Sunday, 3 April 2016

खेतों का अस्वीकार जितेंद्र श्रीवास्तव

खेतों का अस्वीकार
जितेंद्र श्रीवास्तव 

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आज ज्योंही मैं पहुँचा
गाँव के गोंइड़े वाले खेत में
उसने नजर उठाकर देखा पल भर
फिर पूछा
कहो बाबू, कहाँ से आए हो
कुछ-कुछ शहरी जान पड़ते हो?

लगता है
कोई जान-पहचान है इस गाँव में
इधर निकल आए हो शायद निवृत होने!

मैं अचरज में पड़ा हुआ
किंकर्तव्यविमूढ़-सा खड़ा हुआ
ताकने लगा निर्निमेष उसको
जिसकी मिट़्टी में लोट-लोट लहलोट हुआ
मैं बचपन में खेला करता था

मैं भागा तेज वहाँ से
पहुँचा नदी किनारे वाले चक में
चक ने देखा मुझको
कुछ चकमक-चकमक-सा लगा उसे
थोड़ी देर रहा चुप वह
फिर पूछा उसने
किसे ढूँढ़ रहे हो बाबू
इतनी बेसब्री से
यहाँ तो आँसू हैं
हत सपने हैं
अकथ हुई लाचारी है
लेकिन तुम कुछ अलग-अलग दिखते हो
कहाँ रहते हो?

इधर कहाँ निकल आए हो
यहाँ धूल है मिट्टी है
सड़क के नाम पर गिट्टी है
चारों ओर पसरा हुआ
योजनाओं का कीचड़ है

खैर छोड़ो, कहाँ से आए हो
क्या करते हो
आखिर इतना चुप क्यों हो
क्या कभी नहीं कुछ कहते हो?

मैं ठकुआया खड़ा रहा
बहता रहा आँखों का द्रव
मैं भूला
भूला रहा बरस-बरस बरसों-बरस जिन खेतों को

यही सोच-सोच कि मालिक हूँ उनका
उन खेतों ने सचमुच मुझको भुला दिया था

कुछ देर
मैं अवसन्न खड़ा रहा सच के सिरहाने

देवियो-सज्जनो
मालिक बनने को उत्सुक लोगो
आज उन खेतों ने
मुझे पहचानने से इनकार कर दिया है
जिनके मालिक थे मेरे दादा
उनके बाद मेरे पिता
और उनके बाद मैं हूँ
बिना किसी शक-सुब्हे के

आप सब अचरज में पड़ गए हैं सुनते-सुनते
यकीन नहीं कर पा रहे मेरी बातों का
पर सच यही है सोलह आना
कि मैं मालिक हूँ जिनका खसरा खतौनी में
उन खेतों ने
मुझे पहचानने से इनकार कर दिया है।

आत्महत्या के विरूद्ध अनुज लुगुन

आत्महत्या के विरूद्ध 
 
वे तुम्हारी आत्महत्या पर अफ़सोस नहीं करेंगे
आत्महत्या उनके लिए दार्शनिक चिंता का विषय है
वे इसकी व्याख्या में सवाल को वहीँ टांग देंगे
जिस पेड़ पर तुमने अपना फंदा डाला था
यह उनके लिए चिंता का विषय नहीं होगा
वे जानते हैं गेंहूँ की कीमत लोहे से कम है
और इस वक्त वे लोहे की खेती में व्यस्त हैं
लोहे की खेती के लिए ही उन्होंने आदिवासी गाँवों में
सैन्य छावनी के साथ डेरा डाला है
लोहे की खेती के विरूद्ध ही आदिवासी प्रतिघाती हुए हैं
उसी खेती के बिचड़े के लिए उन्हें तुम्हारी जमीन भी चाहिए
तुम आत्महत्या करोगे और उन्हें लगेगा
इस तरह तो वे गोली चलाने से बच जायेंगे
और यह उनकी रणनीतिक समझदारी होगी
वे तुम्हारी आत्महत्या पर अफ़सोस नहीं करेंगे
उन्हें सिर्फ़ प्रतिघाती हत्याओं से डर लगता है
और जब तुम प्रतिघात करोगे
तुम्हारी आत्महत्या को वे हत्याओं में बदल देंगे |
अनुज लुगुन
(
शीर्षक के लिए रघुवीर सहाय का आभार लेकिन यह ठीक उसी रूप में उद्धृत नहीं है |)


 http://www.haribhoomi.com/news/literature/anuj-lugun-poem-farmer-sucide/24012.html से साभार 

एक किसान का दर्द


एक किसान का दर्द (एक कविता जरुर पढ़े )



माना की मै एक चर्चित इंसान हू ...
एक जागता हुआ किसान हू ...

रात को जागना तो मेरी आदत है ...
किसान फसलो की करता हिफाजत है ....

किसान वो क्या जो सो जाए ....
अपनी ही पीड़ा में खो जाए ...

उसपर लाख बच्चो का भार है ...
चलता उससे बाजार है .....

किसान न जगे तो कौन जाग पायेगा ..
उसकी मेहनत कौन आक पायेगा ...

ये एक इसान ही है ..
जो मेहनत का धनवान है ...

इसकी कुंडली में मौसम बलवान है ...
ये इंसान नही "भगवान् " है

जो पालता पेट है लाखो का ...
आज वो कितना परेशान है ...

इसकी आह सुनता सिर्फ भगवान् है ..
लूट रहा इसको शैतान है ....

दिल से निकली आह जिसके
समझो वो "कृष्णा " भी आज उदास है

माना की मै एक चर्चित इंसान हू ...
एक जागता हुआ किसान हू ...


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: कृष्णा की कलम से





http://kkrishanyadav.blogspot.in/2013/03/blog-post_3.html

कविता और फसल ओमप्रकाश वाल्मीकि

ठंडे कमरों में बैठकर
पसीने पर लिखना कविता
ठीक वैसा ही है
जैसे राजधानी में उगाना फसल
कोरे कागजों पर

फसल हो या कविता
पसीने की पहचान है दोनों ही

बिना पसीने की फसल
या कविता
बेमानी है
आदमी के विरुद्ध
आदमी का षडयंत्र-
अंधे गहरे समंदर सरीखा
जिसकी तलहटी में
असंख्‍य हाथ
नाखूनों को तेज कर रहे हैं
पोंछ रहे हैं उंगलियों पर लगे
ताजा रक्त के धब्‍बे

धब्‍बे : जिनका स्‍वर नहीं पहुंचता
वातानुकूलित कमरों तक
और न ही पहुंच पाती है
कविता ही
जो सुना सके पसीने का महाकाव्‍य
जिसे हरिया लिखता है
चिलचिलाती दुपहर में
धरती के सीने पर
फसल की शक्‍ल में

किसान (कविता)

किसान (कविता)

