Sunday, 25 June 2017

कविता अरमान आनंद

आडवाणी
चौराहे पर खड़े गांधी हैं

कहीं जा नहीं सकते
आ नहीं सकते
गांधी के पास लाठी है
लेकिन वे
सर पर बैठा कौआ नही उड़ा नही सकते

चुप चाप
सड़क पर
बलात्कार कर फेकी गयी लड़की को देखते हैं
जिसका चेहरा
भारत माता से मिलता जुलता है

सीमेंट की धोती
आधी फट नही पाती

नंगे समाज की ओर जाती
मुंह काला कर
पृथ्वी पर लेटी हुई सड़क पर

एक नंगी लड़की

ओह
अच्छा हुआ
चश्मे पर कबूतर बीट कर गया है

गांधी की लाठी पकड़
भविष्य की ओर जाता हुआ लड़का
दलालों के कंधे पर बैठ
विश्व भ्रमण पर निकल गया है

आडवाणी
चौराहे पर खड़े गांधी हैं
जिसके सर और चश्मे पर कौवे - कबूतर बीट कर रहे हैं

एक फर्क है

कहते हैं
शहर में कौओं की पहली खेप आडवाणी लाये थे
सुना है उन्होंने
गांधी के बच्चे को लाठी बनने से रोका था

( Ravish Kumar के एक लेख को पढ़कर)

-अरमान आनंद

Saturday, 24 June 2017

पुरानी प्रेमिकाएं अरमान आनंद

पुरानी प्रेमिकाएं
.......................
तुम खुश हो
जानकार खुश होता हूँ

तुम दुखी हो जानकार दुःखी

मेरी भीतर जो स्त्री है
उसे तुम सब ने मिल कर बनाया है
और जो पुरुष है
उस पर
तुम सबका उतना ही अधिकार है
जितना मेरी नई प्रेमिका का

मेरी पुरानी प्रेमिकाओं
तुमसे कभी मैं नफरत नही कर सकता
तुम मेरा गुजरा हुआ वक्त हो
वक्त बेशकीमती होता है

तुमने मेरी खीझ आलस्य गुस्से सबको प्यार दिया है
इतना प्यार
जिसे मैं लौटा नहीं सकता
न लौटाना चाहता हूँ
मुझे कर्जदार की तरह मरने दो
जो तुम्हारे आभाव में फटेहाल दम तोड़ेगा

तुम पहले से ज्यादा खूबसूरत हो गयी हो
पहले से ज्यादा आत्मविश्वास झलकता है तुम्हारे भीतर
स्त्री टूटकर पहले से ज्यादा मजबूत हो जाती है
पुरुष टूटता है
तो बिखरता चला जाता है

ये जानकार भी कि तुम अब मुझे प्यार नहीं करती
इतना विश्वास है अभी भूली नहीं होगी
ख़ास कर जब तुम अनदेखा करने की कोशिश करती हो
ओह ये तो किसी छोटे बच्चे जैसा है

मैं तुम्हारी आँखों में झांकना चाहता हूँ
ओह
ये आज भी उतनी ही पानीदार हैं

मैं जो ये इतनी दूर खड़ा हूँ
यकीन करो मेरा दिल घुटनो के बल है

मेरी ख्वाहिश है
मैं घर से जब भी बाहर निकलूँ
तुम मिल जाओ मुझे
अकेली ऑफिस जाती हुई
किसी दोस्त के साथ शॉपिंग करती हुई
या
किसी मॉल या सिनेमा हॉल में
अपने पति या प्रेमी के साथ घूमती हुई
या अपने बच्चे को चुप कराती हुई

तुम्हें पल भर देखना
प्यार को एक बार और जीने जैसा है।

अरमान आनंद

विचार अरमान आनंद

भारत के जो मध्यवर्ग मार्क्सवाद का बौद्धिक पोषण करता है वही पूँजीवाद का शरीरिक पोषण भी करता है -अरमान

