Thursday, 21 September 2017

अरमान आनंद की मशहूर कविता तानाशाह

तानाशाह 
.........................
लो रे लेखक 
उठाओ अपना पोथा-पतरा 
चढ़ जाओ उधर जिधर फांसी है 
तानाशाह का फरमान है 
लोकतंत्र की विचारधारा बासी है
तानाशाह
आदतन अमर होना चाहता है 
और ये तब तक चाहता है जब तक वह मर नही जाता 
तानाशाह ने जब मारी अपने दिमाग में गोली 
या कि जब
विश्व के सबसे बड़े तानाशाह ने छोटे तानाशाह का कर दिया क़त्ल 
क्या तुमने देखा 
तानाशाह के सर से निकलने वाला खून 
बागी के खून से कितना मिलता जुलता है 
कभी मिले हो तानाशाह से 
एक नियम पसंद तानाशाह 
निजी तौर पर बेहद अराजक होता है
वह कुछ भी हो सकता है 
एक बड़ा कलाकार 
कलाप्रेमी 
अभिनेता
मसखरा 
नया नया प्रेमी
धोखा खाया हुआ आशिक 
कवि 
अय्याश 
जुबान का पाबंद
हर जुर्म की सज़ा फांसी
और उसके फैसले नहीं बदलते
सिंहासन बदलता है वक्त बदलता है 
भूखंड बदलता है 
तानाशाह के तौर तरीके नहीं बदलते 

एक तानाशाह की सांसों से उठता है सिगार का धुंआ 
जैसे उठती है जहरीली गैस 
बद्जुबानों से भरे छोटे से कमरे में 
करती है उनके स्वप्नों में अनधिकृत प्रवेश 
वहां पलती स्त्री शिशु का गला घोंट देने के लिए 
जिसका नाम 
पिछले दिनों वो आजादी बता रहे थे 

तानाशाह को डर हथियारों से नहीं लगता 
तानाशाह को सबसे ज्यादा डर 
भीड़ में खड़े उस आखिरी आदमी के विचारों से लगता है 
जिसके मुंह में इन्कलाब बंद है 
वही आखिरी आदमी उसका पहला निशाना है 


लो 
मेरी खोपड़ी से निकाल लो मेरा दिमाग 
शहर की जिस भी गली से गुजरता दिखे तानाशाह का टैंक
उस टैंक के नीचे डाल देना
मेरा यकीन है तानाशाह के चीथड़े उड़ जायेंगे

Friday, 8 September 2017

जो जंग हम हर गए हैं - अरमान

जो जंग हम हार गए हैं
------------------------------
जो लड़ने गए थे
उनमें कुछ
दुश्मनों से मिल गए
कुछ
लौट गए अपने ग़ांव
कुछ जो अनभिज्ञ थे
साजिशों से
लड़े
और मारे गए
वह कवि
जिसने युद्ध गीत लिखा
भूखा मरा
दूसरा कवि
जिसने
लिखा प्रशस्ति गान
उसे चीटियां खा गयीं
सेनापति देर तक लड़ा
और राजा ने
एक झटके में
अधीनता स्वीकार ली
जो पागल थे
झंडे को छुपाये जंगल चले गए
जो आशिक थे
उन्हें माशूकों ने दुत्कार दिया
वह
जो जंग हम हार गए हैं
उसमें
दुश्मन से अधिक
स्वार्थ की जीत हुई है
Armaan anand singh