बंजर धरती पर टिकी है ,
दो हसरत भरी निगाहें।
तो कभी आसमान की और ,
देखती उम्मीद भरी निगाहें।
की शायद कोई कतरा सा ,
बादलों से होकर ज़मीन पर गिर जाए।
बस कुछ बूंदें !
जिससे इस धरती की प्यास मिट जाये.
बादल आये भी ,
मगर नियति की हवा ने उन्हें उड़ा दिया.
और फिर तेजस्वी सूरज अंगारे बरसाने लगा।
बादल ने तो क्या बरसना था।
उसकी बेबस ,बेज़ार आँखों से टपक पड़ी ,
आंसुओं की चंद बूंदें।
निर्बल ,निस्तेज काठ से बदन से टपक पड़ी,
पसीने की बूंदें।
ना बादल बरसा ,
ना खेत लहलहाए।
बंजर धरती पर लेकिन टिकी है ,
अब भी वह दो निगाहें।
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http://webcache.googleusercontent.com/search?q=cache:http://anusetia.jagranjunction.com/2014/07/07/%25E0%25A4%2595%25E0%25A4%25BF%25E0%25A4%25B8%25E0%25A4%25BE%25E0%25A4%25A8-%25E0%25A4%2595%25E0%25A4%25B5%25E0%25A4%25BF%25E0%25A4%25A4%25E0%25A4%25BE/&gws_rd=cr&ei=msgAV4mvAYudugTezJiYCw
इस लिंक से साभार 

Friday, 1 April 2016

दीवार में चुनवा दी गयी इक खिड़की

दीवार में चुनवा दी गयी है  इक खिड़की
खिड़की
जिस पर
हंस पर बैठ
उड़ आता था राजकुमार
और बढ़ जाता था फूलकुमारी का वजन

दिवार में चुनवा दी गयी वो खिड़की
जहाँ से पद्मिनी झांकती और हंस देती थी
अलाउद्दीन गश खा कर गिर जाता था

खिड़की जिसमें चिड़िया ही नहीं  पत्थर भी लाते थे खत और फोन नम्बर 

खिड़की के बाहर चकोरों की तादाद बताती है
खिड़की में एक चाँद जवां है

दहलीज
जब पाँव में बेड़ियाँ बनती है
खिड़की रास्ता  देती है
इश्क की बाँहों तक का पता बताती है

इसी चुनवा दी गयी खिड़की ने नीचे की मिटटी में ढूंढो
इक आशिक का खत दफन हैं
इक लैला की टूटी चप्पल मिलेगी
गाँव के बीचोबीच
बरगद के नीचे जो साफा बांधे चौधरी बैठा है  न
उसकी नाक भी यहीं कहीं घास में खोई मिलेगी

खिड़की होती है दिवार में
जैसे काँटों बीच  खिल ही जाता है गुलाब
खिड़की में उठती हैं जब दीवारें
गुसलखानों की छतों से रस्सियाँ झूलने लगती हैं

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खाली खिड़कियाँ नाकाम आशिकों को बहुत मुंह चिढाती हैं
इतना भी बुरा नहीं दीवार का उठ जाना ........
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अरमान आनंद

Thursday, 31 March 2016

प्रतिरोध के स्वरों का समायोजन- अनुज लुगुन

प्रतिरोध के स्वरों का समायोजन




   डॉ अनुज लुगुन
सहायक प्रोफेसर, दक्षिण बिहार केंद्रीय विवि, गया

‘मैं समय कहता हूं‍/ और आवाज आती है सीरिया’... हिंदी के वरिष्ठ कवि राजेश जोशी द्वारा बनारस युवा कवि संगम, फरवरी 2016 में पठित यह कविता हिंदी कविता के मौजूदा विविध स्वरों में से एक प्रमुख स्वर है, जो साम्राज्यवाद के विरुद्ध प्रतिबद्धता के साथ खड़ा है. सीरिया आज की वैश्विक दुनिया का सच है, यह नव-साम्राज्यवाद का सच है. जिस तरह हिंदी का वरिष्ठ कवि आज के सच को अनदेखा नहीं कर रहा है, वैसे ही आज का युवा कवि भी अपने समय के सच से आंख नहीं चुरा रहा, बल्कि उससे मुठभेड़ करने के लिए सामने खड़ा है. 
जिस तरह सीरिया वैश्विक दुनिया का सच है, वैसे ही रोहित वेमुला का सच भारतीय समाज में गहरी पैठ बना चुके ब्राह्मणवाद का सच है. इस संगम में युवा कवि शैलेंद्र शुक्ल ने रोहित वेमुला को समर्पित कविता का पाठ किया- ‘यह सुसाइड नोट उन तमाम लोगों का भी है/ कि जिन्हें लिखना नहीं आता/ कि जिन्हें पढ़ने नहीं दिया गया/ कि जिनका मासूम गला रेता गया/ सदियों पुरानी तलवारों से/ कि जिनकी लाशें उस महावृक्ष पर टहनी-दर-टहनी लटकी हुई हैं/ इस महावृक्ष को षड्दर्शन में/ उल्टा करके पढ़ती हैं सत्ताएं/ और युगों तक दिमाग भोथरे हो जाते हैं’. युवा दलित कवि कर्मानंद आर्य ने मौजूदा सत्ता की क्रूरता को ‘जनरल डायर’ के रूपक में प्रस्तुत किया, जो अपने स्वार्थ के लिए वंचितों को अपना नरम चारा समझती है- ‘इस देश में रहते हुए/ तुम्हारी बहुत याद आती है जनरल डायर/ ओ जनरल डायर, फायर!’ विपिन चौधरी ने ‘वसंतसेना’ के माध्यम से पितृसत्ता के वर्चस्व को उभारने की कोशिश की.



कवि संगम में जिस निर्भीकता के साथ कविताओं में युवा कवि अपने यथार्थ को अभिव्यक्त कर रहे थे, उससे यह कतई नहीं कहा जा सकता है कि आज की युवा कविता अपने समय और परिवेश से उदासीन है. 



‘आज का समय और हिंदी की युवा कविता’ विषयक आलोचना के सत्र में जिस उदासीनता के साथ उपस्थित आलोचकों ने अपनी बात कही, उससे यह लग रहा था कि आज की युवा पीढ़ी को अपने समय और समाज की परवाह नहीं है. 



लेकिन कार्यक्रम में कवियों और कवयित्रियों की मुखरता ने आलोचना को उसकी परिधि का एहसास कराया. कविता अपने समय का अनुवाद नहीं करती है और न ही अपने समय से आंख चुराती है, वह तो अतीत और भविष्य के परिप्रेक्ष्य में अपने समय से संवाद करती है. यही संवाद उसका सरोकार होता है.



आज की हिंदी कविता वहीं नहीं है, जहां प्रवृत्तिगत काव्य आंदोलन होते रहे हैं. आज की युवा कविता को किसी एक खास प्रवृत्ति या खांचें में समेट पाना संभव नहीं है. आज दलित, स्त्री, आदिवासी स्वयं प्रत्यक्ष रूप से अपनी बात कह रहे हैं. उनके पास अपनी वैचारिक समझ और दार्शनिक भावभूमि है. हर दिशा से उठ रहे इस स्वर को विभाजित या बिखंडित स्वर के रूप में आसानी से चिह्नित किया जा सकता है. कुछ इस दिशा में प्रयासरत भी हैं कि उनका अलग वैचारिक द्वीप बने. लेकिन वंचितों के इस स्वर में सबसे बड़ी समानता है- प्रतिरोध का स्वर, जो वंचितों के संघर्ष को विभाजित या विखंडित होने नहीं देता है.



आज एक ओर अस्मिताओं को स्थापित करने का प्रयास है, तो दूसरी ओर उसका नकार भी है. सत्य है कि वंचित समुदायों का संघर्ष अपनी अस्मिता के आधार पर है. इस अस्मितावादी स्वर को नकारने के बजाय भारतीय समाज की सामाजिक संरचना को ईमानदारी से विश्लेषित करना चाहिए. ब्राह्मणवाद-जातिवाद, सामंतवाद और पितृसत्ता के हजारों वर्षों के दमन ने देश की बहुसंख्यक जनता की ‘अस्मिता’ का अपहरण किया है. आज जब बहुसंख्यक जनता वर्चस्वकारी शक्तियों के विरुद्ध स्वयं खड़ी हो रही है, तो उसकी ‘अस्मिता’ का उभरना स्वाभाविक है. 



