Saturday, 1 August 2020

मार्क्स की इंसान की अवधारणा' - एरिक फ्रॉम (हिन्दी अनुवाद -प्रणव एन)

एरिक फ्रॉम (1900-1980) बीसवीं सदी के उन कुछ बड़े बुद्धिजीवियों में गिने जाते रहे हैं जिन्होंने अपनी गहरी छाप छोड़ी है। जर्मन यहूदी मूल के एरिक फ्रॉम नाजी काल में जर्मनी छोड़ अमेरिका में बस गए। मूलतः मनोवैज्ञानिक और मनोविश्लेषक रहे एरिक फ्रॉम
एरिक फ्रॉम
की 1961 में आई पुस्तक ‘मार्क्सेज कॉन्सेप्ट ऑफ मैन’ मार्क्स के मूल विचारों और जीवन, समाज, व्यक्ति तथा प्रकृति के प्रति उनके नजरिए को समझने का नया आधार तो प्रदान करती ही है इस सवाल से भी टकराती है कि मार्क्स कैसे और क्यों गलत समझे गए, न केवल अपने विरोधियों द्वारा बल्कि समर्थकों द्वारा भी।

[मार्क्स और उनकी विचारणा को समझने के लिए यह पुस्तक अनिवार्य है।]
सुपरिचित अनुवादक प्रणव एन द्वारा अनूदित एरिक फ्रॉम की पुस्तक के अंश यहाँ क्रमशः प्रकाशित होते रहेंगे।

सुपरिचित अनुवादक एवं पत्रकार प्रणव एन. का अनुवाद! 
प्रणव.एन का यह अनुवाद बेहतर संप्रेषणीय और मूल पाठ तक पहुँचने का रास्ता देता है।लम्बे समय से आप वैचारिकी से जुड़े हुए हैं और तमाम पेशेवर कामों के बीच भी दुनिया समाज पर सजग नज़र रखते हुए लेखन में सक्रिय हैं।महान विचारक एरिक फ्रॉम की यह पुस्तक अपने आप मे महत्वपूर्ण है।इस किताब का अनुवाद कर आपने मार्क्सवादी सिद्धांत को समझने का एक तार्किक रास्ता दिया है।
'मार्क्स की इंसान की अवधारणा'
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मार्क्स की इंसान की अवधारणा
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अध्याय 1: मार्क्स की अवधारणाओं में घालमेल
एरिक फ्रॉम (1961)
इसे इतिहास की विडंबना ही कहेंगे कि स्रोतों तक पहुंच के असीमित साधनों वाले इस दौर में भी सिद्धांतों के साथ तोड़-मरोड़ और गलतफहमियों का कोई अंत नहीं है। इस प्रवृत्ति का सबसे ज्वलंत उदाहरण है पिछले कुछ दशकों में कार्ल मार्क्स के सिद्धांतों के साथ हुई तोड़-मरोड़। प्रेस में, नेताओं के भाषणों में, किताबों में और प्रतिष्ठित दार्शनिकों-समाजशास्त्रियों के लेखों में लगातार मार्क्स तथा मार्क्सवाद का जिक्र होता रहा है, इसके बावजूद ऐसा लगता है कि कुछ अपवादों को छोड़कर नेताओं और मीडियाकर्मियों ने कभी मार्क्स की लिखी एक लाइन पर भी नजर नहीं डाली है और समाजशास्त्री भी मार्क्स की न्यूनतम जानकारी से ही संतुष्ट हैं। साफ है कि वे इस क्षेत्र के विशेषज्ञ की एक्टिंग करने में कोई खतरा महसूस नहीं करते क्योंकि सोशल रिसर्च के उनके साम्राज्य में हैसियत और ताकत रखने वाला कोई भी शख्स उनके अज्ञानतापूर्ण वक्तव्यों को चुनौती नहीं देता।
मार्क्स के विचारों को लेकर जो तमाम गलतफहमियां फैली हैं, उनमें सबसे ज्यादा प्रचलित और व्यापक है मार्क्स के ‘भौतिकवाद’ से जुड़ी गलतफहमी।  इन मान्यताओं के मुताबिक मार्क्स ऐसा मानते थे कि मनुष्य को गतिशील रखने वाला सबसे बड़ा मनोवैज्ञानिक कारक होता है पैसा और भौतिक सुख-सुविधाएं हासिल करने की उसकी इच्छा। अधिकतम संभव लाभ की यही इच्छा उसकी निजी जिंदगी में भी सबसे बड़ा प्रेरक तत्व होती है और मनुष्य जाति के जीवन में भी। इस मान्यता के साथ ही यह धारणा भी उतना ही व्यापक रूप ले चुकी है कि मार्क्स ने व्यक्ति के महत्व की उपेक्षा की है, कि मार्क्स की दृष्टि में मनुष्य की आध्यात्मिक जरूरतों की कोई अहमियत नहीं थी, न ही उन्हें इनकी कोई समझ थी और यह कि उनका आदर्श था अच्छा खाने और अच्छा पहनने वाला ‘आत्मारहित’ मनुष्य। मार्क्स द्वारा की गई धर्म की आलोचना को तमाम आध्यात्मिक मूल्यों के नकार के रूप में लिया जाता है और उन लोगों के लिए यह बात और भी स्पष्ट होती है जो मानते हैं कि आध्यात्मिक रुझान के लिए ईश्वर में आस्था अनिवार्य है।
मार्क्स के बारे में बना यह नजरिया यहीं नहीं रुकता। यह उनके समाजवादी समाज की व्याख्या लाखों लोगों के ऐसे समूह के रूप में करता है जो सर्वशक्तिशाली राज्य नौकरशाही के आगे पूरी तरह समर्पित हो चुके होते हैं, ऐसा समाज जिसने समानता भले हासिल कर ली है पर जिसे अपनी आजादी खो देनी पड़ी है; भौतिक तौर पर संतुष्ट ये तमाम ‘व्यक्ति’ अपनी वैयक्तिकता खोकर ऐसे लाखों रोबॉट या चलती-फिरती मशीनों के रूप में सफलतापूर्वक तब्दील हो चुके होते हैं जिनकी कमान मुट्ठी भर अभिजन (इलीट) नेताओं के हाथों में होती है।
शुरू में इतना कहना ही काफी होगा कि मार्क्स के ‘भौतिकवाद’ की यह लोकप्रिय तस्वीर – उनका आध्यात्मिकता विरोधी रुख, समरूपता और अधीनस्थता को लेकर उनका आग्रह – सिरे से गलत है। मार्क्स का मकसद था मनुष्य को आध्यात्मिक मुक्ति दिलाना, आर्थिक स्थितियों की बेड़ी से उसे आजाद कराना,  उसे फिर से संपूर्ण इंसान का रूप देना और उसे दूसरे इंसानों से तथा प्रकृति से तादात्म्य स्थापित करने में सक्षम बनाना। मार्क्स का दर्शन, धर्मनिरपेक्ष और नास्तिक भाषा में पैगंबर मसीहाई (प्रोफेटिक मेसियनिजम) परंपरा में एक नया और आमूल परिवर्तन लाने वाला कदम था; इसका लक्ष्य था वैयक्तिकता को पूर्ण रूप से अमल में लाना, वही लक्ष्य जो पुनर्जागरण और सुधारों के काल से 19वीं सदी तक पश्चिमी सोच का मार्गदर्शन करता रहा।
यह तस्वीर निस्संदेह बहुत से पाठकों को चौंका सकती है क्योंकि यह उन बातों से एकदम उलट है जो वे मार्क्स के विचारों के बारे में अब तक सुनते-पढ़ते आए हैं। लेकिन इन बातों के विस्तार में जाने से पहले मैं उस विरोधाभास को रेखांकित करना चाहता हूं जो इस तथ्य में निहित है कि मार्क्स के लक्ष्य और समाजवाद की उनकी अवधारणा की निंदा के तौर पर जो विवरण दिए गए हैं वे दरअसल मौजूदा पश्चिमी पूंजीवादी समाज पर फिट बैठते हैं। इस समाज के ज्यादातर लोग ज्यादा भौतिक फायदा पाने की इच्छा से प्रेरित हैं और उनकी इस इच्छा पर कोई अंकुश अगर होता है तो बस सुरक्षा की चिंता का, जोखिम टालने की भावना का। एक ऐसी जिंदगी में ही संतुष्ट रहने की उनकी भावना लगातार मजबूत होती जाती है जो उत्पादन और उपभोग दोनों ही क्षेत्रों में राज्य, बड़े निगम और दोनों की अपनी नौकरशाहियों द्वारा नियमित तथा नियंत्रित की जाती है। वे अनुकूलता के उस स्तर तक पहुंच चुके हैं जिसने उनकी वैयक्तिकता को उल्लेखनीय स्तर तक मिटा दिया है। मार्क्स के शब्दों में कहा जाए तो वे काम शक्ति से संपन्न, मशीनों की सेवा में लगे नपुंसक ‘वस्तु मानव’ हैं। बीसवी शताब्दी के मध्य के पूंजीवाद की ही तस्वीर को ले लें तो वह विरोधियों द्वारा बनाए गए मार्क्स के समाजवाद के कैरिकेचर से शायद ही अलग दिखे। 
इससे भी ज्यादा चौंकाने वाली बात यह है कि जो ‘भौतिकवाद’ का आरोप लगाते हुए मार्क्स की तीखी आलोचना करते हैं, वही लोग समाजवाद को इस आधार पर अव्यावहारिक बताते हैं कि समाजवाद इस बात को स्वीकार नहीं करता कि मनुष्य को कार्य करने के लिए प्रेरित करने वाला एकमात्र कारगर तत्व भौतिक लाभ पाने की उसकी इच्छा है। अपने लिए सुविधाजनक हो तो अधिक से अधिक स्पष्ट अंतर्विरोधों को भी तर्कों की आड़ में नजरअंदाज करने की मनुष्य की असीमित क्षमता का इससे अच्छा उदाहरण शायद ही कोई और मिले। जिन बातों को इसका सबूत बताया जाता था कि मार्क्स के विचार हमारी धार्मिक और आध्यात्मिक परंपराओं के कितने विपरीत हैं और जिन बातों का मार्क्स के विचारों के बरक्स हमारी मौजूदा व्यवस्था के बचाव में इस्तेमाल किया जाता था, उन्हीं बातों के जरिए वही लोग यह भी साबित करते रहे कि पूंजीवाद मानव प्रकृति के समरूप है और इसीलिए ‘अव्यावहारिक’ समाजवाद से बहुत-बहुत अच्छा है।
मैं यह बताने की कोशिश करूंगा 
-कि मार्क्स की यह व्याख्या पूरी तरह गलत है;
-कि मार्क्स के सिद्धांत ऐसा नहीं मानते कि मनुष्य को प्रेरित करने वाला मुख्य कारक भौतिक लाभ है; 
-कि मार्क्स का उद्देश्य ही मनुष्य को आर्थिक जरूरतों के दबाव से मुक्त करना था ताकि वह पूरी तरह इंसान बन सके; 
-कि मार्क्स की मुख्य चिंता यह थी कि मनुष्य की एक व्यक्ति के रूप में मुक्ति कैसे संभव हो, कैसे उसका अलगाव दूर किया जाए और वह दूसरे मनुष्यों से तथा प्रकृति से पूरी तरह तादात्म्य स्थापित करने की अपनी क्षमता वापस हासिल कर सके; 
-कि मार्क्स का दर्शन धर्मनिरपेक्ष भाषा में एक आध्यात्मिक अस्तित्ववाद रचता है और इस आध्यात्मिक खूबी के चलते यह भौतिकवादी व्यवहारों तथा हमारे युग के भौतिकवादी दर्शन के विपरीत है;
-कि मार्क्स की इंसान की अवधारणा पर आधारित उनका लक्ष्य, समाजवाद दरअसल उन्नीसवीं सदी की भाषा में मूलतः प्रोफेटिक मेसियनिजम ही है।
फिर आखिर यह कैसे हो सकता है कि मार्क्स के दर्शन को इस कदर गलत समझा गया और उसे तोड़-मरोड़ कर एकदम विपरीत रूप दे दिया गया? इसके कई कारण हैं। पहला और सबसे स्पष्ट कारण है अज्ञानता। ऐसा लगता है कि ये ऐसे विषय रहे जो विश्वविद्यालयों में नहीं पढ़ाए गए, किसी परीक्षा में इससे जुड़े सवाल नहीं किए गए और इसलिए हर व्यक्ति इन पर अपने ढंग से सोचने, बोलने और लिखने के लिए ‘आजाद’ रहा, इसे ढंग से समझने की चिंता किए बगैर भी। कोई ऐसी सम्मान्य अथॉरिटी नहीं रही जो तथ्यों और सच्चाइयों का सम्मान किए जाने पर जोर देती। इसलिए हर कोई खुद को मार्क्स पर बोलने का अधिकारी समझने लगा, उन्हें पढ़े बगैर या कम से कम इतना पढ़े बगैर कि उनकी जटिल, गूढ़ और सूक्ष्म विचार पद्धति का कुछ अंदाजा हो सके। इससे भी फर्क नहीं पड़ा कि इंसान की, उसके अलगाव की, उसकी मुक्ति आदि की मार्क्स की अवधारणा बताने वाली उनकी प्रमुख दार्शनिक कृति ‘इकॉनमिक एंड फिलॉसफिकल मैन्युस्क्रिप्ट्स’ अभी हाल तक अंग्रेजी में अनुवादित नहीं हुई थी और इसलिए उनके कई विचार अंग्रेजीभाषी जगत के लिए अनजान थे।
हालांकि यह तथ्य किसी भी सूरत में मार्क्स को लेकर फैली अज्ञानता की व्याख्या करने के लिए काफी नहीं है क्योंकि मार्क्स की इस किताब का अंग्रेजी में काफी देर से अनुवादित होना अपने आप में इस अज्ञानता का कारण ही नहीं उसका परिणाम भी था। दूसरी बात यह कि मार्क्स के मूल दार्शनिक विचार उनकी अंग्रेजी में पहले प्रकाशित किताबों में भी इतने साफ हैं कि इस तरह की गलतफहमियों से बचना मुश्किल नहीं था।
इसका एक और कारण इस तथ्य में निहित है कि रूसी कम्यूनिस्टों ने मार्क्स के सिद्धांतों पर अपना कब्जा जमा लिया और पूरी दुनिया को यह यकीन दिलाने की कोशिश की कि उनके सिद्धांत और व्यवहार मार्क्स के ही विचारों के अनुरूप हैं, जबकि बात उल्टी थी। पश्चिम ने उनके प्रचारात्मक दावों को स्वीकार कर लिया और यह मान बैठा कि मार्क्स के सिद्धांत ठीक वही हैं जो रूसियों के सिद्धांत और व्यवहार बताते हैं। हालांकि रूसी कम्यूनिस्ट अकेले नहीं हैं जो मार्क्स के विचारों को तोड़ने-मरोड़ने के दोषी हों। वैयक्तिक गरिमा और मानववादी मूल्यों की ऐसी-तैसी करने के मामले में जरूर उन्हें विशिष्टता हासिल रही है, लेकिन जहां तक अर्थशास्त्रीय भौतिकवाद के प्रतिपादक के तौर पर मार्क्स के विचारों को तोड़ने-मरोड़ने का सवाल है तो उसमें साम्यवाद विरोधियों और सुधारवादी समाजवादियों की भी भागीदारी रही है। इसके कारणों को समझना मुश्किल नहीं है। जहां मार्क्स के सिद्धांत पूंजीवाद की समीक्षा हैं वहीं उनके बहुत से समर्थक पूंजीवादी भावनाओं में इस कदर डूबे हुए थे कि उन्होंने मार्क्स के विचारों की व्याख्या समकालीन पूंजीवाद में प्रचलित अर्थशास्त्रीय और भौतिकवादी मानकों के अनुरूप कर दी। बेशक, सोवियत कम्यूनिस्टों के साथ ही सुधारवादी समाजवादी भी खुद को पूंजीवाद का दुश्मन मानते थे, लेकिन असलियत यह थी कि उन्होंने साम्यवाद और समाजवाद को पूंजीवादी चेतना के साथ ग्रहण किया था। उनके लिए समाजवाद कोई ऐसा नया समाज नहीं था जो पूंजीवाद से मानवीय तौर पर एकदम अलग हो। उनके अनुसार यह पूंजीवादी समाज का ही एक अलग रूप था जिसमें मजदूर वर्ग को ऊंची हैसियत मिली हुई होती है। इसे ही एंगल्स ने एक बार व्यंग्यात्मक स्वर में कहा था, ‘मौजूदा समाज, इसकी कमियों के बगैर।’
अब तक हमने मार्क्स के विचारों में तोड़-मरोड़ के तार्किक और वास्तविक कारणों पर बात की है। लेकिन, इसमें कोई संदेह नहीं कि ऐसे अतार्किक कारण भी रहे हैं जिन्होंने इस तोड़-मरोड़ में मदद की है। सोवियत संघ को तमाम बुराइयों का मूर्त रूप समझा जाता था; ऐसे में स्वाभाविक ही था उसके विचारों को शैतानी प्रभाव से ग्रस्त माना जाने लगता। 1917 के बाद कुछ ही दिनों के अंदर कम्यूनिस्ट शैतान का रूप माने जाने लगे और उनके सिद्धांतों पर निष्पक्षता से विचार होना मुश्किल हो गया। इस नफरत का कारण आम तौर पर उस आतंक को बताया जाता है जो स्टालिनवादियों ने लंबे समय तक बनाए रखा। लेकिन इस व्याख्या की प्रामाणिकता पर संदेह के पुख्ता आधार मौजूद हैं। आतंक और अमानवीयता का ऐसा ही दौर जब फ्रांसीसियों ने अल्जीयर्स में, ट्रुजिलो ने सैंटो डोमिंगो में और फ्रैंको ने स्पेन में कायम किया तो उनके खिलाफ ऐसी नैतिकतापूर्ण नाराजगी नहीं जताई गई, बल्कि कोई नाराजगी नहीं जताई गई। इतना ही नहीं, स्टालिन की बेलगाम आतंककारी व्यवस्था जब ख्रुश्चेव की प्रतिक्रियावादी पुलिस राज्य में बदली तब भी उसकी ओर खास ध्यान नहीं दिया गया। 
इन सबसे हम यह सोचने को मजबूर होते हैं कि क्या रूस के प्रति जताई जा रही यह नैतिकतापूर्ण नाराजगी सचमुच मानवतावादी और नैतिक भावनाओं पर आधारित है या इसका कारण सिर्फ इस एक तथ्य में निहित है कि वहां की व्यवस्था में निजी संपत्ति नहीं थी।
यह कहना मुश्किल है कि मार्क्स के दर्शन में तोड़-मरोड़ और घालमेल के लिए ऊपर बताए गए कारकों में से सबसे ज्यादा जिम्मेदार कौन सा था। संभवतः हर व्यक्ति और राजनीतिक समूह के संदर्भ में इनकी भूमिका का महत्व बदल जाता है। ऐसी संभावना नहीं है कि इनमें से कोई एकमात्र कारक इसके लिए जिम्मेदार हो।