Saturday, 19 August 2017

मानवता निर्माण की बेचैनियों और भाषा के समर्थ कवि हैं त्रिलोचन -अरमान आनंद


भूख और प्यास

आदमी से वह सब कराती है
जिसे संस्कृति कहा जाता है
जीने की कला ( कविता ) त्रिलोचन


                                                  त्रिलोचन शास्त्री हिन्दी साहित्य के उन मूर्धन्य कवियों में हैं जिन्होंने कविता को न सिर्फ लिखा बल्कि उसे जिया भी है। त्रिलोचन कि कविताएं मनुष्यता के निर्माण की बेचैनियों की कबकबाहट को अपने भीतर समाहित किये  हुए अपने पथ पर अग्रसर मिलती हैं।  भाषा मे गंवई सुगन्ध और अपने प्रयोगों के कारण हिंदी साहित्य की भारी भीड़ में भी त्रिलोचन की कविताएं अलग दिखती हैं।  यही वजह है कि प्रख्यात आलोचक नामवर सिंह ने इनकी कविताओं के लिए एक अलग काव्यशास्त्र की मांग कर दी। 
त्रिलोचन शास्त्री का असली नाम वासुदेव सिंह था। उत्तर प्रदेश के सुल्तानपुर जिले के कटघरा चिरानी पट्टी गांव में इनका जन्म हुआ। इनके पिता का नाम जगरदेव सिंह था। त्रिलोचन शास्त्री ने बनारस हिन्दू विश्वविद्यालय से एम ए तथा लाहौर से शास्त्री की परीक्षा ऊत्तीर्ण की। यहीं लाहौर से शास्त्री शब्द उनके नाम के पीछे चिपक गया।  संस्कृति को पेट से जोड़ कर देखने वाले शास्त्री जी आधुनिक हिंदी कविता में नागार्जुन और शमशेर के साथ प्रगतिशील त्रयी में गिने जाते हूं। इन्होंने गीत , नवगीत, सॉनेट, कविता, कहानी और लेख विधाओं में अपनी साहित्य साधना की। 
        स्वभाव से फक्कड़ त्रिलोचन शास्त्री हिंदी के अतिरिक्त अरबी और फ़ारसी के भी अच्छे जानकार थे। इन्होंने पत्रकारिता के क्षेत्र में प्रभाकर, वानर, हंस, आज और समाज जैसी पत्रिकाओं का भी सफल संपादन किया। मार्क्सवादी विचारधारा के पोषक त्रिलोचन शास्त्री 1995 से 2001 तक जन संस्कृति मंच के राष्ट्रीय अध्यक्ष भी रहे।

वे लिखते हैं -

'दीवारें ! दीवारें ! दीवारें ! दीवारें !
चारों ओर खड़ी हैं। तुम चुपचाप खड़े हो
हाथ धरे छाती पर, मानो वहीं गड़े हो।
मुक्ति चाहते हो तो आओ धक्के मारें
और ढहा दें। उद्यम करते कभी न हारें
ऐसे वैसे आघातों से। स्तब्ध पड़े हो
किस दुविधा में। हिचक छोड़ दो। जरा कड़े हो।
आओ, अलगाने वालें अवरोध निवारें।'

समाज की पुरानी और सड़ी गली व्यवस्थाओ को उखाड़ फेंकने के लिए वे लिखते हैं
'अगर घुटन हो, प्राण छटपटाएं तो घेरा

तोड़-फोड़ दो, क्योकि हुआ है नया सबेरा।'

या फिर
'बीज क्रांति के बोता हूँ मैं, अक्षर दाने

हैं, घर बाहर जन समाज को नये सिरे से
रच देने की रूचि देता है। घीरे-घीरे से
रहना असम्मान है जीवन का अनजाने।'

शास्त्री जी ने करीब 550 सॉनेट लिखे। प्यार शीर्षक सॉनेट में वे लिखते हैं
बिना बुलाये जो आता है प्यार वही है

प्राणों की धारा उसमें चुप चाप बही है

देशकाल शीर्षक से उन्होंने एक कहानी संग्रह भी लिखा । इसके अलावा धरती (1945), गुलाब और बुलबुल (1956), दिगंत (1957), ताप के ताये हुए दिन (1980), शब्द (1980), उस जनपद का कवि हूँ (1981), अरघान (1984), तुम्हे सौंपता हूँ (1985), चैती (1987) आदि काव्य संग्रह लिखे। 
ताप के ताये हुए दिन के लिए उन्हें साहित्य अकादमी 1981 पुरस्कार भी दिया गया। उन्हें शलाका सम्मान एवं अन्य सम्मान भी मिले।

त्रिलोचन ने समाज की विभिन्न विसंगतियों के मद्देनजर भी कविताएं लिखीं। स्त्री शिक्षा को बढ़ावा देने के लिए उन्होंने चम्पा काले अक्षर नहीं चिन्हती जैसी प्रसिद्ध कविता लिखी।
मैने कहा चम्पा, पढ़ लेना अच्छा है

ब्याह तुम्हारा होगा , तुम गौने जाओगी,
कुछ दिन बालम सँग साथ रह चला जायेगा जब कलकत्ता
बड़ी दूर है वह कलकत्ता
कैसे उसे सँदेसा दोगी
कैसे उसके पत्र पढ़ोगी
चम्पा पढ़ लेना अच्छा है! 