ऐसा नहीं है कि दलित, स्त्री, आदिवासी या वंचितों का सवाल पहली बार हिंदी कविता में प्रस्तुत हो रहा है. मध्यकाल में निर्गुण भक्त कवियों ने वंचितों के सवाल को मुखरता के साथ उठाया है. आधुनिक समय में प्रगतिशील लेखक संघ की स्थापना के साथ ही लेखन की दुनिया में सामंतवाद और पूंजीवाद के विरुद्ध आम जनता के प्रति वैचारिक प्रतिबद्धता व्यक्त की जाने लगी. केदारनाथ अग्रवाल, नागार्जुन, मुक्तिबोध से लेकर अब तक यह प्रतिबद्धता जारी है.



इसके बावजूद दलित, स्त्री, आदिवासी और अन्य वंचित समुदायों का खुद का स्वर हिंदी कविता की परिधि से बाहर था. हालांकि, यह अनुमान जरूर था कि एक दिन खुद वंचित समुदाय खुद को अभिव्यक्त करेंगे. नागार्जुन ने बस्तर के आदिवासियों की स्थिति का वर्णन करते हुए कहा था कि ‘इन्हें न तुम ‘बेचारे’ कहना/ अजी, यही तो ज्योति कीट हैं/ जान भर रहे हैं जंगल में’. अब वंचित समुदायों के पास खुद को अभिव्यक्त करने के लिए अपना ठोस वैचारिक आधार है. आजादी के लंबे अंतराल के बाद वंचित समुदायों की खुद की अभिव्यक्ति ने आज की हिंदी कविता को नया स्वरूप दे दिया है.



हिंदी में वामपंथी लेखक संगठन समाज के वर्गीय विश्लेषण तक ही सीमित रहे हैं, वहीं अस्मितावादी लेखन ‘वर्ग’ से ज्यादा भारतीय सामाजिक संरचना की वस्तुगत सच्चाई ‘वर्ण’ (वर्णाश्रम आधारित जाति व्यवस्था) और ‘लिंग’ पर बल देता है. लेकिन अब अस्मितावादी लेखन को अपने अंदर उभरनेवाले ‘वर्गीय चरित्र’ को भी रेखांकित करना होगा. वर्गीय विश्लेषण के बिना वह अंतर्विरोध में फंस सकता है, जैसे ‘वर्ण’ और ‘लिंग’ को अस्मिता के नाम पर नकारने की वजह से वामपंथी लेखक संगठनों में अंतर्विरोध पैदा हुआ. आज के युवा लेखन में सत्ता के औपनिवेशिक चरित्र की पड़ताल और अस्मिता की चिंता दोनों बातें एक साथ अलग-अलग दिशाओं से सामने आ रही हैं. आज वह वैश्विक और स्थानीय विषयों पर खुद को अभिव्यक्त करने के लिए बेचैन है. 



बीएचयू के हिंदी विभाग के शोध छात्रों द्वारा प्रत्येक वर्ष आयोजित होनेवाले युवा कवि संगम में हिंदी की युवा कविता की प्रवृत्तियों को सहज ही रेखांकित किया जा सकता है. संभवतः यह देश का एकमात्र ऐसा आयोजन है, जिसमें इतने बड़े पैमाने पर बहुविध रचनाधर्मिता का संगम होता है. आयोजन को विभिन्न क्षेत्रों से उभर रहे सांस्कृतिक प्रतिरोध के स्वरों को समायोजित करने की दिशा में अभी और काम करना बाकी है.















Tuesday, 8 March 2016

सुबह ए बनारस

सुबह ए बनारस

लल्लापुरा की किसी मस्जिद से उठती है एक अजान

और बनारस घंटियों की शक्ल में झूम उठता है

सूरज का रंग गंगा के पानी पर

कुछ इस तरह फैलता है जैसे

किसी चित्रकार ने अभी अभी साफ़ पानी में अपनी कूचियां डुबो दी हो

गलियों में महादेव को रोज ढूंढता नंदी

टांगें झाड़ खड़ा होता है

शीतलाघाट पर पानी से बाहर आता साधू

अपनी जटाओं से झटक देता है गंगा को
गंगा खिलखिलाती चल पड़ती है सागर की तरफ

दुगुने जोश के साथ

यह सुबह ऐ बनारस है


अरमान

रपट (कविता)

इस दफे गांव लौटा हूँ

जहाँ सूनी आँखें

और भटकता हुआ सन्नाटा जहां मेरा इंतज़ार करता है

हवा रुआंसी है

इस मौसम के आंसू मैंने सुबह सुबह दूब पर बिखरे हुए देखे हैं

गांव की मेंड़ पर एक उदास देवता का मन्दिर देखा है

आँगन की नीम पर बैठी एक उदास बूढ़ी कोयल देखी है

जो लड़खड़ाती आवाज में सोहर गाती है

सावन का अल्हड़ झूला कोने में

बैठा है चुपचाप

कुछ हुआ है मेरे गाँव में

कहतें हैं एक उम्र गायब हुई है मेरे गांव से

अब बसन्त में उदास फूल खिला करते हैं

उदास बादल

कभी रोते

कभी सिसकियाँ भरते

कभी दम साध

उस उम्र क़ी तलाश में शहर की ओर उड़ जाते हैं

एक उम्र गायब हुई है मेरे गांव से

जो सुना है

दिल्ली उज्जैन अहमदाबाद कि गलियों में सूरत लटकाये उदास घूमा करती है

पंखे में नायलॉन की रस्सियाँ बाँधने से पहले

माँ और बाउ जी की तस्वीरों पर फूट फूट रोया करती है

ईक उम्र ग़ायब हुई है मेरे गाँव से

जिसकी रपट कोई थानेदार नहीं लिखता

#अरमान

अभी अभी जवान हुई लड़की (कविता )

अभी अभी जवान हुई लड़की

गुमसुम है ...

चुप्प

खोई खोई सी खुशनुमा आँखें लिए बेतरतीब बालों के पीछे चेहरा छुपाये

सर झुकाए

बहुत कुछ तोड़कर

कुछ बना रही है।

अभी अभी जवान हुई लड़की

रोज शाम को

अपने चेहरे से चाँद को उतार कर आसमान पर खूंटी से टांग देती है

और सारे राह किसी आवारा भीड़ में घुप्प से ग़ुम हो जाती है।

अभी अभी जवान हुई एक लड़की

अपने भीतर ही बसे एक पुराने शहर से होकर गुजरती है

जैसे एक हुजूम गुजरता है किसी दरगाह से उर्स के दिनों में

उतरती है किसी उदास नदी के किनारे

सीढ़ियों से

अपने ही अंदर डूब जाने के लिए

अभी अभी जवान हुई एक लड़की को

पिछली दिनों लोलार्क कुण्ड पर नहान को गयी औरतों ने

पानी के भीतर बैठकर मछलियों से बात करते हुए देखा है।

अभी अभी जवान हुई लड़की ने अपने पाँव में एक जिद को बाँध रखा है।

अभी अभी जवान हुई लड़की

चाहती है

बनारस को ठंडई की ग्लास में उतारकर किसी चौराहे पर पी जाए

हज़ारों बरस बूढ़ा बनारस चाहता है

अभी अभी जवान हुई लड़की को जी जाए

अरमान

कविता

शहर से दूर

एक पुराने किले के खण्डहर में

रहता था एक बौना राक्षस

एक दिन जमाने से आई इक चिड़िया

उसने कहा

तुम इस दुनिया के सबसे महान राक्षस हो

सुना है

एक मोमबत्ती के उसपार खड़ा वह अपनी परछाई निहारता रहता है

कविता



हथियार वालों

क्या तुम्हें पता है

कि तुम एक दिन हार जाओगे

क्योंकि दुनिया के बड़े से बड़े फैसले

शब्दों से तय होते हैं

....अरमान

Saturday, 17 October 2015

क्षणिकाएँ

रेत पर मेरी कुछ क्षणिकाएँ

1.