मार्क्स का ऐतिहासिक भौतिकवाद -

मार्क्स के दर्शन की सही समझ विकसित करने के रास्ते में पहली बड़ी बाधा है भौतिकवाद या ऐतिहासिक भौतिकवाद की उनकी अवधारणा को लेकर बनी गलतफहमी। जो इस दर्शन का मतलब यह बताते हैं कि मनुष्य की भौतिक कामना यानी अधिक से अधिक वस्तुएं और सुविधाएं हासिल करते जाने की उसकी इच्छा ही उसका मुख्य प्रेरक तत्व होती है, वे यह मूल बात भूल जाते हैं कि मार्क्स और अन्य तमाम दार्शनिकों ने जिन अर्थों में ‘आदर्शवाद’ या ‘भौतिकवाद’ जैसे शब्दों का इस्तेमाल किया है, उनका उच्च आध्यात्मिक स्तर की ओर ले जाने वाली मनोवैज्ञानिक प्रेरणाओं या निचले स्तर की भौतिक प्रेरणाओं से कोई लेना-देना नहीं है। दार्शनिक शब्दावली में भौतिकवाद का मतलब उस दार्शनिक दृष्टिकोण से होता है जिसके मुताबिक पदार्थों की गतिशीलता ही ब्रह्मांड का मूल तत्व  है। इस लिहाज से यूनान के सुकरात से पहले के दार्शनिक जरूर भौतिकवादी थे, हालांकि ऊपर बताए गए अर्थों में वे कतई भौतिकवादी नहीं थे। इसके विपरीत ‘आदर्शवाद’ का मतलब उस दार्शनिक विचार पद्धति से है जिसमें ज्ञानेंद्रियों के संज्ञान में आने वाली निरंतर बदलती यह दुनिया यथार्थ नहीं है, यथार्थ है आत्मा या चेतना। प्लेटो का सिस्टम पहला ऐसा दार्शनिक सिस्टम है जिसे आदर्शवाद का नाम दिया गया। 
बहरहाल, सचाई यह है कि कई तरह की भौतिकवादी और आदर्शवादी दार्शनिक धाराएं प्रचलित रही हैं और मार्क्स के भौतिकवाद को समझने के लिए जरूरी है कि इन दार्शनिक धाराओं की उस सामान्य परिभाषा से थोड़ा आगे बढ़ा जाए जो ऊपर दी गई है। वास्तव में मार्क्स ने उस दार्शनिक भौतिकवाद के खिलाफ कड़ा स्टैंड लिया जिसका रुझान उनके समय के बहुत से प्रगतिशील चिंतकों (खासकर निसर्गवादियों) में मौजूद था। इस भौतिकवाद का दावा था कि तमाम मानसिक और आध्यात्मिक प्रवृत्तियों का आधार पदार्थों और भौतिक प्रक्रियाओं में ही मिलता है। अपने सबसे फूहड़ और सतही रूप में यह भौतिकवाद बताता है कि भावनाओं और विचारों को ठीक ही शारीरिक रासायनिक प्रक्रियाओं का परिणाम कहा गया है और यह कि ‘मस्तिष्क के लिए विचार वैसा ही है जैसा किडनी के लिए पेशाब।’
मार्क्स ने इतिहास और उसकी प्रक्रियाओं का निषेध करने वाले प्रकृति विज्ञान के इस अमूर्त भौतिकवाद, यांत्रिक और बुर्जुआजी भौतिकवाद के खिलाफ संघर्ष किया। इसके स्थान पर उन्होंने इकोनॉमिक एंड फिलॉसफिकल मैन्युस्क्रिप्ट में प्रकृतिवाद या मानववाद का प्रतिपादन किया जो आदर्शवाद और भौतिकवाद दोनों से अलग है। हालांकि दोनों के एकीकृत सत्य इसमें समाहित हैं। वास्तव में मार्क्स ने कभी ‘ऐतिहासिक भौतिकवाद’ या ‘द्वंद्वात्मक भौतिकवाद’ शब्दों का प्रयोग ही नहीं किया। उन्होंने हीगल की पद्धति से अलग अपनी ‘द्वंद्वात्मक पद्धति’ और इसके भौतिकवादी आधार की चर्चा जरूर की है जिससे उनका मतलब मनुष्य के अस्तित्व के बुनियादी हालात से है। 
‘भौतिकवाद’ का यह पहलू (यानी मार्क्स की ‘भौतिकवादी पद्धति’) जो मार्क्स के विचारों को हीगल के विचारों से अलग करता है, मनुष्य के वास्तविक आर्थिक और सामाजिक जीवन का और उसके वास्तविक जीवन व्यवहारों के उसके विचारों तथा भावनाओं पर पड़ने वाले प्रभावों का अध्ययन करता है। मार्क्स ने लिखा है, ‘स्वर्ग से जमीन पर उतरने वाले जर्मन दर्शन के ठीक उलट इसमें हम जमीन से स्वर्ग की ओर उठते जाते हैं। कहने का मतलब यह कि हाड़-मांस के मनुष्य तक पहुंचने के लिए हमारा प्रस्थान बिंदु यह नहीं होता कि लोग क्या कल्पना करते हैं, क्या सोचते हैं, न ही यह कि उनके बारे में क्या कहा, सोचा जाता है, क्या कल्पना की जाती है या कैसी अवधारणा बनाई जाती है। हमारा प्रस्थान बिंदु होता है वास्तविक, सक्रिय मनुष्य। उनकी वास्तविक जीवन प्रक्रियाओं के आधार पर हम इस जीवन प्रक्रिया के विचारधारात्मक प्रतिरूपों और प्रतिध्वनियों के विकास को दर्शाते हैं।’ या फिर जैसा कि उन्होंने थोड़े अलग शब्दों में कहा है, ‘हीगल का इतिहास का दर्शन और कुछ नहीं बल्कि चेतना और पदार्थ, ईश्वर और संसार के बीच के अंतर्विरोध को लेकर ईसाई-जर्मन धारणा की दार्शनिक अभिव्यक्ति है... हीगल का इतिहास का दर्शन एक ऐसी अमूर्त या संपूर्ण चेतना की कल्पना कर लेता है जो इस तरह से विकसित होती है कि मानव समाज जाने-अनजाने उसका वहन करने वाली एक भीड़ मात्र बन कर रह जाता है। हीगल मान लेता है कि एक पूर्व कल्पित इतिहास होता है जो वास्तविक इतिहास से ज्यादा महत्वपूर्ण होता है। इस तरह मनुष्यता का इतिहास मनुष्यता की उस अमूर्त चेतना के इतिहास में परिणत हो जाता है जो वास्तविक मनुष्य पर हावी हो जाती है।‘
मार्क्स ने खुद अपनी ऐतिहासिक पद्धति को बड़े संक्षेप में वर्णित किया है, ‘मनुष्य किस तरह से अपनी आजीविका के साधन पैदा करते हैं यह सबसे ज्यादा उन वास्तविक साधनों की प्रकृति पर निर्भर करता है जो उन्हें अस्तित्व में मिलते हैं और जिनका उन्हें पुनरुत्पादन करना होता है। इस उत्पादन पद्धति को सीधे-सीधे व्यक्तियों के भौतिक अस्तित्व के पुनरुत्पादन के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए। वास्तव में यह इन व्यक्तियों की गतिविधियों का एक सुनिश्चित स्वरूप है, उनकी जिंदगी को व्यक्त करने का एक निश्चित स्वरूप, उनके हिस्से के जीवन की एक निश्चित पद्धति। व्यक्ति चूंकि अपने जीवन को व्यक्त करते हैं, इसलिए वे होते हैं। इसलिए जो वे होते हैं वह काफी कुछ उनके उत्पादन से जुड़ा होता है, दोनों लिहाज से, यानी एक तो इससे कि वे क्या उत्पादित कर रहे हैं और दूसरे इससे भी कि यह उत्पादन वे कैसे कर रहे हैं। इस तरह, व्यक्तियों की प्रकृति उनका उत्पादन तय करने वाली भौतिक परिस्थितियों पर निर्भर करती है।‘
मार्क्स ने ऐतिहासिक भौतिकवाद और समकालीन भौतिकवाद के बीच का अंतर फायरबाख पर अपनी थीसिस में बड़े स्पष्ट शब्दों में बताया हैः
‘आज तक के सारे भौतिकवादों (फायरबाख के भौतिकवाद सहित) की मुख्य गड़बड़ी यह है कि वस्तु, यथार्थ, जो भी हम अपनी इन्द्रियों के जरिए समझते हैं, वे विचार या वस्तु के ही रूप में समझी जाती हैं, इन्द्रियों के प्रति संवेदनशील मानवीय गतिविधियों के रूप में नहीं। इसलिए भौतिकवाद के विरोध में आदर्शवाद ने सक्रिय पक्ष को अमूर्त रूप से पाला-पोसा जिसे पता ही नहीं कि वास्तव में इन्द्रियों के प्रति संवेदनशील गतिविधि होती क्या है। फायरबाख चाहता है इन्द्रियों के प्रति संवेदनशील गतिविधियों को विचार के विषयों से एकदम अलग, विशिष्ट रूप में लिया जाए, लेकिन वह मानवीय गतिविधियों को ही वस्तुनिष्ठ गतिविधि के रूप में नहीं देखता।‘  हीगल की तरह मार्क्स वस्तु को उसकी गति में देखता है, उसके बनने में, न कि एक ठोस वस्तु के रूप में, जिसकी व्याख्या इसके भौतिक कारण को उद्घाटित करते हुए की जा सकती है। हीगल के विपरीत, मार्क्स इंसान और इतिहास का अध्ययन वास्तविक मनुष्य और उसकी उन सामाजिक, आर्थिक स्थितियों से शुरू करता है जिनमें वह रह रहा होता है, न कि उसके विचारों से। मार्क्स बुर्जुआजी भौतिकवाद से उतना ही दूर था जितना हीगल के आदर्शवाद से था – इसलिए उसने ठीक ही कहा कि उसका दर्शन न तो आदर्शवाद है और न भौतिकवाद बल्कि संश्लेषण (सिंथेसिस) हैः मानववाद और निसर्गवाद।
अब तक यह स्पष्ट हो गया होगा कि ऐतिहासिक भौतिकवाद की प्रकृति के बारे में प्रचलित मान्यता क्यों त्रुटिपूर्ण है। प्रचलित मान्यता यह मान लेती है कि मार्क्स के मतानुसार मनुष्य के अंदर सबसे मजबूत मनोवैज्ञानिक कारक पैसा पाने या भौतिक सुख-सुविधाएं हासिल करने की इच्छा ही होता है। ऐतिहासिक भौतिकवाद की यह व्याख्या आगे कहती है कि अगर यह मनुष्य के अंदर की सबसे बड़ी शक्ति है तो इतिहास को समझने का मुख्य जरिया लोगों की भौतिक इच्छा ही हो सकती है। यानी इतिहास की व्याख्या की कुंजी है मनुष्य का पेट और भौतिक सुख-सुविधाओं के प्रति उसका लोभ। इस व्याख्या की मूलभूत गड़बड़ी है यह मान्यता कि ऐतिहासिक भौतिकवाद ऐसा मनोवैज्ञानिक सिद्धांत है जो मनुष्य की प्रवृत्तियों और आवेगों से वास्ता रखता है। लेकिन वास्तव में, ऐतिहासिक भौतिकवाद मनोवैज्ञानिक सिद्धांत कतई नहीं है। इसका दावा है कि मनुष्य की उत्पादन पद्धति से उसका चिंतन और उसकी इच्छाएं निर्धारित होती हैं, यह नहीं कि उसकी मुख्य इच्छाएं अधिकतम भौतिक लाभ से प्रेरित होती हैं। इस संदर्भ में अर्थव्यवस्था का तात्पर्य एक मनोवैज्ञानिक प्रवृत्ति नहीं बल्कि उत्पादन पद्धति होता है; मनोगत, मनोवैज्ञानिक नहीं बल्कि एक वस्तुगत आर्थिक-समाजशास्त्रीय कारक। इस सिद्धांत में एकमात्र आधार-वाक्य जिसे कुछ हद तक मनोवैज्ञानिक कहा जा सकता है, इस मान्यता में निहित है कि मनुष्य को भोजन, आवास आदि की जरूरत होती है; इसलिए उसे उत्पादन करना होता है; इसलिए उत्पादन पद्धति सर्वोपरि होती है जो कि बहुत सारे वस्तुगत कारकों पर निर्भर करती है और फिर जैसी वह होती है उसके मुताबिक मनुष्य की अन्य क्षेत्रों की गतिविधियों को निर्धारित करती है। वे वस्तुगत स्थितियां जो उत्पादन पद्धति तय करतीं और सामाजिक संगठनों को आकार देती हैं, वही मनुष्य, उसके विचार और हित भी निर्धारित करती हैं। दरअसल, यह विचार कि ‘संस्थाएं मनुष्य का निर्माण करती हैं’ (मॉन्टेस्क्यू) काफी पुराना है। मार्क्स ने इसमें जो नई बात जोड़ी वह है इस बात का विस्तृत विश्लेषण कि कैसे संस्थाओं की जड़ें उत्पादन पद्धति में जमी होती हैं और कैसे उत्पादक शक्तियां इनमें अंतर्निहित होती हैं। कुछ निश्चित आर्थिक स्थितियां जैसे पूंजीवाद की स्थितियां संपत्ति और पैसों की इच्छा को मुख्य प्रेरक शक्ति के रूप में पेश करती हैं; अन्य आर्थिक स्थितियां एकदम विपरीत इच्छाओं जैसे सादगी, संयम और संपत्ति के प्रति विराग को मुख्य प्रेरक शक्ति के रूप में पेश कर सकती हैं। जैसा कि हम पूर्व की संस्कृतियों में और पूंजीवाद की आरंभिक अवस्थाओं में देखते हैं। मार्क्स के मुताबिक पैसों और संपत्ति के प्रति जुनून ठीक वैसे ही आर्थिक स्थितियों की उपज है जैसे कि इसके विपरीत इच्छाएं।
मार्क्स की इतिहास की ‘भौतिकवादी’ या ‘आर्थिक’ व्याख्या का मनुष्य के अंदर कथित तौर पर सबसे प्रमुख प्रवृत्ति के रूप में मौजूद ‘भौतिकवादी’ या ‘आर्थिक’ उद्यम से कोई लेना-देना नहीं है। इसका यह जरूर कहना है कि इतिहास का विषय और इसके कानूनों की समझ का केंद्र मनुष्य, वास्तविक और समग्र मनुष्य होता है, ‘वास्तविक जीवित व्यक्ति’ - न कि इन व्यक्तियों द्वारा प्रस्तुत विचार।
अगर ‘भौतिकवाद’ और ‘आर्थिक’ जैसे शब्दों की अस्पष्टता से बचना हो तो मार्क्स की इतिहास की व्याख्या को इतिहास की मानववैज्ञानिक व्य़ाख्या कहा जा सकता है। यह इतिहास की ऐसी समझ है जो इस तथ्य पर आधारित है कि इंसान ‘अपने इतिहास के लेखक और उसके सक्रिय कार्यकर्ता’ होते हैं।
दरअसल, मार्क्स और 18 वीं तथा 19वीं सदी के अन्य लेखकों के बीच एक बड़ा अंतर ही यह है कि वह पूंजीवाद को मानवीय प्रकृति का परिणाम नहीं मानते और न ही पूंजीवाद के तहत मनुष्य की प्रेरक शक्ति को मनुष्य की सार्वकालिक प्रेरक शक्ति मानते हैं। मार्क्स मनुष्य की सबसे प्रबल प्रेरक शक्ति अधिकतम लाभ को मानते थे, इस मान्यता का बेतुकापन तब और भी स्पष्ट हो जाता है जब हम यह देखते हैं कि मार्क्स ने मनुष्य की प्रेरणाओं के बारे में कई सीधे वक्तव्य दिए हैं। उन्होंने ‘निश्चित’ और ‘सापेक्षिक’ प्रवृत्तियों में फर्क किया है। उनके मुताबिक निश्चित प्रेरणाएं वे होती हैं जो हर परिस्थिति में मौजूद रहती हैं और विभिन्न सामाजिक परिस्थितियों में उनमें जो थोड़े-बहुत बदलाव आते भी हैं वे उनके स्वरूप और दिशा तक सीमित रहते हैं। सापेक्षिक प्रवृत्ति वे होती हैं जो खास तरह के सामाजिक संगठन की ही उपज होती हैं। मार्क्स सेक्स और भूख को निश्चित प्रवृत्ति की श्रेणी में रखते हैं लेकिन उन्हें कभी यह बात नहीं सूझी कि अधिकतम आर्थिक लाभ को भी उसी श्रेणी में रख दें।
मगर, मार्क्स के भौतिकवाद के संबंध में प्रचलित मान्यता को गलत साबित करने के लिए उनके मनोवैज्ञानिक विचारों से ऐसे सबूत ढूंढने की कोई जरूरत नहीं है। पूंजीवाद की उनकी पूरी आलोचना ही यही है कि इसने पैसों और भौतिक लाभों की इच्छा को मनुष्य की मुख्य प्रवृत्ति बना दिया है और समाजवाद की उनकी अवधारणा ही एक ऐसे समाज की है जिसमें यह भौतिक इच्छा मनुष्य की प्रमुख प्रेरक शक्ति नहीं रह जाएगी। यह बात आगे और स्प्ष्ट होगी जब हम मनुष्य की मुक्ति और आजादी संबंधी मार्क्स की अवधारणाओं पर विस्तार से चर्चा करेंगे।
जैसा कि मैंने पहले भी कहा है, मार्क्स आरंभ ही करते हैं मनुष्य से जो खुद अपना इतिहास बनाता हैः “सभी मानवीय इतिहासों का मूल आधार बेशक जीवित व्यक्तियों का अस्तित्व है। इसलिए पहला तथ्य जो स्थापित किए जाने की जरूरत है वह है इन व्यक्तियों का भौतिक संगठन और बाकी पूरी प्रकृति से रिश्ता। बेशक यहां हम न तो मनुष्य की वास्तविक भौतिक प्रकृति का विवेचन कर सकते हैं न ही उन प्राकृतिक स्थितियों – भू तत्वीय, जलतत्वीय, जलवायु संबंधी आदि - का विश्लेषण कर सकते हैं जिनमें मनुष्य खुद को पाता है। इतिहास लेखन की यात्रा हमेशा इन प्राकृतिक आधारों और इतिहास के क्रम में मनुष्य के कार्यों से इनमें होने वाले परिवर्तनों को दर्ज करते हुए बढ़नी चाहिए। मनुष्य जानवरों से चेतना के आधार पर, धर्म के आधार पर या ऐसे ही अन्य आधारों पर अलग किए जा सकते हैं। वे खुद अपनी आजीविका के साधन उत्पादित करना शुरू कर देते हैं। यह एक ऐसा कदम है जो उनके भौतिक संगठन द्वारा तैयार किया जाता है। अपनी आजीविका के साधन उत्पादित करते हुए मनुष्य प्रकारांतर से अपनी वास्तविक भौतिक जिंदगी का उत्पादन कर रहा होता है।”
मार्क्स के मूलभूत विचारों को समझना महत्वपूर्ण हैः मनुष्य खुद अपना इतिहास बनाता है; वह खुद अपना निर्माता है। जैसा कि कई साल बाद उन्होंने ‘पूंजी’ में लिखाः “और ऐसे इतिहास को संकलित करना आसान भी होगा, क्योंकि जैसा कि विको कहते हैं, मानवीय इतिहास नैसर्गिक इतिहास से इस अर्थ में अलग है कि हमने इसे बनाया है, उसे नहीं।“ मनुष्य इतिहास की प्रक्रिया में खुद को जन्म देता है। मनुष्य जाति के आत्मनिर्माण की इस प्रक्रिया में मूल कारक होता है प्रकृति से उसका रिश्ता। अपने इतिहास की शुरुआत में मनुष्य प्रकृति से पूरी तरह जकड़ा होता है। विकास की प्रक्रिया में वह प्रकृति के साथ अपने रिश्ते को रूपांतरित करता है और खुद को भी।
पूंजी में मार्क्स प्रकृति के ऊपर इस निर्भरता के बारे में और भी बहुत कुछ कहते हैः “उत्पादन के ये पुराने सामाजिक ढांचे, बुर्जुआजी समाज के मुकाबले बेहद साधारण और पारदर्शी हैं। मगर वे या तो ऐसे व्यक्तियों के अपरिपक्व विकास पर आधारित हैं जो आदिमकालीन आदिवासी समुदायों में व्यक्तियों को एक-दूसरे से जोड़ने वाले नाभिनाल जुड़ावों को भी काट नहीं पाए थे या फिर प्रत्यक्ष अधीनस्थता वाले संबंधों पर। वे तभी अस्तित्व बना और कायम रख सकते हैं जब उत्पादक श्रम शक्ति का विकास एक खास सीमा से आगे न बढ़ा हो और इसीलिए भौतिक जीवन की परिधि में सामाजिक जीवन – मनुष्य और मनुष्य के बीच तथा मनुष्य और प्रकृति के बीच – उसी अनुपात में संकीर्ण हो। यह संकीर्णता पुराने समय में होने वाली प्रकृति की पूजा तथा प्रचलित धर्म के अन्य तत्वों में झलकती है। वास्तविक दुनिया की धार्मिक परछाईं किसी भी सूरत में, अंतिम तौर पर तभी लुप्त हो सकती है जब रोजमर्रा की जिंदगी के व्यावहारिक रिश्ते मनुष्य को प्रकृति और अन्य मनुष्यों के संबंध में नितांत बोधगम्य और तार्किक रिश्तों की झलक दें। भौतिक उत्पादन की प्रक्रिया पर आधारित समाज की जीवन प्रक्रिया अपना रहस्यात्मक परदा तब तक नहीं हटाती जब तक कि इसका ख्याल रखने के लिए स्वतंत्र रूप से जुड़े मनुष्यों द्वारा संचालित उत्पादन प्रक्रिया अमल में नहीं आ जाती और वह तय योजना के मुताबिक उन लोगों द्वारा सतर्कतापूर्वक नियमित नहीं की जाने लगती। हालांकि इसके लिए समाज में एक निश्चित भौतिक आधार या रहन-सहन की एक खास परिस्थिति का होना जरूरी है जो, फिर विकास की लंबी और तकलीफदेह प्रक्रिया की स्वतःस्फूर्त उपज है।”
इस वक्तव्य में मार्क्स ने एक ऐसे तत्व का जिक्र किया है जिसकी उनके सिद्धांत में प्रमुख भूमिका है। वह है श्रम। श्रम वह कारक है जो मनुष्य और प्रकृति के बीच मध्यस्थता करता है। श्रम अपनी शक्ति को प्रकृति के साथ नियमित करने की मनुष्य की कोशिश है। श्रम मनुष्य की जिंदगी की अभिव्यक्ति है और श्रम के जरिए मनुष्य और प्रकृति के बीच के रिश्तों में बदलाव आता है। यानी श्रम के जरिए मनुष्य खुद को बदलता है। श्रम की उनकी अवधारणा पर आगे और चर्चा होगी।
इस खंड का समापन मैं 1859 में लिखे उस उद्धरण से करूंगा जो ऐतिहासिक भौतिकवाद पर मार्क्स की सबसे संपूर्ण व्याख्या हैः 
“जिस सामान्य निष्कर्ष पर मैं पहुंचा, और एक बार मिलने के बाद जिस निष्कर्ष ने मेरे अध्ययन के लिए मार्गदर्शक सूत्र का काम किया, उसे संक्षेप में इस तरह व्यक्त किया जा सकता हैः अपने जीवन के सामाजिक उत्पादन के दौरान मनुष्य ऐसे निश्चित और अपरिहार्य रिश्तों में पड़ता है जो उसकी इच्छा से स्वतंत्र होते हैं। उत्पादन के ये रिश्ते अपनी भौतिक उत्पादक शक्तियों के विकास की निश्चित अवस्था के अनुरूप होते हैं। उत्पादन के इन तमाम रिश्तों का कुल जोड़ मिलकर समाज की आर्थिक संरचना का निर्माण करता है जो उसकी वास्तविक बुनियाद होती है और इसी के ऊपर खड़ा होता है वह राजनीतिक और वैधानिक सुपरस्ट्रक्चर जिसके अनुरूप विकसित होते हैं सामाजिक चेतना के निश्चित स्वरूप। भौतिक जीवन की उत्पादन पद्धति मोटे तौर पर सामाजिक, राजनीतिक और बौद्धिक जीवन प्रक्रिया तय करती है। वह लोगों की चेतना नहीं है जो उनका सामाजिक अस्तित्व निर्धारित करती है बल्कि इसके उलट उनका सामाजिक अस्तित्व ही उनकी चेतना निर्धारित करता है। अपने विकास की एक निश्चित अवस्था में समाज की भौतिक उत्पादक शक्तियां पहले से मौजूद उत्पादन संबंधों से या उन संपत्ति संबंधों से जिनमें वे अब तक रह रही होती हैं, टकराने लगती हैं। उत्पादक शक्तियों के विकास के स्वरूप से बदलकर ये रिश्ते धीरे-धीरे उनके पांवों की बेड़ियां बन जाते हैं। इसके बाद सामाजिक क्रांति का युग शुरू होता है। आर्थिक बुनियाद में बदलाव के बाद विशाल सुपरस्ट्रक्चर का रूपांतरण अपेक्षाकृत जल्दी होता है। ऐसे रूपांतरणों पर विचार करते हुए उत्पादन की आर्थिक परिस्थितियों के भौतिक रूपांतरण में (जो नैसर्गिक विज्ञान की यथार्थता के जरिए निर्धारित किया जा सकता है)  और वैधानिक, राजनीतिक, धार्मिक या दार्शनिक, एक शब्द में कहें तो वैचारिक स्वरूपों वाले रूपांतरण (जिनमें लोग इस संघर्ष को लेकर सचेत हो जाते हैं और इसे अंजाम देते हैं) में फर्क जरूर किया जाना चाहिए। जैसे कि किसी व्यक्ति के बारे में हमारी राय इस बात पर निर्भर नहीं करती कि वह अपने बारे में क्या सोचता है, वैसे ही हम रूपांतरण की ऐसी किसी अवधि के बारे में फैसला इसकी चेतना के आधार पर नहीं कर सकते। उल्टे, इस चेतना की व्याख्या भौतिक जीवन के अंतर्विरोधों के आधार पर, सामाजिक उत्पादक शक्तियों और उत्पादन संबंधों के बीच चल रहे टकराव के आधार पर की जानी चाहिए। कोई भी सामाजिक व्यवस्था तब तक नष्ट नहीं होती जब तक कि वे तमाम उत्पादक शक्तियां विकसित नहीं हो जातीं जिनके लिए इसमें गुंजाइश होती है; और नए उच्चतर उत्पादन संबंध तब तक सामने नहीं आते जब तक कि उनके अस्तित्व की भौतिक स्थितियां पुराने समाज के ही गर्भ में परिपक्व नहीं हो जातीं। इसलिए मनुष्यता अपने सामने हमेशा वही कार्यभार रखती है जो पूरे किए जा सकते हों। यानी अगर थोड़ा और बारीकी से देखा जाए तो यह हमेशा पाया जाएगा कि कार्य तभी सामने आता है जब उसे पूरा करने लायक भौतिक स्थितियां पहले ही तैयार हो चुकी होती हैं या कम से कम उनके तैयार होने की प्रक्रिया शुरू हो चुकी होती है। एशियाई, प्राचीन, सामंती और आधुनिक बुर्जुआजी उत्पादन पद्धतियों को मोटे तौर पर समाज के आर्थिक निर्माण के क्रम में आए प्रगतिशील युगों के रूप में श्रेणीबद्ध किया जा सकता है। बुर्जुआजी उत्पादन संबंध उत्पादन की सामाजिक प्रक्रिया का आखिरी शत्रुतापूर्ण स्वरूप है - शत्रुतापूर्ण वैयक्तिक शत्रुता के अर्थ में नहीं, व्यक्ति के जीवन की सामाजिक परिस्थितियों से उत्पन्न शत्रुता के अर्थ में; इसी बीच बुर्जुआ समाज के गर्भ में विकसित हो रहीं उत्पादक शक्तियां इस शत्रुता को हल करने के लिए आवश्यक भौतिक स्थितियां तैयार कर देती हैं। इस प्रकार यह सामाजिक ढांचा मानव सभ्यता के इस पूर्व-इतिहास (प्री-हिस्ट्री) को समापन तक पहुंचा देता है।
यहां इस सिद्धांत की कुछ विशेष मान्यताओं को एक बार फिर से रेखांकित कर लेना उपयोगी होगा। सबसे पहले मार्क्स की ऐतिहासिक परिवर्तन की अवधारणा। परिवर्तन का कारण उत्पादक शक्तियों (तथा अन्य वस्तुगत परिस्थितियों) और तत्कालीन सामाजिक ढांचे के बीच का टकराव होता है। जब एक उत्पादन पद्धति या एक सामाजिक ढांचा उत्पादक शक्तियों को आगे बढ़ाने के बदले उन्हें बाधित करने लगता है, तो उन उत्पादक शक्तियों को या तत्कालीन समाज को नष्ट होने से बचने के लिए उत्पादन का ऐसा ढंग चुनना पड़ता है जो नई उत्पादन शक्तियों के अनुकूल हो और उन्हें बढ़ावा दे सके। समूचे इतिहास में मनुष्य का विकास प्रकृति के साथ उसके संघर्ष से ही निर्धारित होता आया है। इतिहास के एक खास बिंदु पर आकर (मार्क्स के मुताबिक, निकट भविष्य में) मनुष्य प्रकृति की उत्पादक शक्तियों का इस हद तक विकास कर लेगा कि मनुष्य और प्रकृति के बीच का विरोध अंततः हल हो जाएगा। इस बिंदु पर मनुष्य का पूर्व-इतिहास (प्री-हिस्ट्री) समाप्त होगा और वास्तविक मानवीय इतिहास का आरंभ होगा।  