सेना और पुलिस में वही अंतर है जो गाय और भैंस में है।

बाल अरमान आनंद

बाल
........
बर्फ में दबी हुई
एक लड़की की सबसे पुरानी
ममी

सबसे ज्यादा सही सलामत मिलते हैं बाल

माँ कहती थी
जामुन खाओ बेटा
पेट में गए हुए बाल तक को गला देते हैं

मतलब
बाल अजर अमर चीज़ है
जल्दी
जाता नही दुनियां से

प्रेमिकाएं चली जाती हैं
कमरे से
उनके बाल नही जाते

अरमान

क्षणिकाएँ 2017

1 पांव दबा कर चलने में
चाय
छलक ही जाती है

2

मेरी बाइक के पीछे बैठ
तुम अपनी ठोड़ी
मेरे काँधे से टिका देती हो
जैसे धरती टिकती है आसमान पर

3

वह पुरुष कैसा
जिसके सीने पर भाला
और पीठ पर
नाखून का निशान न हो

4
इस देश में
लाल देख कर
सिर्फ
साँढ़ ही धैर्य नहीं खोता

5

स्त्री विमर्श

पुरुष ने अपने अपराधों का टोकरा
अपनी पत्नी के माथे मढ़ दिया
पत्नी थी
कि
कलंक लिये
सारा शहर घूमती रही

Monday, 1 May 2017

प्रेम कविता

लौटना इतना आसान नहीं था
और आसान नहीं था
उसका भोर में देहरी की ऊंचाई फाँदना
आसान नहीं था
उसका गाँव की आखिरी छोर पर के उस बेरी के पेड़ तक पहुंचना
बहुत मुश्किल से उसकी फुनगी पर उसने अपना दुपट्टा बाँधा
काँटों में अपना समीज फड़वा बैठी
तलवों में आठ कांटे इश्क के धंसवाये
इश्क के टोटकों ने
आसान कर दिए मुहब्बत के रास्ते

अरमान आनंद

Tuesday, 28 March 2017

व्यक्तित्व विभाजन

जब कुछ लोग रोटी तलाश रहे हों
तुम उनकी संभावनाओं
का व्यापार कर
जाओ
किसी समुद्र के किनारे
और
रति में रत
रात की किसी सुबह
धोओ नमकीन पानी से अपना चेहरा
प्रेम विलाप में
जोर जोर से कराहो
पाब्लो की पंक्तियाँ
विश्व रंगमंच दिवस पर
करो
क्रंदन का शानदार अभिनय
उतारो कुछ सेल्फियां

तुलसी और मुक्तिबोध पर एक साथ बात करते हुए
रैदास को भूल जाने तुम्हारा अवसरवादी प्रयत्न
कितना अद्भुत है
जो आगामी पीढ़ियों को
चरित्रहीनता पर गर्व करने की सीख देता है

तुम कितनी शानदार मकड़ी हो
जो
अपने जाले में हर किसी को फंसाते हुए
एक साथ
समाजवाद
साम्यवाद
दक्षिणपंथ
जातिवाद
गोत्रवाद
क्षेत्रवाद
नस्लवाद
आतंकवाद
में अपनी आठों टाँगें जमा सकती हो

याद रखो दोस्त
जिस पाप को गंगा न धो सकी
उस
पाप की गठरी को समंदर की विशाल कोख भी छुपा नहीं सकती

Sunday, 19 March 2017

गौरैया -अरमान आनंद

गौरैया

गौरैया
तुम गायब हो गयी हो
क्या सचमुच गायब हो गयी हो तुम गौरैया ?
कितनी जरुरी थी तुम आँखों के लिए
तुम्हारा न दिखना डर, भय ,आशंका और आकुलता से भर देता है
कहीं तुम काली रात में घूमती सफेद बस में तो सवार नहीं हो गयीं
कहीं सिगरेट के दागों के साथ तो नहीं पायी गयी
पुलिस की किसी रेड में
हॉस्पिटल के पीछे
गर्भ से निकाल फेंकी गयी नवजात
तुम्हीं तो नहीं थी
जिसके लिए सड़क के कुत्ते छीना झपटी कर रहे थे.