उस दिन रेत

इंतज़ार में थी

ढेर बनी गुमसुम

उदास

उसे सीमेंट गिट्टी ईंट का इंतज़ार रहा होगा

ताकि रेत

एक मुकम्मल घर बन सके

2.

रेत

इंतज़ार में थी

कुछ बच्चों के

ताकि

रेत बन सके एक घरौंदा

3

रेत

एक साजिश है

जो गिरे हुए पुल में उतनी ही मिली है

जितना

ठीकेदार ने बजट से निकाल कर अफसर को दिया है


4


रेत

चाहे किउल नदी की हो

दुर्गावती की

सोन की हो

उड़ेलती रहती है

अपनी ही नदी में रक्त

रेत

गवाह है

लालची और हत्यारी पूरी एक कौम की


5


रेत

चांदनी रात में

अलसायी नदी का प्रेमी है


6.


रेत

को देखो

चांदनी रात में

चांदनी रात में रेत

बिखरा हुआ ताजमहल है


7.


रेत

शिव है

नश्वरता का शाश्वत इष्ट है

बनता है

बिखर जाता है

माथे के फूल उसे ढूंढते इधर उधर भटकते हैं इसी रेत पर


8.


रेत

आखिरी पड़ाव है

इस दुनिया को अलविदा कहने के पहले का

क्षणिका

दिमाग के आनंद कानन में
जैसे किसी शानदार केले के वन में
आता है एक हाथी
आता है
आता है
आता है
सब तहस नहस कर के चला जाता है

Monday, 24 August 2015

भ्रान्ति कविता



भीड़ पगला गई थी
उसने बन्दूक को अपना नेता
और बूटों को अपना ताज घोषित कर दिया था
लोग नींद में क्रांति क्रांति बडबडा रहे थे
मांओं ने अपनी रौंदी हुई छातियों को अफवाहों के हवाले कर दिया था
अफीम की खेतों में लेटे हुए किसान
तोप से सूरज के निकलने का इन्तजार कर रहे थे
सामंतों और सेठों का दलाल नेता का वेश बनाकर
कह रहा था
अबकी सुबह होगी शाम के तुरंत बाद |

अरमान



Wednesday, 1 July 2015

कविता


तुम इतनी शिद्दत से मुझे चाहती हुई
खुदा घोषित करने ही वाली थी
कि मैं
मैंने तुम्हे धोखा दे दिया
साथ ही सच कर दिया उस दावे को
जिसे तुम झुठलाने के आख़री पायदान पर दी
सच्चा प्यार किस्से कहानियों की बातें हैं
और फिर मैं पुरुष हूँ
ये दम्भ मुझे कहाँ सिर्फ तुम्हारा होने देता है

