खरपतवार
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मेरा कोई खेत नहीं
मैं दोस्तों के खेत में
करता था काम
जैसे माँ
फसल आने पर
मैं खेत से बाहर था
जैसे खरपतवार
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लिक्खे में दुःख लीलाधर मंडलोई पृष्ठ २१
मैने सर झुकाया, तुझे इल्म नहीं जा तू पत्थर हो जा, परवाह नहीं। अरमान
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