चम्पा बोली : तुम कितने झूठे हो , देखा ,

हाय राम , तुम पढ़-लिख कर इतने झूठे हो
मैं तो ब्याह कभी न करुंगी 
और कहीं जो ब्याह हो गया
तो मैं अपने बालम को संग साथ रखूंगी 
कलकत्ता में कभी न जाने दुंगी
कलकती पर बजर गिरे।

त्रिलोचन की कविताओं में गांव की मिट्टी की खुशबू है। वे अपनी भाषा के लिए तुलसीदास को प्रेरणा स्रोत मानते हैं
तुलसीबाबा , भाषा मैंने तुमसे सीखी

मेरी सजग चेतना में तुम रमे हुए हो ।

त्रिलोचन की कविताओं में पलिहर , थेथर, बारी इनार मड़ई, सिवान जैसे शब्दों की भरमार है। नगई महरा शीर्षक कविता की भाषा तो बिल्कुल मातृभाषा सरीखी हो गयी है 

'नगई खाँची फाँदे बैठा था
हाथों में वही काम
आँखे उन हाथों को
हयवट चिताती हुई
खाँची में लगी एक आँख मुझे भी देखा
और कहा बैठो उस पीढ़े पर
साफ है मैंने कुछ ही पहले धोया है
बैठने पर मुझसे कहा
अच्छा बाँच लेते हो रामायन
तुम्हारे बापू कहते थे जैसे
अब कोई क्या कहेगा
उनकी भीतरी आँख खुली थी
सुर भी क्या कंठ से निकलता था
जैसे असाढ़ के मेघ की गरज'

शास्त्री जी की कविताओं की एक अन्य खास बात है लोकध्वनियाँ। इनके यहां लोकध्वनियों का ऐसा प्रयोग मिलता है जो सम्पूर्ण हिंदी साहित्य में आज भी अनूठा और दुर्लभ है। 
ये दिन न भुला ऽ ऽ ऽ ऽ ना। और सनेही

नींबू के फूले, बेला के फूले
कहीं किसी बारी में भूले भूले
विलग मत जा ऽ ऽ ऽ ना। ओ सनेही
मंजर गए आम। कोयलिया न बोली
बाटों के अपने। हाथ उठाए धरती।
बसंत सखी को बुलाए
पेड़ हैं सब काम
कोयलिया न बोली।

त्रिलोचन का अंतिम समय बहुत कष्टकर रहा। बुढ़ापे में विस्मृति के शिकार रहे। वे अक्सर रास्ता भटक जाते और कई दिनों बाद कहीं भीख मांगते मिलते। उन्होंने कविता भी लिखी

भीख माँगते उसी त्रिलोचन को देखा कल

भीख माँगते उसी त्रिलोचन को देखा कल
जिस को समझे था है तो है यह फ़ौलादी
ठेस-सी लगी मुझे, क्योंकि यह मन था आदी नहीं,
झेल जाता श्रद्धा की चोट अचंचल,
नहीं सँभाल सका अपने को।
जाकर पूछा ‘भिक्षा से क्या मिलता है। जीवन

त्रिलोचन ने शेर और ग़ज़लें भी लिखीं
कोई दिन था जबकि हमको भी बहुत कुछ याद था

आज वीराना हुआ है, पहले दिल आबाद था।
×××××××××××××××××××××××××××××

गुल गया, गुलशन गया, बुलबुल गया, फिर क्या रहा

पूछते हैं अब वो ठहरा किस जगह सैयाद था।

मारे-मारे फिरते हैं उस्ताद अब तो देख लो,

मर्म जो समझे कहे पहले वही उस्ताद था।

9 दिसंबर 2007 को गाजियाबाद में त्रिलोचन शास्त्री का निधन हो गया। त्रिलोचन तुलसी , ग़ालिब , निराला की परंपरा के कवि थे। उनके जीवन मे कबीर सा फक्कड़पन और अक्खड़पन झलकता है। 
यूं तो भारत मे कई बड़े कवि हुए। लेकिन कह सकते हैं कवि होना और बात है त्रिलोचन होना और बात। उन्होंने साहित्य और मानवता की सेवा में अपनी हर सांस समर्पित कर दी।

भाव उन्हीं का सबका है

जो थे अभावमय
लेकिन अभाव से तपे नहीं
जागे स्वभाव में थके

                                                                                                                         
                                                                                                                          अरमान आनंद


Tuesday, 8 August 2017

मेरे शेर अरमान

बस्तियां दिल की तन्हा बसर नहीं होती
मुहब्बत कभी अकेले असर नही होती

Thursday, 27 July 2017

अंतरात्मा

अंतर आत्मा(कविता)
.....................
सुना है
आत्माएं
अकेली रातों में
खंडहर की टूटी मुंडेरों पर गुनगुनाती हैं
पायल
बजाती हुई
अक्सर अनजाने राहगीर को बुलाती हैं
आत्माएं
अतृप्त होती हैं
चांदनी रातों में
सफ़ेद गाउन पहने
महल की खिड़कियों से दिख जाती हैं
आत्माएं
खूबसूरत और डरावनी होती हैं
मासूम आत्माएं
तांत्रिकों के लिए व्यवसाय हैं
गप्पीयों के लिए कहानियां हैं
राजनीतिज्ञों के लिए
समय समय पर इस्तेमाल में आने वाली चीज़ हैं
वे इसे अंतरात्मा पुकारते हैं
अरमान

