Monday, 21 May 2018

सिद्धार्थ की कविता माड़

माड़

चुपके से देख रहा हूँ
माँ डेकची से माड़ पसा रही है
आज भी शायद भात कम पड़ जायेगा
कल की तरह
और माँ माड़ से ही माज लेगी अपनी जीभ
जो पेट तक जाती होगी। 

कल ही मास्टर साहब स्कूल में कह रहे थे
कथा अश्वथामा की
जिसकी माँ पीसकर चावल
बना लेती थी दूध
मैं भी सोचता हूँ
सीखूँगा जरूर माड़ से भात बनाने का हूनर
और परोसूँगा कभी
भरपेट थाली
अपनी माँ के लिये। 

सिद्धार्थ

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