Saturday, 21 April 2018

महाराज संतोषी की कविता आसिफ़ा

आसिफा

ईश्वरीय उपस्थित के बीच
कोई मासूम
इस तरह
तडपा तडपा कर
मार दी जाए
और मेरे शहर  में
चर्चा  कुछ और हो
रोहिंग्या रोहिंग्या  का शोर हो

मै इस शोर के बीच
तुम्हारा  नाम पुकारूंगा
आसिफा आसिफा
तुम्हें  जिन्होंने  मारा
उन के पास
जैसे  बंधक  बना बैठा है
मेरा ईश्वर
चुपचाप  देखता  रहता है
आस्था  का तमाशा

Maharaj Santoshi, प्रसिद्ध कश्मीरी कवि

गौहर रज़ा की कविता ज़ख्म

ज़ख़्म

जिस्म पर ज़ख़्म हैं,
आँखों में लहू उतरा है,
आज तो रूह भी लरज़ां  है मेरी,
ज़हन पत्थर की तरह,
सख़्त-ओ-बेजान सा, मफ़लूज  सा,
बेहिस, बेकार
इस में चीख़ों के सिवा
कुछ भी नहीं, कुछ भी नहीं, कुछ भी नहीं

मुझ से मत पूछो मेरा नाम तो बेहतर होगा
मैं वही हूँ के जिसे
सारी बदमस्त बहारों को परखना था अभी
मैं वही हूँ के जिसे
फूल सा खिलना , महकना था अभी
झूमते गाते हुए झरनों की धुनों को सुन कर
मेरे पैरों को थिरकना था अभी
दरसगाहों  की खुली बाहों में जाना था मुझे
और एक शोले की मानिंद , धधकना  था मुझे

मैं वही हूँ जिसे
मंदिर की हदों के अंदर
तुम ने जूतों के तले रौंद दिया
मैं वही हूँ के जिसे
सारे भगवान खड़े,
चुप की तस्वीर बने
तकते रहे, तकते रहे, तकते रहे
और मेरे जिस्म का हर क़तरा-ए-ख़ून
थपकियाँ दे के सुलाने का जतन करता रहा
मुझ को समझाता रहा
मौत के पार हर एक ज़ुल्म सिमट जाएगा
तब कोई हाथ तुझे छू भी नहीं पाएगा

मैं वही हूँ जो दरिंदों के घने जंगल में
बैन करती रही इंसाफ़ के दरवाज़े पर
मुझ को मालूम नहीं था के तुम्हें
बाप का साया भी सर पर मेरे मंज़ूर नहीं

जिस्म पर ज़ख़्म हैं, गहरे हैं
बहुत गहरे हैं
मुझ से मत पूछो मेरा नाम तो बेहतर होगा

मादर-ए-हिंद हूँ मैं

वो जो ख़ामोश हैं शामिल हैं ज़िना में मेरी

-गौहर रज़ा

निर्भया को समर्पित कैफ़ी आज़मी की नज्म उठ मेरी जान! मेरे साथ ही चलना है तुझे….

उठ मेरी जान! मेरे साथ ही चलना है तुझे….

कल्ब-ए-माहौल में लरज़ाँ शरर-ए-ज़ंग हैं आज
हौसले वक़्त के और ज़ीस्त के यक रंग हैं आज
आबगीनों में तपां वलवला-ए-संग हैं आज
हुस्न और इश्क हम आवाज़ व हमआहंग हैं आज
जिसमें जलता हूँ उसी आग में जलना है तुझे
उठ मेरी जान! मेरे साथ ही चलना है तुझे

ज़िन्दगी जहद में है सब्र के काबू में नहीं
नब्ज़-ए-हस्ती का लहू कांपते आँसू में नहीं
उड़ने खुलने में है नक़्हत ख़म-ए-गेसू में नहीं
ज़न्नत इक और है जो मर्द के पहलू में नहीं
उसकी आज़ाद रविश पर भी मचलना है तुझे
उठ मेरी जान! मेरे साथ ही चलना है तुझे

गोशे-गोशे में सुलगती है चिता तेरे लिये
फ़र्ज़ का भेस बदलती है क़ज़ा तेरे लिये
क़हर है तेरी हर इक नर्म अदा तेरे लिये
ज़हर ही ज़हर है दुनिया की हवा तेरे लिये
रुत बदल डाल अगर फूलना फलना है तुझे
उठ मेरी जान! मेरे साथ ही चलना है तुझे

क़द्र अब तक तिरी तारीख़ ने जानी ही नहीं
तुझ में शोले भी हैं बस अश्कफ़िशानी ही नहीं
तू हक़ीक़त भी है दिलचस्प कहानी ही नहीं
तेरी हस्ती भी है इक चीज़ जवानी ही नहीं
अपनी तारीख़ का उनवान बदलना है तुझे
उठ मेरी जान! मेरे साथ ही चलना है तुझे

तोड़ कर रस्म के बुत बन्द-ए-क़दामत से निकल
ज़ोफ़-ए-इशरत से निकल वहम-ए-नज़ाकत से निकल
नफ़स के खींचे हुये हल्क़ा-ए-अज़मत से निकल
क़ैद बन जाये मुहब्बत तो मुहब्बत से निकल
राह का ख़ार ही क्या गुल भी कुचलना है तुझे
उठ मेरी जान! मेरे साथ ही चलना है तुझे

तोड़ ये अज़्म शिकन दग़दग़ा-ए-पन्द भी तोड़
तेरी ख़ातिर है जो ज़ंजीर वह सौगंध भी तोड़
तौक़ यह भी है ज़मर्रूद का गुल बन्द भी तोड़
तोड़ पैमाना-ए-मरदान-ए-ख़िरदमन्द भी तोड़
बन के तूफ़ान छलकना है उबलना है तुझे
उठ मेरी जान! मेरे साथ ही चलना है तुझे

तू फ़लातून व अरस्तू है तू ज़ोहरा परवीन
तेरे क़ब्ज़े में ग़रदूँ तेरी ठोकर में ज़मीं
हाँ उठा जल्द उठा पा-ए-मुक़द्दर से ज़बीं
मैं भी रुकने का नहीं वक़्त भी रुकने का नहीं
लड़खड़ाएगी कहाँ तक कि संभलना है तुझे
उठ मेरी जान! मेरे साथ ही चलना है तुझे

निर्भया को समर्पित बाबुषा कोहली  की कविता दंड 

[ सोलह दिसंबर 2012 की काली रात के बाद लिखी ये कविता निर्भया को समर्पित]

ओ मेरे देश !