कविता


हताशाएं होंगी

निराशाएं होंगी

सभ्यताओं ने छीनी हैं खुशियाँ

भूल गए हम लड़ने-जीने का हुनर

दुनिया का अंत तय है

लेकिन न तारीखों में

न विश्वयुद्ध में पानी के लिए

पानी की नदियों से ज्यादा आँखों में जरूरत है

एक दिन नींद की गोलियों में सो जायेगी दुनियां

आत्महत्याओं में ख़त्म हो जायेगी ये दुनियां

Friday, 19 June 2015

केदारनाथ सिंह (दिनकर जी के पुत्र )से इंटरव्यू

शाम के सात बजे थे| लगभग नियत समय पर मैं राहुल , दिनकर जी पर आ रही इस पुस्तक के सम्पादक कुमार वरुण और पटना हाईकोर्ट के वकील आलोक जी दो बाइकों पर सवार हो पटना में रामधारी सिंह दिनकर के नामधारी सड़क पर स्थित दिनकर जी के सुपुत्र श्री केदार नाथ सिंह जी के आवास उदयाचल पर पहुंचे| केदार जी कुछ ही दिनों पहले दिल्ली विज्ञान भवन में दिनकर जी पर आयोजित कार्यक्रम से लौटे थे| पत्रकारों से खफा थे जिन्होंने इनका नाम खबार में डालने के बदले लिखा दिनकर जी के परिजनों का भी सम्मान किया गया| जिस करण हमलोगों को भी टालने की कोशिश की कि आपलोग जब आवाज नहीं उठाते हो तो इंटरव्यू क्यों दूँ| खैर मैंने जब बताया कि इस चुनावी रणनीति का पर्दाफाश किया जा रहा है तब वे तैयार हुए| दिनकर जी की भांति ही रोबीला चेहरा बाल उन्होंने पीछे बांध रखे थे, जो बंधने भर ही लम्बे थे| बातचीत शुरू हुई| इंटरव्यू तो मुझे ही लेना था मगर जिज्ञासा वश साथ के लोगों ने भी प्रश्न पूछे....
*पिता दिनकर किस प्रकार याद आते हैं?
के.- पिताजी की पहली तस्वीर जो हमारे जेहन में आती है वो मेरे ख्याल से १९४२ हो या १९४५ हो | उन दिनों पिता जी सीतामढ़ी में पोस्टेड थे| सरकारी कवार्टर था| बरामदे पर कपडे वाली आराम कुर्सी थी| बरामदा छोटा सा था| उसी कुर्सी पर पिता जी सुबह बैठा करते थे और चाय पीते थे| उस समय मैं चार वर्ष का रहा होऊंगा| उसी समय छोटी बहन विभा का जन्म हुआ था| पिता जी उस सुबह भी वहीँ बैठे थे| मैंने जाकर पिता जी से कहा "हमरा बहिन भेलई हन| {मुझे बहन हुई है|} पिताजी बोले हम्म बहिन .. कि नाम रखबहीं ? {क्या नाम रखोगे?} मुझे क्या पता था |मैंने जवाब नहीं दिया| पिता जी बोले विभा नाम रख देहीं| {विभा नाम रख दो}" उसके बाद विभा से सम्बंधित कुछ पंक्तियों का पाठ किया| कोई कविता जैसी पढ़ी जिसमे कि विभा शब्द का प्रयोग था| यह चित्र एक आता है| उसके बाद उसी कम्पाउंड में थोड़ी जमीन थी | उसमें सब्जी उगने का काम करते थे| एक दृश्य यह आता है| एक दृश्य आता था कि ऑफिस से लौट कर आये थे| ऊपर का भाग नग्न था और चिनिया बदाम के पौधे पर मिटटी चढ़ा रहे थे| वे लुंगी की लुंगी नहीं पहनते थे धोती को लुंगी बना कर पहनते थे|
* स्वभाव से दिनकर जी कैसे जीव थे?
के.- स्वभाव तो सामान्य किस्म का ही था| बच्चों के प्रति अगाध स्नेह था | हमारे चचेरे भाइयों को भी साथ रखते थे| बच्चे पढ़ें इसका ख़ास ख्याल रखा जाता था| हैण्डराइटिंग अच्छी हो इसपर बहुत जोर देते थे|व्यायाम पर भी ध्यान देते थे|
    कोई भी चीज अतिवादी ढंग से उनके स्वभाव में नहीं थी | हर चीज अपने-अपने ढंग से सामान्य रूप में आती थी|
* क्या आपको राष्ट्रकवि दिनकर और पिताजी दिनकर में कोई ख़ास फर्क नजर आया?
के.- परिवार की अपनी जरूरतें होतीं हैं| लेकिन राष्ट्र के लिए जैसे नागरिक की कल्पना उनके मन में रही होगी| निश्चित रूप से वे चाहते थे उनके बच्चे अछे नागरिक बनें|
* दिनकर जी के समकालीन उनके साहित्यिक मित्र रहे होंगे | उनका आना - जाना लगा रहता होगा |इस सम्बन्ध में कोई ऐसी महत्वपूर्ण यादें जो आप साझा करना चाहते हो?
के.- एक तो कामेश्वर शर्मा कमल थे| सुल्तानपुर मोकामा के पास एक बस्ती है वहीँ रहते थे| पिता जी जब पढ़ा करते थे तो सुल्तानपुर आना-जाना होता था| मोकामा सुबह जाते तो शाम तक लौट आते |कभी रुकना हुआ तो कमल जी के यहाँ रुकते थे| उनके दूसरे मित्र थे शिव कुमार शर्मा| हमारे सिमरिया ग्राम के ही थे| रिश्ते में हमलोग उनके भाई लगते हैं|
   किसी साहित्यकार का घर अप आना जाना उस तरह से तो नहीं हुआ , लेकिन १९४८ या ४९ में शायद पटना में हिन्दी साहित्य का बड़ा आयोजन हुआ था| उसमें पन्त जी और डॉ. नगेन्द्र भी आये थे|वे दोनों हमारे घर रुके थे| इनके अलावे बेनीपुरी जी , गंगाशरण सिंह जी, धनराज शर्मा जो कांग्रेस के बड़े नेता थे उस माया के और दरभंगा इलाके में मशहूर थे उनका आना-जाना हुआ था | 
*मोकामा आना-जाना नाव से होता होगा?
के.- हाँ गंगा से लगाव तो था लेकिन दिलचस्प बात यह थी कि वे तैरना नहीं जानते थे|
* उनकी रचनाओं से जुड़ा कोई संस्मरण याद है आपको?
के.- १९४८ से ५२ तक रश्मिरथी के रौ में थे| रश्मिरथी छाया हुआ था|उससे पहले कुरुक्षेत्र ,४५ में | ४५-४६ का दौर होगा |हमलोग मीठापुर (पटना ) में रहते थे| ऊपर एक हॉल था | उसमें ये कविता सुना रहे थे| कुरुक्षेत्र |सुनाते -सुनाते उनका मुंह सूखने लगता |
    रश्मिरथी का तीसरा सर्ग उन्होंने रांची में, पांचवां सर्ग पूर्णियां में जनार्दन प्रसाद द्विज के यहाँ और सातवाँ सर्ग मुजफ्फरपुर में लिखा था| सातवाँ सर्ग लिखने के बाद जब ये कमरे से बाहर निकले तो आवेश में आँखें लाल| दो दफा पिताजी को भावप्रवणता में रोता हुआ देखा था| पहली दफा देखा था जब गाँधी जी मारे तब|
* उनकी लिखने की शैली क्या थी?
के.- वे लेटकर सीने के नीचे तकिया या मसनद लगा कर लिखते थे| वक्त कोई ख़ास तय नहीं था, लेकिन जब नौकरी करते थे तो वक्त सुबह और रात में मिल पाता था| हाँ, सुबह छह बजे रोज जग जाया करते थे|
* सुना जाता है अंतिम समय में वो बड़े परेशानियों में घिरे रहे | ख़ास कर आर्थिक| आप इस सम्बन्ध में कुछ बताना चाहेंगे?
के.- नहीं, नहीं ऐसा कुछ नहीं है| आर्थिक परेशानी तो नहीं थी, लेकिन जब रिटायर होकर घर आये तो उन्हें थोडा लगा कि अब वे किसी काम के नहीं रहे|
*राजनीति के प्रति दिनकर जी का क्या नजरिया था?
के. साहित्य क्या राजनीति के बिना चल सकता है? नहीं| वे कांग्रेस के चवन्नियां सदस्य भी थे| इसी दिलचस्पी के करण वे राज्यसभा भी गये|
*आखिर क्या वजह थी कि उन्होंने राज्यसभा की सदस्यता से इस्तीफा दे दिया था?
के. यही सोचने वाली बात है कि उनकी बेसिक थिंकिंग क्या थी| वे चाहते थे छात्रों का विकास हो देश का विकास हो| इसके लिए उन्होंने राज्यसभा को छोड़कर युनिवर्सिटी को चुना|
    लेकिन बाद में यूनिवर्सिटी की ओछी राजनीति से परेशान हो कर दिल्ली चले गए| उन्हें लगा कि अब लिखने के हिसाब से दिल्ली ज्यादा सही है|वे कहा करते थे "वहां नहीं होता तो संस्कृति के चार अध्याय नहीं लिख पाता | वहां की लाइब्रेरी बहुत रिच है इस मामले में|
*हिन्दी के आलोचकों पर यह आरोप लगता रहा है कि उन्होंने दिनकर की बहुत उपेक्षा की है| दिनकर जी ने अपने समय में कभी इसका जिक्र आपसे किया?
के.-  पिता जी ने जब हरे के हरिनाम लिखा तो सबसे ज्यादा हंगामा मचा कि पुरुषार्थ के कवि हारे को हरिनाम लिख रहा है|
                एक दिन मैं और पिता जी दोनों रिक्शे से कहीं जा रहे थे कि अचानक पिता जी बोल पड़े कि हारे को हरिनाम को लेकर कुछ निगेटिव बातें आ रहीं हैं| हलांकि मैं बोलने का अधिकारी नहीं था फिर भी मैंने कहा कि इससे बड़ा पुरुषार्थ क्या होगा कि जिसने जिन्दगी भर पुरुषार्थ का गीत गाने वाला धर्म की बातें कर रहा है| हारे को हरिनाम गा रहा है| अपनी सारी ख्याति या कहें तो जो जड़ था उससे ही इनकार कर रहा है|इस जवाब से शायद उन्होंने थोडा संतुष्ट सा महसूस किया| १९३६ के प्रलेस के प्रथम अधिवेशन में पिता जी स्वागत सदस्यों में थे| वहां किसी ने कहा कि प्रगतिशील कवियों को चाहिए कि हारे के हरिनाम को सिराहने रख कर सोयें|
*पिछले दिनों भाजपा सरकार ने विज्ञान भवन दिल्ली में दिनकर जी की दो कृतियाँ परशुराम की प्रतीक्षा और संस्कृति के चार अध्याय का स्वर्ण जयंती दिवस मनाया | क्या आप भी वहां थे| क्या आपको इस कार्यक्रम में चुनावी बू नहीं आती| आप इसे कैसे देखते हैं?
के.- मुझे इसमें कोई नुकसान नहीं दिखता| इसी बहाने साहित्य में कोई न्य विवाद या विमर्श बढ़ता है तो इसमें कोई हर्ज नहीं है|
*21 वीं सदी में आप पाठकों के बीच दिनकर को कहाँ देखते हैं साथ ही आपकी क्या अपेक्षाएं हैं? 
के.- अब जैसे पहले होता था |कोर्स में डॉ कविताएँ कवि से परिचय के लिए पर्याप्त होतीं थीं| अब ऐसा हो गया है कि सूर और तुलसी को ही जब स्थान नहीं मिल पा रहा है| पुराने कवियों को हटा रहे हैं | नए कवियों को रख रहे हैं इसमें क्या कहा जाय|
*आपने इतनी सारी बातें बताईं , संस्मरण सुनाये आपका बहुत बहुत धन्यवाद |