एरिक फ्रॉम (1900-1980) बीसवीं सदी के उन कुछ बड़े बुद्धिजीवियों में गिने जाते रहे हैं जिन्होंने अपनी गहरी छाप छोड़ी है। जर्मन यहूदी मूल के एरिक फ्रॉम नाजी काल में जर्मनी छोड़ अमेरिका में बस गए। मूलतः मनोवैज्ञानिक और मनोविश्लेषक रहे एरिक फ्रॉम की 1961 में आई पुस्तक ‘मार्क्सेज कॉन्सेप्ट ऑफ मैन’ मार्क्स के मूल विचारों और जीवन, समाज, व्यक्ति तथा प्रकृति के प्रति उनके नजरिए को समझने का नया आधार तो प्रदान करती ही है इस सवाल से भी टकराती है कि मार्क्स कैसे और क्यों गलत समझे गए, न केवल अपने विरोधियों द्वारा बल्कि समर्थकों द्वारा भी।


चेतना की समस्या, सामाजिक ढांचा और बल प्रयोग
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ऊपर दिए गए उद्धरण में मानवीय चेतना से जुड़ी सबसे बड़ी समस्या का जिक्र आया है। अहम वाक्य हैः मनुष्यों की चेतना उनका अस्तित्व नहीं तय करती बल्कि इसके उलट, यह उनका सामाजिक अस्तित्व है जो उनकी चेतना तय करता है। चेतना की समस्या को लेकर अपना पूरा बयान मार्क्स ‘जर्मन आइडियोलॉजी’ में देते हैः
“तथ्य, इसलिए, यह है कि कुछ खास व्यक्ति जो खास तरह से उत्पादकतापूर्ण रूप से सक्रिय होते हैं इन खास सामाजिक और राजनीतिक रिश्तों में प्रवेश करते हैं। इनमें से हरेक मामले में अनुभवजन्य अवलोकनों के जरिए बगैर किसी रहस्यात्मकता या आनुमानिकता के सामाजिक तथा राजनीतिक ढांचे के उत्पादन से संबंधों का पता किया जाना चाहिए। सामाजिक ढांचा और राज्य निश्चित व्यक्तियों की जीवन प्रक्रिया से लगातार विकसित होते रहते हैं, उस रूप में नहीं जैसे कि वे अपनी या अन्य लोगों की कल्पना में लगते हैं बल्कि उस रूप में जैसे कि वे वास्तव में होते हैं। तात्पर्य यह कि वे भौतिक रूप से उत्पादित करते हैं, प्रभावी होते हैं और निश्चित भौतिक सीमाओं, पूर्वधारणाओं और शर्तों के अंतर्गत सक्रिय रहते हैं, उनकी इच्छाओं से स्वतंत्र।
“विचारों, अवधारणाओं या चेतना का उत्पादन प्रथमतया सीधे तौर पर भौतिक गतिविधियों से, मनुष्य की भौतिक अंतर्क्रियाओं से यानी वास्तविक जीवन की भाषा से अंतर्गुंफित रहता है। मनुष्य की मानसिक अंतर्क्रियाएं (परिकल्पना, चिंतन वगैरह) इस अवस्था में उनके भौतिक व्यवहार से सीधे तौर पर जुड़ी प्रतीत होती हैं। राजनीति, कानून, नैतिकता, धर्म की भाषा में और राष्ट्र की तत्व मीमांसा में झलकने वाले मानसिक उत्पादन पर भी यही बात लागू होती है। मनुष्य (अपनी उत्पादक शक्तियों के निश्चित विकास द्वारा और इनकी समानांतर अंतर्क्रियाओं द्वारा गढ़ा गया वास्तविक सक्रिय मनुष्य) अपने तमाम विचारों, अवधारणाओं आदि का उत्पादनकर्ता है। चेतना सचेत अस्तित्व से और वास्तविक जीवन प्रक्रिया में मनुष्य के अस्तित्व से अलग कुछ भी नहीं हो सकती। अगर तमाम विचारधाराओं में मनुष्य और उनकी परिस्थितियां कैमरे की प्रतिच्छाया की तरह उल्टी प्रतीत होती हैं तो यह तथ्य वैसे ही उनकी ऐतिहासिक जीवन प्रक्रिया से निकलता है जैसे कि रैटिना (आंख की पुतली) पर विभिन्न वस्तुओं की उल्टी छाया उनकी भौतिक जीवन प्रक्रिया से संभव होती है।”
सर्वप्रथम यह बात नोट की जानी चाहिए कि स्पिनोजा और फिर फ्रॉयड की तरह मार्क्स का भी यकीन था कि लोग सचेत ढंग से जो कुछ सोचते हैं उसका ज्यादातर हिस्सा ‘भ्रामक’ चेतना होती है। यह कोरी सिद्धांतवादिता या तार्किकता का नतीजा होती है। मनुष्य के कार्यों का वास्तविक अक्स उसका अचेतन होता है। फ्रॉयड के मुताबिक उसकी जड़ व्यक्ति की कामेच्छा में होती है; मार्क्स के मुताबिक इसकी जड़ व्यक्ति के समूचे सामाजिक ढांचे में होती है जो उसकी चेतना को निश्चित दिशाओं में निर्देशित करता है और उसे खास तथ्यों तथा अनुभवों से अवगत होने से रोकता है।
इस बात को समझना महत्वपूर्ण है कि यह सिद्धांत ऐसा झूठा दावा नहीं करता कि विचार या आदर्श वास्तविक नहीं होते या मजबूत नहीं होते। मार्क्स जागरूकता की बात करते हैं आदर्शों की नहीं। यह मनुष्य के सचेत विचारों का अंधापन ही है जो उसे उसकी वास्तविक मानवीय जरूरतों से, उनमें निहित आदर्शों से अवगत होने से रोकता है। अगर भ्रामक चेतना वास्तविक चेतना में रूपांतरित हो जाए तभी और सिर्फ तभी ऐसा संभव हो पाएगा कि हम तार्किकता या कल्पना से वास्तविकता को तोड़ने-मरोड़ने के बजाय उससे अवगत हो सकें, अपनी वास्तविक और सच्ची मानवीय जरूरतों से परिचित हो सकें।
इस बात पर भी गौर किया जाना चाहिए कि मार्क्स के मुताबिक खुद विज्ञान और मनुष्य में निहित समस्त ऊर्जा उन उत्पादक शक्तियों का हिस्सा हैं जो प्रकृति की शक्तियों से अंतर्क्रियाओं में शामिल रहती हैं। और जहां तक मनुष्य के विकास पर विचारों के प्रभाव की बात है तो मार्क्स किसी भी सूरत में उन ताकतों से उतने बेखबर नहीं थे जितना कि उनके लेखन की लोकप्रिय व्याख्याओं में दिखाया जाता है। मार्क्स की दलीलें विचारों के खिलाफ नहीं, बल्कि उन विचारों के खिलाफ थीं जो मानवीय और सामाजिक यथार्थ में रची बसी न हों, जो हीगल के शब्दों में, ‘वास्तविक संभावना’ न हों। सबसे बड़ी बात, मार्क्स कभी यह नहीं भूले कि न केवल परिस्थितियां मनुष्य का निर्माण करती हैं बल्कि मनुष्य भी परिस्थितियों का निर्माण करता है। नीचे दिए जा रहे अंश से यह साफ हो जाएगा कि मार्क्स के बारे में यह कहना कितना गलत है कि कई अन्य दार्शनिकों और समाजशास्त्रियों की तरह उन्होंने मनुष्य को ऐतिहासिक प्रक्रिया में निष्क्रिय भूमिका दी, मानो वह उसे परिस्थितियों की एक निष्क्रिय उपज के रूप में देखते होः 
‘’परिस्थितियों में बदलाव और शिक्षा से जुड़ा भौतिकवादी सिद्धांत (मार्क्स के विचारों के विपरीत) भूल जाता है कि परिस्थितियां मनुष्य द्वारा बदली जाती हैं और खुद शिक्षक को भी शिक्षित होना प़ड़ता है। इसलिए यह सिद्धांत समाज को दो भागों में बांटकर देखता है जिनमें से एक समाज (संपूर्णता में) से ऊपर होता है। 
“परिस्थितियों में बदलाव का और मानवीय गतिविधियों का संयोग केवल क्रांतिकारी अभ्यास के रूप में ही पूरी तरह समझा जा सकता है।”
क्रांतिकारी अभ्यास की यह अवधारणा हमें मार्क्स के दर्शन की सबसे विवादित अवधारणाओं में गिनी जाने वाली ताकत की अवधारणा की ओर ले जाती है। सबसे पहले तो यह बात अपने आप में कितनी विचित्र है कि उस सिद्धांत पर पश्चिमी लोकतांत्रिक देशों में इतना गुस्सा है जो यह दावा करता है कि समाज में बदलाव राजनीतिक ताकत पर बलपूर्वक कब्जे के जरिए ही लाया जा सकता है। ताकत के जरिए राजनीतिक क्रांति का विचार मार्क्सवादी विचार कतई नहीं है। यह पिछले तीन सौ सालों से बुर्जुआजी समाज का विचार रहा है। पश्चिमी लोकतंत्र महान अंग्रेजी, फ्रांसीसी और अमेरिकी क्रांतियों का शिशु है। फरवरी 1917 की रूसी क्रांति और 1918 की जर्मन क्रांति का पश्चिम में जोरदार स्वागत हुआ था, बावजूद इसके कि इन क्रांतियों में बल का इस्तेमाल हुआ था। साफ है कि पश्चिमी देशों में बल के इस्तेमाल को लेकर जो गुस्सा आज दिखता है वह इस बात पर निर्भर करता है कि बल का इस्तेमाल कौन किसके विरुद्ध कर रहा है। हर युद्ध बल पर आधारित होता है। लोकतांत्रिक सरकारें भी बल के सिद्धांत पर आधारित होती हैं। वे बहुमत को अल्पमत के खिलाफ बल का इस्तेमाल करने की इजाजत देती हैं। यथास्थिति बनाए रखने के लिए यह जरूरी होता है। बल के इस्तेमाल से नाराजगी केवल शांतिवादी नजरिए से ही प्राणाणिक कही जा सकती है जो मानता है कि या तो ताकत पूरी तरह गलत होती है या फिर आत्मरक्षा के लिए अनिवार्य होने की स्थिति को छोड़कर ताकत का इस्तेमाल कभी भी कोई बेहतर बदलाव नहीं ला सकता।
तथापि, यह दर्शाना काफी नहीं है कि बलपूर्वक क्रांति संबंधी मार्क्स के विचार मध्यवर्गीय परंपरा के अनुरूप रहे हैं। यह जोर देकर कहा जाना चाहिए कि मार्क्स के विचार मध्यवर्गीय नजरिए में एक महत्वपूर्ण सुधार लाए, ऐसा सुधार जिसकी जड़ मार्क्स के इतिहास के समूचे सिद्धांत में निहित है।
मार्क्स ने देखा कि राजनीतिक ताकत ऐसी कोई भी चीज उत्पन्न नहीं कर सकती जिसके लिए सामाजिक और राजनीतिक प्रक्रिया में तैयारी न हो गई हो। यानी राजनीतिक ताकत अधिक से अधिक उस विकास को आखिरी धक्का दे सकती है जो पहले ही हो चुका होता है, लेकिन किसी भी सूरत में वह सचमुच कोई वास्तविक चीज नहीं उत्पन्न कर सकती। उन्होंने कहा, ‘ताकत नई सोसाइटी से गर्भवती हुई हर पुरानी सोसाइटी की दाई है।‘ यह मार्क्स की गहरी अंतर्दृष्टि थी कि वह पारंपरिक मध्यवर्गीय अवधारणा की सीमा से आगे बढ़े। उन्होंने शक्ति की रचनात्मक ताकत में विश्वास नहीं किया। इस विचार में भरोसा नहीं जताया कि राजनीतिक ताकत खुद ब खुद नई सामाजिक व्यवस्था का निर्माण कर सकती है। इसी वजह से, मार्क्स के मुताबिक ताकत की, अधिक से अधिक, संक्रमणकालीन सार्थकता ही होती है। समाज के रूपांतरण में इसकी भूमिका कभी स्थायी कारक की नहीं होती। 