यदि इस घोर विपत्ति काल में मेरे मुँह पर छाले पड़ जाएँ
और मैं कुछ कह न सकूँ तो तू मुझे दंड देना

मेरे गूँगेपन को इतिहास के चौराहों पर धिक्कारना

ओ मेरी मिट्टी
मेरे फेफड़ों में भरी हवाओं
और मुझे सींचने वाले जल

इस कठिन समय में मेरे कंठ की तटस्थता पर थूकना

ओ मेरे मुक्त आकाश
ओ विनम्र पेड़ और धधकती अग्नि शिखाओं
जीभ में भर आए फोड़ों के लिए मुझे दंड देना

फाँसी से कम तो हरगिज नहीं

इस चालाक चुप्पी के लिए मेरे शव को भी दंड देना
अपनी स्मृतियों में दिन रात कोड़े मारना आजीवन

कुमार विश्वास की कविता विदा लाडो

विदा लाडो!
तुम्हे कभी देखा नहीं गुड़िया,
तुमसे कभी मिला नहीं लाडो!
मेरी अपनी दुनिया की अनोखी उलझनों में
और तुम्हारी ख़ुद की थपकियों से गढ़ रही
तुम्हारी अपनी दुनिया की
छोटी-छोटी सी घटत-बढ़त में,
कभी वक़्त लाया ही नहीं हमें आमने-सामने।
फिर ये क्या है कि नामर्द हथेलियों में पिसीं
तुम्हारी घुटी-घटी चीख़ें, मेरी थकी नींदों में
हाहाकार मचाकर मुझे सोने नहीं देतीं?
फिर ये क्या है कि तुम्हारा ‘मैं जीना चाहतीं हूँ माँ‘ का
अनसुना विहाग मेरे अन्दर के पिता को धिक्कारता रहता है?
तुमसे माफी नहीं माँगता चिरैया!
बस, हो सके तो अगले जनम
मेरी बिटिया बन कर मेरे आँगन में हुलसना बच्चे!
विधाता से छीन कर अपना सारा पुरुषार्थ लगा दूंगा
तुम्हें भरोसा दिलाने में कि
‘मर्द‘ होने से पहले ‘इंसान‘ होता है असली ‘पुरुष‘!

डॉ. ए. दीप की कविता - अगले गैंगरेप पर अगली कविता लिखने तक

कविता

अगले गैंगरेप पर अगली कविता लिखने तक

किसी ने तुम्हें वेदना कहा
किसी को तुम दामिनी दिखी
किसी ने निर्भया कहकर पुकारा
और तकनीकी शब्दावली में
गैंगरेप-पीड़िता थीं तुम…
जो भी नाम हो तुम्हारा
नमन करता हूँ तुम्हें
कि तुम जागी रहीं तब तक
जब तक बारी-बारी से
सो नहीं गए
तमाम अंग तुम्हारे।

आत्मा का आवरण ही नहीं
आत्मा भी लहूलुहान थी तुम्हारी
फिर भी
पूरे तेरह दिनों तक
तुम जीवित बैठी रहीं चिता पर
सोई नहीं
हमारे जागने से पहले।

मलाला का मलाल
अभी साल ही रहा था
कि जाना
छह-छह पशुओं ने मिलकर
बनाया तुम्हें शिकार
अपनी हवस का…
आज मैं लज्जित हूँ
अपने पुरुष होने पर
कि वे सारे पशु
पुरुष जाति के थे।

तुम निढ़ाल
नंगी पड़ी रहीं
सड़क के किनारे
पर कृष्ण के इस देश ने
देर कर दी
दो गज कपड़ा तक जुटाने में…
बस में उन पशुओं ने
जो तुम्हारे शरीर के साथ किया
वही दुष्कर्म करते रहे
तुम्हारे अस्तित्व के साथ
वहाँ से गुजरने वाले
न जाने कितने पिता, पुत्र, पति और भाई…
लज्जित हूँ
कि उन पशुओं के साथ-साथ
ये भी पुरुष जाति के थे।

यकीन मानो
उस दिन से आज तक
नजरें चुरा रहा हूँ
अपनी दो साल की बेटी से
और हो जाता हूँ कुंठित
जाकर पास पत्नी के
कि मैं
पुरुष जाति का हूँ।

तुम्हीं बताओ
अब कैसे करूँ पाठ
दुर्गा सप्तशती का
कैसे चढ़ाऊँ जल
पवित्र तुलसी को
कैसे दूँ बहन को
रक्षा का वचन
और कैसे दबाऊँ पैर
अपनी माँ के
कि मैं पुरुष जाति का हूँ।

लज्जित हूँ
कि पकड़े गए केवल वही छह
और बाहर हैं उनकी जाति के
बाकी हम सारे पशु।

लज्जित हूँ
कि हमारी सभ्यता के
हजारों साल होने को आए
पर हम अदद पशुता को भी
जीत नहीं पाए।

लज्जित हूँ
कि अब भी वीर्य बहता है
हमारे भीतर
और आदम की भूमिका
अब भी निभाएगा
आदमी ही।

लज्जित हूँ
कि तुम्हारे जगाने के बाद
जागकर ये कविता तो लिख दी…
अब शायद बैठ जाऊँगा
अगले गैंगरेप पर
अगली कविता लिखने तक।

सुलोचना वर्मा की कविता स्त्री रु- ब- रु

लड़की, नारी, स्त्री
इन नामों से जानी जाती है
कई उपाधियाँ भी हैं
बेटी, पत्नी, माँ
अनेक रूपों मे नज़र आती है
पहले घर की रौशनी कहा
तो आँखो के नीचे काला स्याह क्यों ?

निर्भया, दामिनी, वीरा भी कहा
पर तब जब कुछ लोगो ने अपनी
पाशविकता का प्रमाण भी दिया
कुछ ने तो परी कहा
परियो से पंख भी दे डाले
जब उनके उड़ने की बारी आई
वही पंख किसी ने काट डाले
ऐसे समाज से आज भी
करती वो निर्वाह क्यों?

लड़की का पिता अपना
सबसे मूल्यवान धन दान कर
कर जोड़े खड़ा है
उधर लड़के की माँ को
लड़के की माँ होने का
झूठा नाज़ बड़ा है

झूठा इसलिए कि
उसकी संतान के लिंग निर्धारण में
उसका कोई योगदान नहीं है
तो क्या लड़की के पिता का
कोई स्वाभिमान नहीं है?

पिता का आँगन छोड़कर
नया संसार बसाया है
माँ के आँचल की छाँव कहाँ
"माँ जैसी" ने भी रुलाया है
रुलाने का कारण?