के. - धन्यवाद 

दंगा (1) अरमान आनन्द

मेरा कुसूर था
कि मेरे चेहरे पर दाढ़ियाँ थीं
मूंछे नहीं थी

मेरा कुसूर था कि
मेरे माथे पर लाल रोड़ी का तिलक लगा था

हमने अपनी कुसुरवारी की सजा कुछ मासूम बच्चों को दी
हमने एक दूसरे की औरतों को नंगा किया

हम अपना वीर्य
अपने अपने शक्तिशाली ईश्वर को बचाने में खर्च करते रहे।

हमने कुछ पागल बनाए हैं
जिन्होंने तुम्हारी सरकार बनाई है।

Monday, 11 May 2015

आज जाने की जिद न करो

आज जाने की जिद न करो

यूं ही पहलू में बैठे रहो

आज जाने की जिद न करो

कि तुम जो रुक जाओ

आज

आज की साँझ ढलेगी नहीं

यहीं किसी मेज के नीचे से निकल आएगी यमुना

और विस्की की ये बोतल

बदल जायेगी बांसुरी में

इस कैंडल की लाइट

भक्क से टूटेगी

और आसमान में आधे चाँद सा

उल्टा लटक जायेगी

आज जाने की जिद न करो

यूँ ही पहलू में बैठे रहो

आज जाने की....




रहने दो

कि मम्मी डैडी को समझा लेना कुछ बहानों से

कह देना

नेहा की बर्थडे पार्टी थी

और शबाना आंटी ने रोक लिया था

डैडी से कहना एग्जाम की तैयारी के लिए रुक रही हो आज की रात

किसी सहेली के घर पर

खुद से भी कह देना एक झूठ

कि तुम

नशे में थी

कि आज जाने क़ी ज़िद न करो




निकालो

अपनी जीन्स से रेशमी रुमाल

और फैला दो अपने आँचल की तरह

इससे पहले कि हमें कोई बोरियत के मायने समझाए

कुछ देर तलक हम बेतरह प्यार करें

इस से पहले कि हमारे झगडे मतभेदों में बदल जाए

हमें लगने लगे कि हम शायद एक दूसरे के लिए नहीं बने थे

और यह बार बार हो

हर एक बार हो

और जब हम पर

मैं

हाई हील वाली सैंडल पहन कर इतराने लगे

और तुम

मुझे सिर्फ इस लिए छोड़ दो

कि मैंने सलमान की जगह

मनोज वाजपेयी की फ़िल्म तुम्हे दिखा दी

इससे पहले कि तुम्हे पता चले

मैंने अपने पिता की 10 बीघे की जमीन

जिसके चार पटीदार हैं

तुम्हें 1000 एकड़ की बताई है

इस दफे गेहूँ को भी तुम्हारे मनपसंद रेन डांस के रेन ने तबाह कर दिया है।

बाबूजी का दिल इसी गम में झट्के ले रहा है

जैसे पुराने एम्बेसडर के करबोरेटर में कचड़ा फंस गया हो

तुम्हे पता है?

मैं बिहार से दिल्ली उसी तरह पढ़ने आया हूँ

जैसे

हावड़ा अमृतसर से पंजाब

और जनसाधारण में पटना से दिल्ली मजदूर आते हैं

इससे पहले कि तुम यह जान लो

आइसा मेरी मजबूरी है और तुम्हारा शौक

दोस्त के कमरे पे उधार में रहकर खाना बनाने के बदले

मिल जाती है उसकी बाइक

जिसपर मैं तुम्हे

मैं चाँद के पार ले जाने के सपने देखता हूँ।

कल तुम्हे डिस्को लेजाने के लिए

मैंने अपने स्पर्म और खून बेचे हैं।

ये जानने से पहले

कि मेरा इश्क मेरे पॉकेट में रोशनाई छोड़ चुकी कलम और

मेरी कमर के फाड़े में खोंसा हुआ कट्टा है

ये सब जानने से पहले आज

बस आज

तुम जाने की जिद न करो

आज जाने की जिद न करो




सहम जाता हूँ

जब किसी हंक और स्टड को तुम देखती हो

मेरी बाइक के पीछे बैठ बी एम् डब्ल्यू पर नजर फेंकती हो

देखो मैंने खरीदी है लिए

ये ड्रेस

इसमें तुम्हारे वक्ष आजादी की लड़ाईयां लड़ रहे हैं

मैंने इस अप्रैल कोई किताब नहीं खरीदी

मैंने बहुत कुछ किया है

जो तुम्हारी नजर में कुछ भी नहीं हो सकता है

इस लिए आज

आज जाने की जिद न करो

यूं ही पहलू में बैठे रहो

हम तो मर जायेंगे

हम किधर जायेंगे

ऐसी बातें किया न करो

आज जाने की जिद न करो...




अरमान आनंद

Sunday, 5 April 2015

बनारस वाया बजरडीहा

बजरडीहा 

नल का पानी
जहाँ उतरकर सड़क पर जमे
और शर्म से काला पड़ जाये
जहाँ मर्द आंत के रेशों को बुन कर
संसार की सबसे सुन्दर स्त्री के लिए साड़ियाँ तैयार करते हों
औरतें
हया को जरुरत मानकर
चिथड़ों में लिपटी हुई
धागों के थान लपेट रही हों
दुनियां के ट्रेडमिल पर हांफने के साथ जहाँ
रात की रोटी
अगली सुबह के लिए पानी में गर्क कर दी जाती हो
जहाँ करघों के खटर-पटर में दुधमुहें की आवाज
अनंत कालों के लिए दबा दी जाती हों
जहाँ करघा ही मां है बाप है भाई है
स्कूल है
नवाजुद्दीन की किसी फिल्म का डायलोग है
करघे का चलना सांसों का चलना है
करघे का बंद होना
किसी कुपोषित बच्चे का अनाथ होना है
अच्छे दिन जहाँ दिन में भी झाँकने नहीं आते
अच्छे दिन के लिबास वहीँ से जाते हैं
ये वही बजरडीहा है
ऐ मेरे मदमस्त बनारस
बता न
बजरडीहा में तेरा पता क्या है? 