साभार ब्रह्मराक्षस पेज


Friday, 31 July 2020

प्रेमचंद की नज़र में राष्ट्र - प्रो गोपेश्वर सिंह

प्रेमचंद की नज़र में राष्ट्र  : गोपेश्वर सिंह

रामविलास शर्मा ने 1936 ई. को इस अर्थ में विशिष्ट माना है कि इस वर्ष तीन ऐसी रचनाएँ प्रकाशित हुईं जिनमें भविष्य के भारत का सपना था। इनमें पहली रचना आधुनिक भारत के निर्माता जवाहर लाल नेहरू की ‘आत्मकथा’ है। दूसरी रचना लोकनायक जयप्रकाश नारायण की ‘समाजवाद ही क्यों?’ (‘why socialism?’) है जबकि तीसरी रचना प्रेमचंद का निबंध ‘महाजनी सभ्यता’ है। पहली दोनों रचनाएँ पुस्तक रूप में थीं और अंग्रेजी में लिखी गई थीं। ‘आत्मकथा’ सिर्फ नेहरू की निजी कथा न होकर स्वतंत्रता आन्दोलन और स्वतंत्र भारत के आधुनिक जनतांत्रिक सपने की भी कथा है। ‘समाजवाद ही क्यों?’ भारत में समाजवादी व्यवस्था की आवश्यकता पर जोर देने वाली पहली व्यवस्थित पुस्तक है। नेहरू और जे.पी. प्रसिद्ध स्वतंत्रता सेनानी, अपने-अपने समय के युवा ह्रदय सम्राट तथा गाँधी के बाद देश के सर्वाधिक लोकप्रिय नेता थे। ऐसे महानों की अति प्रसिद्ध पुस्तकों के साथ रामविलास जी ने हिंदी के लेखक प्रेमचंद के एक निबंध को याद किया है तो इसका विशेष अर्थ है| वे ऐसे लेखक थे जिनकी नजर वर्तमान के साथ बेहतर भविष्य पर भी थी। इसलिए यह अकारण नहीं है कि नेहरू और जे.पी. की पुस्तकों के साथ रामविलास शर्मा प्रेमचंद के निबंध का नाम लेते हैं जो उनकी लेखकीय दृष्टि को समझने के खयाल से बहुत ही महत्त्वपूर्ण है। महाजनी सभ्यता यानी पूँजीवादी सभ्यता। पूँजीवाद के पहले सामंतवादी सभ्यता थी। ये दोनों सभ्यताएँ जनता के शोषण और सामजिक भेदभाव पर आधारित थीं। जो सभ्यता शोषण और भेदभाव पर आधारित हो वह प्रेमचंद को किसी भी रूप में स्वीकार्य नहीं थी। उन्होंने उस सभ्यता का स्वागत किया जिसका सूर्य पश्चिम में उग रहा था। निस्संदेह पश्चिम के उस सूर्य से तात्पर्य रूस में स्थापित समाजवादी व्यवस्था से है। प्रेमचंद ने पूँजीवादी सभ्यता की कठोरतम आलोचना करने के बाद लिखा: “परन्तु अब नई सभ्यता का सूर्य सुदूर पश्चिम से उदय हो रहा है जिसने इस नारकीय महाजनवाद या पूँजीवाद की जड़ खोदकर फेंक दी है जिसका मूल सिद्धांत यह है कि प्रत्येक व्यक्ति, जो अपने शरीर या दिमाग से मेहनत करके कुछ पैदा कर सकता है, राज्य और समाज का परम सम्मानित सदस्य हो सकता है और जो दूसरों की मेहनत या बाप-दादों के जोड़े हुए धन पर रईस बना फिरता है वह पतीततम प्राणी है।”1 
प्रेमचंद भारतीय राष्ट्रीय आन्दोलन के गर्भ से पैदा हुए ऐसे लेखक थे जिसके लिए स्वतंत्रता का अर्थ राजनीतिक मुक्ति के साथ सामजिक और आर्थिक मुक्ति भी है। वे पूँजीवादी व्यवस्था के जितने खिलाफ थे, उतने ही सामंती व्यवस्था के भी। जाति, संप्रदाय और गरीबी के सवाल उनके शब्द-कर्म के जरूरी एजेंडे थे। पुराना क्या है जो अप्रासंगिक हो चुका है और नया क्या है जो प्रासंगिक है, उसकी जितनी साफ़ समझ उनके पास थी, वैसी हिंदी के उनके समकालीन किसी दूसरे लेखक के पास शायद ही हो! वे यदि 1936 में ‘महाजनी सभ्यता’ का क्रीटिक तैयार करते हैं तो इसका कारण यह है कि वे पुराने समय और नए समय में फर्क करना ठीक से जानते हैं। 1919 में प्रकाशित उनके ‘पुराना जमाना: नया जमाना’ शीर्षक निबंध को देखने से पता चलता है कि 1936 में वे जहाँ पहुंचे थे उसकी तैयारी वे बहुत पहले से कर रहे थे। अपने उस निबंध में वे लिखते हैं: ”आने वाला जमाना अब जनता का है, और वह लोग पछताएंगे जो ज़माने के कदम-से-कदम मिलाकर न चलेंगे।”2 
ज़माने के कदम-से-कदम मिलाकर चलने की जो सबसे बड़ी कसौटी प्रेमचंद की थी वह थी किसानों की हालत। उनके सारे रचनात्मक और वैचारिक लेख के मूल में किसान जीवन की वास्तविकता और उनकी चिंता सर्वोपरि है। जैसे महात्मा गाँधी के ‘स्वराज’ के केंद्र में गाँव था और गाँव के किसान थे, वैसे ही प्रेमचंद के लेखकीय चिंतन के केंद्र में किसान हैं। ‘पूस की रात’ का हलकू हो या ‘गोदान’ का होरी या उनका वैचारिक लेखन, किसान जीवन की दशा-दुर्दशा और उसका भविष्य उनकी सजग-सचेत नजर से कभी ओझल नहीं होता। ‘पुराना जमाना, नया जमाना’ का एक अंश इस दृष्टि से देखा जा सकता है:  ”क्या यह शर्म की बात नहीं कि जिस देश में नब्बे फीसदी आबादी किसानों की हो उस देश में कोई किसान सभा, कोई किसानों की भलाई का आन्दोलन, कोई खेती का विद्यालय, किसानों की भलाई का कोई व्यवस्थित प्रयत्न न हो... मगर नए ज़माने ने नया पन्ना पलटा है। आने वाला जमाना अब किसानों और मजदूरों का है। दुनिया की रफ़्तार इसका साफ़ सबूत दे रही है। हिंदुस्तान इस हवा से बेअसर नहीं रह सकता। हिमालय की चोटियाँ उसे इस हमले से नहीं बचा सकतीं। जल्द या देर से, शायद जल्द ही, हम जनता को केवल मुखर ही नहीं, अपने अधिकारों की माँग करने वाले के रूप में देखेंगे और तब वह आपकी किस्मतों की मालिक होगी।”3 
प्रेमचंद जिस आधुनिक भारत का सपना देख रहे थे वह ऐसा राष्ट्र-राज्य है जिसमें किसान-मजदूर खुद अपनी किस्मत के मालिक होंगे। वे यह तो मानते हैं कि ‘वर्तमान सभ्यता का सबसे अच्छा पहलू राष्ट्रीयता की भावना का जन्म लेना है।’4 लेकिन सच्ची राष्ट्रीयता उनकी नजर में तब तक नहीं आ सकती जब तक कि सामजिक, आर्थिक और शैक्षणिक गैर बराबरी जनता में है। वे कहते हैं: ”आपका आधुनिक शिक्षा से वंचित भाई आपको इस ठाट में देखता है और यह समझता है कि यह आदमी हममें नहीं है, हम उनके नहीं हैं। फिर चाहे आप कितनी बुलंद आवाज से राष्ट्रीयता की हाँक लगाएँ।”5 वे ‘राष्ट्रीयता’ को आधुनिक सभ्यता का सबसे अच्छा पहलू कहते हैं लेकिन वे यह भी बताते चलते हैं कि ‘जनतांत्रिक’ का समावेश ‘आधुनिक सभ्यता का सबसे प्रधान गुण है।”6 इससे पता चलता है कि प्रेमचंद के लिए जो भविष्य का भारत है उसका ताना-बाना ‘जनतांत्रिकता’ और ‘आधुनिकता’ के रेशे से निर्मित है जिसमें ‘किसान-मजदूर अपनी किस्मत के मालिक’ हैं। लगभग सौ वर्ष पूर्व देखा गया भारतीय राष्ट्र-राज्य का प्रेमचंद का सपना मुहावरे के अर्थ में अब भी सपना है! किसान मजदूर अब भी अपनी किस्मत के मालिक नहीं हैं! हमारी जनतांत्रिक आकांक्षाओं पर अब भी पहरेदारी है! आर्थिक और शैक्षणिक गैर बराबरी की तो बात ही मत पूछिए! “किसानों की हालत और खराब है. गरीबों और अमीरों के बीच खाई और चौड़ी हो चुकी है. समाजवादी दुनिया बिखर चुकी है. ऐसे पूँजीवाद की उनके द्वारा की गई आलोचना का महत्त्व और बढ़ गया है. रामविलास शर्मा ने ठीक ही गणेश शंकर विद्यार्थी के बाद प्रेमचंद को पूँजीवाद का सबसे महत्त्वपूर्ण आलोचक कहा है|7
भारत के राष्ट्रीय आन्दोलन में प्रेमचंद सदेह शामिल नहीं थे। कुछ लोगों को आश्चर्य हो सकता है कि जनता की मुक्ति की बात करने वाला लेखक जनता के मुक्ति-संघर्ष में सदेह शामिल क्यों नहीं होता? उस ज़माने में हिंदी व विभिन्न भारतीय भाषाओं के अनेक लेखक स्वतंत्रता संग्राम में सदेह शामिल थे और उस कारण उन्हें तरह-तरह की यातनाएँ भी झेलनी पड़ीं। ऐसे सभी लेखकों से भारत के मुक्ति-संग्राम को बल मिला। उनके कर्म से भी और उनके शब्द से भी। लेकिन ऐसे भी बहुतेरे लेखक थे जो स्वतंत्रता संग्राम में सदेह शामिल न होकर मनसा-वाचा शामिल थे। उनके लिखे से भारतीय राष्ट्र-राज्य का नया रूप बन रहा था। उनका एक-एक शब्द हजारों-लाखों को प्रेरित-प्रभावित कर रहा था। रवीन्द्रनाथ ठाकुर ऐसे ही लेखक थे जिनसे भारतीय स्वातंत्र्य संग्राम को नयी ऊर्जा मिलती थी। प्रेमचंद भी ऐसे ही लेखक थे जो भारतीय समाज और राष्ट्र की मुक्ति के मार्ग में बाधक सभी तत्त्वों से लड़ते रहे। अमृत राय ने ‘कलम का सिपाही’ नाम से उनकी जीवनी लिखी है। सही अर्थों में वे कलम के सिपाही थे। वे कलम से स्वतंत्रता की लड़ाई लड़ने वाले हिंदी के सबसे बड़े लेखक थे।
कलम से जिस तरह जनता और राष्ट्र की मुक्ति की लड़ाई प्रेमचंद लड़ रहे थे, उसका सही पता-ठिकाना तभी चलता है जब हम उनके रचनात्मक साहित्य के साथ उनके वैचारिक लेखन को भी देखते हैं। अपने लेखन काल के प्रारंभ से लेकर मृत्यु पर्यंत लगभग तीन दशक का उनका जो वैचारिक लेखन है वह भारत की स्वतंत्रता, स्वावलंबन, आर्थिक-सामजिक गैरबराबरी और विश्व बंधुत्व जैसी अनेक चिंताओं से मुठभेड़ का प्रतिफल है। हम अक्सर उन्हें आर्य समाजी, गाँधीवादी और मार्क्सवादी प्रभावों के सन्दर्भ में देखते-दिखाते हैं। उनके साहित्य पर इनके प्रभाव से किसी को इंकार भी नहीं है। लेकिन उनकी चेतना सबसे अधिक स्वतंत्रता आन्दोलन के मूल्यों से संचालित है। विदेशी दासता से मुक्ति के लिए स्वशासन जरूरी था। लेकिन कैसा स्वशासन? वे सही अर्थों में जनता के शासन के पक्ष में थे और जनता का शासन तब आएगा जब बेजबानों की ताकत जाहिर होने लगेगी। उन्हीं के शब्द देखें...”अब एक फाकाकश मजदूर भी अपनी अहमियत समझने लगा है और धन-दौलत की ड्योढ़ी पर सर झुकाना पसंद नहीं करता। उसे अपने कर्त्तव्य चाहे न मालूम हों लेकिन अपने अधिकारों का पूरा ज्ञान है। वह जानता है कि इस सारे राष्ट्रीय वैभव और प्रभुत्व का कारण मैं हूँ। यह सारा राष्ट्रीय विकास और उन्नति मेरे ही हाथों का करिश्मा है। अब वह मूक संतोष और सर झुकाकर सबकुछ स्वीकार कर लेने में विश्वास नहीं रखता।”8 तो प्रेमचंद इसी मजदूर की हिस्सेदारी ‘स्वशासन’ में सुनिश्चित करना चाहते थे। 
‘स्वदेशी आन्दोलन’ स्वतंत्रता संग्राम का एक बड़ा एजेंडा था। स्वदेशी के बिना भारत राष्ट्र के रूप में खड़ा नहीं हो सकता था। स्वतंत्रता आन्दोलन में महात्मा गाँधी के प्रवेश के बहुत पहले स्वदेशी की माँग जोर-शोर से उठने लगी थी। महात्मा गाँधी के आने के बाद इस आन्दोलन ने और जोर पकड़ा जब वे 1915 में भारत आए। प्रेमचंद 1905 में ‘देशी चीजों का प्रचार कैसे बढ़ सकता है’9  शीर्षक निबंध लिखकर घरेलू उद्योग-धंधों के विकास और उनकी मार्केटिंग के मार्ग में आने वाली बाधाओं की चिंता करते हैं। वे उसी वर्ष ‘स्वदेशी आन्दोलन’ की वकालत करते हैं और उसे ‘देशभक्तिपूर्ण आन्दोलन’10 की संज्ञा देते हैं। ‘स्वराज से किसका अहित होगा?’ (1930) शीर्षक अपने निबंध में वे निर्भय होकर इस संग्राम में सम्मिलित होने की मांग करते हैं। 1931 में ‘देश की वर्त्तमान परिस्थिति’ की चर्चा करते हुए वे किसानों से अपील करते हैं कि ‘महात्मा जी के मार्ग’ से यदि वे हटे तो उन्हें पछताना पड़ेगा। ‘स्वदेशी आन्दोलन’ का जबर्दस्त समर्थन करने के साथ प्रेमचंद भारत और पूरी दुनिया में गोरी जातियों की सभ्यता के अन्यायपूर्ण आचरण और दमन-शोषण की आलोचना करते हैं और उनके पाखंड पर चोट करते हैं। ‘गोरी जातियों का प्रभाव क्यों कम है’ (1931) शीर्षक निबंध में वे लिखते हैं कि “...गोरों ने आदि से ही प्रेम के बल पर नहीं, आतंक के बल पर संसार पर प्रभुत्व जमाया है। वह कालों की नज़रों से अपने ऐबों को छिपाकर अपनी नीतिमता की साख बिठाये थे|”11 अंग्रेजों की अन्यायपूर्ण नीति और गरीब जनता को टैक्स के जरिए लूटने की उनकी आदत के कारण प्रेमचंद को ‘स्वराज की कामना’ का भारतीय जन में ‘जन्म लेना’ स्वाभाविक जान पड़ता है। 
 प्रेमचंद के लिए राष्ट्र का अर्थ सिर्फ कोई निश्चित भू-भाग ही नहीं, उसके आगे भी बहुत कुछ है। उनके लिए राष्ट्र का अर्थ सबसे पहले उस भू-भाग की शोषित, पीड़ित जनता है। ‘नवयुग’ (1932) शीर्षक अपने एक निबंध में राष्ट्र और राष्ट्रीयता की ओर संकेत करते हुए वे लिखते हैं: “राष्ट्र केवल एक मानसिक प्रवृत्ति है। जब यह प्रवृत्ति प्रबल हो जाती है तो किसी प्रांत या देश के निवासियों में भ्रातृभाव जागरित हो जाता है। तब उनमें रुढियों से पैदा होने वाले भेद, पुराने संस्कारों से उत्पन्न होनेवाली विभिन्नताएँ और ऐतिहासिक तथा धार्मिक विषमताएँ, एक प्रकार से मिट जाती हैं।”12 जब तक ‘विविधताएँ’ और ‘विषमताएँ’ किसी राष्ट्र में मौजूद हैं तब तक वह सही अर्थों में राष्ट्र नहीं है। जनता का जिस तरह शोषण है, गरीबी का जैसा साम्राज्य है, गाँवों की जो हालत है, उस पर वे ‘दमन की सीमा’ (1932) शीर्षक निबंध में गंभीर और तल्ख़ टिप्पणी करते हैं। ब्रिटिश सरकार, प्रशासन और जमींदारों को कठघरे में खड़ा करते हुए कहते हैं: “देहात से, सुधार और सहयोग और शिक्षा और स्वास्थ्य और सभी आयोजनाएँ, जिनसे राष्ट्र बनता है, जिनसे उसका विकास होता है, लापता हैं।”13 इसीलिए औरों के लिए राष्ट्र और राष्ट्रीयता का जो भी अर्थ हो, प्रेमचंद के लिए उसका ठेठ भारतीय अर्थ है। उनकी दो टूक राय है,  “राष्ट्रीयता की पहली शर्त वर्ण-व्यवस्था, ऊँच-नीच के भेदभाव और धार्मिक पाखण्ड की जड़ खोदना है।”14 
 जाति भेद की समस्या को भारतीय राष्ट्रीयता की केन्द्रीय समस्या मानते हुए ऐसे लोगों पर प्रेमचंद जोरदार हमला करते हैं जो जाति की श्रेष्ठता और धार्मिक विद्वेष की भावना से भरे हुए हैं। राष्ट्र, राष्ट्रीयता और राष्ट्रवाद के नकली प्रवक्ताओं को ‘क्या हम वास्तव में राष्ट्रवादी हैं?’ (1934) शीर्षक निबंध लिखकर वे कठघरे में खड़ा करते हैं। वे लिखते हैं: “हम अभी तक केवल मुँह से राष्ट्र-राष्ट्र का गुल मचाते हैं, हमारे दिलों में अभी वही जाति भेद अन्धकार छुपा हुआ है। और यह कौन नहीं जानता कि जाति भेद और राष्ट्रीयता दोनों में अमृत और विष का अंतर है।”15 इसलिए जो पुजारी, पुरोहित और पंडे जातिभेद करते हैं उन्हें वे ‘टके पंथी’ और ‘हिन्दू जाति का कलंक’ कहकर संबोधित करते हैं।
 भारत का विशाल भू-भाग, शस्य श्यामला धरती और यहां की पुरानी अच्छी बातें उन्हें भाती हैं। इस अर्थ में वे सच्चे देश-प्रेमी हैं। इसलिए वे औपनिवेशिक गुलामी से मुक्ति की बात जोरदार ढंग से उठाते हैं। काँग्रेस और महात्मा गाँधी के नेतृत्व में चलने वाले राष्ट्रीय आन्दोलन की जोरदार वकालत करते हैं। इस विषय पर लिखते हुए उनका राष्ट्रवादी रुझान और उनकी राष्ट्रीयता पूरी बुलंदी पर है। इसलिए ‘दुनिया का सबसे अनमोल रतन’ जैसी भावना प्रधान देशभक्तिपूर्ण कहानी हो या ‘कर्मभूमि’ जैसा स्वाधीनता संग्राम के झंझावतों से भरा उपन्यास, ‘देशी चीजों का प्रसार कैसे बढ़ सकता है’ (1905) और ‘स्वदेशी आन्दोलन’ (1905) जैसे प्रारम्भिक वैचारिक लेख हों या आर्य समाज, गाँधीवाद और मार्क्सवाद जैसी विचारधाराओं के प्रभाव से गुजरने के बाद अंतिम दिनों के लेख, प्रेमचंद साम्राज्यवाद से भारत की मुक्ति के हमेशा पक्षधर हैं। लेकिन मुक्ति से प्रेरित उनकी राष्ट्रीयता सिर्फ कुछ प्रतीकों तक सीमित नहीं है। वे सिर्फ अपनी सरकार बन जाने से संतुष्ट होने वाले राष्ट्रप्रेमी नहीं हैं। राष्ट्र, जो मेहनतकश जनता से बनता है, वे उस राष्ट्र की मुक्ति के पक्षधर हैं। इसलिए ऐसे राष्ट्रवादियों को जिनके एजेंडे में भेदभाव मिटाना नहीं है, फटकार लगाते हुए वे कहते हैं “राष्ट्रीयता की पहली शर्त है, साम्य का दृढ होना। इसके बिना राष्ट्रीयता की कल्पना ही नहीं की जा सकती।”16  
 सच्ची राष्ट्रीयता का विकास कब होगा? जब समतामूलक समाज बनेगा, जब जाति भेद न होगा। प्रेमचंद हिंदी के इस अर्थ में अकेले लेखक हैं जो जीवन भर जातिप्रथा का विरोध करते रहे। उनका सारा साहित्य जातिप्रथा के विरुद्ध सतत संघर्ष का साहित्य है। सामजिक समता के लिए संघर्ष करते हुए वे कभी आर्थिक गैर बराबरी को नहीं भूलते। इसीलिए वे ‘स्वराज्य’ के साथ-साथ ‘आर्थिक स्वराज्य’ का प्रश्न उठाते हैं। अपनी एक टिप्पणी ‘आर्थिक स्वराज्य’ (1933) में वे आर्थिक और राजनैतिक स्वराज्य दोनों को एक-दूसरे का पूरक मानते हुए दिखाई देते हैं। उसी वर्ष की अपनी एक दूसरी टिप्पणी ‘अविश्वास’ में वे यही बात और साफ़ तरीके से कहते हुए दिखाई देते हैं। वे लिखते हैं “अधिकांश भारतीय स्वराज्य इसलिए नहीं चाहते कि अपने देश के शासन में उनकी आवाज ही पहले सुनी जावे, पर स्वराज्य का अर्थ उनके लिए आर्थिक स्वराज्य होता है। अपने प्राकृतिक साधनों पर अपना अधिकार, अपनी प्राकृतिक उपजों पर अपना नियंत्रण, अपनी वस्तुओं का स्वच्छंद उपभोग और अपनी पैदावार पर अपनी इच्छानुसार मूल्य लेने का स्वत्व- यही उनकी सबसे बड़ी, सबसे पहली, सबसे उत्कृष्ट माँग है। यह माँग स्वराज्य का अंग नहीं, स्वराज इसी माँग का अंग है।”17 इस तरह प्रेमचंद का स्वराज्य, उनके भारत का सपना, आर्थिक आत्मनिर्भरता से अलग नहीं था। भारत में आज भी किसानों-मजदूरों और आदिवासियों की आर्थिक पर निर्भरता, उनके अपने ही साधनों पर अपने अधिकार न होने पर हिंदी के कितने लेखक चिंतित दिखाई देते हैं? प्रेमचंद स्वराज्य के साधन के रूप में सबसे पहला स्थान इसीलिए ‘स्वावलंबन’ को देते हैं।18 
यह सही है कि प्रेमचंद भारत के लिए जिस स्वराज्य का स्वप्न देखते थे, वह ‘आर्थिक स्वराज्य’ से भिन्न न था। लेकिन वे उसके आगे सोशलिज्म का समर्थन करते हुए भी देखे जाते हैं। अपनी एक टिप्पणी ‘रूस में समाचार पत्रों की उन्नति’ (1933)  में जहाँ वे सोवियत संघ की प्रशंसा करते हैं, वहीँ वे भारत के नेताओं में जवाहरलाल नेहरू की उनके समाजवादी विचारों के लिए खुलकर तारीफ़ करते हैं। नेहरू के एक व्याख्यान की चर्चा करते हुए लिखते हैं, जैसे नेहरू उनके ही मन की बात कह रहे हों। प्रेमचंद के शब्द हैं, “श्री जवाहर लाल नेहरू ने अपने व्याख्यानों में वैज्ञानिक साम्यवाद (साइंटिफिक सोशलिज्म) शब्द का प्रयोग किया। आपका अभिप्राय यह था कि वर्तमान समाज में मनुष्य-मनुष्य में जो भीषण असमानता है, वह दूर हो। यह ठीक नहीं है कि एक मनुष्य के पास अथाह धन भरा पड़ा हो और दूसरा मनुष्य भूखा मरता हो। समाज का इस प्रकार संगठन होना चाहिए जिससे कोई मनुष्य भूखा न रहने पावे, सबको पर्याप्त अन्न और वस्त्र मिले और सबको उन्नति करने का समान अवसर हो।”19 1930 के दशक में जवाहर लाल नेहरू की जो छवि जनता में थी वह प्रेमचंद के उक्त कथन में दिखती है। 
 प्रेमचंद की राष्ट्रीय भावना कभी अंध-राष्ट्रवाद का रूप ग्रहण नहीं करती। वे अपने राष्ट्र से प्रेम तो करते हैं, पर विश्वबंधुत्व की भावना को तिलांजलि देकर नहीं। वे राष्ट्रीय आन्दोलन के समर्थक हैं, लेकिन उस अंध-राष्ट्रवाद के समर्थक नहीं हैं जो विश्वबंधुत्व का शत्रु है। इसीलिए वे अंध-राष्ट्रवाद की आलोचना करते हैं और अंतरराष्ट्रीयता को भारत के पुरातन सन्देश ‘वसुधैव कुटुम्बकम्’ से जोड़कर देखते हैं। राष्ट्र की सेवा, उसकी स्वतंत्रता आदि सवालों को वे राष्ट्रीय भावना के अंतर्गत रखते हैं, लेकिन जब हमारा राष्ट्रीय हित पड़ोसी मुल्क के हित के खिलाफ हो जाए, दूसरे देशों के अस्तित्व के लिए खतरा हो जाए तो वह अंध-राष्ट्रवाद में बदल जाता है। प्रेमचंद ऐसी अन्ध-राष्ट्रीयता के विरोध में हैं। अपनी एक टिप्पणी ‘राष्ट्रीयता और अंतरराष्ट्रीयता’ (1933) में वे अंध-राष्ट्रीयता की तुलना मध्ययुगीन साम्प्रदायिकता से करते हैं। वे लिखते हैं: “राष्ट्रीयता वर्त्तमान युग का कोढ़ है, उसी तरह मध्यकालीन युग का कोढ़ साम्प्रदायिकता थी। नतीजा दोनों का एक है। साम्प्रदायिकता अपने घेरे के अन्दर पूर्ण शांति और सुख का राज्य स्थापित कर देना चाहती थी, मगर उस घेरे के बाहर जो संसार था उसको नोचने-खसोटने में उसे जरा भी मानसिक क्लेश न होता था। राष्ट्रीयता भी अपने अपरिमित क्षेत्र के अन्दर रामराज्य का आयोजन करती है। उस क्षेत्र के बाहर का संसार उसका शत्रु है। सारा संसार ऐसे ही राष्ट्रों या गिरोहों में बंटा हुआ है और सभी एक-दूसरे को हिंसात्मक संदेह की दृष्टि से देखते हैं और जब तक इसका अंत न होगा संसार में शांति का होना असंभव है। जागरुक आत्माएँ संसार में अंतरराष्ट्रीयता का प्रचार करना चाहती है और कर रही हैं। लेकिन राष्ट्रीयता के बंधन में जकड़ा हुआ संसार उन्हें ड्रीमर या शेखचिल्ली समझकर उनकी उपेक्षा करता है।”20 उसके आगे वे लिखते हैं: “इसमें तो कोई संदेह नहीं कि अंतरराष्ट्रीयता मानव संस्कृति और जीवन का बहुत ऊँचा आदर्श है और आदि से संसार के विचारकों ने इसी आदर्श का प्रतिपादन किया है। ‘वसुधैव कुटुम्बकम्’ इसी आदर्श का परिचायक है।”
 अंतरराष्ट्रीयता के सम्बन्ध में प्रेमचंद की यह धारणा अचानक नहीं बनती है। देश में जो स्वाधीनता संघर्ष चल रहा था उसका लक्ष्य निश्चित रूप से स्वतंत्रता की प्राप्ति था। लक्ष्य की प्राप्ति के लिए भारतवासियों में राष्ट्रीय भावना का जागरण आवश्यक था। किन्तु हमारे राष्ट्र नायकों ने दूसरे राष्ट्रों की कीमत पर अपने राष्ट्र की मुक्ति और उन्नति की कामना नहीं की। उसका प्रभाव भारतीय साहित्य और हिंदी साहित्य पर भी पड़ा। हिंदी साहित्य की चेतना स्वस्थ राष्ट्रीयता के साथ उदार अंतरराष्ट्रीयता से निर्मित हुई। प्रेमचंद की राष्ट्रीयता और अंतरराष्ट्रीयता उसी चेतना की उपज है। इस सम्बन्ध में प्रेमचंद के पूर्ववर्ती महावीर प्रसाद द्विवेदी के भी विचारों को देखना उचित होगा। राष्ट्र-प्रेम जब संकुचित होकर दूसरे देश के विरोध में चला जाए, इसको द्विवेदी जी ‘धूर्तों के भयंकर ढोंग’ के अंतर्गत रखते हुए अंतरराष्ट्रीयता को प्रमुखता से रेखांकित करते हैं और ‘वसुधैव कुटुम्बकम्’ के प्राचीन भारतीय आदर्श को आधुनिक सन्दर्भ में प्रासंगिक बताते हैं।21 द्विवेदी जी ने ठीक ही इस सम्बन्ध में रवीन्द्रनाथ ठाकुर को भी याद किया है जिनका चिंतन राष्ट्रीयता के साथ अंतरराष्ट्रीयता के विचारों को पुष्ट करता है। द्विवेदी जी अंधराष्ट्रीयता को यूरोप की देन मानते हैं और इसे भारत की स्वाभाविक वृत्ति नहीं मानते। कहने की जरुरत नहीं कि प्रेमचंद उसी धारा से निकले हिंदी चेतना के मुखर स्वर हैं। 
 एक तरफ काँग्रेस के नेतृत्व में राष्ट्रीय मुक्ति आन्दोलन चल रहा था तो दूसरी तरफ मुस्लिम लीग और हिन्दू महासभा की सांप्रदायिक राजनीति थी। प्रेमचंद लीग और सभा दोनों की सांप्रदायिक राजनीति का विरोध करते हैं और कांग्रेस के नेतृत्व में चलने वाले मुक्ति संघर्ष के पक्ष में खड़े रहते हैं। साम्प्रदायिकता को वे राष्ट्रीयता का शत्रु मानते हैं और सभी सम्प्रदायों के बीच मेल मुहब्बत का माहौल बनाने में अपनी सारी लेखकीय ऊर्जा झोंक देते हैं। वे धर्म के आधार पर आधुनिक राष्ट्र-राज्य की कल्पना के विरुद्ध हैं। अपनी एक टिप्पणी ‘पाकिस्तान की नयी उपज’ (1933) में वे न सिर्फ मुहम्मद इकबाल के धर्म के आधार पर पाकिस्तान के निर्माण संबंधी प्रस्ताव का विरोध करते हैं, बल्कि यह भी कहना नहीं भूलते कि धर्म राष्ट्र निर्माण का आधार नहीं हो सकता।”22 वे धर्म के ऊँचे भावों का सम्मान करते  हैं, उसे जीवन में उतारने की बात करते भी हैं, लेकिन उसके संकीर्ण अर्थ का हमेशा विरोध करते हैं। 
 सांप्रदायिक ढंगों पर, हिन्दू-मुस्लिम समस्याओं पर उन्होंने जितनी अधिक मात्रा में जोरदार टिप्पणियाँ लिखी है, उतनी और वैसी हिन्दी के किसी दूसरे लेखक ने शायद ही लिखी हों। सांप्रदायिकता को ‘विष’ समझनेवाले प्रेमचंद सांप्रदायिक राजनीति के पीछे की उस चतुराई को भी बेनकाब करते हैं जो संस्कृति का रूप धारण कर तरह-तरह से राष्ट्रीय जीवन में जहर घोलने का काम करती है। ‘सांप्रदायिकता और संस्कृति’(1934) नामक अपने प्रसिद्ध निबंध में उन्होंने साफ शब्दों में कहा है: “सांप्रदायिकता सदैव संस्कृति की दुहाई दिया करती है। उसे अपने असली रूप में निकलते शायद लज्जा आती है, इसलिए वह गधे की भांति जो सिंह की खाल ओढ़कर जंगल के जानवरों पर रौब जमाता फिरता था, संस्कृति का खोल ओढ़कर आती है। अब संसार में केवल एक संस्कृति है और वह है आर्थिक संस्कृति मगर हम आज भी हिन्दू और मुस्लिम संस्कृति का रोना रोए चले जाते हैं।“23 सांप्रदायिकता, अंधविश्वास आदि की आलोचना करते हुए वे आगे लिखते हैं: “ये जमाना सांप्रदायिक अभ्युदय का नहीं है। ये आर्थिक युग है और आज वही नीति सफल होगी जिससे जनता अपनी आर्थिक समस्याओं को हल कर सके, जिससे ये अंधविश्वास और ये धर्म के नाम पर किया गया पाखंड या नीति के नाम पर गरीबों को दुहने की कथा मिटाई जा सके।”24
  प्रेमचंद का एक प्रसिद्ध वाक्य कहावत की तरह हिंदी समाज में लोगों की जुबान पर है, जो उनकी कहानी ‘आहुति’ का है: “ऐसे स्वराज का आना व्यर्थ है जिसमें जॉन की जगह गोविंद गद्दी पर बैठ जाए।” इसीलिए ठीक ही रामविलास शर्मा ने उन्हें ‘स्वाधीनता-संग्राम के सैनिक साहित्यकार’25 के रूप में याद किया है|उनके मन में ‘स्वराज’ और ‘राष्ट्र’ का जो चित्र था वह बहुत साफ था। वे सिर्फ पात्र परिवर्तन के नहीं, व्यवस्था परिवर्तन के हिमायती थे। वे जाति-भेद के सवाल पर अम्बेडकर की तरह, संप्रदाय-भेद पर गाँधी की तरह और अमीरी-गरीबी के सवाल पर एक समाजवादी की तरह सोचते थे। जीवन, समाज और राष्ट्र के इतने व्यापक धरातल को छूने वाले वे हिंदी के सबसे बड़े लेखक थे। गाँधी के नेतृत्व में काँग्रेस ने प्रस्ताव पारित कर स्वराज के जिस रूप का संकल्प लिया था, उस पर प्रेमचंद ने अपनी एक टिप्पणी ‘काँग्रेस’ (1931) में लिखा: “अब काँग्रेस का ध्येय राष्ट्र के सामने है। वह गरीबों की संस्था है, गरीबों के हितों की रक्षा उसका प्रधान कर्तव्य है। उसके विधान में मजदूरों, किसानों और गरीबों के लिए वही स्थान है जो अन्य लोगों के लिए। वर्ग, जाति, वर्ण आदि के भेदों को उसने एकदम मिटा दिया है।”26 प्रेमचंद की नजर में ‘स्वराज्य’ के लिए लड़ने वाली काँग्रेस का यही रूप था! अफसोस यह है कि यह देखने के लिए वे जीवित न रहे ! ‘स्वराज्य’ तो आया किन्तु भारत वैसा राष्ट्र-राज्य नहीं बन सका जिसका वे सपना देखते थे| 
संदर्भ सूची:
1. Anavaratblogspot.in
2. विविध प्रसंग; भाग-1, पृष्ठ- 269 
3. वही, पृष्ठ- 268
4. वही, पृष्ठ- 259
5. वही
6. वही
7. भारत में अंग्रेजी राज और मार्क्सवाद, पृष्ठ- 275
8. वही, पृष्ठ- 264 
9. वही, पृष्ठ- 15
10. वही, पृष्ठ- 20 
11. विविध प्रसंग; भाग-2, पृष्ठ- 77-78 
12. वही, पृष्ठ- 98
13. वही, पृष्ठ- 92
14. वही, पृष्ठ- 476
15. वही, पृष्ठ- 470
16. वही, पृष्ठ- 471
17. वही, पृष्ठ- 152
18. वही, पृष्ठ- 272
19. वही, पृष्ठ- 222 
20. वही, पृष्ठ- 334 
21. महावीर प्रसाद द्विवेदी रचना संचयन; संपादक: भरत यायावर, ‘समस्या’ शीर्षक निबंध। 
22. विविध प्रसंग; भाग-2, पृष्ठ- 409-10 
23. Krantiswarblogspot.in
24. वही
25. प्रेमचंद और उनका युग ,पृष्ठ -122
26. वि.प्र.,भाग-2, पृष्ठ-75  
Add: 38/4, छात्र मार्ग,
दिल्ली विश्वविद्यालय                                                                                                                                              दिल्ली- 110007
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Thursday, 23 July 2020

