Tuesday, 24 February 2015
सत्ता और साहित्य
Sunday, 28 September 2014
हिन्दी साहित्यिक ब्लॉग (परिचयात्मक आलेख)
Friday, 19 September 2014
एक कहानी चाय के साथ
Saturday, 30 August 2014
बेबाक कविताओं की दुनिया: जी हाँ लिख रहा हूँ.. armaan anand
Thursday, 10 July 2014
धर्म {कहानी}
अधेड़ उम्र के सुलतान मियां की आँखों में बीस साल पहले का दृश्य घूम गया। कैसे लोग एक दुसरे की जान के प्यासे हो रहे थे। साथ साथ गली में क्रिकेट खेलने वाले बच्चों ने बल्लों की जगह तलवारें थाम लीं थीं। जमीन खून से लाल हो चुकी थी।
या अली या अल्लाह के नारे गूँज रहे थे। मुस्लिम बाहुल्य क्षेत्र होने के कारण दूसरा कोई नारा गूंजना तो खैर संभव ही नहीं था। बीस साल गुजर गए। यहीं पास में दो गली छोड़ के आम वाले मकान में सुलेमान का दोस्त भी तो रहता था। बड़ा प्यारा दोस्त था वह सुलेमान का । गाढ़ी छनती थी दोनों की। वो मनहूस शाम भी याद है उडती खबर आई थी की किसी ने दरगाह में जानवर का कोई अंग काट कर फेंक दिया है। बात की तह तक जाने की जरूरत किसी ने नहीं समझी। मार काट शुरू हो गयी। कर्फ्यू भी लग गया। देखते ही गोली मारने का आदेश था।दो दिनों गुज़र गए।
उस शाम करीबन आठ बज रहे होंगे। अँधेरा आहिस्ते-आहिस्ते शहर को अपनी आगोश में ले रहा था। अचानक किसी ने दरवाजे को पीटना शुरू किया। दरवाजा खुलते सुल्तान के पैरो में कोई गिर गया। ये गोविन्द था। बुरी तरह घायल.. उसके हाथ में 6 महीने की बच्ची भी थी।
...बचा ले यार इसे। इसे बचा ले। मैं तेरे पाँव पड़ता हूँ। उन्होंने सब खत्म कर दिया। मेरी बीबी बेटे सबको मार दिया। इतना कहकर गोविन्द रोने लगा।
सुलेमान उसे उठाकर घर के अन्दर ले आया। उसे भरोसा नही हो रहा था। उसकी आवाज जैसे गायब हो गयी थी। दिमाग सुन्न पड़ गया था। गोविन्द बोलता ही जा रहा था। नही सुलेमान मुझे जाने दो इसे बचा लो बस ।वो सब पागल हो चुके हैं।
सुलेमान ने दरवाजा बंद किया और बोला आओ भाई तुम्हे जल्दी से कहीं छुपा दूं। तभी किसी ने दरवाजे को पीटा। आवाज आई दरवाजा खोलो सुलेमान भाई... भाई दरवाजा खोलो ..
गोविन्द का चेहरा स्याह पड़ गया। सुलेमान ने कहा तुम घबराओ मत मैं इनसे निबटता हूँ। दरवाजा खोलते ही सामने जहीर बशीर के साथ कई लोग दिखे। उनके हाथों में नंगी तलवारें थीं। जहीर ने चीखते हुए पूछा साला गोविन्दवा आया है क्या इधर। सुलेमान ने अपने को संयत करते हुए कहा.. नही तो.. क्या हुआ?
झूठ मत बोलो सुलेमान भाई छोड़ेंगे नही उसे। उसके बेटे और बीबी को काट डाला हमने .. उसेभी नहीं छोड़ेंगे?? कहाँ है वह काफ़िर?