आज उसके बेटे ने
किसी दूसरी औरत को
प्यार से बुलाया है
आज वो इक माँ है
उस पीड़ा की गवाह है
जो उसकी माँ ने कभी
झूठी मुस्कान से दबाया था

बेटी के पैदा होने पर
कब किसने गीत गया था
पति के चले जाने के बाद
माथे की लाली मिटा दी लोगों ने
वो लाली जो उसके मुख का गौरव था
उसे कुलटा, मनहूस कहा
क्या सिर्फ़ पति ही
उसके जीवन का एकमात्र सौरभ था

शीघ्र ही वो दिवस भी आएगा
जब हरियाणा और राजस्थान की तरह
सारे विश्व से विलुप्त हो जाएगी ये "प्रजाति"
फिर राजा यज्ञ करवाएँगे
पुत्री रत्न पाने हेतु
राजकुमारियाँ सोने के पलनों मे पलेंगी
स्वयंवर रचाएँगी,
अपने सपनों के राजकुमार से
फिर द्रौपदी के पाँच पति होने पर
कोई सवाल ना कर सकेगा
उसके चरित्र पर कोई
टिप्पणी नही होगी
नारी को तब कोई भी
"वस्तु" नही कहेगा
संवेदनशील इस चाह को
"तथास्तु" ही कहेगा।

अरुण शीतांश की कविता आबरू नागरिक की

आबरू नागरिक की
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ओ नागरिको!
अब जाओ, सो जाओ
कल आना
सड़क पर

आने की जरुरत क्यों -
धान के खेत में बच्ची गई है
किसान का खाना लेकर
फैक्टरी में कामग़ार का भोजन
कैटवाक करती कोई बच्ची ही तो है
घास काटती
सुई में धागा लगाती
स्कूल पढ़ने जाती
सड़क पार करती
छत पर खिलखिलाती

नागरिक पर बच्ची को यक़ीन नहीं
यक़ीन  का विश्वविद्यालय कहाँ है बहन?

जहाँ से यात्रा शुरु ही हुई थी
वहीं नागरिक ख़त्म करने को तत्पर है

हम नागरिक का विरोध करते हैं
उस बच्ची के कपड़े कौन सिलेगा
जो रोज़ फाड़ रहा है
चर्र.....  चर्र.....  चर्र..... ?

अपने अन्दर की आवाज सुनो
कोई  नहीं है
पृथ्वी पर
कोई नहीं है देश

मिट्टी कितनी मुलायम और कितनी कठोर है
उन्हें पता नहीं  कि मिट्टी में भी आग होती है
और धरती के नीचे तो ज़ख़ीरा ही है।

एक बेटी का बाप नहीं हूँ
हजारों बेटियां हैं 
हजारों माँएं  हैं
हज़ारों बहनें हैं
और हजारों समाचार वाचिकाएँ  हैं
सब हमारे साथ हैं

लो मशाल और उठा लो इसे
हजारों आँखें देख रहीं हैं
तुम्हें बारंबार।

नागरिक नंगा है
और पक रहा ईंट का भट्ठा  है
यहाँ-वहाँ पत्थर ही पत्थर  है
छू लो
और  चला दो वहाँ
जहाँ तुम्हें इच्छा हो...

Friday, 20 April 2018

राकेश रंजन की कविता सनहा

सनहा
--------

मेरा रूमाल कहीं छूट गया है
गुलाबी रूमाल
मेरे नाम के पहले अच्छर
कढ़े थे उस पर
छोटा था
पर छोटी चीज नहीं था हजूर
मेरा सनहा लिख लो

मेरा छाता कहीं छूट गया है
कुछ पुराना था पर ठीक था
सिर्फ एक कमानी खराब थी उसकी
जरा ऐसे खोलो
तो खुल जाता था
पिता की निशानी था हजूर

मेरी भाषा कहीं छूट गई है
आसमान में चिरैया जैसी भाषा
छौनों की खातिर
हँकरती गैया जैसी

मैं खो चुका मेहनत का पसीना
रात में परियों के किस्से
चौड़े पाटवाली नदी
मिट्टी का सीधा रास्ता
इससे पहले
कि यह भी छूट जाए
कि क्या छोड़ आया हूँ
लिख लो हजूर

सच कह रहा
बूटों ने कुचल दिया मेरा साहस
बाजार ने छीन लिया संघर्ष
प्रेत के पैरों में गिरा आया
अपनी संतान

मेरी मुट्ठी में राख है
आँखों में धुंध
साँसों में धुआँ
और पैरों में मांस के लोथड़े
मेरी स्मृति में मलबे की गाद
से सनी
वह लहूलुहान बच्ची है
जिसके हाथ में
उसकी माँ का हाथ है
एक कटा हुआ हाथ
जो हमले के बाद
उसके पास बचा रह गया है

सीरिया और गाजा और मोसुल
अब यही मेरी स्मृति
सामूहिक हत्याओं के दृश्य
और युद्ध
युद्धों के अंतहीन सिलसिले
अब यही मेरी नियति

अब यही मेरा शहर
आज जिसकी गलियों में हिंसक जुलूस
आज जिसके हाथों में नंगी तलवारें
आज जिसके सीने में नफरत की आग
बुद्ध की पीठ में छुरा घोंपनेवाला
मेरा शहर
पहले ऐसा नहीं था हजूर

अस्सी के दशक में
ईदगाह
और नवमी के मेले में नंगे पाँव घूमता
एक घूँट शरबत के लिए तरसता मेरा शहर
खून का प्यासा नहीं था आज की तरह
भागलपुर
और मेरठ की तरह
जहर नहीं था उसकी रगों में

अस्सी के दशक में
गंडक के हिलकोरों में सिहरता मेरा शहर
किसी बच्चे की तरह
नंगे पाँव
स्कूल जाता हुआ
और स्कूल से ठीक पहले
जलेबी के पेड़ की छाँव में
मिठास के सवाल को हल करता हुआ
वह शहर कहीं खो गया हजूर
मेरा सनहा लिख लो

मेरे चारों ओर
चीख ही चीख
विलाप ही विलाप

दंगाइयों ने
जब उस औरत के पेट को छलनी किया
आँतों के साथ
उसका बच्चा बाहर आ गया
खून से लथपथ
वह आँतों को समेटती और बच्चे को सँभालती
कहाँ तक भागती
कब तक बचती
वह गिरी
और खत्म हो गई
उसका कुछ भी नहीं बचा
सिर्फ उसके गिरने
और खत्म होने की परछाईं बची
साबरमती के जल में

साबरमती से गोमती तक
गंगा-यमुना से दजला-फरात तक
आदमी के गिरने
और खत्म होने की परछाइयाँ

बूचड़खाने में बदलता मेरा देश
जहाँ ठीहे ही ठीहे
खून ही खून
लोथड़े ही लोथड़े

सोलह दिसंबर दो हजार बारह की रात
संसद के दक्खिन में
जिस बच्ची को हवस के भेड़िए चींथते रहे
और आखिर में
उसके अंग में सरिया डालकर फेंक गए
अब वही बच्ची मेरी भारत माता
अब वही सरिया
मेरा राष्ट्र ध्वज

लिख लो हजूर
लिख लो!