कुँवर नारायण की रचना आत्मजयी आज के मनुष्य को बेहतर अभिव्यक्ति देने का एक बेहतर उदाहरण है : अरुणाभ सौरभ

कुँवर नारायण की आत्मजयी को प्रकाशित हुए पचास साल से ज्यादा हो चुके हैं। इन पचास सालों में कुँवर जी ने कई महत्त्वपूर्ण कृतियों से भारतीय भाषा का मान बढ़ाया है । आत्मजयी काव्य इनकी सर्जना का एक बेहतरीन उदाहरण है। जीवन और मृत्यु के अंतर्संबंधों की बुनियाद पर इस कविता की रचना हुई है। इसकी भूमिका में कुँवर जी लिखते हैं-

''नचिकेता की चिन्ता भी अमर जीवन की चिन्ता है। ‘अमर जीवन’ से तात्पर्य उन अमर जीवन-मूल्यों से है जो व्यक्ति-जगत् का अतिक्रमण करके सार्वकालिक और सार्वजनिक बन जाते हैं। नचिकेता इस असाधारण खोज के परिणामों के लिए तैयार है। वह अपने आपको
कुँवर नारायण
इस धोखे में नहीं रखता कि सत्य से उसे सामान्य अर्थों में सुख ही मिलेगा, लेकिन उसके बिना उसे किसी भी अर्थ में सन्तोष मिल सकेगा, इस बारे में उसे घातक सन्देह है। यम से-साक्षात् मृत्यु तक से-उसका हठ एक दृढ़ जिज्ञासु का हठ है जिसे कोई भी सांसारिक वरदान डिगा नहीं सकता।''

'आत्मजयी' में मृत्यु से साक्षात को कठोपनिषद की कथा को अपनी व्याख्या के साथ कुँवर जी ने प्रस्तुत किया है ।  नचिकेता अपने पिता की आज्ञा, 'मृत्य वे त्वा ददामीति' अर्थात मैं तुम्हें मृत्यु को देता हूँ, को शिरोधार्य करके यम के द्वार पर चला जाता है, जहाँ वह तीन दिन तक भूखा-प्यासा रहकर यमराज के घर लौटने की प्रतीक्षा करता है। उसकी इस साधना से प्रसन्न होकर यमराज उसे तीन वरदान माँगने की अनुमति देते हैं। नचिकेता इनमें से पहला वरदान यह माँगता है कि उसके पिता वाजश्रवा का क्रोध समाप्त हो जाए।

        ‘आत्मजयी’ ने ना सिर्फ़ हिन्दी अपितु भारतीय भाषाओं में अपनी एक खास उपस्थिति दर्ज़ की है और सर्वत्र प्रशंसित हुआ है। इसका मूल कथासूत्र कठोपनिषद् में नचिकेता के प्रसंग पर आधारित है।  एक आख्यान के पुराकथात्मक पक्ष को कवि ने आज के मनुष्य की जटिल मनःस्थितियों से जोड़ा है। आज के मनुष्य को बेहतर अभिव्यक्ति देने का एक बेहतर उदाहरण आत्मजयी है । जीवन के साथ-साथ उसकी अनश्वरता, जीने की उत्कट लालसा और मृत्यु की उदात्त भारतीय प्रेरणा इसके मूल में है । एक ऐसे सत्य से साक्षात कराती कविता है यह जिसमें मरणधर्मा व्यक्ति जीवन से बड़ा, या चिरस्थायी हो। यही मनुष्य को सांत्वना दे सकता है कि मर्त्य होते हुए भी वह किसी अमर अर्थ में जी सकता है। 

पिछली पूजाओं के ये फूटे मंगल-घट।
किसी धर्म-ग्रन्थ के
पृष्ठ-प्रकरण-शीर्षक-
सब अलग-अलग।
वक्ता चढ़ावे के लालच में
बाँच रहे शास्त्र-वचन,
ऊँघ रहे श्रोतागण !...

ओ मस्तक विराट,
इतना अभिमान रहे-
भ्रष्ट अभिषेकों को न दूँ मस्तक 
न दूँ मान..
इससे अच्छा
चुपचाप अर्पित हो जा सकूँ
दिगन्त प्रतीक्षाओं को....

                   मनुष्य जीवन से केवल कुछ पाने की ही आशा पर चलने वाला प्राणी होगा तो वह सिर्फ़ असहाय होगा । जब वह जीवन को कुछ दे सकने वाला  मनुष्य होगा तभी जीवन की समर्थता को समझेगा। फिर यह चिन्ता सहसा व्यर्थ हो जाएगी कि जीवन कितना असार है-उसकी मुख्य चिन्ता यह होगी कि वह जीवन को कितना सारपूर्ण बना सकता है। मुक्तिबोध की इन पंक्तियों की तरह- ''अब तलक क्या किया जीवन क्या जीया''। ‘आत्मजयी’ मूलतः मनुष्य की रचनात्मक सामर्थ्य में आस्था की पुनःप्राप्ति की कहानी है। यह कविता अपने साथ कुछ मूलवर्ती आस्थाओं को साथ लेकर चलती है ।  आज का मनुष्य केवल लघुमनाव नहीं है । वह जीवन की जटिलताओं और अर्थों से संवाद करता है। उसकी नियति जटिल है,परिणति भी जिसको समझते हुए इस कविता में जटिल नियति से गहरा काव्यात्मक आत्मसाक्षात्कार है।

''मेरे उपकार-मेरे नैवेद्य-
समृद्धियों को छूते हुए
अर्पित होते रहे जिस ईश्वर को
वह यदि अस्पष्ट भी हो
तो ये प्रार्थनाएँ सच्ची हैं...इन्हें
अपनी पवित्रताओं से ठुकराना मत,
चुपचाप विसर्जित हो जाने देना
      समय पर....सूर्य पर...''

कुँवर जी ने भूमिका में लिखा है-
''‘आत्मजयी’ में ली गयी समस्या नयी नहीं-उतनी ही पुरानी है (या फिर उतनी ही नयी) जितना जीवन और मृत्यु सम्बन्धी मनुष्य का अनुभव। इस अनुभव को पौराणिक सन्दर्भ में रखते समय यह चिन्ता बराबर रही कि कहीं हिन्दी की रूढ़ आध्यात्मिक शब्दावली अनुभव की सचाई पर इस तरह न हावी हो जाये कि ‘आत्मजयी’ को एक आधुनिक कृति के रूप में पहचानना ही कठिन हो। उपनिषद् यम, नचिकेता, आत्मा, मृत्यु, ब्रह्म...किसी भी नये कवि के लिए इन प्राचीन शब्दों की अश्वत्थ जड़ें, प्रेरणा शायद कम, चेतावनी अधिक होनी चाहिए। फिर भी मैंने यदि इस बीहड़ वन में प्रवेश करने का दुस्साहस किया, तो उसका एक कारण यह भी था कि मुझे ये शब्द वास्तव में उतने बीहड़ नहीं लगे जितने उन्हें ठीक से न समझने वाले व्याख्याकारों ने बना रखा है। उन्हें आधुनिक व्यक्ति की मानसिक अवस्थाओं के सन्दर्भ में भी जाँचा जा सकता है। ऐसी आशा ने भी इस ओर प्रेरित किया''

            आत्मजयी के मूल में आधुनिक मनुष्य का द्वन्द्वग्रस्त मन है ।विचारशील मनुष्य कहाँ तक जाकर सोच सकता है, इसकी पूरी परिणति कविता का ऊत्स है ।  कुंवर नारायण अपनी रचनाशीलता में इतिहास और मिथक के माध्यम से वर्तमान को देखने के लिए जाने जाते है। उनका रचना संसार इतना व्यापक एवं जटिल है कि उसे किसी खाँचों में नहीं बाँटकर देख सकते। मिथकों का सर्वाधिक सार्थक उपयोग आधुनिक हिन्दी कविता में कुँवर जी ही करते हैं । पर हाँ मिथकों के उपयोग केआर समय भी उनकी दृष्टि सर्वथा आधुनिक भारतीय बुद्धिजीवी की रहती है। आधुनिक हिन्दी कविता में इतनी वस्तु व्यंजकता भी अकेले कुँवर जी के पास है । इतिहास और पुराख्यान को कथातत्त्वों से बुनकर उन्होने सधी हुई कविता की है। बहुलार्थ तत्त्वों की प्रधानता इनकी रचनात्मक विशेषता है। एक खास बात कुँवर जी के पास है कि पुराख्यान और मिथकों कि कथावस्तु को उठाते समय वो सिर्फ़ भारतीय कथाख्यानों तक सीमीत ना रहकर ग्रीक की, लैटिन की ज़मीन से अपनी कथा को जोड़ते हैं। यही एक खास वजह है जिससे उनकी कविता कहीं से भी भटकती नहीं है। और अपनी अनथक यात्रा पूरी कर लेती है, जिसकी स्वाभाविक माँग कविता से थी । आत्मजयी की भूमिका में ही कुँवर जी लिखते हैं -

''यूनानी पुरा कथाओं की ही तरह भारतीय पुराकथाएँ भी आरम्भ में रहस्यवादी ढंग की नहीं थीं, मनुष्य और प्रकृति के बीच बड़े ही घनिष्ठ सम्बन्धों का रोचक और जीवन्त कथा—रूप थीं। लेकिन आज हिन्दू धर्म  और हिन्दू पौराणिक अतीत को अलग कर सकना लगभग असम्भव है; जबकि ग्रीक पुराकथाएँ ईसाई धर्म और यूरोपीय रहस्यवाद से लगभग अछूती रहीं। भारतीय पुराकथाओं पर परिवर्ती धार्मिक रंग इतना गहरा है कि उसे विशुद्ध मानवीय महत्त्व दे सकना  कठिन लगता है। ग्रीक पुराकथाओं में आदि-मानव की अन्तः प्रकृति का अधिक अरंजित रूप सुरक्षित मिलता है। इसीलिए कामू का ‘सिसीफ़स’ या जेम्स जॉयस का ‘यूलिसिस’ पुराकथात्मक चरित्र होते हुए भी धार्मिक चरित्र नहीं लगते—उन्हें ‘साहस’ जैसे नितान्त मानवीय गुण का प्रतीक मानकर चलने में उस प्रकार का धार्मिक व्यवधान बीच में नहीं आता, जैसा अवतारवाद के कारण भारतीय देवी-देवताओं के साथ आता है।'' 

                 आत्मजयी में रहस्यवाद के धुंधलकों को पाटकर शास्वत मूल्यों की तलाश की गयी है। यह एक विराट कविता है । विराटता को प्रमाणित करने हेतु इसमें कई अर्थ संदर्भ हैं। पुराख्यान होकर भी कुँवर जी की दृष्टि कहीं से भी धार्मिक नहीं लगती । धार्मिकता और रहस्यों के आवरण से इस कविता को मुक्त रखा गया है। दार्शनिक विवेचन की चरम परिणति तक कविता जाती है । दार्शनिक सूत्रों और प्रमेयों के बीच कई जगह पर कविता अबूझ भी हो जाती है । कविता की असफलता भी इसकी दार्शनिक विवेचना है। जीवन-मृत्यु और आज के मनुष्यों की स्वाभाविकता को बनाए रखने के संतुलन के बीच आत्मजयी कविता कई जगह पर असंतुलित भी हुई है। कई जगहों पर टूटती है, बिखरती है । फिर भी संभलकर कवि पुरा कथा को फिर से कविता की तरफ खींचता है । कुँवर जी के बहुधा अधीत मानस होने के कारण ही ऐसा संभव हुआ । 

 ओ मस्तक विराट,

अभी नहीं मुकुट और अलंकार।
अभी नहीं तिलक और राज्यभार।

तेजस्वी चिन्तित ललाट। दो मुझको
सदियों तपस्याओं में जी सकने की क्षमता।
पाऊँ कदाचित् वह इष्ट कभी
कोई अमरत्व जिसे
सम्मानित करते मानवता सम्मानित हो।

                            इतिहास और दार्शनिकता के स्थान पर कुँवर जी की मूल चिंता इस कविता में नचिकेता के मानवीय स्वरूप को स्थापित करना है। जिसे उन्होने इसकी भूमिका में स्पष्ट कर दिया है --''

नचिकेता का प्रसंग इस दृष्टि से मुझे विशेष उपयुक्त लगा कि वह मुख्यतः धार्मिक क्षेत्र का न होकर दार्शनिक क्षेत्र का ही रहा, जहाँ वैचारिक स्वतन्त्रता के लिए अधिक गुंजाइश है। दूसरे, नचिकेता के बाद में जो थोड़ा-बहुत साहित्य लिखा भी गया है उसकी ऐसी साश्वत परम्परा नहीं जो उसे फिर कोई नया साहित्यिक रूप देने में बाधक हो—न अब तक इस आख्यान के पुराकथात्मक पक्ष को ही इस प्रकार लिया गया है कि वह आज के मनुष्य की जटिल मनःस्थितियों को बेहतर अभिव्यक्ति दे सके। इसीलिए मैंने ‘आत्मजयी’ के धार्मिक या दाशर्निक पक्ष की विशेष चिन्ता न करके उन मानवीय अनुभवों पर अधिक दबाव डाला है जिनसे आज का मनुष्य भी गुज़र रहा है, और जिनका नचिकेता मुझे एक महत्त्वपूर्ण प्रतीक लगा।''

                               नचिकेता,यम और पिता वाजश्रवा ये तीन पात्र ही इस विराट कविता मुख्य पात्र हैं । जब कुँवर जी वाजश्रवा का चित्र खींचते हैं तो स्पष्ट हो जाता है -

"पिता, तुम भविष्य के अधिकारी नहीं, 
क्योंकि तुम ‘अपने’ हित के आगे नहीं सोच पा रहे,
न अपने ‘हित’ को ही अपने सुख के आगे।
तुम वर्तमान को संज्ञा देते हो, पर महत्त्व नहीं।
तुम्हारे पास जो है, उसे ही बार-बार पाते हो 
और सिद्ध नहीं कर पाते कि उसने 
तुम्हें सन्तुष्ट किया।
इसीलिए तुम्हारी देन से तुम्हारी ही तरह फिर पानेवाला तृप्त नहीं होता,
तुम्हारे पास जो है, उससे और अधिक चाहता है,
विश्वास नहीं करता कि तुम इतना ही दे सकते हो।

पिता, तुम भविष्य के अधिकारी नहीं, क्योंकि 
तुम्हारा वर्तमान जिस दिशा में मुड़ता है 
वहां कहीं एक भयानक शत्रु है जो तुम्हें मारकर तुम्हारे संचयों को तुम्हारे ही मार्ग में ही लूट लेता है, और तुम खाली हाथ लौट आते हो।''
               1965 में जब आत्मजयी छपकर आई तो हिन्दी आलोचना ने इस कृति के साथ स्वाभाविक न्याय नहीं किया । इस तरह से इसपर अस्तित्त्ववाद के मुहर लग गए कि फिर प्रगतिशील हिन्दी आलोचना को इधर देखने की जरूरत ही नहीं महसूस हुई । और फिर एक चूक हिन्दी आलोचना से हो गयी जिसकी भरपाई अब संभव हो सकती है । अपने हित के आगे,सुखों के आगे नचिकेता अपने  विवश पिता को देखता है । यम से मिलने जाना और वहाँ से वरदान  लेना अद्भुत घटना है । मृत्यु को भारतीय वाङ्ग्मय और धर्मशास्त्रों में परम सत्य माना है। कठोपनिषद का एक श्लोक है-

येयं प्रेते विचिकित्सा मनुष्येऽस्तीत्येके नायमस्तीति चैके।
एतद्विद्यामनुशिष्टस्त्वयाहं वराणामेष वरस्तृतीय: ॥२०॥

मृतक मनुष्य के संबंध में यह जो संशय है कि कोई कहते हैं कि यह आत्मा(मृत्यु के पश्चात) रहता है और कोई कहते हैं कि नहीं रहता, आपसे उपदेश पाकर मैं इसे जान लूं, यह वरों मे तीसरा वर है |

 कुँवर नारायण ने हिन्दी कविता के पाठकों में  नई तरह की सोच-समझ विकसित की। नचिकेता के पुराख्यान पर आधारित आत्मजयी को आधार बनाकर एक बार फिर उन्होने नयी कृति की सर्जना की। वह कृति  कुँवर नारायण की 2008 में आई, 'वाजश्रवा के बहाने', उसमें उन्होंने पिता वाजश्रवा के मन में जो उद्वेलन चलता रहा उसे अत्यधिक सात्विक शब्दावली में काव्यबद्ध किया है। इस की विशेषता
डॉ अरुणाभ सौरभ
यह है कि 'अमूर्त' को एक अत्यधिक सूक्ष्मता के साथ संवेदनात्मक शब्दावली के साथ नए उत्साह और जिजीविषा को वाणी दी है। जहाँ एक ओर आत्मजयी में कुँवर नारायण ने मृत्यु जैसे विषय का निर्वचन किया है, वहीं इसके ठीक विपरीत 'वाजश्रवा के बहाने' कृति में अपनी विधायक संवेदना के साथ जीवन के आलोक को रेखांकित किया है। आत्मजयी मृत्यु से मृत्यु को जीतने की वैचारिक कवायद है। इसकी भाषा में संस्कृत शब्दों की बहुलता है । पुरा कथा होने के कारण संसकृत शब्दों की बहुलता है। कविता का शिल्प इतना सुघड़ है कि क्षण-क्षण में कविता पाठकों को बांध कर रखती है । आत्मजयी हिन्दी के विरल की अनूठी कृति है । आधुनिक हिन्दी कविता की विशिष्टतम उपलब्धि है- आत्मजयी !

अरुणाभ सौरभ

चन्द्रकान्त देवताले की कविताएं

1

पत्थर की बेंच
....................
पत्थर की बेंच
जिस पर रोता हुआ बच्चा
बिस्कुट कुतरते चुप हो रहा है

जिस पर एक थका युवक
अपने कुचले हुए सपनों को सहला रहा है

जिस पर हाथों से आंखें ढांप
एक रिटायर्ड बूढ़ा भर दोपहरी सो रहा है

जिस पर वे दोनों
जिंदगी के सपने बुन रहे हैं

पत्थर की बेंच
जिस पर अंकित हैं आंसू, थकान
विश्राम और प्रेम की स्मृतियां

इस पत्थर की बेंच के लिए भी
शुरू हो सकता है किसी दिन
हत्याओं का सिलसिला
इसे उखाड़कर ले जाया
अथवा तोड़ा भी जा सकता है
पता नहीं सबसे पहले कौन आसीन हुआ होगा
इस पत्थर की बेंच पर।

2

नींद और कवि

रात पत्थरों को पीसती है
बिखरता रहता है पत्थरों की छाती में छिपा
पानी का उदास संगीत

और नींद है अंधेरे में बिल्ली की चमकती आंख

एक घुड़सवार रौंदता है सपनों को
कवि दर्ज करता है कविता में
कुत्तों के रुदन का प्राचीन शिलालेख
और घोड़े की नाल ठुक जाती है ज़ख्म के ऊपर

धीवर की फटी आंखों में लेटा समुद्र
करवट तक नहीं बदलता
पियक्कड़ों से बेखबर आसमान
देखता रहता है जलता हुआ पहाड़
एक अकेला आदमी खोदता रहता है अपने भीतर
किसी अज्ञात अकेली औरत का सन्नाटा

कवि बिल्ली को पुचकारना चाहता है
पर वह पीती रहती है शब्दों का दूध।

3

शब्दों की पवित्रता के बारे में

रोटी सेंकती पत्नी से हंसकर कहा मैंने
अगला फुलका बिलकुल चंद्रमा की तरह बेदाग हो तो जानूं

उसने याद दिलाया बेदाग नहीं होता कभी चंद्रमा

तो शब्दों की पवित्रता के बारे में सोचने लगा मैं
क्या शब्द रह सकते हैं प्रसन्न या उदास केवल अपने से

वह बोली चकोटी पर पड़ी कच्ची रोटी को दिखाते
यह है चंद्रमा-जैसी, दे दूं इसे क्या बिन आंच दिखाए ही

अवकाश में रहते हैं शब्द शब्दकोश में टंगे नंगे अस्थिपंजर
शायद यही है पवित्रता शब्दों की
अपने अनुभव से हम नष्ट करते हैं कौमार्य शब्दों का
तब वे दहकते हैं और साबित होते हैं प्यार और आक्रमण करने लायक

मैंने कहा सेंक दो रोटी तुम बुढ़िया कड़क चुंदड़ीवाली
नहीं चाहिए मुझको चन्द्रमा जैसी!