Thursday, 6 July 2017

सायकिल

साइकिल
..............................
गांव में था
तो लड़कियों के पास उतनी सायकिलें नहीं थीं
जितना लड़कों के पास थीं

किताब और अपने दिमाग के बीच का रास्ता पांव से तय करती थीं

गांव के लड़के
अपनी सायकिल के हैंडिल में चाइनीज हॉर्न लगवाते
कैसेट के रील की झालर लटकाते
करिश्मा कपूर की तस्वीर वाली बरसाती
या फिर वो
जिसमे लिखा होता

फिर मिलेंगे

लड़कियों को रिझाने के लिए रोज बालों में करू तेल लगा कर चमकाया जाता
गुटखाखोर मुंह में तिरंगा दबाए आई लभ यू बोलने की प्रैक्टिस होती
छोटका भाई के हाथ मे लेमनचूस और पॉकेट में चिट्टी दे कर
फ्री मैसेजिंग का मजा लिया जाता

लड़कियों के सपनों में हरी काली लाल साइकिलें होती
जिस पर सवार लड़का उसे शहर घूमने का वादा करते
खेत के रास्ते सिनेमा हॉल तक ले जाता था

कभी कभी अंधेरे मुंह
प्रेमियों को लेकर सायकिलें
पंजाब भाग जाया करती थीं

मेरे कॉलेज के दिनों में पता चला
सरकार ने
लड़कियों को सायकिलें दिलवा दीं
लड़कियां
अब गुलाबी साइकिलों  से लड़कियां पढ़ने स्कूल जाने लगी
आगे वाली डोलची में
बस्ता रखे हुए

लड़के मोटरसाइकिल के सपनों में मशगूल हो गए

जब शहर आया
अधिकांश लड़कियां सायकिल चढ़ चुकी थीं
ये स्कूटी का जमाना था

एक स्कूटी पर तीन तीन की खेप में महिला महाविद्यालयों से निकलतीं

लेकिन सायकिल
अब भी टुनटुनाती हुई उनके जीवन मे आजाती
कभी प्रेम दिन में

कभी सुहाग रात में

अरमान आनंद

Wednesday, 5 July 2017

यशोधरा अरमान आनंद

यशोधरा
.............
कई
घंटों
दिनों
महीनों
वर्षों
युगों से
घूम रही है पृथ्वी

तुम
भी घूम रहे हो न जाने कब से

मैं
खिड़की पर पड़ी हुई आंख हूँ

मेरा मन भी घूम रहा है
छोड़ कर मेरे शरीर को
घँटों,
दिनों,
महीनों,
वर्षों
और युगों से
तुम्हारे पीछे-पीछे

कुछ नहीं ठहरता है बुद्ध

अरमान

Sunday, 25 June 2017

प्रिय अनिल यादव के लिए कविता

ये जो सुलगती सिगरेट को
मशाल की तरह उठाये हुए
है जो शख्स
जिंदगी को धुएं में उड़ाए हुए

खेत में खुशियाँ उगाने
हेंगा चला कर आया है

रंजो गम ने पूछा पता
ठेंगा बता  आया है

सभ्यता जिसके शहर में बदनाम है
अनिल यादव उसका नाम है

आईटी सेल कविता

आई टी सेल

करे कबड्डी खो खो खेल
आई टी सेल आईटी सेल

लिखना और पढ़ना फेल
आईटी सेल आईटी सेल

जनता का बिगाड़े मेल
आई टी सेल आईटी सेल

खाते पीते दिमाग का जेल
आईटी सेल आईटी सेल

इंटरनेट hp और dell
आईटी सेल आईटी सेल

ये सब है सत्ता का खेल
आईटी सेल आईटी सेल

कविता अरमान आनंद

आडवाणी
चौराहे पर खड़े गांधी हैं

कहीं जा नहीं सकते
आ नहीं सकते
गांधी के पास लाठी है
लेकिन वे
सर पर बैठा कौआ नही उड़ा नही सकते

चुप चाप
सड़क पर
बलात्कार कर फेकी गयी लड़की को देखते हैं
जिसका चेहरा
भारत माता से मिलता जुलता है