सुलेमान के चेहरे पर दर्द भरी मुस्कराहट तैर गयी। मार दिया? ... अच्छा किया अरे चचा कहता था तुम्हे और शांति भाभी कितनी प्यालियाँ चाय की गटकी हैं उनके घर पे खुदा इसका हिसाब करेगा। दोजख में जलोगे... दोजख में भाग जाओ यहाँ से कोई नही है यहाँ। बशीर और जहीर के चेहरे उतर गये। सुलेमान ने दरवाजा बंद कर लिया। सुलेमान लौट कर कमरे में आया। फूल सी बच्ची सोफे पर लेटी हुई थी। गोविन्द नही था। सुलेमान ने सारा घर छान मारा। पिछला दरवाजा खुला था। गोविन्द शायद वहीँ से निकल गया । सुलेमान बच्ची को सीने से लगाए काफी देर तक रोता रहा।
Sunday, 6 July 2014
विश्वसुन्दरी पुल वाया बनारस{कविता }
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विश्व सुंदरी पुल {कविता}
बनारस की गलियों में गुजरते हुए
घाटों की सीढियों पर घूमते हुए,
मैंने देखा
कि दुनिया भर से लोग यहाँ मरने आते हैं|
बनारस एक पुल है
जो मर्त्य को अमर्त्य तक पहुंचाता है
मृत्युंजय का ये शहर
मृत्यु के इंतज़ार का शहर भी है
एक जमाने में
जब डाक्टरी
समाज को भुलावा दे पाने में इतनी सक्षम नहीं थी
तब विधवाएं
यहाँ कबीर गढ़ती थीं
यहाँ आने वाला हर आदमी एक झुका हुआ सर है
और मदद में उठने वाला हर हाथ उस्तरा
ये वो शहर है
जहाँ तिरस्कृत तुलसीदास होता है
और बहिष्कृत रैदास
मौत कुछ दे न दे निश्चिन्तता तो जरूर देती हो
धतूरे सी सुबहें
भांग के नशे सी शाम
जैसे किसी अंतहीन यात्रा पर निकली हों
इसी बनारस में एक पुल रहता है
विश्व सुंदरी पुल
पुल को देखने के बाद मुझे कभी ऐसा नहीं लगा
कि यह विश्व का यह सबसे सुन्दर पुल है
विश्व के तमाम धर्मों की तरह यह पुल भी एक धोखा है
सुना है
कल फिर एक औरत ने यहाँ से गंगा में छलांग लगा दी
अखबार ने लिखा
वो कूदने से पहले पुल पर थोड़ी देर टहली भी थी
मन पूछता है टहलने के वक्त क्या सोचा होगा उसने
क्या उसने लड़ने के बारे में सोचा
या जीवन संग्राम से भाग जाना अधिक आसान लगा उसे
किसी ने उसे लड़ना क्यों नही सिखाया
लड़ना क्या सचमुच असभ्य हो जाना है
क्या होता अगर
मरने से पहले वो उसे मार कर मरती
क्या सचमुच पति ही दोषी होगा
हो सकता है
सरकार की किसी योजना का शिकार हुयी हो
ये भी हो सकता हो कि किसी प्रेमी ने
उसे अच्छे दिनों का झांसा देकर पांच साल तक किया हो यौन-शोषण
जरूर किसी ने सच बता दिया होगा उसे
जरूर उस कमबख्त का नाम भूख होगा
भूख खाने में बहुत माहिर है
सब कह रहे हैं बच्ची बच गयी उसकी
कोई बात नहीं
पुल का रास्ता दोनों तरफ से खुलता है
फिर माँ सिखा के तो गयी ही है
सहने और सहते हुए टूट जाने की कला
जानते हो लोग मरने बनारस आते हैं
और एक ये पुल है
यहाँ मरने
बनारस आता है
अरमान आनंद ०५/०७/२०१४
Saturday, 17 May 2014
अरमान आनंद की कविता दंगे के फूल
अर्थ का अनर्थ कर दिया था
तलवारें
गर्भ से बच्चे निकालने में व्यस्त हो गयीं थीं
चौराहे
जलते हुए टायरों के हवाले कर दिए गए
शहर
कर्फ्यू के शिकंजे में घिग्घिया रहा था
श्री राम और अल्ला हो अकबर के
नारों के बीच
नाड़ों के टूटने की आवाजें
मौत की बाहों में सिमटने से पहले तक सिसक रही थीं
आँखों के पानी के सूखते ही
घर
आग की आगोश में समा गए
इसी सुबह
रधिया की कॉपी पर जुम्मन ने लिखा था
'लभ यू'
दोपहर चौथी घंटी में
जुम्मन के बस्ते के पते पर
इक चिट्ठी आई
जिसमे कुछ हर्फों के साथ उकेरा गया था
साड़ी का किनारा
उगता हुआ सूरज
और एक कमल
शाम होने तक
कमल
राक्षस में बदल गया
और चबा गया जुम्मन का दिल
जिसमे
रधिया के नाम का तीर
रोज कहीं से उड़ता
और आकर
धंस जाता था।
©अरमान आनंद
Thursday, 8 May 2014
Sunday, 9 February 2014
फैशन-अरमान आनंद
मेरा दिल खाना चाहते हो
आजकल तो सब दिमाग चबाना पसंद करते हैं...