4

इतनी पत्थर रोशनी

बजते हुए पानी के पठार के
इस बाजू इच्छाओं का जंगल
दूध के पहाड़
दौड़ते खुशबुओं के घोड़े

तुम उस बाजू
कब तक चंद्रमा से
धोती रहोगी आंखें

मैं कब तक पीता रहूंगा
इतनी पत्थर रोशनी
यहां चुपचाप।




चन्द्रकान्त देवताले

Thursday, 9 July 2020

रश्मि भारद्वाज की कविता पति की प्रेमिका के नाम पर आलोचक प्रो. गोपेश्वर सिंह की टिप्पणी

पति की प्रेमिका के नाम
                         :  रश्मि भारद्वाज

सोचती हूँ कि तुम्हें एक घर तोड़ने का इल्ज़ाम दूँ
या कि उस पुरुष के कहीं रिक्त रह गए हृदय को भरने का श्रेय 
जो घर गृहस्थी के झमेलों में 
शायद मेरे प्रेम को ठीक से ग्रहण नहीं कर पाया था,
तुम्हारे और मेरे मध्य
एक-दूसरे से बंधने के कई कारण थे
हम उसी पुरुष से जुड़े थे
जो मुझे रिक्त कर 
तुममें ख़ुद को खाली कर रहा था

तुम्हारे पास जो आया था
वह मेरे प्रेम का शेष था
हमारे संबंध की बची रह गई
इच्छाओं का प्रेत,
यह कितना कठिन रहा होगा
कि तमाम समय मुझ सा नहीं होने की चेष्टा में
मैं मौज़ूद रहती होऊँगी तुम्हारे अंदर
और उसकी सुनाई कहानियों के साए
आ जाते होंगे तुम्हारे बिस्तर तक

तुम मुझसे अधिक आकर्षक
अधिक स्नेहिल 
अधिक गुणवती होने की अघोषित चेष्टा में
ख़ुद को खोती गई 
और मुझसे मेरा जब सब छिन गया
मैं ख़ुद को खोजने निकली

हमने जी भर कर एक-दूसरे को कोसा
एक-दूसरे के मरने की दुआएँ माँगी,
हमारे मध्य एक पुरुष के प्रेम का ही नहीं
घृणा का भी अटूट रिश्ता था

मेरे पास था 
एक प्रेम का अतीत
एक बीत गई उम्र
और एक बीतती जा रही देह के साथ
उसके प्रणय का प्रतीक
एक और जीवन 

तुम्हारे पास था
एक प्रेम का वर्तमान
यौवन का उन्माद
देह का समर्पण
अपने रूप का अभिमान
और मेरे लिए एक चुनौती

लेकिन अपना भविष्य तो हम दोनों ने
किसी और को सौंप रखा था

यह होता कि तुमने मेरा अतीत
और मैंने तुम्हारे वर्तमान का साझा दुख पढ़ा होता 
काश कि हमें दुखों ने भी बाँधा होता।   

                         

 यह कविता मैंने बार - बार पढ़ी और याद करने की कोशिश की कि इस विषय पर कोई और कविता हिन्दी में है या नहीं? है भी तो इतनी रचनात्मक संवेदना से वह भरी - पूरी भी है?
अनेक लोक गीतों- लोक कथाओं की याद आई। अनेक फ़िल्मों की याद आई। कुछ कहानियां, कुछ उपन्यासों की भी याद आई। पितृसत्तात्मक समाज में प्रेयसी के रूप- जाल में बंधे हुए पति याद आए। रोती - बिसुरती पत्नियां भी  याद आईं। प्रेमिका से अपने बच्चों,  अपने सुहाग की आंचल पसार कर भीख मांगती पत्नियों की भी याद आती रही। उन आधुनिक स्त्री चरित्रों की भी याद आई, जिन्होंने अपने ऐसे पतियों का त्याग कर दिया। लेकिन पति की प्रेमिका से इतने ऊंचे मानवीय धरातल पर संवाद करने वाली कोई पत्नी नहीं याद आई।
कोई शोर नहीं। कोई आरोप - प्रत्यारोप नहीं। बहुत सधे और सीधे अंदाज़ में पितृसत्तात्मक समाज में स्त्री की नियति को प्रश्नांकित करती यह कविता स्त्री - मन का और उसके दुखों का कितना बड़ा संसार समेटे हुए है! कितना कुछ कह जाने का कलात्मक सलीका है इसमें !
 'मैंने अपनी मां को जन्म दिया है' संग्रह को पढ़ते हुए इस या इस जैसी कई कविताएं अपनी नई भंगिमा के कारण पाठक को बार - बार रोक लेती हैं।शुक्रिया रश्मि भारद्वाज

Monday, 29 June 2020

अरमान आनंद की कविता कॉमरेड दीमक

अरे यार कॉमरेड दीमक
तुम तो अव्वल दर्जे के क्रान्तिकामी हो
पता चला है जिस कुर्सी पर जमते हो उसे ही खा जाते
और सबसे पहले पैर फिर हत्था
और तो और
कुर्सी जिस मेज की ओट में इतराती है
उसका भी भोज उड़ाते हो
यार खा जाते हो
खाते जाते हो
पहले अपनी कुर्सी
फिर दूसरे की फिर तीसरे की...
हद है मतलब
यार कॉमरेड
कॉमरेड दीमक

जानते हो
हर कॉमरेड को दीमक होना था
मगर पता है
सब
मकड़ी हो गए

कुर्सी के पौव्वों के बीच
पहले अपना घर बनाते हैं
फिर धीरे धीरे
शिकार फँसाते हैं



Monday, 22 June 2020

मनीष राय की कविता बनारस

एक वहम
पाल रखा था मैंने
बनारस के बारे मे

वहम ये 
कि ज़िन्दगी 
जैसे भीड़ भाड़ 
सँकरी गलियो
और गालियों में ही पनपती है।

वहम ये 
कि प्रेम 
बनारस का
रंग नहीं आत्मा है
जिसका अंश
समा जाता है
हर बनारसी में।

वहम ये
कि बनारस 
दिल्ली नहीं है
जहाँ 
बेतुकी सी ज़िन्दगी
दौड़ती रहती है
मीलों, अविरल
सड़कें लंबी 
चौड़ी
विस्तृत 
पर हृदय
छोटे संकुचित
जैसे धड़कना
कोई परियोजना हो।

पर 
ये वहम हुआ कैसे?
मैं तो सतर्क रहता हूँ
सिवाय उस पल के
जब चैतन्य पर
किसी शराब सी
चढ़ जाती थी तुम।

पर नहीं
बनारस भी दिल्ली है
ये भी छीनता है
प्रेम यहाँ भी
रंग है 
जो बदल जाता है
नियमित अंतराल पर

बनारस 
इक्षाओं का
अस्सी है तो
प्रेम का 
मणिकर्णिका भी।

बनारस नगरी है 
शिव की 
और 
शव की भी।

मनीष

Wednesday, 17 June 2020

अरमान आनंद की कविता मेरे शहर का आसमान

मेरे शहर का आसमान तेरे शहर के आसमान से बिलकुल अलग है
फिर भी मेरी शामों में बसती है
शाम तेरी
डूबते सूरज की लाली ठहरी है
अब भी एक कोने भर आसमान में
जैसे मुस्कुराते मुस्कुराते थक गया हो कोई
एक बात तो साफ़ है
अब काम का बोझ सिर्फ बाजुओं की मांसपेशियों तक नहीं रह गया है
तुम लौटती होगी फुटपाथ से
कई नजरों से होकर 
मैं किसी बीयर की दूकान की पिछली गली में तब्दील हो रहा हूँ
शहर की सारी टैक्सियां हमारे ठिकानों को जानती हैं
और सारे ठिकाने 
सिर्फ महीने की एक तारीख का इंतज़ार करते हैं
इन दो शहरों के दरम्यान
हमारा प्यार
अब तुम्हारे किचन में लगा हुआ एम् सी डी का नल है
जिसमें पानी की जगह हवा निकलती है ....

Friday, 24 April 2020

कविता - प्रेमिकाओं को ब्याह नहीं करना चाहिए: आकांक्षा अनन्या

प्रेमिकाओं को ब्याह नहीं करना चाहिए

स्त्री ने चाहा हमेशा प्रेमिका बने रहना
वो ब्याह के बाद भी बनीं रहना चाहती थीं प्रेमिका
और खोजती रहतीं थीं पति में प्रेमियों वाला चेहरा
चाहती रहीं कि निपट के हर काम से
उन्हें मिल जाये घर का एक कोना
जहाँ बैठ कर बे बतियाते रहें थोड़ा ही छुप कर सबसे

वो जब माँ बनी
तब भी लड़ैती रहना चाहतीं थीं अपने पति की
सुला कर बच्चे को ले लेती थी करवट उसकी ओर
और रख कर उसकी बाँह में अपना सिर सो जाना चाहती थीं
वो चाहती रहीं हमेशा कि
काम से आते जाते उसका पति
उसके बच्चे के साथ साथ उसके सिर पर भी हाथ फेरता चले
वे चाहती रहीं अपने माथे पर एक चुप्पा चुम्बन बचाकर नज़र से सबकी

स्त्री बंधीं है ऐसे कई रिश्तों से 
निभा रही है ऐसे कई रिश्ते
फिर भी बचा लेना चाहती है समय प्रेम के लिए

इसी भनक से
वे रोक दी गईं
वे टोक दी गईं
वे तोड़ दी गईं
उनके अन्दर से खत्म हो गयी प्रेमिका

स्त्री के अन्दर से जब खत्म हो जाता प्रेम
वे खण्डित मूर्ति हो जाती हैं ।

आकाँक्षा अनन्या

Monday, 25 November 2019

समय सत्ता और कवि : एक (मनोज कुमार झा की कविताएं)

जब मोहम्मद रफ़ी मरे तो बारिश हुई थी
संदर्भ : #मनोज_कुमार_झा_की_कविताएँ
शहंशाह आलम

मनोज कुमार झा की कविता हवा का वह झोंका है, जो भीषण गर्मी के दिन सहसा आता है और पसीने से चिपचिप बदन को थोड़े समय के लिए राहत देकर खेत, पगडंडी, दरख़्त, दरिया के रास्ते आगे बढ़ जाता है। नामवर सिंह ने भी इनकी कविता को लेकर कहा है कि इनकी कविताएँ हवा के नए झोंके की तरह हैं। नामवर जी ने सही लिखा। मनोज कुमार झा की कविता में हवा के जिस झोंके की बात यहाँ पर चल रही है, वह झोंका जब-जब आता है
मनोज कुमार झा
पुनर्नवा होकर आता है। मनोज कुमार झा की कविता में व्यक्त शब्द आदमी के लिए यही काम करते हैं। यानी इनकी कविता आदमी को राहत पहुँचती है। आज की तारीख़ में एक आदमी की हालत कैसी है, यह क़िस्सा किसी दहलाने वाले क़िस्से से कम नहीं है। तभी दुनिया भर के आदमियों के सड़कों पर निकलने की ख़बरें रोज़ आती रहती हैं। सड़कों पर आदमी के लिए कड़ी धूप है और किसी साये का इंतज़ाम तक नहीं है। ऐसे में, मनोज कुमार झा की कविता एक सायेदार पेड़ की तरह आदमी को राहत पहुँचाती है। कविता का असल काम यही तो है। बहुत सारे लोग ऐसे भी हैं, जो पल भर सो नहीं पाते, ग़ुरबत की वजहकर। इनकी कविता उनकी आँखों को नींद देती आई है।
     मनोज कुमार झा की कविता ‘देशज’ कविता है और यह कवि ‘देशज्ञ’ कवि है। यानी इनकी कविता बोलचाल की भाषा से स्वतः उत्पन्न कविता तो है ही, कवि आदमी की रीति, नीति और संस्कृति से भी परिचित है। यह देशजता और यह देशज्ञता इस कवि का अपना गुण है। अपना मूल पाठ है। संभवतः इन्हीं कारणों से यह कवि अतीत से अधिक वर्तमान में जीता है। कवि का अपना वर्तमान वही है, जो देश के आम नागरिक का वर्तमान है, ‘ठीक कह रहे अनवर भाई / जब मोहम्मद रफ़ी मरे तो बारिश हुई थी / अनवर भाई, ठीक कह रहे / जब आपके भाई रोशन क़व्वाल मरे तब भी बारिश हुई थी / मानता हूँ अनवर भाई / आपके अब्बू मोहम्मद रफ़ी की नक़ल नहीं करते थे / उनकी आवाज़ निकालते थे / मगर अबकि बारिश वैसी बारिश नहीं / घुला हुआ है अम्ल / घुला हुआ है रक्त / चलो अनवर चलो कोई चौड़े पाट वाली नदी ढूँढ़ो / जिसमें धुल सके इस बारिश की बूँदें।’
     अपने शब्द की मार्फ़त अंतिम आदमी के लिए जितना कुछ किया जा सकता है, हर कवि करता है। मनोज कुमार झा अपने शब्द की मार्फ़त यही करते हैं। कारण कि जो अंतिम आदमी है, उसकी बोलती बंद है। हर अंतिम आदमी ‘कदाचित् अपूर्ण’ है। अब जिन कदाचित् कारणों से सबकी आवाज़ अपूर्ण है, सबकी बोलती बंद है, सबकी हालत पतली है, ये सारी वजहें घृणा से भरी हुई हैं। घृणित इस कारण हैं कि सत्ताएँ हर अंतिम आदमी के साथ आखेट करती हैं। यह सच ही तो है, अब वह वक़्त गया, जब कोई राजा अपने राज्य के अंतिम आदमी के दुःख को समझने वेश बदलकर रात को निकला करता था। अब का राजा अपने असली रूप में अंतिम आदमी का शिकार करने निकलता है। यानी अब सत्ताधीश बस कुशल आखेटक भर बनकर है, शांत दिनों की हर संभावना को नष्ट करने वाला भर रह गया है, ‘उखड़ी-उखड़ी लगती है रात की साँस / बढ़ता जाता प्रकाश का भार / तेज़ उठता मथने वाला शोर / तो क्या फट जाएगा एक दिन रात का शहद / और नाराज़ सूरज कहेगा अब नहीं लौटूँगा / रात ही देती थी लाल रूमाल / जिसको हिलाते बीतते थे प्रात / अब भोगो अपना प्रकाश अपना अँधकार।’ मनोज कुमार झा अपनी कविता में जिस अंदेशे से अकसर घिरे दिखाई देते रहे हैं, वह अंदेशा एक जागरूक कवि का अंदेशा है। यह अंदेशा हर कवि में बार-बार आता रहता है। वह कवि जिस भी भाषा का कवि है, यह अंदेशा यानी यह पूर्वाभास उसको परेशान करता रहता है कि उसके घर के बाहर जो सत्ताधीश गली में छिपकर उसकी टोह में लगा हुआ है, वह उसको न मालूम किस जुर्म में फँसाकर उसका शिकार कर लेगा। ऐसे टोही और हरजाई सत्ताधीशों से भरे समय में भी मनोज कुमार झा अपने ‘अनवर भाई’ जैसे पड़ोसियों को आज के शिकारी सत्ताधीश से बचाना चाहते हैं। कवि के बचाव का यह तरीक़ा हर आदमी के लिए माक़ूल है और कविता के लिए मुनासिब भी, ‘क्या तुम्हें शर्म नहीं आती / क्या तुमने दूध के लिए रोते बच्चों को देखा है / अपनी माँ से पूछ लो / नहीं, तुमसे छूट गई होगी वो भाषा / जिसमें माँओं से बात की जाती है / क्या तुमने तेज़ाब की शीशी को / बच्चों की पहुँच से दूर किया है कभी / अपनी पत्नी से पूछ लो।’
     मनोज कुमार झा की कविता ऊपर-ऊपर से जितनी शांत दिखाई देती है, अंदर से आपको इतनी बेचैन कर देती है कि आप ज़िंदगी की त्रासदी को परत-दर-परत समझ पाते हैं। शर्त यही है कि इस कवि की कविता वाली नदी में आपको डुबकी लगानी होगी। शर्त यह भी है कि आपको नदी में गोता लगाना आता हो। इनकी कविता का स्वर आदमी को प्रेम से बाँधे रखना ज़रूर है, परंतु जो सत्ताधीश रेड कार्पेट पर चलते हैं, उनकी मुख़ालफ़त की शर्त पर मनोज कुमार झा आपसे प्रेम करते हैं। वजह साफ़ है, सत्ता के लोग आपके मुख़ालिफ़ ही तो खड़े दिखाई देते रहे हैं। मनोज कुमार झा की असल कारीगरी यही है कि लोगों के सत्तावादी प्यार को ख़त्म करना चाहते हैं, ‘तुम नहीं तो यहाँ अब मेरे हाथ नहीं / एक जोड़े दास्तानें हैं / पैर भी नहीं / एक जोड़ी जूते की / देह भी नहीं / मात्र बाँस का एक बिजूका / जिसमें रक्त और हवाएँ घूम रही हैं।’ कवि आपसे यह कहना चाहता है कि पक्षियों और जंतुओं को डराने के लिए खेत में उलटी हाँडी का सिर बनाकर खड़ा किया गया जो पुतला होता है न, वही अब लोगबाग होते जा रहे हैं। लेकिन वह पुतला तो महज़ धोखा और भुलावा होता है न। फिर आप ऐसे क्यों होते जा रहे हैं? कवि को मालूम है, आज के सत्ताधीश अपनी जनता को किसी बिजूका से ज़्यादा नहीं मानते। हालत यह हो गई है कि देश में जनता को नोटबंदी के बाद अब एक किलो प्याज़ के लिए पंक्ति में खड़ा कराया जा रहा है और तुर्रमख़ाँ सत्ताधीश विदेश की यात्राएँ कर-करके मौज मना रहा है, ‘तुमने परमाणु बम बनाया / चाँद को छुआ / वह दस दिन का बच्चा डूब रहा पानी में / वह काग़ज़ का टुकड़ा नहीं / जिसे तुम फेंक देते हो बिना दस्तख़त के / शिशु-शरीर वह / बसती है जिसमें सभ्यता की सुगंध / तुम इस दस दिन के बच्चे को नहीं बचा सकते / तुम्हें शर्म नहीं आती।’
     यह सही है कि सत्ताधीशों को अब शर्म नहीं आती। शर्म आती होती तो वे जो दिन-रात संविधान की धज्जियाँ यहाँ-वहाँ उड़ाते हुए दनदनाते फिर रहे हैं, देश में संविधान दिवस मनाए जाने की बातें नहीं करते। वास्तव में, देश की जनता ऐसे सत्ताधीशों को अपना मौन-समर्थन जब तक देती रहेगी, वे देश की जनता को प्याज़ क्या, नमक तक के लिए पंक्ति में खड़ा करवाते रहेंगे। चेतना सत्ताधीशों को नहीं, हमको है। ग़म यही है कि हम चेतने से अच्छा किसी मंदिर में जाकर घंटी बजा आना मान रहे हैं, ‘यह युद्ध इतना विषम / नोचे इतने पंख / लूटते रहे मेरे दिन की परछाइयाँ / कुतरते रहे मेरे रात की पंखुड़ियाँ / चितकबरा लहू थूकता यह अँधकार / फिर भी छूटा वो अर्जित कोना निपट अकेला / जहाँ बसे हैं विकट दुर्गुण मेरे ख़ास।’ मनोज कुमार झा धब्बेदार, लाल-काले दाग़ोंवाली और बेसुरी इस सदी के बारे में जो भी कहते हैं, यथार्थ कहते हैं। तभी इनकी कविता यथार्थ की कविता है। यह कवि ऐसा है कि अपने दुःख में सबको शामिल करने से बचता दिखाई देता है। इस कवि को मालूम है, दुखी तो सभी जन हैं, फिर अपना दुःख सुनाकर दुखी जनों को और अधिक दुखी काहे किया जाए, ‘मैं काँपता अपने निश्चय के भीतर कि मैं तो रोऊँगा।’ आज का माहौल भी ऐसा है कि किसी रोते हुए आदमी के काँधे पर भला प्यार से कौन हाथ धरता है। हमदर्द आदमियों की कमी जो होती जा रही है। साथ ही, आदमी के अंदर से हमदर्दी ख़त्म भी होती जा रही है, ‘मगर मेरे पास सिर्फ़ देह / क्या इसे निर्वस्त्र करके गलियों में घुमाऊँ / तो दिखेगा उदासी का चेहरा।’ एक कवि आपको चेता भर ही न सकता है कि आप अपनी दर्दमंदी, अपना ख़ुलूस, अपनी सहानुभूति खो रहे हैं, तभी अब आप दूसरे के दुःख से दुखी होने का भाव अपने अंदर नहीं महसूस कर पाते, ‘उधर से खाँसी उठती थी / जान जाता था कि पिता जगे हैं / इधर मैं कविताओं का काग़ज़ फाड़ता था / जान जाते थे कि लड़का जगा है / इस तरह एक रिश्ता बनता था / लड़ाइयों की हार की तरफ़ लुढ़कते हुए।’
     मनोज कुमार झा की कविता का जो स्वर है, यही है कि इनकी कविता आदमी के अतीत और वर्तमान, दोनों को साथ लेकर चलती है। आदमी का अतीत अगर-मगर करता हुआ पूर्णता के साथ बीता है तो उसका वर्तमान कदाचित् अपूर्ण रह गया है। लेकिन कवि की श्रद्धा आदमी के भविष्य को लेकर विश्वास से भरी है। यही वजह है कि इनकी कविता आदमी को अधूरा आदमी नहीं मानती - पूर्ण, सुंदर और भव्य मानती है। इनकी कविता आदमी से बातचीत की कविता है। कहीं कोई कमी है भी तो कवि का ग़ुस्सा सातवें आसमान तक नहीं जाता है। कारण कि ‘तथापि जीवन’ एक कवि का ही जीवन तो है। मनोज कुमार झा ‘हम तक जो विचार’ पहुँचाना चाहते है, यही पहुँचाना चाहते हैं, ‘दुःख तो पुराना गुइयाँ है / जैसे राख की साथी आग / मगर चुंबक का एक सिल बनाया हम लोगों ने / और उस पर खीरा रखा / जिसे काटने को लोहे के चाक़ू से हुनर क़बूल किया।’
     मनोज कुमार झा उम्मीदों के कवि हैं। इनको नाउम्मीदी हर तरफ़ से घेरती भी है तो नाउम्मीदी का घेरा इनको तोड़ना बख़ूबी आता है। नाउम्मीदी के घेरे को तोड़ने का यह काम भी यह कवि विनम्रतापूर्वक करता है। संभव है, इनकी इस विनम्रता और इनके इस विनयन के लिए कोई ‘बहुत डरा हुआ कवि’ कहकर ताने मारे, लेकिन यह ग़लत होगा। मानवता के बचाव की लड़ाई मुहब्बत से भी लड़ी जाती रही है। मनोज कुमार झा ऐसे ही कवियों में हैं। इनकी कविता को एक नए फ़्रेम में देखेंगे तो लगेगा कि पूरी तरह सहज रहकर कोई कवि किस प्रकार आदमी के पक्ष का संघर्ष जीतता है, ‘नहीं दिख रहा हरसिंगार का पेड़ / नहीं दिख रहा गेंदा जिसे सुबह में छुआ था / इन अँधियारों में मुझे क्यों लग रहा कोई नाव चला रहा है।’ दरअसल मनोज कुमार झा का कवि उस नाविक की भूमिका में है, जो नाविक चाहे समुद्र में जितनी आँधियाँ आएँ, जितनी परेशानियाँ आएँ, जितनी हैरानियाँ आएँ, अपनी कश्ती को किनारे लाकर ही दम लेता है। यह इनके एक सतर्क कवि होने का भी परिचायक है।
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Sunday, 17 November 2019

कविता : कम्बखत ये गरीब

ये गरीबों के बच्चे
कम्बखत

बिना टैक्स दिए
पढ़ लेते हैं 
देश के बड़े संस्थानों में

फीस बढ़ाओ और 
संस्थानों को इनकी पहुंच से बाहर कर दो

बिना टैक्स दिए लेते हैं
देश की हवा में सांस
और
टैक्स पेयर के हिस्से की भी हवा खींच लेते हैं

सायकिल से मर्सिडीज की सड़क जाम कर देते हैं

देश की रफ्तार बढ़ाने के लिए
इन गरीब पिल्लों को 
मारो
धक्के दो
और विकास रथ से नीचे उतार दो

Saturday, 16 November 2019

कविता: प्रेम जो कभी बासी नहीं होता

बहुत बार दुहराने पर जो बासी नही होता
वह प्रेम ही है
बाक़ी
सब कुछ बासी हो जाता है
स्वर्ग
स्वाद
देह
दान
ज्ञान
जीवन
दुनिया- जहान

Thursday, 14 November 2019

एक विक्षिप्त वैज्ञानिक का अवसान : प्रेमकुमार मणि

एक विक्षिप्त वैज्ञानिक का अवसान : प्रेमकुमार मणि 

 किंवदंती पुरुष गणितज्ञ वशिष्ठनारायण  सिंह आज 14  नवंबर को इस दुनिया को अलविदा कह गए . यूँ भी उनका पार्थिव  शरीर ही शेष था . चेतना तो आज से 45   साल पहले ही लोप हो गयी थी . दरअसल उनका वास्तविक अवसान उसी रोज ,यानि आज से 45 साल पहले जनवरी 1974 में हो चुका था .
  
