साहित्यिक -सांस्कृतिक ई पत्रिका
ख्वाबों के उन महंगे हो चुके
पहले बुनने के
सोचना पड़ता है
जोड़ना पड़ता है
हजार दफ़े
मापनी होती है
मोटाई पॉकेट की। ****************---अरमान
मैने सर झुकाया, तुझे इल्म नहीं जा तू पत्थर हो जा, परवाह नहीं। अरमान
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