देखना तो कसाई की बेटी को देखना
खून न देखना

मेरी बच्ची उस ठेहे को बिल्कुल मत देखना
बेहोश मत होना

लाईन में लगे उन जीवों पर दया करना
जैसे एक चिड़िया अपने बच्चे को समय से चोंच में दाना भर उड़ जाती है

तुम कुछ भी मत देखना
जिससे तुम्हारे गर्भ में पल रहे बच्चे पर
असर हो

एक पिता होने के नाते तुम्हें कह रहा हूँ

लेकिन तुम कसाई के भूख को जरुर जानना

जिसके बच्चे देश के भविष्य हैं ...

रात: २ बजे
५ सितम्बर १६

फूल के पौधे

मेरे पास दो फूल है
तीसरा फूल तुम हो

दरअसल फूल के पौधे
जगमग करते
गमकते हुए
जंगल से
मेरे आँगन में हैं आज

तुम पृथ्वी में समेटे बीज
हो
चाँदनी की रौशनी में
सोने की ताबीज

मेरे दोनो कंधे और
दोनो पैर में बल अतिरिक्त आ चुका है

रंग और स्वर
ताल और नाद
समय और सोपान के बीच नहीं
पुरी शक्ति हो

आओ !
बाँहो में भर जावो
मेरी गुस्सैल प्रेमिका

नदी के छोर को छोड़ दो
और बाँह पकड़ लो
पार कर
हँसेगे जोर से
जैसे बच्चे हँसते हैं
जी भर

कैमरा मैन
.............

कितना अच्छा था
कुछ भी ले जाने का
झंझट नही था

कितना अच्छा था

अब घर से पहनकर जाओ
तब खिंचो या खिचवाओ

सेल्फी है अब
रिश्ते बदल गए

अब कोट पहनो तब जाओ
जूते पॉलिस करो
पाउडर लगाओ

पहले सबकुछ वहाँ मिल जाता रहा
कंघी ऐनक मुस्कुराहट

कैमरा मैन!!!

अब सबकुछ होते हुए
कुछ नहीं मिलता

लड़की चुपके से आ जाती बैठ जाती धीरे से
कैमरा मैन दोनो का बाँह पकड़कर डाल देता गले में
पसिना होकर भी
धड़कन बढने पर भी
चुपचाप लौट जाते घर
और तकिए के नीचे फोटू छूपा रोते पूरजोर

अब हमारा कोई नहीं  कैमरा मैन

न वैसी कुर्सी
न वैसा जीवन
न वैसा गुलदस्ता
न स्टुल
न वैसा बस्ता

न वैसा विचार
न वैसा घर
न वैसा क्रोध
एक फोटो देखकर सोच रहा हूँ
मुक्तिबोध..

  ०६ ०९.२०१४ (आरा)

दोनों

फूल पर बारिश हुई।
कुछ बचा
कुछ गिरा
अब दोनो सुख रहे हैं
फूल झड़ रहा है

बूँदें हवा में समा गईं

वहाँ एक बच्चा हँस रहा
एक बच्ची रो रही है!

आज फिर बारिश होनेवाली है।...

Tuesday, 4 September 2018

कविताएं अंत तलाशती हैं / सूरज सरस्वती

कविताएं अंत तलाशती हैं / सूरज सरस्वती
अज्ञात युगल तलाशता है स्नेह
स्नेह जिसमें छिपा होता है प्रेम प्रेम के पश्चात विरह का आगमन
तलाशता है प्रेम की नवीनतम परिभाषा
सूरज सरस्वती
दो देह तलाशते हैं एकांत
और एकांत तलाशता है एकात्मा
उन दो देहों के आपसी स्पर्श में
सिंदूरी वर्ण तलाशता है रिक्त मांग
अनामिका तलाशती है मिलन की अंगूठी
दो जोड़ी नेत्र तलाशते हैं सम्मान
ईश्वर तलाशते हैं भक्त
जो करें आराधना पवित्र मन से
भक्त तलाशता है ईश्वर में जीवन
जो कवच बन सके उस भक्त का
चंचरीकों की काम क्रीडा तलाशती है
वर्णित पुष्प परागों की सुगन्ध
कहानियां तलाशती हैं नए क़िरदार
काव्य रसों से अवगत कराने को
कविताएं अंत तलाशती हैं
सूरज सरस्वती

Monday, 3 September 2018

प्रभात मिलिंद की कविता / एक कॉमरेड का बयान

प्रभात मिलिंद की कविता / एक कॉमरेड का बयान

(गोरख पांडेय की स्मृति में)