:अरमान आनंद 

Thursday, 12 March 2015

आगरे का पागलखाना (गल्प) - अरमान आनंद

14को आगरा जा रहा हूँ। बेरोजगारी का फायदा ये कि आपको घूमने के खूब मौके मिलते हैं। बेरोजगारी और आवारगी का सम्बन्ध जीजा साली वाला है। रंगीन और संगीन।
आगरे में तीन चीज़े प्रसिद्ध हैं। पेठा, पागलखाना, और ताजमहल। ताजमहल और पेठा कैसे बना ये तो सब जानते हैं। पागलखाना कैसे बना ये बताता हूँ। एक बार एक अंग्रेज अधिकारी आगरा  पहुंचा। पेठा खा के मस्त हो गया।  फिर शाम को बग्ग्घी से ताजमहल देखने निकला। ताजमहल देखा तो दंग रह गया। उसने कारिंदों को कहा मेरा सामान गेस्ट हाउस से ले आओ। अब हम इसी महल में रहेंगे। गाइड ने कहा सरकार ये महल नहीं कब्र है। यहाँ नहीं रह सकते। गाइड ने आगे बताया राजा ने रानी को खूब प्यार किया , जिससे रानी बच्चा पैदा करते करते मर गई। फिर उसकी याद में राजा ने ताजमहल बनवाया। ताजमहल बनवाने के बाद राजा ने यहीं ताज बनाने वाले कारीगर के हाथ भी काटा था। जिससे कि वो कोई दूसरा ताज न बना सके।
अंग्रेज ने कहा इस शहर को पागलखाने की जरुरत है। जल्दी से पागलखाना बनवाया जाय।
फिर क्या था आगरा का पागलखाना तैयार हो गया और जब से पागलखाना बना दूसरा ताजमहल नहीं बना। मन हो तो भिजिट(विजिट) कर आइये।

Tuesday, 24 February 2015

सत्ता और साहित्य



सत्ता और साहित्य


सत्ता, वर्चस्व और प्रतिरोध के समेकित अन्तः क्रियाओं का नाम है| मानवीय सभ्यता की शुरुआत से ही सत्ता मनोवृति के रूप में मानव व्यवहार श्रृंखला में शामिल हो गई है| आज के समय में पूँजीवाद, बाजार और वैश्वीकरण ने मानव सभ्यता को एक गहरे संकट के मुहाने ला खड़ा किया है| विश्व की बड़ी जनसंख्या गरीबी और अवसाद से ग्रस्त है| मानवीय मूल्यों और संवेदनाओं का भयंकर ह्रास हुआ है| ऐसे में बहुत आवश्यक है कि इन समस्याओं की जड़ तक पहुंचा जाये और मनुष्य की समस्याओं का समाधान उसके व्यवहारों के अध्ययन से ही संभव है | इसके लिए साहित्य से बेहतर साधन नहीं हो सकता| साहित्य की प्रसिद्ध परिभाषा को याद करें “किसी भी देश का साहित्य वहां की जनता की चित्तवृत्ति का संचित प्रतिबिंब होता है”- आचार्य रामचंद्र शुक्ल की इस परिभाषा से यह स्पष्ट है कि साहित्य समाज की चित्त-वृत्तियों का आख्यान है, अर्थात् साहित्य समाज की सत्ता संरचना का व्याख्याता भी है| इसलिए किसी भी समाज की चित्त-वृत्ति और विकास को समझने के लिए वहां के साहित्य को समझना अति आवश्यक है| “सत्ता भी एक मनोवृति है , जो मनुष्य के व्यवहार में परिलक्षित असंख्य अलग-अलग हुए अनुभवों के करण हुई असंख्य अलग-अलग इच्छाओं के जोड़ के कारण नहीं बल्कि स्वाभाविक रूप में और लगातार मनुष्य सत्ता की इच्छा करता है|” 1 मनुष्य अपनी इसी वृति के कारण आजीवन संघर्ष और द्वन्द में जीता है| उसकी दो इच्छाएं हमेशा साथ साथ चलती हैं| पहली स्थायित्व जिसका अगला चरण प्रभुत्व में परिवर्तित होता जाता है| दूसरा किसी भी प्रकार के दबाव या प्रभुत्व का प्रतिरोध| स्वच्छंदता मनुष्य की आदिम चेतना रही है| वह किसी भी प्रकार के बंधन से मुक्त रहना चाहते है| परन्तु स्थायित्व और प्रभुत्व की इच्छा उसे दूसरों पर अपने वर्चस्व को स्थापित करने की प्रेरणा देता है| फलतः एक अनवरत चलने वाले संघर्ष की उत्त्पति होती है| वर्चस्व और प्रतिरोध के इसी द्वन्द पर मार्क्स अपना पक्ष रखते हुए कहते हैं: “आजतक का अस्तित्वमान समस्त समाज का इतिहास वर्ग संघर्षों का इतिहास है|” 2कार्ल जे. फ़्राईडरिक ने constitutional government and democracy (pp.12-14) में सत्ता को ‘किसी प्रकार के मानव सम्बन्ध के वर्णन’ से जोड़ा है| यही सत्ता और सत्ता विमर्श का मूल है| यह मानवीय संबंधों की व्याख्या करने का सफल औजार है|3 मिशेल फूको सत्ता का स्पष्टीकरण देते हुए कहते हैं “सत्ता ‘हम क्या हैं? उसका निर्धारण करती है| 4 एक ही वाक्य में फूको सत्ता के सम्पूर्ण चरित्र का उद्घाटन कर देते हैं कि सत्ता मूलतः अस्तित्वमूलक शब्द है| यही अस्तित्व स्थायित्व पाकर वर्चस्व में परिणत हो जाता है| मिशेल फूको फिर कहते हैं "सत्ता वह मूलभूत तत्व है जो संसार की प्रत्येक वस्तु में बराबर रूप से विद्यमान है |" 5


अर्थात यहाँ यह कहना होगा कि प्रत्येक व्यक्ति में सत्ता अस्तित्वमूलक प्रवृति में तो है ही साथ ही प्रत्येक मनुष्य में सत्ता वर्चस्व की आकांक्षा के रूप में भी पलती है| तात्पर्य यह कि वर्चस्व और प्रतिरोध दोनों साथ-साथ चलते और पलते हैं| Where there is power, there is resistance 6 


अंतोनियो ग्राम्शी भी इस विचार से सहमत होते हुए लिखते हैं “प्रत्येक मनुष्य चाहे वह स्त्री हो या पुरुष, वर्चस्व के प्रभाव से युक्त होता है | हालांकि हर मनुष्य का अलग- अलग उद्देश्य पूर्ण जीवन होता है , जो कि अन्य से अलग होता है | परन्तु सामाजिक स्तर पर वह सांस्कृतिक वर्चस्व का हिस्सा होने से बच नहीं सकता, और जब तक कोई मनुष्य सामाजिक संरचना में शामिल है वह समाज में अन्तर्निहित सांस्कृतिक वर्चस्व को समझने में उसके प्रतिकार में असमर्थ है|7 हिन्दी का सत्ता विमर्श अंग्रेजी के पॉवर डिस्कोर्स का पर्याय है| पॉवर को हम शक्ति के रूप में समझते हैं| परन्तु सामाजिक और राजनीति विज्ञान में इसे सत्ता कहा गया है|


