Sunday, 5 April 2015

बनारस वाया बजरडीहा

बजरडीहा 

नल का पानी
जहाँ उतरकर सड़क पर जमे
और शर्म से काला पड़ जाये
जहाँ मर्द आंत के रेशों को बुन कर
संसार की सबसे सुन्दर स्त्री के लिए साड़ियाँ तैयार करते हों
औरतें
हया को जरुरत मानकर
चिथड़ों में लिपटी हुई
धागों के थान लपेट रही हों
दुनियां के ट्रेडमिल पर हांफने के साथ जहाँ
रात की रोटी
अगली सुबह के लिए पानी में गर्क कर दी जाती हो
जहाँ करघों के खटर-पटर में दुधमुहें की आवाज
अनंत कालों के लिए दबा दी जाती हों
जहाँ करघा ही मां है बाप है भाई है
स्कूल है
नवाजुद्दीन की किसी फिल्म का डायलोग है
करघे का चलना सांसों का चलना है
करघे का बंद होना
किसी कुपोषित बच्चे का अनाथ होना है
अच्छे दिन जहाँ दिन में भी झाँकने नहीं आते
अच्छे दिन के लिबास वहीँ से जाते हैं
ये वही बजरडीहा है
ऐ मेरे मदमस्त बनारस
बता न
बजरडीहा में तेरा पता क्या है? 

:अरमान आनंद 

Thursday, 12 March 2015

आगरे का पागलखाना (गल्प) - अरमान आनंद

14को आगरा जा रहा हूँ। बेरोजगारी का फायदा ये कि आपको घूमने के खूब मौके मिलते हैं। बेरोजगारी और आवारगी का सम्बन्ध जीजा साली वाला है। रंगीन और संगीन।
आगरे में तीन चीज़े प्रसिद्ध हैं। पेठा, पागलखाना, और ताजमहल। ताजमहल और पेठा कैसे बना ये तो सब जानते हैं। पागलखाना कैसे बना ये बताता हूँ। एक बार एक अंग्रेज अधिकारी आगरा  पहुंचा। पेठा खा के मस्त हो गया।  फिर शाम को बग्ग्घी से ताजमहल देखने निकला। ताजमहल देखा तो दंग रह गया। उसने कारिंदों को कहा मेरा सामान गेस्ट हाउस से ले आओ। अब हम इसी महल में रहेंगे। गाइड ने कहा सरकार ये महल नहीं कब्र है। यहाँ नहीं रह सकते। गाइड ने आगे बताया राजा ने रानी को खूब प्यार किया , जिससे रानी बच्चा पैदा करते करते मर गई। फिर उसकी याद में राजा ने ताजमहल बनवाया। ताजमहल बनवाने के बाद राजा ने यहीं ताज बनाने वाले कारीगर के हाथ भी काटा था। जिससे कि वो कोई दूसरा ताज न बना सके।
अंग्रेज ने कहा इस शहर को पागलखाने की जरुरत है। जल्दी से पागलखाना बनवाया जाय।
फिर क्या था आगरा का पागलखाना तैयार हो गया और जब से पागलखाना बना दूसरा ताजमहल नहीं बना। मन हो तो भिजिट(विजिट) कर आइये।

Tuesday, 24 February 2015

सत्ता और साहित्य



सत्ता और साहित्य


सत्ता, वर्चस्व और प्रतिरोध के समेकित अन्तः क्रियाओं का नाम है| मानवीय सभ्यता की शुरुआत से ही सत्ता मनोवृति के रूप में मानव व्यवहार श्रृंखला में शामिल हो गई है| आज के समय में पूँजीवाद, बाजार और वैश्वीकरण ने मानव सभ्यता को एक गहरे संकट के मुहाने ला खड़ा किया है| विश्व की बड़ी जनसंख्या गरीबी और अवसाद से ग्रस्त है| मानवीय मूल्यों और संवेदनाओं का भयंकर ह्रास हुआ है| ऐसे में बहुत आवश्यक है कि इन समस्याओं की जड़ तक पहुंचा जाये और मनुष्य की समस्याओं का समाधान उसके व्यवहारों के अध्ययन से ही संभव है | इसके लिए साहित्य से बेहतर साधन नहीं हो सकता| साहित्य की प्रसिद्ध परिभाषा को याद करें “किसी भी देश का साहित्य वहां की जनता की चित्तवृत्ति का संचित प्रतिबिंब होता है”- आचार्य रामचंद्र शुक्ल की इस परिभाषा से यह स्पष्ट है कि साहित्य समाज की चित्त-वृत्तियों का आख्यान है, अर्थात् साहित्य समाज की सत्ता संरचना का व्याख्याता भी है| इसलिए किसी भी समाज की चित्त-वृत्ति और विकास को समझने के लिए वहां के साहित्य को समझना अति आवश्यक है| “सत्ता भी एक मनोवृति है , जो मनुष्य के व्यवहार में परिलक्षित असंख्य अलग-अलग हुए अनुभवों के करण हुई असंख्य अलग-अलग इच्छाओं के जोड़ के कारण नहीं बल्कि स्वाभाविक रूप में और लगातार मनुष्य सत्ता की इच्छा करता है|” 1 मनुष्य अपनी इसी वृति के कारण आजीवन संघर्ष और द्वन्द में जीता है| उसकी दो इच्छाएं हमेशा साथ साथ चलती हैं| पहली स्थायित्व जिसका अगला चरण प्रभुत्व में परिवर्तित होता जाता है| दूसरा किसी भी प्रकार के दबाव या प्रभुत्व का प्रतिरोध| स्वच्छंदता मनुष्य की आदिम चेतना रही है| वह किसी भी प्रकार के बंधन से मुक्त रहना चाहते है| परन्तु स्थायित्व और प्रभुत्व की इच्छा उसे दूसरों पर अपने वर्चस्व को स्थापित करने की प्रेरणा देता है| फलतः एक अनवरत चलने वाले संघर्ष की उत्त्पति होती है| वर्चस्व और प्रतिरोध के इसी द्वन्द पर मार्क्स अपना पक्ष रखते हुए कहते हैं: “आजतक का अस्तित्वमान समस्त समाज का इतिहास वर्ग संघर्षों का इतिहास है|” 2कार्ल जे. फ़्राईडरिक ने constitutional government and democracy (pp.12-14) में सत्ता को ‘किसी प्रकार के मानव सम्बन्ध के वर्णन’ से जोड़ा है| यही सत्ता और सत्ता विमर्श का मूल है| यह मानवीय संबंधों की व्याख्या करने का सफल औजार है|3 मिशेल फूको सत्ता का स्पष्टीकरण देते हुए कहते हैं “सत्ता ‘हम क्या हैं? उसका निर्धारण करती है| 4 एक ही वाक्य में फूको सत्ता के सम्पूर्ण चरित्र का उद्घाटन कर देते हैं कि सत्ता मूलतः अस्तित्वमूलक शब्द है| यही अस्तित्व स्थायित्व पाकर वर्चस्व में परिणत हो जाता है| मिशेल फूको फिर कहते हैं "सत्ता वह मूलभूत तत्व है जो संसार की प्रत्येक वस्तु में बराबर रूप से विद्यमान है |" 5


अर्थात यहाँ यह कहना होगा कि प्रत्येक व्यक्ति में सत्ता अस्तित्वमूलक प्रवृति में तो है ही साथ ही प्रत्येक मनुष्य में सत्ता वर्चस्व की आकांक्षा के रूप में भी पलती है| तात्पर्य यह कि वर्चस्व और प्रतिरोध दोनों साथ-साथ चलते और पलते हैं| Where there is power, there is resistance 6 


अंतोनियो ग्राम्शी भी इस विचार से सहमत होते हुए लिखते हैं “प्रत्येक मनुष्य चाहे वह स्त्री हो या पुरुष, वर्चस्व के प्रभाव से युक्त होता है | हालांकि हर मनुष्य का अलग- अलग उद्देश्य पूर्ण जीवन होता है , जो कि अन्य से अलग होता है | परन्तु सामाजिक स्तर पर वह सांस्कृतिक वर्चस्व का हिस्सा होने से बच नहीं सकता, और जब तक कोई मनुष्य सामाजिक संरचना में शामिल है वह समाज में अन्तर्निहित सांस्कृतिक वर्चस्व को समझने में उसके प्रतिकार में असमर्थ है|7 हिन्दी का सत्ता विमर्श अंग्रेजी के पॉवर डिस्कोर्स का पर्याय है| पॉवर को हम शक्ति के रूप में समझते हैं| परन्तु सामाजिक और राजनीति विज्ञान में इसे सत्ता कहा गया है|


साहित्य में सत्ता की भूमिका को लेकर लगातार सवाल उठते रहे हैं| समाज में साहित्य की क्या भूमिका हो? ऐसे समय में जब हर तीसरा आदमी लिख रहा है तो किसे साहित्य की श्रेणी में माना जाय| किस वैचारिकी में पिरोया गया शब्द साहित्य की संज्ञा प्राप्त करने की क्षमता रखते हैं आदि-आदि| तो उत्तर यह है कि साहित्य की सत्ता प्रतिरोध की सत्ता है जो हमेशा वर्चस्व के विरोध में रची जाती है| "कला कला के लिए" की मान्यता से हट कर कला में उपयोगितावाद या कला समाज के लिए की सैद्धांतिकी इसी तरफ ले जाती है| हालाँकि वर्चस्ववादी सत्ता कला का इस्तेमाल अपने लिए वर्चस्व के अदृश्य हथियार के रूप में करती है| रामस्वरूप चतुर्वेदी नया सहस्त्राब्द और साहित्य शीर्षक आलेख में लिखते हैं "साहित्य को यों खतरा अब उपसाहित्य से है जो या तो सत्ता से अनुशासित होता है या फिर बाज़ार से|"8 रामस्वरूप चतुर्वेदी उस साहित्य को उपसाहित्य का दर्जा देते हैं जो मूल साहित्य के साथ-साथ साहित्य की मूल चेतना और सरोकारों पर घाट करता हुआ चलता है| बाजारवादी संस्कृति की ऐसी मुश्किल घड़ी में में साहित्य को दो कार्य करने होंगे | पहला यह की साहित्य को अपनी प्रतिबद्धता बनाये रखने के लिए जोर शोर से काम करना होगा दूसरा नकली साहित्य का पर्दाफाश करना होगा | कला का मूल धर्म प्रतिरोध है| कला का रवैया हमेशा जड़ता के विरुद्ध रहा है| बी. क्रिलोव इस सम्बन्ध में लिखते हैं: मार्क्सवाद के संस्थापकों ने इस बात पर जोर दिया कि कला वर्गों के बीच विचारधारात्मक संघर्ष में महत्वपूर्ण अस्त्र है| वह शोषकों की शक्ति पुख्ता बना सकती है,तो उसकी जड़ भी खोद सकती है, वह यदि वर्ग उत्पीडन की रक्षा का काम दे सकती है,तो इसके उलट मेहनतकश जनसाधारण की शिक्षा और उनकी चेतना के विकास में योग दे सकती है तथा उन्हें अपने उत्पीड्कों पर विजय के समीप पहुंचा सकती है|9 जब तक आम जनता की पीड़ा और करुणा के साथ साहित्य स्वर में स्वर नहीं मिलाता हम उसे कैसे साहित्य की परिभाषा पर खरा उतरा हुआ मानेंगे| मोनालिजा प्रतिरोध के सम्बन्ध में कहती हैं “प्रतिरोध उत्तर साम्राज्यवादी दौर की अवधारणा है, उत्तर साम्राज्यवादी सत्ता को दर्शाती है| 10 वहीँ प्रतिरोध के सम्बन्ध में मदन सोनी अपने आलेख प्रतिरोध और सहित्य में लिखते हैं: "प्रतिरोध की अवधारणा, एक गहरे अर्थ में ,मनुष्य के साथ जन्मी और मनुष्य की अवधारणा से अभिनाभव जुड़ी प्रतीत होती है|मनुष्य जैसे अपनी परिभाषा में ही एक प्रतिरोधक प्राणी प्रतीत होता है| अगर उसके द्वारा गढ़ी गई सभ्यता और संस्कृति का इस ख़ास दृष्टि से मूल्यांकन करें, तो उसकी इस रचनात्मकता के पूरे इतिहास को प्रतिरोध के इतिहास के रूप में देखा जा सकता है|"11जार्ज लूकाच वर्चस्व और प्रतिरोध के इस संघर्ष में साहित्य की भूमिका को मार्क्सवादी नजरिये से देखते हुए लिखते हैं: “इस तरह साहित्य के अस्तित्व, महत्त्व,उत्थान, और प्रभाव की व्याख्या समूची व्यवस्था के समग्र ऐतिहासिक सन्दर्भ में ही की जा सकती है|साहित्य का उद्भव और विकास समग्र ऐतिहासिक सामाजिक प्रक्रिया का अंग है| साहित्यिक रचनाओं का सौन्दर्यगत सारतत्व और मूल्य और इसलिए उनका प्रभाव उस सामान्य और समन्वित सामाजिक प्रक्रिया का अंग है ,जिसमें मनुष्य चेतना के जरिए दुनिया को अपने काबू में करता है|”12 साहित्य और सत्ता के सम्बन्ध की व्याख्या करते हुए कात्यायनी लिखती हैं: “कविता जो स्वयं मानवीय जरुरत रही है, मानवीय जरूरतों की तड़प पैदा करती हुई, वह प्रकृति से वर्चस्व-विरोधी होती है, और एक औजार भी होती है, राज्य के रहस्य को भेदने समझने का, जैसे कि जीवन के तमाम भेदों को जानने-समझने का|”13 कविता जो मनुष्य के पक्ष में खड़ी है| वह अंतिम शोषित और प्रवंचित के साथ है| वह सत्ता के विरुद्ध है|वह बाज़ार को पहचानती है|वह किसी भी तरह के उपनिवेश का प्रतिरोध करती है| वह अपना स्वाभिमान रचती और मानव के स्वाभिमान के लिए लड़ती है| प्रथमतः और अंततः वह मनुष्य विरोधी ताकतों को निस्तोनाबूद करने का महास्वप्न देखती है|इसलिए पूरी सदी में फैली उसकी भूमिका को आज और आनेवाले कल के लिए देखना प्रासंगिक है| 14 