सीमेंट की धोती
आधी फट नही पाती

नंगे समाज की ओर जाती
मुंह काला कर
पृथ्वी पर लेटी हुई सड़क पर

एक नंगी लड़की

ओह
अच्छा हुआ
चश्मे पर कबूतर बीट कर गया है

गांधी की लाठी पकड़
भविष्य की ओर जाता हुआ लड़का
दलालों के कंधे पर बैठ
विश्व भ्रमण पर निकल गया है

आडवाणी
चौराहे पर खड़े गांधी हैं
जिसके सर और चश्मे पर कौवे - कबूतर बीट कर रहे हैं

एक फर्क है

कहते हैं
शहर में कौओं की पहली खेप आडवाणी लाये थे
सुना है उन्होंने
गांधी के बच्चे को लाठी बनने से रोका था

( Ravish Kumar के एक लेख को पढ़कर)

-अरमान आनंद

Saturday, 24 June 2017

पुरानी प्रेमिकाएं अरमान आनंद

पुरानी प्रेमिकाएं
.......................
तुम खुश हो
जानकार खुश होता हूँ

तुम दुखी हो जानकार दुःखी

मेरी भीतर जो स्त्री है
उसे तुम सब ने मिल कर बनाया है
और जो पुरुष है
उस पर
तुम सबका उतना ही अधिकार है
जितना मेरी नई प्रेमिका का

मेरी पुरानी प्रेमिकाओं
तुमसे कभी मैं नफरत नही कर सकता
तुम मेरा गुजरा हुआ वक्त हो
वक्त बेशकीमती होता है

तुमने मेरी खीझ आलस्य गुस्से सबको प्यार दिया है
इतना प्यार
जिसे मैं लौटा नहीं सकता
न लौटाना चाहता हूँ
मुझे कर्जदार की तरह मरने दो
जो तुम्हारे आभाव में फटेहाल दम तोड़ेगा

तुम पहले से ज्यादा खूबसूरत हो गयी हो
पहले से ज्यादा आत्मविश्वास झलकता है तुम्हारे भीतर
स्त्री टूटकर पहले से ज्यादा मजबूत हो जाती है
पुरुष टूटता है
तो बिखरता चला जाता है

ये जानकार भी कि तुम अब मुझे प्यार नहीं करती
इतना विश्वास है अभी भूली नहीं होगी
ख़ास कर जब तुम अनदेखा करने की कोशिश करती हो
ओह ये तो किसी छोटे बच्चे जैसा है

मैं तुम्हारी आँखों में झांकना चाहता हूँ
ओह
ये आज भी उतनी ही पानीदार हैं

मैं जो ये इतनी दूर खड़ा हूँ
यकीन करो मेरा दिल घुटनो के बल है

मेरी ख्वाहिश है
मैं घर से जब भी बाहर निकलूँ
तुम मिल जाओ मुझे
अकेली ऑफिस जाती हुई
किसी दोस्त के साथ शॉपिंग करती हुई
या
किसी मॉल या सिनेमा हॉल में
अपने पति या प्रेमी के साथ घूमती हुई
या अपने बच्चे को चुप कराती हुई

तुम्हें पल भर देखना
प्यार को एक बार और जीने जैसा है।

अरमान आनंद

विचार अरमान आनंद

भारत के जो मध्यवर्ग मार्क्सवाद का बौद्धिक पोषण करता है वही पूँजीवाद का शरीरिक पोषण भी करता है -अरमान

सेना और पुलिस में वही अंतर है जो गाय और भैंस में है।

बाल अरमान आनंद

बाल
........
बर्फ में दबी हुई
एक लड़की की सबसे पुरानी
ममी

सबसे ज्यादा सही सलामत मिलते हैं बाल

माँ कहती थी
जामुन खाओ बेटा
पेट में गए हुए बाल तक को गला देते हैं

मतलब
बाल अजर अमर चीज़ है
जल्दी
जाता नही दुनियां से

प्रेमिकाएं चली जाती हैं
कमरे से
उनके बाल नही जाते

अरमान

क्षणिकाएँ 2017

1 पांव दबा कर चलने में
चाय
छलक ही जाती है

2

मेरी बाइक के पीछे बैठ
तुम अपनी ठोड़ी
मेरे काँधे से टिका देती हो
जैसे धरती टिकती है आसमान पर

3

वह पुरुष कैसा
जिसके सीने पर भाला
और पीठ पर
नाखून का निशान न हो

4
इस देश में
लाल देख कर
सिर्फ
साँढ़ ही धैर्य नहीं खोता

5

स्त्री विमर्श

पुरुष ने अपने अपराधों का टोकरा
अपनी पत्नी के माथे मढ़ दिया
पत्नी थी
कि
कलंक लिये
सारा शहर घूमती रही

