साहित्यिक -सांस्कृतिक ई पत्रिका
बलात्कार
बलात्कार प्रतिदिन प्रतिक्षण होता है।।
कभी निगाहों से कभी बाहों से- अपने; मसलकर बलात्कारी डँसता है।।
संस्कृति सभ्यता स्त्री का कोमल मन वेदना से चीख़ता है।।
बेहोश बेखबर बदहवास बनकर समाज सोता है।।
स्मिता तिवारी 'बलिया'
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