बलात्कार के विरुद्ध शिवांगी चौबे की कविताएं

1

सुना है तुम्हारे घर के भीतर,
तुम्हारे ही भक्त,
तुम्हारी ही बेटी को
तुम्हारे ही सामने,
खा गए!
सुना है तुमने आँखें बंद कर ली थीं,
मुँह छुपा लिया था,
हथियार डाल दिये थे,
शेर पर बैठी रही थी,
बिलखती रही थी!
सुना है तुम भी औरत हो,
अबला, कमज़ोर, मुँहचोर!
सुना है तुम्हें देवी कहते हैं,
तुम भी जानती हो,
तुम देवताओं का बनाया हुआ सामान भर हो!
तुम एक योनि से बढ़ कर कुछ भी नहीं,
हम सब माँस के लोथड़े हैं,
कल हम न होंगे तो ये खाने वाले तुम्हें भी खा जाएंगे,
भाग जाओ मंदिरों से,
कल ये तुम्हारा बलात्कार करने आएंगे।

2

गर कल मैं ना रही,
तो उसे कहना कि मैं हूँ,
कि मैं हूँ हर बुलंद आवाज़ में,
मैं साड़ियों के तार में हूँ,
मैं अदालत की पेशी में हूँ,
मैं हिन्दू-मुस्लिम दंगों में हूँ,
मैं न्यूज़ चैनल के थ्रेड में हूँ,
मैं बॉर्डर पार उस देश में हूँ,
मैं मोमबत्तियों की लौ में हूँ,
मैं तिरंगे के रंग में हूँ,
मैं अपनी माँ के गर्भ में हूँ,
मैं फेसबुक के कमैंट्स में हूँ,
मैं रातों की नींद में हूँ,
मैं नुक्कड़ों के कोरस में हूँ,
मैं जंतर मंतर मार्च में हूँ,
मैं संघियों के कटाक्ष में हूँ,
मैं कपड़ों की लंबाई में हूँ,
मैं लड़कों की पढ़ाई में हूँ,
मैं पिताजी की मौत में हूँ,
मैं गीता और क़ुरान में हूँ,
मैं क्या कहूँ मैं कहाँ नहीं हूँ,
उसे कहना कि मैं गयी नहीं हूँ,
उसे कहना कि मैं यहीं कहीं हूँ।

3

बुरा हुआ!
बुरा हुआ जो आसिफ़ा मर गई,
इसलिए नहीं क्योंकि वो आठ साल की थी,
इसलिए भी नहीं क्योंकि वो मुसलमान थी,
पर इसलिए कि अब जब भी
हम 'जय श्री राम' का नारा सुनेंगे,
दुपट्टा और भींच के समेटेंगे,
दरवाज़े में दो सिटकनियाँ लगाएंगे,
खिड़कियों में छेद कर के झाँकेंगे,
और देखेंगे अपनी मौत का तमाशा।
देखेंगे अपने भाई और बाप को,
जो अब हमें नहीं पहचानते,
वो अब सिर्फ़ 'मर्द' होंगे,
देह में आग लिए, ख़ून के प्यासे कुछ 'मर्द',
अब मंदिरों की घंटियों में चीख सुनाई देगी,
हम जैसों की बेबसी की कराहें गूँजेंगी,
अब देवस्थान में भी पाबंदी होगी,
हम अपनी बेटियों को फिर से कोख में मार देंगे,
अब हम में प्रेम न उमड़ेगा,
न धर्म के प्रति, न देश के प्रति,
हम लाशें हैं, जला दो हमें,
भारत के सपूतों, जला दो हमें।

4

"आप पांडेय जी की बीवी हैं न?"
"अरे ये तो किशोर की माँ है!"
"नारी तो साक्षात देवी का रूप है।"
मुझे देवी कह कर जंगल में छोड़ने वालों,
आज मैं अपना हिस्सा माँगने आयी हूँ।
मुझे मेरी बारिश, मेरी रातें, मेरा चाँद वापस करो।
मुझे मेरे संदूक की चाभियाँ लौटाओ,
जिसमें रखे हैं मैंने अपने ख़्वाब, अपने सपने।
आज मैं तुम्हारे कागज़ी फ़रमान के टुकड़े उड़ाना चाहती हूँ।
चले जाओ, कि तमाशा नहीं हैं मेरी टाँगें अब,
हाथों में हथौड़ा लिए ज़ंजीर से मिल कर आई हूँ।
किवाड़ खटखटाया मैंने, तुमने सुना नहीं,
आग लगा दी, लकड़ी राख हो गयी है।
अब भी थोड़ी आग मैंने बचा कर रखी है।
वो सारी सड़कें जो मेरे पाँव तले पड़ी नहीं,
वो सारे तारे जो मेरी खिड़कियों तक पहुँचने न पाए,
वो टेढ़ी रोटियाँ जो पकती गयीं गोल होने तक,
उन सब के ज़िम्मेदार तुम हो।
आज हम सब हिसाब माँगते हैं, जवाब दो।
जवाब में चूड़ी, पायल, कँगन हो तो खुद पहन लेना,
मैं मेरा जवाब मेरे साथ ले कर आई हूँ।
और सुनो,
मैं तुम्हारी गालियों में प्रयोग की हुई माँ नहीं हूँ।
ना ही मैं तुम्हारे बाद खाना खाने वाली बहन हूँ।
नहीं हूँ बेटी, नहीं हूँ बीवी।
मैं इंसान हूँ,
मुझसे इंसानियत का रिश्ता रखो।

5

क्या मुझे मौसम की आज़ादी भी नहीं?
रात के शायद तीन बजे हैं,
बाहर झमाझम बारिश हो रही है,
मैं बूंदों के गिरने की खनक सुन पा रही हूँ,
मिट्टी की सोंधी खुशबू बेचैन कर रही है,
चलो सूँघने की आज़ादी अब तक न छिनी।
लंका पे चाय मिलती होगी क्या अभी?
लोग ठंडे पानी और गरम चाय में डूब रहे होंगे क्या?
मेरे कमरे का दरवाजा छोड़, मेरे लिए कोई और द्वार नहीं खुला,
कितने खोलूँ? सब बन्द हैं।
पँखे की आवाज़ के साथ झिमझिम कि आवाज़ मिल गयी है,
आज नींद कैसे आएगी?
उसने कहा वो दोस्तों के साथ बाहर जा रहा है।
मैं क्या कहूँ मेरे दोस्तों को?
हम सब मौसमहीन एक ही कमरे में बैठे हैं,
चाय पीने की इच्छा जताने पर हँस रहे हैं,
जैसे चाँद उतार लाने को कह दिया हो।
पर कोई बात नहीं,
हम सो जाएंगे,
इस आवाज़, इस खुशबू को लिए,
हम सो जाएंगे।


शिवांगी चौबे की यह तस्वीर
स्त्रियों पर हो रहे पुरुषों के अत्याचारों के विरुद्ध एक प्रतीक के रूप में है

*शिवांगी चौबे बीएचयू में स्नातक की छात्रा हैं । छात्र आंदोलनों और नुक्कड़ नाटकों का अहम हिस्सा रही हैं। शिवंगी एक समर्पित सामाजिक कार्यकर्ता हैं।




सविता सिंह की बलात्कार विरोधी कविताएँ

सविता सिंह की बलात्कार विरोधी कविताएँ

1. ईश्वर और स्त्री

जागी हुई देह और आसमान एक दर्पण
देखता होगा ईश्वर भी स्त्री के हाहाकार को
बदलने के लिए होगा उत्सुक अपनी ही कल्पना को
कि बनाए नहीं उसने वे पुरुष अब तक
ले सकें जो उसे बाहों में