गौरैया
बताओ न
तुम्हारी किडनी बिकी कि देह
मेरे घर की प्यारी लक्ष्मी
तुम अभी न उतरी थी आँगन की नीम से
कहाँ छुप्पा हो गयी
मैं तुम्हे ढूंढ के धप्पा बोलूंगा देखना
प्यारी गौरैया तुम्हे पता है
अनुपस्थिति अपने आप में एक राजनीति है
और गायब कर देना
सत्ता का
जादूगरों से भी पुराना खेल
प्यारी गौरैया
ये दुनियां कोई संसद् तो नहीं
जिससे तुम वाक आउट कर गयी हो
गौरैया तुमने एक बार सलीम अली के बारे में बताया था
उनसे पूछूँ क्या तुम्हारा पता
गौरैया बताओ न तुम गुजरात गयी कि पाकिस्तान
तुम्हारा कौन सा देश था गौरैया
तुम किस सरहद पर मारी गयी
तुम किसका लिखा  गीत गाती थी
इकबाल का या इकबाल का
हम तुम्हेँ ही बचाने के नारे लिख रहे थे
और तुम गायब हो गयी गौरैया
मेरी प्यारी गौरैया
कुछ बताओ न बताओ
ये तो बता दो
तुम्हें इश्क में शहादत मिली कि जंग में

Saturday, 18 March 2017

फैसला अरमान आनंद

फैसला
..........
बतौर कवि
और
दुनियां के अदने से चिंतक की हैसियत से
स्वयं को न्यायाधीश मानकर
सबसे पहले ये तय कर दिया मैंने
कि
सरकार ही आरोपी है
उसे फांसी दे दो
लिखा और
तोड़ दी कलम
कि इस आरोपी को
मौत तक
फांसी पर लटकाए रखा जाय

अब सरकार चाहे तो
मुझे
देशद्रोही करार दे
चाहे तो
नक्सली
चाहे तो
वह मुझे
पागल कहे
चाहे तो
मुझे उकसाये
आत्महत्या के लिए
जैसा किसानों को उकसाती है
अभावों के बीच रखकर

अपने साथियों का नरमुंड ले कर दिल्ली में भटकने के बदले

किसानों
उठो
कपास उगाओ
बनाओ फांसी की सबसे मोटी
और सबसे बड़ी फांद वाली रस्सी
जिसमे अंट सके
अंधेर नगरी वाले राजा का गला

तुम्हारा कवि
तुम्हारी रक्षा के लिए
आज जल्लाद की भी भूमिका अदा करेगा
©अरमान आनंद

Thursday, 16 March 2017

कूट देंगे

सुनो
ऐसा है
सवाल पूछोगे?
कूट देंगे
जवाब मांगोगे
कूट देंगे
हंसोगे
कूट देंगे
रोओगे
कूट देंगे
नाचोगे
कूट देंगे
कूदोगे
कूट देंगे
फांदोगे
कूट देंगे
किताब लिखोगे
कूट देंगे
व्याख्यान दोगे
कूट देंगे
मैंने पहना हुआ है
तीन रंग के झंडे का नकाब
उघाड़ोगे
कूट देंगे
तुम क्या जानो कितने षड्यंत्रों के बाद मिलती है सत्ता
छीनोगे
कूट देंगे

मेरे पास जुबान से बड़ी लाठी है
मेरे पास मेरे दिमाग से भी मोटी लाठी है
कुछो करोगे
कूट देंगे

©अरमान

इंतज़ार

इस नदी को बहने दो
और नदी किनारे के इस आखिरी पेड़ को मत काटना

जब जड़ता और पशुता से लड़ता मैं
किसी शाम थक जाऊंगा
या
कि कोई
धर्मांध खंजर
मेरी पीठ ,बाजु, और जाँघों को चीर देगा

मैं सिराहने तलवार रख
खुद को किसी पत्थर से टिकाये
यहीं
घावों को मिटटी से तर करता
या फिर
इसी पेड़ की छाँव में घनी नींद सोया मिलूंगा