सत्ता विमर्श ही साहित्य और समाज के सारे विमर्शों का मूल है | समाज की मूल समस्या वर्ग समस्या है| वर्चस्व और प्रतिरोध कहें या शोषक और शोषित मामला वही है| आप स्त्री विमर्श कहें ,दलित विमर्श कहें या आदिवासी विमर्श साहित्य में आप किसी न किसी वर्चस्ववादी प्रवृति के खिलाफ खड़े होते हैं |


















































































1. पृष्ठ 668 समकालीन राजनीतिक सिद्धांत –जे. सी. जौहरी स्टर्लिंग पब्लिशर्स प्रा. लि. नई दिल्ली 2007


2. पृष्ठ ३० मार्क्स एंगेल्स कम्युनिस्ट पार्टी का घोषणा पत्र पीपुल्स पब्लिशिंग हाउस 2013


3. पृष्ठ 663 समकालीन राजनीतिक सिद्धांत –जे. सी. जौहरी स्टर्लिंग पब्लिशर्स प्रा. लि. नई दिल्ली 2007


4. {http://www.powercube.net/other-forms-of-power/foucault-power-is-everywhere/} 


5. page 93 history of sexuality volume 1 Michel Foucault, Pantheon Books1978 New York ISBN 0-394-41775-5


6. Page 93 History of Sexuality Volume 1 Michel Foucault, Pantheon Books1978 New York ISBN 0-394-41775-5


7. Page 233-38 Antoniyo Gramsci Prision Note Books 1992 Buttigieg , Joseph A, Ed, Newyork City Columbia Univertsty 


8. पृष्ठ 288 हिन्दी साहित्य संवेदना और विकास लोकभारती प्रकाशन 2004


9. पृष्ठ 28-29 भूमिका - बी. क्रिलोव मार्क्स–एंगेल्स साहित्य और कला, राहुल फाउन्डेशन, लखनऊ 2006


10. page 4 monalizza editor Christopher kullenberg resistance studies magazine 


11. http//pratilipi.in/2008/04/pratirodh-aur-sahitya-madansoni


12. पृष्ठ 445 सौंदर्यशास्त्र के बारे में मार्क्स और एंगेल्स के विचार- जार्ज लूकाच, भूमिका - बी. क्रिलोव मार्क्स–एंगेल्स साहित्य और कला, राहुल फाउन्डेशन, लखनऊ २००६


13. पृष्ठ 5 कवि ने कहा [चुनी हुई कविताएँ] :कात्यायनी, 


14. कविता के सौ बरस, सम्पादकीय ,संपादक लीलाधर मंडलोई, शिल्पायन,दिल्ली 2008 


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Sunday, 28 September 2014

हिन्दी साहित्यिक ब्लॉग (परिचयात्मक आलेख)

  हिन्दी साहित्यिक ब्लॉग
   सामान्य परिचय एवं इतिहास -
       ब्लाग दिखने में यह छोटा सा शब्द, स्वयं में बड़ी अर्थवत्ता रखता है तथा इसकी सबसे बड़ी महत्ता है इसकी विचारों को संकलन एवं संवहन-प्रसारण बार सकने की क्षमता। मुक्त ज्ञान जोश विकिपिडिया ब्लाग का हिन्दी तात्पर्य चिट्ठा बताता है। ब्लाग लिखने वाले को ब्लागर (चिट्ठाकार) तथा इस कार्य को ब्लागिंग या चिट्ठाकारी की संज्ञा दी जाती है। प्रत्येक ब्लाग की अपनी एक खासियत होती है। उसके अनुसार उसे व्यक्तिगत, साहित्यिक, संगीत, इतिहास, पत्रिका इत्यादि श्रेणियों में रखा जाता है। ब्लाग अंग्रेजी शब्द वेबलाग ूमइसवह का सूक्ष्म रूप है। एक प्रारंभिक ब्लागर द्वारा मजाक में वी ब्लाग ूमइसवह से  ूम.इसवह का प्रयोग हुआ तथा संक्षिप्तिकरण होते होते मात्र ठसवह शब्द रह गया। ब्लाग का आरंभ 1992 में लांच की गई पहली बेवसाइट के साथ ही हो गया था। तथ्यों के अनुसार दिसम्बर 2007 तक खर्च इंजिन टैªक्नोरैटी द्वारा 112,000,000 ब्लाग टैªक किये जा रहे थे। टैबलैट, लैपटाप की बढ़ती जनसंख्या के आधार पर मैं यह दावे से कह सकता हूँ कि इनकी संख्या तत्काल में अरब को पार कर गई होगी।
       ब्लाग एक प्रकार का व्यक्तिगत जाल पृष्ठ या वेबसाइट होता है जिस पर संबंधित विषयों को समाचार, चित्र जानकारियाँ विचार आदि उपलब्ध कराये जाते हैं।
       हिन्दी शब्द चिट्ठा हिन्दी चिट्ठाकार आलोक कुमार प्रतिपारित किया गया थाा जो कि अब इन्टरनेट पर हिन्दी दुनिया में सामान्यतः प्रचलित है। गूगल ने भी इसे अपने शब्द कोश में स्थान दिया है। हिन्दी के प्रथम चिट्ठा का श्रेय भी आलोक कुमार के चिट्ठे या ब्लॉग नौ दो ग्यारह को जाता है।
       2004 में ब्लाग शब्द को मेरियम बेबस्टर में अधिकारिक तौर पर सम्मिलित किया गया था। सूचनाओं के आधार पर पता चलता है कि आरंभिक ब्लाग कंप्यूटर जगत संबंधी मूल भूत जानकारियों के थे। अब विषयों के आधार पर इन्हें कई प्रकारों में बंट गया है।
प्रकार -       व्यक्तिगत ब्लाग
साहित्यिक ब्लाग
              छायाचित्र ब्लाग
              विडियो एवं संगीत के ब्लाग
              कला या आर्ट ब्लाग इत्यादि।
हिन्दी साहित्यिक ब्लाग-
       जैसा कि पूर्ववत बताया गया है कि हिन्दी ब्लाग या चिट्ठे की शुरूआत आलोक कुमार ने नौ दो ग्यारह से होती है इसके बाद ब्लाग लिखने वालों का सिलसिला सा चल पड़ा। बड़े-बड़े साहित्यकारों कवियों आलोचको और बड़ी छोटी पत्रिकाओं ने अपने ब्लाग बनाए। इनके साथ ही जो सबसे बड़ी बात हुई वह यह कि साहित्य की जो छुई मुई लेकिन मार्के की आवाजें जो स्वयं या अन्य किसी कारणों से दबी थीं साथ ही वे आवाजें और विचार जिन्हें संपादकीय तानाशाही का शिकार बनना पड़ा मुखर होकर सामने आई। अतः मेरा विचार है कि ब्लाग या चिट्ठों को नई साहित्यिक क्रान्ति का संवाहक माना जाय तो कुछ गलत नहीं होगा।
       हिन्दी साहित्य को बढ़ावा देने में ब्लाग का विकसित रूप अब हिन्दी साहित्यिक पत्रिकाओं के रूप में दिखता है। साहित्यिक पत्रिकाओं की सफलता का अन्दाजा आप इस बात से लगा सकते हैं कि अनुराग वत्स की ब्लाग पत्रिका सबद पर एक कहानी है रिवाल्वर उसे हजारों फीड बैक और हिट मिले हैं। क्या किसी प्रिंट मीडिया की पत्रिका को इतने पाठक भी मिल पाते हैं। वाराणसी बी.एच.यू. के हिन्दी विभाग के प्राध्यापक डा0 रामाज्ञा शशिधर ब्लाग है अस्सी चौराहा। शशिधर जी की सूरन वाली वैचारिक कबकबाहट का आस्वादन लेने के लिए आपको इस पर फिजी, अरब, यू.एस.ए., मद्रास, केरल सभी जगहो के भारतीय-अभारतीय, हिन्दी-अहिन्दी भाषी लोग एक साथ चौकड़ी लगाए मिलेंगे। कुछ रूढ़-मूढ़ लोग हाथ में नींबू का टुकड़ा लेकर बैठते हैं फिर भी सूरन का मजा लते हैं। विरोेध के बावजूद उठ जाएं ऐसा साहस नहीं होता।
       तीसरी तरफ कविता कोश और प्रतिलिपि जैसी प्रसिद्ध ब्लाग पत्रिकाएं भी हैं। प्रतिलिपि को फोर्ब्स इंडिया ने इण्टरनेट और साहित्य की अणमान्य पत्रिकाओं में शामिल कर उसे सम्मान दिया हैं
       कविता कोश लंदन से चलाई जाती है और अनिवासी और निवासी भारतीय में समान्य रूप से लोकप्रिय है।
लाभ -
       साहित्य स्वभाव सामान्य जन को हित का आकांक्षी होता है ऐसे में हिन्दी की कुछ प्रमुख पत्रिकाएं साहित्यिक राजनीति की चपेट में आकार सामान्य जनता लेखक और खास कर नवोदित लेखकों के साथ अन्याय कर रहीं थी। लेखक अकारण साहित्यिक तानाशाही का शिकार हो रहे थे ऐसे में ब्लाग एक खुले मंच के रूप में पदापर्ण करता है जहां हर कोई अपनी वैचारिक स्वतंत्रता के साथ उपस्थित होता है। बादनोति की अनावश्यक हस्तक्षेप से भी मुक्ति मिलती है।
       दूसरी बात यह कि हिन्दी भारतीयों की भाषा है और नव शिक्षित भारतीयों का बड़ा तबका तकनीकी, प्रबंधन इत्यादि क्षेत्रों में कर रहा है ऐसे में समय की न्यूनता और आम साहित्यिक पत्रिकाओं की पहुँच की संभावना शून्यता का पृष्ठ पोषण ब्लाग ही कर पाता है। एक ब्लाग ही है जो दुनिया के किसी हिस्से में आप की उंगलियों की एक क्लिक में दब पड़ा है।
       तीसरी बात है भाषा का प्रसार हिन्दी भाषा भाषियों की संख्या इसे विश्व की तीसरी सबसे बड़ी भाषा का दर्जा देती है और हमारी दिली ख्वाहिश रहती है कि हिन्दी भाषा और उसका संस्कार तरक्की करे ऐसे में ब्लाग ही एक ऐसा सशक्त माध्मय बन सकता है जो समान और निष्पक्ष रूप से साहित्य का संवेदन कर सके और साहित्य का विकास स्वतः स्फुर्त रूप से भाषा गर्वोन्नत ऊँचाई प्रदान करता है।
       अगले पक्ष के रूप में मैं देखता हूँ उन छात्रों के वैचारिक विकास की और जो अपना वक्त और देश का भविष्य पोर्न साइट्स और विडियो गेम्स की भेंट चढ़ा रहे हैं। ब्लागिंग या साहित्य इनके लिए वैचारिक, संस्कृतिक तथा शैक्षिक रूप से ज्ञान और मूल्यों का संवर्द्धक होगा ऐसा कहने में कोई गुरेज नहीं है।
       राजनैतिक मुद्दों और विचारों और साहित्य का साथ भी चोली दामन का रहा है लेकिन वक्त के साथ-साथ दामन स्थिति विकृत हुई फिर स्थान शून्यता का शिकार हुई ऐसे में राजनैतिक नग्नता उभर कर सामने आई है। ब्लाग ऐसे में पुनः साहित्य को पुर्नस्थिति में लाने के लिए कृतसंकल्प दिख रहा है तथा नग्नता को छुपाने के बदले नग्नता की समाप्ति मूल्यों और स्वच्छ विचारों को बढ़ावा देने की पुरजोर कोशिश कर रहा हैै।
प्रतिपक्ष-
       संपादकीय हस्तक्षेप पहले साहित्य को सुनियोजित उत्कृष्टता प्रदान करते थे। ब्लाग में संपादकों का अस्तित्व समाप्त हो गया है। ऐसे में ब्लागरों को चाहिए कि वे स्वच्छंदता में बदलने से रोकें तथा आत्म अनुशासन रखें। दूसरा पक्ष यह भी है कि अब भारतेंदु और महावीर प्रसाद जैसे संपादक भी कहां मिलते हैं। लेखकों को चाहिए कि वे पाठकों के कामेंट पर ध्यान दे स्वतंत्र संपादक के रूप में पाठक ही उनकी रचना धर्मिता को निखार सकते है तथा वे इस प्रसिद्ध पंक्ति को आत्मसात भी करे कि..... निंदक नियरे राखिये.......
       प्रमुख साहित्यिक ब्लाग एवं ब्लाग पत्रिकाएँ अस्सी चौराहा (रामाज्ञा शशिधर), प्रतिलिपि, शबद (अनुराग कश्यप), संवादी (अरूण देव) कलम (महेश आलोक), हम कलम (अशोक कुमार पाण्डेय), अनुवाद, कविता कोश, कविता कोसी, अ आ, कबाड़खाना, असुविधा, समालोचन इत्यादि।
अंत में- ब्लाग रचना धर्मिता और वैचारिकी को उत्कृष्ट ऊँचाई प्रदान करने प्रक्षेपण स्थल है। हिन्दी की समृद्धि और साहित्य के विकास के इस क्रांति रथ पर सवार हो हम नया मुकाम हासिल कर सकेंगे।