उनींदी आँखें बंद होने-होने को
खुलने के लिए तैयार मगर वे दरवाज़े
जिन्हें बचा रखा है अब तक रात ने
लहराता अन्धकार मिल जाने देता है
अपने तम में एक और तम को
सारी वासना को जैसे स्त्री हो

चंद्रमा खिला रहता है आसमान में रात भर
सिमटा एक कोने में सब कुछ देखता सोचता
बदलेगा यह संसार अब स्त्री की कामना से ही
ईश्वर की नहीं इसमें अब कोई भूमिका

2. शिल्पी ने कहा

मरने के बाद जागकर शिल्पी ने
अपने बलात्कारियों से कहा
‘तुम सबने सिर्फ़ मेरा शरीर नष्ट किया है
मुझे नहीं’
मैं जीवित रहूँगी सदा प्रेम करने वालों की यादों में
दुःख बनकर
पिता के कलेजे में प्रतिशोध बनकर
बहन के मन में डर की तरह
माँ की आँखों में आँसू होकर
आक्रोश बनकर
लाखों करोड़ों दूसरी लड़कियों के हौसलों में
वैसे भी नहीं बच सकता ज्यादा दिन बलात्कारी
हर जगह रोती कलपती स्त्रियाँ उठा रही हैं अस्त्र

3. संपत्ति यह पृथ्वी

यहां तो सब कुछ तुम्हारी संपत्ति है
पूरी पृथ्वी ही है निशाने पर तुम्हारे
तुम्हारी तृष्णा से कुछ भी बचा नहीं रहेगा एक दिन
सब कुछ पर होगा तुम्हारा आधिपत्य
छोटी से छोटी भावना पर निर्मम क्रूर दृष्टि तुम्हारी
जानवरों से लेकर मनुष्यों तक
सब पर अधिकार है वैसे भी तुम्हारा
तुम्हारे बच्चे तुम्हारी संपत्ति हैं
तुम उन्हें किसी और तरह से जानते भी नहीं
पत्नियों के स्वामी तो अनंतकाल से रहे हो तुम

मगर बच्चे इस धरती के होते हैं जैसे हम तुम स्वयं भी
प्रकृति जिन्हें सींचती है अपनी नम आँखों से
अपनी हवा से बनाती है जिनके मन
अपनी बारिशों से पैदा करती है वासना
इस जीवन के लिए
अपने हरे लाल पीली बैगनी अनगिनत दूसरे रंगों से
गढ़ती है उनके अपने रंग
और अब तो उसके पास एक दूसरी कल्पना भी है
तुम्हारे स्वामित्य से उबरने की
जैसे है अब स्त्री की भी एक अपनी कल्पना
जबरन प्रेम और मोह की गिरफ्त से
छूट कर इस संसार में जीने की
यहां सब कुछ तुम्हारी संपत्ति नहीं
कुछ इस तरह सोचकर देखो
कितनी आबाध दिखेगी तुम्हें अपनी ही स्वायत्तता

4. अपूर्ण समय

यह एक समय है
बीत जाने वाला
हो चाहे इसका रंग अभी कितना ही गाढ़ा
दहशत चाहे जितनी मारक
एक भीत ही है आखिर रेत की
भुरभुरा जाएगा
कितनी बौखलाहट में दौड़ रही है अभी से हवा
कि पीछे-पीछे चली आती है एक दूसरी कम बौखलाई नहीं
चीरती हुई बाहर का दृश्य
हमारी आँखों को जो ढापे हुए है

लोग शब्दहीन होते जा रहे हैं
हाथों से पकड़े अपनी चुप्पियां
बेटियां जो कल तक खेलती थीं अपने आंगनों दालानों में
पेड़ों की शाखाओं से लटकाई गयी है
हों जैसे कागज की गुड़िया
किसी दुःस्वप्न की कतरनें या कि
फटा हुआ उसका कोई हिस्सा

यह समय यूं ही नहीं रह सकता आखिर

उतारी जाएंगी ये बच्चियां हत्यारी इन शाखाओं से
चिन्हित किए जाएंगे हत्यारे
नहीं आज तो बाद आज के
हिसाब-किताब बराबर होगा

धूलभरी आंधी उठेगी कहीं से
अनगिनत उन आँखों को सचमुच पत्थर बनाती
जिन्होंने देखी ये हत्याएँ और चुप रहीं
सोचकर ये थीं दलितों की बेटियां

सविता सिंह

(सविता सिंह इग्नू के स्त्री अध्ययन केंद्र में प्राध्यापिका हैं, समकालीन हिंदी विमर्श और कविता की प्रमुख हस्ताक्षर)

दुनिया भर के 12 बेहतरीन गानों का हिन्दी अनुवाद

दुनिया भर के 12 बेहतरीन गीत का हिंदी अनुवाद किया है ! गीत के शब्द कविता से ज्यादे गहरे होते हैं और अंग्रेज़ी भाषा के गीत लगभग हर विषय पर लिखे गए हैं ! अकेलपन से लेकर प्रेम और समाज से लेकर जीवन तक इनका विस्तार है ! कोडालिन का ये गीत इस सीरीज का प्रथम गीत है ,आपका साथ चाहिए ! - आशुतोष सिंह