और
तुम आओ
हक की लड़ाई में जीती
प्यास से हारी
अपना गला तर करने
इसी नदी के किनारे
अश्रु स्वेद रक्त औऱ
मिट्टी में लिपटी

एक बार मुझे अपनी जांधों पर सर रख कर सोने देना
एक बार मुझे अपनी बाहों में
लिपट कर रोने देना
भर लेना अपने गर्भ में मुझको
और
फिर लड़ने को एक लड़ाई
फिर एक बार मुझे होने देना
©अरमान

Tuesday, 28 February 2017

हिंसा

कुत्ते, सांप ,बिच्छू
यहाँ तक कि हिरण भी
डर से हिंसक हो जाते हैं
इंसानों तुम बताओ तुम्हारे हिंसक हो जाने का राज क्या है
क्योंकि
हिंसा के सिर्फ दो कारण हो सकते हैं
आत्मरक्षा और भूख
बताओ
तुम किससे डरे हो
या तुम किसे खा जाना चाहते हो

अरमान आनंद की कालजयी रचना नींद जिसे रात भर नहींं आती

नींद जिसे रात भर नहीं आती
...................................

नींद 
जिसे रात भर नहीं आती
मुमकिन है
वह दुनिया बदलने के सपने देख रहा हो
नींद
जिसे रात भर नहीं आती
मुमकिन है 
वह प्रतिघात की योजनाएं बना रहा हो
नींद 
जिसे रात भर नहीं आती
मुमकिन है
उसके कानों में गूँज रही हो 
बच्चों के रोने की आवाजें
नींद
जिसे रात भर नहीं आती
मुमकिन है उसकी बाहों में पड़ी हो एक सभ्यता की लाश
नींद 
जिसे रात भर नहीं आती
मुमकिन है वह अभी अभी जान गया हो 
सत्ता की सारी साजिशें
नींद
जिसे रात भर नहीं आती
मुमकिन है उसे प्रेम हुआ हो
नींद
जिसे रात भर नहीं आती
मुमकिन है उसे चाँद की लुका-छिपी पसंद हो
नींद
जिसे रात भर नहीं आती
मुमकिन है
उसे भागना है आज की रात
धता बताते हुए
किसी बूढ़ी खाप-पंचायत को
नींद
जिसे रात भर नहीं आती
मुमकिन है
वह निगलने वाला हो पूरा का पूरा देश
बदलने वाला हो
मानवों को संसाधनों में
पीने वाला हो
हजारों हजार लीटर कच्चा तेल
सता रही हो उसे
अपने गोदाम को बाज़ार में खाली करने की फ़िक्र
रौंदने वाला हो 
एक पूरी की पूरी कौम को आतंकवादी बताकर
चबा जाने वाला हो
एक 
पूरी की पूरी भाषा
काट खाने वाला हो 
किसी मजदूर के हाथ पैर
रात भर चोरी चोरी बदल रहा हो शब्दावलियाँ
तानाशाही को जनवाद में 
लूट को शांति बता रहा हो
रच रहा हो
पूरी की पूरी विष की विचारधारा
फिराक में हो
दिमागों के शिकार के
इन्हें नींद आनी चाहिए
सुला दो इन्हें
वही गीत गाकर
जो तुमने गाया है
धान रोपते हुए
महुआ चुनते हुए
पेड़ों से लकड़ियाँ काटते हुए
चरखा कातते हुए
फाँसी पर चढ़ते हुए
अल्फ्रेड पार्क में गोलियां खाते हुए
किसी तानाशाह का सर कुचलते हुए
सुला दो इन्हें
इन्हें नींद आनी चाहिए
और यह नामुमकिन नहीं है...
©अरमान आनंद

Monday, 20 February 2017

विचार 1

इस दुनिया में SATISFACTION से महत्वपूर्ण चीज़ कुछ नहीं हुई। इसका सीधा संबंध आनंद, परितोष और मुक्ति से हैं। साहित्यकार बनने के लिए यह पहली शर्त है । साहित्यकार  अपनी रचना से कितनों को किन्हें और  कैसे satisfy कर पाते हैं । उनके वर्गीकरण और आलोचना का इससे महत्वपूर्ण पैमाना नहं हो सकता।
अरमान