साहित्य में सत्ता की भूमिका को लेकर लगातार सवाल उठते रहे हैं| समाज में साहित्य की क्या भूमिका हो? ऐसे समय में जब हर तीसरा आदमी लिख रहा है तो किसे साहित्य की श्रेणी में माना जाय| किस वैचारिकी में पिरोया गया शब्द साहित्य की संज्ञा प्राप्त करने की क्षमता रखते हैं आदि-आदि| तो उत्तर यह है कि साहित्य की सत्ता प्रतिरोध की सत्ता है जो हमेशा वर्चस्व के विरोध में रची जाती है| "कला कला के लिए" की मान्यता से हट कर कला में उपयोगितावाद या कला समाज के लिए की सैद्धांतिकी इसी तरफ ले जाती है| हालाँकि वर्चस्ववादी सत्ता कला का इस्तेमाल अपने लिए वर्चस्व के अदृश्य हथियार के रूप में करती है| रामस्वरूप चतुर्वेदी नया सहस्त्राब्द और साहित्य शीर्षक आलेख में लिखते हैं "साहित्य को यों खतरा अब उपसाहित्य से है जो या तो सत्ता से अनुशासित होता है या फिर बाज़ार से|"8 रामस्वरूप चतुर्वेदी उस साहित्य को उपसाहित्य का दर्जा देते हैं जो मूल साहित्य के साथ-साथ साहित्य की मूल चेतना और सरोकारों पर घाट करता हुआ चलता है| बाजारवादी संस्कृति की ऐसी मुश्किल घड़ी में में साहित्य को दो कार्य करने होंगे | पहला यह की साहित्य को अपनी प्रतिबद्धता बनाये रखने के लिए जोर शोर से काम करना होगा दूसरा नकली साहित्य का पर्दाफाश करना होगा | कला का मूल धर्म प्रतिरोध है| कला का रवैया हमेशा जड़ता के विरुद्ध रहा है| बी. क्रिलोव इस सम्बन्ध में लिखते हैं: मार्क्सवाद के संस्थापकों ने इस बात पर जोर दिया कि कला वर्गों के बीच विचारधारात्मक संघर्ष में महत्वपूर्ण अस्त्र है| वह शोषकों की शक्ति पुख्ता बना सकती है,तो उसकी जड़ भी खोद सकती है, वह यदि वर्ग उत्पीडन की रक्षा का काम दे सकती है,तो इसके उलट मेहनतकश जनसाधारण की शिक्षा और उनकी चेतना के विकास में योग दे सकती है तथा उन्हें अपने उत्पीड्कों पर विजय के समीप पहुंचा सकती है|9 जब तक आम जनता की पीड़ा और करुणा के साथ साहित्य स्वर में स्वर नहीं मिलाता हम उसे कैसे साहित्य की परिभाषा पर खरा उतरा हुआ मानेंगे| मोनालिजा प्रतिरोध के सम्बन्ध में कहती हैं “प्रतिरोध उत्तर साम्राज्यवादी दौर की अवधारणा है, उत्तर साम्राज्यवादी सत्ता को दर्शाती है| 10 वहीँ प्रतिरोध के सम्बन्ध में मदन सोनी अपने आलेख प्रतिरोध और सहित्य में लिखते हैं: "प्रतिरोध की अवधारणा, एक गहरे अर्थ में ,मनुष्य के साथ जन्मी और मनुष्य की अवधारणा से अभिनाभव जुड़ी प्रतीत होती है|मनुष्य जैसे अपनी परिभाषा में ही एक प्रतिरोधक प्राणी प्रतीत होता है| अगर उसके द्वारा गढ़ी गई सभ्यता और संस्कृति का इस ख़ास दृष्टि से मूल्यांकन करें, तो उसकी इस रचनात्मकता के पूरे इतिहास को प्रतिरोध के इतिहास के रूप में देखा जा सकता है|"11जार्ज लूकाच वर्चस्व और प्रतिरोध के इस संघर्ष में साहित्य की भूमिका को मार्क्सवादी नजरिये से देखते हुए लिखते हैं: “इस तरह साहित्य के अस्तित्व, महत्त्व,उत्थान, और प्रभाव की व्याख्या समूची व्यवस्था के समग्र ऐतिहासिक सन्दर्भ में ही की जा सकती है|साहित्य का उद्भव और विकास समग्र ऐतिहासिक सामाजिक प्रक्रिया का अंग है| साहित्यिक रचनाओं का सौन्दर्यगत सारतत्व और मूल्य और इसलिए उनका प्रभाव उस सामान्य और समन्वित सामाजिक प्रक्रिया का अंग है ,जिसमें मनुष्य चेतना के जरिए दुनिया को अपने काबू में करता है|”12 साहित्य और सत्ता के सम्बन्ध की व्याख्या करते हुए कात्यायनी लिखती हैं: “कविता जो स्वयं मानवीय जरुरत रही है, मानवीय जरूरतों की तड़प पैदा करती हुई, वह प्रकृति से वर्चस्व-विरोधी होती है, और एक औजार भी होती है, राज्य के रहस्य को भेदने समझने का, जैसे कि जीवन के तमाम भेदों को जानने-समझने का|”13 कविता जो मनुष्य के पक्ष में खड़ी है| वह अंतिम शोषित और प्रवंचित के साथ है| वह सत्ता के विरुद्ध है|वह बाज़ार को पहचानती है|वह किसी भी तरह के उपनिवेश का प्रतिरोध करती है| वह अपना स्वाभिमान रचती और मानव के स्वाभिमान के लिए लड़ती है| प्रथमतः और अंततः वह मनुष्य विरोधी ताकतों को निस्तोनाबूद करने का महास्वप्न देखती है|इसलिए पूरी सदी में फैली उसकी भूमिका को आज और आनेवाले कल के लिए देखना प्रासंगिक है| 14 


सत्ता विमर्श ही साहित्य और समाज के सारे विमर्शों का मूल है | समाज की मूल समस्या वर्ग समस्या है| वर्चस्व और प्रतिरोध कहें या शोषक और शोषित मामला वही है| आप स्त्री विमर्श कहें ,दलित विमर्श कहें या आदिवासी विमर्श साहित्य में आप किसी न किसी वर्चस्ववादी प्रवृति के खिलाफ खड़े होते हैं |


















































































1. पृष्ठ 668 समकालीन राजनीतिक सिद्धांत –जे. सी. जौहरी स्टर्लिंग पब्लिशर्स प्रा. लि. नई दिल्ली 2007


2. पृष्ठ ३० मार्क्स एंगेल्स कम्युनिस्ट पार्टी का घोषणा पत्र पीपुल्स पब्लिशिंग हाउस 2013


3. पृष्ठ 663 समकालीन राजनीतिक सिद्धांत –जे. सी. जौहरी स्टर्लिंग पब्लिशर्स प्रा. लि. नई दिल्ली 2007


4. {http://www.powercube.net/other-forms-of-power/foucault-power-is-everywhere/} 


5. page 93 history of sexuality volume 1 Michel Foucault, Pantheon Books1978 New York ISBN 0-394-41775-5


6. Page 93 History of Sexuality Volume 1 Michel Foucault, Pantheon Books1978 New York ISBN 0-394-41775-5


7. Page 233-38 Antoniyo Gramsci Prision Note Books 1992 Buttigieg , Joseph A, Ed, Newyork City Columbia Univertsty 


8. पृष्ठ 288 हिन्दी साहित्य संवेदना और विकास लोकभारती प्रकाशन 2004


9. पृष्ठ 28-29 भूमिका - बी. क्रिलोव मार्क्स–एंगेल्स साहित्य और कला, राहुल फाउन्डेशन, लखनऊ 2006


10. page 4 monalizza editor Christopher kullenberg resistance studies magazine 


11. http//pratilipi.in/2008/04/pratirodh-aur-sahitya-madansoni


12. पृष्ठ 445 सौंदर्यशास्त्र के बारे में मार्क्स और एंगेल्स के विचार- जार्ज लूकाच, भूमिका - बी. क्रिलोव मार्क्स–एंगेल्स साहित्य और कला, राहुल फाउन्डेशन, लखनऊ २००६


13. पृष्ठ 5 कवि ने कहा [चुनी हुई कविताएँ] :कात्यायनी, 


14. कविता के सौ बरस, सम्पादकीय ,संपादक लीलाधर मंडलोई, शिल्पायन,दिल्ली 2008 


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