अरमान

Friday, 19 September 2014

एक कहानी चाय के साथ

एक कहानी चाय के साथ

एक कप चाय में कितनी कहानी? ओह मतलब कितना शक्कर ? एक चम्मच ? नहीं! वो भी नहीं|शुगर फ्री चलेगा ? हम्म चलिए शुगर फ्री आपकी मर्जी से कहानी मेरी मर्जी से | एक कहानी सुनाता हूँ चाय के साथ |
                      एक पूंजीवादी था |क्षमा करें मैं शब्द बदलना चाहूँगा ...अर्थ में ख़ास परिवर्तन तो नहीं होगा, हाँ... शब्द आँखों में चुभेगा नहीं |पुनः प्रारंभ ... एक सेठ था उसका कपड़ों का व्यवसाय था| उसकी दुकान कहीं भी हो सकती है.. जर्मनी लन्दन,दिल्ली, बिहार, बेगुसराय, बनारस.. कहीं भी| आपके पड़ोस में भी हो सकता है शायद| मगर गोदाम उसके पेट में था और फेफड़े में तिजोरी| अब बचा समय ..तो स्वादानुसार जो भी सन ..ईस्वी चाहें इस कहानी में डाल सकते हैं|
                         कहानी का दूसरा पात्र उसी सेठ द्वारा तयशुदा  व्यवस्था का शिकार  ..स्वयं  सेठ का विलोम एक भिखारी था| हाँ .. हाँ.. सही पकड़ा .. भिखमंगा यार| वही जो फटे कपड़ों में स्टेशन के बहार आपके लिए खड़ा होता है और निकलते ही एसी का सारा मजा खराब कर देता है| सिक्कों के बदले बेफजूल दुआएं बांटता फिरता है|आह.. क्षमा करना आप पकड़ कैसे सकते हैं ? उसके कपड़ों की गंद आपके ड्रायक्लीन कपड़ों की खूबसूरती बर्बाद कर सकता है| तो बिना पकड़े .... बस देखें कि एक भिखमंगा भी था |रोजाना वह भीख मांगने सेठ की दूकान पर आ धमकता | सेठ उससे बेहद तंग आ चुका था|एक दिन उसने भिखारी को बुलवाया | उसे नहलवाया .. उसकी हजामत बनवायी और महाकवि निराला के उस भिखमंगे पर कोट-वोट वो भी नया-नया  डाल-डूल कर बोला ..  अब आइना देखो बस .. तुम कैसे साहब से लगते हो?
                भिखमंगा खुद को निहारता हुआ खाली जेबों वाला कोट-पैंट पहनकर चला गया|
               सुना है वह आपके शहर वाला साहब भिखमंगा भूख से तड़प-तड़प कर{संवेदना मंगवाइये सर } मर गया | सेठ खुश था | अब वह चैन से दुपहरी में एसी चला कर पेट पर हाथ रखे सोयेगा| कोई कटोरा बजाकर उसकी नींद में खलल नहीं डाल पायेगा |
            आपकी चाय-वाय ख़त्म हो गयी हो तो कप-प्लेट समेत कर नीचे रख दीजिये |कहानी तो खत्म हो गयी| आप तो खामख्वाह भावुक हुए जाते हैं, भिखारी ही तो था|

                                                                                                                अरमान आनंद 

Saturday, 30 August 2014

बेबाक कविताओं की दुनिया: जी हाँ लिख रहा हूँ.. armaan anand



बेबाक कविताओं की दुनिया: जी हाँ लिख रहा हूँ..


सर्जक की प्रसव पीड़ा को उसकी रचना ही सार्थक करती है और सर्जना जड़ता के विध्वंश और प्रजनन के दर्द से उत्पन्न आनंद का नाम है| अपने परिवेश से कवि का सतर्क सम्बन्ध सशक्त एवं कालजयी कविताओं को जन्म देता है|निशान्त अपने संग्रह के शीर्षक "जी हाँ लिख रहा हूँ ..", आवरण चित्र और प्रस्तावना में नागार्जुन की कविता के द्वारा संकेत दे देते हैं कि वे अपनी सर्जना के प्रति कितने सतर्क ,संकल्पित और गौरवान्वित हैं| जी हाँ लिख रहा हूँ.../बहुत कुछ! बहोत -बहोत!! /ढेर -ढेर सा लिख रहा हूँ/मगर, आप उसे पढ़ नहीं पाओगे /देख नहीं सकोगे उसे आप!...जी हाँ लिख रहा हूँ...| बाबा नागार्जुन की इन पांच पंक्तियों को अपनी पांच लम्बी कविताओं का प्रतिनिधि स्वर बनाकर कवि ने अपना रूख बिलकुल साफगोई से सामने रख दिया है| जी हाँ लिख रहा हूँ.. शीर्षक इस ध्वन्यात्मकता के साथ अपनी उपस्थिति दर्ज कराता है ,जैसे वह कालचक्र का इतिहास लिखने जा रहा हो ... ,जैसे उसने भांप ली हो चाल समय के पहिये की |संग्रह की कवितायें एक प्रकार से यात्रा कवितायेँ है, जो कवि के जीवनानुभव को साथ लेकर चलती हैं |व्यक्ति का सम्पूर्ण जीवन एक यात्रा ही तो है|जन्म से मृत्यु की यात्रा ,अज्ञान से ज्ञान की यात्रा ,अबोध से बोध, बोध से शास्त्र, शास्त्र से अनुभव, अनुभव से बौद्धिकता की यात्रा ,कहा भी गया है कि यात्रा ही जीवन है और ठहराव मृत्यु | संग्रह में उतरते ही निशान्त कोलकाता को कविता के कैनवास पर बिखेर देते हैं| चित्र दर्शन के बहाने से पाठक को कालयात्री बना देते हैं |कोलकाता के सीने पर बिछी हुई हैं पटरियां , कहते ही वे कोलकाता की प्राच्य -आधुनिकता ,टून...टून..टून की आवाज के साथ सांस्कृतिक बोध और बैलगाड़ी और उसके चलने की आवाज कहते ही समय के पारिवार्तनिक नैरंतैर्य की यात्रा पर पाठक को अनायास ही रवाना कर देते हैं |कोलकाता कभी हाथ में रिक्शा बन दौड़ पड़ता है, तो कभी पिताजी की सीख में सामंत बनकर खड़ा दिखता है|फिर यह यात्रा पाताललोक में सरक आती है, जहाँ पाताल लोक कोलकाता के साथ-साथ कवि के बचपन में भी बसा है और साथ ही बसा है दादी की कहानियों में |यह पाताल लेखक की अगली पीढ़ी की कहानियों में भी प्रत्यक्ष -अप्रत्यक्ष दोनों बसता है|'कोलकाता एक जादुई नगरी' कहते हुए लेखक उन तमाम कहानियों को जिन्दा कर देता है, जो दूर अनजान देशों में कोलकाता कि प्रतिनिधि थीं | सत्ता के उस तिलिस्म को बेनकाब करता है, जो वामपंथ के नाम पर गद्दी से गलियों तक फैला हुआ है| यही जादू कवि -फिल्मकार बुद्धदेव दास गुप्ता की फिल्मों और कविताओं में प्रकृति बन कर मुस्कुरा रहा है|कोलकाता बस में एक रूपये के लिए लडती औरत से लेकर विक्टोरिया मेमोरियल के गुम्बद तक फैला हुआ है|भोर के सपने-सा उतरता हुआ किराये के कमरों में घर बनकर अधलेटा हुआ कोलकाता कविता की आखिरी पंक्ति तक पाठक के अन्दर टहल रहा है|कुल मिलाकर "कोलकाता :कविता के कैनवास" पर कुछ बिखरे चित्रों में निशांत दर्शन की कला और दर्शन का सौन्दर्य प्रस्तुत करते हैं|बातें सारी होतीं तो इसी दुनिया और हमारे आस-पास की हैं ,मगर घड़ियों की रफ़्तार में अंधी आँखें न देख पाती हैं , न टिक टिक के शोर में सुना जा सकता है| आधुनिक अफ़्रीकी साहित्य के पिता माने जाने वाले चिनुआ अचेबे कहते थे -लेखक को इतिहासकार होना पड़ता है|मेरी उनसे सौ प्रतिशत सहमति इसलिए है क्योंकि मैं सोचता हूँ, पत्रकारिता या इतिहास लेखन में समाज के रहन -सहन ,विचार आदि का डाटा मात्र भरा होता है ,वहीँ साहित्यकार समाज का भावपूर्ण इतिहास लिखता है, जो कई मायनों में बेहतर और उपयोगी है|