Monday, 1 May 2017

प्रेम कविता

लौटना इतना आसान नहीं था
और आसान नहीं था
उसका भोर में देहरी की ऊंचाई फाँदना
आसान नहीं था
उसका गाँव की आखिरी छोर पर के उस बेरी के पेड़ तक पहुंचना
बहुत मुश्किल से उसकी फुनगी पर उसने अपना दुपट्टा बाँधा
काँटों में अपना समीज फड़वा बैठी
तलवों में आठ कांटे इश्क के धंसवाये
इश्क के टोटकों ने
आसान कर दिए मुहब्बत के रास्ते

अरमान आनंद

Tuesday, 28 March 2017

व्यक्तित्व विभाजन

जब कुछ लोग रोटी तलाश रहे हों
तुम उनकी संभावनाओं
का व्यापार कर
जाओ
किसी समुद्र के किनारे
और
रति में रत
रात की किसी सुबह
धोओ नमकीन पानी से अपना चेहरा
प्रेम विलाप में
जोर जोर से कराहो
पाब्लो की पंक्तियाँ
विश्व रंगमंच दिवस पर
करो
क्रंदन का शानदार अभिनय
उतारो कुछ सेल्फियां

तुलसी और मुक्तिबोध पर एक साथ बात करते हुए
रैदास को भूल जाने तुम्हारा अवसरवादी प्रयत्न
कितना अद्भुत है
जो आगामी पीढ़ियों को
चरित्रहीनता पर गर्व करने की सीख देता है

तुम कितनी शानदार मकड़ी हो
जो
अपने जाले में हर किसी को फंसाते हुए
एक साथ
समाजवाद
साम्यवाद
दक्षिणपंथ
जातिवाद
गोत्रवाद
क्षेत्रवाद
नस्लवाद
आतंकवाद
में अपनी आठों टाँगें जमा सकती हो

याद रखो दोस्त
जिस पाप को गंगा न धो सकी
उस
पाप की गठरी को समंदर की विशाल कोख भी छुपा नहीं सकती

Sunday, 19 March 2017

गौरैया -अरमान आनंद

गौरैया

गौरैया
तुम गायब हो गयी हो
क्या सचमुच गायब हो गयी हो तुम गौरैया ?
कितनी जरुरी थी तुम आँखों के लिए
तुम्हारा न दिखना डर, भय ,आशंका और आकुलता से भर देता है
कहीं तुम काली रात में घूमती सफेद बस में तो सवार नहीं हो गयीं
कहीं सिगरेट के दागों के साथ तो नहीं पायी गयी
पुलिस की किसी रेड में
हॉस्पिटल के पीछे
गर्भ से निकाल फेंकी गयी नवजात
तुम्हीं तो नहीं थी
जिसके लिए सड़क के कुत्ते छीना झपटी कर रहे थे.

गौरैया
बताओ न
तुम्हारी किडनी बिकी कि देह
मेरे घर की प्यारी लक्ष्मी
तुम अभी न उतरी थी आँगन की नीम से
कहाँ छुप्पा हो गयी
मैं तुम्हे ढूंढ के धप्पा बोलूंगा देखना
प्यारी गौरैया तुम्हे पता है
अनुपस्थिति अपने आप में एक राजनीति है
और गायब कर देना
सत्ता का
जादूगरों से भी पुराना खेल
प्यारी गौरैया
ये दुनियां कोई संसद् तो नहीं
जिससे तुम वाक आउट कर गयी हो
गौरैया तुमने एक बार सलीम अली के बारे में बताया था
उनसे पूछूँ क्या तुम्हारा पता
गौरैया बताओ न तुम गुजरात गयी कि पाकिस्तान
तुम्हारा कौन सा देश था गौरैया
तुम किस सरहद पर मारी गयी
तुम किसका लिखा  गीत गाती थी
इकबाल का या इकबाल का
हम तुम्हेँ ही बचाने के नारे लिख रहे थे
और तुम गायब हो गयी गौरैया
मेरी प्यारी गौरैया
कुछ बताओ न बताओ
ये तो बता दो
तुम्हें इश्क में शहादत मिली कि जंग में

Saturday, 18 March 2017

फैसला अरमान आनंद

फैसला
..........
बतौर कवि
और
दुनियां के अदने से चिंतक की हैसियत से
स्वयं को न्यायाधीश मानकर
सबसे पहले ये तय कर दिया मैंने
कि
सरकार ही आरोपी है
उसे फांसी दे दो
लिखा और
तोड़ दी कलम
कि इस आरोपी को
मौत तक
फांसी पर लटकाए रखा जाय