Monday, 3 February 2014
नस्ली हिंसा के खिलाफ ....कविता
हम मारे गये अपने ही वतन में
तय किये कुछ इलाके और हम कुत्तों में बदल गये
हम कुत्तों की तरह मारे गये अपने ही वतन में
Sunday, 17 November 2013
तुम्हारा नाश हो {कविता}
तुमने भारत को माँ कहते ही
डाल दिए पत्थर उसके गुप्तांगो में
दाग दी गोली नृसंश बलात्कार के बाद
गोली गर्भ और मस्तिष्क को भेदती हुई मेडल में बदल गयी
तुमने भारत को माँ कहते ही
पहाड़ों को निचोड़ लिया स्तनों की तरह
और खींच कर उसका रक्त बेच दिया बिसलेरी की बोतलों में
हे भारत के माननीय
दलालों
तुमने हमारी जड़ जोरू और जमीन का सौदा किया
हमारी भाषा , संस्कृति, सोच,भावनाएं और आदर्श
तुम वादा करते रहे
हमारे ही उपजाए अनाज को हमारे पेट तक पहुंचाने का
और लिखते रहे भूख का इतिहास
विकास के नाम पर हमें सौप दिया
अयोध्या और गोधरा के उजड़े गाँव का नक्शा
क़ानून के नाम पर लिखा
कश्मीर मणिपुर बस्तर और भट्ठा परसौल
तुमने जय जवान कहते ही लूट ली बेटियों की अस्मत
जय किसान कहते ही बना दिया विदर्भ को श्मशान
जय विज्ञान कह कर बिठा दिया रसायनिक हथियारों के नीचे
हे भारत के तथाकथित उद्धारकर्ताओं
तुम्हारा नाश हो
अरमान।
Thursday, 7 November 2013
कविता पोस्टर {डायन} -अरमान आनंद
लगाउंगी अट्टहास
आज होगी मौत मेरे हाथों
तुम्हारी बनायी हुई औरत की
और हो जाउंगी आजाद
बेख़ौफ़
मैं आजाद स्त्री हूँ
मेरे बाल खुले हैं
सिन्दूर धुले हैं
मैं स्तनों को कपड़ों में नहीं बाँधा
पांव में पायल नहीं पहने
मेरे वस्त्र लहरा रहे है।
तुम मुझे डायन कहोगे
कहोगे मेरे पाँव उलटे है
हाँ मेरे पाँव तेरे बनाये गलियों से उलट चलते हैं
मेरे हाथ लम्बे हैं
मैं छू सकती हूँ आसमान
मैं निकलूंगी अंधियारी रात में
बेख़ौफ़
तेरे चाँद को कहीं नाले में गोंत कर
और तेरे चेहरे पर ढेर सारी कालिख पोत कर
Friday, 1 November 2013
मौत के बाद क्या है? ( कविता)
जिस रास्ते से गया है वो, वो रास्ता क्या है?