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               1
All_I_want  kodaline
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मैं तुमसे और कुछ भी नही माँगता
माँगता हूँ तो सिर्फ इतना कि तुम एक बार
मेरे सामने आ सको !
ताकि मैं तुम्हारा चेहरा आख़िरी बार देख सकूँ !
और एक ज़िंदा इंसान की तरह मर सकूँ !
जब आख़िरी बार तुमने अलविदा कहा था
मैं भीतर ही भीतर मर चुका था
मैं आँसुओं के साथ हर रात सोता रहा
अपनी तरफ से मैं बिल्कुल अकेला था !
लेकिन तुमने मुझसे अगर प्रेम किया
तो तुमने मेरा साथ क्यों छोड़ा
तुम मेरा शरीर रख लो
तुम मेरा शरीर रख लो
जो कुछ भी मैं चाहता हूँ,
जो कुछ भी मेरी जरूरत है
किसी को पा लेने की
और तुम जैसा ही कोई ढूंढ लूँगा !
तुमने मुझे सबसे खूबसूरत बनाया
जिस खूबसूरती को मैं कभी नही जान सका
तुमने मेरे दिल को रखकर उसे साफ किया है ऐसे
जैसे कोई हमारे प्रेम पर फिल्मे बना सकता है !
लेकिन तुमने मुझसे अगर प्रेम किया
तो तुमने मेरा साथ क्यों छोड़ा
तुम मेरा शरीर रख लो
तुम मेरा शरीर रख लो
जो कुछ भी मैं चाहता हूँ,
जो कुछ भी मेरी जरूरत है
वो इतनी है सिर्फ की मुझे ढूंढ़ना है तुम जैसा ही
और तुम जैसा ही कोई ढूंढ लूँगा !
लेकिन तुमने मुझसे अगर प्रेम किया
तो तुमने मेरा साथ क्यों छोड़ा
तुम मेरा शरीर रख लो
तुम मेरा शरीर रख लो
जो कुछ भी मैं चाहता हूँ,
जो कुछ भी मेरी जरूरत है
किसी को पा लेने की
और तुम जैसा ही कोई ढूंढ लूँगा !
                         2
love_minus_zerobob_daylon
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बिना किसी आदर्श और हिंसा के
मेरा प्रेम खामोशी की तरह बोलता है!
उसे अपने आप को वफ़ादार कहने
की कोई जरुरत नहीं !
क्योंकि वो अब भी बर्फ और आग की
तरह पवित्र है !
फूल लिए लोग घण्टों मिन्नतें करते हैं ।
मेरा प्रेम फूल की तरह हँसता है ।
उसे कोई वैलेंटाइन खरीद नहीं सकता !
मद्धिम रौशनी में दुकानों,बस स्टेशन के पास
लोग घटनाओ का ज़िक्र करते हैं !
किताबें पढ़ते हैं,कथनो की पूनरावृति करते हैं ।
दीवालों पर अपना यथार्थ लिखते हैं ।
कुछ भविष्य की बात करते हैं ।
मेरा प्रेम धीमे से कहता है
की असफलता से बड़ी कोई सफलता नहीं !
पर असफलता कोई सफलता भी नहीं ।
घडी की सुई और खंजर एक साथ डोलते हैं ।
मोमबत्ती की रौशनी में जश्न होता है !
सुबह को भी शिकायत है
की माचिस की तीलियों से बनी मूर्तियाँ
भी लड़खड़ा रही हैं ।
मेरा प्रेम तब भी एक रौशनी की तरह
टिमटिमाता है बिना किसी की परवाह किये
क्योंकि वो किसी के आँकने और विवाद
से ज्यादा जानता है ।
अर्धरात्रि में जब पुल काँपता है
चिकिस्तकों की भीड़ लगती है वहाँ ।
कहीं बैंकर्स की भतीजी पूर्णता ढूंढती है
अपने उपहारों में !
सर्द रात में बारिश के साथ हवाएँ
हथौड़े की तरह चोट करती हैं ।
मेरा प्रेम किसी रावेंन् पक्षी की तरह उड़ता है !
जिसके टूटे पंख मेरे खिड़कियों पे बिखरे
पड़े हैं ।
                        3
linkin_park somewhere_i_belong
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और इस तरह जब ये शुरू हुआ
मुझे इस बारे में कुछ नही कहना था
मैं अपने गलतियों के मतलब ढूँढने में लगा था !
और मैं इसमे पूरी तरह खो चुका था !
मैं थोड़ा उलझा हुआ तो था
पर मैंने अपने मन से सारी बातें बाहर कर दी
और अपने मन के साथ पूरी तरह अकेला हो गया
अपने इन सवालों के लिए ,इनके जवाब के लिए
सिर्फ मैं बचा था !
कुछ वक्त बाद मैंने सोचा क्या सच मे यही एक
सवाल है जिसे मैं ढूंढना चाहता हूँ !
क्या यही है जो मैं सच मे जानना चाहता हूँ
की मैंने ये गलतियाँ क्यों कि ?
अब मेरे पास खोने के लिए कुछ भी नही है
फिर मैं क्यों इन जवाबों को ढूंढ रहा हूँ
बिल्कुल अकेले ,बिल्कुल अकेले होकर
क्यों ऐसे ही जीने में लगा हूँ !
हालाँकि मुझे ये पता है ये सारी गलतियाँ
मैंने ही कि है
फिर मैं इन जवाबों में किसे ढूंढ रहा !
मैं अब वो सारी चीज़ें सही करना चाहता हूँ
जो कभी वास्तविक थी ही नही !
और मैं इस सारे दुखों से दूर हो जाना चाहता हूँ
जिसे मैं एक लंबे वक्त से झेलता आ रहा हूँ !
पता नही क्यों मुझे ऐसा लगता है मैं
इन सारी चीजों को सही कर दूँगा एक ना एक दिन !
ऐसा मेरा विश्वाश है !
और इस बीच कहीं मुझे जाना भी है
शायद उस जगह जो मेरी मिट्टी है
जहाँ से मैं आया था
जिससे मैं जुड़ा हूँ !
इसके अलावा मुझे कुछ नही जानना है !
मुझे आजतक विश्वास नही हो रहा कि
मैं वो नही था जो मैं सच मे हूँ !
हर जगह लोग कुछ ना कुछ ढूंढ रहे हैं
मुझे नही लगता मैंने इसकी कल्पना भी की थी
मैं भी ऐसा ही करने लग जाऊँगा !
मैं जब भी ऐसा सोचता हूँ तो वही पाता हूँ !
मैं बीते हुए वक़्त में कभी वो नही रहा
जिसके बारे में मेरा मन कल्पनाएं करता था !
मेरे पास तो सिर्फ नकरात्मकता बची है
ये वही हैं जो लोगों के लिए मैंने बचाकर रखा है !
और इसके अलावा सिर्फ मेरे पास मेरा खाली मन है
जिसमे मेरे अलावा कोई नही !
और मैं चाहता हूँ अब जब मुझे कुछ नही पाना है
मेरे पास खोने के लिए कुछ भी नही
मुझे कुछ नही ढूंढना
मैं जानना चाहता हूँ कि
क्या मैं उन गलतियों को कभी बदल पाउँगा ?
क्या मैं उन सारे वक़्त को सही कर पाऊंगा?
क्या मैं उन सारे दुखों को भूल पाउँगा
जो मैंने कभी वर्षों तक झेले थे
बिल्कुल अकेले,बिल्कुल अकेले होकर,!
मैं ये सब जानना चाहता हूँ
इसके लिए मैं वहाँ जाऊँगा
जो मेरी मिट्टी है
जहाँ से मैं आया था
जहाँ से मैं जुड़ा हूँ !
मैं ऐसा जरूर करूँगा मेरे साथ कोई हो ना हो
मैं इसे अकेले ही करूँगा
क्योंकि मुझे अपना सच जानना है
मुझे अपने बारे में जानना है !