संग्रह की दूसरी लम्बी कविता कबूलनामा लेखक के आत्म चिन्तन और आत्म-चिन्तन के बहाने समग्र चिंतन की भी कविता है|मध्यवर्गीय चेतना अपने अस्तित्वमूलक सत्ता की पहचान और स्थापना को लेकर चिंतित है|कभी-कभी मैं पहचान नहीं पाता हूँ ,अपने आपको /शीशे में मेरा चेहरा स्थिर रहता है /हिलता है /डुलता है और कई चेहरे बनता है /दरअसल वह कई मुखौटे रखता है अपने पास /मैं अपने 'मैं' को लेकर सशंकित रहता हूँ.. जीवन संकट के पीछे मध्यवर्गीय चिंता और मध्यवर्ग का ढुलमुल आचरण है ,जो स्वयं को बचाए और बनाये रखने के लिए वह इस्तेमाल करता है| यहाँ जीवन संकट से ज्यादा तवज्जो निशांत पहचान के संकट को देते हैं |अस्तित्व मूलक सत्ता की स्थापना को देते हैं |जीवन को बचा लेने और गुपचुप तरीके से जी लेने की मध्यवर्गीय सोच जिसके लिए मध्यवर्ग ने मुखौटों और कई चेहरों का आज तक सहारा लिया है|उसे वह एक सिरे से नकार देते हैं| सत्ता सबसे पहले स्वायत्तता चाहती है |लेखक अपनी अस्मिता की स्थापना के लिए स्वतंत्रता चाहता है|आँखें वह नहीं देख पातीं जिसे मैं देखना चाहता था / जुबान वह नहीं बोलती जिसे मैं चाहता था बोलना |मध्यवर्गीय चेतना दो चरित्रों को साथ लेकर चलती है |वह दास भी है और दमनकारी भी|वह स्वतंत्रता चाहता भी है और स्वतंत्र होने देना भी नहीं चाहता |सपने में हमेशा एक सुन्दर स्त्री आती है और अपने हाथों में बारूद लिए /उसके हाथ बहुत ही कलात्मक होते /किसी कलाकार द्वारा फुरसत में बनाए हाथों की तरह ..अब बारूद लिए स्त्री निश्चय ही कवि द्वारा अपनी अस्मितामूलक सत्ता बचाने और बनाने में उद्धत स्त्री का बिम्बात्मक चित्रण है ,परन्तु उसके हाथों की तारीफ में डूबी अगली पंक्तियाँ उन तमाम मध्यवर्गीय मानसिकता को उजागर करती है , जो उसकी यौनेच्छाओं को शांत करने में लगी रहती हैं|फ्रायड इसी को लिविडो कहते हैं|माँ में हमेशा एक पुरुष दीखता था मुझे ..उस स्त्री का चित्रण है जो शरीर से स्त्री और चेतना से पुरुष है |यह पंक्ति लान्का के सुप्रसिद्ध विचार वीमेन डज नाट एक्जिस्ट का काव्यात्मक रूपांतरण है|विचार कविता में ढलकर किस तरह आम जन तक पहुँचती है इसका सुंदर उदाहरण भी|शक ,संशय और डर मध्यवर्ग का चिर परिचित मिजाज है |अपने ही विश्वासघाती व्यक्तिव से मनुष्य इतना आतंकित है कि उसे किसी पर भरोसा नहीं है|माँ , बहन, बच्चे, प्रेमिका सब पर शक करता है ,अपने डर को तुष्ट करने के लिए डराता है ,मनोनुकूल आचार और प्यार करने पर मजबूर करता है|यह भी जानता है कि यह एक मनोरोग है परन्तु वह लाचार है| उसका सबसे बड़ा संकट है पवित्रता, जो उसे विरासत में मिली है|इसे बचाने के लिए वह कई जघन्य अपराध भी करता है| कविता का दूसरा हिस्सा गाँव और शहर के बीच फंसे मध्यवर्ग का बयान है |कुछ खेत, कुछ जानवर, कुछ बच्चे, कुछ औरतें और /ढेर सारे झूठ पीछे छूटे जा रहे थे /यात्रा करना जरूरत नहीं मेरी मजबूरी थी/लाभ बहुत ज्यादा नहीं था/ फिर भी पेट के लिए फिरते रहना मेरी मजबूरी है ......शहर पहुँचते ही पवित्रता के सारे आडम्बर धराशायी हो जाते हैं | पहली बार भीख मांगते हुए मैंने जाना /दुनिया में कुछ भी पवित्र नहीं है /अभी -अभी जाना... शहर के नजदीक आते गाँव का दूर हो जाना सांस्कृतिक बिछुडन का शिकार बनाता है |वहीँ शहर पवित्रता के ढोंग का चेहरा साफ़ और स्पष्ट करने में भी माहिर है|असलम दा के बहाने एक बौद्धिक और एक सामान्य व्यक्ति के बीच के फर्क को कवि दिखाना चाह रहा है|अपनी जिन्दगी बिना अनावश्यक पचड़े के न जी पाने की सारी भडास निकाली है|कविता के चौथेपन में कवि डर जैसे शाश्वत सत्य का उद्घाटन कर रहा है|डर जीवन का उपहार भी है और कमजोरी भी |डर का अपना मनोविज्ञान है| राजनीतिक सत्ता खुद की स्थापना के लिए जनता में डर बनाये रखना चाहती है तो उसी अनुरूप क़ानून भी बनाती है| घार्मिक सत्ता नैतिकता और पवित्रता के नाम पर डर का निर्माण करती है ,तो समाज मर्यादा के नाम पर डर पैदा करता है|व्यक्ति अपने जीवन और अस्मिता की रक्षा के लिए भयभीत रहता है, परन्तु तब तक जब तक भय संभव है|भय के अंतिम क्षणों में साहस की उत्पत्ति होती है| युद्ध नीति कहती है -दुश्मन को हमेशा तीन तरफ से ही घेरना चाहिए, एक तरफ से भागने का मौका देना चाहिए |वर्ना वह अंतिम सांस तक लडेगा | यह डरना नितांत आवश्यक है /डर-डर के ही की जा सकती है सफल यात्रा..कहते ही कवि इंगित करता है कि मध्यवर्गीय मनोविज्ञान में डर अपनी अस्मिता, पवित्रता, नैतिकता, संस्कार आदि को बचाए रखने के लिए ही आता है| यही डर सफलता की कुंजी है, परन्तु यह डर घातक हो जाता है ,जब डर अभिव्यक्ति और सोच की स्वतंत्रता पर हावी हो जाता है| डरो ताकि डरने से नहीं लगता चुनरी में दाग /भागो ताकि भागने से सोयी रहती है आत्मा...../ डर-डर कोई स्वप्न देखता है भविष्य के लिए /डर -डर कर कुछ लोग करते हैं आत्महत्या ..... / डर कर कुछ मुंह खुल नहीं पाते ..कविता के पांचवें हिस्से में कई छोटी-छोटी चीज़ें अहम हो जाती हैं| फुलपैंट ,कुरता , बंडी, रुमाल, छोटी घटनाएँ, रिश्ते ,रिश्तों की छोटी-छोटी मगर अहम यादें ,सबकुछ मध्यवर्गीय जीवन में विशालता के साथ उपस्थित होता हैं |जीवन में इनका अपना हिस्सा है|अपना सरोकार है|निशांत लिखते हैं -छोटे -छोटे शब्दों के भी होते हैं /बहुत बड़े-बड़े अर्थ /बहुत बड़े -बड़े साम्राज्य /एक उम्र में समझ में आती है यह बात /..साइकिल, प्रेम, चाय , झगड़ा ,रूठना - मनाना,एस एम् एस सबकुछ एक आम जीवन में उतना ही महत्वपूर्ण होता है ,जितना कि राज्य के लिए प्रधानमन्त्री, राजनयिक, विदेश नीति, मुद्रास्फीति, परमाणु और मिसाइलें |छोटी चीजों का अस्तित्व कितना महत्वपूर्ण होता है और हो सकता हैं या होना चाहिए ,इसे बतलाते हुए निशांत लिखते हैं -इतने बड़े राष्ट्रपति भवन में /एक कबूतर तक नहीं बैठ सकता /बड़े शर्म की बात है /दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र में /कबूतरों तक को बैठने के लिए जगह नहीं है .. अर्थात लोकतंत्र तभी तक सार्थक है, जब तक लोक जिन्दा है|जब तक केंद्र हाशिये से परिचालित है|अन्त्योदय सबसे बड़ा लक्ष्य है|छोटी और मामूली चीजें लोक जैसी महत्वपूर्ण शक्ति का निर्माण करती हैं|इन्हीं छोटी चीजों में मध्यवर्ग का मैं भी महत्वपूर्ण है और इतना महत्वपूर्ण कि आपका जीवन ,आपके अस्तित्व की सत्ता भी इसी मैं पर टिकी है|


'मैं में हम -हम में मैं' कविता कई मैं के मिलने से बने हम और हम की परिधि में उलझे कई मैं की गाथा है| निशांत ने कई मैं की कहानियों को बारीकी से रखा है, जो समवेत रूप में हम की कहानी है|हम ही नहीं हैं 'सबकुछ'/सबकुछ में एक बूँद में एक बूँद हैं हम /हम में ही कुछ है /कुछ में ही मैं हूँ -हम है .. कवितायेँ छात्र जीवन की चुहलबाजियों और यादों से पटी पड़ी हैं|इनमे एक जीवन्तता है|कभी न खत्म होने वाला एक सिलसिला है|कितनी छोटी -छोटी बातों से खुश हो लेते हैं 'हम '/तो कुछ दुखी भी /मसलन हजार रूपये की ब्रांडेड जींस चार सौ में मिल गयी /पडोसी वर्मा की बेटी मुस्कुराकर के बगल से सट कर गयी... |कविता के दौरान निशांत उन तमाम परेशानियों और उधेड़बुनों से भी दो चार होते हैं, जिनसे छात्र जीवन जूझता है| ....और बार-बार आत्महत्या के बारे में सोचते हुए /कमरे से बाहर निकलता /जीने की मजबूरी को कंधे पर लादे /कमरे में उसी ब्लेड से नाखून काटता ....../ माँ पंखा झलती /और कहती -"आज बहुत उमस है |/रात को बारिस होगी|"/ 'पिता' कहते -"बस ,वह बन जाये 'कुछ'|"...


"फिलहाल सांप कविता" संग्रह की चौथी कविता है|कवि ने इसे बाबा नागार्जुन को समर्पित किया है|बाबा लोक और लोक राजनीति के लोकमान्य धुरंधर थे|कविता का पहला पैरा ही बाबा के प्रति समर्पण को स्पष्ट कर देता है|साथ ही उन तमाम अवसरवादियों और विचारधारा के दलालों के प्रति अपने विरोध को भी मुखर रूप देता है जो पुरस्कार और साहित्य के नाम पर तीसरे दर्जे की राजनीति करते हैं|उम्र बढ़ने के साथ-साथ वह होता जा रहा है सन्त /बढती जा रही है लोलुपता ..कह कर निशांत तमाम घोंघा बसंतों को बेनकाब कर दते हैं|संपादकों को जनतांत्रिक तानाशाहों से जोड़ कर साहित्य और सियासत के सियारी चेहरे में बेनकाब कर देते हैं|खींसों के खेल से तथा अदृश्य पूँछों की सलामी के सहारे साहित्य की सीढियाँ चढ़ने वाले तमाम लोगों की खबर इस कविता में ली गयी है|एक कवि ने चिल्ला कर कहा /उदारवादी बाजारवादी और विज्ञापन के शिखर कालखंड में /दारू पीने-पिलाने से इनकार करने वाला व्यक्ति /सबकुछ हो सकता है कवि नहीं हो सकता ... |कविता का दूसरा खंड उस व्यक्ति का प्रतिनिधित्व करता है, जो पिछली कविताओं में अपने अस्तित्व और उसकी सत्ता की स्थापना के लिए चिंतित था|वह खूंसटों की खबर ले रहा है| अपनी स्थापना की घोषणा कर रहा है|वह बता रहा है कि ये कविता जो वह लिखता है, एक्सपायर्ड दिमाग से बाहर की चीज़ है|माओत्से कहते थे -साहित्य और कला का कार्य हमेशा से ही पर्दाफाश करना रहा है| सम्पादकीय चरित्र की बखिया उधेड़ते हुए निशांत साफ़ -साफ़ लिखते हैं एक सम्पादक सरकारी कमरे में तीन तरफ /चाणक्य प्लेटो और ईश्वर के शांति दूत प्रधानमंत्री की तस्वीर लगाये /चौथी तरफ अपनी तस्वीर लगाने की इच्छा लिये / थर-थर काँपता है रात को बिस्तर में /उसके सपने में आता है एक 'रक्त-स्नात-पुरुष' बीड़ी जलाता और अँधेरे में पूछता - पार्टनर तुम्हारी पोलिटिक्स क्या है ? जिन झोलाछाप डाक्टरों के कारण साहित्य क्षय रोग का शिकार हुआ है तथा खांसता हुआ दम तोड़ रहा है निशांत ने उन्हें एक- एक कर अपने निशाने पर लिया है|साहित्य अपने आप में एक महान काम है |लोग इसे शौक या प्रसिद्धि के लिए इस्तेमाल करते हैं |निशांत इनके प्रति भी खासा रोष प्रकट करते हुए कहते हैं .. दफ्तर के वक्त पूरी दफ्तरी/कविता के वक्त कविता के अलावा और कुछ नहीं होना चाहिए .. चीन के प्रसिद्ध साहित्यकार लू-शुन भी क्रन्तिकारी काल का साहित्य निबंध में अपने विचार व्यक्त करते हैं कि.. क्रांतिकारी साहित्य क्रांति के वक्त लिखा साहित्य नहीं बल्कि क्रांति के सम्बन्ध में क्रांतिकारियों द्वारा लिखा हुआ साहित्य होता है,परन्तु क्रांति के वक्त साहित्य नहीं लिखा जाना चाहिए| क्रांति के वक्त केवल क्रांति और साहित्य के वक्त केवल साहित्य|इसके लिए क्रांतिकारी साहित्य थोड़ी देर से भी शुरू हो तो कोई हर्ज नहीं है|काम के प्रति निष्ठा ही काम में परफेक्शन देता है|निशांत कविता में घुसी हुई हर फर्जी प्रवृति को उधेड़ते और निषेध करते हैं|चौथी लम्बी कविता के चौथे हिस्से में युवा समकालीन कवियों को लताड़ लगाते हैं कि उनका लक्ष्य पूँजी और पद प्राप्ति हो गया है,संपादकों के इर्द-गिर्द मंडराना उनकी फितरत हो गयी है|वे लिखते हैं -पूँजी हमारा परम मित्र है /जाति हमारी पहचान /सूचना जाल हमारे मददगार हैं /आप हमारे पालनहार ..| समकालीन कविता सचमुच फार्मूलाबद्ध हो गयी है|बिलकुल हिंदी सिनेमा की तरह ..थोडा आदर्श, थोडा नाच-गाना, थोडा इमोशनल ड्रामा,थोडा डायरेक्टर,एक्टर का नाम थोड़ी पब्लिसिटी हो गयी फिल्म सौ करोड़ के पार|इसी तरह संपादकों से मोबाइल मैनेजमेंट और चलताऊ विमर्शों से कविता में पुरस्कृत गोबर भरे जा रहे है|भाषा को साहित्य की कसौटी पर इसलिए कसा जाता है क्योंकि साहित्य ज्ञान मीमांसा का सर्वोत्कृष्ट साधन है|बिना नये ज्ञान का उत्पादन किये जो कुछ लिखा जायेगा |सब कूड़ा ही तो होगा |अनावश्यक ,बेमतलब ,सिर्फ भाषा चमत्कार कुछ भी हो साहित्य तो बिलकुल नहीं हो सकता | इस समय के पास नहीं है विचारों की वह सान /जो आन्दोलन की जमीन बना सके ...आगे लिखा है.. ठीक रीति काल में "कन्हाई सुमिरन के बहानो है"की तर्ज पे /वे समझ गये हैं इस समय की कविता पढने के लिए नहीं /सजे-धजे पृष्ठों पर छपने के लिए लिखी जा रही है|निशांत ने बेरोजगारी से मुक्ति और पूँजी के लोभ कविता के जन्म के दो तत्कालीन आधार बताये हैं |सम्पादक विज्ञापनों के लिए कवितायेँ बटोरता है तो कवि चंद लघु पत्रिकाओं की सीढियाँ बनाकर रोटी,फिर ऐशो -आराम तक पहुंच बनाता है|जनता को भी कवि कठघरे में खड़ा करता है-अब, खून नहीं खौलता किसी को सरेआम हत्या पर /बस अखबार में रिपोर्ट लिखी-पढ़ी जाती है / काली पट्टी बांधकर प्रदर्शन किया जाता है /मोमबत्ती जलाकर जुलूस निकाली जाती है /अंत में सारी घटनाएँ एक फिल्म में तब्दील हो जाती हैं | पांचवें खंड में कविता के अंतर्वस्तु के सम्बन्ध में बात करती है|कविता का डायरी और छोटी चीजों का इतिहास होते जाना आज की कविता की विशिष्टता है| कविता की शैली कुछ कुछ समाचार शैली है|घटनाओं को विस्तार से समझाती सुंदर लड़की के नीचे तुरत-फुरत की घटनाएँ शब्द बनकर दौड़ती हैं|मगर घटनाओं के विस्तारीकरण से निशांत आपको आपको बोर नहीं करते|कवितायेँ सीधी-सपाट भाषा में सत्ता की तमाम साजिशों का पर्दाफाश करती चली जाती है, जिसमे केंद्र चूतड़ अटकाए जमा है और हाशिया चूतड लिए धक्का मुक्की करता केंद्र की ओर दौड़ रहा है|किसी को सम्पूर्ण परिवर्तन नहीं चाहिए ; हिस्सा चाहिए लूट में हिस्सा| हर परिवर्तन बस अपनी स्थिति तक के परिवर्तन की आकांक्षा तक सीमित है |