ये बिखरती राहें मुझे क्यूँ खींचती हैं
हूँ भटकता जिसकी चाह में , वो आरजू क्या है?
जिन्दगी के तार पर मौत की रागिनी है छेड़ी,
एक तार पकड़ खड़ा हूँ
पर वो दूसरा तार क्या है?
जी करता है उसे छेड़ दूं मगर,
पता नहीं इसके बाद मौत मिले या जिन्दगी,
मौत से प्यार है
मगर , मौत के बाद क्या है??
-अरमान आनंद
{ नोट-यह कविता फ़रवरी 2005में घूमता चक्र नाम की मासिक पत्रिका में आई थी।पत्रिका पटना बिहार से निकलती थी। तब मैं 12वीं में था }
राजेन्द्र यादव (व्यक्तित्व एवं विचार )
राजेन्द्र यादव :व्यक्तित्व एवं विचार
Thursday, 31 October 2013
प्रेम कविता - अरमान आनंद
जो मैने तेरे साथ गाया था
मेरे प्यार की तरह अधूरा है
मेरा बचपन तेरे स्कूल के पुराने बस्ते में कहीं पड़ा है
और मेरे पास रह गया है
तेरा आखिरी चुम्बन उधार की तरह
दिन की रौशनी दुनिया अधूरी दिखाती है
रात के अंधेरे में तुम उभर आती हो जेहन में
सुकून क़ी तलाश में
मैंने ना जाने कितनी छातियाँ टटोल डाली
प्यार की तलाश में कितने दिलों के गुलल्क तोड़ डाले
तेरी खुशबू पा सकूं सो कितने जूड़े खॊल डाले
कहाँ मिली तुम
नहीं मिली
क्यों नहीं लौट आते तुम मेरी पहली मुहब्बत
तेरे बिना दिल जंगल होता जा रहा है।...
अरमान आनंद
अँधेरे में
और गहरा
और गहरा
क्या जल्दी सबेरा लायेगा?
कहीं इस अँधेरे ने
सूरज को निगल लिया हो
कहीं सूरज अँधेरे में जाकर बस ना गया हो
निकला भी तो कहीं अँधेरे से सांठ-गाँठ कर के न निकले
सुबह के इंतज़ार में जनता अँधेरे की अभ्यस्त हो गयी तो
अँधेरा सवाल है
कई कई सवाल
कई कई आशंकाएं
अँधेरा चुप निः स्तब्ध
चोरों को भी इंतज़ार रहता है अँधेरे का
मासूम जानवरअँधेरे में सो जाते है
उल्लू अँधेरे में ही देख पाता है
नेताओं को दिन में भीअँधेरा चाहिए
कितना अंधेर है
और इतनाअँधेरा
मैं जाग रहा हूं अँधेरे में
टटोल टटोल कर जगा रहा हूँ आँखें
हाथ को मशाल ढूंढती है
निराशा को आशा
मृत्यु को जीवन
नीरस को रस
असत्य को सत्य
ये युद्ध का आरंभ है
पराजय को विजय ढूंढती है
अँधेरे में अँधेरे को खत्म करने के लिए रौशनी ने ढूंढना शुरू कर दिया है।
छोडो सूरज का इंतज़ार
देखो दिया कहाँ है.... ....