Sunday, 19 February 2017

लघु कविता

किसी को जाते हुए देखना भी खूबसूरत हो सकता है
.
देखो
दुःख दूर जा रहा है
.
जाना
हमेशा खौफनाक क्रिया नहीं होती
अरमान

Friday, 3 February 2017

मकबूल

मकबूल - अरमान आनंद (कविता)
--------------------------
फिल्म के पोस्टर बनाता था
एक लड़का
मुम्बई की सड़कों पर
सीढियाँ लगा कर लोइयों से पोस्टर के चौकोर हिस्से आपस में  चिपकाया करता था
जैसे आकाश पर चाँद सितारे चिपका रहा हो
और फिर सबसे आँखें बचा कर
नीले कोरे समंदर पर बादल से उड़ते घोड़ों की हिनहिनाहट लेप देता

गर्द उड़ाते हवा से बातें करते
शानदार अरबी घोड़े
और उनकी पीठ पर हिंदुस्तानी कहानियां चिपकी होतीं

कैनवास पर उभरते बदन के पेचों खम को उसके हाथ यूं तराशते जैसे
गुलाम अली की कोई गजल चल रही हो

रुईयों की तरह सफ़ेद झक्क
अमिताभ कट वाले बाल
गोल चश्मा
कुरतेबाज़ बदन
कूचियों में उलझी लंबी उँगलियाँ
और
ख़ाली खुले पैर
जाने क्या ज़िद थी

उसकी अम्मी बचपन में गुजर गईं थीं
वह जब भी आकाश से उतरता
भागती गोल धरती को कैनवास सा बिछा देता
और देर तक
गोल गोल रेखाएं खींचता
और इन सबसे ऊब जाता
तो भीमसेन की आवाज पर रंगों का डब्बा उड़ेल देता

कहते हैं एक दिन किसी ने उसकी कूचियां चुरा लीं
और रंगों का वह रूठा बादशाह अपने ही अरबी घोड़े पर बैठ कर कहीं दूर चला गया

भला कोई किसी से उसकी मां दो बार कैसे छीन सकता है
लेकिन उसके साथ ऐसा ही हुआ

अब वह भी दूर तक बिछे रेत में
गोल गोल आकृतियां बनाता है
उन गोलाइयों के बीच मादरे हिन्द की याद में बिलखता प्यासे रेगिस्तान के होठ अपने आंसुओं से तर करता है

मकबूल फ़िदा हुसैन
एक वो शख़्स जिसने हिंदुस्तान का नाम पूरी दुनिया में मकबूल किया
हिंदुस्तानी उसे सिवा नफरतों के कुछ नहीं दे पाए

अरमान आनंद

Saturday, 28 January 2017

ख़िलजी का इश्क़


औरतों से ऊब गया अलाउद्दीन खिलजी

उसने जब मलिक काफूर को पहली बार बाजार में बिकते देखा 

उसकी ऊब ने उसे इश्क का शिकार बना दिया

काफूर का लोहे सा बदन और उसकी पसीने की गंध

खिलजी के भीतर एक औरत को जिंदा करती

हर शाम जब खिलजी

जब खूब नशे में होता

घाघरा और चोलियां पहन लिया करता

औरतों के कपड़ों में खिलजी का गोरा और छरहरा बदन खूब फबता था

आँखों के काले सुरमों को काजल से और

कान के मोटे कुंडलों को बालियों से बदलता

पलकेँ भी नाज़ो अदा से उठाने की कोशिश करता था

काफूर जंगी आदमी था

उसे बिस्तर से ज्यादा घोड़े की पीठ और जंग के मैदान पसंद थे

काफूर से मिलने से पहले खिलजी के शौक भी कुछ इसी तरह के हुआ करते थे

आजकल कजरियां गुनगुनाता था खिलजी

याद पिया की आये हाय...