     मैं जब हाई स्कूल में था ,तब वशिष्ठ जी का नाम पहली दफा  सुना था . हमारे स्कूल में शिक्षा विभाग के रिजनल डायरेक्टर आये थे . 1967 -68 का साल होगा .  अपने भाषण के दौरान नेतरहाट स्कूल के औचित्य पर बोलते हुए उन्होंने कहा था कि वैसा स्कूल हर जिले में होना चाहिए . इसी क्रम में उन्होंने वशिष्ठनारायण की चर्चा की और कहा कि यदि एक वशिष्ठ उस स्कूल से  निकल गया तो नेतरहाट का  बनना सार्थक हो गया . हमारे गाँव-घर  के सत्यदेव प्रसाद जी ,जो अब दिवंगत हैं ,नेतरहाट स्कूल में वशिष्ठ नारायण से एक बैच सीनियर थे . हायर सेकेंडरी के पहले बैच में बिहार भर  में उन्होंने भी प्रथम स्थान प्राप्त किया था . मैंने  सत्यदेव भैया से वशिष्ठनारायण के बारे में पूछा . वह ,यानि सत्यदेव भैया उनके खूब प्रशंसक थे . उनकी विलक्षणता की जानकारी उनसे भी हुई थी . बाद में सुना कि वशिष्ठनारायण जी विक्षिप्त हो गए . लेकिन लीजेंड तो वह छात्रजीवन में ही बन चुके थे . आज उस करुण- कथा का अंत हो गया . आज मेरे हिसाब से श्रद्धांजलि का नहीं ,संकल्प  का समय है . हम इस पूरे हादसे को एक गंभीर  सामाजिक प्रश्न के रूप में क्यों नहीं देखते ? 

जो थोड़ी बहुत जानकारी मुझे मिली है ,उसके अनुसार 1942 में जन्मे वशिष्ठजी का विवाह जुलाई 1973 में हुआ और जनवरी 1974 में वह विक्षिप्त हो गए . मैं उन लोगों में नहीं हूँ जो सब कुछ सरकार पर छोड़ते हैं . यह सामाजिक समस्या है ,जिस पर सबको मिल कर सोचना है . हमने अपनी प्रतिभाओं को सहेजना नहीं सीखा है . शिक्षा और ज्ञान के प्रति हमारी रूचि गलीज़ किस्म की है . संभव है उनपर जोर हो कि इतनी प्रतिभा है तो भारतीय प्रशासनिक सेवा में क्यों नहीं जाते . क्योंकि हमारे कुंठित और गुलाम समाज में अफसर बनना प्रतिभा की पहली पहचान होती है . देखता हूँ प्रतिभाशाली  इंजीनियर  और डॉक्टर भी प्रशासनिक सेवाओं में तेजी से जा रहे हैं . इस पर पाबंदी लगाने की कोई व्यवस्था हमारे यहां नहीं है . शिक्षा का हाल और संस्कार कितना बुरा है ,कहना मुश्किल है . शिक्षा का समाजशास्त्र यही है कि बड़े लोग वर्चस्व हासिल करने केलिए उच्च शिक्षा हासिल करते हैं और मिहनतक़श तबका मुक्ति हेतु इससे जुड़ते हैं . वशिष्ठ नारायण शिक्षा के ज्ञान मार्ग से  जुड़ गए थे . अपनी साधना का इस्तेमाल वह सुपर थर्टी खोल कर पैसे और रुतबा हासिल करने में कर सकते थे . प्रशासनिक सेवाओं से जुड़ कर वह सत्ता की मलाई में हिस्सेदार हो  सकते थे . लेकिन वह तो गणितीय सूत्रों को सुलझा कर ज्ञान की वह चाबी ढूँढ रहे थे ,जिससे प्रकृति के रहस्यों पर से पर्दा हटाना संभव होता . वह वैज्ञानिक थे . हमने वैज्ञानिकों का सम्मान करना नहीं सीखा है . अधिक से अधिक टेक्नोक्रेट तक पहुँच पाते हैं ,जो आज की साइंस -प्रधान दुनिया के अफसर ही होते हैं . ऐसे समाज में वशिष्ठ नारायण विक्षिप्त नहीं हों तो क्या हों ? हमारे साहित्य की दुनिया में निराला और मुक्तिबोध अंततः इसी अवस्था को प्राप्त हुए थे . एक लोभी , काहिल और वर्चस्व -पसंद समाज अफसर ,नेता और ठेकेदार ही पैदा कर सकता है . उसे वैज्ञानिकों -विशेषज्ञों की जरुरत ही नहीं  होती . यहां पंडित वही  होता है ,जो गाल बजाते हैं . 

और ऐसे में गुस्से से मन खीज उठता है ,जब लोग सरकार को दोष देते हुए कायराना रुदन कर रहे हैं कि हमारे महान वैज्ञानिक के शव को सरकार एम्बुलेंस भी मुहैय्या नहीं करा सकी . खैर ,आज की गमगीन घड़ी में हम यदि यह संकल्प लें कि अपने समाज में हम किसी दूसरे वशिष्ठ को विक्षिप्त नहीं होने देंगे ,तब यह उस गणितज्ञ के प्रति सच्ची श्रद्धांजलि होगी . लेकिन मैं जानता हूँ ऐसा  कुछ नहीं होगा . बस दो चार रोज में हम उन्हें भूल जायेंगे . हमारी जिद है कि  हम नहीं सुधरेंगें . जात - पात और सामंती ख्यालों के कीचड़ में लोटम -लोट होने में जो आनंद है ,वह अन्यत्र कहाँ  है ?

Monday, 11 November 2019

सवाल :कविता

सवाल

सवाल
महफ़िल में किसी बच्चे की तरह
बार बार
उठ खड़ा होता है
लोग नाच के नशे में चिल्लाते हैं

बैठ जाओ
बैठ जाओ

अरमान

Friday, 1 November 2019

तिब्बत की स्वाधीनता का स्वप्न है मेरा भविष्य - तेन्ज़िन च़ुन्डू

तिब्बत की स्वाधीनता का स्वप्न है मेरा भविष्य  - तेन्ज़िन  च़ुन्डू
तेन्ज़िन च़ुन्डू निर्वासित तिब्बतियों की भू- राजनीतिक जनांकाक्षाओं की न केवल साहित्यिक आवाज़ है,बल्कि वह एक जांबाज़ क्रांतिकारी एक्टिविस्ट के रूप में ज़्यादा जाने और सराहे जाते हैं ।
 
 तिब्बती कवि एक्टिविस्ट तेन्ज़िन  च़ुन्डू और हिन्दी के कवि अग्निशेखर
धर्मशाला में उनकी पहचान माथे पर बंधी लाल पट्टी वाले तिब्बती एक्टिविस्ट के रूप में है।सन् 1959 में तिब्बत से करीब एक लाख लोगों के निर्वासित होने के करीब डेढ़ दशक के बाद तेन्ज़िन च़ंडू  का जन्म सड़क  मज़दूरी करने वाले शरणार्थी माता -पिता के यहाँ मनाली में हुआ। देश के अलग अलग राज्यों में शिक्षा पाई।

तेन्ज़िन च़ुन्डू एक अत्यंत संवेदनशील, प्रश्नाकुल कवि तो हैं हीं जो निर्वासन की चेतना से ओतप्रोत तिब्बत के प्रश्न पर बड़े बड़े जोखिम उठाते रहे हैं । चीन की तानाशाही और छिन चुके तिब्बत में जारी उसकी विध्वंसक कार्यकलाप  का विरोध करने वालों में वह अग्रणी हैं ।
आम तिब्बती लामाओं की तरह उनके चेहरे पर अवसाद और सौम्य खामेशी नहीं  बल्कि एक मुखर बांकपन है। तिब्बत उनके रोम रोम में है ,उनकी आंखों में है। वह तिब्बत के बारे में देश में जगह जगह जाकर जागरूकता के अभियान में लगे रहते हैं ।अंग्रेज़ी में लिखने वाले तेन्ज़िन च़ंडू की चार पुस्तकें हैं ।
मैंने धर्मशाला जाकर उनके जीवन, उनके स्वप्न, संघर्ष और उनकी साहित्यिक यात्रा के कई पहलुओं पर एक विस्तृत बातचीत की ।
अग्निशेखर  : आपसे यदि अपना परिचय देने को कहें तो क्या कहेंगे अपने बारे में ?
●तेन्ज़िन च़ुन्डू : मैं जवाब में अपनी कविता 'शरणार्थी ' का एक अंश सुनाता हूँ आपको।
       जब मेरा जन्म  हुआ
       कहा मेरी माँ ने
       एक शरणार्थी हो तुम
       बर्फ में धंसा सड़क किनारे
       तंबु हमारा
       तुम्हारी भौंहों के बीच
       एक 'R' है अंकित
       कहा मेरे शिक्षक ने..
यानी मैं एक पैदाइशी शरणार्थी हूँ  जिसके  माता पिता सन् 1960 में किशोर अवस्था में तिब्बत पर चीनी आक्रमण के बाद जान बचाकर भारत आए । यहाँ उन्होंने कुली का काम किया । रास्ते बनाने की मज़दूरी की। पिता लद्दाख के रास्ते से भाग आए थे और अन्य तिब्बती अरुणाचल,नेपाल,भूटान,सिकिम से आए थे। माता पिता अलग अलग कैंपों में रहे । कुली का काम खत्म होने पर वे अन्य तिब्बती शरणार्थियों की तरह कर्णाटक चले गए।इस तरह मेरी शिक्षा दीक्षा भी अलग अलग जगहों पर हुई।
अग्निशेखर  : आपने अपनी एक कविता में कहा है कि आप उस देश के लिए लड़ते हुए थक गये हैं जिसे आपने कभी नहीं देखा है ।
●तेन्ज़िन च़ुन्डू  : यह एक फ्रस्ट्रेशन की अभिव्यक्ति है ।एक घुटन है।हम दशकों से जुलूस निकालते हैं।संघर्ष करते हैं ।लेकिन बदलता कुछ नहीं । कोई हमारा साथ नहीं देता। मैक्लोडगंज,कुल्लू,
  मनाली,दिल्ली या कहीं भी आप जब जुलूस निकालते हैं तो सब किनारे से तमाशा देखते हैं ।शामिल नहीं होते।आपको लग सकता है कि यह एक अनुष्ठान है,एक अलग तरह रिवाज है ।विरोध नहीं ।इसलिए एक फ्रस्ट्रेशन सी होती है कि हो कुछ नहीं रहा।
लेकिन हम लड़ना जारी रखे हुए हैं ।उसका कोई विकल्प नहीं है ।भले ही मैंने अपनी मातृभूमि देखी नहीं है , मैं उसके लिए लड़ रहा हूँ फिर भी ।
अग्निशेखर  :आपने सन् 2002 में तत्कालीन चीनी राष्ट्रपति के भारत आगमन के अवसर पर मुम्बई में ओबेराय टावर्स की चौदहवीं मंज़िल पर ' तिब्बत को आज़ाद करो' अंकित तिब्बती झंडा और बैनर फहराया था।कुछ प्रकाश डालेंगे उस जोखिम भरी घटना पर ?
●तेन्ज़िन च़ुन्डू  : यह तिब्बत को चीन द्वारा हड़प लिए जाने और उसकी मुक्ति के उद्देश्य से प्रेरित एक कदम उठाया था मैंने ताकि संसार का ध्यान आकर्षित हो हमारे साथ हुए अन्याय के प्रति ।
मुझे याद है कैसे मुम्बई में छः सौ तिब्बती युवा भूख हड़ताल पर बैठे थे।मैं चुपचाप ओबेराॅय होटल की 14वीं मंज़िल  की स्कैफ़ोल्डिंग पर तिब्बत का राष्ट्रीय झंडा फहराया।वहाँ तत्कालीन चीनी राष्ट्रपति भारतीय व्यापारियों को संबोधित कर रहे थे।मैंने "तिब्बत को मुक्त करो"  का नारा लगाया।। हवा में करीब 500 पर्चों की वर्षा की। गिरफ्तार हुआ।
फिर जब सन् 2006 में चीन के तत्कालीन राष्ट्रपति का भारत दौरा था , मुझे 14 दिन तक धर्मशाला में पुलिस ने हिरासत में रखा।ऐसे किसी भी आंदोलन से जुडे किसी प्रतिबद्ध कवि- कार्यकर्ता के लिए आम बात होती हैं।किसी भी हद तक जाया जा सकता है ।आपतो भली भांति जानते हैं यह सब।
अग्निशेखर: तो " मैं थक गया हूँ " , जिसे आप एक तरह ऊब या फ्रस्ट्रेशन कहते हैं, कविता को क्या आपकी पीढ़ी की समकालीन सोच माना जाए ,जिन्होंने तिब्बत नहीं देखा ..परंतु उसके लिए लडे जा रहे हैं?
●तेन्ज़िन च़ुन्डू : हाँ ..बिलकुल ।
अग्निशेखर: आप अपनी अग्रज पीढ़ी के संघर्ष को कैसे देखते हैं  ?
●तेन्ज़िन च़ुन्डू  :  उस पीढ़ी में नॉस्टेल्जिया बहुत है।वे लोग तिब्बत में रहे।वहाँ पैदा हुए।पले बढे..और उनको मातृभूमि छोड़कर आना पढ़ा।उनके त्रासद अनुभव हैं जो सीधे हैं । वे पहाडों पहाडों भारत आते हैं ।उनका शरीर यहाँ रहता है लेकिन उनकी आत्मा तिब्बत में रहती है ।
अग्निशेखर  : और आप कहाँ रहते हैं ?
●तेन्ज़िन च़ुन्डू  : दोनों दुनियाओं में ।यहाँ भी और वहाँ भी। जहाँ हमारे माँ- बाप,हमारी अग्रज यादों में रहते हैं ,वहीं हम सपनों में रहते हैं ।दोनों तिब्बत में रहते हैं ।
हममें बचपन में एक दिन तिब्बत वापस जाने का सपना बोया गया ।वो सपना हमारे लिए भविष्य है और तिब्बत की यादें हमारे बडों के लिए अतीत ।दो सोच हैं और साफ साफ हैं।
अग्निशेखर  : इन दोनों संघर्षरत पीढियों में आपसे में तिब्बत को लेकर कोई संवाद है ?
●तेन्ज़िन च़ुन्डू  : है..लेकिन अब उन्हें लगने लगा है कि वे वापस नहीं पहुँचने वाले। वे बूढे हो गये हैं,उनके घुटने दुखने लग गये हैं । उनके हाथों से सब कुछ निकलता जा रहा है । अब वे नहीं उनके बच्चे यानी हमारी पीढ़ी जाएगी एक दिन ।इसलिए जब मैं थकने की बात करता हूँ तो वो अस्थायी मानसिक अवस्था है,हताशा नहीं।
अग्निशेखर  : कुछ याद है कि बचपन में  तिब्बत आपकी चेतना में कब आया ?
●तेन्ज़िन च़ुन्डू  : बचपन में नानी से सुनी   की कहानियों से मेरे अंदर तिब्बत साकार हुआ। वह ऊंचा पर्वतक्षेत्र है।वहाँ याक और ड्री नाम के विशेष जानवर होते हैं ।वहाँ दही और पनीर बनाती थी नानी।हमारी वेशभूषा और भाषा तिब्बती है।
मैं नानी से पूछा करता था कि फिर हमारे कैंप के बाहर ये जो भारतीय लोग रहते हैं इनके चेहरे,इनकी भाषा और वेशभूषा अलग क्यों हैं ?
मज़ेदार बात यह कि मैं नानी से पूछता कि ये भारतीय लोग यहाँ क्यों हैं? फिर हर शनिवार और रविवार को एक कन्नडिगा स्त्री हमारी बस्ती में इडली बेचने आती थी ।हम बच्चे दौड़ कर जाते इडली खाने।
इस तरह समझ में आया कि हम तिब्बत से भागकर यहाँ आए हैं ..हम शरणार्थी हैं ।एक बच्चे को जब यह पता चले कि हम यहाँ के नहीं हैं किसी अन्य देश से आए हैं ..उसपर क्या गुज़रती होगी ..कोई कल्पना कर सकता है ? फिर बडे होने पर समझ में आया कि हम हर साल 'तिब्बती विद्रोह दिवस' क्यों मनाते हैं उन हज़ारों  शहीदों की याद में जिन्हें  सन् 1959 में चीनी आक्रमणकारी सेनाओं ने मार डाला।
अग्निशेखर  : मैं यह अच्छे से  समझ सकता हूँ, यह शरणार्थी कैंपों में  हमारे   बच्चों का भी अनुभव है ।
●तेन्ज़िन च़ुन्डू : तो हमारे माता-पिता  को बेबस और अपमानित होकर अपना देश छोड़कर भागना पड़ा है ; और एक बच्चे के लिए संसार में उसके माता-पिता ही पहला गौरव होते हैं ।और अब हम किसी अन्य देश में शरणार्थी हैं ।किसी की सहानुभूति और दया पर रहते हैं और यदि उनका मन बदले तो हमें यहाँ से  जाना होगा ।इस तरह बचपन में एहसास हुआ कि मैं एक शरणार्थी हूँ ।
और शरणार्थी होना कोई शर्म नहीं,क्योंकि  इसके लिए हम ज़िम्मेदार नहीं । शरणार्थी बनने को मैं एक सुअवसर के रूप में देखता हूँ ।आप के लिए भगतसिंह या गाँधी बनने के रास्ते भी खुल सकते हैं । जैसे मेरे पास तीन भाषाएँ हैं ।मातृभाषा जिसमें मैं गाता हूँ, स्थानीय भाषा के अतिरिक्त तीसरी भाषा है -
"रंगज़ेन" (Rangzen) अर्थात् मुक्ति ।रंगज़ेन विमर्श के तौर पर मेरी भाषा है।
अग्निशेखर  : एकबार आप चोरी छिपे तिब्बत पहुँच  गये थे और वहाँ पकड़े भी गये थे। वो सब कैसे हुआ था ?
●तेन्ज़िन च़ुन्डू  : यह तब की बात है जब मुझ पर अपनी मातृभूमि तिब्बत की एक झलक देखने का जुनून हावी हो गया। तिब्बत केवल मेरी सोची हुई दुनिया में था।मैंने लद्दाख के उत्तरी मैदान  से हिमालय लांघकर अवैध रूप से  तिब्बत में प्रवेश किया और मन बनाया अब तिब्बत में ही बसूंगा।मुझे चीन की सेना ने पकड़ लिया।मेरी पिटाई की । गिरफ्तार किया गया ।और एक दिन किसी तरह मैं उनकी जेल से रिहा हुआ।
अग्निशेखर : आपने शुरु से ही अंग्रेज़ी में लेखन किया अथवा पहले तिब्बती में लिखते थे ?
●तेन्ज़िन च़ुन्डू : मैं शायद तिब्बती भाषा में बेहतर लिख सकता था।लेकिन हमें शुरू से ही बताया गया था कि दुनिया को हमारे बारे में कुछ पता नहीं है ।इसलिए मैंने  बचपन से ही तय किया था कि अंग्रेज़ी में ही लिखूंगा।यों दावा नोरबु के बाद  जमियंग नोरबू, थिरिंग वांग्याल ,तुंडुप जैसे मेधावी बुद्धिजीवी ने ही अंग्रेज़ी में लिखने की सुदृढ़ नींव डाली।
अग्निशेखर  : चूंकि चीन की तानाशाही और उसकी विस्तारवादी नीति के चलते तिब्बत में एक जीनोसाइड हुआ है।आप इसपर क्या कहना चाहेंगे ?
● तेन्ज़िन च़ुन्डू  :  चीन की कोशिश जारी है कि वह तिब्बत में हमारे इतिहास को ,हमारी संस्कृति और आबादी को पूरी तरह से नष्ट करे ।उसने साठ लाख तिब्बती नागरिकों में से दस-ग्यारह लाख लोगों  का जनसंहार किया है ।
इतने भर से उसका पेट नहीं भरा।चीन ने हमारी तिब्बती भाषा और संस्कृति पर धावा बोला है।आप जानते होंगे कि चीन ने तिब्बत में सांस्कृतिक संहार के चलते छः हज़ार बौध विहार नष्ट किए हैं। प्राचीन पांडुलिपियां जला डाली हैं ।कुछ पांडुलिपियां लामा लोग यहाँ साथ ले आए। 'कल्चरल रिवोल्यूशन' के दौरान चीन ने यही नीति चीन में अपनायी।चीन के लोगों के पास उसकी बर्बरता से निपटने का कोई विकल्प न था।तिब्बत में चीन इस दृष्टि से पूर्ण रूप से सफल न हो सका ।
अग्निशेखर  : सो कैसे  ?
●तेन्ज़िन च़ुन्डू  : इधर सन् 1981-82 के बाद से सुनने में आया कि तिब्बत में लोग अपने बुद्ध धर्म,अपनी संस्कृति और भाषा की ओर फिर से मुड गए हैं ।
अग्निशेखर : कविता के अलावा गद्य की अन्य विधाओं की क्या स्थिति है  तिब्बती  निर्वासन साहित्य में?
●तेन्ज़िन च़ुन्डू  : भले ही कम लिखा जा रहा हो, लेकिन कहानी, आत्मकथा,जीवनी, निबंध खूब लिखे गये हैं ।जमियंग नोरबू ने
नाटक लिखे ,उपन्यास लिखे।आपको आश्चर्य होगा कि साहित्य की अपेक्षा हमारे यहाँ संगीत अभिव्यक्ति का सर्वाधिक सशक्त माध्यम है ।लोक साहित्य भी लोकप्रिय माध्यम बना हुआ है। लोग पारंपरिक गीत गाएँगे, 'बोली' करेंगे,नाटक करेंगे । इसी में ज़्यादातर तिब्बत की स्मृति है।उसका बिछोह है।
अग्निशेखर  : कोई उदाहरण देंगे ?
●तेन्ज़िन च़ुन्डू  : एक लोकगीत गाया जाता है -"एक दिन गुरूजी ( दलाईलामा) को साथ लेकर हम अपने देश वापस जाएँगे।"
पारंपरिक धुनों में नये भावबोध के प्रार्थना गीत गाये जाते हैं-" गुरुजी तिब्बत आ जाएँ ..."
एक लोकगीत में दलाईलामा और पेंचनलामा (मृत्यु 1988) को नायकत्व दिया गया है ।दलाईलामा  स्वाधीनता की मणि की खोज में तिब्बत छोड़ कर गये हैं और उन्होंने अपने पीछे तिब्बती में  प्रजा की देखभाल के लिए पेंचनलामा को रखा है।यह सब पूर्वजन्म के  कर्मों का खेल है ।इस लोकगीत में दलाईलामा के मुंह से कहलवाया गया है कि मेघों के पीछे ढका हुआ सूर्य अवश्य फिर से निकलेगा ।
अग्निशेखर  : क्या निर्वासन की यह केंद्रीय संवेदना चित्रकारों  के यहाँ भी देखने को मिलती है?आपके यहाँ तो थन्का पेंटिंग की समृद्ध परंपरा है।
●तेन्ज़िन च़ुन्डू  : हमारे अधिकांश चित्रकारों ने इधर जो चित्र बनाए हैं उनमें अक्सर प्रतीक रूप में "पोताला" (दलाईलामा का प्राचीन महल), उनका चित्र और तिब्बत का राष्ट्रीय ध्वज भी बनाया हुआ मिलेगा।अमेरिका में हमारे अनेक चित्रकार सक्रिय हैं ।आस्ट्रेलिया में कर्मा फिन्सुक सृजनरत  हैं।
अग्निशेखर  : तिब्बती समाज में साहित्यिक  पत्र पत्रिकाएँ हैं क्या ?
तेन्ज़िन च़ुन्डू  :बहुत ज़्यादा जानकारी नहीं है । एक ज़माने में 'नोरबलिंगा',  'चिलू मेलों','  'सोशल मिरर' साहित्यिक होते थे। तिब्बत लाइब्रेरी का एक ' तिब्बत जर्नल' निकला करता था। उनका एक साहित्यिक ग्रुप होता था -" अनिमाची " जो पुरस्कार भी देते थे।
अग्निशेखर  : आपको कभी कोई सम्मान मिला है ?
तेन्ज़िन च़ुन्डू  : मेरी कोई अपेक्षा भी नहीं ..चार पुस्तकें  लिखी हैं ।
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Wednesday, 9 October 2019