'कैनवास पर कविता' रंगों की वैचारिकी को शब्दबद्ध करने का सुंदर प्रयास है| इसे रंगों का भावानुवाद भी कह सकते हैं , जिसमे कुछ -कुछ दार्शनिक टच भी मिलता है|संग्रह के इस अंतिम खंड में निशांत साबित करते हैं कि कला वैचारिकी का माध्यम भर है|कला का असल उद्देश्य नई वैचारिकी का जन्म है|चाहे बात रंगों में हो या शब्दों में नई बात अगर सलीके से कही जाएगी,तभी महत्वपूर्ण होगी|अंतिम पंक्ति इसे और भी पुष्ट करती है|जब कुमार अनुपम की पेंटिंग्स को देखते हुए कहते हैं -वह लिखता है कविता रंगों की भाषा में |


संग्रह को पढ़ते हुए पाठक यह महसूस करता है कि निशांत अपनी कविताई और समय के प्रति प्रतिबद्ध हैं|वह समस्याओं पर पैनी और निडर नजर रखते हैं| सबसे ज्यादा उनकी बेबाकी मुझे प्रभावित करती है|पांच लम्बी कविताओं से वे विश्वास दिलाते हैं कि कविता की पटकथा और शिल्प में आज भी नये और सार्थक प्रयोग हो रहे है|कविता में मुक्तिबोध के चिरपरिचित वाक्यों का प्रयोग उनके परम्पराबोध को भी दर्शाता है| मेरे विचार से जवान होते हुए लड़के का कबूलनामा के बाद उनका यह दूसरा संग्रह जी हाँ लिख रहा हूँ भी एक योग्य प्रयास है,जिसके लिए निशांत साधुवाद के पात्र हैं| आशा है कि आगे भी उनकी रचनाधर्मिता से साहित्य लाभान्वित होता रहेगा| 





अरमान आनंद,शोध-छात्र ,हिंदी विभाग बी.एच.यू. 07499261303

Thursday, 10 July 2014

धर्म {कहानी}

भागलपुर एक बार फिर सुर्ख़ियों में था। वजह .. दंगे। हिन्दू बाहुल्य मुहल्लों में न मुसलामानों की खैर थी और न ही मुस्लिम बाहुल्य मुहल्लों में हिन्दुओं की। चीख पुकार और मातम का माहौल था। आज किसी को फुरसत नही थी की वो किसी के घावों पर मलहम लगाए। कोई किसी को सांत्वना नही दे रहा था क्योंकि हर एक के बदन खुद घाव से लथपथ थे। जिन्हें फुरसत थी वो बदला लेने के षडयंत्र रच रहे थे।
                   अधेड़ उम्र के सुलतान मियां की आँखों में बीस साल पहले का दृश्य घूम गया। कैसे लोग एक दुसरे की जान के प्यासे हो रहे थे। साथ साथ गली में क्रिकेट खेलने वाले बच्चों ने बल्लों की जगह तलवारें थाम लीं थीं। जमीन खून से लाल हो चुकी थी।
        या अली या अल्लाह के नारे गूँज रहे थे। मुस्लिम बाहुल्य क्षेत्र होने के कारण दूसरा कोई नारा गूंजना तो खैर संभव ही नहीं था। बीस साल गुजर गए।  यहीं पास में दो गली छोड़ के आम वाले मकान में सुलेमान का दोस्त भी तो रहता था। बड़ा प्यारा दोस्त था वह सुलेमान का । गाढ़ी छनती थी दोनों की। वो  मनहूस शाम भी याद है उडती खबर आई थी की किसी ने दरगाह में जानवर का कोई अंग काट कर फेंक दिया है। बात   की तह तक जाने की जरूरत किसी ने नहीं समझी। मार काट शुरू हो गयी। कर्फ्यू भी लग गया। देखते ही गोली मारने का आदेश था।दो दिनों गुज़र गए।
        उस शाम करीबन आठ बज रहे होंगे। अँधेरा आहिस्ते-आहिस्ते शहर को अपनी आगोश में ले रहा था। अचानक किसी ने दरवाजे को पीटना शुरू किया। दरवाजा खुलते सुल्तान के पैरो में कोई गिर गया। ये गोविन्द था। बुरी तरह घायल.. उसके हाथ में 6 महीने की बच्ची भी थी।
...बचा ले यार इसे। इसे बचा ले। मैं तेरे पाँव पड़ता हूँ। उन्होंने सब खत्म कर दिया। मेरी बीबी बेटे सबको मार दिया। इतना कहकर गोविन्द रोने लगा।
     सुलेमान उसे उठाकर घर के अन्दर ले आया। उसे भरोसा नही हो रहा था। उसकी आवाज जैसे गायब हो गयी थी। दिमाग सुन्न पड़ गया था। गोविन्द बोलता ही जा रहा था। नही सुलेमान मुझे जाने दो इसे बचा लो बस ।वो सब पागल हो चुके हैं।
सुलेमान ने दरवाजा बंद किया और बोला आओ भाई तुम्हे जल्दी से कहीं छुपा दूं। तभी किसी ने दरवाजे को पीटा। आवाज आई दरवाजा खोलो सुलेमान भाई... भाई दरवाजा खोलो ..
गोविन्द का चेहरा स्याह पड़ गया। सुलेमान ने कहा तुम घबराओ मत मैं इनसे निबटता हूँ। दरवाजा खोलते ही सामने जहीर बशीर के साथ कई लोग दिखे। उनके हाथों में नंगी तलवारें थीं। जहीर ने चीखते हुए पूछा साला गोविन्दवा आया है क्या इधर। सुलेमान ने  अपने को संयत करते हुए कहा.. नही तो.. क्या हुआ?
झूठ मत बोलो सुलेमान भाई छोड़ेंगे नही उसे। उसके बेटे और बीबी को काट डाला हमने .. उसेभी नहीं छोड़ेंगे?? कहाँ है वह काफ़िर?
सुलेमान के चेहरे पर दर्द भरी मुस्कराहट तैर गयी। मार दिया? ... अच्छा किया अरे चचा कहता था तुम्हे और शांति भाभी कितनी प्यालियाँ चाय की गटकी हैं उनके घर पे खुदा इसका हिसाब करेगा। दोजख में जलोगे... दोजख में भाग जाओ यहाँ से कोई नही है यहाँ। बशीर और जहीर के चेहरे उतर गये। सुलेमान ने दरवाजा बंद कर लिया। सुलेमान लौट कर कमरे में आया। फूल सी बच्ची सोफे पर लेटी हुई थी। गोविन्द नही था। सुलेमान ने सारा घर छान मारा। पिछला दरवाजा खुला था। गोविन्द शायद वहीँ से निकल गया । सुलेमान बच्ची को सीने से लगाए काफी देर तक रोता रहा।

Sunday, 6 July 2014

विश्वसुन्दरी पुल वाया बनारस{कविता }

बनारस को जब भी देखा मस्त देखा |भांग की मस्ती से सराबोर देखा |कभी सोचा है क्या है इस मस्ती के पीछे का रहस्य | बनारस मृत्यु के सच को समझता है | बिना मृत्यु को समझे जीवन के महत्व को नहीं समझा जा सकता क्योंकि ब्रह्माण्ड में  सिर्फ नश्वरता ही शाश्वत है| कितनी हैरत की बात है कि लोग यहाँ मरने आते हैं| स्वर्ग और पृथ्वी के बीच का पुल है बनारस| इसी बनारस  में एक और पुल रहता है ..विश्वसुंदरी पुल... यहाँ बनारस मरने आने लगा है |क्या हो गया इस बनारस को ? सोच के मन परेशान हो जाता है |परसों पिंकी नाम की एक स्त्री ने अपनी बच्ची के साथ इस पुल से छलांग लगा दी | क्या पक रहा है भीतर भीतर ?  क्यों आत्महत्या पर उतारू हो गया है ये शहर ? मन उदास है .... उदास मन के साथ ये कविता आप सबके लिए
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 विश्व सुंदरी पुल  {कविता}

बनारस की गलियों में गुजरते हुए
घाटों की सीढियों पर घूमते हुए,
मैंने देखा
कि दुनिया भर से लोग यहाँ  मरने आते हैं|
बनारस एक पुल है
जो मर्त्य को अमर्त्य तक पहुंचाता है
मृत्युंजय का ये शहर
मृत्यु के इंतज़ार का शहर भी  है
एक जमाने में
जब डाक्टरी
समाज को भुलावा दे पाने में इतनी सक्षम नहीं थी
तब विधवाएं
यहाँ कबीर गढ़ती थीं
यहाँ आने वाला हर आदमी एक झुका हुआ सर है
और मदद में उठने वाला हर हाथ उस्तरा
ये वो शहर है
जहाँ तिरस्कृत तुलसीदास होता है
और बहिष्कृत रैदास
मौत कुछ दे न दे निश्चिन्तता तो जरूर देती हो
धतूरे सी सुबहें
भांग के नशे सी शाम
जैसे किसी अंतहीन यात्रा पर निकली हों
इसी बनारस में एक पुल रहता है
विश्व सुंदरी पुल
पुल को देखने के बाद मुझे कभी ऐसा नहीं लगा
कि यह विश्व का यह सबसे सुन्दर पुल है
विश्व के तमाम धर्मों  की तरह यह पुल भी एक धोखा है
सुना है
कल फिर एक औरत ने यहाँ से गंगा में  छलांग लगा दी
अखबार ने लिखा
वो कूदने से पहले  पुल पर थोड़ी देर टहली भी थी
मन पूछता है टहलने के वक्त क्या सोचा होगा उसने
क्या उसने लड़ने के बारे में सोचा
या जीवन संग्राम से भाग जाना अधिक आसान लगा उसे
किसी ने उसे लड़ना क्यों नही सिखाया
लड़ना क्या सचमुच असभ्य हो जाना है
क्या होता अगर
मरने से पहले वो उसे  मार कर मरती
क्या सचमुच पति ही दोषी होगा
हो सकता है
सरकार की किसी योजना का शिकार हुयी हो
ये भी हो सकता हो कि किसी प्रेमी ने
उसे अच्छे दिनों का झांसा देकर पांच साल तक किया हो यौन-शोषण
जरूर किसी ने सच बता दिया होगा  उसे
जरूर उस कमबख्त का नाम भूख होगा
भूख खाने में बहुत माहिर है
सब कह रहे हैं  बच्ची बच गयी उसकी
कोई बात नहीं
पुल का रास्ता दोनों तरफ से खुलता है
फिर  माँ सिखा के तो गयी ही है
सहने और सहते हुए टूट जाने की कला

जानते हो लोग मरने बनारस आते हैं
और एक ये पुल है
यहाँ मरने
बनारस आता है

अरमान आनंद ०५/०७/२०१४

Saturday, 17 May 2014

अरमान आनंद की कविता दंगे के फूल

किताबों ने
अर्थ का अनर्थ कर दिया था
तलवारें
गर्भ से बच्चे निकालने में व्यस्त हो गयीं थीं
चौराहे
जलते हुए टायरों के हवाले कर दिए गए
शहर
कर्फ्यू के शिकंजे में घिग्घिया रहा था
श्री राम और अल्ला हो अकबर के
नारों के बीच
नाड़ों के टूटने की आवाजें
मौत की बाहों में सिमटने से पहले तक सिसक रही थीं
आँखों के पानी के सूखते ही
घर
आग की आगोश में समा गए
इसी सुबह
रधिया की कॉपी पर जुम्मन ने लिखा था
'लभ यू'
दोपहर चौथी घंटी में
जुम्मन के बस्ते के पते पर
इक चिट्ठी आई
जिसमे कुछ हर्फों के साथ उकेरा गया था
साड़ी का किनारा
उगता हुआ सूरज
और एक कमल
शाम होने तक
कमल
राक्षस में बदल गया
और चबा गया जुम्मन का दिल
जिसमे
रधिया के नाम का तीर
रोज कहीं से उड़ता
और आकर
धंस जाता था।
©अरमान आनंद

Thursday, 8 May 2014

जंगल राज

एक जंगल था
एक जंगल का राजा था
राजा चाहता था
जंगल जंगल ही रहे

Sunday, 9 February 2014

फैशन-अरमान आनंद

कितने ओल्ड फैशन भूत हो
मेरा दिल खाना चाहते हो
आजकल तो सब दिमाग चबाना पसंद करते हैं...