इश्क में गिरफ्तार खिलजी की साँसे धौंकनी सी हो जातीं

जब मलिक काफूर के घोड़े की टापें महल में लश्कर के साथ पड़तीं

हिंदुस्तान के तमाम इलाकों को जीतने की ख्वाहिशें खिलजी ने  

मालिक के कानों में फुसफुसाते हुए जाहिर की थीं 

मलिक भी अपने माशूक मालिक की हर ख्वाहिश उसके बिस्तर पर लाकर देता रहा

अलाउद्दीन खिलजी की एक इंसानी आदत थी

वह ऊब जाता था

वह ऊब कर गश खा गया एक रोज जब उसने पद्मिनी को देखा

मलिक काफूर ने पद्मिनी को तबाह कर दिया
........अरमान आनंद

Friday, 27 January 2017

अरमान आनंद की मशहूर कविता तीस की उम्र में ब्रेकअप

तीस की उम्र में ब्रेकअप (कविता ) अरमान आनंद
..............................................

कविता जानती है
कि उसकी जवानी मुट्ठी में बंद रेत है

पिछले पांच ब्रेकअप में तीन तो नादानी में हो गए 
चौथा उससे कम उम्र का था
इसलिए शादी के मूड में नहीं था
और पांचवां
बेहतरी के तलाश में
कुछ और कम उम्र की
और कुछ कम फ्रस्टेटेड लड़की की तलाश में निकल गया

कविता को शुरुआत में जींस बिलकुल भी पसंद नहीं थी
लेकिन उम्र की ढलान आने लगी है 
तो उसने जींस पहनना शुरू कर दिया है
उसे ऐसा महसूस होता है
कि 
इसमें उसकी उम्र कुछ कम लगती है
नितम्बों का उभार कुछ और खिलता है
लड़कों के दिल में
उसके लिए प्यार कुछ और खिलता है

बालों की स्ट्रेटनिंग और मेकअप ने तीस से छब्बीस तो बना ही दिया है
लेकिन सोच पर उम्र का असर तो आ ही जाता है

अबकी बार जो भी मिलेगा
मजा लेकर निकल जाने नहीं देगी कविता
पहले पूछेगी
शादी तो करोगे न

सुनो
मैं उस टाइप की लड़की नहीं हूँ
एक जिस्म भर नहीं हूँ मैं
सिर्फ फ़िल्में देखने और साथ घूमने वाली भी नहीं हूँ

मैं सब समझती हूँ
सब जानती हूँ

कविता ने एक लिस्ट बनाई है
वह वो सब पूछेगी
जिसके बिना पर उसे पिछले सारे लड़कों ने उसे ब्रेकअप दे दिया था

क्योंकि अब उसके पास गलतियाँ करने भर की उम्र नहीं बची है

अब प्यार भी उसी से करेगी जो शादी करेगा

हो तो यह भी सकता है कि वह पहले शादी करले
फिर उसे उसी से प्यार हो जाये
जैसा मम्मी और पापा को हुआ
बुआ और फूफा को हुआ

लेकिन वो सारी बगावती बातें
जो हॉस्टल में उसने अपनी सहेलियों को आलोकधन्वा की कविता पढ़कर सुनाते हुए समझाई थीं
ओह
कैसे मुंह दिखाएगी सहेलियों को

वैसे कहाँ लिखा है कि शादी की ही जाए

लेकिन कविता को दुल्हन बनने का बड़ा शौक है
वो अपनी शादी में बिलकुल वैसा ही लहंगा बनवाएगी जैसा कटरीना ने फिल्म में पहना था
कविता ने दिलवाले दुल्हनियां कई कई बार देखी है
बचपन में राज राज चिल्लाती सरसों के खेत में बावली सी दौड़ा करती थी

प्यार तो बेहद जरुरी चीज़ है
बिना प्यार के कैसे जी पायेगी वो
और सच भी तो है
कोई कैसे किसी से बिना देखे, मिले या जाने शादी कर ले
प्यार होना जरूरी होता है 