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लिंकिंग पार्क के गीत का अनुवाद "समव्हेर आई बिलोंग" चेस्टर बेल्लींगटन की याद में !
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  everything passenger
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जब भी तुम्हारे पास कुछ नही होता
तब तुम आज़ाद होते हो
आज़ाद होकर कुछ भी करने के लिए !
जब भी तुम्हारे पास कुछ नही होता
तब ही शायद तुम्हे कुछ साबित करना होता है !
तब जाकर तुम कुछ पाते हो !
वो सब शायद जिसके सपने तुमने देखे हैं !
जब भी तुम्हारे पास कुछ होता है
तुम्हारे पास कुछ ना कुछ खोने को जरूर होता है !
और वो तुमसे तुम्हारा सबकुछ माँग लेते हैं !
वो तुम्हारे आँखों की चमक और सबकुछ माँग लेते है!
वो तुम्हारा दिल तोड़ते हैं फ़िर
सबकुछ माँग लेते हैं !
ओह लेकिन हर बार ये जरूरी नही की
तुम हर बार बार कुछ ना कुछ खोते ही हो !
कुछ क्षण के लिए तुम सबकुछ पाते हो
तुम आसमान में दूर तक उड़ते हो और कभी
ज़मी पर लौटना भी नही चाहते !
लेकिन तुम्हारे दिल मे कुछ जरुर नीचे तक कुछ उतरता है !
और ये भी है कि वो सबकुछ जो तुमने पाया है
वो कोई मायने नही रखता अगर
तुम ये सब किसी को बता ना सको !
कोई तो हो जिसे तुम सबकुछ या कुछ ना कुछ दे सको जो भी तुम्हारे पास मौजूद है !
उन्हें तुम सबकुछ दे दो वो सब जो तुम्हारे पास है !
अँधेरा या रौशनी सबकुछ !
तुम उन्हें अपना सबकुछ दे दो
सारा दिल सारा जहां सबकुछ दे दो !
और हाँ जबतक तुम सबकुछ ना दे दो
तब तक कुछ ना कुछ तुम्हारे पास रहता ही है !
कुछ भी यहाँ जीवन भर के लिए नही होता !
और हा वो कुछ चीज़ें कभी बदल भी नही सकते !
और हाँ वो कुछ चीज़ें बदलना भी नही चाहते !
तुम्हे पता है तुम्हारे लिए सबकुछ बेहतर है
अगर तुम प्रेम ढूंढ लेते हो
तब तुम सबकुछ पा लेते हो !
तब तुम सबकुछ पा लेते हो !
तब तुम सबकुछ पा लेते हो !
तब तुम सबकुछ पा लेते हो !
ओह
सबकुछ
सबकुछ
सबकुछ!
कुछ भी कभी कुछ नहीं है
जब तक तुम सब कुछ न दे दो !
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coldplay paradise
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जब वो छोटी बच्ची थी !
वो दुनिया को खुद के बेहद करीब समझती
लेकिन जब भी वो इसके पास आती
दुनिया उससे और भी दूर हो जाती !
वो हर बार परेशान होकर नींद की यात्रा करती !
और स्वर्ग के सपने देखा करती !
जब भी वो आँखें बंद करती
तब वो स्वर्ग के सपने देखा करती !
जब वो छोटी बच्ची थी !
वो दुनिया को खुद के बेहद करीब समझती
लेकिन जब भी वो इसके पास आती
दुनिया उससे और भी दूर हो जाती !
और हर बार उसके दांतों में  शब्द
फँस जाया करती !
जीवन चलता रहता है
और नीरस नीरस काम के लिए भी
कितना मेहनत करना पड़ता है !
यहाँ तो एक आसुँ भी बरसात की तरह लगती है !
और आँधी के इसी रात में
वो अपनी आँखें बंद करती
और हर बार उड़ जाया करती !
और शायद यही उसका स्वर्ग था
हाँ और यही उसका स्वर्ग है !
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marshmello !   silence !
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हाँ मैं एक प्रेमी से ज्यादा एक लड़ाकू रहा हूँ !
क्योंकि पूरे जीवन मैने यही तो किया है
मैं हर बार लड़ता ही तो आ रहा हूँ
बिना आराम की परवाह किये हर बार !
हर बार खुद से छिपता ही तो रहा हूँ मैं
और कभी मेरे पास ऐसा कोई नही रहा
जिसे मैं फ़ोन करके अपनी बात कह सकूँ !
अपनी बातें कहने के बजाए इसलिए मैं
सबसे छिपाता रहा हूँ !
प्रेम ने हर बार मुझे अकेला किया है
लेकिन हर बार मेरे साथ खामोशी रही है !
मैंने तुम्हारे हिंसा में भी शांति ढूंढ ली है !
ये कभी नही बतला सकता मैं की कोशिश
में कोई हर्ज है या नही !
मैं खामोशी के साथ रहा हूँ
और एक लंबे वक्त से ऐसे ही चुप हूँ !
इसलिये क्योंकि मैंने तुम्हारे हिंसा में शांति को
ढूँढा है !
मैं एक लंबे समय से चुप हूँ
मैं एक लंबे समय से चुप हूँ
और मैंने तुम्हारे हिंसा में शांति को
ढूंढ लिया है !
हाँ मैं एक रक्षक की तलाश में जरूर हूँ
लेकिन मैं अपने लिए उससे कुछ भी नही चाहता !
मेरा पुरा जीवन
पूरा जीवन मुझे एक बोझ लगा है !
मैंने इसके बारे में बहोत सोचा है
और अब मैं इससे ऊब चुका हूँ !
मैं बहोत बार गलत साबित हो चुका हूँ
और मैं अब इसकी परवाह भी नही करता !
प्रेम ने कभी मुझे घर नही दिया
इसलिए मैं एक खामोशी के साथ ही
रहने लगा हूँ !
मैंने तुम्हारे हिंसा में भी शांति ढूंढ ली है !
ये कभी नही बतला सकता मैं की कोशिश
में कोई हर्ज है या नही !
मैं खामोशी के साथ रहा हूँ
और एक लंबे वक्त से ऐसे ही चुप हूँ !
इसलिये क्योंकि मैंने तुम्हारे हिंसा में शांति को
ढूँढा है !
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©आशुतोष सिंह
( प्रस्तुत गीत सीरिया के खूनी जंग के लिए समर्पित था जिसे दुनिया भर में कई सम्मान मिले हैं )
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bryan_adams       i_cant_stop_loving_you !
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मैंने इरादा कर लिया है
कि मैं तुमसे प्रेम करना नही छोड़ सकता !
उदासियों की यादों में रहना नही छोड़ सकता
और मैं तुम्हे पाने की इक्षा भूला दूँगा
ये कहना भी व्यर्थ है मेरे लिए !
इसलिए मैं अपने जीवन को कल के सपनों
में जीने जा रहा हूँ !
वो मेरे जीवन के सबसे खूबसूरत पल थे
जिसे याद करके मैं आजतक खुश होता हूँ !
वो कहते है कि समय टूटे दिल के हर घाव ठीक कर देगा !
लेकिन समय आज भी ठीक वैसा ही है जब से हम
एक दुसरे से अलग हुए हैं !
मैंने इरादा कर लिया है