अब सरकार चाहे तो
मुझे
देशद्रोही करार दे
चाहे तो
नक्सली
चाहे तो
वह मुझे
पागल कहे
चाहे तो
मुझे उकसाये
आत्महत्या के लिए
जैसा किसानों को उकसाती है
अभावों के बीच रखकर

अपने साथियों का नरमुंड ले कर दिल्ली में भटकने के बदले

किसानों
उठो
कपास उगाओ
बनाओ फांसी की सबसे मोटी
और सबसे बड़ी फांद वाली रस्सी
जिसमे अंट सके
अंधेर नगरी वाले राजा का गला

तुम्हारा कवि
तुम्हारी रक्षा के लिए
आज जल्लाद की भी भूमिका अदा करेगा
©अरमान आनंद

Thursday, 16 March 2017

कूट देंगे

सुनो
ऐसा है
सवाल पूछोगे?
कूट देंगे
जवाब मांगोगे
कूट देंगे
हंसोगे
कूट देंगे
रोओगे
कूट देंगे
नाचोगे
कूट देंगे
कूदोगे
कूट देंगे
फांदोगे
कूट देंगे
किताब लिखोगे
कूट देंगे
व्याख्यान दोगे
कूट देंगे
मैंने पहना हुआ है
तीन रंग के झंडे का नकाब
उघाड़ोगे
कूट देंगे
तुम क्या जानो कितने षड्यंत्रों के बाद मिलती है सत्ता
छीनोगे
कूट देंगे

मेरे पास जुबान से बड़ी लाठी है
मेरे पास मेरे दिमाग से भी मोटी लाठी है
कुछो करोगे
कूट देंगे

©अरमान

इंतज़ार

इस नदी को बहने दो
और नदी किनारे के इस आखिरी पेड़ को मत काटना

जब जड़ता और पशुता से लड़ता मैं
किसी शाम थक जाऊंगा
या
कि कोई
धर्मांध खंजर
मेरी पीठ ,बाजु, और जाँघों को चीर देगा

मैं सिराहने तलवार रख
खुद को किसी पत्थर से टिकाये
यहीं
घावों को मिटटी से तर करता
या फिर
इसी पेड़ की छाँव में घनी नींद सोया मिलूंगा

और
तुम आओ
हक की लड़ाई में जीती
प्यास से हारी
अपना गला तर करने
इसी नदी के किनारे
अश्रु स्वेद रक्त औऱ
मिट्टी में लिपटी

एक बार मुझे अपनी जांधों पर सर रख कर सोने देना
एक बार मुझे अपनी बाहों में
लिपट कर रोने देना
भर लेना अपने गर्भ में मुझको
और
फिर लड़ने को एक लड़ाई
फिर एक बार मुझे होने देना
©अरमान

Tuesday, 28 February 2017

हिंसा

कुत्ते, सांप ,बिच्छू
यहाँ तक कि हिरण भी
डर से हिंसक हो जाते हैं
इंसानों तुम बताओ तुम्हारे हिंसक हो जाने का राज क्या है
क्योंकि
हिंसा के सिर्फ दो कारण हो सकते हैं
आत्मरक्षा और भूख
बताओ
तुम किससे डरे हो
या तुम किसे खा जाना चाहते हो

अरमान आनंद की कालजयी रचना नींद जिसे रात भर नहींं आती

नींद जिसे रात भर नहीं आती
...................................