क़िस्सा चयन समिति - सिद्धार्थ शंकर राय

क़िस्सा चयन समिति

किसी विश्वविद्यालय का इंटरव्यू हो रहा था। अमुक आवेदक से विशेषज्ञ ने सवाल पूछा तो आवेदक ने कोई जवाब नहीं दिया। साक्षात्कार समाप्त हुआ तो आवेदकों पर बात होने लगी। चयन समिति के अध्यक्ष ने कहा कि अमुक आवेदक का करिए। इस पर विशेषज्ञों ने कहा कि अमुक आवेदक ने किसी प्रश्न का उत्तर नहीं दिया; कुछ भी नहीं बोला । इस पर अध्यक्ष ने कहा कि अमुक आवेदक लिखता बहुत अच्छा है। अध्यक्ष महोदय के इस तर्क पर अमुक की नियुक्ति हो गयी।
कुछ दिनों के बाद अमुक जी के प्रोमोशन काा इंटरव्यू था। पिछली चयन समिति के एक विशेषज्ञ फिर से चयन समिति में विशेषज्ञ के रूप में आ गये। अमुक जी साक्षात्कार के लिए आये और पूछे गये सवालों पर मौनव्रत की पिछली व्यवस्था बनायी रखी। विशेषज्ञ ने अमुक जी के लेखन के बारे में सवाल किया तो उन्होंने काँख-कूँख, खाँस-खखारकर शांति व्यवस्था बहाल रखी। समिति के अध्यक्ष ने अमुक जी के प्रोमोशन हेतु प्रस्ताव रखा। इस पर दोबारा पधारे विशेषज्ञ ने कहा कि आपने पिछली बार कहा था कि ये बोलते नहीं अपितु लिखते अच्छा हैं; लेकिन इन्होंने ने तो कुछ लिखा भी नहीं है। इस पर अध्यक्षजी ने कहा कि जी! ये सोचते बहुत अच्छा हैं।
इस प्रकार अच्छा सोचने के कारण अमुकजी प्रोमोशन को प्राप्त कर गये।
आप भी अच्छा सोचिए ।

Tuesday, 8 October 2019

बड़ा शोर सुनते थे पहलू में दिल का - कृष्ण मोहन

बड़ा शोर सुनते थे पहलू में दिल का
अभी हाल में आलोचक-मित्र आशुतोष कुमार ने यह दावा किया था कि "आज की हिंदी की समूची पीढ़ी नामवर सिंह के कुर्ते की जेब से निकली है"।(नवभारतटाइम्स, 21 फरवरी, 2019) अपनी इस मान्यता को उन्होंने अन्यत्र भी एकाधिक बार दुहराया। असल मे यह वक्तव्य महान रूसी कथाकार तुर्गनेव की एक अभिव्यक्ति से प्रेरित है। तुर्गनेव ने कभी कहा था कि 'हमारी पीढ़ी गोगोल के ओवरकोट से निकली है'। संदर्भ गोगोल की प्रसिद्ध कहानी "ओवरकोट" का था, जिसका परवर्ती पीढ़ियों पर पर्याप्त प्रभाव पड़ा था। इस कथन में गोगोल की कहानी के नाम का उपयोग संश्लिष्ट अर्थ में हुआ है, इसलिए रूपक बन जाता है, और बात सार्थक हो जाती है। लेकिन आशुतोष कुमार के वक्तव्य में इसका अभाव है। अगर कोई कहे कि  'हिंदी की आधुनिक कहानीकारों की पीढ़ियाँ प्रेमचंद के क़फ़न से निकली हैं', और दूसरा कहे कि 'वे उनकी बंडी की जेब से निकली हैं', तो दोनों की बात में जो अंतर होगा, कमोबेश वही अंतर इन दोनो वक्तव्यों में है।
              
बहरहाल, इस प्रसंग में लेखक ने नामवर सिंह की आलोचना के बारे में और क्या कहा है, देखें: "उनकी आलोचना-दृष्टि को समझने के लिए ज्ञानोदय में प्रकाशित उनके प्रसिद्ध लेख 'नंगी और बेलौस आवाज़' को पढ़ने की ज़रूरत है। भारत-चीन युद्ध के समय राष्ट्रवाद का ज्वार उमड़ पड़ा था। बड़े-बड़े प्रगतिशील कवि भी भावनाओं के उस ज्वार में
कृष्ण मोहन
तिनके की तरह उड़ गए जिनमें शमशेर जैसे शिखर कवि भी थे। लेकिन नामवर सिंह ने शमशेर पर भी सवाल उठाने में कोई कोताही नहीं की और बताया कि युद्ध को लेकर 'काशी के एक नितांत नए कवि' धूमिल की कविता कहीं ज़्यादा संयत है। यह साहस वही कर सकते थे।" (नवभारतटाइम्स,वही)
"आलोचना"60 में भी आशुतोष कुमार ने लिखा कि "नामवर सिंह में यह साहस था कि एक अज्ञात कवि धूमिल की कविता को अपने प्रिय शमशेर जैसे स्थापित कवि की कविता से बड़ी बता सकें और उसे रातोरात हिंदी का सितारा बना दें।"
नामवर सिंह के लेख 'नंगी और बेलौस आवाज़' का शमशेर की कविता से सम्बंधित अंश देखें:  " 'बात बोलेगी हम नहीं' के कवि शमशेर से पहले ही से कौन आश्वस्त न होगा कि वे शोर मचाने वालों में नहीं हो सकते! 'मौन' का कवि और शोर! आकर्षण स्वाभाविक है। कविता में भी 'सत्य' और 'सच्चाई' (कवि का प्रिय शब्द) एक बार नहीं अनेक बार। इतने पर भी कोई कमी दिखे तो कविता का अंत देखिए, सत्यमेव जयते, सत्यमेव जयते,सत्यमेव जयते का तीन बार उद्घोष! नाटकीयता की पराकाष्ठा, भाषण कला का उच्चतम आदर्श! लेकिन कविता के अंदर 'तुम मूर्ख हो', 'धन्यवाद पशु', 'आवारा प्रेत', 'मार्क्स को जला दो', 'लेनिन को उड़ा दो' वगैरह-वगैरह। इस प्रकार कवि कुछ कहता है, कविता कुछ! पाठक किसका विश्वास करे? कहते हैं, थोथा चना बाजे घना! कवि को स्वयं बोलना पड़े तो समझिए कि कविता की वाणी को पक्षाघात है! यह कैसा 'रेटरिक' कि भाषा शब्द से अपशब्द के स्तर तक स्खलित हो गई। 'सत्यमेव जयते' की पुष्टि तो बाद में होगी यहाँ तो 'काव्यमेव जयते' में ही सन्देह है!"
इस टिप्पणी की तेरह पंक्तियों में से आठ के अंत में आया विस्मयबोधक चिह्न यह बताता है कि इसका लेखक किसी वजह से अपनी बात पर अतिरिक्त जोर देना चाहता है, लेकिन पूरी कोशिश करके भी संतुष्ट नहीं है। वह पाठकों को अपनी "खोज" से विस्मित कर देना चाहता है, जिसके लिए  ख़ुद विस्मित होने का अभिनय किए जा रहा है। अपनी बात के खोखलेपन का एहसास होने पर ऐसी ही हास्यास्पद हरकत हो जाती है। न केवल इस अंश में बल्कि पूरे लेख में ही नामवर सिंह ने इसी तरह मुद्राओं और भंगिमाओं से काम चलाया है। इस संदर्भ में शमशेर की कविता पर आने से पहले कुमारेन्द्र पारसनाथ सिंह की एक कविता "विषयांतर" को उद्धृत करके वे उस पर जो टिप्पणी करते हैं, उसे देखते चलें:
"बिना किसी हिचक के कह सकता हूँ कि चीनी हमले पर अभी तक जितनी कविताएँ सामने आई हैं उनमें यह सर्वोत्तम है। यदि इसमें कोई कमजोरी है तो हिंदी कविता के वर्तमान समय या 'कन्वेंशन' की, जैसे प्रतीक-पद्धति। परन्तु प्रतीक-बोध से मुक्त होकर भी एक 'विषयांतर' के रूप में कविता का स्वाद लिया जा सकता है----ख़ास तौर से 'हवा का रुख और मौसम का रंग बदल गया' के आगे। कहने की आवश्यकता नहीं कि कविता के सम्पूर्ण भाव या अर्थ को ग्रहण करने के लिए बराबर 'विषयांतर' के सन्दर्भ को ध्यान में रखना होगा। कहाँ अन्य कवियों का भावावेश और कहाँ इस कविता का परिपक्व स्वर: 'यह कुछ नहीं था जो हुआ!' पूरी कविता के लय-विन्यास में स्वर की यह परिपक्वता व्याप्त है। चीनी आक्रमण से स्थिति में जो परिवर्तन आया, उसके बारे में जहाँ दूसरे लोग कयामत की तुरही बजा रहे थे वहाँ मद्धिम स्वर कुमारेन्द्र केवल इतना कहते हैं: 'चाँदनी के धरती पर पड़ने में फ़र्क़ ज़रा पड़ गया' और 'कणिका का ताप सहसा कुछ बढ़ गया!' कौन कह सकता है कि इस 'अंडरस्टेटमेंट' में तार-स्वर से कम शक्ति है---शक्ति और समझ! शीर्षक इसका 'सत्यमेव जयते' भले न हो किन्तु यहाँ सत्य की जीत होती है, वास्तविकता कविता के कथ्य का समर्थन ही नहीं करती, बल्कि इस काव्य-सत्य को पुनः प्राप्त करके हमारी दृष्टि में कहीं अधिक निखर उठती है। इससे स्पष्ट हो जाता है कि सत्य का ढोल न पीटते हुए भी कवियों की नई पीढ़ी आज सत्य के कथन में अधिक समर्थ है। जितनी सीधी-सादी यह भाषा है, उतनी ही सीधी-सादी दृष्टि। इसके मूल में निश्चय ही एक निर्भीक नैतिकता अथवा नैतिक साहस है।"
यही नामवर सिंह की आलोचना की शैली है। कविता की पद्धति की आलोचना कर दी, लेकिन उसके आशयों के बारे में एक शब्द नहीं कहा। कविता की पंक्ति को उद्धृत करके उसे 'परिपक्व स्वर' का उदाहरण बताया और फिर किसी विलक्षण तरकीब से 'पूरी कविता के लय-विन्यास' में उसे व्याप्त बता दिया। लेकिन यह पता नहीं चल पाया कि 'यह कुछ नहीं था जो हुआ' में परिपक्व क्या है, अर्थ, स्वर, या लय। 'हवा का रुख और मौसम का रंग' क्या था जो 'बदल गया'? 'जो हुआ' वो क्या था, और क्या नहीं था? 'चाँदनी के धरती पर पड़ने' का क्या अभिप्राय है, और वह 'ज़रा-सा फ़र्क़' क्या है, जो 'पड़ गया? 'कणिका का ताप' क्या है जो 'सहसा कुछ बढ़ गया'?  कौन सी 'वास्तविकता' किस 'कथ्य' का समर्थन करती है और फिर किस 'काव्य-सत्य' को पुनः प्राप्त करके निखर उठती है, कुछ पता नहीं चलता। और तो और , आलोचक महोदय ने कविता के शीर्षक का भी दो बार इस्तेमाल किया, लेकिन एक बार भी यह पता नहीं लगने दिया कि उनकी नज़र में यह कैसा विषयांतर है, किस विषय से किस दूसरे विषय मे प्रवेश कर रहे हैं। कविता की अपनी व्याख्या हम सभी कर सकते हैं, लेकिन आलोचक जब कविता के नाम पर बड़ी-बड़ी बातें बना रहा हो तो उससे यह न्यूनतम उम्मीद की जाती है कि उसकी बात जिन पंक्तियों पर आधारित है, उसका अर्थ उसने क्या समझा, इसे ज़रूर बताए। "प्यार को प्यार ही रहने दो कोई नाम न दो" की यह शैली, दरअसल, नामवर सिंह की प्रतिनिधि शैली है।
बहरहाल, हमें देखना चाहिए कि शमशेर की कविता में ऐसा क्या है जो नामवर सिंह के मुताबिक इस क़दर आपत्तिजनक है। नामवर सिंह ने कविता से जो कुछ शब्द और वाक्य उद्धृत किए हैं, जिनमें अतिरिक्त भावावेश की कल्पना करते हुए उन्होंने उन्हें अपशब्द मान लिया है, उनमें 'मार्क्स को जला दो', 'लेनिन को उड़ा दो' जैसे वाक्यों पर ही यह शक किया जा सकता है। बाक़ी, 'मूर्ख', 'पशु' या 'आवारा प्रेत' कहने में कठोर निर्णय का संकेत भले ही मिलता है, अविचारित अभिव्यक्ति का नहीं।  इसलिए हम यहाँ इन्हीं वाक्यों पर विचार करेंगे ताकि नामवर सिंह की आलोचकीय क्षमताओं का कुछ और परिचय प्राप्त कर सकें। कविता का वह अंश देख लें जिसमें ये पंक्तियाँ आई हैं:
"क्या बुद्ध का नाम हिमालय के पार भी
लोग लेते हैं?
अगर तोपों के मुँह में ज़बान है
           सच्चाई की,
और बम्बार ही भाई-भाई को पहचानेंगे;
तो
तो---मार्क्स को जला दो! लेनिन को उड़ा दो!
माओ के क्यून-ल्यून को
प्रशांत महासागर में डुबा दो!
हिमालय पहाड़ कोई चीन की दीवार तो नहीं
जिसे लाँघ जाओ!"
साहित्य का कोई सामान्य विद्यार्थी भी देख सकता है कि नामवर सिंह ने मार्क्स-लेनिन से सम्बंधित पंक्तियों को इस तरह से प्रस्तुत किया है मानो साम्यवादी चीन पर क्रोधावेश के कारण शमशेर मार्क्स और लेनिन को आग में जलाने या बम से उड़ाने का आह्वान कर रहे हों। किसी समय कम्यून में रहने वाले और अपनी मार्क्सवादी प्रतिबद्धता को प्रकट करने में कभी न हिचकने वाले कवि शमशेर पर उनका यह आरोप कितना घातक रहा होगा, इसकी कल्पना की जा सकती है। बहरहाल, अगर सचमुच कोई कवि किसी को "जलाने या उड़ाने" का आह्वान करे तो उस पर अवश्य आपत्ति की जा सकती है। सवाल है, क्या शमशेर वही कह रहे हैं, जो नामवर सिंह हमें इशारों-इशारों में बताना चाहते हैं।
बुद्ध का नाम हिमालय के पार न केवल लिया जाता है, स्वयं चीन में भी कन्फ्यूशियस के बाद वे सम्भवतः सर्वाधिक सम्मानित विचारक हैं। भारत और चीन के बीच प्राचीन काल से स्थापित सांस्कृतिक रिश्ते की यह एक सामान्य अभिव्यक्ति है। बुद्ध के साथ अहिंसा का सिद्धांत भी अनिवार्यतः जुड़ा हुआ है। ऊपर उद्धृत अंतिम पंक्ति से स्पष्ट है कि यह कथन चीनियों के प्रति है, भारतीयों के प्रति नहीं। चीनियों से बाक़ायदा मुख़ातिब होकर कवि उनसे तोपों और बमवर्षक विमानों की बाबत सवाल करता है----अगर वे इन्हीं के माध्यम से इंसानी रिश्तों और सचाई के तक़ाज़ों को समझते हैं तो उन्हें अपने मार्गदर्शक आधुनिक विचारकों मार्क्स और लेनिन को भी मटियामेट कर देना चाहिए, क्योंकि व्यवहार में वो ऐसा पहले ही कर चुके हैं। बुद्ध को तो उन्होंने पहले ही त्याग दिया है।
कहना अनावश्यक है कि शमशेर की इस कविता में अंधराष्ट्रवाद जैसा कुछ भी नहीं था। अगर कुछ था तो छले जाने का एहसास था। जिस मित्रता से बहुत उम्मीद थी, उसके टूटने से पैदा हुई हताशा और आक्रोश, जिसकी अभिव्यक्ति तीखी वैचारिक बहस के साथ आरोप-प्रत्यारोप में हो रही थी। लेकिन किसी को गिराने और किसी को उठाने के अभियान पर निकले आलोचक को यह सब देखने की न तो फ़ुर्सत थी, न ज़रूरत।
बहरहाल, शमशेर की इस कविता के मुकाबले नामवर सिंह ने धूमिल की जिन कविता-पंक्तियों को श्रेयस्कर माना था, उन्हें उन्होंने "स्वयं कवि के मुँह से सुनी" थी:
"मुझमें सारे समूह का भय
चीख़ता है
दिग्विजय! दिग्विजय!!"
इन पंक्तियों पर नामवर सिंह की टिप्पणी भी देख लें, जो बिना कुछ कहे बहुत कुछ कहता हुआ दिखने की उनकी शैली के अनुरूप ही है:
"भय चीख़ता है दिग्विजय! भय और दिग्विजय। क्या इस विडम्बना में कोई वास्तविकता नहीं है? इन तीन पंक्तियों में जितनी बड़ी विडम्बना को व्यक्त कर दिया गया है वह लम्बे-लम्बे दर्जनों वीर-गीतों से कहीं अधिक काव्यात्मक है और उससे भी अधिक काव्यात्मक है नई पीढ़ी के एक दूसरे कवि श्री कुमारेन्द्र पारसनाथ सिंह की इसी विषय से सम्बद्ध कविता 'विषयान्तर'..."
नामवर सिंह ने "कविता की वाणी को पक्षाघात" का ज़िक्र किया था, जिसकी असलियत हम देख चुके हैं। लेकिन उनकी आलोचना की भाषा यहाँ पक्षाघात की वास्तविक शिकार मालूम पड़ती है। किसी भी वाक्य में वास्तविकता का कोई न कोई पहलू अवश्य होता है, इसलिए उनका पहला प्रश्न तब तक निरर्थक है जब तक वे उस वाक्य में किस वास्तविकता के दर्शन कर रहे हैं, नहीं बताते।'विडम्बना' है लेकिन उसकी वस्तुगतता के नाम पर केवल उसके आकार का पता चलता है, यानी वह 'बड़ी' है। बड़ी होते होते वह अचानक 'काव्यात्मक' होने लगती है और इतनी 'काव्यात्मक' हो जाती है कि 'दर्जनों वीर-गीत' पीछे छूट जाते हैं। तभी अचानक एक उससे भी 'अधिक काव्यात्मक' कविता आ जाती है, जिसके बारे में उनके विचारों से हम पहले ही परिचित हो चुके हैं। यही है नामवर सिंह की बहुश्रुत आलोचना का सच। रचना का सामना होने पर वे उस डॉक्टर की तरह व्यवहार करते हैं जिसे चिकित्सा-शास्त्र का ज्ञान तो है, लेकिन मरीज़ की नब्ज़ देखना नहीं आता, और जब वह मर्ज़ की पहचान नहीं कर पाता तो दवाई छोड़कर ओझाई करना शुरू कर देता है।
बहरहाल, धूमिल की ऊपर दी हुई पंक्तियों पर विचार करें तो पता चलता है कि 'दिग्विजय' के आग्रह का औचित्य 'समूह के भय' की प्रकृति पर टिका हुआ है। अगर भय का कारण कवि की दृष्टि में वास्तविक  है, तो दिग्विजय का आग्रह भी अनुचित न होगा। इन पंक्तियों से इस विषय में कोई स्पष्ट सूचना नहीं मिलती, लेकिन अगर पूरा समूह भयभीत है तो सम्भावना इसी बात की अधिक है कि भय का कोई न कोई ठोस कारण है। धूमिल का इस विषय में और क्या सोचना था, इसका पता उनकी एक अन्य कविता 'पटकथा' से चलता है। कुछ पंक्तियाँ देखें:
"मैंने देखा कि मैदानों में
नदियों की जगह
मरे हुए साँपों की केंचुलें बिछी हैं
पेड़---
टूटे हुए रडार की तरह खड़े हैं
दूर-दूर तक
कोई मौसम नहीं है
लोग---
घरों के भीतर नंगे हो गये हैं
और बाहर मुर्दे पड़े हैं
विधवाएँ तमगा लूट रही हैं
सधवाएँ मंगल गा रही हैं
वन महोत्सव से लौटी हुई कार्यप्रणालियाँ
अकाल का लंगर चला रही हैं
जगह-जगह तख़्तियाँ लटक रही हैं---
'यह श्मशान है, यहाँ की तस्वीर लेना मना है'।"
फ़िलहाल, 'विधवाएँ तमगा लूट रही हैं' जैसी उक्तियों में निहित भावभूमि को किसी अन्य मौक़े पर विचार के लिए छोड़कर हम यहाँ इन पंक्तियों में व्याप्त देश की दुर्दशा के चित्र पर ध्यान केंद्रित करते हैं। 'समूह का भय' इसी परिस्थिति की देन है, क्योंकि दोनों का सन्दर्भ भारत-चीन युद्ध है, जिसका पता कुछ ही पंक्तियों बाद के अंश से चलता है:
"मैंने अचरज से देखा कि दुनिया का
सबसे बड़ा बौद्ध-मठ
बारूद का सबसे बड़ा गोदाम है
अखबार के मटमैले हाशिये पर
लेटे हुए, एक तटस्थ और कोढ़ी देवता का
शांतिवाद, नाम है"
बुद्ध की ओर संकेत, चीन के संदर्भ में, शमशेर ने भी किया था, लेकिन पंचशील, शांति और अहिंसा जैसी अवधारणाओं का प्रेरक होने के कारण धूमिल को वे "कोढ़ी देवता" मालूम पड़ते हैं। पहचान के लिए 'लेटे हुए' कहकर वे उनके अंतिम समय की कुशीनगर स्थित लेटी हुई मुद्रा को भी याद करते हैं। बौद्ध मठ को 'बारूद का गोदाम' बताकर उन्होंने अपने आशय को और स्पष्ट किया है। कविता में इससे पहले तत्कालीन भारतीय नेतृत्व की छवि का अंकन करते हुए उन्होंने अपने ख़ास अंदाज़ में 'पंचशील' के सिद्धांत को ख़ारिज़ किया था:
"मैं अपनी सम्मोहित बुद्धि के नीचे
उसी लोकनायक को
बार-बार चुनता रहा
जिसके पास हर शंका और
हर सवाल का
एक ही जवाब था
यानी कि कोट के बटन-होल में
महकता हुआ एक फूल
गुलाब का।
वह हमें विश्वशांति और पंचशील के सूत्र
समझाता रहा।"
कहने की ज़रूरत नहीं कि धूमिल का विचार यहाँ अंधराष्ट्रवाद से आगे बढ़कर धर्म-आधारित वैमनस्य की हद को छू रहा है। यही उनकी सुसंगत वैचारिक स्थिति थी। शायद इसी वजह से '63 में उनसे सुनी कुछ पंक्तियों के आधार पर उन्हें अग्रणी कवि के रूप में प्रस्तुत कर चुके नामवर सिंह की देखरेख में जब उनका पहला संग्रह 'संसद से सड़क तक' '72 में छपा (भारत यायावर, 'नामवर होने का अर्थ', पेज 375) तो उसमें यह कविता नहीं थी। नामवर सिंह इसकी जो व्याख्या कर चुके थे, 'पटकथा' के साथ छपने पर उसकी निरर्थकता उजागर हो जाती।
एक बात और। एक जमाना था जब किसी को 'रातोरात सितारा' बनाने का कारनामा उपेक्षा के योग्य समझा जाता था। अब शायद इसे साहसिकता की मिसाल माना जाता है। दुनिया परिवर्तनशील है। लेकिन हर बदलाव के बावजूद कुछ चीज़ें कभी नहीं बदलतीं। जोश मलीहाबादी ने ऐसी ही किसी स्थिति पर क्या ख़ूब चुटकी ली है:
"बेहोश होके जल्द तुझे होश आ गया
मैं बदनसीब होश में आया नहीं हनोज़"

कृष्ण मोहन
प्रोफेसर
हिन्दी विभाग
बीएचयू वाराणसी

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