रक्तपात
कदली के कुञ्ज में, कोने में जहाँ दीपक की आड़ जैसी अंध-ज्योत थी
वहीँ कौमार्य नष्ट किया उसका
किसे समाचार होता
यदि कौओं का झुण्ड 'षडज षडज'
करता नहीं ऊपर; देखकर उसका
शुद्ध, गाढ़ा रक्त
उसी की कोपवती आँखों के रंगवाला
मैने सर झुकाया, तुझे इल्म नहीं जा तू पत्थर हो जा, परवाह नहीं। अरमान
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