Monday, 3 February 2014

नस्ली हिंसा के खिलाफ ....कविता

तुम मारे गये अपने ही वतन में
हम मारे गये अपने ही वतन में
तय किये कुछ इलाके  और हम कुत्तों में बदल गये
हम कुत्तों की तरह मारे गये अपने ही वतन में

Sunday, 17 November 2013

तुम्हारा नाश हो {कविता}

तुम्हारा नाश हो {कविता}

तुमने भारत को माँ कहते ही

डाल दिए पत्थर उसके गुप्तांगो में

दाग दी गोली नृसंश बलात्कार के बाद

गोली गर्भ और मस्तिष्क को भेदती हुई मेडल में बदल गयी

तुमने भारत को माँ कहते ही


पहाड़ों को निचोड़ लिया स्तनों की तरह

और खींच कर उसका रक्त बेच दिया बिसलेरी की बोतलों में

हे भारत के माननीय

दलालों

तुमने हमारी जड़ जोरू और जमीन का सौदा किया

तुमने बेचीं

हमारी भाषा , संस्कृति, सोच,भावनाएं और आदर्श

तुम वादा करते रहे

हमारे ही उपजाए अनाज को हमारे पेट तक पहुंचाने का

और लिखते रहे भूख का इतिहास

विकास के नाम पर हमें सौप दिया

अयोध्या और गोधरा के उजड़े गाँव का नक्शा

क़ानून के नाम पर लिखा

कश्मीर मणिपुर बस्तर और भट्ठा परसौल

तुमने जय जवान कहते ही लूट ली बेटियों की अस्मत

जय किसान कहते ही बना दिया विदर्भ को श्मशान

जय विज्ञान कह कर बिठा दिया रसायनिक हथियारों के नीचे

हे भारत के तथाकथित उद्धारकर्ताओं

तुम्हारा नाश हो

अरमान।

Thursday, 7 November 2013

कविता पोस्टर {डायन} -अरमान आनंद

मैं हंसूंगी तुम्हारे ऊपर
लगाउंगी अट्टहास
आज होगी मौत मेरे हाथों
तुम्हारी बनायी हुई औरत की
और हो जाउंगी आजाद
बेख़ौफ़
मैं आजाद स्त्री हूँ
मेरे बाल खुले हैं
सिन्दूर धुले हैं
मैं स्तनों को कपड़ों में नहीं बाँधा
पांव में पायल नहीं पहने
मेरे वस्त्र लहरा रहे है।
तुम मुझे डायन कहोगे
कहोगे मेरे पाँव उलटे है
हाँ मेरे पाँव तेरे बनाये गलियों से उलट चलते हैं
मेरे हाथ लम्बे हैं
मैं छू सकती हूँ आसमान
मैं निकलूंगी अंधियारी रात में
बेख़ौफ़
तेरे चाँद को कहीं नाले में गोंत कर
और तेरे चेहरे पर ढेर सारी कालिख पोत कर


Friday, 1 November 2013

मौत के बाद क्या है? ( कविता)

ऐ रहगुजर , इतना बता मेरी मंजिल क्या है?
जिस रास्ते से गया है वो, वो रास्ता क्या है?
ये बिखरती राहें मुझे क्यूँ खींचती हैं
हूँ भटकता जिसकी चाह में , वो आरजू क्या है?
    जिन्दगी के तार पर मौत की रागिनी है छेड़ी,
    एक तार पकड़ खड़ा हूँ
    पर वो दूसरा तार क्या है?
    जी करता है उसे छेड़ दूं मगर,
    पता नहीं इसके बाद मौत मिले या जिन्दगी,
    मौत से प्यार है
    मगर , मौत के बाद क्या है??
     -अरमान आनंद
{ नोट-यह कविता फ़रवरी 2005में घूमता चक्र नाम की मासिक पत्रिका में आई थी।पत्रिका पटना बिहार  से निकलती थी। तब मैं 12वीं में था }

राजेन्द्र यादव (व्यक्तित्व एवं विचार )