क्या एक बार और प्यार किया जा सकता है
क्या एक बार और कहा जा सकता है
कि मैं बस तुम्हारे लिए बनी हूँ
मैं बस तुम्हारे लिए जीना चाहती हूँ
मैं बस तुम्हारे लिए मरना चाहती हूँ
और वो बस ये कह दे
हाँ मैं तुमसे शादी करूँगा

कविता ने इसके अलावे दुनिया का हर लफ्ज सुना है
सिवाय इसके

तीस की उम्र में ब्रेकअप
आपको रोने भी नहीं देता ठीक से

हॉस्टल का पंखा कितना धीमे धीमे चलता है
उसे अब ख्याल आया है 
जून के महीने में ब्रेकअप नही करना चाहिये था उसे
गर्मी से वैसे ही सर फट रहा है
दिल टूटने से या गर्मी से
किस से परेशान होऊं समझ नहीं आता

पिछले तीन साल से उसने कहाँ ध्यान दिया था
उसके कमरे की खिड़की से एक लड़कों वाला हॉस्टल दीखता है
दो मैना और एक कबूतर रोज उसकी खिड़की पर आते हैं

आजकल वह जब भी हॉस्टल लौटती है
एक बात गौर करती है
जिन लड़कियों के प्रेमी हैं
उनकी खिडकियों पर शीशे रखे होते हैं खाली उदास से
और जिनका ब्रेकअप हो चुका होता है
उनकी खिडकियों पे वो खुद होती हैं
शीशों की तरह

कविता कहीं भाग जाना चाहती है
लेकिन कहाँ
किसके साथ
उसके कानों में आलोक की थरथराती हुयी आवाज गूंजती है
लड़की भागती है
तो क्या जरुरी है उसके साथ
कोई लड़का भी भागा हो
लड़की भागती है दर्शकों से भरे जगर मगर स्टेडियम में
कविता बार बार सोचती है
अब इस उम्र में
क्या वह स्टेडियम में भाग भी सकती है
उसके भागने का इंतजार कर रहे उसके अपने लोग
क्या वाकई छुपायेंगे उसका शीशा उसका आबनूस उसकी सात पलों वाली नाव
उसके दुपट्टे के झुटपुटे में जिसे वह आलमारी में कहीं छोड़ आई है
क्या उसके पास कोई उम्र बची है

तीस की हो गयी कविता
सोचती है
कहाँ होगा वह लडका जो उसे कहीं भगा ले जाए

जिसका इंतज़ार हर समंदर के दरवाजे पर खड़ी वह कर रही है

Saturday, 14 January 2017

कविता अरमान

आदमखोर
और हव्वाखोर  चक्रवातों में फंसा हुआ
तुम्हारा यह कवि
संभावनाएं बो रहा है

तुम कविता के इस किसान की कब्र के लिए कुछ फूल उगाओ
कुछ वक्तव्य तैयार करो

सत्ता ने मेरे गर्दन की नाप मेरी दर्जी से खरीदी है
तुम उस दर्जी को कई वादों का सहारा दो
इस विवाद को खत्म करो
©अरमान

Friday, 6 January 2017

गाय

गाय
-------
कुछ इतिहासकार कहते हैं
पहले हिन्दू गाय खाते थे
लेकिन सबका मानना है
जब हम न हिन्दू थे न मुसलमान
बस जंगली इंसान थे
हम गाय क्या हाथी भी खा जाते थे
भारत के कई हिस्सों में लोग
कुत्ते बिल्ली भी खाते हैं
बिलकुल वैसे जैसे
लोग मुर्गा कबूतर सूअर ऊंट आदि आदि खाते हैं
जैसे मछली और चींटी के अचार खाते हैं
केकड़ा और सांप खाते हैं
..............................
कुछ लोग ये सब नहीं खाते
वे गाय का चारा खाते हैं
..........................
प्लास्टिक से भरा पेट लिए
भीख मांगती बुढ़िया वेश्या सी
सड़क पर घूमती दो मजबूत सींगों वाली गाय
उतनी खतरनाक नहीं है
जितने इसके नालायक बच्चे हैं
जो माँ की राजनीति तो करते हैं
माँ का ख्याल नहीं रखते
.....................
गाय माँ है
हम उसका दूध पीते हैं
लेकिन बकरी का दूध अधिक पौष्टिक होता है
लोग बकरी मेमना खाते हैं
गाय के प्रति बायस्ड हो जाना
भैंस का अपमान है
उसे मान हानि का मुकदमा ठोकना चाहिए
........................
गाय पहले दूध देती थी
अब
वोट देती है।
ये काम बात है
कि गाय ने विश्व के सबसे बड़े लोकतंत्र का मुखिया चुना है
©अरमान आनंद

