Friday, 22 March 2013

अरमान आनंद की कविता नए दौर की क्रांति

आज दोपहर अपने गांव में
घर की देहरी पर
यूँ ही खाली खाली सा उंकडू  बैठा था मैं
अचानक याद आया
इस दफे दिल्ली में मैंने
कई प्रगतिशील अप्सराएँ देखी थीं
जो अपने ब्रांडेड जूतियों से रौंद देना चाहती थीं
नए दौर के साम्राज्यवादियों को।
लेक्मे से रँगे नाखूनों से
नोंच देना चाहती थीं भ्रष्टाचार की जड़ें
ब्लैक बेरी मैसेंजर और फेसबुक से
कर रही थीं
क्रांति का आह्वान
अब मैं
सरक कर खटिये पर आ लेता हूँ
सोचना जारी है
और खटिये की चरमराहट के बीच
औंधा सा लेट
सर को खुजाता हुआ सोच रहा हूँ
ससुरा मार्क्स ने
ई क्रांति के बारे में किस पेज में लिक्खा था।
&&&&&&&&*अरमान*&&&&&&&&&&

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