                                         
                    राजेन्द्र यादव :व्यक्तित्व एवं विचार
                                       
दुनिया में एक धर्म ऐसा भी है जिसका मानना है कि दुनिया शैतान ने बनायी है| राजेन्द्र यादव को पढ़ते- सुनते हुए कुछ कुछ ऐसा ही महसूस होता है| क्योंकि अपने विरोधियों और समाज के सामंतों के लिए वे किसी शैतान से कम नहीं थे |मगर साहित्य की एक अपनी दुनिया जो उन्होंने तैयार की, वह बेहद जीवंत और क्रान्तिकारी मूल्यों से भरपूर थी|सच है की विवादों ने राजेन्द्र जी का साथ कभी नहीं छोड़ा , परन्तु विवादों के भय से कभी अपने शर्तों से समझौता किया हो ,ऐसा भी नहीं हुआ | राजेन्द्र यादव का कार्य क्षेत्र हिंदी साहित्य को एक अमूल्य धरोहर है | साहित्य में राजेन्द्र यादव की अपनी एक दुनिया का निर्माण किया , उनका एक पूरा का पूरा  स्कूल था |जिसने शिखर के साहित्य और साहित्यकार हिन्दी  को दिए|
                  राजेन्द्र यादव का जन्म २८ अगस्त १९२९ को आगरा में हुआ था|इनके पिता मिश्री लाल यादव डॉक्टर थे| माता का नाम श्रीमती तारा देवी था|सुरीर नमक जगह से मिडिल की परीक्षा पास करने के बाद ये चाचा के पास मवाना (मेरठ )आ गये|यहीं हॉकी खेलते हुए इनके पांव में चोट लगी |हड्डी निकालनी पड़ी और आजीवन विकलांगता के दंश को झेलना पड़ा|इस दौरान इन्होने काफी साहित्यिक पुस्तकों का अध्ययन किया |झाँसी से उन्होंने १९४४ में मैट्रिक की परीक्षा उत्तीर्ण की|आगरा विश्वविद्यालय से १९४९ में बी.ए.और १९५१ में एम.ए .की डिग्री हासिल की|एम. ए.में इन्होने प्रथम श्रेणी में प्रथम स्थान प्राप्त  किया|१९५४ में कलकत्ता गए और ६४ तक व हीँ रहे|कलकत्ता में ही ज्ञानोदय में दो बार अल्पावधि के लिए नौकरी भी की|१९६४ में राजेन्द्र जी दिल्ली आ गए और अक्षर प्रकाशन की स्थापना की|उनका विवाह मन्नू भंडारी के साथ२२ नवम्बर १९५९ को  हुआ था|१५८-५९ में जवाहर चौधरी के साथ अक्षर प्रकाशन की स्थापना की और करीब २५० पुस्तकों का प्रकाशन किया|१९८६ में अक्षर प्रकाशन बंद कर दिया और ज्यादतर किताबें राधाकृष्ण प्रकाशन को दे सोवियत संघ की यात्रा पर निकल गए |१९८९-९० में आई.आई.टी.कानपुर में अतिथि लेखक के  रूप में प्रवास किया | १९४७ में इनकी पहली कहानी  प्रतिहिंसा आयी|प्रेत बोलते हैं शीर्षक से पहला उपन्यास लिखा जो बाद में सारा आकाश के नाम से प्रकाशित हुआ|इन्होने अपने जीवन काल में अनेक पुस्तकों की रचना की|
कृतित्व:-
कहानी संग्रह- देवताओं की मूर्तियाँ १९५१ ,खेल -खलौने १९५३,जहाँ लक्ष्मी कैद है १९५७,अभिमन्यु की आत्महत्या १९५९ ,छोटे -छोटे ताजमहल १९६१, किनारे से किनारे तक १९६२ ,टूटना १९६६,चौखट तोड़ते त्रिकोण १९८७,श्रेष्ठ कहानियां,प्रिय कहानियाँ, प्रतिनिधि कहानियां,प्रेम कहानियां चर्चित कहानियां ,मेरी पच्चीस कहानियां,ये जो आतिश ग़ालिब २००८ |
उपन्यास - सारा आकाश १९५९ ,उखड़े हुए लोग १९५६,कुलटा १९५८,शह और मात १९६९ ,अनदेखे अनजान पुल १९६३,एक इंच मुस्कान मन्नू भंडारी के साथ१९६३,मन्त्र-विद्ध१९६७,एक था शैलेन्द्र २००७,
कविता संग्रह - आवाज है तेरी२०६०  
समीक्षा निबंध - कहानी :स्वरुप और संवेदना १९६८,प्रेमचन्द की विरासत १९७८,अठारह उपन्यास १९८१,कांटे की बात (बारह खण्ड )१९९४,कहानी :अनुभव और अभिव्यक्ति१९९६, उपन्यास -स्वरुप और संवेदना १९९८,आदमी की निगाह में औरत २००१,वे देवता नहीं हैं २००१,मुड़-मुड़ के देखता हूँ २००२,अब वे वहां नहीं रहते २००७,
साक्षात्कार-मेरे साक्षात्कार१९९४,जवाब दो विक्रमादित्य २००७ (साक्षात्कार),काश मैं राष्ट्रद्रोही होता२००८ .यातना संघर्ष और स्वप्न २०१० 
संपादन-प्रेमचंद द्वारा स्थापित पत्रिका हंस का अगस्त १९८६ से मृत्युपर्यंत संपादन,एक दुनिया समानांतर१९६७ , कथा दशक हिंदी कहानियां(१९८१-९०) ,आत्मतर्पण१९९४,दिल्ली दूर है १९९५,काली सुर्खियाँ १९९५(अश्वेत खानी संग्रह ),कथा यात्रा १९६७ औरत:उत्तर कथा २००१,अतीत होती सदी और त्रासदी का भविष्य २०००,,देहरी भई बिदस,कथा जगत की बागी मुस्लिम औरतें ,हंस के शुरूआती चार साल २००८,वह सुबह कभी तो आएगी २००८ (साम्प्रदायिकता पर लेख )
अनुवाद :टक्कर-चेखव  ,हमारे युग का नायक-लार्मंतोव,प्रथम-प्रेम-तुर्गनेव,वसंत-प्लावन -तुर्गनेव,एक मछुआ-एक मोती -स्टाइनबैक,अजनबी-कामू,नरक ले जाने वाली लिफ्ट २००२,स्वस्थ आदमी के बीमार विचार-२०१२ 
नाटक-चेखव के तीन नाटक (सीगल,तीन बहने,चेरी का बागीचा)
राजेन्द्र यादव से सम्बंधित रचनाएँ- 
हमारे युग का खलनायक राजेन्द्र यादव -साधना अग्रवाल ,शिल्पायन प्रकाशन , दिल्ली, २००५ 
२३ लेखिकाए और राजेन्द्र यादव -संपादन -गीताश्री किताबघर प्रकाशन नईदिल्ली २००९
राजेन्द्र यादव मार्फ़त मनमोहन  ठाकौर -कमला ठाकौर राधाकृष्ण प्रकाशन १९९९ 
राजेन्द्र यादव का साहित्य में योगदान और हंस (आलेख isahitya.com ब्लॉग पर )
इनका निधन २८ अक्टूबर २०१३ को रात्रि के बारह बजे हुआ |
सात्र ने कहा था-" किसी व्यक्ति के विचारों  की समीक्षा  उसकी मृत्यु के बाद ही की जा सकती है"|साहित्य में उनके महत्वपूर्ण योगदान पर जब बात की जाए तो कमलेश्वर और मोहन राकेश के साथ नई कहानी के नायक  के रूप में राजेन्द्र यादव को याद किया जायेगा,साथ ही हिंदी साहित्य में दलित और स्त्री विमर्श के प्रथम पैरोकार के रूप में उनकी छवि दिखती है||तीसरा सबसे बड़ा और यादगार योगदान है हंस का २८ वर्षों तक सफल रूप से संपादन |प्रेमचंद ने अपने आखिरी दिनों में दो चिंताएं जाहिर कीं|पहला तो यह की उन्होंने जैनेन्द्र को कहा अब आदर्श से काम नहीं चलेगा और दूसरा शिवरानी से हंस को उनकी याद के रूप में चलते रहने की गुजारिश की|इस सम्बन्ध में प्रकाश चन्द्र गुप्त लिखते हैं ...इसके लिए उन्हें अंग्रेज सरकार को एक हजार रूपये की जमानत भी देनी पड़ी तथा हंस का स्वामित्व  भारतीय परिषद् से वापस अपने हाथों में लेना पड़ा| इन्हीं दिनों 'हंस' से एक हजार रूपये की जमानत मांगी गयी |सरकार ने सेठ गोविन्ददास के एक नाटक पर आपत्ति की थी |भारतीय परिषद् ने पत्र को बंद करने का निश्चय किया और इस आशय की सूचना भी प्रेमचंद के हस्ताक्षर से दे दी|प्रेमचंद ने गाँधी जी को इस सम्बन्ध में पत्र लिखा |गाँधी जी का निर्णय था-"यदि प्रेमचंद हंस को प्रकाशित करते रहना चाहें ,तो करें|" प्रेमचंद ने हंस को अपने हाथों में ले लिया और जमानत की रकम जमा करवा दी गई|उन्होंने शिवरानी से कहा "रानी तुम हंस की जमानत करवा दो ,चाहे मैं रहूँ या न रहूँ , 'हंस' चलेगा |यदि मैं जिन्दा रहा ,तो सब प्रबंध कर दूंगा |यदि मैं चल दिया तो यह मेरी यादगार होगी| (पृष्ठ सं.-५१ भारतीय साहित्य के निर्माता प्रेमचन्द  -प्रकाशचन्द्र गुप्त,२००८ संस्करण  ,साहित्य अकादमी ) प्रेमचंद के बाद हंस को उनके पुत्र अमृत राय ने चलाया|बाद के  दिनों में यह पत्रिका बंद हो गयी|राजेन्द्र यादव ने प्रेमचन्द के मानस पुत्र के रूप में इस पत्रिका को चलाने का बीड़ा उठाया और प्रेमचन्द की इच्छा का सम्मान करते हुए अगस्त १९८६ से हंस पत्रिका पुनः आरम्भ की, साथ ही उनके अंतिम वाक्य को अपना सूत्र वाक्य भी बनाया की सिर्फ आदर्श से काम नहीं चलेगा|हंस संपादन के दौरान उन्होंने ढूंढ -ढूंढ  कर अनछुए यथार्थ को ढूँढ निकला , लिखा और लिखवाया|मैत्रेयी पुष्पा लिखती हैं ...."जब मैंने उपन्यास लिखना शुरू किया ,तो उन्होंने एक खास सलाह मुझे दी|उन्होंने कहा ,ग्रामीण स्त्री के बारे में तुम लिखती हो ,यह मैदान खाली है |तुम्हारा यह जो अनुभव है , इसे यदि तुम अपने लेखन में इस्तेमाल करो तो तुम सबको पछाड़ सकती हो |उसके बाद मैं गांव की हो गई|मैंने गांवों को छान डाला और गांवों में समा गई|" (हिन्दुस्तान सम्पादकीय लेख न जाने कैसा दिल था दिल राजेन्द्र यादव का-मैत्रेयी पुष्पा ३० अक्तूबर २०१३ से )राजेन्द्र यादव  न केवल विषय और शैली बल्कि लेखक के व्यक्तिव निर्माण पर भी काफी ध्यान  देते थे|विमर्शों को व्यक्तित्व में रूपांतरित होते देखना उनका सपना था|इसी लेख में मैत्रेयी लिखती हैं ..."मैं दो घंटे तक बहार बैठी रही |जब उन्हें बताया ,तो वह बोले ,'बेवकूफ हो क्या ? दो घंटे तक बाहर बैठी रही अन्दर क्यों नहीं आ गयी?वह जो कुछ पूछते मैं सर नीचे करके जवाब देती|थोड़ी देर बाद उन्होंने कहा,'सर उठा कर बात करो'|सर उठा कर बात करने की उनकी वह सलाह मेरे लिए एक सबक थी|" नए लेखकों के प्रति उनके समर्पण एवं       विश्वास के बारे में स्वयं उनकी पत्नी मन्नू भंडारी लिखती हैं - "अपने लेखन के प्रति ये जितने निष्ठावान हैं दूसरों को लेखक बना देने की दिशा में में भी उतने ही उत्साही|यदि किसी में जरा सी भी प्रतिभा दिखाई दे जाए तो उसे हर प्रकार से मदद करना ,प्रेरित करना ,उसके साथ घंटों बर्बाद करना इन्हें नहीं अखरता |कलकत्ते में जब नया -नया घर बसाया था ,संयोग से नौकर भी कहानीकार ही मिला था |जिस दिन इस रहस्य का उद्घाटन हुआ था ,उसके दूसरे दिन ही इन्होने उसकी सारीकहानियाँ सुनीं,फिर दो घंटे बैठकर कहानी की टेक्नीक पर भाषण देते रहे ..."
यथार्थवादी ,प्रगतिशील एवं लोकतान्त्रिक होने के बावजूद राजेन्द्र यादव परंपरा और क्लासिक का एक बारगी तिरस्कार नहीं करते थे ,उन्हें सिर्फ सामंती परंपरा से चिढ थी| धरोहरों के प्रति उनके मन में अगाध सम्मान था | इतिहास के बरक्श आधुनिकता की इस खोजी प्रवृति के वे धनी व्यक्ति थे|इस सम्बन्ध में विचार रखते हुए  हंस के छब्बीसवें वर्ष के पहले अंक के  संपादकीय (हंस, अगस्त २०११)में राजेन्द्र जी ने लिखा था .."सही है की क्लासिकल संगीत या आधुनिक चित्रकला में मेरी गति नहीं है|मगर यह कहना ज्यादती है की मैं इन्हें सामंती कह कर तिरस्कृत करता हूँ , सूर्य मंदिर ,अजंता ,एलोरा या ताजमहल हमारी ऐसी धरोहर हैं ,जिनपर हमें गर्व है|निश्चय ही मैं वहां अकेला या मित्रों के साथ जाऊंगा और अपने को उस युग में स्थानांतरित करके एक नई उर्जा और प्रेरणा के साथ लौटूंगा |हो सकता है आज के लिए कुछ उपयोगी को भी मन में बाँध लाऊं|मगर निश्चय ही मैं अपना घर बना कर वहां रहने नहीं जाऊंगा |वे किसी भी क्लासिक ग्रन्थ की तरह मेरे पास सुरक्षित हैं और उनका वहां हों ही मुझे आश्वस्ति और बल देता है| " कहीं एक वाक्या सुना था कि एक बार एक  लेखक की कोई रचना छपी थी, तो उन्होंने अपने  गुरूजी  को गाँव में फोन करके बताया की उनकी रचना छपके आई है|गुरु जी ने तपाक से पूछा हंस में आयी है क्या? यह है हंस की लोक व्याप्ति और राजेन्द्र यादव का संपादकीय कौशल |जमाना था की लोग तब तक किसी को लेखक नहीं मानते जब तक वह हंस में न छपता|दूसरी बड़ी बात यह थी की हंस के असाहित्यिक पाठकों की भी बड़ी संख्या थी|यह एक मात्र साहित्यिक पत्रिका है, जिसे सुदूर गांवों में भी देखा जा सकता है|मुझ जैसे न जाने कितने साहित्यिक व्यक्ति होंगे जिनका साहित्य के प्रति अनुराग हंस को पढ़-पढ़ कर पैदा हुआ है|प्रख्यात आलोचक मैनेजर पाण्डेय इस बाबत बात करते हुए लिखते  हैं -राजेन्द्र यादव के हंस विवेक को प्रभावशाली बनाने में मदद करती है उनकी जानदार और असरदार भाषा |राजेन्द्र यादव के सम्पादकीयों की भाषा जनतांत्रिक है और संवादधर्मी भी|(पृष्ठ -४५, राजेन्द्र यादव का हंस-विवेक,पाखी पत्रिका ,सितम्बर २०११ ) खुद राजेन्द्र यादव भी भाषा के बारे में अपने विचार स्पष्ट करते हुए कहते हैं "व्यक्तिगत रूप से मैं नहीं मानता की विचार की संश्लिष्टता और भाषा की जटिल दुरूहता एक दुसरे के पर्याय हैं| भाषा तभी उलझती है जब या तो विचारों की अस्पष्टता हो ,या अंग्रेजी में सोचा हुआ वाक्य ज्यों का त्यों हिंदी में उतार देने की जिद हो |"(पृष्ठ८५ ,कांटे की बात -४ )भाषा और विचार के संबंधों के उदाहरण के तौर पर मैं प्रेम जैसे क्लिष्ट विषय का उदाहरण दे रहा हूँ ,जिसे पारिभाषित करने के लिए  सदियों  लिखा जा रहा है और सदियों तक लिखा जायेगा|परन्तु राजेन्द्र जी जब इसे व्यख्यायीत करते हैं, तो कहते हैं -"प्रेम वह है जो हमें सोलह-सत्रह साल की अवस्था में पड़ोस के छत वाली लड़की से हो जाता है|"... हंस के सम्बन्ध में हमेशा से एक सवाल उठता रहा है की क्या हंस वही हंस है जो प्रेमचंद का था ?मेरे विचार से तो नहीं ,क्योकि पत्रिकाओं का स्वरूप तो समाज और वैचारिकी की दिशा और दशा तय करती है|प्रेमचंद ने अपने आखिरी दिनों में जैनेन्द्र से कहा अब वैचारिकी से काम नहीं चलेगा मतलब जिस आदर्श की वकालत वो सम्पूर्ण जीवन करते रहे अंत समय में उसे ख़ारिज कर दिया |राजेन्द्र यादव का हंस उत्तरोतर समाज का हंस है ,जिसकी अपनी  वैचारिकी और दिशा है|राजेन्द्र यादव अपने हंस में भी परिवर्तन की मांग को लेकर काफी उत्सुक थे |उन्होंने लिखा .."हंस के छब्बीसवें वर्ष के पहले अंक से ही यह सवाल भी जुदा है की क्या अब पत्रिका के चले आ रहे रूप में कुछ बदलाव आएगा या वहां कुछ परिवर्तन होंगे? सच पूछा जाय तो परिवर्तन तो होते रहे हैं ...(हंस पत्रिका ,अंक ,अगस्त २०११ ) आलोचक मैंनेजर पाण्डेय कहते है.."राजेन्द्र यादव के हंस के हर अंक में उसे 'जन चेतना का प्रगतिशील कथा मासिक ' कहा जाता है|इस कथन में जो प्रगतिशील है वह राजेन्द्र यादव के हंस को प्रेमचंद के हंस से जोड़ता है|तो क्या राजेन्द्र यादव के हंस की प्रगतिशीलता वही है जो प्रेमचंद के हंस की थी|जी नहीं ,प्रेमचन्द की प्रगतिशीलता भारत में और हिंदी में आधुनिकता के आरम्भिक काल की प्रगतिशीलता थी, उसका सम्बन्ध प्रगतिशील आन्दोलन के आरंभिक दौर से भी था, जबकि राजेन्द्र यादव की प्रगतिशीलता उत्तर आधुनिक समय  की है,अस्मिता विमर्श के दौर की |मैं पहले भी लिख चुका हूँ की प्रेमचंद के हंस और राजेन्द्र यादव के हंस में वही फर्क है जो प्रेमचंद और राजेन्द्र यादव के बीच है|"(पृष्ठ -४५, राजेन्द्र यादव का हंस-विवेक,पाखी पत्रिका , सितम्बर २०११ ) 
राजेन्द्र यादव ने भारत की दो अभिशप्त जातियों को उद्धार का भी रास्ता दिखाया ,वे हैं स्त्री जाति और दलित जाति|अपने उपन्यासों और हंस के द्वारा उन्होंने एक वैचारिकी पैदा की जिससे इन दोनों जातियों में समर्थ और प्रतिबद्ध लेख और लेखक पैदा हुए |स्त्रीवादी विमर्शकार लान्का ने कहा था "WOMEN DOES NOT EXIST".ओशो इसी को व्याख्यायित करते हुए अपने शब्दों में कहते हैं-'नारी और क्रांति ',स्त्री मुक्ति के सम्बन्ध में अपने विचार व्यक्त करते हुए उन्होंने कहा था - इस सम्बन्ध में बोलने को सोचता हूँ ,तो पहले यही ख्याल आता है कि नारी कहाँ है? नारी का कोई अस्तित्व ही नहीं है |माँ का अस्तित्व है,बहन का अस्तित्व है,बेटी का अस्तित्व है,पत्नी का अस्तित्व है,नारी का कोई भी अस्तित्व नहीं है|(सम्पादकीय ,नारी और क्रांति -ओशो,हिन्द पॉकेट बुक्स) राजेन्द्र यादव इस सम्बन्ध में कहते हैं-"पुरुष की अपेक्षा स्त्री देह में ज्यादा कैद है|वह अपने देह से ऊपर उठाना या उसे भूलना भी चाहे ,तो न  प्रकृति उसे ऐसा करने देगी ,न समाज |उसका सारा सामाजिक  मूल्यांकन ,सबसे पहले उसके शरीर का मूल्यांकन है|  गुण तो बाद में आते हैं |वह एक ऐसी दृश्य वास्तु है जिसे अपनी सार्थकता पुरुष की निगाह से सुन्दर और उपयोगी लगने में ही है |" (कांटे की बात -३ पृष्ठ १५६ ) यह व्यंगोक्ति एक बड़ी वीभत्स सामजिक मानसिकता की तरफ इशारा करती है|जिससे स्त्री मुक्त करने का सपना राजेन्द्र यादव ने देखा था |एक दलित विमर्शकार के तौर पर राजेन्द्र यादव साम्प्रदायिकता और ब्राह्मणवाद दोनों के धुर विरोधी व्यक्ति थे |दलित प्रश्नों के परिप्रेक्ष्य में शीर्षक आलेख में बजरंग बिहारी तिवारी लिखते हैं -''धर्म का उन्मादी आग्रह जब राजनीतिक शब्दावली अख्तियार करता है , उग्र राष्ट्रवाद की सृष्टी होती है |इसे सांस्कृतिक राष्ट्रवाद कहते हैं |राजेन्द्र यादव इसे सवर्ण पुरुष सत्ता का दुश्चक्र मानते हैं |इसमें पिसती हैं स्त्रियाँ ,अल्पसंख्यक और दलित|दलित विमर्श सांस्कृतिक राष्ट्रवाद से जूझे बिना आगे नहीं बढ़ सकता ?लेकिन क्या दलित लेखन में ऐसी तैयारी दिखाई पड़ती है?इस प्रश्न को राजेन्द्र जी भविष्य पर छोड़ देते हैं|हिंदूवादी राष्ट्रवाद से जुड़े खतरों की पहचान करते -कराते रहना उन्हें अलबत्ता जरूरी कार्यभार लगता है|उनके सम्पादकीय भगवा ब्रिगेड को हर वक्त हित करते रहते हैं|'अपना मोर्चा' कालम इसका सबूत है ,अपने विरोधियों को जगह देना ,उनकी बातें छापना ,अधिकांश पाठकों के लेखे राजेन्द्र जी के जनवादी सोच का प्रमाण हैं|...राजेन्द्र जी सत्ता प्रतिष्ठान का विघटन चाहते हैं और फिर उसकी पुनर्रचना  |(पृष्ठ-१२० पाखी ,अंक -सितम्बर २०११) दलित लेखक कँवल भारती ने राजेन्द्र यादव को कबीर जैसे तेवर का व्यक्ति बताते हुए लिखा था -राजेन्द्र यादव के पास यह दृष्टी इसलिए है क्योंकि उनके पास साहित्य का एक एजेंडा है -समाज को  सुधारने का नहीं ,समाज को बदलने का ,जिसमें दलितों आदिवासियों और स्त्री मुक्ति के सवाल केंद्र में हैं |इस एजेंडे ने हिंदी के उन  तथाकथित महान लेखकों को कहीं का नहीं छोड़ा  था ,जो अभिजात चिंतन को ही मुख्यधारा का चिंतन समझ रहे थे |उनका सारा भ्रम ही नहीं टूट गया जमीन भी दरक गयी जब राजेन्द्र यादव ने वास्तविक मुख्यधारा का निर्माण शुरू  किया |(कबीर जैसा तेवर ,पृष्ठ ११० पाखी सितम्बर २०११ )साम्प्रदायिकता के मामले में राजेन्द्र यादव हिन्दू और मुस्लिम दोनों कट्टरपंथियों का विरोध करते थे |सीबा असलम फहमी और तसलीमा के आलेखों को हंस में स्थान देकर उन्होंने इस बात की पुष्टि की |राजेन्द्र यादव के प्रतिरोधी स्वर की बात जब भी प्रियदर्शन उठाते हैं तो कहते हैं -उनकी निगाह में वर्चस्व के तीन रूप प्रमुख हैं -तीन सत्ताएँ जो इस समाज में अन्याय और गैर बराबरी की बड़ी वजह बनी हुई हैं |राजनैतिक सत्ता ऐसी पहली सत्ता है|दूसरी सत्ता धर्म की है -जिसे ईश्वर नाम के सम्राट के सेनापति और अनुचर चलाते हैं, और तीसरी सत्ता पुरुष वर्चस्व की है जो सदियों में आधी आबादी को गुलाम बनाये रखने में कामयाब रही है |जब इन तीनों सत्ताओं को चुनौती देने की कोशिश की जाती है ,तो समाज के ताकतवर तबके इसके विरूद्ध खड़े हो जाते हैं |हंस भी ऐसी बगावतों का गुनाहगार माना जाता रहा है|धार्मिक और नैतिक सत्ताएँ हंस के हमलों से तिलमिलाती रही हैं...(राजेन्द्र यादव होने का मतलब पृष्ठ, ७८ पाखी,अंक सितम्बर २०११ )
 अब अंत में:-
                            एक आलेख में इतने उर्वर मस्तिष्क को समेटना बहुत मुश्किल है|शेष फिर कभी.. आज राजेन्द्र यादव हमलोगों के बीच नहीं हैं |उनके वैचारिक आयाम  और प्रतिबद्धता उनकी रचनाओं और हंस के पन्नों  में बिखरी पड़ी है|वे खुले जीवन और वैचारिकी में विश्वास रखने वाले व्यक्ति थे| जरुरत है आज उस वैचारिक विरासत को आगे बढ़ाने की |समाज और साहित्य के प्रति किये गए उनके प्रतिदान की अहमियत को बनाये और बचाए रखने की |मैं यह सोचता हूँ कि  आवारा मसीहा या गुनाहों का देवता भाग दो लिख दी ही जाये |राजेन्द्र राव ने तो उन पर गुनाहों का देवता नाम ने संस्मरणात्मक आलेख पाखी के सितम्बर २०११ में लिख ही मारा है|परन्तु  मेरा मानना है की कथा नायक के रूप में राजेन्द्र यादव का आना काफी दिलचस्प होगा|एक उपन्यास और एक नायक के सारे कंटेंट राजेन्द्र यादव में मिलते हैं|८४ साल तक जवानी को जीने वाले और समाजिक वर्जनाओं को तोड़ कर गिरा देने वाले उस योद्धा के लिए मशहूर कथाकार संजीव ने कहा था..राजेन्द्र यादव के न होने से फर्क पड़ता है|....
                                                              अरमान आनंद (शोध-छात्र ,हिंदी विभाग बी.एच.यू.) 