कि मैं तुमसे प्रेम करना नही छोड़ सकता !
उदासियों की यादों में रहना नही छोड़ सकता
और मैं तुम्हे पाने की इक्षा भूला दूँगा
ये कहना भी व्यर्थ है मेरे लिए !
इसलिए मैं अपने जीवन को कल के सपनों
में जीने जा रहा हूँ !
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one_republic counting_stars
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बहुत दिनों से नींद को खो चुका हूँ !
सपने देख रहा हूँ उनके जो हम कभी हो सकते थे !
लेकिन मेरी प्रिय
मैं बड़ी मेहनत से प्रार्थना कर रहा हूँ !
यही कि हम रुपये नही
बल्कि तारों को गिनेंगे !
ऐसा लगता है कि जीवन एक हिलता हुआ झूला है
जिससे मेरा दिल सीमाओं को पार कर जाता है !
मेरे चेहरे पर ये निशान साफ झलकते हैं
जिसे हम या तुम ही देख सकते हैं !
हाँ पुराना हूँ पर इतना भी नही !
नया भी हूँ लेकिन उतनी भी चमक नही !
मुझे लगता है दुनिया अभी भी बिकी नही है
और मैं वही कर रहा जो मुझे कहा गया है !
गलत करने पर मुझे अच्छा महसूस होता है !
अच्छा करने पर मुझे गलत महसूस होता है !
मैं झूठ तो नही बोल सकता ना !
मैं झूठ तो नही बोल सकता ना !
जो चीज़ भी मुझे मौत देती है
ऐसा महसूस होता है वो मुझे जीवन देती है !
मैं उसके प्रेम को महसूस कर पाता हूँ !
और मैं इसके आग में जलता रहता हूँ !
आशा दो वर्ण का शब्द है जो मुझे
पैसों को जलता हुआ दिखाता है !
वो सब पैसे लेकर जला दो
चलो इस प्रेम नदी के गीत गाते हैं जो हमने सीखे हैं !
हाँ पुराना हूँ पर इतना भी नही !
नया भी हूँ लेकिन उतनी भी चमक नही !
मुझे लगता है दुनिया अभी भी बिकी नही है
और मैं वही कर रहा जो मुझे कहा गया है !
बहुत दिनों से नींद को खो चुका हूँ !
सपने देख रहा हूँ उनके जो हम कभी हो सकते थे !
लेकिन मेरी प्रिय
मैं बड़ी मेहनत से प्रार्थना कर रहा हूँ !
यही कि हम रुपये नही
बल्कि तारों को गिनेंगे !
                   9
madona।  -like_a_little_prayer
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ये जिंदगी एक रहस्य है
और हर किसी को यहाँ अकेले होना है
मैं सुनता हूँ कि तुम मेरा नाम पुकारते हो
और मुझे घर की तरह महसूस होता है !
एक छोटी सी प्रार्थना में ईश्वर
जब भी मैं तुम्हारा नाम कहता हूँ !
मैं अपने घुटनों पर बैठकर
तुम्हे अपना लेना चाहता हूँ !
आधी रात में मैं तुम्हारी
शक्ति को महसूस करता हूँ !
बिल्कुल एक प्रार्थना की तरह
तुम्हे अपनाने के लिए !
मैं आवाज़ सुनता हूँ
ये किसी देवता की आवाज़ है !
मेरे पास कोई विकल्प नही
तुम्हारे आवाज़ सुनने के बजाय !
ये हवाओं में तैरने जैसा महसूस कराता है !
मैं अपनी आँखें बंद करता हूँ
और ईश्वर मुझे ऐसा लगता है कि मैं उड़ रहा हूँ !
आसमान के पार बिल्कुल पार
अपनी बंद आँखों से ये सब देख पाता हूँ !
स्वर्ग के ईश्वर मेरी मदद करो !
एक बच्चे की तरह कानों में धीमे धीमे कहते हो !
तुम्हे सुन के मैं झूमता हूँ !
ये एक सपने जैसा है
जिसका ना अंत ना शुरुआत है
तुम मेरे साथ हो !
तुम मेरे साथ हो
चलो गीत गाते हैं !
एक सपने की तरह
तुम वो नही जो तुम हो
तुम एक प्रार्थना हो
बिना विकल्प के तुम्हारी आवाज़
मुझे तुमतक ले जाती है !
                  10
Bob_daylon- like_a_rolling_stone
कैसा महसूस होता है ?
कैसा महसूस होता है ?
खुद की तरह का हो जाना
घर की दिशा के बग़ैर !
एक अज्ञात की तरह
एक घूमते हुए पत्थर की तरह !
                   11
james_blunt  you_are_beautiful
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मेरा जीवन खूबसूरत है !
मेरा जीवन शानदार है !
मेरा प्यार सच्चा है !
मैंने एक परि को देखा है !
मेरा ये विश्वास है !
उन सड़कों के पास मुझे उसने
मुस्कराहट भेजा है !
वो किसी और के साथ थी
लेकिन एक पल के लिए ही सही
वो  मेरे लिए सबसे खूबसूरत पल था !
तुम खूबसूरत हो !
तुम खूबसूरत हो !
और ये सच है !
मैंने भीड़ में तुम्हे एक बार देखा है
और मुझे पता नहीं चला की
मैं क्या करूँ !
क्यूंकि मैं तुम्हारे साथ कभी रहा
भी तो नहीं
तुम्हे जानता भी तो नहीं !
तुम खूबसूरत हो !
तुम खूबसूरत हो !
और ये सच है !
जरूर कोई परि उसके चेहरे पर दिखती है
जब वो मुस्कुराती है !
और शायद जब उसने सोचा की
उसे मेरे साथ होना है !
शायद तभी ये सही समय था
जब मुझे ये सच स्वीकार लेना चाहिये था
की मैं कभी उसका नहीं हो पाऊंगा
                        12
avril lavigne     when you are gone
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मुझे हमेशा खुद के लिए समय चाहिए था
मैंने कभी नहीं सोचा था की मेरे रोने पर मुझे
तुम्हारी याद आएगी !
और दिन ऐसे लगने लगेंगे जैसे की सदियों से
अकेला रहा हूँ !
और बिस्तर भी तुम्हारी ओर  का हो जाएगा !
जब तुम जाने लगी तो मैंने तुम्हारे
हर कदम को गिना !
तुम देख पाती हो कभी क्या की
मुझे तुम्हारी जरुरत है !
जब तुम गयी
मेरा दिल तुम्हे याद करता है !
जिस अपने
चेहरे को मैं जानता था
वो तुम्हे याद करता है !
जिस शब्द को सुनकर मेरा
दिन मुझे अच्छा लगता था
और मै उसे अच्छा कहता था
आज तुम्हे याद करता हूँ !
मैंने कभी ऐसा महसूस नहीं किया
जो भी करता हूँ मुझे तुम याद आती हो !
तुम्हारे कपडे जमीन पर वैसे ही पड़े हैं !
और वो तुमसे ही गंध देते हैं !
मुझे याद आते हैं वो हर काम
जो तुम करती थी !
हम एक दूसरे के लिए ही बने थे ना
हम एक दूसरे को जानते भी थे ना
जो कुछ भी मै तुम्हारे लिए चाहता था
वो तुम्हे जानना चाहिए था !
जो कुछ भी मैं चाहता था की
मैं तुम्हे अपना दिल और आत्मा सौंप दूँ !
अब मई मुश्किल से सांस ले पाता हूँ
और मुझे तुम्हारी जरुरत है !

Featured post

सर गणेश दत्त