नींद 
जिसे रात भर नहीं आती
मुमकिन है
वह दुनिया बदलने के सपने देख रहा हो
नींद
जिसे रात भर नहीं आती
मुमकिन है 
वह प्रतिघात की योजनाएं बना रहा हो
नींद 
जिसे रात भर नहीं आती
मुमकिन है
उसके कानों में गूँज रही हो 
बच्चों के रोने की आवाजें
नींद
जिसे रात भर नहीं आती
मुमकिन है उसकी बाहों में पड़ी हो एक सभ्यता की लाश
नींद 
जिसे रात भर नहीं आती
मुमकिन है वह अभी अभी जान गया हो 
सत्ता की सारी साजिशें
नींद
जिसे रात भर नहीं आती
मुमकिन है उसे प्रेम हुआ हो
नींद
जिसे रात भर नहीं आती
मुमकिन है उसे चाँद की लुका-छिपी पसंद हो
नींद
जिसे रात भर नहीं आती
मुमकिन है
उसे भागना है आज की रात
धता बताते हुए
किसी बूढ़ी खाप-पंचायत को
नींद
जिसे रात भर नहीं आती
मुमकिन है
वह निगलने वाला हो पूरा का पूरा देश
बदलने वाला हो
मानवों को संसाधनों में
पीने वाला हो
हजारों हजार लीटर कच्चा तेल
सता रही हो उसे
अपने गोदाम को बाज़ार में खाली करने की फ़िक्र
रौंदने वाला हो 
एक पूरी की पूरी कौम को आतंकवादी बताकर
चबा जाने वाला हो
एक 
पूरी की पूरी भाषा
काट खाने वाला हो 
किसी मजदूर के हाथ पैर
रात भर चोरी चोरी बदल रहा हो शब्दावलियाँ
तानाशाही को जनवाद में 
लूट को शांति बता रहा हो
रच रहा हो
पूरी की पूरी विष की विचारधारा
फिराक में हो
दिमागों के शिकार के
इन्हें नींद आनी चाहिए
सुला दो इन्हें
वही गीत गाकर
जो तुमने गाया है
धान रोपते हुए
महुआ चुनते हुए
पेड़ों से लकड़ियाँ काटते हुए
चरखा कातते हुए
फाँसी पर चढ़ते हुए
अल्फ्रेड पार्क में गोलियां खाते हुए
किसी तानाशाह का सर कुचलते हुए
सुला दो इन्हें
इन्हें नींद आनी चाहिए
और यह नामुमकिन नहीं है...
©अरमान आनंद

Monday, 20 February 2017

विचार 1

इस दुनिया में SATISFACTION से महत्वपूर्ण चीज़ कुछ नहीं हुई। इसका सीधा संबंध आनंद, परितोष और मुक्ति से हैं। साहित्यकार बनने के लिए यह पहली शर्त है । साहित्यकार  अपनी रचना से कितनों को किन्हें और  कैसे satisfy कर पाते हैं । उनके वर्गीकरण और आलोचना का इससे महत्वपूर्ण पैमाना नहं हो सकता।
अरमान

Sunday, 19 February 2017

लघु कविता

किसी को जाते हुए देखना भी खूबसूरत हो सकता है
.
देखो
दुःख दूर जा रहा है
.
जाना
हमेशा खौफनाक क्रिया नहीं होती
अरमान

Friday, 3 February 2017

मकबूल

मकबूल - अरमान आनंद (कविता)
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फिल्म के पोस्टर बनाता था
एक लड़का
मुम्बई की सड़कों पर
सीढियाँ लगा कर लोइयों से पोस्टर के चौकोर हिस्से आपस में  चिपकाया करता था
जैसे आकाश पर चाँद सितारे चिपका रहा हो
और फिर सबसे आँखें बचा कर
नीले कोरे समंदर पर बादल से उड़ते घोड़ों की हिनहिनाहट लेप देता

गर्द उड़ाते हवा से बातें करते
शानदार अरबी घोड़े
और उनकी पीठ पर हिंदुस्तानी कहानियां चिपकी होतीं

कैनवास पर उभरते बदन के पेचों खम को उसके हाथ यूं तराशते जैसे
गुलाम अली की कोई गजल चल रही हो

रुईयों की तरह सफ़ेद झक्क
अमिताभ कट वाले बाल
गोल चश्मा
कुरतेबाज़ बदन
कूचियों में उलझी लंबी उँगलियाँ
और
ख़ाली खुले पैर
जाने क्या ज़िद थी

उसकी अम्मी बचपन में गुजर गईं थीं
वह जब भी आकाश से उतरता
भागती गोल धरती को कैनवास सा बिछा देता
और देर तक
गोल गोल रेखाएं खींचता
और इन सबसे ऊब जाता
तो भीमसेन की आवाज पर रंगों का डब्बा उड़ेल देता

कहते हैं एक दिन किसी ने उसकी कूचियां चुरा लीं
और रंगों का वह रूठा बादशाह अपने ही अरबी घोड़े पर बैठ कर कहीं दूर चला गया

भला कोई किसी से उसकी मां दो बार कैसे छीन सकता है
लेकिन उसके साथ ऐसा ही हुआ

अब वह भी दूर तक बिछे रेत में
गोल गोल आकृतियां बनाता है
उन गोलाइयों के बीच मादरे हिन्द की याद में बिलखता प्यासे रेगिस्तान के होठ अपने आंसुओं से तर करता है

मकबूल फ़िदा हुसैन
एक वो शख़्स जिसने हिंदुस्तान का नाम पूरी दुनिया में मकबूल किया
हिंदुस्तानी उसे सिवा नफरतों के कुछ नहीं दे पाए

अरमान आनंद

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सर गणेश दत्त