Thursday, 5 January 2017

सर्द रात, सिनेमा हॉल और सिगरेट   (प्रेम कविता)

सर्द रात, सिनेमा हॉल और सिगरेट   (प्रेम कविता)
*******************
वह ओस से भीगी हुई रात थी

घने कुहरे ने चाँद सितारों को छुपा कर जब हमें बेशर्म हो जाने का भरपूर मौका दिया

आसमान सड़क के किनारे लगे पेड़ के पत्तों से टप टप टपक रहा था

खाली बेलौस सड़क पर तुम्हारी साँसे

मेरी बुल्लेट की आवाज की रजाई में दुबकी हुई गर्म हो रही थीं

तुम मेरे जैकेट में हाथ डाले मेरी पीठ से चिपकी हुई
अलसाई हुई
गुनगुना रही थी

अजीब दास्ताँ है ये कहाँ शुरू कहाँ ख़त्म ये मंजिलें हैं कौन सी  न तुम समझ सके न हम...

ये प्यार की गर्माहट भरी रात थी

हम अभी अभी हिन्दुस्तान के एक मशहूर सितारे की फ़्लॉफ फिल्म का लुत्फ़ उठा कर बाहर निकले थे

मैंने उस रात तुम्हें सिगरेट की तरह सुलगा दिया
पूरे कमरा इश्क से धुआँ धुआँ था

अगली सुबह तेरे हॉस्टल जाने के बाद
मैं कमरे में बड (सिगरेट का आख़िरी टुकड़ा ) की तरह इधर उधर होता रहा।

©अरमान आनंद

Tuesday, 3 January 2017

कविता

कुचलते हो
कुचलकर कितना मचलते हो
सोचो
किसी दिन वह पकड़ ले तुम्हारी लात
चबा जाये उँगलियाँ
उखाड़ दे नाखून
बना दे तुम्हारी हड्डियों का चूरमा
उलट दे पटक दे तुमको
डर लगता है न सोच कर
बताओ न
डरते हो इसीलिए डराते हो न

Wednesday, 28 December 2016

नायक

नायक
******
जो हत्या कर
अहिंसा पर भाषण दे सके
हमारे समय का नायक वही है

जो रिश्वत से मंच तक पहुंचे
और
भ्रष्टाचार पर बोलता रहे
हमारे समय का नायक वही है

जो क्रूरता पर डाल सके
मासूम मुस्कुराहटों का पर्दा
हमारे समय का नायक वही है

इस जटिल समय में
जो कुटिल हो सके
हमारे समय का नायक वही है

हम जिसका इंतज़ार कर रहे
उसका वेश जो धारण कर सके बहरूपिया
हमारे समय का नायक वही है
..........................
हमने न जाने कितनी लड़ाइयाँ उसके इंतज़ार में हारी हैं
...........................
हमारी लाशों पर जो समझौता कर सके
हमारे समय का नायक वही है

Tuesday, 27 December 2016

Thursday, 15 December 2016

कविता अरमान आनंद

सच समय के उस पार
राम ने मार दिया रावण को
और
कृष्ण ने कंस को

सच से बिलकुल दूर
हम रटते और दुहराते रहे
नायकों के इंतज़ार का सूनापन

मन्त्रों और मनगढंत उम्मीदों के बीच
पुष्ट करते रहे
अपनी भीतर के राक्षस का सीना

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सर गणेश दत्त