अरमान
विचार
# सभ्यता के विकास की कहानी समाज में नैतिकता के ह्रास तथा हिंसा के विकास की भी कहानी है। राम ने भाई के लिए राज्य त्याग दिया वहीँ कृष्ण ने राज्य लिप्सा कोअधिकार कह कर गीता का उपदेश दिया और भाइयों के खूनसे महाभारत की गाथा लिखी। रावण सीता का अपहरण तो करता है परंतु स्पर्श नहीं करता। वहीँ अपनी बीबी को जुए में दांव पर लगाने वाले पांडव और भाभी को जंघा पर बैठने काआमन्त्रण देने वाले कौरवों की कथा विकसित समाज की कथा है। निश्चय ही विकास और आधुनिकता का सम्बंध कहीं भी नैतिकता के िवकास से नहीं है। आधुनिकता समय मात्र के सापेक्ष होती है। समय समाज में नैतिकता के ह्रास का साक्षी भी है। सतयुग से कलयुग का सफ़र इसका प्रमाणहै।
आधुनिकता समय मात्र के सापेक्ष होती है। अर्थात मूल्यों के विकास और मनुष्यता को भी आधुनिकता आपने एजेंडे और आयाम में रखती तो यह समाज के लिए हितकारी सिद्ध होती। परन्तु ऐसा बिलकुल नहीं है समय मात्र के आधार पर हम पुरानाऔर नया तय कर रहे। खासकरआज के समाज में यह प्रवृतिऔर भी अधिकहै जब इसने पुराने को विकृत मान कर त्याग दिया है। पुरानी परंपरा में जो शोध रूप में था ,व्यवस्थित था । समाज और संवेदनाओं के लिए हितकारी था उसका भी परित्याग कर दिया।
सनद रहे आधुनिकता को इतिहास के सापेक्ष होना चाहिए न कि समय के।..
#शर्तों से बंधी आजादी और गुलामी में बस शब्दों की हेराफेरी है।-अरमान
#भ्रष्टाचार मुक्त देश नेता नहीं नैतिकता बनाएगी। आप अपने चरित्र में तरक्की करें देश खुद आगे बढ़ेगा। अरमानआनंद
#सत्ता की स्थापना के लिए स्वयं का सांस्कृतिक संलयन और विपक्ष का सांस्कृतिक विघटन आवश्यक होता है।- अरमान
#गुजरात से दो लोग चले... भारत बदलने का सपना लेकर महात्मा गाँधी और मोदी.... गाँधीका सपना राम राज्य... मोदी का राम का ही राज्य हो...
# "शून्य" का जन्म भारत में हुआ। आज सम्पूर्ण भारत शून्यता रोग से ग्रस्त है। सांस्कृतिक शून्यता बौद्धिक शून्यता राजनैतिक शून्यता आर्थिक शून्यता.. काश हम शून्य से आगे भी सोच पाते...
Saturday, 15 June 2013
चेहरे
दुनिया में
हर चेहरे के
दो चेहरे होते हैं
और
हर चेहरे से दिखने वाले
सात चेहरे
मैं मुस्कुराता हूँ
मेरी आँखें
अम्मा और बाबूजी की
तस्वीर पर टंग जाती है।
अरमान आनंद
Saturday, 1 June 2013
घर
एक छत जिसे दुनिया पिता कहती है।
एक दीवार जो माँ कहलाती है।
इस घर की खिड़की कितनी हसीन दिखती है ये दुनिया....
जब से घर से निकला हूँ....दुनिया का चेहरा स्याह पड़ता जा रहा है।
दूर से मेरा घर आज हसीन नज़र आ रहा है।...
औरत © armaan anand
उसने माँ की तरह मुझे सीने से चिपका लिया
वह एक बहन की तरह सुनती रही मेरे दर्द को
एक वेश्या की तरह उसने गम के अपने अन्दर निचोड़ लिया
मुझे मर्द बनाने वाली उस औरत के कई चेहरे हैं
और आज कई चेहरों वाली ये दुनिया मुझे अच्छी लग रही है।
अरमान
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1. माँ मुझे नहीं जाना स्कूल जंगल के रास्ते होते हैं सुनसान, युवा कवयित्री ज्योति साह माँ मुझे मत ले जा हाट-बाजार नहीं ...
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बिहार_राजनीति_और_बाहुबल -1 आजाद भारत में जब 1951-52 में पहली बार चुनाव हुए उसी समय से बिहार में वर्चस्व के बलबूते चुनाव जीतने का सिलसिल...