हम ऐसे शातिर न थे
कि इस तरह से मार दिए जाते
हमारे मंसूबे ख़तरनाक तरीके से बुलंद थे
इसलिए हमारा मारा जाना तय था ...
हमें कुछ ख़्वाब को अंजाम देना था
बचे हुए वक़्त में बची हुई ईंट-मिट्टी से
हमें बनानी थी एक मुख़्तलिफ़ दुनिया
हम इसलिए भी मारे गए
कि हमने उन फरेबियों का एतबार किया
जिन्होंने खींच कर पकड़ रखी थी रस्सी
और उकसाया हमको बारम्बार
उसपर पांव साध कर चलने के लिए
लेकिन वे तो तमाशबीन लोग थे
उनको क्या ख़बर होती
कि नटों के इस खेल में
धीरे-धीरे किस तरह दरकता जाता है
आदमी के भीतर का हौसला
और बाहर जुम्बिश तक नहीं होती.
मारे जाने के वक़्त
जिनकी आंखों में खौफ़ नहीं होता
वे नामाक़ूल किस्म के लोग माने जाते हैं
वे मारे जाने के बाद भी
संशय की नज़र से देखे जाते हैं.
इसके बावजूद अगर हम चाहते
तो मारे जाने से शर्तिया बच सकते थे..
अगर हम नहीं होते इतना निर्द्वन्द्व और भयमुक्त
अगर हम नहीं करते इस विपन्न समय में प्रेम
अगर हम नहीं खड़े होते वक़्त के मुख़ालिफ़
अगर हम खुरच फेंकते आंखों के ख्वाब
अगर हम ढीली छोड़ देते अपनी मुट्ठियाँ
और गुज़र जाते पूरे दृश्य से.. निःशब्द
नेपथ्य से बोले गए उन जुमलों पर
होंठ हिलाने का उपक्रम करते हुए
जो दरअसल किसी और के बोले हुए थे
तब शायद हम मारे जाने से बच जाते.

प्रभात मिलिंद
Prabhat Milind

मोहे श्याम रंग दईदे / शैलजा पाठक

आज बात पर बात याद आई। ये रंग को लेकर कितनी तकलीफें झेली लड़कियों ने ।
जब घर में दो बहनें हो एक बहुत गोरी एक सांवली । तो बातें घर से ही शुरू हो जाती। मेरे रंग को लेकर अम्मा कैफियत देती कि वो प्रेग्नेंसी में बहुत पपीता खाती थी इसलिए मैं
सांवली हुई । जबकि भरम अम्मा को ये भी था कि नैनीताल रानीखेत वाली जगह पर जहाँ टमाटर जैसे गाल वालियां ही होती थी मैं भी कोई अप्सरा ही जनमु लेकिन पपीता वाली बात सही निकली। बधाई देने आये लोगों ने मेरी बन्द मुठ्ठी में तबसे सहानुभूति बांध दी ।
घर के लोग कई बार नही परहेज कर पाते कि जो बात वो यूँ ही कर रहे हैं उसका असर किसी बच्चे के मन पर बुरा हो सकता। चाचियाँ सामने से कहती रहीं "ए बबुनी बड़की बहिन त दूध जइसन बाड़ी रउवा काहे सांवर हो गइली "
मैंने अपने हिस्से कुछ भी बेहतर होगा की कल्पना भी नही की । मुझे जो मिलेगा वही हासिल होगा मेरा। आखिर मेरे रंग को लेकर शादी व्याह की बात भी अटक सकती थी । रंग की पूर्ति बड़े फ्रिज को देकर करनी पड़ती।
तो बस गुनहगार वाली फिलिंग आती रही। सपनें गोरी लड़कियाँ देखती होंगी। उनके दूल्हे सुंदर मिल सकते हैं दहेज कम हो सकता उनका। उन्हें कोई भी।दोस्त बना सकता है । नाते रिश्तेदारों में जाते ही हाथोहाथ पूछ होती उनकी। कोई जीजा का भाई ऐसी गोरियों पर दिल हारे बैठ सकता होगा । जो अच्छा होगा गोरी लड़कियों के साथ ही होगा।
स्कुल में मैं कभी परी नही बनी न रानी न स्टेज के मध्य में रही कभी प्रार्थना में पीछे और क्लास में पीछे ही जगह तय रही।
मेरे सांवली यादों के कुछ पन्ने लम्बे नाख़ून से है । खच्च से छील देते हैं मुझे । ऐसी लड़कियाँ डायरी में सपनें लिखती खुद को ही गुलाब देती अपने ही खाली पन्ने पर अपने होठ के निशान लगाती ।
और यूँ के जब नूतन गाती है" मेरा गोरा रंग लै लो मोहे श्याम रंग दै दो "
जब यही मुस्कराता सा मन करता अरे मुर्ख मत बदल रंग हमने इस रंग के लिए कितने जतन किये फिर भी न मिला .......

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सर गणेश दत्त