Thursday, 31 October 2013

प्रेम कविता - अरमान आनंद

मेरे जीवन का पहला गीत

जो मैने तेरे साथ गाया था

मेरे प्यार की तरह अधूरा  है

मेरा बचपन तेरे स्कूल के पुराने बस्ते में कहीं पड़ा है

और मेरे पास रह गया है

तेरा आखिरी चुम्बन उधार की तरह

दिन की रौशनी  दुनिया  अधूरी दिखाती है

रात के अंधेरे में तुम उभर आती हो जेहन में 

सुकून क़ी तलाश में

मैंने ना जाने  कितनी छातियाँ टटोल डाली

प्यार की तलाश में  कितने दिलों के गुलल्क तोड़ डाले

तेरी खुशबू पा सकूं सो कितने जूड़े खॊल डाले

कहाँ मिली तुम

नहीं मिली

क्यों नहीं लौट आते तुम मेरी पहली मुहब्बत

तेरे बिना दिल जंगल होता जा रहा है।...

अरमान आनंद

अँधेरे में

डूबता हुआ यह अँधेरा
और गहरा 
और गहरा
क्या जल्दी सबेरा लायेगा?
कहीं इस अँधेरे ने
सूरज को निगल लिया हो
कहीं सूरज अँधेरे में जाकर बस ना गया हो
निकला भी तो कहीं अँधेरे से सांठ-गाँठ कर के न निकले
सुबह के इंतज़ार में जनता अँधेरे की अभ्यस्त हो गयी तो
अँधेरा सवाल है
कई कई सवाल
कई कई आशंकाएं
अँधेरा चुप निः स्तब्ध
चोरों को भी  इंतज़ार रहता है अँधेरे का
मासूम जानवरअँधेरे में सो जाते है
उल्लू अँधेरे में ही देख पाता है
नेताओं को दिन में भीअँधेरा चाहिए
कितना अंधेर है
और इतनाअँधेरा
मैं जाग रहा हूं अँधेरे में
टटोल टटोल कर जगा रहा हूँ  आँखें
हाथ को मशाल ढूंढती है
निराशा को आशा
मृत्यु को जीवन
नीरस को रस
असत्य को सत्य
ये युद्ध का आरंभ है
पराजय को विजय ढूंढती है
अँधेरे में अँधेरे को खत्म करने के लिए  रौशनी ने ढूंढना शुरू कर दिया है।
छोडो सूरज का इंतज़ार
देखो दिया कहाँ है.... ....
अरमान

विचार

# सभ्यता के विकास की कहानी समाज में नैतिकता के ह्रास तथा हिंसा के विकास की भी कहानी है। राम ने भाई के लिए राज्य त्याग दिया वहीँ कृष्ण ने राज्य लिप्सा कोअधिकार कह कर गीता का उपदेश दिया और भाइयों के खूनसे महाभारत की गाथा लिखी। रावण सीता का अपहरण तो करता है परंतु स्पर्श नहीं करता। वहीँ अपनी बीबी को जुए में दांव पर लगाने वाले पांडव और भाभी को जंघा पर बैठने काआमन्त्रण देने वाले कौरवों की कथा विकसित समाज की कथा है। निश्चय  ही विकास और आधुनिकता का सम्बंध कहीं भी नैतिकता के िवकास से नहीं है। आधुनिकता समय मात्र के सापेक्ष होती है। समय समाज में  नैतिकता के ह्रास का साक्षी भी है। सतयुग से कलयुग का सफ़र इसका प्रमाणहै।
आधुनिकता समय मात्र के सापेक्ष होती है। अर्थात मूल्यों के  विकास और मनुष्यता को भी आधुनिकता आपने एजेंडे और आयाम में रखती तो यह समाज के लिए हितकारी सिद्ध होती। परन्तु ऐसा बिलकुल नहीं है समय मात्र के आधार पर हम पुरानाऔर नया तय कर रहे। खासकरआज के समाज में  यह प्रवृतिऔर भी अधिकहै जब इसने पुराने को विकृत मान कर त्याग दिया है। पुरानी परंपरा में जो शोध रूप में था ,व्यवस्थित था । समाज और संवेदनाओं के लिए हितकारी था उसका भी परित्याग कर दिया।
सनद रहे आधुनिकता को इतिहास के सापेक्ष होना चाहिए न कि समय के।..
#शर्तों से बंधी आजादी और गुलामी में बस शब्दों की हेराफेरी है।-अरमान

#भ्रष्टाचार मुक्त देश नेता नहीं नैतिकता बनाएगी। आप अपने चरित्र में तरक्की करें देश खुद आगे बढ़ेगा। अरमानआनंद

#सत्ता की स्थापना के लिए स्वयं का सांस्कृतिक संलयन और विपक्ष का सांस्कृतिक विघटन आवश्यक होता है।- अरमान

#गुजरात से दो लोग चले... भारत बदलने का सपना लेकर महात्मा गाँधी और मोदी.... गाँधीका सपना राम राज्य... मोदी का राम का ही राज्य हो...
# "शून्य" का जन्म भारत में हुआ। आज सम्पूर्ण भारत शून्यता रोग से ग्रस्त है। सांस्कृतिक शून्यता बौद्धिक शून्यता राजनैतिक शून्यता आर्थिक शून्यता.. काश हम शून्य से आगे भी सोच पाते...

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सर गणेश दत्त